नवजात को बचाने के लिए विचार व रिवाजों में मौजूद कचरा साफ करें: मोनिका
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रांची : संतोष कॉलेज ऑफ टीचर्स ट्रेनिंग एंड एजुकेशन में महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मनायी गई। आयोजन में एक अहम कार्य के लिए जागरुकता कार्यक्रम भी किया गया। “अनचाहे नवजात शिशु की रक्षा विषय” पर आयोजित इस कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत पारंपरिक तरीके से ढोल बजाकर, तिलक लगाकर किया गया।
संतोष कॉलेज की निदेशक रश्मि प्रसाद ने अपने संबोधन में बताया कि वंचित परिवारों के बच्चों की शिक्षा व संरक्षण के लिए उनके कॉलेज के बीएड संकाय के विद्यार्थी पहले से ही कृतसंकल्प हैं। ये उन बच्चों को न सिर्फ अच्छी शिक्षा दे रहे हैं, बल्कि उन्हें भोजन भी दिया जाता है। यह सब कार्य नि:शुल्क होता है। यही वजह है कि जो बच्चे पहले ठीक से बात भी नहीं कर पाते थे, अब इंग्लिश भी जानने समझने लगे हैं।
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि व वक्ता मोनिका गुंजन आर्य, संस्थापक पालोना ने शिशु हत्या और नवजात बच्चों के असुरक्षित परित्याग पर विस्तार से प्रकाश डाला। संबोधन की शुरुआत में उन्होंने महात्मा गांधी को याद करते हुए कहा कि जब भी स्वच्छता की बात होती है, हम केवल सड़कों, नालियों, वातावरण में फैले कचरे पर ध्यान केंद्रित करते हैं। उसी को साफ करने के लिए निकल पड़ते हैं, लेकिन आज जरूरत है कि हम अपने विचारों, रिवाजों और मानसिकता में मौजूद कचरे को भी निकाल बाहर करें। दिमागों का ये कचरा साफ करने की अत्यंत आवश्यकता है, क्योंकि ये नन्हें, मासूम बच्चों की जान ले रहा है।
उन्होंने कई वीडियो स्लाईड्स और तस्वीरों के माध्यम से अवांछित नवजात बच्चों की भयावह स्थिति को सबके सामने रखा। इसे रोकने के लिए युवाओं का आह्वान किया। कहा कि ऐसे बहुत से रास्ते हैं, बहुत से विकल्प हैं, जिन्हें अपनाकर शिशु हत्या जैसे जघन्य अपराध के पाप से बचा जा सकता है। इस अपराध की तह में छुपे मेडिकल रीजन्स का भी जिक्र किया। उनसे अवेयर रहने की जरूरत पर बल दिया। विद्यार्थियों से कहा कि वे अपने घरों, संबंधियों, परिजनों, घरों में काम करने वाले कर्मचारियों और दोस्तों से शिशु हत्या के मुद्दे पर चर्चा करें। विकल्पों की जानकारी जन जन तक पहुंचाने में सहयोग करें।
कार्यक्रम को लाईफ सेवर्स के अतुल गेरा ने भी संबोधित किया। बताया कि शिशु हत्या और परित्याग का एक प्रमुख कारण थैलेसीमिया भी है। उन्होंने कहा कि गांव देहात में थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों के लिए कहा जाता है कि वह खून पीता है। और उसे परिवार के लिए अपशकुन समझ कर त्याग दिया जाता है। यही नहीं, थैलेसीमिया का इलाज बहुत ही महंगा है। एक बच्चे के इलाज में 40 से 50 लाख रुपये तक खर्च हो जाते हैं, और वह भी सब जगह अवेलेबल नहीं हैं। इसलिए बच्चे को जन्म देने से पहले ये टैस्ट करवाना जरूरी है कि कहीं उसमें थैलेसीमिया के लक्षण तो नहीं हैं। उन्होंने कॉलेज की निदेशिका ऱश्मि मैडम से कॉलेज में थैलेसीमिया की स्क्रीनिंग के लिए कैंप लगवाने की अपील भी की।
कार्यक्रम का समापन डॉ. अनिता मिश्रा ने धन्यवाद ज्ञापन से किया। इससे पूर्व रुमानिया दत्ता ने गांधी जी का प्रिय भजन वैष्णव जन तो तैने कहिए..गाकर बापू को याद किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में संतोष कॉलेज के शिक्षक गण निभा कुमारी, हेमंत कुमार, एस. निशा, राकेश शुक्ला, अभिषेक कुमार आदि का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
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Edited By: Samridh Jharkhand
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