जागरूकता से दूर हो सकती हैं माहवारी संबंधित गलत धारणाएं: आराधना
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-74 प्रतिशत महिलाएं सेनेटरी नैपकिन का प्रयोग नही करतीं
रांची: पेयजल व स्वच्छता विभाग की सचिव अराधना पटनायक ने कहा है, कि जानकारी के आभाव में किशोरियां माहवारी संबंधी समस्याओं से ग्रसित होती है, लेकिन इसे जागरुकता के माध्यम से इस बाबत फैली तमाम गलत भ्रांतियां दूर हो सकती हैं। वे शुक्रवार को आहूत एकदिवसीय विभागीय कार्यशाला चुप्पी तोड़ो स्वस्थ रहो अभियान के शुभारंभ में लोगों को संबोधित कर रहीं थी।
इस मौके पर इससे संबधित पोस्टर रिलीज किया गया। सचिव ने कहा कि अभियान का नाम इसलिए ये रखा गया है, ताकि किशोरियां अपनी चुप्पी तोड़ कर खुलकर इस विषय पर बात करें। अभियान 28 मई से 27 जून 2019 तक चलेगा। इसके तहत विभिन स्तर पर माहवारी संबंधित जागरूकता अभियान का संचालन किया जाएगा, जो चार सप्ताह में होगा। पहले सप्ताह में प्रशिक्षण, दूसरे सप्ताह जागरूकता कार्यक्रम, तीसरे सप्ताह ग्राम, पंचायत और ब्लॉक स्तर पर एक्शन प्लान तैयार करना और चौथा सप्ताह कार्ययोजना में कार्रवाई करने का सप्ताह होगा। पटनायक ने कहा, कि माहवारी एक सामान्य प्रक्रिया है, जिससे हर महिला को हर महीने गुजरना पड़ता है। इसके लिए कई गलत धारणाएं लोगों के मन में होती है ,जिसे हम जागरूकता फैलाकर दूर कर सकते है। स्वच्छ भारत मिशन एवं यूनिसेफ के प्रयास से इस हेतु कई कदम उठाए जा रहे हैं, जिससे महिलाओं और किशोरियों को इस हेतु जागरूक किया जा सके।[URIS id=8357]
भारत सरकार में पेयजल स्वच्छता विभाग मंत्रालय के सह सचिव समीन कुमार ने कहा, कि नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे और यूनिसेफ की सर्वे के अनुसार, देश में मात्र 36 प्रतिशत महिलाएं माहवारी के दौरान सेनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं, जबकि 74 प्रतिशत महिलाओं को इसके बारे में जानकारी भी नहीं है। ये आंकड़े चौंकानेवाले हैं। ऐसे में तो देश में आधुनिकता को अपनाया जा चुका है, लेकिन फिर भी जब बात माहवारी की होती है तो लोग खुल कर बात नहीं करते। कहा कि लोग सेनेटरी नैपकिन के इस्तेमाल की बात तो करतें है, लेकिन इसके डिकंपोजिंग के बारे में भी लोगों को सोचना चाहिए। कारण यह कि एक सेनेटरी नैपकिन को नष्ट होने में चार सौ से पांच सौ वर्ष लगते हैं। होटल बीएनआर चाणक्य में आहूत इस कार्यक्रम के दौरान अराधना पटनायक ने कहा कि राज्य में जो महिलाएं या किशोरियां सेनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल नहीं करती, उन्हें इसके उपयोग और इसके निष्पादन की जानकारी देने की कोशिश की जाएगी। जागरूकता के माध्यम से ही इन अवधारणाओं को दूर किया जा सकता। ऐसे में पुरूषों और लड़कों की सहभागिता भी जरूरी है, क्योंकि वे भी समाज के अंग है।
इस दौरान यह भी जानकारी दी गई कि भारत में 64 फीसदी महिलाएं सेनिटरी नैपकिन की जगह-अलग अलग चीजें इस्तेमाल करती है. वहीं 28 फीसदी महिलाएं इसे बाहर फेंक देतीं है। 28 फीसदी महिलाएं कूड़ेदान में फेंकती है, जबकि 33 फीसदी नैपकिन को सुरक्षा के साथ जलाया जाता है, तो वहीं 15 फीसदी नैपकिन खुले में जला दिये जाते हैं। कहा कि इस अभियान के तहत किशोरियों, किशोर दीदी एवं भईया का समूह बनाया जायेगा व उन्हें प्रशिक्षित कर के जागरूकता अभियान में सम्मिलित किया जायेगा। इस मौके पर किशोरियों ने भी अपने अनुभव को साझा किया। कार्यशाला में डॉ मधुलिका जोनाथन सी.एफ.ओ. यूनिसेफ झारखंड, अबु ईमरान, निदेशक, एस.बी.एम, विभिन जिलों के एस.बी.एम के नोडल ऑफिसर एवं अधिकारी पदाधिकारी, कस्तुरबा विद्यालय कि किशोरियां, शिक्षिकाएं अभियान से जुड़े विभिन्न एनजीओ. के प्रतिनिधि भी मौजूद थे।
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Edited By: Samridh Jharkhand
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