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मुनमुन मरांडी : एक खिलाड़ी जो सेना में जाना चाहती थी, कैसे बन गयी मुखिया

दुमका : मुनमुड मरांडी दुमका जिले के सुदूरवर्ती गांव मोहलबना की निवासी हैं। यह गांव रानीश्वर प्रखंड क्षेत्र में पड़ता है। हालांकि मुनमुन मरांडी का बचपन व स्कूली जीवन पश्चिम बंगाल के वर्द्धमान में गुजरा, जहां उनका परिवार दशकों से रह रहा था। मुनमुन के दादा-दादी पश्चिम बंगाल के वर्द्धमान में एक चावल मिल में काम करने गए थे और वहीं बस गए। ऐसे में मुनमुन व उनकी दो बहनों ने वहीं पढाई-लिखाई की। इस दौरान मुनमुन के पिता शोभन मरांडी गांव में रहते और समय-समय पर परिवार का हाल-चाल लेने वर्द्धमान जाया करते।

गांव में रह रहे पिता की सहभागिता सामाजिक कार्याें में थी। ऐसे में मोहलबना सीट जब अनुसूचित जनजाति की महिला के लिए आरक्षित हुई तो ग्रामीणों ने शोभन मरांडी पर दबाव दिया कि वे अपनी बेटी को यहां से चुनाव में खड़ा करें। आखिरकार पिता ने मुनमुन को चुनाव लड़ने के लिए राजी किया और वे उम्मीदवार बन गयीं और चुनाव में जीत भी गयीं।

मुनमुन मरांडी अपनी बहन मणीमाला सोरेन के साथ।

 

मुनमुन मरांडी खो-खो, अतिया-पतिया सहित कई दूसरे खेलों की प्रतिस्पर्द्धा में हिस्सा लेती रही हैं। अतिया-पतिया में वे राष्ट्रीय स्तर तक खेल चुकी हैं। मुनमुन ने बताया कि 2015 में वे इस खेल में पश्चिम बंगाल की स्टेट चैंपियन रही हैं और इसी साल उन्होंने एनसीसी कंप्लीट किया था। वे इस समय वर्द्धमान से बीए आर्ट्स थर्ड ईयर की पढाई भी कर रही हैं।

खेल से सामाजिक जीवन में आने के सवाल पर मुनमुन कहती हैं, पापा पर सबने दबाव दिया कि बेटी को चुनाव में खड़ा कीजिए तो हम खड़ा हो गए, मेरा मन तो सेना में जाने का था।

मुनमुन ने 2018 में मैट्रिक की परीक्षा पास की और 2020 में इंटरमीडिएट किया है। इंटरमीडिएट में उनका विषय बांग्ला और संताली था।

मुनमुन मरांडी।

 

मुनमुन की छोटी बहन मणीमाला मरांडी भी वर्द्धमान में पढाई करती हैं और फुटबॉल खेलती हैं। सबसे छोटी बहन 13 साल की मुधमिता मरांडी हैं और वह भी पढाई करती है।

मुनमुन कहती हैं कि उनकी सफलता में सबसे बड़ा योगदान उनके पिता का है, अगर वे प्रोत्साहित नहीं करते तो यहां तक नहीं पहुंचतीं। वे रानीश्वर प्रखंड मुखिया समिति की उपाध्यक्ष भी हैं। उनका उद्देश्य समाज की बेहतरी के लिए काम करना है।

 

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