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कोयला क्षेत्र में रोजगार के संकट का एक और दौर, झारखंड में ऐसे प्रावधानों से बढेगी और दिक्कतें

झारखंड में कोल इंडिया की सहायक कंपनियों द्वारा अधिग्रहित बड़ी जमीन है। इनमें ऐसी भी जमीन है जिसे दशकों से खनन के लिए अधिग्रहित कर रखा गया है लेकिन वहां माइनिंग आरंभ नहीं हो सका है। वहीं, राज्य में दर्जनों ऐसे गांव हैं, जहां नौकरी एवं बेहतर पुनर्वास के लिए रैयत संघर्षरत हैं।

रांची : कोयला मंत्री प्रह्लाद जोशी ने नवरत्न कोल माइनिंग कपंनी एनएलसी इंडिया लिमिटेड – एनएलसीआइएल के लिए नयी आरएंडआर पॉलिसी – रिसेटलमेंट एंड रिहेबिटेशन पॉलिसी का 17 जनवरी 2022 को ऐलान किया। आरएंडआर पॉलिसी कोयला क्षेत्र में प्रभावित लोगों के स्थानांतरण एवं पुनर्वास से संबंधित नीति है। एनएलसीआइएल के लिए जिस तरह के प्रावधान लागू किए गए हैं, अगर उसे कोल इंडिया में लागू किया जाता है तो इससे झारखंड जैसे प्रमुख कोयला उत्पादक राज्य में दिक्कतें बढने की संभावना है। कोल इंडिया ही झारखंड में प्रमुख रूप से अपनी सहायक कंपनियों के माध्यम से खनन कार्य कर रही है।

एनएलसीआइएल के लिए किए गए नए संशोधन के बाद प्रभावितों को जमीन अधिग्रहण के बाद नौकरी नहीं मिलेगी, बल्कि उन्हें एक तय राशि में मुआवजा दिया जाएगा।  शहरी क्षेत्र में नौकरी के बदले 75 लाख रुपये प्रति एकड़ मुआवजा दिया जाएगा, जबकि ग्रामीण इलाके में 40 लाख रुपये प्रति एकड़ होगी। एन्युटी स्कीम के तहत प्रभावित परिवारों को सात हजार से 10 हजार रुपये प्रतिमाह 20 सालों तक दिया जाएगा, ताकि परिवार की आजीविका के लिए कैश फ्लो बना रहे। प्रभावित परिवार को 1000 वर्गफीट का आवास दिया जाएगा और इतनी ही जमीन में गाय रखने की भी जगह होगी। कोयला मंत्री ने इसकी घोषणा करते हुए कहा कि नई नीति में कई और ऐसी घोषणाएं है जिससे प्रभावित परिवार गरिमापूर्ण जीवन जी सकें।

झारखंड में कोल इंडिया की सहायक कंपनियों द्वारा अधिग्रहित बड़ी जमीन है। इनमें ऐसी भी जमीन है जिसे दशकों से खनन के लिए अधिग्रहित कर रखा गया है लेकिन वहां माइनिंग आरंभ नहीं हो सका है। वहीं, राज्य में दर्जनों ऐसे गांव हैं, जहां नौकरी एवं बेहतर पुनर्वास के लिए रैयत संघर्षरत हैं। इस संवाददाता ने राज्य के विभिन्न कोयला खनन प्रभावित गांवों के दौरे के क्रम में यह पाया कि जमीन लिए जाने के एवज में प्रभावितों की नौकरी, बेहतर पुनर्वास, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधा ये चार अहम मांगें हैं। ज्यादातर गांवों में विस्थापितों व प्रभावितों ने विस्थापित संघर्ष मोर्चा या इस तरह के मिलते-जुलते नाम का संगठन बना रखा है जिसके माध्यम से वे अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करते हैं और कोयला उत्पादक कंपनियों से बात करते हैं।

 

 

कोयला मंत्रालय के नए फैसले को लेकर सवाल पूछे जाने पर मजदूर यूनियन एटक के महासचिव लखन लाल महतो ने कहा कि हम इसके खिलाफ 23-24 फरवरी 2022 को राष्ट्रव्यापी हड़ताल करेंगे। उन्होंने कहा कि सरकार आधारभूत संरचना के कोर सेक्टर को बेचकर 6 लाख करोड़ रुपये जुटाना चाहती है और हम इसके खिलाफ लड़ेंगे। उन्होंने बताया कि आरएसएस से संबंद्ध मजदूर संगठन बीएमएस – भारतीय मजदूर संगठनों को छोड़ कर सभी के साथ हमारी बातचीत जारी है, 18 जनवरी को एक वर्चुअल मीटिंग हुई थी, फिर 27 जनवरी को रांची में बैठक करेंगे और आगे की रणनीति तय करेंगे। उनका आरोप है कि देश में कोल इंडिया के 160 माइंस ऑपरेशनल हैं, जिससे केंद्र सरकार 28 हजार करोड़ रुपया निकालना चाहती है।

लखन लाल महतो कहते हैं, “पुनर्वास व मुआवजा में एकरूपता नहीं है, जैसे बीसीसीएल 37 लाख रुपये मुआवजा देती है तो राजमहल परियोजना में 56 लाख मिलता है”। वे कहते हैं कि जमीन अधिग्रहण रैयत या टेनेंसी एक्ट वाली भूमि पर दिक्कत नहीं है, दिक्कत गैर मजरूआ जमीन पर है, जिसका सेटलमेंट कर दिया गया है, वहां 2011 से रसीद कटना बंद है। उनके अनुसार, राज्य सरकार का तंत्र जमीन का सत्यापन नहीं करता है। वहीं, बोकारो के बेरमो कोयलांचल क्षेत्र के प्रमुख कोयला विस्थापित नेता काशीनाथ केवट ने कहा कि झारखंड के कोयला क्षेत्र के परिप्रेक्ष्य में इस तरह के फैसले को लागू किए जाने से दिक्कत और बढेगी। रैयत जमीन नहीं देंगे और पहले से ही यहां कई कोयला खनन परियोजनाएं इसी वजह से लटकी हुई हैं।

झारखंड में बहुत सारी कोयला खनन परियोजना जमीन अधिग्रहण के कारण लंबित हैं और उसे आगे बढाने में नौकरी, पुनर्वास आदि के सवाल पर ग्रामीणों के तीखे विरोध का सामना करना पड़ रहा है। जैसे रजरप्पा परियोजना का विस्तार धोबैया के ग्रामीणों के विरोध के कारण लंबित है। ऐसे अन्य मामले भी हैं। कोल इंडिया में नौकरियां पहले से घट रहीं हैं और इसमें अगर नया बदलाव किया जाता है तो दिक्कतें और टकराव दोंनों बढेगा।

अध्ययन के अनुसार, झारखंड में कोयला क्षेत्र में चार असंगठित रोजगार पर एक संगठित रोजगार है। अगर नौकरियां देने में कमी आती है तो यह असंगठित क्षेत्र पर निर्भरता और बढेगी।

 

एटक के अध्यक्ष व पूर्व सांसद रमेंद्र कुमार ने इस संवाददाता को दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि कोल इंडिया एकमात्र कंपनी है जो जमीन के बदले नौकरी देती है, लेकिन कोयला क्षेत्र में प्रत्यक्ष रोजगार घट रहा है। कांट्रेक्ट पर नौकरियां बढी हैं और आवाज उठाने वालों को नौकरी से निकाल दिया जाता है।

कोल इंडिया ने 2020 में अपनी एन्युटी स्कीम बनायी थी, जिसे In Liue of Direct Employment or one – Time Monetary Compensation Against Land (प्रत्यक्ष रोजगार के एवज में या भूमि पर एकमुश्त मौद्रिक मुआवजा) के रूप में परिभाषित किया गया है। इसके तहत प्रभावितों को रोजगार के ऐवज में 150 रुपये डिसमिल प्रति माह की दर से न्यूनतम दो हजार रुपये और अधिकतम 30 हजार रुपये 30 साल तक देने की बात कही गयी है। ऐसे परिवार जो जमीन के नॉन टाइटल होल्डर हैं और अधिग्रहण से कम से कम तीन साल पूर्व से वे उससे आजीविका अर्जित कर रहे हैं, उन्हें भी 20 सालों तक दो हजार रुपये प्रति महीने एन्युटी स्कीम के तहत देने की बात कही गयी है। कोल इंडिया के शब्दों में ही एन्युटी स्कीम एक ऐसी व्यवस्था है, जो रोजगार के ऐवज में प्रभावित परिवार के टिकाऊ वित्त प्रवाह सुनिश्चित कराता है और कंपनी पर खर्च व वेतन का बोझ कम करता है। लेकिन, क्या ऐसे दो या तीन दशक की छोटी वित्तीय नकदी प्रवाह जैसे प्रावधानों से सदियों से उस भूमि पर पैदावार कर भरण-पोषण कर रहे परिवारों का संकट हल हो जाएगा।