Breaking News

Climate Change

निशान्त जब ग्लासगो में प्रधानमंत्री मोदी ने COP 26 के दौरान जलवायु परिवर्तन के खिलाफ़ वैश्विक जंग के संदर्भ में अंग्रेज़ी के शब्द LIFE के अक्षरों में छिपे एक मंत्र ‘लाइफ़स्टाइल फॉर एनवायरनमेंट’ का उल्लेख किया था, तब वो महज़ उनके चिर-परिचित अंदाज़ वाला शब्दों का खेल नहीं था। सोचने बैठिए तो पता चलेगा कि

मिस्र के शर्म-अल-शेख में आगामी नवंबर में आयोजित होने जा रहे संयुक्‍त राष्‍ट्र जलवायु परिवर्तन सम्‍मेलन (सीओपी27) से पहले विशेषज्ञों ने क्लाइमेट जस्टिस पर खास जोर देते हुए कहा है कि अगर इस पहलू पर ठोस कार्रवाई नहीं होती है तो सीओपी जैसे तमाम मंच बेमानी माने जाएंगे।  सीओपी27 से पहले जलवायु परिवर्तन के कारण

पेरिस समझौते के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए, विशेष रूप से वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए, पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था के डीकार्बोनाइजेशन में बहुत तेज प्रगति की आवश्यकता है। आज जारी ब्रेकथ्रू अजेंडा रिपोर्ट में साफ किया गया है कि अगर अंतरराष्ट्रीय सहयोग में कमी हुई तो

संयुक्त राष्ट्र महासभा के उच्च-स्तरीय 77वें सत्र के लिए एकत्र हुए दुनिया के शीर्ष नेताओं से संयुक्त राष्ट्र के मुखिया अंटोनियो गुतेरस ने साफ तौर पर अपील की है कि वह धरती का तापमान कम करने कि दिशा में फौरन कदम उठाएँ और इस धरती को डूबने से बचाएं। गुतेरस का यह बयान बाढ़ प्रभावित

बेंगलुरु में हाल ही में हुई भीषण वर्षा के बाद हुई जल भराव की खबरों ने दुनिया भर में सुर्खियां बटोरी। तमाम लोगों को अपना घर छोड़ कर सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ा और इंटरनेट पर इस पूरे घटनाक्रम से जुड़े तमाम मीम्स और मज़ाक़ वायरल होते रहे। स्थिति वाकई कई मायनों में हास्यास्पद थी,

आज का दिन खास है। आज, सितंबर सात, को हर साल साफ हवा और नीले आसमान को समर्पित अंतरराष्ट्रीय दिवस के तौर पर मनाया जाता है। मगर इस साल साफ हवा और नीले आसमान को मिलेंगे बोल और धुन। दरअसल आज संयुक्त राष्ट्र-समर्थित वैश्विक वकालत समूह, AirQualityAsia ने धरती के सबसे प्रदूषित हॉटस्पॉट्स में से

साहिबगंज : आरोग्य भारती के प्रांतीय पर्यावरण टोली सदस्य सह राजमहल मॉडल कॉलेज के प्राचार्य डॉ रणजीत कुमार सिंह ने कहा है कि लगातर नष्ट किए जानं से राजमहल पहाड़ियों की जैव विविधता पर संकट उत्पन्न हो गया है। उन्होंने रांची में आरोग्य भारती द्वारा आयोजित प्रांतीय पर्यावरण कार्यशाला में विशेषज्ञ सत्र को संबोधित करते

दुनिया के हर कोने में न सिर्फ़ जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को महसूस किया जा रहा है, बल्कि उससे जुड़े जोखिम और मौजूदा कमजोरियों को कम करने के लिए अनुकूलन परियोजनाओं को लागू भी किया जा रहा है। मगर क्या इन अनुकूलन परियोजनाओं में जेंडर की कोई भूमिका रहती है? इसी सवाल का जवाब तलाशते

मौसम विज्ञानी देश भर में मानसून मौसम प्रणालियों के ट्रैक में बदलाव पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं। यह प्रवृत्ति पिछले 4-5 वर्षों में अधिक से अधिक दिखाई देने लगी है, जिसमें 2022 सीज़न नवीनतम है। दरअसल, हाल ही में पाकिस्तान में आई बाढ़ भी इसी बदलाव का नतीजा रही है।

रांची : पुणे स्थित भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान आईआईटीएम के शोधकर्ताओं का नवीनतम अध्ययन दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने के मामले के साथ-साथ हमारे दैनिक जीवन के कई अन्य क्षेत्रों और पहलुओं के समक्ष एक दिलचस्प सवाल प्रस्तुत करता है। जलवायु परिवर्तन अगले पांच दशकों