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कोविड से उबरने के लिए WHO ने किये जलवायु कार्रवाई के दस आह्वान, बड़ी स्वास्थ्य आपदा को टालने के लिए वैश्विक स्वास्थ्य कार्यबल ने किया वैश्विक कार्रवाई का आग्रह

इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) द्वारा जारी शोध-आधारित साक्ष्य में हालिया उछाल और डब्ल्यूएचओ द्वारा वायु गुणवत्ता दिशानिर्देशों के नवीनतम संशोधन ने बेहतर स्वास्थ्य के लिए स्वच्छ हवा की आवश्यकता पर पुन: जोर दिया है। भारत दुनिया के सबसे प्रदूषित देशों की सूची में शीर्ष स्‍थान पर है, और (वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक –

वर्तमान वायु प्रदूषण के स्वीकार्य स्तरों को नये दिशा-निर्देशों में प्रस्तावित स्तरों तक कम किया जाए तो दुनिया में PM₂.₅ से संबंधित लगभग 80% मौतों को टाला जा सकता है। साल 2005 के बाद पहली बार विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने अपने वायु गुणवत्ता दिशानिर्देशों में संशोधन कर नये दिशानिर्देश जारी किये हैं। यह वायु

एक नए अध्ययन, जिसमें जलवायु, हवा की गुणवत्ता और कृषि के बीच अंतर संबंधों तथा जन स्वास्थ्य पर उन सभी के संयुक्त प्रभाव को खंगालने के लिए शोध किया गया है, से पता चलता है कि वायु गुणवत्ता का प्रभाव हमारी कृषि पर भी पड़ता है और इसी क्रम में हमारे स्वास्थ्य पर भी इसका

क्लीन एयर फंड के विश्लेषण से पता चलता है कि पिछले 30 वर्षों में वायु गुणवत्ता से संबंधित मौतों में 153% की वृद्धि होने के बावजूद, वायु प्रदूषण को कम करने के लिए सरकारी विकास सहायता का 1% से भी कम मिलता है।

  भारत भर में लाखों स्कूली बच्चे आज स्कूल लौटे और ऐसे समय में हम सब उन्हें वापस स्कूल जाने देने से पहले COVID-19 के संदर्भ में उनकी सुरक्षा के लिए  चिंतित हैं, लेकिन एक और अदृश्य हत्यारा उनके स्वास्थ्य को गंभीर और धीरे-धीरे प्रभावित कर रहा है। दुनिया भर के अध्ययन साबित करते हैं कि वायु प्रदूषण हमारे बच्चों के दिमाग को प्रभावित कर रहा है, उनके न्यूरो-डेवलपमेंट और संज्ञानात्मक क्षमता को प्रभावित कर रहा है और उनमें अस्थमा और बचपन के कैंसर को ट्रिगर कर सकता है।

जो स्वच्छ वायु नीतियां जीवाश्म ईंधन उत्सर्जन को कम और जलवायु परिवर्तन को संभालने में मदद कर सकती हैं, वही नीतियां सबसे प्रदूषित क्षेत्रों में लोगों के जीवनकाल में 5 साल तक जोड़ सकती हैं, और विश्व स्तर पर जीवनकाल में औसतन 2 साल की बढ़त दिला सकती हैं।

दक्षिण एशिया में वायु प्रदूषण की समस्या से निपटने के अवसरों पर बातचीत के लिए इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) और क्लाइमेट ट्रेंड्स ने एक वेबिनार का आयोजन किया। इसमें विशेषज्ञों ने दक्षिण एशिया में विकराल रूप लेती वायु प्रदूषण की समस्‍या और उसके स्‍वास्‍थ्‍य सम्‍बन्‍धी पहलू की भयावहता को सामने रखा बल्कि उन कारणों को भी जाहिर किया जिनके चलते ये हालात पैदा हुए।

  राष्ट्रीय स्तर की वायु गुणवत्ता मॉनिटरिंग और शहर के एक्शन प्लान साबित हुए हैं अप्रभावी, राज्यों के एक्शन प्लान नहीं किये गये हैं तैयार : लाइफ राष्ट्रीय स्वच्छ वायु योजना (NCAP), जिसे 2019 में 102 प्रदूषित शहरों में वायु में सुधार के लिए शुरू किया गया था, अपने उद्देश्य को पूरा करने में विफल होने की संभावना है, यह कहना है लीगल

आप और हम जब अपनी पेट्रोल और डीज़ल की गाड़ी में बैठ आराम से इधर से उधर जाते हैं तब हमारी गाड़ी से निकलने वाले धुआं दुनिया में होने वाली हर पांचवीं मौत का ज़िम्मेदार बन जाता है। बात भारत की करें तो यहाँ जीवाश्म ईंधन के उपयोग से होने वाले PM2.5 वायु प्रदूषण के