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                <title>शिक्षा स्वास्थ्य बजट - Samridh Jharkhand</title>
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                <description>शिक्षा स्वास्थ्य बजट RSS Feed</description>
                
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                <title>झारखंड बजट 2026–27: केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और विकास का घोषणापत्र</title>
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                        <![CDATA[झारखंड विधानसभा में वित्त वर्ष 2026–27 के लिए प्रस्तुत 1,58,560 करोड़ रुपये का बजट केवल आय-व्यय का दस्तावेज नहीं बल्कि सामाजिक न्याय, आत्मनिर्भरता और समावेशी विकास का घोषणापत्र है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता विजय शंकर नायक ने इसे राजनीतिक इच्छाशक्ति, आर्थिक प्रबंधन और जनभागीदारी का प्रतीक बताया है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/jharkhand-budget-2026%E2%80%9327-not-just-a-figure-but-a-manifesto/article-18355"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/ef68a3eb-245f-4519-8780-c1e33a5895b1_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>रांची : </strong>यह बजट केवल आंकड़ा नहीं—यह विश्वास है, यह संकल्प है और यह झारखंड के उज्ज्वल भविष्य की ठोस आधारशिला है। झारखंड विधानसभा में वित्त वर्ष 2026–27 के लिए ₹1,58,560 करोड़ का बजट प्रस्तुत करते हुए वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि झारखंड की सरकार चुनौतियों से घबराने वाली नहीं है। यह बजट केवल आय-व्यय का वार्षिक दस्तावेज नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, आर्थिक प्रबंधन और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों का समन्वित घोषणापत्र है।</p>
<p>बजट भाषण की शुरुआत वीर शहीदों और झारखंड आंदोलन के महानायक शिबू सोरेन को श्रद्धांजलि देकर की गई। यह संकेत था कि यह सरकार विकास को केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सामाजिक चेतना के साथ जोड़कर देखती है।</p>
<h4><strong>1. बजट का आकार : निरंतर वृद्धि का प्रमा</strong></h4>
<p>₹1,58,560 करोड़ का यह बजट राज्य की वित्तीय क्षमता और प्रशासनिक दक्षता का प्रमाण है। पिछले वर्षों में बजट आकार में क्रमिक वृद्धि हुई है, जो बताती है कि—<br />राज्य का आंतरिक राजस्व संग्रह बढ़ा है।<br />खनिज संसाधनों से आय में सुधार हुआ है।<br />कर प्रशासन में पारदर्शिता आई है।<br />पूंजीगत व्यय को प्राथमिकता दी गई है।</p>
<p>इतने बड़े बजट का अर्थ है कि सरकार विकास की गति को धीमा नहीं, बल्कि तेज करना चाहती है। जब संसाधनों पर दबाव हो, संघीय सहयोग में असंतुलन हो और आर्थिक चुनौतियाँ सामने हों, तब नेतृत्व की असली परीक्षा होती है। वित्त वर्ष 2026–27 के लिए प्रस्तुत ₹1,58,560 करोड़ का झारखंड बजट इसी परीक्षा में खरा उतरने का दस्तावेज़ है। यह बजट केवल आय-व्यय का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, सामाजिक न्याय और जनभागीदारी के संकल्प का सशक्त घोषणापत्र है—जो बताता है कि चुनौतियाँ चाहे जितनी हों, विकास की रफ्तार नहीं थमेगी।</p>
<p>केंद्र से ₹5,000 करोड़ की लंबित हिस्सेदारी और जीएसटी से अनुमानित ₹5,640 करोड़ के नुकसान के बावजूद सामाजिक न्याय, पूंजीगत निवेश और ‘बाल बजट’ जैसी ऐतिहासिक पहलों के साथ राज्य ने विकास की रफ्तार को नई मजबूती दी है।</p>
<h4>2. केंद्र से लंबित राशि और वित्तीय असंतुलन</h4>
<p>वित्त मंत्री ने सदन में तथ्यों के साथ कहा कि—<br />केंद्र सरकार से कर हिस्सेदारी में लगभग ₹5,000 करोड़ लंबित हैं।<br />जीएसटी व्यवस्था के कारण राज्य को अनुमानित ₹5,640 करोड़ का नुकसान हो रहा है।<br />मनरेगा की राशि वितरण प्रणाली में बदलाव से ₹5,640 करोड़ तक की संभावित कमी का आकलन है।</p>
<p>यह आँकड़े बताते हैं कि संघीय ढांचे में वित्तीय संतुलन की चुनौती वास्तविक है। परंतु महत्वपूर्ण यह है कि इन परिस्थितियों के बावजूद सरकार ने विकास योजनाओं में कोई कटौती नहीं की।</p>
<h4>3. सामाजिक क्षेत्र पर बड़ा निवेश</h4>
<p>(क) शिक्षा— विद्यालय भवनों के निर्माण और मरम्मत के लिए विशेष प्रावधान, डिजिटल कक्षाओं का विस्तार, छात्रवृत्ति योजनाओं में वृद्धि, शिक्षक नियुक्तियों को गति। सरकार समझती है कि मानव संसाधन में निवेश दीर्घकालीन आर्थिक विकास की कुंजी है।</p>
<p>(ख) स्वास्थ्य— जिला अस्पतालों का उन्नयन, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सक और उपकरण उपलब्ध कराना, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रमों का विस्तार, कुपोषण उन्मूलन के लिए समेकित पोषण अभियान।</p>
<p>(ग) “बाल बजट” की अभिनव पहल— राज्य के विभिन्न जिलों में “बाल बजट संवाद” आयोजित किए गए। बच्चों से पूछा गया कि वे स्कूल, खेल, पोषण और सुरक्षा के क्षेत्र में क्या चाहते हैं। यह पहल लोकतांत्रिक भागीदारी का अनूठा उदाहरण है।</p>
<h4>4. ग्रामीण विकास और रोजगार</h4>
<p>(क) मनरेगा और ग्रामीण रोजगार— हालांकि मनरेगा के फंड आवंटन को लेकर चुनौतियाँ हैं, पर राज्य सरकार ने स्पष्ट किया कि ग्रामीण रोजगार योजनाओं को प्राथमिकता दी जाएगी और राज्य संसाधनों से पूरक वित्त उपलब्ध कराया जाएगा।</p>
<p>(ख) कृषि और किसान— सिंचाई परियोजनाओं के पुनर्जीवन, फसल विविधीकरण, कृषि प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना, न्यूनतम समर्थन मूल्य तंत्र को सुदृढ़ करना।</p>
<p>(ग) स्वयं सहायता समूह (SHGs)— महिला समूहों को सस्ती दर पर ऋण और विपणन सहायता उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिकता है।</p>
<h4>5. अवसंरचना : दीर्घकालिक आर्थिक आधार</h4>
<p>ग्रामीण और शहरी सड़कों का विस्तार, पुल और फ्लाईओवर निर्माण, ऊर्जा वितरण प्रणाली में सुधार, औद्योगिक क्लस्टर और लॉजिस्टिक पार्क की स्थापना। पूंजीगत व्यय में वृद्धि का सीधा प्रभाव रोजगार सृजन और निजी निवेश आकर्षण पर पड़ता है।</p>
<h4>6. खनिज संपदा और राजस्व सुदृढ़ीकरण</h4>
<p>झारखंड खनिज संसाधनों से समृद्ध राज्य है। ई-नीलामी प्रणाली से पारदर्शिता, रॉयल्टी संग्रह में वृद्धि, अवैध खनन पर नियंत्रण तथा खनन क्षेत्र से प्राप्त आय को सामाजिक क्षेत्र और अवसंरचना में पुनर्निवेश करना सरकार की रणनीति है।</p>
<h4>7. युवाओं के लिए अवसर</h4>
<p>कौशल विकास मिशन, स्टार्टअप नीति, MSME प्रोत्साहन, आईटी और सेवा क्षेत्र में निवेश। युवा आबादी को रोजगार और उद्यमिता से जोड़ना सरकार का दीर्घकालिक लक्ष्य है।</p>
<h4>8. शहरी विकास</h4>
<p>नगर निकायों को वित्तीय सुदृढ़ता, पेयजल और स्वच्छता परियोजनाएँ, स्मार्ट प्रबंधन प्रणाली तथा आवास योजनाओं का विस्तार। शहरीकरण की बढ़ती गति को ध्यान में रखते हुए बजट में संतुलित दृष्टिकोण अपनाया गया है।</p>
<h4>9. वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता</h4>
<p>डिजिटल ट्रेजरी प्रणाली, ई-गवर्नेंस, ऑनलाइन भुगतान प्रणाली, बजट मॉनिटरिंग डैशबोर्ड। इन उपायों से भ्रष्टाचार पर अंकुश और राजस्व की बेहतर निगरानी संभव हुई है।</p>
<h4>10. आत्मनिर्भरता का संकल्प</h4>
<p>वित्त मंत्री ने स्पष्ट कहा कि यदि केंद्र सहयोग नहीं करता, तो भी राज्य अपने आंतरिक संसाधनों के माध्यम से विकास की गति बनाए रखेगा। ₹5,000 करोड़ की लंबित राशि और ₹5,640 करोड़ के जीएसटी नुकसान के बावजूद योजनाओं में कटौती न करना प्रशासनिक आत्मविश्वास का प्रमाण है।</p>
<h4>11. राजनीतिक स्थिरता और विकास</h4>
<p>गठबंधन सरकार ने स्पष्ट किया है कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद विकास सर्वोच्च प्राथमिकता है। राज्यपाल के अभिभाषण का उल्लेख करते हुए यह स्वीकार किया गया कि केंद्र का सहयोग आवश्यक है, परंतु राज्य की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।</p>
<h4>निष्कर्ष : संघर्ष से सशक्त भविष्य की ओर</h4>
<p>₹1,58,560 करोड़ का यह बजट झारखंड की विकास गाथा का नया अध्याय है। सामाजिक न्याय, वित्तीय अनुशासन, पूंजीगत निवेश, ग्रामीण और शहरी संतुलन, बच्चों और युवाओं पर विशेष ध्यान—इन सभी पहलुओं का समन्वय इस बजट को दूरदर्शी बनाता है। केंद्र से अपेक्षित ₹5,000 करोड़ की लंबित राशि और जीएसटी से ₹5,640 करोड़ के अनुमानित नुकसान के बावजूद विकास की गति बनाए रखना इस सरकार की प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक प्रतिबद्धता का प्रमाण है।</p>
<p>झारखंड आज संसाधनों की धरती से आगे बढ़कर अवसरों की धरती बनने की दिशा में अग्रसर है। यदि यही नीति, पारदर्शिता और समावेशी दृष्टिकोण जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में झारखंड केवल खनिज संपदा के लिए नहीं, बल्कि मानव विकास सूचकांकों और आर्थिक प्रगति के लिए भी देश के अग्रणी राज्यों में शामिल होगा। यह बजट केवल आंकड़ा नहीं—यह विश्वास है, यह संकल्प है और यह झारखंड के उज्ज्वल भविष्य की ठोस आधारशिला है।</p>
<p><strong>लेखक : विजय शंकर नायक</strong></p>]]>
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                                                            <category>समाचार</category>
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                                            <category>राज्य</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 24 Feb 2026 16:08:23 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Susmita Rani]]>
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                <title>रांची में बजट पेश, वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने रखा 1,58,560 करोड़ का प्रस्ताव</title>
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                        <![CDATA[झारखंड विधानसभा बजट सत्र के दौरान वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए 1,58,560 करोड़ रुपये का बजट सदन में पेश किया। यह बजट पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 9 प्रतिशत अधिक है। ‘अबुआ दिशोम’ नामक इस बजट में स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा और गरीबी उन्मूलन को प्राथमिकता दी गई है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/presenting-the-budget-in-ranchi-finance-minister-radhakrishna-kishore-proposed/article-18350"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/b136dbd6227393f53a03f48eecf965ed_723725797_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>रांची :</strong> झारखंड विधानसभा बजट सत्र के पांचवें दिन मंगलवार को वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने वित्तिय वर्ष 26—27 के लिए सदन में एक लाख, 58 हजार 560 करोड़ का बजट पेश किया। यह पिछले वित्तिय वर्ष की तुलना में करीब नौ प्रतिशत अधिक है। यह उनका लगातार दूसरा बजट है। इस बजट को 'अबुआ दिशोम' बजट नाम दिया गया है। मंत्री ने अपने भाषण के दौरान कहा कि आज दिशोम गुरु की कमी खल रही है।<br /><br />उल्लेखनीय है कि पिछले साल उन्होंने 1,45,400 करोड़ रुपये का मूल बजट पेश किया था, जिसमें 91,741.53 करोड़ रुपये योजना मद के लिए और 17,073.61 करोड़ रुपये केंद्रीय योजनाओं से संबद्ध थे। इस बार बजट में सामाजिक क्षेत्र पर खास जोर दिया गया है।<br /><br />वित्त मंत्री ने राधाकृष्ण किशोर ने सदन में कहा कि यह बजट झारखंडवासियों के चेहरे पर मुस्कान लाने वाला है। सरकार ने गरीबी उन्मूलन, स्वास्थ्य, ऊर्जा और शिक्षा क्षेत्रों को प्राथमिकता दी है।<br /><br />गौरतलब है कि सदन जाने से पहले वित्त मंत्री को उनकी पत्नी ने दही-चीनी खिलाकर शुभकामनाएं दी। इस दौरान वित्त सचिव प्रशांत कुमार भी मौजूद थे। वित्त मंत्री की पत्नी ने उम्मीद जताई कि पिछले बजट की तरह इस बार भी महिलाओं के हितों को विशेष महत्व दिया जाएगा।<br /><br />सरकार का दावा है कि यह बजट सामाजिक सशक्तिकरण और समावेशी विकास को मजबूती देगा। गरीब, महिलाओं और कमजोर वर्गों को प्राथमिकता देने के साथ-साथ शिक्षा और स्वास्थ्य पर भी अधिक फोकस किया गया है। वित्त मंत्री ने कहा कि बजट में किए गए उपाय सीधे लोगों की जिंदगी में बदलाव लाने वाले हैं और राज्य में विकास की गति और मजबूती बढ़ाने में मदद करेंगे।<br /><br />वित्त मंत्री ने सदन में बजट पेश करते हुए कहा कि यह बजट उन्होंने अपने गुरुजी को समर्पित किया है। 'किसी के पैरों पर गिरकर कुछ पाने से बेहतर है अपने पैरों पर चलकर कामयाबी हासिल करना। यह गरीबों के आंसू पोछने वाला बजट है।'<br /><br />वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि 'केंद्र के बिना विकास संभव नहीं। कर हिस्सेदारी का पांच हज़ार करोड़ और अनुदान का ग्यारह हज़ार करोड़ अब तक राज्य को नहीं मिला है। हमारे ऊपर जी रामजी योजना से लगभग पांच हजार करोड़ का प्रति वर्ष अतिरिक्त बोझ बढ़ जाएगा।'<br /><br />उन्होंने कहा कि एक लाख 36 हजार करोड़ भी नहीं मिला। लेकिन हम अपने संसाधन से विकास करेंगे। ग्राम सभा हमने मजबूत किया। प्रथम चरण में धनबाद, गिरिडीह, जामताड़ा और खूंटी के सदर अस्पतालों को पीपीपी मोड में विकसित कर मेडिकल कॉलेज अस्पताल बनाया जाएगा।</p>
<p>दूसरे चरण में साहिबगंज और सरायकेला के सदर अस्पतालों को पीपीपी मोड में मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के रूप में विकसित किया जाएगा। आगामी चार वर्षों में एमबीबीएस की सीटों को दोगुना किया जाएगा। साथ ही राज्य में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय की स्थापना चतरा में की जाएगी।</p>]]>
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                                                            <category>समाचार</category>
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                <pubDate>Tue, 24 Feb 2026 13:19:34 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Susmita Rani]]>
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                <title>झारखण्ड का बजट: अंतिम पायदान पर खड़े समाज के विकास का सच्चा आईना बने</title>
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                        <![CDATA[झारखण्ड का बजट तभी ऐतिहासिक होगा जब वह अंतिम पायदान पर खड़े दलित, आदिवासी, मूलवासी और गरीब समाज के विकास का वास्तविक प्रतिबिंब बने। शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि अधिकार, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा पर केंद्रित बजट ही राज्य को सामाजिक न्याय का मॉडल बना सकता है।]]>
                    </description>
                
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                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/jharkhands-budget-should-become-a-national-model-of-social-justice/article-18249"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/c136e8c6-8a8c-45a8-9bf2-8712d983adce_samridh_1200x720-(1).jpeg" alt=""></a><br /><p>झारखण्ड की इस पावन धरती पर खनिजों की अनमोल चमक है — कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, यूरेनियम। लेकिन इसी माटी में सदियों से शोषण, विस्थापन और अधिकार-वंचना का खून बहता रहा है। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की लगभग 26.21% आबादी अनुसूचित जनजाति और लगभग 12% अनुसूचित जाति से है। यानी हर तीन में से एक झारखण्डवासी उस समुदाय से है, जिसे इतिहास ने विकास की दौड़ में सबसे पीछे धकेल दिया।</p>
<p>आज जब राज्य का वार्षिक बजट लाखों करोड़ की योजनाओं का खाका खींचता है, तो सबसे बड़ा सवाल यह है — क्या बजट की पहली पंक्ति में वे लोग हैं, जो सदियों से अंतिम पायदान पर खड़े हैं?</p>
<p>झारखण्ड देश के खनिज उत्पादन में अग्रणी है, लेकिन मानव विकास सूचकांक में देश के पिछड़े राज्यों में शुमार है। यह विडंबना तभी खत्म होगी, जब बजट की प्राथमिकता खनिज नहीं, मनुष्य होगी; लाभ नहीं, अधिकार होगा; और विकास का मतलब विस्थापन नहीं, बल्कि सशक्तिकरण होगा।</p>
<p>यदि शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि-अधिकार, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा पर केंद्रित, डेटा-आधारित, पारदर्शी और समुदाय-संचालित बजट बने, तो झारखण्ड न सिर्फ आर्थिक रूप से मजबूत बनेगा, बल्कि पूरे देश के लिए सामाजिक न्याय का जीवंत मॉडल भी बनेगा। ऐसा बजट ही दलित-आदिवासी-मूलवासी एवं अन्य कमजोर वर्गों के अंतिम पायदान पर बैठे नागरिकों तथा उच्च जाति के सबसे गरीब परिवारों के सर्वांगीन, चहुमुखी और समग्र विकास का वास्तविक मार्ग प्रशस्त करेगा।</p>
<p><strong>विकास बनाम वंचना: एक कठोर सच</strong></p>
<p>झारखण्ड देश के प्रमुख खनिज उत्पादक राज्यों में अग्रणी है, लेकिन जिन जिलों से ये खनिज निकलते हैं — पश्चिम सिंहभूम, गुमला, पाकुड़, लातेहार — वहीं गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा और पलायन की दर सबसे ऊँची है। विकास की गाड़ी तेज़ चली, लेकिन अंतिम डिब्बा छूट गया। यह विरोधाभास केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक संकट है। अब समय आ गया है कि बजट इस नैतिक संकट का समाधान बने।</p>
<p><strong>1. शिक्षा: अधिकार, दान नहीं</strong></p>
<p>आदिवासी-दलित बहुल क्षेत्रों में माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर 25-35% तक पहुँच चुकी है। बालिका शिक्षा की स्थिति और भी दर्दनाक है। यदि बजट में शिक्षा पर 30% से कम आवंटन होता है, तो यह सामाजिक न्याय की अधूरी प्रतिबद्धता होगी।</p>
<p>बजट में हर आदिवासी प्रखंड में आवासीय विद्यालय अनिवार्य हों। प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा — संथाली, मुंडारी, हो, कुरुख — में हो, ताकि बच्चे की सीखने की क्षमता बढ़े और सांस्कृतिक पहचान बरकरार रहे। उच्च शिक्षा में दलित-आदिवासी विद्यार्थियों के लिए 100% छात्रवृत्ति, कोचिंग सहायता और तकनीकी संस्थानों में आरक्षित सीटों का सख्त क्रियान्वयन हो।</p>
<p>“दलित-आदिवासी कौशल मिशन” के तहत ₹1000-2000 करोड़ का वार्षिक प्रावधान कर आईटीआई, पॉलिटेक्निक और स्किल सेंटरों को उद्योगों से जोड़ा जाए, ताकि प्रशिक्षण के साथ रोजगार भी सुनिश्चित हो। शिक्षा केवल साक्षरता नहीं — यह सामाजिक गतिशीलता का सबसे मजबूत पुल है। यही वह सीढ़ी है, जिस पर चढ़कर अंतिम पायदान का बच्चा भी शिखर छू सकता है।</p>
<p><strong>2. भूमि और वनाधिकार: सम्मान का प्रश्न</strong></p>
<p>सदियों से जंगल-जमीन से जुड़ा समाज आज भी अपने ही संसाधनों पर अधिकार के लिए संघर्ष कर रहा है। वनाधिकार कानून (FRA) के तहत हजारों दावे अभी भी लंबित हैं। जब तक सामुदायिक और व्यक्तिगत पट्टे नहीं बाँटे जाते, विकास अधूरा रहेगा।</p>
<p>बजट में “FRA मिशन फंड” के तहत कम से कम ₹500 करोड़ का विशेष प्रावधान हो। लघु वनोपज — तसर, महुआ, साल बीज, लाख — के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य और स्थानीय प्रोसेसिंग इकाइयाँ स्थापित हों। खनिज रॉयल्टी और DMF फंड का कम से कम 40% स्थानीय समुदायों के विकास पर खर्च हो।</p>
<p>सिंचाई, सौर पंप, सूक्ष्म जलाशयों में निवेश बढ़े। महिला स्वयं सहायता समूहों को बिना ब्याज ऋण और विपणन सहायता दी जाए। विकास का मॉडल विस्थापन का नहीं, स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय समुदाय के अधिकार का हो। तभी न्यायपूर्ण विकास संभव होगा।</p>
<p><strong>3. स्वास्थ्य: जीवन का अधिकार</strong></p>
<p>दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएँ आज भी नाममात्र की हैं। मातृ मृत्यु दर और कुपोषण गंभीर समस्या बने हुए हैं। स्वास्थ्य बजट में 25% वृद्धि हो। हर 20,000 आबादी पर एक पूर्ण सुसज्जित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) बने, जिसमें विशेषज्ञ डॉक्टर, दवाइयाँ और एम्बुलेंस अनिवार्य हों।</p>
<p>“पोषण सुरक्षा मिशन” के लिए ₹1000 करोड़ का वार्षिक प्रावधान हो। मोबाइल मेडिकल यूनिट, मातृ-शिशु स्वास्थ्य मिशन और मानसिक स्वास्थ्य व नशा मुक्ति केंद्र ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित हों। स्वास्थ्य कोई दया नहीं, संविधान द्वारा प्रदत्त जीवन का अधिकार है। बजट में यह भावना साफ झलकनी चाहिए।</p>
<p><strong>4. रोजगार और पलायन: मजबूरी नहीं, विकल्प</strong></p>
<p>झारखण्ड से लाखों युवा रोजगार की तलाश में बाहर जाते हैं। यह सिर्फ आर्थिक नहीं, सामाजिक विखंडन की त्रासदी है। “दलित-आदिवासी उद्यमिता कोष” के लिए ₹2000 करोड़ का प्रावधान हो। खनिज आधारित उद्योगों में 75% स्थानीय रोजगार अनिवार्य किया जाए।</p>
<p>मनरेगा को जल संरक्षण और उत्पादक परिसंपत्तियों से जोड़ा जाए। हस्तशिल्प, बांस, तसर और कृषि आधारित लघु उद्योगों के लिए विशेष स्टार्टअप कोष बने। रोजगार ऐसा हो, जो पलायन रोके, आत्मसम्मान बढ़ाए और युवाओं को अपनी मिट्टी से जोड़े।</p>
<p><strong>5. सामाजिक न्याय और सुरक्षा</strong></p>
<p>अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण कानून के बावजूद न्याय प्रक्रिया लंबी और जटिल है। कानूनी सहायता और फास्ट-ट्रैक अदालतों के लिए विशेष कोष हो। वृद्धावस्था, विधवा और दिव्यांग पेंशन में 50% वृद्धि हो। सभी छात्रवृत्ति और सामाजिक योजनाओं का 100% समयबद्ध DBT सुनिश्चित हो। न्याय कागज़ पर नहीं, ज़मीन पर दिखना चाहिए।</p>
<p><strong>आवास, सड़क और बुनियादी ढाँचा</strong></p>
<p>सुरक्षित पक्का घर, स्वच्छ पेयजल, बिजली, सड़क और डिजिटल कनेक्टिविटी — ये सुविधाएँ नहीं, गरिमापूर्ण जीवन के अनिवार्य तत्व हैं। आदिवासी-दलित बस्तियों में पक्के घरों का निर्माण, हर घर जल योजना का पूर्ण विस्तार, हर टोला को सड़क से जोड़ना और ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी बजट की प्राथमिकता बने।</p>
<p><strong>पारदर्शिता और जनभागीदारी</strong></p>
<p>बजट बनाना पर्याप्त नहीं, उसका सही उपयोग ज़रूरी है। इसलिए ग्राम सभा आधारित पार्टिसिपेटरी बजटिंग लागू हो। सभी योजनाओं की ऑनलाइन ट्रैकिंग, वार्षिक सामाजिक लेखा परीक्षा और जिला स्तर पर स्वतंत्र प्रभाव मूल्यांकन अनिवार्य हों।</p>
<p><strong>अंतिम शब्द: बजट एक नैतिक दस्तावेज़ है</strong></p>
<p>झारखण्ड का बजट मात्र आय-व्यय का ब्यौरा नहीं, यह तय करता है कि राज्य किसके साथ खड़ा है। यदि अंतिम पायदान पर खड़े दलित, आदिवासी, मूलवासी और गरीब समाज को केंद्र में रखकर बजट नहीं बना, तो विकास की चमक सिर्फ शहरों तक सिमट जाएगी।</p>
<p>आज ज़रूरत है ऐसे बजट की — जहाँ प्राथमिकता खनिज नहीं, मनुष्य हो; लाभ नहीं, अधिकार हो; विकास का अर्थ विस्थापन नहीं, सशक्तिकरण हो। तभी झारखण्ड की आत्मा पूरी होगी। तभी बजट ऐतिहासिक कहलाएगा।</p>
<p>दलित, आदिवासी और मूलवासी समाज के बिना झारखण्ड अधूरा है। बजट की हर पंक्ति में यह संदेश साफ दिखे — राज्य की प्राथमिकता खनिज नहीं, मनुष्य है; मुनाफा नहीं, गरिमा है; और विकास विस्थापन नहीं, सशक्तिकरण है। ऐसा बजट ही झारखण्ड को न सिर्फ आर्थिक रूप से समृद्ध, बल्कि सामाजिक न्याय का राष्ट्रीय मॉडल बनाएगा।</p>
<p><strong>लेखक: विजय शंकर नायक</strong></p>]]>
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                <pubDate>Thu, 19 Feb 2026 14:31:35 +0530</pubDate>
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