<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://samridhjharkhand.com/rahul-gandhi-ravneet-bittu-clash/tag-65581" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Samridh Jharkhand RSS Feed Generator</generator>
                <title>Rahul Gandhi Ravneet Bittu clash - Samridh Jharkhand</title>
                <link>https://samridhjharkhand.com/tag/65581/rss</link>
                <description>Rahul Gandhi Ravneet Bittu clash RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>Opinion : संसद के मकर द्वार पर गुस्से का विस्फोट और राजनीति की मर्यादा पर उठते सवाल</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[4 फरवरी को संसद के मकर द्वार पर राहुल गांधी और केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू के बीच हुई तीखी नोकझोंक ने भारतीय राजनीति की भाषा और मर्यादा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। यह विवाद अब व्यक्तिगत आरोपों से आगे बढ़कर राष्ट्रीय बहस बन चुका है।]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-an-outburst-of-anger-at-the-makar-gate-of/article-17854"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/protest-by-suspended-mps-at-the-parliament-s-main-gate_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>संसद लोकतंत्र का सबसे ऊँचा मंच है, लेकिन 4 फरवरी को इसी संसद के मकर द्वार पर जो हुआ, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या भारतीय राजनीति में अब संयम और शिष्टाचार पीछे छूटते जा रहे हैं। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू के बीच हुई तीखी नोकझोंक सिर्फ दो नेताओं की व्यक्तिगत नाराज़गी नहीं थी, बल्कि यह उस राजनीतिक तनाव की अभिव्यक्ति थी, जो पिछले कुछ वर्षों से अंदर ही अंदर पक रहा था।</p>
<p>घटना उस समय की है जब बजट सत्र के दौरान कांग्रेस सांसद तख्तियाँ लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। राहुल गांधी खुद इस प्रदर्शन में मौजूद थे। इसी दौरान सामने से केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू आते दिखे। राहुल गांधी ने उन्हें देखते ही बिना किसी भूमिका के तीखे शब्द कह दिए  ये गद्दार जा रहा है, जरा इसका चेहरा देखो। यह टिप्पणी वहीं खड़े कांग्रेस सांसदों के बीच ठहाकों के साथ गूंज गई। इसके बाद राहुल गांधी ने हाथ बढ़ाते हुए कहा, हेलो ब्रो मेरे गद्दार दोस्त चिंता मत करो तुम वापस आ जाओगे।</p>
<p>यह कोई मंचीय भाषण नहीं था, न ही कोई लिखी हुई टिप्पणी। यह क्षणिक गुस्से से निकली प्रतिक्रिया थी। लेकिन राजनीति में कई बार यही क्षणिक प्रतिक्रियाएं सबसे भारी पड़ जाती हैं। बिट्टू ने राहुल गांधी का हाथ नहीं पकड़ा। उन्होंने पलटकर कहा, देश के दुश्मन के साथ मैं हाथ नहीं मिलाता, और सीधे संसद के भीतर चले गए।यहीं से यह मामला शब्दों की लड़ाई से निकलकर राष्ट्रीय राजनीतिक बहस बन गया।</p>
<p>रवनीत सिंह बिट्टू कोई साधारण नेता नहीं हैं। वे पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते हैं, जिनकी 1995 में आतंकवादियों द्वारा हत्या कर दी गई थी। बिट्टू ने 2009 में कांग्रेस के टिकट पर पहली बार लोकसभा चुनाव जीता। इसके बाद 2014 और 2019 में भी वे सांसद बने। कुल मिलाकर उन्होंने 15 साल तक कांग्रेस का प्रतिनिधित्व संसद में किया।</p>
<p>लेकिन 2024 के आम चुनाव से ठीक पहले उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गए।2024 के चुनाव में बिट्टू लुधियाना सीट से भाजपा के उम्मीदवार थे। उन्हें कांग्रेस के अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग से करीब 20 हजार वोटों से हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद भाजपा ने उन्हें राज्यसभा भेजा और केंद्र सरकार में मंत्री बनाया। यहीं से राहुल गांधी और बिट्टू के रिश्तों में तल्खी खुलकर सामने आने लगी।</p>
<p>राहुल गांधी के गद्दार शब्द ने इसलिए ज्यादा विवाद खड़ा किया, क्योंकि भारतीय राजनीति में यह शब्द सिर्फ दल बदलने तक सीमित नहीं माना जाता। यह शब्द देश, संविधान और जनता के साथ विश्वासघात से जोड़कर देखा जाता है। यही कारण है कि भाजपा नेताओं ने इसे केवल राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक हमला बताया।</p>
<p>भाजपा नेताओं का तर्क है कि एक सिख नेता, जिसके परिवार ने आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष में बलिदान दिया, उसे सार्वजनिक रूप से गद्दार कहना असंवेदनशील है। दूसरी ओर कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह टिप्पणी राजनीतिक संदर्भ में थी और पार्टी छोड़कर जाने वालों पर राहुल गांधी पहले भी तीखे शब्दों का इस्तेमाल करते रहे हैं।यह पहला मौका नहीं है जब बिट्टू ने राहुल गांधी को देश का दुश्मन कहा हो।</p>
<p>इससे पहले अमेरिका में दिए गए राहुल गांधी के एक बयान को लेकर बिट्टू ने सार्वजनिक रूप से उन्हें भारत का सबसे बड़ा दुश्मन तक कहा था। राहुल गांधी ने उस बयान में सिख समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठाया था, जिसे भाजपा और बिट्टू ने भारत की छवि खराब करने की कोशिश बताया। यह पूरा विवाद ऐसे समय में सामने आया, जब राहुल गांधी पहले से ही सरकार पर हमलावर रुख अपनाए हुए हैं।</p>
<p>लोकसभा चुनाव के बाद कभी वे हाथ में संविधान की प्रति लेकर नजर आए, तो अब संसद परिसर में वे पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की किताब फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी हाथ में लिए दिखाई दिए। इस किताब के कुछ अंश पढ़ने की अनुमति जब उन्हें सदन में नहीं दी गई और रिकॉर्ड से हटाया गया, तो राहुल गांधी ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा बना दिया।</p>
<p>राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मकर द्वार पर हुआ यह विवाद राहुल गांधी के बढ़ते आक्रामक तेवर और भाजपा के प्रति उनकी असहजता का परिणाम है। विपक्ष के नेता के तौर पर राहुल गांधी लगातार सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इस प्रक्रिया में कई बार भाषा की मर्यादा टूटती दिखाई दे रही है।</p>
<p>यह भी सच है कि राजनीति में धैर्य सबसे कठिन परीक्षा होती है। लंबे संघर्ष, हार, आलोचना और व्यक्तिगत हमलों के बीच कई बार नेता खुद पर नियंत्रण खो बैठते हैं। लेकिन संसद परिसर जैसे स्थान पर बोले गए शब्द सिर्फ व्यक्तिगत नहीं रहते, वे संस्था की गरिमा से भी जुड़ जाते हैं।यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाती है कि राजनीतिक असहमति अब वैचारिक बहस से निकलकर व्यक्तिगत आरोपों तक पहुंच चुकी है।</p>
<p>गद्दार और देश का दुश्मन जैसे शब्द राजनीति को और ज्यादा ध्रुवीकृत करते हैं। इससे न तो लोकतांत्रिक संवाद मजबूत होता है और न ही जनता का भरोसा।मकर द्वार पर हुआ यह टकराव आने वाले दिनों में सिर्फ बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहेगा। यह घटना विपक्ष की रणनीति, सत्ता पक्ष की प्रतिक्रिया और राजनीतिक भाषा की दिशा तय करने वाला संकेत बन सकती है।</p>
<p>सवाल यह नहीं है कि किसने पहले क्या कहा, सवाल यह है कि क्या भारतीय राजनीति अब संयम की भाषा छोड़ चुकी है।लोकतंत्र में विरोध जरूरी है, लेकिन मर्यादा उससे भी ज्यादा जरूरी है। 4 फरवरी को संसद के बाहर जो हुआ, वह सिर्फ एक क्षणिक गुस्से का नतीजा नहीं था, बल्कि उस राजनीति का प्रतिबिंब था, जहाँ शब्द हथियार बन चुके हैं और संवाद कमजोर पड़ता जा रहा है।</p>
<img src="https://samridhjharkhand.com/media/2026-02/9ee7bed9-4c73-4c84-8902-f3ea0f7ad1e2_samridh_1200x720-(1).jpeg" alt="Opinion : संसद के मकर द्वार पर गुस्से का विस्फोट और राजनीति की मर्यादा पर उठते सवाल" width="166" height="100"></img>
अजय कुमार (फाइल फोटो)

<p> </p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-an-outburst-of-anger-at-the-makar-gate-of/article-17854</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-an-outburst-of-anger-at-the-makar-gate-of/article-17854</guid>
                <pubDate>Thu, 05 Feb 2026 16:32:49 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-02/protest-by-suspended-mps-at-the-parliament-s-main-gate_samridh_1200x720.jpeg"                         length="53699"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[अजय कुमार, लखनऊ]]>
                    </dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        