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                <title>rural livelihood - Samridh Jharkhand</title>
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                <title>आईआईटी बॉम्बे की ‘जीवोदया’ परियोजना ने रचा नैतिक रेशम उत्पादन में नया इतिहास</title>
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                        <![CDATA[कोल इंडिया के सीएसआर सहयोग से आईआईटी बॉम्बे की ‘जीवोदया’ पायलट परियोजना ने तीन वर्षों के अनुसंधान के बाद ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसमें रेशम के कीड़ों की हत्या किए बिना नैतिक और पर्यावरण अनुकूल रेशम का उत्पादन संभव हुआ है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/iit-bombays-jivodaya-project-creates-new-history-in-ethical-silk/article-17751"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/0b356c4f-f14c-4680-a34c-b31e6027ac87_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>रांची : </strong>कोल इंडिया के कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) फंड के सहयोग से संचालित आईआईटी बॉम्बे की अनूठी पायलट परियोजना ‘जीवोदया’ ने तीन वर्षों के निरंतर अनुसंधान एवं विकास के पश्चात नैतिक रेशम उत्पादन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस परियोजना के अंतर्गत आईआईटी बॉम्बे के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए प्रौद्योगिकी विकल्प केंद्र (सी-तारा) ने रेशम उत्पादन की एक ऐसी नवीन तकनीक सफलतापूर्वक विकसित की है, जिसमें रेशम के कीड़ों की हत्या की आवश्यकता नहीं होती। पारंपरिक विधियों से अलग, इस तकनीक में रेशम के कीड़े रेशमी धागा उत्पन्न करने के बाद पतंगे (moth) में परिवर्तित होकर अपना प्राकृतिक जीवन चक्र पूर्ण कर पाते हैं। इसीलिए, मानवीय और नैतिक दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करते इस रेशम को ‘जीवोदया सिल्क’ नाम दिया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">परंपरागत रूप से, शहतूत की पत्तियों पर पलने वाले रेशम के कीड़े अपने चारों ओर कोकून (cocoon) बनाते हैं। रेशम निकालने के लिए इन कोकूनों को उबाल दिया जाता है, जिससे लाखों रेशम कीड़ों की मृत्यु हो जाती है। ‘जीवोदया’ परियोजना ने इस लंबे समय से चली आ रही प्रथा को चुनौती देते हुए करुणा आधारित वैज्ञानिक नवाचार के माध्यम से रेशम उत्पादन की प्रक्रिया को पुनर्परिभाषित किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">अथक प्रयोगों के बाद, ‘सी-तारा’ ने एक दुर्लभ वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की है, जिसके तहत रेशम के कीड़ों को कोकून बनाए बिना समतल सतह पर रेशमी धागा बुनने के लिए प्रशिक्षित किया गया। इसके परिणामस्वरूप, अब रेशम के कीड़ों को कोकून बनाने की आवश्यकता नहीं रहती और वे अंततः पतंगे के रूप में मुक्त होकर उड़ान भर पाते हैं। यह उपलब्धि प्राचीन भारतीय दर्शन की उस भावना को साकार करती है -<br />“मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्” — कोई भी दुःखी न हो।</p>
<p style="text-align:justify;">कोल इंडिया ने इस असाधारण प्रयोग को अवधारणा से सफलता तक पहुँचाने में निरंतर सीएसआर सहयोग के माध्यम से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। नैतिक और पर्यावरणीय महत्व के साथ-साथ, यह तकनीक रेशम उत्पादन से जुड़े किसानों के लिए आय का एक नया और सतत स्रोत भी प्रदान करती है, जिससे ग्रामीण आजीविका को मजबूती मिलेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">‘जीवोदया’ पायलट परियोजना की सफलता के साथ, यह पहल व्यापक स्तर पर अपनाए जाने तथा सतत और नैतिक रेशम उत्पादन को बढ़ावा देने की अपार संभावनाएँ रखती है।</p>]]>
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                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Feb 2026 15:48:26 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Anshika Ambasta]]>
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                <title>भोडा’— संथाल परगना की आदिवासी मिठाई, जो हाट-बाज़ार और प्रवास की कहानी कहती है</title>
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                        <![CDATA[संथाल परगना के हाट-बाज़ारों में मिलने वाली पारंपरिक मिठाई ‘भोडा’ न सिर्फ स्वाद का हिस्सा है बल्कि प्रवास, मेहनतकश जीवन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की एक जीवंत कहानी भी है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/dumka/bhoda%E2%80%94a-tribal-sweet-of-santhal-pargana-that-tells-the-story/article-17437"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-12/whatsapp-image-2025-12-12-at-12.52.23_e44ddb0f_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>दुमका: </strong>संथाल परगना के ग्रामीण हाट–बाज़ार केवल खरीद–फरोख़्त का स्थान भर नहीं हैं, बल्कि वे स्थानीय संस्कृति, रोज़गार और सामाजिक जीवन की नब्ज़ भी हैं। इन्हीं हाटों में मिलने वाली एक साधारण-सी दिखने वाली लेकिन बेहद लोकप्रिय मिठाई है— भोडा। आज यह स्थानीय पहचान का हिस्सा बन चुकी है और मेहनतकश तबके के दैनिक जीवन के स्वाद में शामिल है।</p>
<p>मैदानी पड़ताल और हाट-बाज़ार के विक्रेताओं से हुई बातचीत में यह साझा समझ सामने आई कि भोडा की जड़ें प्रवास से जुड़ी हैं। आमतौर पर लोग मानते हैं कि यह मिठाई केरल से संथाल परगना आई, और समय के साथ धीरे-धीरे यहां की सांस्कृतिक विरासत में घुल-मिल गई। भोडा का आकार और तलने की तकनीक दक्षिण भारत की प्रसिद्ध ‘बोंडा’ से काफी मिलती-जुलती है। इस समानता को लोग मजदूरी और रोज़गार के उद्देश्य से केरल जाने वाले प्रवासी श्रमिकों की लंबी परंपरा से जोड़कर देखते हैं।</p>
<p>रेलवे, निर्माण कार्य और अन्य अस्थायी रोज़गारों के सिलसिले में दशकों से होती आ रही यह आवाजाही केवल श्रम का स्थानांतरण नहीं थी—यह स्वाद, आदत और संस्कृति का भी आदान–प्रदान थी। भोडा इसी यात्रा की एक मीठी विरासत है।</p>
<p>स्थानीय विक्रेता बताते हैं कि वे पिछले चार वर्षों से भोडा बेच रहे हैं। इसकी तैयारी आसान नहीं होती—घोल तैयार करने से लेकर तलने तक लगभग पूरा दिन लग जाता है। इसके घोल में सोडा का उपयोग किया जाता है, जिससे भोडा हल्का, फूला हुआ और कुरकुरा बनता है। इसी विशेष बनावट और स्वाद की वजह से यह तेजी से लोकप्रिय हुई है।</p>
<p>हाट-बाज़ार में भोडा आज भी ₹10 प्रति पीस की दर पर बिकती है। कम लागत और सरल संसाधनों में तैयार होने के कारण यह छोटे विक्रेताओं के लिए स्थायी आमदनी का जरिया बन चुकी है। सुबह-सुबह चाय के साथ भोडा खाने वाले मजदूर, किसान, महिलाएं और राहगीर—यही इसके सबसे बड़े उपभोक्ता हैं और इसकी पहचान का मूल स्वर भी।</p>
<p>भोडा की कहानी बताती है कि झारखंड की समृद्धि केवल खनिज या उद्योगों से नहीं, बल्कि लोक परंपराओं, छोटे व्यापारों और सांस्कृतिक आदान–प्रदान से भी बनती है। यह मिठाई इस बात का प्रमाण है कि कैसे प्रवास, रोजगार और स्थानीय बाज़ार मिलकर नई सांस्कृतिक पहचान रचते हैं।</p>
<p>लेखक— संथाल परगना, जैवविविधता और लोक संस्कृति पर कार्यरत शोधकर्ता।</p>
<p><strong>कुलेश भंडारी</strong></p>
<p> </p>]]>
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                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>दुमका</category>
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                <pubDate>Fri, 12 Dec 2025 17:03:15 +0530</pubDate>
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