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                <title>Giridih News: नाबार्ड 'ग्रामीण हाट' का भव्य उद्घाटन, किसानों को मिलेगा बड़ा बाजार </title>
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                        <![CDATA[गिरिडीह जिले के जमुआ अंतर्गत रंगा माटी में मंगलवार को नाबार्ड (NABARD) द्वारा प्रायोजित ग्रामीण हाट का विधिवत उद्घाटन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि विधायक मंजू कुमारी, एसडीएम अनिमेष रंजन और नाबार्ड के डीडीएम आशुतोष कुमार उपस्थित रहे। वक्ताओं ने कहा कि इस हाट के शुरू होने से किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए एक बेहतर मंच मिलेगा और उन्हें बिचौलियों से मुक्ति मिलेगी। साथ ही, व्यवस्थित हाट परिसर होने से क्षेत्र में जाम की समस्या का भी समाधान होगा।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/giridih/giridih-news-grand-inauguration-of-nabard-gramin-haat-farmers-will/article-19319"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/fb43e9e6-84e1-43f6-a95a-46f6bac50c05_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>जमुआ: </strong>रंगा माटी में मंगलवार को राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) द्वारा प्रायोजित ग्रामीण हाट का उद्घाटन समारोहपूर्वक किया गया। उद्घाटन कार्यक्रम में जमुआ विधायक मंजू कुमारी, एसडीएम अनिमेष रंजन, एसडीपीओ राजेंद्र प्रसाद, बीडीओ अमल, सीओ नरेश वर्मा, पुलिस इंस्पेक्टर प्रदीप दास, नाबार्ड के डीडीएम आशुतोष कुमार और थाना प्रभारी विभूति देव सहित कई अधिकारी एवं जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता मुखिया आशा देवी ने की, जबकि संचालन त्रिभुवन मंडल ने किया।</p>
<p style="text-align:justify;">कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विधायक मंजू कुमारी ने कहा कि ग्रामीण हाट स्थानीय किसानों के लिए बाजार उपलब्ध कराएगा, जिससे उन्हें उनके उत्पादों का उचित मूल्य मिल सकेगा। उन्होंने कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पर जोर देते हुए ऐसे हाटों को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। एसडीएम अनिमेष रंजन ने कहा कि पंजीकृत हाटों का विकास एवं सौंदर्यीकरण जरूरी है, ताकि सड़क पर लगने वाले बाजारों से होने वाली जाम की समस्या को रोका जा सके। नाबार्ड के डीडीएम ने ग्रामीण क्षेत्रों में आधारभूत संरचना को सुदृढ़ करने की प्रतिबद्धता है मुखिया आशा देवी ने कहा बाजार लगने से किसानों को एक अच्छा प्लेट फॉर्म मिला। इसमें किसानों को उत्पादित फसल अच्छी कीमतों पर बेचकर अधिक मुनाफा कमाने का अवसर है। </p>
<p style="text-align:justify;">इस तरह बारी बारी से लोगो ने हाट की विशेषता पर प्रकाश डाला कार्य क्रम मौके पर नाबार्ड डी डी एम आशुतोष प्रकाश, जिला परिषद प्रतिनिधि विजय वर्मा, मोहन वर्मा, नंदकिशोर वर्मा, रंजीत मंडल, राजेश्वर राम, लक्ष्मण किशोर, विकास मंडल दिलीप वर्मा, राकेश वर्मा, शोभा महतो,पंचायत समिति सदस्य टू प लाल महतो, राजेंद्र विश्वकर्मा छतर धारी महतो त्रिभुवन मंडल सहित कई लोग शामिल रहे।</p>]]>
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                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>गिरिडीह</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 18:54:04 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Anjali Sinha]]>
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                <title>भोडा’— संथाल परगना की आदिवासी मिठाई, जो हाट-बाज़ार और प्रवास की कहानी कहती है</title>
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                        <![CDATA[संथाल परगना के हाट-बाज़ारों में मिलने वाली पारंपरिक मिठाई ‘भोडा’ न सिर्फ स्वाद का हिस्सा है बल्कि प्रवास, मेहनतकश जीवन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की एक जीवंत कहानी भी है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/dumka/bhoda%E2%80%94a-tribal-sweet-of-santhal-pargana-that-tells-the-story/article-17437"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-12/whatsapp-image-2025-12-12-at-12.52.23_e44ddb0f_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>दुमका: </strong>संथाल परगना के ग्रामीण हाट–बाज़ार केवल खरीद–फरोख़्त का स्थान भर नहीं हैं, बल्कि वे स्थानीय संस्कृति, रोज़गार और सामाजिक जीवन की नब्ज़ भी हैं। इन्हीं हाटों में मिलने वाली एक साधारण-सी दिखने वाली लेकिन बेहद लोकप्रिय मिठाई है— भोडा। आज यह स्थानीय पहचान का हिस्सा बन चुकी है और मेहनतकश तबके के दैनिक जीवन के स्वाद में शामिल है।</p>
<p>मैदानी पड़ताल और हाट-बाज़ार के विक्रेताओं से हुई बातचीत में यह साझा समझ सामने आई कि भोडा की जड़ें प्रवास से जुड़ी हैं। आमतौर पर लोग मानते हैं कि यह मिठाई केरल से संथाल परगना आई, और समय के साथ धीरे-धीरे यहां की सांस्कृतिक विरासत में घुल-मिल गई। भोडा का आकार और तलने की तकनीक दक्षिण भारत की प्रसिद्ध ‘बोंडा’ से काफी मिलती-जुलती है। इस समानता को लोग मजदूरी और रोज़गार के उद्देश्य से केरल जाने वाले प्रवासी श्रमिकों की लंबी परंपरा से जोड़कर देखते हैं।</p>
<p>रेलवे, निर्माण कार्य और अन्य अस्थायी रोज़गारों के सिलसिले में दशकों से होती आ रही यह आवाजाही केवल श्रम का स्थानांतरण नहीं थी—यह स्वाद, आदत और संस्कृति का भी आदान–प्रदान थी। भोडा इसी यात्रा की एक मीठी विरासत है।</p>
<p>स्थानीय विक्रेता बताते हैं कि वे पिछले चार वर्षों से भोडा बेच रहे हैं। इसकी तैयारी आसान नहीं होती—घोल तैयार करने से लेकर तलने तक लगभग पूरा दिन लग जाता है। इसके घोल में सोडा का उपयोग किया जाता है, जिससे भोडा हल्का, फूला हुआ और कुरकुरा बनता है। इसी विशेष बनावट और स्वाद की वजह से यह तेजी से लोकप्रिय हुई है।</p>
<p>हाट-बाज़ार में भोडा आज भी ₹10 प्रति पीस की दर पर बिकती है। कम लागत और सरल संसाधनों में तैयार होने के कारण यह छोटे विक्रेताओं के लिए स्थायी आमदनी का जरिया बन चुकी है। सुबह-सुबह चाय के साथ भोडा खाने वाले मजदूर, किसान, महिलाएं और राहगीर—यही इसके सबसे बड़े उपभोक्ता हैं और इसकी पहचान का मूल स्वर भी।</p>
<p>भोडा की कहानी बताती है कि झारखंड की समृद्धि केवल खनिज या उद्योगों से नहीं, बल्कि लोक परंपराओं, छोटे व्यापारों और सांस्कृतिक आदान–प्रदान से भी बनती है। यह मिठाई इस बात का प्रमाण है कि कैसे प्रवास, रोजगार और स्थानीय बाज़ार मिलकर नई सांस्कृतिक पहचान रचते हैं।</p>
<p>लेखक— संथाल परगना, जैवविविधता और लोक संस्कृति पर कार्यरत शोधकर्ता।</p>
<p><strong>कुलेश भंडारी</strong></p>
<p> </p>]]>
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                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>दुमका</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
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                <pubDate>Fri, 12 Dec 2025 17:03:15 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Susmita Rani]]>
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