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                <title>Uttar Pradesh Politics - Samridh Jharkhand</title>
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                <title>Opinion : संभल की सियासत में बर्क और नवाब की जंग से अखिलेश यादव की बढ़ी टेंशन</title>
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                        <![CDATA[संभल विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के भीतर बर्क और नवाब परिवार के बीच राजनीतिक टकराव खुलकर सामने आ गया है। मौलाना ममलूकुर्रहमान बर्क के चुनाव लड़ने के ऐलान से अखिलेश यादव की मुश्किलें बढ़ गई हैं। मुस्लिम वोट बैंक और पार्टी एकजुटता पर संकट गहराता दिख रहा है। इस टकराव का फायदा भाजपा और बसपा को मिल सकता है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/akhilesh-yadavs-tension-increased-due-to-war-between-burke-and/article-17885"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/susmit_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अभी एक साल दूर हैं, लेकिन संभल की सियासत में हलचल अभी से तेज हो चुकी है। बीते कुछ महीनों में सांप्रदायिक हिंसा और प्रशासनिक सख्ती के बाद संभल जैसे संवेदनशील इलाके में राजनीति थोड़ी संभलती दिखी ही थी कि अब समाजवादी पार्टी के भीतर ही सत्ता और वर्चस्व की जंग खुलकर सामने आ गई है।</p>
<p>सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क के पिता मौलाना ममलूकुर्रहमान बर्क ने 2027 का विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। उनका सीधा निशाना मौजूदा विधायक नवाब इकबाल महमूद हैं, जो लगातार सात बार से संभल सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इस ऐलान ने न सिर्फ स्थानीय राजनीति को गर्माया है, बल्कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव की मुश्किलें भी बढ़ा दी हैं।</p>
<p>संभल विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश की उन गिनी-चुनी सीटों में है, जहां समाजवादी पार्टी की जड़ें बेहद गहरी रही हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, 2012 से लेकर 2022 तक हुए तीन विधानसभा चुनावों में यह सीट लगातार सपा के खाते में रही है। नवाब इकबाल महमूद ने 1993 से लेकर अब तक सात बार जीत दर्ज की है, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है।</p>
<p>2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने करीब 52 प्रतिशत वोट हासिल किए थे, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी भाजपा प्रत्याशी को लगभग 39 प्रतिशत वोट मिले थे। यह अंतर बताता है कि संभल में नवाब की राजनीतिक पकड़ कितनी मजबूत रही है। दूसरी ओर, लोकसभा स्तर पर बर्क परिवार का दबदबा रहा है। शफीकुर्रहमान बर्क कई बार सांसद रहे और उनके निधन के बाद जियाउर्रहमान बर्क ने 2024 के लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज कर यह विरासत आगे बढ़ाई।</p>
<p>अब ममलूकुर्रहमान बर्क के मैदान में उतरने के ऐलान ने दशकों पुरानी सियासी संतुलन की व्यवस्था को चुनौती दे दी है। अब तक सपा के भीतर एक अनकहा फॉर्मूला चलता रहा था विधानसभा नवाब परिवार के पास और लोकसभा बर्क परिवार के खाते में। लेकिन जियाउर्रहमान के सांसद बनने के बाद बर्क परिवार की महत्वाकांक्षा और बढ़ गई है। ममलूकुर्रहमान का दावा है कि संभल की जनता बदलाव चाहती है और मौजूदा विधायक से नाराज है।</p>
<p>उनका तर्क है कि सिर्फ पुरानी जीतों के आधार पर टिकट नहीं मिलना चाहिए, बल्कि जनता के बीच सक्रियता और मुद्दों पर संघर्ष को भी देखा जाना चाहिए।संभल की जनसांख्यिकी इस लड़ाई को और दिलचस्प बनाती है। 2011 की जनगणना और बाद के चुनावी अनुमानों के अनुसार, इस सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब 55 से 60 प्रतिशत के बीच मानी जाती है। इसके अलावा दलित और पिछड़े वर्ग के वोट भी निर्णायक भूमिका में रहते हैं।</p>
<p>समाजवादी पार्टी की रणनीति लंबे समय से एम-वाई, यानी मुस्लिम-यादव समीकरण पर टिकी रही है। ऐसे में संभल जैसी सीट सपा के लिए बेहद अहम है, जहां आपसी कलह का सीधा फायदा विपक्ष को मिल सकता है। 2022 के चुनाव में भले ही सपा जीती हो, लेकिन भाजपा ने अपना वोट शेयर पिछले चुनाव के मुकाबले लगभग 6 प्रतिशत तक बढ़ाया था, जो खतरे की घंटी मानी जाती है।</p>
<p>नवाब इकबाल महमूद अब अपने बेटे सुहेल इकबाल को सियासी उत्तराधिकारी के तौर पर आगे बढ़ाने की तैयारी में हैं। यह कदम भी पार्टी के भीतर असंतोष की वजह बन रहा है। ममलूकुर्रहमान बर्क ने बिना नाम लिए तंज कसते हुए कहा है कि टिकट किसी के बेटे होने के आधार पर नहीं, बल्कि जनता के भरोसे पर मिलना चाहिए। यह बयान सीधे तौर पर नवाब परिवार की वंशवादी राजनीति पर सवाल खड़ा करता है।</p>
<p>दूसरी ओर, नवाब खेमा यह संकेत दे रहा है कि पार्टी अनुशासन सर्वोपरि है और अंतिम फैसला अखिलेश यादव को ही करना है। उन्होंने यह भी पूछा है कि अगर पार्टी किसी और को टिकट देती है, तो क्या ममलूकुर्रहमान बर्क पूरी निष्ठा से चुनाव लड़ाएंगे। यह सियासी टकराव सिर्फ एक सीट तक सीमित नहीं है। संभल में बर्क और नवाब, दोनों परिवारों का प्रभाव आसपास की सीटों असमौली, गुन्नौर और चंदौसी तक फैला हुआ है।</p>
<p>स्थानीय राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, अगर यह विवाद खुली बगावत में बदलता है तो इसका असर कम से कम तीन से चार विधानसभा क्षेत्रों में सपा के वोट बैंक पर पड़ सकता है। 2017 के चुनाव में पार्टी को आंतरिक कलह का खामियाजा भुगतना पड़ा था, जब कई सीटों पर बागी उम्मीदवारों ने नुकसान पहुंचाया था। अखिलेश यादव इस अनुभव को दोहराना नहीं चाहेंगे।</p>
<p>संभल में हालिया हिंसा के बाद जियाउर्रहमान बर्क एक मुखर नेता के रूप में उभरे हैं। उन्होंने संसद से लेकर सड़क तक अल्पसंख्यक मुद्दों को उठाया, जिससे उन्हें युवाओं और खासकर मुस्लिम मतदाताओं के बीच नई पहचान मिली है। पार्टी के अंदर उन्हें सपा की मुस्लिम राजनीति के उभरते चेहरे के रूप में देखा जा रहा है। वहीं, नवाब इकबाल महमूद का कद एक अनुभवी नेता का है, जो मुलायम सिंह यादव की सरकार में मंत्री रह चुके हैं और संगठन में गहरी पकड़ रखते हैं।</p>
<p>यही वजह है कि अखिलेश यादव के लिए किसी एक पक्ष को नाराज करना आसान फैसला नहीं है। आंकड़े साफ इशारा करते हैं कि संभल में सपा की जीत का अंतर धीरे-धीरे घट रहा है। 2012 में जहां पार्टी ने लगभग 18 प्रतिशत के बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी, वहीं 2022 में यह अंतर सिमटकर करीब 13 प्रतिशत रह गया। अगर पार्टी के भीतर फूट पड़ती है तो यह अंतर और कम हो सकता है।</p>
<p>भाजपा और बसपा दोनों ही इस मौके की ताक में हैं। भाजपा पहले ही पश्चिमी यूपी में सामाजिक इंजीनियरिंग के जरिए गैर-यादव ओबीसी और दलित वोटरों को साधने की कोशिश कर रही है, जबकि बसपा को मुस्लिम वोटों में सेंध लगाने का मौका मिल सकता है। अब सवाल यही है कि अखिलेश यादव इस उलझन को कैसे सुलझाते हैं।</p>
<p>एक रास्ता यह हो सकता है कि वह दोनों परिवारों के बीच कोई समझौता कराएं, जैसे संगठन में एक को बड़ी जिम्मेदारी और टिकट दूसरे को। दूसरा विकल्प सर्वे के आधार पर टिकट देने का है, ताकि फैसला तथ्यों और आंकड़ों के सहारे लिया जा सके। लेकिन जिस तरह बयानबाजी तेज हो चुकी है, उससे मामला आसान नहीं दिखता।</p>
<p>संभल की सियासत एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ी है, जहां एक गलत कदम पूरी रणनीति पर भारी पड़ सकता है। 2027 का चुनाव भले ही दूर हो, लेकिन संभल ने अभी से अखिलेश यादव की सियासी परीक्षा लेना शुरू कर दिया है।</p>
<p><strong>संजय सक्सेना,लखनऊ</strong><br /><strong>वरिष्ठ पत्रकार</strong><br /><strong>skslko28@gmail.com</strong><br /><strong>9454105568, 8299050585</strong></p>]]>
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                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 06 Feb 2026 17:24:23 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Susmita Rani]]>
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                <title>Opinion: जेल से बाहर आये आजम की चुप्पी ने बढ़ाया सियासी पारा</title>
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                        <![CDATA[कद्दावर नेता आजम खान 23 माह के बाद जेल से रिहा हो गए हैं। रिहाई के बाद उन्होंने कोई बयान नहीं दिया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में उनके भविष्य को लेकर चर्चाएं तेज हैं। समाजवादी पार्टी ने फिलहाल उनसे दूरी बनाई है, जबकि आजम के पास बहुजन समाज पार्टी या ओवैसी के साथ नए राजनीतिक विकल्प तलाशने के रास्ते खुले हैं। उनकी कट्टर मुस्लिम छवि सपा के लिए चुनौती बनी हुई है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/azams-silence-who-came-out-of-opinion-jail-increased-political/article-16415"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-09/resized-image---2025-09-23t143803.903.jpeg" alt=""></a><br /><p>कद्दावर नेता आजम खान 23 माह के बाद जेल से बाहर आ गये। रिहाई के बाद उन्होंने अभी तक मुंह नहीं खोला है, लेकिन आजम को लेकर राजनीति के गलियारों में कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। कोई उनके बहुजन समाज पार्टी के साथ तो कोई ओवैसी के साथ जाने की बात कह रहा है। उधर, समाजवादी पार्टी आजम की रिहाई पर मुखर होकर खुशियां नहीं मना रही है, इससे लगता है कि अब आजम खान समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के लिए प्रासंगिक नहीं रह गये हैं। इसकी वजह भी है आजम एक कट्टर मुस्लिम नेता के रूप में अपनी पहचान रखते हैं। उधर, बीजेपी हिन्दू वोटरों को एकजुट करने में लगी है, ऐसे में आजम की कट्टर छवि के चलते उनको साथ लेने पर समाजवादी पार्टी को गैर मुस्लिम वोट बैंक छिड़कने की संभावना रहती है। इसी से बचने के लिये आजम खान से समाजवादी पार्टी थोड़ी दूरा बनाकर चल रही है।आजम खान के पास रिहाई के बाद सपा से दूरी बनाकर अपनी राजनीति चमकाने के और कौन कौन से विकल्प बचे है, इस पर बारीकी से नजर दौड़ाने पर जो तस्वीर उभर कर सामने आती है। वह कुछ इस प्रकार की हो सकती है।</p>
<p>करीब दो साल बाद आजम खान की रिहाई के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गयी है। तेईस महीनों तक जेल की सलाखों के पीछे रहकर बाहर आये आजम खान ने बाहर आते ही खामोशी अख्तियार कर रखी है। यह खामोशी अपने आप में बहुत गहरी है, क्योंकि एक ओर जहां उनके समर्थक यह इंतजार कर रहे हैं कि वह कोई राजनीतिक संकेत देंगे, वहीं दूसरी ओर समाजवादी पार्टी में उनके लिये ठंडी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने भी आजम की रिहाई पर कोई बड़ा बयान नहीं दिया, न ही पार्टी ने ढोल नगाड़ों के साथ इस अवसर को राजनीतिक उत्सव बनाया। इस स्थिति को देखकर यह सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि आजम खान अब समाजवादी पार्टी की राजनीति में पहला विकल्प नहीं रह गये हैं।</p>
<p>गौरतलब हो, आजम खान ने अपनी लंबी राजनीतिक यात्रा के दौरान यह छाप बनाई है कि वह एक बेहद मजबूत, कट्टर और मुखर मुस्लिम नेता हैं। रामपुर से लेकर लखनऊ तक उनके भाषणों और उनकी पहचान हमेशा अल्पसंख्यक राजनीति से मजबूती से जुड़ती रही है। इसी वजह से जब भी मुस्लिम वोट बैंक को लामबंद करने की चर्चा होती है, तो आजम खान का नाम सबसे ऊपर आता है। मगर उत्तर प्रदेश की मौजूदा राजनीति में सपा की रणनीति मुस्लिम समेत अन्य जातियों को साथ लाकर सत्ता पर वापसी की है। भाजपा लगातार हिंदू वोटों का धु्रवीकरण कर रही है। ऐसे समीकरण में पार्टी के लिये आजम खान की कट्टर मुस्लिम नेता वाली छवि कहीं न कहीं चुनौती बन सकती है, क्योंकि भाजपा इस छवि को कठघरे में खड़ा कर गैर मुस्लिम वोटरों को अपने पास पूरी तरह खींचने की कोशिश करेगी। ऐसे में यह सवाल उठता है कि अब जेल से बाहर आये आजम खान अपनी राजनीति किस दिशा में ले जाते हैं। अगर समाजवादी पार्टी ने उनसे दूरी बना ली, तो उनके पास रणनीतिक तौर पर कौन कौन से नए रास्ते बचते हैं।</p>
<p>सबसे पहला रास्ता बहुजन समाज पार्टी की ओर जाता दिखता है। बसपा की मौजूदा राजनीति मुस्लिम और दलित के गठजोड़ पर टिकी हुई है। मायावती लगातार इस फार्मूले को आगे रखने की कोशिश कर रही हैं। मगर बसपा के पास वह तेजतर्रार मुस्लिम चेहरा नहीं है जो आजम खान जैसे कद्दावर नेता की सियासी ताकत को दर्शा सके। ऐसे में यदि आजम मायावती के साथ कदम मिलाते हैं, तो बसपा को लाभ मिल सकता है और आजम को भी अल्पसंख्यकों के बीच अपनी जमीन मजबूत करने का प्लेटफार्म मिल जायेगा। दूसरा रास्ता असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन का है। ओवैसी ने उत्तर प्रदेश समेत उत्तर भारत की राजनीति में मुसलमानों को अपने पक्ष में करने की लगातार कोशिश की है। मगर उनकी पार्टी अभी तक यहां बहुत बड़ी सफलता हासिल नहीं कर पाई है। अगर आजम खान जैसे नेता ओवैसी के साथ आते हैं, तो मुस्लिम राजनीति को एक नया स्वरूप मिल सकता है। रामपुर, मुरादाबाद, बरेली, सहारनपुर जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों में यह गठजोड़ असर दिखा सकता है। हालांकि इसके साथ यह भी सच है कि अगर आजम खान पूरी तरह मुस्लिम राजनीति में केंद्रित हो जाते हैं, तो उन्हें व्यापक गठजोड़ का हिस्सा बनने से दूरी झेलनी पड़ सकती है।</p>
<p>तीसरा विकल्प यह है कि आजम खान अपनी अलग राजनीतिक पार्टी खड़ी करें। उत्तर प्रदेश में कई नेताओं ने यह रास्ता अपनाया है, लेकिन बहुत कम को सफलता मिली है। मुलायम सिंह यादव, कांशीराम और मायावती जैसे नेताओं ने अलग मंच लेकर बड़ा विस्तार किया, पर इसके लिये व्यापक जनाधार और संगठनात्मक क्षमता की ज़रूरत होती है। आजम खान के पास रामपुर और उसके आसपास प्रभावशाली जनाधार है, लेकिन पूरे प्रदेश में उन्हें एक व्यापक समर्थन खड़ा करने की चुनौती होगी। हालांकि अगर वह यह कदम उठाते हैं, तो यह मुस्लिम राजनीति के लिहाज से एक बड़े प्रयोग जैसा होगा। इसके अलावा चौथा मार्ग हुये गठबंधन की राजनीति हो सकता है। आजम न तो अकेले बसपा में शामिल हों, न ही ओवैसी की पार्टी में समा जायें, बल्कि इन सबके बीच गठजोड़ का सूत्रधार बनें। मुस्लिम राजनीति के दल और कुछ छोटे नेताओं को वे मिलाकर एक साझा मंच खड़ा कर सकते हैं। इस तरह वह न सिर्फ अपने भविष्य को सुरक्षित करेंगे, बल्कि प्रदेश की सत्ता समीकरणों में महत्वपूर्ण कारक भी बन सकते हैं। वहीं यह भी हो सकता है कि आजम खान सक्रिय राजनीति से दूरी बनाकर खुद को एक बड़े मार्गदर्शक की भूमिका में ढालें और अपने बेटे को राजनीति में स्थापित करें। आजम की उम्र अब उस पड़ाव पर है जहां लंबे संघर्ष के बाद एक वरिष्ठ नेता के रूप में वह अपनी परंपरा और अनुभव को युवा चेहरों तक पहुंचा सकते हैं। मगर आजम खान की अब तक की राजनीति को देखकर लगता है कि वह इतनी जल्दी राजनीतिक जीवन से संन्यास नहीं लेंगे। वैसे एक विकल्प कांग्रेस के साथ जाने का भी है, उसके साथ जाकर आजम इडिया गठबंधन के हिस्सेदार बन सकते हैं।</p>
<p>आजम की खामोशी, दरअसल बहुत कुछ बयां कर रही है। जेल से बाहर आने के बावजूद उन्होंने तुरंत कोई राजनीतिक बयान नहीं दिया। यह हो सकता है कि वह देखना चाह रहे हों कि समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव की तरफ से उन्हें किस तरह का संकेत मिलता है। अगर सपा लंबे समय तक खामोश रहती है, तो वह मजबूर होकर नया रास्ता तलाश सकते हैं। वर्तमान दौर में उत्तर प्रदेश की राजनीति मुख्यतः भाजपा और सपा के बीच सीमित होकर रह गयी है। मायावती की पार्टी कमजोर हुई है और कांग्रेस प्रभावहीन। ऐसे में आजम खान अपने विकल्पों को जिस दिशा में ले जायेंगे, वह सिर्फ उनकी ही राजनीति तय नहीं करेगी, बल्कि प्रदेश के चुनावी समीकरणों पर भी असर डालेगी। अगर वह सपा से दूर होकर नया रास्ता अपनाते हैं, तो भाजपा के खिलाफ विपक्षी गठजोड़ की मजबूती या कमजोरी दोनों में उनकी भूमिका अहम रहेगी। फिलहाल, आजम खान की रणनीति इंतजार और नजर रखने वाली लग रही है। वह यह समझना चाह रहे हैं कि मौजूदा समय में कौन सा रास्ता उन्हें ज्यादा सियासी फायदा देगा और उन्हें उनकी पुरानी सियासी ताकत दिला सकता है। अगले कुछ महीनों में यह साफ हो जाएगा कि आजम खान किस राह पर चलेंगे, लेकिन इतना तय है कि उनकी मौन साधना ने प्रदेश की राजनीति को एक नई बेचैनी और चर्चा का विषय जरूर दे दिया है।</p>]]>
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                <pubDate>Tue, 23 Sep 2025 14:40:28 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[अजय कुमार, लखनऊ]]>
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                <title>Opinion: योगी की मेहनत पर पानी फेर रहे है बीजेपी के नाकारा पार्षद</title>
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                        <![CDATA[उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा पार्षदों की गैर-जिम्मेदारी और भ्रष्टाचार ने जनता में नाराजगी बढ़ा दी है। विकास कार्य ठप, कमीशनखोरी के आरोप और जनता से दूरी योगी सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। 2027 चुनावों से पहले यह मुद्दा भाजपा की छवि और वोटबैंक पर सीधा असर डाल सकता है। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-bjps-nakara-councilors-are-turning-water-on-yogis-hard/article-16099"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-09/resized-image---2025-09-09t163038.396.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों जिस तरह से पार्षदों की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं, उसने न केवल योगी सरकार की चिंता बढ़ा दी है बल्कि स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी की भविष्य की संभावनाओं पर भी सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। कहा जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी के हजारों पार्षदों ने सरकार की नींद उड़ा रखी है, क्योंकि ये न तो जनता के काम आ पा रहे हैं और न ही खुद को जिम्मेदार जनप्रतिनिधि साबित कर पा रहे हैं। इन पर आरोप है कि इन्हें न तो अपने क्षेत्र के विकास की कोई फिक्र है और न ही जनता से जुड़े मुद्दों में इनकी कोई दिलचस्पी। उलटे इनमें से अधिकांश पार्षद अपने दफ्तरों और बैठकों से गायब रहते हैं, जबकि जब कहीं ठेकेदारी या कमीशन लेने का मामला आता है तो ये सबसे आगे कूद पड़ते हैं। यही वजह है कि विकास कार्य ठप पड़े रहते हैं और जनता का गुस्सा सीधे-सीधे योगी सरकार पर फूटने लगा है।</p>
<p style="text-align:justify;">रिपोर्ट्स बताती हैं कि कई नगर निगमों और नगर पालिकाओं के पार्षद पिछले लंबे समय से अपने क्षेत्र में नजर ही नहीं आए। जनता जब उनसे संपर्क करने जाती है तो या तो यह फोन पर उपलब्ध नहीं होते, या बहानेबाजी करके टालमटोल कर देते हैं। लखनऊ के आलमबाग इलाके का उदाहरण लें, वहां के लोग शिकायत कर रहे हैं कि पिछले चार महीने से सड़कों की मरम्मत रुकी हुई है, नालियों की सफाई नहीं हो रही, लेकिन स्थानीय पार्षद न तो मौके पर आ रहे हैं और न ही नगर निगम से कोई दबाव बना पा रहे हैं। यही हाल कानपुर नगर निगम के हर्ष नगर वार्ड में देखने को मिला, जहां पर लंबे समय से जलभराव की समस्या से लोग परेशान हैं। पार्षद से बार-बार निवेदन किया गया, लेकिन न उन्होंने खुद फील्ड में जाकर हालात देखे और न ही अफसरों पर कार्रवाई का दबाव बनाया। जनता का कहना है कि पार्षद सिर्फ टेंडर पास कराने में या कमीशन लेने में सक्रिय होते हैं, लेकिन जनता को राहत दिलाने में उनकी दिलचस्पी नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह समस्या किसी एक नगर निगम या पालिका तक सीमित नहीं है। गोरखपुर, वाराणसी, प्रयागराज, मेरठ, अयोध्या जैसे बड़े नगरों से लेकर छोटे कस्बों तक हर जगह से ऐसी शिकायतें आ रही हैं। बलिया जिले में तो हाल यह है कि कई पार्षद अपनी मौजूदगी ही दर्ज नहीं कराते। वे न तो बैठकों में शामिल होते हैं और न ही जनता के बीच दिखाई देते हैं। परिणाम यह है कि जनता में यह धारणा तेजी से बन रही है कि पार्षद बस राजनीतिक टिकट पाने और लाभ कमाने के लिए चुने जाते हैं, जनता की सेवा इनकी प्राथमिकता नहीं है। कुछ मामलों में तो शिकायतें इतनी गंभीर हो गईं कि लोग आरटीआई के जरिए कामकाज की जांच करने लगे। मुरादाबाद नगर निगम में एक पार्षद के खिलाफ तो यह शिकायत भी आई कि उन्होंने नाली निर्माण के ठेकेदार से खुलेआम कमीशन मांगा। इस तरह की घटनाएं जब उजागर होती हैं तो सरकार की छवि पर सीधा असर पड़ता है, क्योंकि आखिरकार जनता इसकी जिम्मेदारी योगी सरकार पर ही डालती है।</p>
<p style="text-align:justify;">यूपी की जनता पहले से ही महंगाई, बेरोजगारी और कानून-व्यवस्था जैसी समस्याओं से जूझ रही है और उस पर जब स्थानीय स्तर पर भी उसकी सुनवाई नहीं होती, तो गुस्सा और बढ़ना तय है। भाजपा के पार्षद जिस तरह से काम कर रहे हैं, उससे जनता के भीतर यह संदेश जा रहा है कि सत्ताधारी दल सिर्फ चुनाव जीतने और सत्ता पाने के लिए है, सेवा और विकास की बात बस कागजों पर होती है। विपक्ष ने भी इस मुद्दे को भुनाने का काम शुरू कर दिया है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस लगातार यह आरोप लगा रही हैं कि भाजपा ने भ्रष्ट और नाकारा पार्षदों को टिकट देकर जनता के साथ धोखा किया है। योगी सरकार के विकास के दावों को सवालों के घेरे में खड़ा करते हुए विपक्ष यह कह रहा है कि जब जमीनी स्तर पर भाजपा के पार्षद ही काम नहीं करेंगे, तो विकास की कोई भी योजना धरातल पर कैसे उतर सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">दिलचस्प बात यह भी है कि जब जनता पार्षदों की शिकायत लेकर बीजेपी के स्थानीय नेताओं या मंत्रियों तक पहुंचती है तो वहां से भी उन्हें कोई खास राहत नहीं मिलती। कई मामलों में पार्षदों की शिकायतें सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय तक भी पहुंची हैं, लेकिन कार्रवाई न होने से लोगों के मन में निराशा और गुस्सा दोनों ही बढ़ रहा है। कानपुर ग्रामीण की एक घटना इसका स्पष्ट उदाहरण है। वहां एक पार्षद ने हैंडपंप लगवाने के नाम पर हजारों रुपए की वसूली की, लेकिन हैंडपंप आज तक नहीं लगा। जब इस शिकायत को जिले के आला अधिकारियों तक ले जाया गया तो उन्होंने भी टालमटोल कर दी। ऐसे में जनता का गुस्सा योगी सरकार की ओर मुड़ना बिल्कुल स्वाभाविक है।</p>
<p style="text-align:justify;">भाजपा के लिए यह स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण है क्योंकि 2027 के विधानसभा चुनावों की राह में स्थानीय निकायों और पार्षदों की अहम भूमिका होती है। जनता का असंतोष सीधे-सीधे पार्टी की वोटबैंक पर असर डाल सकता है। योगी सरकार विकास और सुशासन को अपनी सबसे बड़ी </p>
<p style="text-align:justify;">ताकत मानकर आगे बढ़ रही है, लेकिन जब उसी सरकार की रीढ़ समझे जाने वाले स्थानीय प्रतिनिधि ही जनता का विश्वास खोने लगें, तो पूरा ढांचा कमजोर पड़ने लगता है। यही कारण है कि भाजपा नेतृत्व अंदर ही अंदर इस मसले पर चिंतित है। सूत्र बताते हैं कि सरकार और संगठन स्तर पर ऐसे पार्षदों की रिपोर्ट मांगी जा रही है और कई जगहों पर चेतावनी देने की प्रक्रिया भी शुरू हुई है। हालांकि जनता को अब सिर्फ चेतावनी से तसल्ली मिलने वाली नहीं है, वह ठोस काम चाहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, जनप्रतिनिधियों से जनता की अपेक्षा होती है कि वे सिर्फ वोट मांगने तक सीमित न रहें, बल्कि रोजमर्रा की समस्याओं में जनता के बीच खड़े होकर उसकी मदद करें। पार्षद ही सबसे नजदीकी प्रतिनिधि होते हैं और जब वही जनता के साथ धोखा करते नजर आते हैं, तो इससे जनता का भरोसा पूरे शासन-प्रशासन पर से उठ जाता है। इसलिए यदि भाजपा सचमुच जनता का विश्वास बनाए रखना चाहती है, तो उसे अपने हजारों नाकारा पार्षदों पर सख्ती दिखानी होगी। वरना यह नाराजगी आने वाले चुनावों में बड़ा नुकसान साबित हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">योगी सरकार फिलहाल भले ही कानून-व्यवस्था और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर अपना ध्यान केंद्रित किए हुए है, लेकिन स्थानीय स्तर पर फैल रही भ्रष्टाचार और उदासीनता की यह लहर उस सारे काम को बेअसर करने की ताकत रखती है। आज यूपी की जनता को सिर्फ वादों की नहीं बल्कि जमीनी बदलाव की जरूरत है। भाजपा के पार्षद यदि इस जिम्मेदारी में विफल साबित होते रहे, तो जनता का भरोसा टूटना अब तय है और उसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ेगा। यही वजह है कि इस समय योगी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती सड़क, बिजली और पानी से ज्यादा अपने ही पार्षदों की कार्यशैली को सुधारना है, क्योंकि यही वे चेहरे हैं जो सीधे जनता और सरकार के बीच की कड़ी हैं। अगर ये कड़ी कमजोर पड़ गई तो भाजपा के मजबूत गढ़ को भी दरकने से कोई नहीं रोक पाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>संजय सक्सेना,लखनऊ</strong><br /><strong>वरिष्ठ पत्रकार</strong><br /><strong>skslko28@gmail.com</strong><br /><strong>9454105568, 82990505</strong></p>]]>
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                <pubDate>Tue, 09 Sep 2025 16:33:18 +0530</pubDate>
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