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                <title>बच्चों की सुरक्षा - Samridh Jharkhand</title>
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                <description>बच्चों की सुरक्षा RSS Feed</description>
                
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                <title>गोमिया में जर्जर भवन में नव प्राथमिक विद्यालय, बच्चों की सुरक्षा पर खतरा</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[गोमिया के चतरोचट्टी थाना क्षेत्र में स्थित नव प्राथमिक विद्यालय माघा का 15 साल पुराना भवन जर्जर हो गया है। दीवारों और छतों में दरारें, बरसात में पानी टपकना और कमरों में सीलन से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। ग्रामीण जल्द नए भवन निर्माण की मांग कर रहे हैं।]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/bokaro/threat-to-safety-of-new-primary-school-children-in-dilapidated/article-18066"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/a0f9fa4e-9844-4858-87f7-ab724b8a5e54_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>गोमिया : </strong> शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के दावों के बीच चतरोचट्टी थाना क्षेत्र स्थित नव प्राथमिक विद्यालय माघा की स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है। करीब 15 वर्ष पुराना विद्यालय भवन पूरी तरह जर्जर हो चुका है। दीवारों और छतों में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ गई हैं, जबकि कई जगहों से प्लास्टर झड़ चुका है।</p>
<p style="text-align:justify;">बरसात के दिनों में छत से पानी टपकता है और कमरों में सीलन भर जाती है, जिससे पढ़ाई बाधित होती है। शिक्षक प्रकाश मंडल ने बताया कि भवन की मरम्मत और नए निर्माण को लेकर कई बार विभाग को अवगत कराया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई। कभी सैकड़ों बच्चों से गुलजार रहने वाला यह विद्यालय अब महज 50-60 छात्रों तक सीमित रह गया है। अभिभावक भी जर्जर भवन को देखकर बच्चों को भेजने से हिचक रहे हैं। ग्रामीणों ने शीघ्र नए भवन निर्माण की मांग की है।</p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>बोकारो</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 12 Feb 2026 11:58:01 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Anshika Ambasta]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Opinion : डिजिटल लत के साये में बचपन, टूटती जिंदगियां और भारत की अधूरी सोशल मीडिया सुरक्षा नीति</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[भारत में तेजी से बढ़ती मोबाइल और इंटरनेट पहुंच बच्चों की मानसिक दुनिया को बदल रही है। ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया एल्गोरिदम उन्हें लत के जाल में फंसा रहे हैं, जहां खेल और असली जिंदगी की सीमा मिटती जा रही है। हाल की घटनाएं इस डिजिटल खतरे की गंभीरता को उजागर करती हैं।]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-childhoods-lives-broken-under-the-shadow-of-digital-addiction/article-17847"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/9ee7bed9-4c73-4c84-8902-f3ea0f7ad1e2_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:left;">भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां बच्चों की दुनिया तेजी से बदल रही है। खिलौनों, मैदानों और दोस्तों की जगह मोबाइल स्क्रीन ने ले ली है। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि धीरे-धीरे हमारी आंखों के सामने पनपा। गाजियाबाद की तीन नाबालिग बहनों और भोपाल के एक 14 साल के बच्चे की मौत ने इस सच्चाई को बेरहमी से उजागर कर दिया है कि डिजिटल दुनिया अब सिर्फ मनोरंजन नहीं रही, बल्कि कई मासूम जिंदगियों के लिए मानसिक जाल बन चुकी है।</p>
<p style="text-align:left;">ये घटनाएं कोई इत्तेफाक नहीं हैं, बल्कि उस सिस्टम का नतीजा हैं जहां बच्चों की सुरक्षा से ज्यादा अहमियत डिजिटल मुनाफे को दी जा रही है। भारत में इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुंच ने पिछले एक दशक में क्रांति ला दी। सरकारी और निजी रिपोर्टों के मुताबिक आज देश में 80 करोड़ से ज्यादा इंटरनेट यूजर हैं और इनमें करीब एक तिहाई बच्चे और किशोर हैं। एक औसत भारतीय बच्चा रोजाना 3 से 6 घंटे स्क्रीन पर बिता रहा है। कोरोना महामारी के दौरान यह समय और बढ़ा।</p>
<p style="text-align:left;">ऑनलाइन पढ़ाई ने मोबाइल को बच्चों की जिंदगी का अनिवार्य हिस्सा बना दिया। लेकिन पढ़ाई खत्म होने के बाद वही मोबाइल गेमिंग, सोशल मीडिया और ऑनलाइन चैलेंज का प्रवेश द्वार बन गया. धीरे-धीरे बच्चों के लिए असली दुनिया उबाऊ और स्क्रीन के भीतर की दुनिया ज्यादा आकर्षक लगने लगी।</p>
<p style="text-align:left;">ऑनलाइन गेमिंग का मनोविज्ञान बेहद जटिल है। कई गेम्स और टास्क-बेस्ड ऑनलाइन ट्रेंड इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि यूजर को लगातार अगला स्तर पूरा करने की बेचैनी बनी रहे । हर टास्क पूरा होने पर दिमाग में डोपामिन रिलीज होता है, जो खुशी और संतुष्टि का एहसास देता है।</p>
<p style="text-align:left;">यही प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती है और लत बन जाती है। बच्चों का दिमाग, जो अभी विकास की अवस्था में होता है, इस प्रभाव को समझ नहीं पाता. वे यह फर्क नहीं कर पाते कि गेम का दबाव और असली जिंदगी की अहमियत क्या है। गाजियाबाद की तीनों बहनों के मामले में भी शुरुआती जांच यही संकेत देती है कि वे एक टास्क-बेस्ड ऑनलाइन गेम से भावनात्मक रूप से जुड़ चुकी थीं, जहां गेम पूरा करना ही उनका लक्ष्य बन गया था।</p>
<p style="text-align:left;">समस्या सिर्फ गेमिंग तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया एल्गोरिदम भी इसी सिद्धांत पर काम करते हैं. रील्स, शॉर्ट वीडियो और लाइक-शेयर का सिस्टम बच्चों को लंबे समय तक स्क्रीन से बांधे रखता है। कंपनियों का मुनाफा यूजर के समय पर निर्भर करता है। जितना ज्यादा समय बच्चा स्क्रीन पर रहेगा, उतना ज्यादा डेटा, उतना ज्यादा विज्ञापन और उतनी ज्यादा कमाई। लेकिन इस दौड़ में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की कीमत कोई नहीं गिनता। भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए बच्चों की सुरक्षा को लेकर नियम तो हैं, लेकिन वे या तो अधूरे हैं या सख्ती से लागू नहीं होते।</p>
<p style="text-align:left;"> </p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 05 Feb 2026 12:33:31 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[अजय कुमार, लखनऊ]]>
                    </dc:creator>
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            <item>
                <title>टेस्ला मॉडल वाई इलेक्ट्रॉनिक डोर हैंडल फेल: बच्चों की सुरक्षा खतरे में, अमेरिका में NHTSA की जांच शुरू </title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>नेशनल डेस्क: </strong>टेस्ला के मॉडल वाई को लेकर एक गंभीर सुरक्षा चिंता सामने आई है। अमेरिका में कई यूज़र्स ने शिकायत की है कि कार के इलेक्ट्रॉनिक डोर हैंडल्स अचानक काम करना बंद कर देते हैं। यह समस्या तब और खतरनाक हो गई जब बच्चों के अंदर फंसे होने के बावजूद माता-पिता दरवाजा नहीं खोल सके। आखिरकार, कुछ मामलों में माता-पिता को कार का शीशा तोड़कर बच्चों को बाहर निकालना पड़ा। यह सब एक प्रीमियम इलेक्ट्रिक गाड़ी के साथ हुआ, जिसकी कीमत भारतीय बाजार में करीब ₹39.5 लाख है।</p>
<hr class="bg-offsetPlus h-px border-0" />
<h5 class="mb-2 mt-4 font-display font-semimedium text-base first:mt-0"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>कैसे सामने आई यह दिक्कत</strong></span></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">इन मामलों की जाँच में पाया</p>...]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/international/tesla-model-y-electronic-door-handle-failed-childrens-safety-of/article-16290"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-09/gemini_generated_image_i3t25ci3t25ci3t2.jpg" alt=""></a><br /><p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>नेशनल डेस्क: </strong>टेस्ला के मॉडल वाई को लेकर एक गंभीर सुरक्षा चिंता सामने आई है। अमेरिका में कई यूज़र्स ने शिकायत की है कि कार के इलेक्ट्रॉनिक डोर हैंडल्स अचानक काम करना बंद कर देते हैं। यह समस्या तब और खतरनाक हो गई जब बच्चों के अंदर फंसे होने के बावजूद माता-पिता दरवाजा नहीं खोल सके। आखिरकार, कुछ मामलों में माता-पिता को कार का शीशा तोड़कर बच्चों को बाहर निकालना पड़ा। यह सब एक प्रीमियम इलेक्ट्रिक गाड़ी के साथ हुआ, जिसकी कीमत भारतीय बाजार में करीब ₹39.5 लाख है।</p>
<hr class="bg-offsetPlus h-px border-0" />
<h5 class="mb-2 mt-4 font-display font-semimedium text-base first:mt-0"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>कैसे सामने आई यह दिक्कत</strong></span></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">इन मामलों की जाँच में पाया गया कि इलेक्ट्रॉनिक डोर हैंडल्स तब फेल होते हैं जब कार के इलेक्ट्रॉनिक डोर लॉक को पर्याप्त बिजली नहीं मिल पाती। कई कार मालिकों ने इस समस्या के बाद अपनी लो-वोल्टेज बैटरी बदलवाई, लेकिन किसी को भी पहले से इस संबंध में कोई चेतावनी नहीं मिली थी। बच्चों के लिए स्थिति और भी खतरनाक हो गई क्योंकि कार के मैन्युअल डोर ओपनर का इस्तेमाल बच्चे छोटी उम्र की वजह से नहीं कर सके।</p>
<hr class="bg-offsetPlus h-px border-0" />
<h5 class="mb-2 mt-4 font-display font-semimedium text-base first:mt-0"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>क्या कहती है NHTSA और अब आगे क्या</strong></span></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">नेशनल हाईवे ट्रैफिक सेफ्टी एडमिनिस्ट्रेशन (NHTSA), अमेरिका ने इस गंभीर समस्या को देखते हुए लगभग 1.74 लाख टेस्ला मॉडल वाई कारों की जांच शुरू कर दी है। रायटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक यह जांच 2021 मॉडल के लिए शुरू की गई है। अधिकारियों को लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि दरवाजे के इलेक्ट्रॉनिक हैंडल अचानक काम नहीं करते, जिससे आपातस्थिति में लोगों की जान खतरे में पड़ सकती है। अगर जांच में यह साबित होता है कि सेफ्टी पर खतरा है, तो टेस्ला के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है और कंपनी को इन कारों को रिकॉल करने के लिए कहा जा सकता है।</p>
<hr class="bg-offsetPlus h-px border-0" />
<h5 class="mb-2 mt-4 font-display font-semimedium text-base first:mt-0"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>कंपनी की प्रतिक्रिया</strong></span></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">फिलहाल, इस पूरे मामले में टेस्ला ने कोई आधिकारिक बयान नहीं जारी किया है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर टेस्ला जल्द समाधान नहीं खोजती, तो उसकी ब्रांड वैल्यू और कस्टमर ट्रस्ट पर असर पड़ सकता है। इलेक्ट्रिक गाड़ियों के भविष्य के लिए यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि क्या बढ़िया टेक्नोलॉजी के बावजूद बेसिक सेफ्टी फीचर्स में लापरवाही की जा सकती है।</p>
<hr />
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">टेस्ला के लिए ये घटनाएं एक बड़ा झटका हैं, क्योंकि उसकी पहचान इनोवेशन और शानदार सुरक्षा फीचर्स के लिए थी। आगामी समय में अमेरिका के नियामक एजेंसी के फैसले और टेस्ला के जवाब पर सभी की नजरें होंगी। ऐसी घटनाओं के बाद इलेक्ट्रिक वाहनों में आपातकाल सुरक्षा पर दोबारा मंथन शुरू हो गया है।</p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>तकनीक</category>
                                            <category>अंतरराष्ट्रीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 17 Sep 2025 19:48:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[Samridh Desk]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>लातेहार में फ़ाइलेरिया उन्मूलन अभियान: घर-घर जाकर दी जा रही मुफ्त दवाएं</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<p><strong>लातेहार: </strong>लातेहार जिला प्रशासन एवं स्वास्थ्य विभाग द्वारा फ़ाइलेरिया उन्मूलन अभियान (आईडीए राउंड) गत कई दिनों से ज़ोर-शोर से चलाया जा रहा है। यह अभियान 10 अगस्त से झारखंड के 9 जिलों में एक साथ प्रारंभ किया गया था, जिसमें लातेहार प्रमुख जिलों में शामिल है।</p>
<p>जिला मलेरिया पदाधिकारी डॉ. मर्शा टोप्प्नों ने बताया कि स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा प्रत्येक घर पर जाकर पात्र लाभुकों को फ़ाइलेरिया रोधी तीन दवाओं – डीईसी, अल्बेंडाजोल और आइवरमेक्टिन का सेवन कराया जा रहा है। यह सभी दवाएं पूरी तरह सुरक्षित, प्रभावी और मुफ़्त हैं।</p>
<p>उन्होंने बताया कि इस अभियान के अंतर्गत लातेहार के 07</p>...]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/latehar/filaria-eradication-campaign-in-latehar-is-being-given-from-house/article-16017"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-09/resized-image-(25)1.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>लातेहार: </strong>लातेहार जिला प्रशासन एवं स्वास्थ्य विभाग द्वारा फ़ाइलेरिया उन्मूलन अभियान (आईडीए राउंड) गत कई दिनों से ज़ोर-शोर से चलाया जा रहा है। यह अभियान 10 अगस्त से झारखंड के 9 जिलों में एक साथ प्रारंभ किया गया था, जिसमें लातेहार प्रमुख जिलों में शामिल है।</p>
<p>जिला मलेरिया पदाधिकारी डॉ. मर्शा टोप्प्नों ने बताया कि स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा प्रत्येक घर पर जाकर पात्र लाभुकों को फ़ाइलेरिया रोधी तीन दवाओं – डीईसी, अल्बेंडाजोल और आइवरमेक्टिन का सेवन कराया जा रहा है। यह सभी दवाएं पूरी तरह सुरक्षित, प्रभावी और मुफ़्त हैं।</p>
<p>उन्होंने बताया कि इस अभियान के अंतर्गत लातेहार के 07 चिन्हित प्रखंडों की 07 लाख 81 हज़ार 551 आबादी को लक्षित किया गया है, जिनमें से 07 लाख 31 हजार 833 लोगों को दवा खिलाया जा चुका है। लातेहार जिले में अभियान की निगरानी के लिए नियमित समीक्षा बैठकें की जा रही हैं और सूक्ष्म कार्ययोजनाओं के आधार पर प्रखंडवार गतिविधियाँ संचालित की जा रही हैं।</p>
<p>जिले के भीबीडी कंसल्टेंट सुनील कुमार सिंह ने बताया कि अभियान को सफल बनाने में शिक्षा, आंगनबाड़ी, पंचायती राज, नगर निकाय, स्वच्छता, आजीविका एवं जलापूर्ति विभागों की सहभागिता महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।<br />यह ध्यान दिया जा रहा है कि 2 वर्ष से कम उम्र के बच्चे, गर्भवती महिलाएं एवं गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति इस दवा से वंचित रहें, जबकि शेष सभी नागरिकों को आयु के अनुसार फ़ाइलेरिया रोधी दवाओं की नि:शुल्क  खुराक स्वास्थ्यकर्मियों के सामने ही खिलाई जाये। ये दवाएं खाली पेट नहीं खानी हैं।</p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>लातेहार</category>
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                <pubDate>Sat, 06 Sep 2025 18:31:09 +0530</pubDate>
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                <title>पश्चिमी सिंहभूम में फ़ाइलेरिया उन्मूलन: 15 लाख से अधिक लोगों को दी जा रही मुफ्त दवाएं</title>
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                        <![CDATA[<p><strong>पश्चिमी सिंहभूम: </strong>पश्चिमी सिंहभूम  जिला प्रशासन एवं स्वास्थ्य विभाग द्वारा फ़ाइलेरिया उन्मूलन अभियान (आईडीए राउंड) गत कई दिनों से ज़ोर-शोर से चलाया जा रहा है। यह अभियान 10 अगस्त से झारखंड के 9 जिलों में एक साथ प्रारंभ किया गया था, जिसमें पश्चिमी सिंहभूम प्रमुख जिलों में शामिल है।</p>
<p>जिला मलेरिया पदाधिकारी डॉ. मीना कलूंडिया ने बताया कि स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा प्रत्येक घर पर जाकर पात्र लाभुकों  को फ़ाइलेरिया रोधी तीन दवाओं – डीईसी, अल्बेंडाजोल और आइवरमेक्टिन का सेवन कराया जा रहा है। यह सभी दवाएं पूरी तरह सुरक्षित, प्रभावी और मुफ़्त हैं।</p>
<p>उन्होंने बताया कि इस अभियान के अंतर्गत</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/chaibasa/free-medicines-are-being-given-to-more-than-15-million/article-16016"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-09/resized-image-(24)2.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>पश्चिमी सिंहभूम: </strong>पश्चिमी सिंहभूम  जिला प्रशासन एवं स्वास्थ्य विभाग द्वारा फ़ाइलेरिया उन्मूलन अभियान (आईडीए राउंड) गत कई दिनों से ज़ोर-शोर से चलाया जा रहा है। यह अभियान 10 अगस्त से झारखंड के 9 जिलों में एक साथ प्रारंभ किया गया था, जिसमें पश्चिमी सिंहभूम प्रमुख जिलों में शामिल है।</p>
<p>जिला मलेरिया पदाधिकारी डॉ. मीना कलूंडिया ने बताया कि स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा प्रत्येक घर पर जाकर पात्र लाभुकों  को फ़ाइलेरिया रोधी तीन दवाओं – डीईसी, अल्बेंडाजोल और आइवरमेक्टिन का सेवन कराया जा रहा है। यह सभी दवाएं पूरी तरह सुरक्षित, प्रभावी और मुफ़्त हैं।</p>
<p>उन्होंने बताया कि इस अभियान के अंतर्गत पश्चिमी सिंहभूम के 15 चिन्हित प्रखंडों की 15 लाख 73 हज़ार 723 आबादी को लक्षित किया गया है, जिनमें से 14 लाख 53 हजार 664 लोगों को दवा खिलाया जा चुका है। पश्चिमी सिंहभूम जिले में अभियान की निगरानी के लिए नियमित समीक्षा बैठकें की जा रही हैं और सूक्ष्म कार्ययोजनाओं के आधार पर प्रखंडवार गतिविधियाँ संचालित की जा रही हैं।</p>
<p>जिले के भीबीडी कंसल्टेंट शशि भूषण महतो ने बताया कि अभियान को सफल बनाने में रात्रि चौपाल, शिक्षा, आंगनबाड़ी, पंचायती राज, नगर निकाय, स्वच्छता, आजीविका एवं जलापूर्ति विभागों की सहभागिता महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।</p>
<p>यह ध्यान दिया जा रहा है कि 2 वर्ष से कम उम्र के बच्चे, गर्भवती महिलाएं एवं गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति इस दवा से वंचित रहें, जबकि शेष सभी नागरिकों को आयु के अनुसार फ़ाइलेरिया रोधी दवाओं की नि:शुल्क  खुराक स्वास्थ्यकर्मियों के सामने ही खिलाई जाये। ये दवाएं खाली पेट नहीं खानी हैं।</p>]]>
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                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>चाईबासा</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Sep 2025 18:27:39 +0530</pubDate>
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