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                <title>Jharkhand High Court - Samridh Jharkhand</title>
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                <description>Jharkhand High Court RSS Feed</description>
                
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                <title>झारखंड में चल रही है ‘फटकार आधारित शासन’ व्यवस्था: प्रतुल शाहदेव </title>
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                        <![CDATA[भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने झारखंड की हेमंत सरकार पर "फटकार आधारित शासन" चलाने का गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि निकाय चुनाव, पंचायत सचिवों की नियुक्ति और सूचना आयुक्तों के चयन जैसे महत्वपूर्ण निर्णय सरकार ने अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि न्यायालय की कड़ी फटकार और हस्तक्षेप के बाद लिए हैं। शाहदेव के अनुसार, सरकार अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों से भाग रही है और केवल कानूनी दबाव में ही काम कर रही है, जो राज्य की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/reprimand-based-governance-system-is-running-in-jharkhand-pratul-shahdev/article-19317"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/download_samridh_1200x720-(19).jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>रांची: </strong>भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता प्रतुल शाह देव ने कहा कि झारखंड में शासन व्यवस्था की स्थिति बेहद चिंताजनक हो चुकी है। हेमंत सरकार अब अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन स्वयं नहीं कर रही, बल्कि माननीय न्यायालयों की फटकार के बाद ही हरकत में आती है। प्रतुल ने कहा कि हेमंत सरकार का पूरा कार्यकाल इस बात का प्रमाण है कि यह सरकार “फटकार आधारित शासन” चला रही है। जब तक उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय कड़ी टिप्पणी नहीं करता, तब तक सरकार महत्वपूर्ण निर्णयों को टालती रहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रतुल ने कहा कि राज्य में निकाय चुनाव वर्षों तक लंबित रखे गए, लेकिन उच्च न्यायालय की सख्ती के बाद ही चुनाव कराए गए। पंचायत सचिव अभ्यर्थियों की नियुक्ति भी लंबे समय तक अटकी रही, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद ही सरकार को प्रक्रिया पूरी करनी पड़ी। सूचना आयुक्तों और लोकायुक्त जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों को भरने में भी सरकार पूरी तरह विफल रही। उच्च न्यायालय के निर्देश के बाद ही चयन समिति की बैठक की तिथि तय की गई। इसी प्रकार थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने जैसी आवश्यक </p>
<p style="text-align:justify;">नियुक्तियों, प्रशासनिक फैसलों और कानून-व्यवस्था से जुड़े कई मामलों में न्यायालय को बार-बार हस्तक्षेप करना पड़ा है। यह दर्शाता है कि सरकार अपनी जिम्मेदारियों से बच रही है और केवल दबाव में काम कर रही है। एक लोकतांत्रिक सरकार से अपेक्षा होती है कि वह जनता के प्रति जवाबदेह हो और समय पर निर्णय ले, लेकिन झारखंड में सरकार की जवाबदेही केवल न्यायालय की फटकार तक सीमित रह गई है। यह स्थिति राज्य के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने मांग की कि हेमंत सरकार न्यायालय के आदेशों का इंतजार करने के बजाय स्वयं पहल कर राज्यहित में निर्णय ले, अन्यथा यह सरकार पूरी तरह से निष्क्रिय और दिशाहीन साबित होगी।</p>]]>
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                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 18:36:16 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Anjali Sinha]]>
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            <item>
                <title>हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: रांची यूनिवर्सिटी के लॉ कॉलेज में एडमिशन पर रोक</title>
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                        <![CDATA[झारखंड उच्च न्यायालय ने रांची विश्वविद्यालय के लॉ कॉलेज में कमियों के कारण अगले सत्र के नामांकन पर रोक लगा दी है।]]>
                    </description>
                
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                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/big-decision-of-high-court-banning-admission-in-law-college/article-19071"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/bc3803426b8cd7db6a0ead079f919268_798006537_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>रांची : </strong>रांची विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित लॉ कॉलेज इंस्टिट्यूट ऑफ लीगल स्टडीज में अगले सत्र से नामांकन पर झारखंड उच्च न्यायालय ने अगले आदेश तक रोक लगा दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति आनंदा सेन की अदालत ने पारित किया।<br /><br />मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तथ्य आया कि संस्थान में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के नियमों के अनुरूप बुनियादी सुविधाओं की कमी है। इनमें लाइब्रेरी, योग्य प्रिंसिपल और कोर फैकल्टी का अभाव प्रमुख रूप से शामिल है।<br /><br />इस संबंध में अंबेश कुमार चौबे और अन्य की ओर से याचिका दायर की गई थी। याचिका में कहा गया कि संस्थान की लापरवाही के कारण 418 विद्यार्थियों का भविष्य संकट में पड़ गया है। बीसीआई ने अक्टूबर 2025 में संस्थान को ईमेल के माध्यम से निर्देश दिया था कि छह माह के भीतर सभी कमियों को दूर किया जाए, अन्यथा आगे की संबद्धता नहीं दी जाएगी। बावजूद इसके संस्थान ने आवश्यक सुधार नहीं किए।<br /><br />प्रार्थी की ओर से अधिवक्ता अनूप कुमार अग्रवाल ने अदालत में पक्ष रखा। बताया गया कि यह संस्थान सरकार के निर्देश के तहत स्व-वित्त पोषित है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने फिलहाल नए नामांकन पर रोक लगाते हुए संस्थान को कमियों को दूर करने का आदेश दिया है।</p>]]>
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                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 20 Mar 2026 16:07:44 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Anshika Ambasta]]>
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                <title>14 महीने बाद जेल से बाहर आए सैयद अरशद नसर, कहा – न झुकेंगे, न डरेंगे</title>
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                        <![CDATA[साहिबगंज के चर्चित सामाजिक कार्यकर्ता एवं राजमहल विधानसभा क्षेत्र के पूर्व प्रत्याशी सैयद अरशद नसर 14 महीने बाद जेल से रिहा हो गए। उनके खिलाफ दर्ज विभिन्न मामलों में नियमित जमानत मिलने के बाद वे शेखपुरा जेल से बाहर आए।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/sahibganj/syed-arshad-nassar-came-out-of-jail-after-14-months/article-18463"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/75579e61-65be-48ab-8522-9517c6c6bfe5_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>साहिबगंज :</strong> चर्चित सामाजिक कार्यकर्ता सह राजमहल विधानसभा क्षेत्र के पूर्व प्रत्याशी सैयद अरशद नसर के खिलाफ़ जिले के खनन पदाधिकारी कृष्ण कुमार किस्कू के द्वारा रंगदारी, भयदोहन, ब्लैकमेलिंग, सरकारी संचिका फाड़ने, सरकारी काम में बाधा डालने व एससी-एसटी एक्ट के तहत जिरवाबाड़ी थाना में दर्ज कराए गए दो-दो कांड संख्या- (104/24 तथा 204/24) में झारखंड हाई कोर्ट के न्यायाधीश अनिल कुमार चौधरी के बेंच में विद्वान अधिवक्ता सुधांशु शेखर चौधरी व प्रधान जिला व सत्र न्यायाधीश, साहिबगंज अखिल कुमार के न्यायालय में विद्वान अधिवक्ता मोहम्मद तारीक जफर उर्फ मिंटू के द्वारा तथा शेखपुरा थाना कांड संख्या-248/24 में संतोष कुमार तिवारी, प्रधान जिला व सत्र न्यायाधीश, शेखपुरा के न्यायालय में विद्वान अधिवक्ता बिनोद कुमार सिंह के द्वारा अरशद की तरफ़ से पैरवी उपरांत न्यायालय के द्वारा नियमित जमानत प्रदान करने के चलते अरशद 14 महीने पर रविवार को शेखपुरा जेल से बाहर निकले।     </p>
<p>विदित हो कि अरशद बीते वर्ष 8 जनवरी से साहिबगंज जेल में बंद थे, जहाँ अरशद द्वारा जेल में व्याप्त भ्रष्टाचार, अत्याचार, कुव्यवस्था, घटिया खान-पान के खिलाफ़ लगातार किए जा रहे आंदोलन के चलते बीते 13 दिसम्बर को अरशद को साहिबगंज जेल से मधुपुर जेल भेज दिया गया था, वहाँ भी अरशद के द्वारा भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ़ आवाज़ उठाने के चलते बीते 26 फरवरी को मधुपुर जेल से शेखपुरा जेल भेज दिया गया। जेल से बाहर आने के बाद प्रेस-विज्ञप्ति जारी कर अरशद ने सर्वप्रथम न्यायालय के प्रति आभार प्रकट करते हुए कहा की वह न कभी झुकें हैं और न ही कभी झुकेंगे और न ही कभी डरें हैं और न ही कभी डरेंगे। जेल जाने से उनका मनोबल गिरने के बदले और मजबूत हुआ है। अरशद ने आगे कहा की भ्रष्ट पुलिस-प्रशासनिक पदाधिकारी राजनीतिज्ञ व स्टोन क्रशर, पत्थर, बालू, ईटा, भूमि, कोयला, वन माफियाओं व आसामाजिक तत्वों के खिलाफ उनका संघर्ष और तेज होगा तथा ऐतिहासिक राजमहल पहाड़ व गंगा नदी के संरक्षण व संवर्धन के लिए उनका अभियान अब और जोर पकड़ेगा तथा जल-वायु-ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ़ निर्णायक लड़ाई लड़ी जाएगी।    </p>
<p>साहिबगंज व मधुपुर जेल में बिताए गए पल के बारे में अरशद ने बताया कि अंग्रेज के समय का जेल बेहतर था जबकि आजाद भारत का साहिबगंज जेल व मधुपुर जेल नरक से भी बदतर है, जिसका वह जल्द खुलासा करेंगे। हाई कोर्ट द्वारा उनके खनन कार्यालय में प्रवेश पर रोक लगाए जाने के बारे में कहा की वे सुप्रीम कोर्ट में जल्द अपील दायर करेंगे। अरशद के जेल से बाहर आने पर भ्रष्ट पुलिस-प्रशासनिक पदाधिकारी समेत सफेदपोश नेताओं व आसामाजिक तत्वों व पत्थर माफियाओं व कारोबारियों में दहशत व बेचैनी देखी जा रही है। वहीं, दूसरी तरफ सामाजिक कार्यकर्ताओं, जागरूक नागरिकों व बुद्धिजीवी वर्ग में खुशी व हर्ष व्याप्त है।</p>]]>
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                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>साहिबगंज</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2026 18:05:34 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Mohit Sinha]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>लोकायुक्त और मानवाधिकार आयोग की नियुक्ति पर झारखंड हाईकोर्ट का कड़ा रुख</title>
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                        <![CDATA[झारखंड हाईकोर्ट ने लोकायुक्त, राज्य मानवाधिकार आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं में वर्षों से खाली पड़े पदों पर नियुक्ति को लेकर राज्य सरकार से ठोस समयसीमा मांगी है और चेतावनी दी है कि छह सप्ताह में नियुक्ति नहीं हुई तो आदेश पारित किया जाएगा।]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/jharkhand-high-courts-tough-stance-on-the-appointment-of-lokayukta/article-17982"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/76dbc9516c74fcbb48e62739a518a1da_1835919879_samridh_1200x720-(1).jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>रांची :</strong> झारखंड में लोकायुक्त, राज्य मानवाधिकार आयोग, राज्य सूचना आयोग सहित अन्य संवैधानिक संस्थाओं में वर्षों से रिक्त पड़े पदों पर नियुक्ति को लेकर झारखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के प्रति कड़ा रुख अपनाया है। सोमवार को इस संबंध में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया कि वह नियुक्तियों को लेकर ठोस समयसीमा बताए।<br /><br />मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक एवं न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजीव रंजन उपस्थित हुए। उन्होंने अदालत को अवगत कराया कि राज्य सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त एवं अन्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति का मामला फिलहाल उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए इस विषय में राज्य सरकार कोई अंतिम निर्णय नहीं ले पा रही है।<br /><br />हालांकि, महाधिवक्ता ने यह भी स्पष्ट किया कि लोकायुक्त और राज्य मानवाधिकार आयोग में अध्यक्ष पद पर नियुक्ति की प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है और शीघ्र ही इन पदों पर नियुक्ति कर ली जाएगी। इसके लिए उन्होंने अदालत से कुछ समय देने का अनुरोध किया।<br /><br />वहीं, जनहित याचिका की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता वी.पी. सिंह ने सरकार के रुख पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार बीते चार वर्षों से इन महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर नियुक्ति को लेकर केवल समय मांग रही है, लेकिन अब तक न तो लोकायुक्त और न ही मानवाधिकार आयोग में अध्यक्ष की नियुक्ति की गई है। इसके कारण इन संस्थाओं का कामकाज गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है और आम जनता को न्याय एवं संरक्षण से जुड़े मामलों में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।<br /><br />इस पर खंडपीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य सरकार यह स्पष्ट करे कि लोकायुक्त और मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति आखिर कब तक की जाएगी। अदालत ने कहा कि यदि सरकार संतोषजनक और ठोस जवाब देने में विफल रहती है, तो वह छह सप्ताह के भीतर इन दोनों पदों पर नियुक्ति का आदेश पारित करने पर विचार करेगी।<br /><br />अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई मंगलवार को निर्धारित की है। इससे पूर्व की सुनवाई में याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया था कि राज्य में लोकायुक्त, राज्य मानवाधिकार आयोग, राज्य सूचना आयोग सहित कई संवैधानिक संस्थाओं में अध्यक्ष एवं सदस्यों के पद तीन से पांच वर्षों से रिक्त पड़े हैं, लेकिन अब तक उन्हें भरा नहीं गया है। इस पर राज्य सरकार ने पहले दलील दी थी कि सभी पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया जारी है।<br /><br />उल्लेखनीय है कि राज्य में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति नहीं होने को लेकर राजकुमार की ओर से उच्च न्यायालय में अवमानना याचिका भी दायर की गई है। इसके अलावा राज्य की 12 संवैधानिक संस्थाओं में अध्यक्ष और सदस्यों के पद रिक्त रहने को लेकर एक अलग जनहित याचिका भी झारखंड उच्च न्यायालय में लंबित है, जिस पर सुनवाई जारी है।</p>]]>
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                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>रांची</category>
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                <pubDate>Mon, 09 Feb 2026 16:44:45 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Susmita Rani]]>
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                <title>ईडी अधिकारियों पर पुलिस जांच की रोक बढ़ी, हाईकोर्ट का बड़ा आदेश</title>
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                        <![CDATA[झारखंड उच्च न्यायालय ने ईडी अधिकारियों के खिलाफ पुलिस जांच और किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर लगी रोक को अगले आदेश तक बढ़ा दिया है। मामले की अगली सुनवाई 17 फरवरी को होगी।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/high-courts-big-order-extends-ban-on-police-investigation-on/article-17970"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/76dbc9516c74fcbb48e62739a518a1da_1835919879_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:left;"><strong>रांची :</strong> झारखंड उच्च न्यायालय ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के अधिकारियों के विरुद्ध पुलिस जांच एवं किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई पर लगी रोक को अगले आदेश तक बढ़ा दिया है। सोमवार को न्यायमूर्ति एस.के. द्विवेदी की अदालत में हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पूर्व में दी गई अंतरिम राहत को कायम रखा। इस मामले की अगली सुनवाई 17 फरवरी को निर्धारित की गई है।<br /><br />सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजीव रंजन ने पक्ष रखा, जबकि ईडी की ओर से भारत के सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू, अधिवक्ता एके दास और सौरभ कुमार ने दलीलें पेश कीं। अगली सुनवाई में मुख्य रूप से याचिका की मेंटेनेबिलिटी यानी यह याचिका सुनवाई योग्य है या नहीं, इस बिंदु पर बहस होगी।<br /><br />पिछली सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने ईडी कार्यालय की सुरक्षा को लेकर सख्त रुख अपनाया था। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि रांची स्थित ईडी कार्यालय की सुरक्षा के लिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआईएसएफ), सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) या किसी अन्य अर्धसैनिक बल की तैनाती सुनिश्चित की जाए। साथ ही ईडी कार्यालय के सीसीटीवी फुटेज को सुरक्षित रखने का भी निर्देश दिया गया था, ताकि किसी प्रकार के साक्ष्य से छेड़छाड़ न हो सके।<br /><br />उल्लेखनीय है कि यह मामला एयरपोर्ट थाना कांड संख्या 05/2026 से संबंधित है, जिसमें ईडी अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। ईडी अधिकारियों ने अदालत से अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर एवं आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने अथवा मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी, जैसे केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपने का अनुरोध किया है। इसके साथ ही ईडी ने शिकायतकर्ता संतोष कुमार के खिलाफ भी प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की है।<br /><br />ईडी के अनुसार, संतोष कुमार पर लगभग 23 करोड़ रुपये के सरकारी धन के गबन का आरोप है, जो कथित पेयजल घोटाले से जुड़ा हुआ है। इस मामले में ईडी की ओर से उनके खिलाफ ईसीआईआर भी दर्ज की गई है। ईडी का कहना है कि 12 जनवरी 2026 को संतोष कुमार स्वयं ईडी कार्यालय पूछताछ के लिए पहुंचे थे, जहां वे अचानक उत्तेजित हो गए और उन्होंने स्वयं ही पानी का जग उठाकर अपने सिर पर मार लिया, जिससे उन्हें मामूली चोट आई। बाद में उन्होंने ईडी अधिकारियों पर हमला करने का आरोप लगाते हुए एयरपोर्ट थाना में मामला दर्ज कराया।</p>]]>
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                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Feb 2026 15:41:20 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Susmita Rani]]>
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            <item>
                <title>पत्नी हत्या मामले में झारखंड हाई कोर्ट का अहम फैसला, उम्रकैद की सजा रद्द</title>
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                        <![CDATA[झारखंड हाई कोर्ट ने पत्नी हत्या के एक पुराने मामले में साक्ष्यों के अभाव में निचली अदालत द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि केवल संदेह के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/important-decision-of-jharkhand-high-court-in-wife-murder-case/article-17710"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-01/f346d462a6de20ce10a7ef58dc82e56f_518316086_samridh_1200x7201.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>रांची : </strong> झारखंड उच्च न्यायालय ने पत्नी की हत्या से जुड़े एक पुराने आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए हजारीबाग की निचली अदालत द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को रद्द कर दिया है। अदालत ने साक्ष्यों के अभाव और संदेह का लाभ देते हुए दोनों आरोपितों को दोषमुक्त कर दिया। यह निर्णय शुक्रवार को न्यायमूर्ति रंगन मुखोपाध्याय और न्यायमूर्ति दीपक रोशन की खंडपीठ ने सुनाया।<br /><br />उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि इस मामले में कोई भी प्रत्यक्षदर्शी गवाह उपलब्ध नहीं है। अभियोजन पक्ष की पूरी कहानी केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है, लेकिन ये साक्ष्य न तो आपस में जुड़कर एक पूर्ण श्रृंखला बनाते हैं और न ही इतने मजबूत हैं कि उनके आधार पर दोषसिद्धि को कायम रखा जा सके। अदालत ने कहा कि आपराधिक मामलों में केवल संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।<br /><br />दरअसल, यह दोनों आपराधिक अपीलें शत्रुघन प्रसाद डांगी और धानु भुइयां की ओर से दायर की गई थीं, जो हजारीबाग के आठवें अपर सत्र न्यायाधीश द्वारा वर्ष 2003 में दिए गए निर्णय के खिलाफ थीं। उच्च न्यायालय ने इन अपीलों को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को निरस्त कर दिया।<br /><br />यह मामला वर्ष 2000 का है, जब शत्रुघन प्रसाद डांगी की पत्नी उषा देवी की हत्या कर दी गई थी। शुरुआत में पुलिस ने इसे लूटपाट के दौरान हुई हत्या बताया था, लेकिन जांच आगे बढ़ने पर आरोप लगाया गया कि शत्रुघन प्रसाद डांगी ने साजिश रचकर अपनी पत्नी की हत्या करवाई। इस कथित साजिश में धानु भुइयां को सह-आरोपित बनाया गया था।<br /><br />ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपितों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। हालांकि, उच्च न्यायालय ने पाया कि सह-आरोपित धानु भुइयां के खिलाफ केवल सह-आरोपित के स्वीकारोक्ति बयान के अलावा कोई ठोस, स्वतंत्र और विश्वसनीय साक्ष्य मौजूद नहीं है, जिसे कानूनन स्वीकार नहीं किया जा सकता।<br /><br />अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि जिस चाकू की बरामदगी अभियोजन पक्ष द्वारा दिखाई गई थी, उसे न तो फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) भेजा गया और न ही यह प्रमाणित किया गया कि उसी हथियार से हत्या की गई थी। ऐसे में इस कथित बरामदगी को भी अदालत ने अविश्वसनीय माना।<br /><br />इसके अलावा, मृतका के माता-पिता द्वारा बताए गए वैवाहिक तनाव को भी उच्च न्यायालय ने हत्या का निर्णायक और ठोस कारण मानने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि मात्र वैवाहिक कलह के आधार पर हत्या जैसे गंभीर अपराध को सिद्ध नहीं किया जा सकता।<br /><br />चूंकि दोनों अपीलकर्ता पहले से ही जमानत पर थे, इसलिए उच्च न्यायालय ने उन्हें जमानत बंधन से भी मुक्त कर दिया। यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों की मजबूती, निष्पक्ष जांच और दोषसिद्धि के लिए आवश्यक मानकों को रेखांकित करने वाला एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।</p>]]>
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                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 30 Jan 2026 16:23:36 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Anshika Ambasta]]>
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            <item>
                <title>अब “खून के बदले खून” नहीं मांग सकेगा कोई अस्पताल, झारखंड वासियों के हक़ में हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फ़ैसला</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[झारखंड हाईकोर्ट ने “खून के बदले खून” की प्रथा पर रोक लगाते हुए तीन महीने में हर जिले में ब्लड कंपोनेंट सेपरेशन यूनिट स्थापित करने का सख़्त आदेश दिया है।]]>
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                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/now-no-hospital-will-be-able-to-ask-for-blood/article-17575"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-12/download_samridh_1200x720-(1).jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>रांची:</strong> झारखंड की जनता के लिए एक ऐतिहासिक और राहत भरा फैसला सामने आया है। झारखंड हाईकोर्ट ने आज रक्तदान और ब्लड ट्रांसफ्यूजन व्यवस्था को लेकर बड़ा और सख़्त आदेश पारित करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि अब राज्य में कोई भी सरकारी या निजी अस्पताल, नर्सिंग होम या ब्लड बैंक मरीज़ों से “खून के बदले खून” की मांग नहीं कर सकता।</p>
<p>हाईकोर्ट ने इसे न केवल अवैध बल्कि अमानवीय करार देते हुए कहा कि रक्त उपलब्ध कराना अस्पताल और स्वास्थ्य तंत्र की जिम्मेदारी है, न कि बीमार मरीज़ या उसके परिजनों की। यह आदेश आज ही पारित हुआ है और पूरे झारखंड में तत्काल प्रभाव से लागू होगा।</p>
<p>चार PIL, एक बड़ा फ़ैसला यह ऐतिहासिक आदेश चार अलग-अलग जनहित याचिकाओं (PIL) और कोर्ट द्वारा लिए गए स्वतः संज्ञान (Court on its Own Motion) से जुड़े मामलों की संयुक्त सुनवाई के बाद पारित किया गया है।</p>
<p><strong>इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं— Life Savers Ranchi द्वारा दाख़िल जनहित याचिका</strong></p>
<h4><strong>अरुण कुमार सिंह द्वारा दाख़िल PIL</strong></h4>
<p>दो अन्य मामले, जिनमें हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया इन सभी याचिकाओं में झारखंड में रिप्लेसमेंट ब्लड ट्रांसफ्यूजन की प्रथा, रक्त की भारी कमी, थैलेसीमिया और सिकल सेल रोगियों की समस्याएं, ब्लड बैंकों की कार्यप्रणाली और सरकारी तंत्र की विफलता को विस्तार से उजागर किया गया था।</p>
<h4><strong>“रक्त व्यवस्था पूरी तरह विफल” — हाईकोर्ट</strong></h4>
<p>मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति तरलोक सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने अपने सख़्त शब्दों में कहा कि— झारखंड में अब तक राष्ट्रीय रक्त नीति के उद्देश्य 8.5 को लागू नहीं किया गया आज भी मरीज़ों के परिजनों को डोनर ढूंढने के लिए मजबूर किया जा रहा है यह व्यवस्था स्वास्थ्य के मौलिक अधिकार और मानवीय गरिमा का उल्लंघन है.</p>
<p>स्टेट ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल (SBTC) केवल कागज़ों में सक्रिय है कोर्ट ने कहा कि राज्य में रक्त व्यवस्था का हाल “बेहद चिंताजनक” है।</p>
<h4><strong>सरकारी आंकड़ों ने खोली हकीकत</strong></h4>
<p>हाईकोर्ट के समक्ष राज्य सरकार द्वारा पेश किए गए हलफनामे में जो आंकड़े सामने आए, उन्होंने पूरी व्यवस्था की पोल खोल दी—जुलाई 2025 में सिर्फ 13% रक्त संग्रह स्वैच्छिक रक्तदान से<br />अगस्त 2025 में 15–22%<br />सितंबर 2025 में भी महज़ 25% रक्त स्वैच्छिक रूप से प्राप्त हुआ<br />हाईकोर्ट ने कहा कि ये आंकड़े साबित करते हैं कि झारखंड अब भी रिप्लेसमेंट ब्लड सिस्टम पर निर्भर है, जो कानून, नीति और नैतिकता—तीनों के खिलाफ है।</p>
<h4><strong>निजी अस्पताल और ब्लड बैंक भी दोषी</strong></h4>
<p>हाईकोर्ट ने निजी अस्पतालों और निजी ब्लड बैंकों की भूमिका पर भी कड़ी नाराज़गी जताई। कोर्ट ने कहा कि— निजी संस्थानों ने अपनी जरूरत के अनुरूप रक्तदान शिविर आयोजित नहीं किए मुनाफा कमाने वाले ये संस्थान सामाजिक जिम्मेदारी निभाने में विफल रहे मरीज़ों पर डोनर लाने का दबाव बनाना कानूनन अपराध है।</p>
<p>थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों सिकल सेल रोगियों गंभीर दुर्घटना व सर्जरी वाले मरीजों को उठाना पड़ रहा है। कई डे-केयर सेंटरों में आवश्यक दवाएं, प्रशिक्षित डॉक्टर और नियमित रक्त उपलब्ध नहीं है।</p>
<h4><strong>2018 का आदेश भी नहीं माना गया</strong></h4>
<p>हाईकोर्ट ने 26 फरवरी 2018 के अपने आदेश का हवाला देते हुए कहा कि— सरकार ने 2018–19 में हर जिले में ब्लड कंपोनेंट सेपरेशन यूनिट (BCSU) लगाने का आश्वासन दिया था, लेकिन आज तक झारखंड के किसी भी जिले में यह यूनिट स्थापित नहीं की गई।</p>
<h4><strong>हाईकोर्ट के 6 बड़े और सख़्त निर्देश</strong></h4>
<p>हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और संबंधित संस्थानों को निर्देश दिया कि—</p>
<ul>
<li>तीन महीने के भीतर हर जिले में ब्लड कंपोनेंट सेपरेशन यूनिट स्थापित की जाए</li>
<li>100% रक्त संग्रह स्वैच्छिक रक्तदान से सुनिश्चित किया जाए</li>
<li>निजी अस्पताल और ब्लड बैंक अनिवार्य रूप से रक्तदान शिविर आयोजित करें</li>
<li>थैलेसीमिया व सिकल सेल डे-केयर सेंटर पूरी तरह कार्यशील हों</li>
<li>रक्त उपलब्धता के लिए अलग शिकायत निवारण तंत्र, ऐप और टोल-फ्री नंबर बनाया जाए</li>
<li>राज्य के सभी ब्लड बैंकों का हर तीन महीने में निरीक्षण किया जाए</li>
<li>अगली सुनवाई हाईकोर्ट ने इन सभी आदेशों के अनुपालन की समीक्षा के लिए 20 मार्च 2026 की तिथि तय की है।</li>
</ul>]]>
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                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>दिल्ली</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Dec 2025 22:26:09 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Mohit Sinha]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Ranchi News : सूचना आयोग और पेसा पर वर्षों की चुप्पी, RIMS अतिक्रमण पर 72 घंटे में बुलडोज़र: दोहरे मापदंड पर सवाल</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[सूचना आयोग और पेसा से जुड़े मामलों में वर्षों की देरी और RIMS अतिक्रमण पर त्वरित कार्रवाई को लेकर विजय शंकर नायक ने न्यायिक असमानता का मुद्दा उठाया है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/ranchi-news-years-of-silence-on-information-commission-and-pesa/article-17528"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-12/whatsapp-image-2025-12-18-at-17.41.18_54212212_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>रांची :</strong> सूचना आयोग और पेसा पर वर्षों से  चुप्पी,  रिम्स (RIMS) परिसर से अतिक्रमण हटाने के मामले में  मात्र 72 घंटों के भीतर प्रशासन ने बुलडोज़र चलाकर कार्रवाई कर दी। दोहरे मापदंड पर सवाल विजय शंकर नायक  झारखंड में न्यायिक प्रक्रिया की गंभीर असमानता और दोहरे मापदंडों को उजागर करते हुए आज आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच के केन्द्रीय उपाध्यक्ष सह पूर्व विधायक प्रत्यशी विजय शंकर नायक ने माननीय राष्ट्रपति महोदय एवं माननीय भारत के मुख्य न्यायाधीश को एक संयुक्त पत्र ईमेल के माध्यम से भेजा है। पत्र में राज्य के उन संवैधानिक मुद्दों पर चिंता जताई गई है, जिन पर वर्षों से न्यायिक मौन बना हुआ है, जबकि अन्य मामलों में त्वरित और कठोर कार्रवाई देखने को मिल रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">नायक ने आगे बताया की पत्र में यह जानकारी दी है कि राज्य सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति तथा पेसा अधिनियम, 1996 के प्रभावी क्रियान्वयन से संबंधित जनहित याचिकाएँ झारखंड उच्च न्यायालय में कई  वर्षों से अधिक समय से लंबित हैं। आज पांच वर्ष से अधिक दिन हो चुके है सुचना आयुक्तों की नियुक्ति नही हो सकी  है। इन मामलों में केवल तारीख़ें तय होती रही हैं, हलफनामे और सप्लीमेंट्री हलफनामे दाखिल होते रहे हैं, लेकिन कोई समयबद्ध और निर्णायक आदेश अब तक नहीं आया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि सूचना का अधिकार निष्क्रिय हो गया है और अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी समुदायों का स्वशासन कमजोर पड़ गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">जबकि इसके विपरीत, रिम्स (RIMS) परिसर से अतिक्रमण हटाने के मामले में झारखंड उच्च न्यायालय के आदेश पर मात्र 72 घंटों के भीतर प्रशासन ने बुलडोज़र चलाकर कार्रवाई कर दी। यह विरोधाभास यह सवाल खड़ा करता है कि क्या सरकार और शक्तिशाली तंत्र से जवाबदेही तय करने वाले मामलों में न्यायिक सख़्ती जानबूझकर कम कर दी जाती है, जबकि आम नागरिकों से जुड़े मामलों में तुरंत कठोर कदम उठाए जाते हैं।<br />नायक ने पत्र में यह भी स्मरण कराया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने 5 मई 2025 को निर्णयों में अत्यधिक देरी को अस्वीकार्य बताया था तथा 12 नवंबर 2025 को उच्च न्यायालयों को निर्णयों में देरी से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश देकर पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने पर बल दिया था।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके बावजूद झारखंड में जनहित से जुड़े मामलों की स्थिति में कोई ठोस सुधार नहीं होना चिंता को और गहरा करता है। यह पूरी परिस्थिति संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (1) (a) (सूचना का अधिकार) और पाँचवीं अनुसूची की भावना के प्रतिकूल बताई गई है। इससे न केवल न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं, बल्कि झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्य में लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा पर भी संकट खड़ा होता है। पत्र के माध्यम से राष्ट्रपति महोदय और मुख्य न्यायाधीश से आग्रह किया गया है कि वे संविधान के संरक्षक के रूप में हस्तक्षेप करते हुए इन लंबित जनहित याचिकाओं पर समयबद्ध और प्रभावी निर्णय सुनिश्चित कराएँ, ताकि न्याय की समानता बहाल हो।</p>]]>
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                                                            <category>समाचार</category>
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                <pubDate>Thu, 18 Dec 2025 18:16:48 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Susmita Rani]]>
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                <title>हाईकोर्ट में प्रतिनियुक्त नोडल अधिकारियों की जानकारी तलब, झारखंड पुलिस मुख्यालय का आदेश</title>
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                        <![CDATA[झारखंड पुलिस मुख्यालय ने राज्य के उच्च न्यायालय में प्रतिनियुक्त नोडल अधिकारियों की विस्तृत जानकारी 24 घंटे के भीतर उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/jharkhand-police-headquarters-called-for-information-about-nodal-officers-deputed/article-17500"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-12/a1090f4007ebe2f551528c17eed89c01_1935053855_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>रांची:  </strong>झारखंड पुलिस मुख्यालय ने राज्य के उच्च न्यायालय में प्रतिनियुक्त नोडल अधिकारियों की विस्तृत जानकारी तलब की है। इस संबंध में पुलिस मुख्यालय ने राज्य के सभी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी), पुलिस अधीक्षक (एसपी) और विभिन्न पुलिस इकाइयों के अधिकारियों को आवश्यक निर्देश जारी किए हैं।<br /><br />पुलिस मुख्यालय की ओर से महानिरीक्षक (आईजी, प्रोविजन) की ओर से जारी पत्र में 24 घंटे के भीतर निर्धारित प्रारूप में जानकारी उपलब्ध कराने को कहा गया है। पत्र के अनुसार, सभी जिलों और इकाइयों से झारखंड उच्च न्यायालय में तैनात नोडल अधिकारियों का पूरा विवरण मांगा गया है।<br /><br />मांगी गई जानकारी में नोडल अधिकारी का नाम एवं पद, मोबाइल नंबर, उच्च न्यायालय में प्रतिनियुक्ति की तिथि तथा उन्हें सौंपे गए कार्यों का विवरण शामिल है। पुलिस मुख्यालय ने सभी संबंधित अधिकारियों को समयसीमा के भीतर सटीक और पूर्ण जानकारी भेजने का निर्देश दिया है।</p>]]>
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                                                            <category>समाचार</category>
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                <pubDate>Wed, 17 Dec 2025 16:00:58 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Anshika Ambasta]]>
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                <title>सांसद निशिकांत दुबे को बड़ी राहत, उच्च न्यायालय ने दर्ज प्राथमिकी की रद्द</title>
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                        <![CDATA[सांसद निशिकांत दुबे के खिलाफ देवघर में दर्ज प्राथमिकी को झारखंड उच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया, जिससे उन्हें बड़ी कानूनी राहत मिली।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/big-relief-to-mp-nishikant-dubey-high-court-cancels-fir/article-17466"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-12/bc3803426b8cd7db6a0ead079f919268_1432633194_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>रांची :  </strong>गोड्डा से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद निशिकांत दुबे को उच्च न्यायालय से बड़ी राहत मिली है। उनकी क्रिमिनल याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने उनके विरुद्ध दर्ज प्राथमिकी को रद्द कर दिया है। सांसद निशिकांत दुबे के खिलाफ देवघर जिले के मनोहरपुर थाना में कांड संख्या 281/23 दर्ज की गई थी। प्राथमिकी दर्ज होने के बाद उन्होंने इस मामले को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।<br /> इस याचिका पर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की पीठ में सुनवाई हुई।</p>
<p>सुनवाई के दौरान सांसद निशिकांत दुबे की ओर से वरीय अधिवक्ता अजीत कुमार, पार्थ जालान एवं स्मिता सिन्हा ने पक्ष रखा। उल्लेखनीय है कि निशिकांत दुबे को कथित रूप से गौ तस्कर के साथ मारपीट करने के मामले में आरोपित बनाया गया था। मामले की सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने उनके खिलाफ दर्ज मुकदमे को रद्द कर दिया। उच्च न्यायालय के इस आदेश से सांसद निशिकांत दुबे को बड़ी कानूनी राहत मिली है।</p>]]>
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                                                            <category>समाचार</category>
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                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 15 Dec 2025 17:38:57 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Susmita Rani]]>
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                            </item>
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                <title>  15 नवंबर को मनेगा झारखंड हाईकोर्ट का भव्य सिल्वर जुबिली उत्सव, सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति होंगे शामिल</title>
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                        <![CDATA[झारखंड उच्च न्यायालय का सिल्वर जुबिली समारोह 15 नवंबर को आयोजित होगा। मुख्य कार्यक्रम सुबह 11.30 बजे हाईकोर्ट परिसर में और शाम 7.30 बजे ज्यूडिशियल एकेडमी में होगा। सुप्रीम कोर्ट के होने वाले चीफ जस्टिस सूर्यकांत सहित कई न्यायाधीश शामिल होंगे। परिसर को भव्य रोशनियों से सजाया गया है और सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया गया है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/grand-silver-jubilee-celebration-of-jharkhand-high-court-will-be/article-17024"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-11/resized-image---2025-11-14t123038.073.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>रांची:</strong> झारखंड उच्च न्यायालय का सिल्वर जुबिली समारोह 15 नवंबर को आयोजित किया जाएगा। मुख्य कार्यक्रम उच्च न्यायालय परिसर में सुबह 11.30 बजे से होगा। इसके बाद शाम 7.30 बजे से ज्यूडिशियल एकेडमी में सांस्कृतिक कार्यक्रम सहित सम्मान समारोह भी होगा। इसमें उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) के होने वाले चीफ जस्टिस सूर्यकांत समारोह के मुख्य अतिथि होंगे। इसके अलावा उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीश सहित 10 राज्यों के उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस भी समारोह के गवाह बनेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">न्यायाधीशों की ओर से कार्यक्रम में आने की स्वीकृति मिल गई है। इधर, सिल्वर जुबिली समारोह को लेकर तैयारियां तेजी से चल रही है। उच्च न्यायालय भवन और पूरे परिसर को दुल्हन की तरह सजाया गया है। चारों ओर रंग-बिरंगी लाइटें लोगों को आकर्षित कर रही है। उच्चतम न्यायालय सहित विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस के आने की संभावना 'को देखते हुए सुरक्षा कड़ी की गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">झारखंड हाइकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल सत्य प्रकाश सिन्हा ने शुक्रवार को बताया कि समारोह की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। उल्लेखनीय है कि झारखंड उच्च न्यायालय 165 एकड़ में फैला हुआ है। यह उच्चतम न्यायालय से कैंपस से कई गुना बड़ा है। झारखंड उच्च न्यायालय का भवन 550 करोड़ रुपये की लागत से बना है। झारखंड उच्च न्यायालय के 30 हजार वर्गफीट में लाइब्रेरी है। यहां 500 सीसीटीवी कैमरा लगा है।</p>]]>
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                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/grand-silver-jubilee-celebration-of-jharkhand-high-court-will-be/article-17024</link>
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                <pubDate>Fri, 14 Nov 2025 12:32:17 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Hritik Sinha]]>
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