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                <title>Lord Vishnu - Samridh Jharkhand</title>
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                <title>17 सितंबर को इंदिरा एकादशी और विश्वकर्मा पूजा का शुभ संयोग</title>
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                        <![CDATA[आज कन्या की संक्रान्ति संध्या 05:19 पर एकादशी संक्रांति के साथ पुष्य नक्षत्र होने से कई गुणा अधिक महत्व हो गया है। भगवान विश्वकर्मा की जयंती कन्या संक्रांति के दिन मनाई जाती है, जो आमतौर पर 17 सितंबर को पड़ती है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/religion/auspicious-coincidence-of-indira-ekadashi-and-vishwakarma-puja-on-17/article-16284"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-09/resized-image---2025-09-16t194140.741.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>समृद्ध डेस्क:</strong> आज कन्या की संक्रान्ति संध्या 05:19 पर एकादशी संक्रांति के साथ पुष्य नक्षत्र होने से कई गुणा अधिक महत्व हो गया है। भगवान विश्वकर्मा की जयंती कन्या संक्रांति के दिन मनाई जाती है, जो आमतौर पर 17 सितंबर को पड़ती है। इस लिए हर साल 17 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा की जाती है। कन्या संक्रांति 17 सितंबर को  भगवान भास्कर  कन्या राशि में आते हैं।  इस दिन भगवान विश्वकर्मा को नाना प्रकार के अस्त्र शस्त्र से सुशोभित किया जाएगा और 17 सितंबर को विधवत इनकी पूजा अर्चना किया जायेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इस दिन भगवान विश्वकर्मा  के साथ साथ  लोग अपने ऑफिस, कारखानों, दुकानों की मशीनों, औजारों और साथ ही अपने वाहनों की पूजा करते हैं। भगवान विश्वकर्मा ब्रह्म पुत्र हैं। सभी शिल्पकारों और वास्तुकारों के इष्टदेव हैं। इन्हें स्वयंभू और संसार का रचयिता माना जाता है। उन्होंने पवित्र द्वारका शहर का निर्माण किया जहां कृष्ण ने शासन किया था। उनका उल्लेख दिव्य बढ़ई के रूप में ऋग्वेद में किया गया है। उन्हें स्थापत्य वेद , यांत्रिकी और वास्तुकला विज्ञान का श्रेय दिया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रसिद्ध ज्योतिष आचार्य प्रणव मिश्रा के अनुसार, इस साल विश्वकर्मा पूजा इस दिन कई मंगलकारी योग भी बन रहे हैं। कन्या संक्रांति और विश्वकर्मा पूजा के दिन शिव योग और शिववास योग का संयोग रहेगा। मान्यता है कि इन योगों में पूजा करने से हर मनोकामना पूरी होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। सबसे अच्छी बात यह है कि इस दिन ही एकादशी का व्रत  मनाया जाएगा इसलिए भगवान विष्णु और शिल्पकारी विश्वकर्मा का एक साथ आने का संयोग बहुत ही दुर्लभ होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"><strong>प्रसिद्ध ज्योतिष</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>आचार्य प्रणव मिश्रा</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>आचार्यकुलम, अरगोड़ा, राँची</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>8210075897</strong></p>]]>
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                                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Sep 2025 19:43:04 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Mohit Sinha]]>
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                <title>तुलसी विवाह 2024: जानें कब है सही तारीख और मुहूर्त </title>
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                        <![CDATA[इस दिन तुलसी माता का श्रृंगार कर उनका विवाह भगवान विष्णु के स्वरूप शालिग्राम जी के साथ कराया जाता है. मान्यता है कि तुलसी विवाह कराने से साधक को मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती हैं.]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/religion/tulsi-vivah-2024--know-the-exact-date-and-muhurta/article-12582"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2024-11/whatsapp-image-2024-11-10-at-4.51.22-pm.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>धर्म: </strong>तुलसी के पौधे को मां लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है. इसकी पूजा अर्चना करने से घर में बरकत बनी रहती है. मान्यता है कि तुलसी के पौधे के पास सुबह-शाम दीपक जलाने से परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है. साथ ही धन लाभ के योग भी बनते हैं. हिंदू धर्म में कार्तिक माह को तुलसी माता की पूजा के लिए बेहद शुभ माना जाता है. मान्यता है कि यह माह उनके विवाह का होता है.</p>
<p>पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को तुलसी विवाह का पर्व मनाया जाता है. इस दिन तुलसी माता का श्रृंगार कर उनका विवाह भगवान विष्णु के स्वरूप शालिग्राम जी के साथ कराया जाता है. मान्यता है कि तुलसी विवाह कराने से साधक को मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती हैं.</p>
<h3><strong>शुभ मुहूर्त </strong></h3>
<p>इस साल 12 नवंबर 2024 को तुलसी विवाह का शुभ मुहूर्त शाम 5:29 बजे से है, क्योंकि इस समय सूर्यास्त होगा. उसके बाद से तुलसी विवाह की तैयारी शुरू होगी. अंधेरा होने पर देवी तुलसी का विवाह भगवान शालिग्राम से किया जाएगा. तुलसी विवाह का शुभ समय शाम 5 बजकर 29 मिनट से 7 बजकर 53 मिनट तक है.</p>
<h3><strong>जानें तुलसी को लगाने की सही दिशा </strong></h3>
<p>वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर में तुलसी का पौधा उत्तर पूर्व या फिर उत्तर दिशा में लगाना शुभ होता है. माना जाता है कि इस दिशा में तुलसी का पौधा लगाने से परिवार के सदस्यों के बीच मनमुटाव की समस्या दूर होती है. साथ ही घर में सदैव मां लक्ष्मी का वास होता है. तुलसी का पौधा घर में लगाने से नकारात्मक शक्ति दूर होती है. वास्तु शास्त्र की मानें तो तुलसी का पौधा घर में दक्षिण दिशा में नहीं लगाना चाहिए. इस दिशा में तुलसी का पौधा लगाने से वास्तु दोष का सामना करना पड़ता है और आर्थिक समस्या आती है.<br /> </p>]]>
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                                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>ट्रेंडिंग</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 10 Nov 2024 16:54:20 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Subodh Kumar]]>
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                <title>आज और कल शरद पूर्णिमा, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि एवं खीर का महत्व </title>
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                        <![CDATA[शरद पूर्णिमा पर चांद पृथ्वी के सबसे नजदीक रहता है और अपनी समस्त 16 कलाओं से युक्त होता है. हिंदू पंचांग के अनुसार हर वर्ष शरद पूर्णिमा का पर्व आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि के बाद मनाया जाता है. शरद पूर्णिमा को कोजोगार और रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है.]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/today-and-tomorrow-sharad-purnima-know-the-auspicious-time-and/article-11979"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2024-10/whatsapp-image-2024-10-16-at-15.48.07_976b1993.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>रांची: </strong>आज 16 अक्तूबर को शरद पूर्णिमा है. शरद पूर्णिमा को लेकर पूरे भारत के मंदिरों और अन्य पूजन स्थलों पर भव्य तैयारियां की जा रही है. ऐसा माना जाता है कि शरद पूर्णिमा के अवसर पर चंद्रमा की किरणों से अमृत की वर्षा होती है, जिसे अमृत काल के नाम से जाना जाता है. धर्म ग्रंथों में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व होता है. शरद पूर्णिमा पर चांद पृथ्वी के सबसे नजदीक रहता है और अपनी समस्त 16 कलाओं से युक्त होता है. हिंदू पंचांग के अनुसार हर वर्ष शरद पूर्णिमा का पर्व आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि के बाद मनाया जाता है. शरद पूर्णिमा को कोजोगार और रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है. </p>
<p style="text-align:justify;">सनातन धर्म में पूर्णिमा तिथि भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी को समर्पित है. आश्विन माह की पूर्णिमा तिथि को शरद पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है. इस पर्व को साधक अधिक उत्साह के साथ मनाते हैं. साथ ही शुभ मुहूर्त में गंगा स्नान और दान करते हैं. इसके बाद विधिपूर्वक विष्णु जी की उपासना करते हैं. धार्मिक मत है कि ऐसा करने से जातक को जीवन में शुभ फल मिलता है. साथ ही सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है. इसके अलावा कार्यों में आ रही रुकावट से छुटकारा मिलता है.</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>तिथि और शुभ मुहूर्त </strong></h3>
<p style="text-align:justify;">इस वर्ष तिथियों के घटने और बढ़ने के कारण शरद पूर्णिमा की तिथि दो दिन यानी 16 और 17 अक्तूबर दोनों ही दिन रहेगी. वैदिक पंचांग की गणना के मुताबिक 16 अक्तूबर को आश्विन माह की शरद पूर्णिमा की रात्रि करीब 8 बजे से शुरू हो जाएगी. जो 17 अक्तूबर की संध्या करीब 5 बजे तक रहेगी. हालांकि शरद पूर्णिमा का त्योहार रात को ही मनाया जाता है, इसलिए यह पर्व 16 अक्तूबर को ही मनाया जाएगा. 17 अक्तूबर को शाम 5 बजे के बाद नया हिंदू माह कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा की शुरुआत हो जाएगी. शरद पूर्णिमा पर चांद निकलने का समय करीब 5 बजे का होगा. इस वर्ष शरद पूर्णिमा पर रवि योग का शुभ संयोग होगा. वैदिक ज्योतिष शास्त्र में रवि योग को बहुत ही शुभ योग माना जाता है. यह रवि योग सुबह 06 बजकर 23 मिनट से लेकर शाम 07 बजकर 18 मिनट तक रहेगा. </p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>शरद पूर्णिमा पर खीर का महत्व </strong></h3>
<p style="text-align:justify;">शरद पूर्णिमा का विशेष स्थान होता है. इस दिन खुले आसमान में खीर रखने और फिर इसके बाद अगली सुबह इसके सेवन करने का खास महत्व होता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है. शास्त्रों में चंद्रमा की किरणों को अमृत तुल्य माना गया है ऐसे में शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा की किरणों से अमृत वर्षा होती है, जिसमें औषधीय गुण मौजूद होते हैं. शरद पूर्णिमा की रात्रि पर चन्द्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है और अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण रहता है. ऐसा माना जाता है कि शरद पूर्णिमा पर चांद की किरणों में औषधीय गुण के कारण कई बीमारियों दूर होती है और मन प्रसन्न होता है. </p>
<p style="text-align:justify;">एक दूसरी मान्यता के अनुसार अनुसार माता लक्ष्मी का जन्म शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था इसीलिए देश के कई हिस्सों में शरद पूर्णिमा को लक्ष्मी जी का पूजन किया जाता है. इसके अलावा ऐसी भी मान्यता है कि शरद पूर्णिमा पर देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु संग पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और अपने भक्तों से पूछती हैं कौन जाग रहा है. इस वजह से इसे कोजागर पूर्णिमा भी कहते हैं. ऐसे में शरद पूर्णिमा पर पूजा-पाठ करने से देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं. एक अन्य मान्यता के अनुसार शरद पूर्णिमा पर  भगवान श्रीकृष्ण गोपियों संग वृंदावन में रात को महारास रचाया था.</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>पूजा और स्नान का महत्व</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">शरद पूर्णिमा पर पवित्र नदियों में स्नान, दान-पुण्य और पूजा-पाठ करने की परंपरा होती है. मान्यता है कि जो भी शरद पूर्णिमा पर गंगा स्नान करता है उसके ऊपर भगवान की विशेष कृपा रहती है. ऐसे में शरद पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी के साथ-साथ चन्द्रमा की भी पूजा अर्चना करनी चाहिए. शरद पूर्णिमा पर सुबह सूर्य और रात को चन्द्र देव की पूजा अर्चना करें, इसके साथ ही रात को लक्ष्मी जी की षोडशोपचार विधि से पूजा, श्रीसूक्त का पाठ, कनकधारा स्त्रोत, विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ अवश्य करें. इससे मां लक्ष्मी आपके घर को धन-धान्य से भर देंगी.</p>]]>
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                                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 16 Oct 2024 16:12:36 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Subodh Kumar]]>
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