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अभूतपूर्व बिजली संकट से जूझ रहे झारखंड के लिए जरूरी है नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश बढाना

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रांची : देश का 17 प्रतिशत कोयला उत्पादन करने वाला झारखंड अभूतपूर्व बिजली संकट से जूझ रहा है। इस बिजली संकट ने इस प्रचंड गर्मी और हिट वेव के दौर में आम लोगों के साथ कारोबारी जगत को भी परेशान कर दिया है। बिजली का सीधा संबंध औद्योगिकत उत्पादकता से है और अगर इसकी आपूर्ति प्रभावित होती है तो उत्पादकता कम होगी।

झारखंड चेंबर ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज ने राज्य की बिजली की मौजूदा स्थिति की तुलना 20 साल पहले के हालात से की है, जब नया राज्य अस्तित्व में आया था। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस संकट देश में जारी बिजली से जोड़ा है, जब कोयला के पर्याप्त उत्पादन के बावजूद संकट बना हुआ है।

भारत में अप्रैल से अक्टूबर तक बिजली की मांग अधिक होती है। इसके जुलाई 2021 के 200 गीगावाट से अधिक होने की संभावना हैै। नेशनल पॉवर पोर्टल पर 25 अप्रैल 2022 तक के उपलब्ध डाटा के अनुसार, घरेलू कोयला आधारित संयंत्रों के पास 7.9 दिन का और आयाजित कोयला के अनुरूप निर्मित संयंत्रों 7.7 दिन का कोयला स्टॉक है। भारत अब भी बुरी तरह अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए कोयला पर निर्भर है। देश के कुल ऊर्जा जरूरतों का 53 प्रतिशत कोयला आधारित ताप संयंत्रों से पूरा होता है।

झारखंड जीवाश्म ईंधन पर और अधिक निर्भर है। राज्य में अगर हाइड्रो प्लांट को छोड़ दिया जाए तो नवीनीकृत ऊर्जा उत्पादन की क्षमता मात्र 97 मेगावाट है, जबकि राज्य में स्थापित ऊर्जा संयंत्रों की कुल क्षमता 4557 मेगावाट है और यहां उत्पादित बिजली बड़ी मात्रा में अन्य राज्यों को जाती है, जिसमें दिल्ली, पंजाब, केरल प्रमुख हैं। इससे उलट झारखंड के पड़ोसी राज्यों को देखें तो वे आगे हैं। ओडिशा में 617 मेगावाट, बिहार में 387, पश्चिम बंगाल में 587 मेगावाट नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन क्षमता है। राज्य में नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में सरकारी सेक्टर का योगदान नहीं के बराबर है और जो कुछ मौजूदगी है वह निजी सेक्टर की है।

प्रभात खबर अखबार की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस गर्मी में झारखंड को 2600 मेगावाट बिजली की जरूरत है और वर्तमान में उत्पादित हो रही 4246 मेगावाट बिजली में झारखंड को 1246 मेगावाट बिजली ही मिल रही है।

राज्य को बिजली संकट से राहत देने के लिए सरकार ने झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड को बिजली खरीद के लिए 1690 करोड़ रुपये देने की कैबिनेट में स्वीकृति दी है। हालांकि इस तरह के उपाय को ‘ऊर्जाआपदा प्रबंधन’ की संज्ञा दी जा सकती है। वर्तमान में ऊर्जा का संकट एक आपदा की तरह है, क्योंकि इससे पूरी व्यवस्था चरमरा जाती है।

इस तरह की समस्याओं के स्थायी समाधान के लिए यह आवश्यक है कि राज्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में अपना निवेश बढाए और इसके लिए इस पठारी और विशाल खाली भूभाग वाले राज्य में पर्याप्त संभावना भी है।