Politics News: दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मिले भारत रत्न! पहली पुण्यतिथि पर उठी बड़ी मांग
झारखंड आंदोलन में दिशोम गुरु के योगदान को बताया ऐतिहासिक
झारखंड आंदोलन के प्रणेता एवं पद्म भूषण दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि पर जारी विशेष लेख में उनके संघर्ष, आदिवासी अस्मिता और झारखंड राज्य निर्माण में योगदान को रेखांकित किया गया है। लेखक विजय शंकर नायक ने केंद्र सरकार से शिबू सोरेन को मरणोपरांत भारत रत्न देने की मांग करते हुए कहा कि उनका योगदान राष्ट्रीय सम्मान का पात्र है।
रांची: कुछ लोग सत्ता के माध्यम से इतिहास में अपना स्थान बनाते हैं, जबकि कुछ अपने संघर्षों से इतिहास की दिशा बदल देते हैं। झारखंड आंदोलन के प्रणेता और पद्म भूषण दिशोम गुरु शिबू सोरेन ऐसे ही जननायक रहे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन जल, जंगल, जमीन, आदिवासी अस्मिता और झारखंड की पहचान के लिए समर्पित कर दिया।
4 अगस्त 2026 को उनकी पहली पुण्यतिथि केवल एक राजनीतिक नेता को श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं है, बल्कि उस लंबे जनसंघर्ष को याद करने का दिन है, जिसके परिणामस्वरूप भारत के 28वें राज्य झारखंड का गठन संभव हो सका।
संघर्ष से निकला जननेता

झारखंड आंदोलन की सबसे मजबूत आवाज
दिशोम गुरु ने आदिवासी समाज की आवाज को गांवों और जंगलों से निकालकर संसद तक पहुंचाया। उन्होंने जल, जंगल, जमीन, स्थानीय अधिकार, प्राकृतिक संसाधनों और आदिवासी अस्मिता को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाया।
महाजनी प्रथा, भूमि लूट और बंधुआ शोषण के खिलाफ उनका आंदोलन केवल आर्थिक अधिकारों की लड़ाई नहीं था, बल्कि सम्मान, संस्कृति और पहचान की लड़ाई भी था। इसी कारण उन्हें "दिशोम गुरु" यानी जनता का मार्गदर्शक कहा गया।
अलग राज्य आंदोलन को दी निर्णायक दिशा
झारखंड आंदोलन कई महान नेताओं के योगदान से मजबूत हुआ। बिरसा मुंडा ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह किया, जयपाल सिंह मुंडा ने संविधान सभा में आदिवासियों की आवाज बुलंद की, जबकि विनोद बिहारी महतो, ए.के. राय और निर्मल महतो ने राजनीतिक आंदोलन को नई ऊर्जा दी।
लेकिन इस आंदोलन को गांव-गांव तक पहुंचाकर जनआंदोलन बनाने और उसे राज्य निर्माण तक पहुंचाने में शिबू सोरेन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है।
राजनीति का केंद्र सत्ता नहीं, समाज रहा
शिबू सोरेन कई बार सांसद बने, केंद्र सरकार में मंत्री रहे और झारखंड के मुख्यमंत्री भी बने। राजनीतिक जीवन में उतार-चढ़ाव और विवादों के बावजूद उनकी सबसे बड़ी ताकत जनता का भरोसा बना रहा।
वे लगातार कहते रहे कि झारखंड का विकास तभी सार्थक होगा, जब प्राकृतिक संसाधनों का पहला अधिकार स्थानीय लोगों को मिलेगा। विस्थापन, शिक्षा, रोजगार और स्थानीय नीति उनके राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में रहे।
आदिवासी अस्मिता को दी राष्ट्रीय पहचान
दिशोम गुरु ने आदिवासी समाज को केवल वोट बैंक नहीं माना, बल्कि उसकी भाषा, संस्कृति, परंपरा और पहचान को सम्मान दिलाने का प्रयास किया। उन्होंने यह स्थापित किया कि विकास और आदिवासी अस्मिता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
भारत रत्न की मांग
लेखक का मानना है कि दिशोम गुरु शिबू सोरेन के राष्ट्रीय योगदान को देखते हुए उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न प्रदान किया जाना चाहिए।
लेख में कहा गया है कि यदि डॉ. भीमराव आंबेडकर, सरदार वल्लभभाई पटेल और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं को उनके ऐतिहासिक योगदान के लिए भारत रत्न दिया गया, तो झारखंड आंदोलन को लोकतांत्रिक सफलता तक पहुंचाने वाले शिबू सोरेन के योगदान पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।
लेखक ने झारखंड विधानसभा से सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को अनुशंसा भेजने तथा सभी दलों के सांसदों से इस मांग का समर्थन करने की अपील की है।
संघर्ष की अमर विरासत
लेख के अनुसार, दिशोम गुरु शिबू सोरेन का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगा। झारखंड की पहचान, आदिवासी स्वाभिमान और सामाजिक न्याय की लड़ाई का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, उसमें उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा।
उनकी पहली पुण्यतिथि पर लेखक ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए केंद्र सरकार से उनके राष्ट्रीय योगदान का सम्मान करते हुए मरणोपरांत भारत रत्न देने पर गंभीरता से विचार करने का आग्रह किया है।
Susmita Rani is a journalist and content writer associated with Samridh Jharkhand. She regularly writes and reports on grassroots news from Jharkhand, covering social issues, agriculture, administration, public concerns, and daily horoscopes. Her writing focuses on factual accuracy, clarity, and public interest.
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