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झारखंड: युवाओं के सहयोग से हजारीबाग में बना कपड़ा बैंक, धनंजय कर रहे हैं संचालन

झारखंड: युवाओं के सहयोग से हजारीबाग में बना कपड़ा बैंक, धनंजय कर रहे हैं संचालन

गरीबी और भूख को मिटाना चाहते हैं धनंजय, रोटी बैंक की जल्द करेंगे शुरूआत

एक ऐसा बैंक, जहां शेविंग से सभी को मिलता है लाभ

हजारीबाग: कपड़े ले लो, कपड़े … सस्ते अच्छे कपड़े … रास्ता चलते आपने ये आवाजें तो जरूर सुनी होंगी. लेकिन ये बाजारू भाषा है, जो सिर्फ फेरी वालों के मुंह से या फिर फुटपाती दुकानदारों के मुंह से सुना जा सकता है. यह उनका व्यवसाय है और वो दो वक्त की रोटी के लिए आवाजें लगाते हैं.

हम जिस भारत में रहते हैं वहां प्रच्छन्न गरीबी पलती है. किसी के पेट में दाना नहीं, तो किसी के तन पर कपड़े नहीं. गरीबी की दंश झेल रहे ये लोग अक्सर किसी मसीहा का इंतजार करते देखे जाते हैं कि शायद कोई उनके पास आए और उन्हें कुछ दे जाए. इस धरती पर जो भी मानव आए हैं, उनकी यहां जरूरत है, उनका यहां अस्तित्व है, तभी तो भगवान ने उन्हें यहां भेजा है. लेकिन इस अस्तित्व को बचाने के लिए समाजसेवी के रूप में किसी न किसी को तो आगे आना होगा.

“समाज से लेकर समाज को देना ही समाजसेवा है.” जो समाज के चिंतक हैं, वो समाजसेवी है.

यह है अनूठा बैंक

बैंक में आपका खाता तो जरूर होगा? आपने कई बार बैंक जाकर पैसे जमा भी किए होंगे और उस पैसे की निकासी भी की होगी. जो कि आपका अपना पैसा होगा. लेकिन हम जिस बैंक की बात कर रहे हैं. उस बैंक में ना तो पैसे जमा होते हैं और ना ही उसकी निकासी होती है. लेकिन इसके बावजूद लोगों को इसका बेहतर लाभ मिल रहा है. तो आइए ले चलते हैं अनोखे बैंक की ओर…

हजारीबाग के संत कोलंबस विश्वविद्यालय (St. Columba’s College Hazaribagh) के पीछे वाले रास्ते से गुजर रहा था कि अचानक एक बैंक पर नजर गयी. मेरे कदम वहीं थम से गए और मैं आगे नहीं बढ़ पाया. उस बैंक के ऊपर लगे पोस्टर पर नजर गयी. उसपर लिखा था “अस्तित्व”. ठीक इस शीर्षक के नीचे एक कोटेशन नजर आया “ज्यादा हो तो दे जाएं, जरूरत हो तो ले जाएं.” मन में उत्सुकता जागी, मैंने इस पोस्टर वाले को ढूंढा. फिर पता चला कि यहां अनूठा बैंक चलाया जा रहा है. जो कि पूरी तरह से समाज के लोगों पर निर्भर है. इस बैंक का नाम है “अस्तित्व: कपड़ा बैंक”. मैंने इसके संचालक धनंजय कुमार से मुलाकात की.

झारखंड: युवाओं के सहयोग से हजारीबाग में बना कपड़ा बैंक, धनंजय कर रहे हैं संचालन

कौन हैं धनंजय

धनंजय कुमार हजारीबाग में अपने कर्मों से जाने जाते हैं. वे अपने मधुर स्वभाव से सभी के दिल में बस जाते हैं. ये कोई और नहीं, झारखंड के नामी कलाकारों में से एक हैं. इन्होंने झॉलीवुड से बॉलीवुड तक का सफर तय किया है. थियेटर से जिंदगी की शुरूआत करने वाले धनंजय समाजसेवा की ओर रूख कर चुके हैं. गरीबी की गंभीरता को समझकर, ये गरीबी को मिटाने निकल पड़े हैं.

कैसे रखी गयी अस्तित्व की आधारशिला

धनंजय बताते हैं कि उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ, जहां उन्होंने गरीबी को महसूस किया. लेकिन उन्होंने इससे हार नहीं मानी, बल्कि गरीबी को दूर करने का संकल्प लिया. वे बचपन से ही सामाजिक कार्यों में रूचि रखने लगे. धीरे-धीरे समय बीतता गया और समय के साथ समाजसेवा का स्तर वृहद होता चला गया. बचपन से वे अपना जन्मदिन हजारीबाग के दीपूगढ़ा स्थित वृद्धाश्रम में मनाते आए हैं. वहीं सड़क किनारे और सूदुरवर्ती गांवों से ठंड के कारण लोगों की मौत उनके मन को झकझोरती थी. जिसे लेकर उन्होंने कपड़ा बैंक की आधारशिला रखी और लोगों के अस्तित्व को बचाने के लिए उन्होंने “अस्तित्व” संस्था की नींव डाली.

कैसे बना अस्तित्व का आशियाना

धनंजय बताते हैं कि पहले तो समझ नहीं आ रहा था कि अस्तित्व का आशियाना कैसे बनाया जाए और लोग यहां से कपड़े लेंगे भी या नहीं. इसकी भी चिंता सता रही थी. लेकिन जब अपने दोस्तों से पूछा, तो उन्होंने इस काम में सहयोग किया और फिर मैंने छोटे-सी जगह में अस्तित्व का आशियाना बनाना शुरू किया. दोस्तों और गुरूजनों की मदद से अस्तित्व की नींव रखी गयी.

झारखंड: युवाओं के सहयोग से हजारीबाग में बना कपड़ा बैंक, धनंजय कर रहे हैं संचालन

जुगाड़ तकनीक से बना अस्तित्व का कार्यालय

हम भारतवासी हैं, इसलिए जहां कोई तकनीक काम न करे, वहां जुगाड़ तकनीक लगा देते हैं. इसी जुगाड़ तकनीक से अस्तित्व के कार्यालय का निर्माण हुआ. चारो ओर बांस की टटरी से घेराबंदी करने के बाद छत की चिंता सताने लगी. छत के लिए धनंजय ने लोगों से बड़े- बड़े कार्टून मांगे. जिससे कार्यालय का छत तैयार हुआ. बरसात के दिनों में छत से पानी चूने लगा, तो उसके ऊपर एक प्लास्टिक लगाया. बांस के टेबल पर ही धनंजय ने कपड़े का बैंक चलाना शुरू किया और कार्यालय को बेहतर बनाने के लिए संस्था का पोस्टर लांच किया. जिसे एक्सटिरियर डेकोरेशन में उपयोग में लाया गया.

कैसे काम करता है अस्तित्व

वर्षों पहले “नेकी की दीवार” हमें यहां-वहां नजर आते थे. जिस कपड़े का उपयोग लोग नहीं करते थे, उन्हें उस नेकी की दीवार पर टांग जाते थे. ताकि कोई जरूरतमंद उसका उपयोग कर ले. लेकिन समाजसेवा की यह परंपरा समय के साथ दम तोड़ने लगी. जरूरतें तो वहीं रही, लेकिन जरूरतमंद ऐसी जगहों से कपड़े लेने से हिचकिचाने लगे. वहीं कुछ लोग उस नेकी की दीवार पर ऐसे कपड़े टांग जाते कि खुद मानवता को भी शर्म आ जाए. लेकिन अस्तित्व ने इसी पहल को नया आयाम दिया. लोगों से साफ और अच्छे कपड़े देने को कहा और जिस कपड़े का वो खुद उपयोग करने का नहीं सोचते, वो किसी अन्य को देने से मना किया.

“अस्तित्व” के फाउंडर धनंजय का कहना है कि लोग साफ- सुथरा रहना ज्यादा पसंद करते हैं, चाहे वो शहर के हों या गांव के. इसलिए हमें सभी को एक नजर से देखना चाहिए और जिन चीजों का उपयोग हम स्वयं न कर पाएं, वैसी चीजें किसी को दान में भी नहीं देना चाहिए. उनका कहना है कि  कपड़े पुराने हों, तो कोई बात नहीं. लेकिन उसकी सफाई और सिलाई व्यवस्थित हो, ताकि जो व्यक्ति उसका उपयोग करेगा, वो खुद को असहज महसूस न करे.

अस्तित्व के पहल को मिला आयाम

धनंजय के अस्तित्व के पहल की सराहना करते हुए लोग उनसे जुड़ने लगे. ठंड के दिनों में “अस्तित्व” से जुड़कर लोगों ने सुदूरवर्ती गांव जाकर लोगों के बीच गर्म कपड़ों का वितरण किया. जिससे ग्रामीणों के चेहरे पर मुस्कान नजर आयी.

आगे कि क्या है योजना

अस्तित्व के निदेशक धनंजय कुमार बताते हैं कि मनुष्य की तीन प्राथमिक आवश्यकताएं होती हैं. जिसमें से रोटी,कपड़ा और मकान महत्वपूर्ण है. कपड़ा बैंक की नींव तो उन्होंने डाल दी है, लेकिन अब वो गरीबों को भोजन कराना चाहते हैं. उनके गुरू के सहयोग से कई साल पहले हजारीबाग में रोटी बैंक की शुरूआत की गयी थी. जिसे वो नए रूप में लोगों के बीच में लेकर आना चाहते हैं. ताकि फिर से कोई भूखल घासी भूख के कारण दम न तोड़ दे.

झारखंड: युवाओं के सहयोग से हजारीबाग में बना कपड़ा बैंक, धनंजय कर रहे हैं संचालन

किसने दिया साथ

धनंजय एक कलाकार हैं और समाज में उनकी अच्छी पहचान है. उन्होंने इसका श्रेय अपने माता-पिता और बड़े भाई गौतम को दिया है. साथ ही अपने गुरू तापस चक्रवर्ती, खालीद चाचा, सहयोगी मुकेश राम प्रजापति, रितेश खंडेलवाल, सुदेश कुमार सहित कई लोगों को अस्तित्व की आधारशिला में शामिल होने का श्रेय दिया है.

जहां चाह, वहां राह

हम बचपन से यही सुनते आ रहे हैं कि कोई धनवान व्यक्ति ही समाजसेवी बन सकता है, लेकिन आखिरकार धनंजय ने इसे झूठला दिया और उन्होंने समाज को प्रेरणा दी कि “बांटने से बढ़ता है”. उनका कहना है कि इंसान के अंदर बस किसी के सहयोग की चाहत होनी चाहिए, रास्ते खुद-ब-खुद बन जाते हैं. पौराणिक भारत में जब मुद्रा का विकास नहीं हुआ था, उस समय भारतीय समाज समन्वय, शेयरिंग और समर्पण से चल रहा था. लेकिन आज के आधुनिक युग में हम इन बातों को नजरअंदाज करते जा रहे हैं. जिसके कारण मानवता खत्म होती जा रही है. हमें समाज को दिशा देने के लिए सामाजिक स्तर पर बेहतर कार्य करने की जरूरत है.