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ग्राउंड रिपोर्ट : प्रस्तावित पीरपैंती-बाराहाट कोयला परियोजना को लेकर ग्रामीणों के मन में हैं कैसे सवाल?

ऐसे गांव की कहानियां अक्सर छपती हैं जो कोयला खनन से प्रभावित हैं। पर, ऐसे गांव जो भविष्य में कोयला खनन से प्रभावित हो सकते हैं, वहां के लोगों की भविष्य को लेकर क्या कल्पना और सोच है, उसे जानना भी दिलचस्प है। यह जानना तब और जरूरी हो जाता है जब धरती के बढते तापमान को नियंत्रित करने के लिए “अब और नया कोयला खदान नहीं” का संकल्प व्यक्त किया जाता है। पढें झारखंड के गोड्डा जिले से यह रिपोर्ट…

सिंघाड़ी और बोरमा गांव के बीच के उर्वर खेतों को गर्मी की फसल के लिए तैयार करते किसान।

राहुल सिंह

70 साल के महेंद्र रविदास अपने गांव की आखिरी पंक्ति (समाज की तरह ही) के व्यक्ति हैं। वे जूता सिलाई कर अपना खर्च चलाते हैं और उन्हें यह पता नहीं जिस सिंघारी गांव में उन्होंने जीवन के इतने साल निकाल दिए उसके आसपास का क्षेत्र भविष्य में कोयला खनन के दायरे में आ सकता है।  इस बारे में सवाल पूछने पर वे कहते हैं – “बाबू हमें पता नहीं, हम जूता सिल कर घर चलाते हैं और यह देखिए मेरा घर कैसा है। इससे पहले वे इस संवाददाता को साथ लेकर तंग गलियों से अपने घर तक पहुंचते हैं”।

 

हालांकि बिहार से सटे झारखंड के गोड्डा जिले के इस गांव में ज्यादातर लोगों को यह पता है कि उनका गांव कोयला खनन के लिए चिह्नित है, चाहे वे पुरुष हों या महिलाएं। गांव के लोग यह भी बताते हैं कि कुछ साल पहले कोयला खनन के लिए गांव के बाहरी इलाकों में सर्वे किया गया और यहां कोयला खनन हो पाएगा या नहीं, होने से लाभ होगा या नुकसान इस पर गांव के लोगों की मिश्रित प्रतिक्रिया है। बातचीत में कुछ लोगों ने इस पर उत्साह दिखाया तो ज्यादातर सशंकित नजर आए और इसे ठीक नहीं बताया और कहा कि इससे हम सब उजड़ जाएंगे।

महेंद्र रविदास।

 

 

गोड्डा जिले के मेहरमा प्रखंड क्षेत्र में पड़ने वाला सिंघाड़ी एक बड़ा गांव है और यह पंचायत भी है। इसके बगल में बोरमा गांव है और इन दोनों गांवों को लोग सिंघाड़ी बोरमा भी कहते हैं। लोगों ने बताया कि दोनों की आबादी करीब 5000 है और यहां हिंदू-मुसलिम मिश्रित आबादी है और कई जातियों के लोग रहते हैं। जाति की बात करें तो दोनों गांव में कुर्मी, धानुक, मुसहर, रविदास, कुम्हार, ब्राह्मण सहित कई दूसरी जातियां यहां हैं। यह गांव भागलपुर और साहिबगंज जिले से बहती गंगा नदी से बामुश्किल 15 किमी के आसपास की दूरी पर है और मैदानी व उर्वर भूमि वाला है। इस वजह से यहां काफी हरियाली नजर आती है। सरकार के प्रस्तावित 99 नए कोल ब्लॉक में एक पीरपैंती बाराहाट की अगर नीलामी होती है तो उससे यह प्रभावित होगा। इसके आसपास वाजितपुर, प्यालापुर, महेशपुर आदि गांव हैं, जो भविष्य में प्रभावित हो सकते हैं। प्रस्तावित पीरपैंती-बाराहाट कोल माइनिंग एरिया 10 वर्ग किलोमीटर का होगा।

सिंघाड़ी गांव के मासूम बच्चे।

 

कोयला मंत्रालय के कोल ब्लॉक के प्रस्तावित आवंटन या आवंटित कर दिए गए खदानों के एक दस्तावेज के अनुसार, पीरपैंती बाराहाट में ओपन कास्ट माइनिंग होगी। यहां 562.82 मीट्रिक टन कोयला का भंडार होने का अनुमान है, जिसका थिकनेस 50 व ग्रेड एफ है। यह सूची सरकारी कपंनियों या अनुमति प्राप्त उपयोगकर्ता के लिए चिह्नित कोयला खदानों की है। हालांकि एक अन्य रिपोर्ट में पीरपैंती-बाराहाट में 798.563 मीट्रिक टन कोयला का भंडार होने का अनुमान पेश किया गया है।

पीरपैंती-बाराहाट क्षेत्र इसीएल के कमांड एरिया में आता है और उसके राजमहल कोल परियोजना के करीब है, जो प्रमुख रूप से गोड्डा जिले में स्थित है। राजमहल इसीएल की एक बड़ी कोल परियोजना है।

 

उम्मीदों पर आाशंकाएं हैं हावी

बाराहाट बाजार में इलेक्ट्रिक की दुकान चलाने वाले बोरमा के 38 वर्षीय अनिल कुमार कहते हैं, “कोयला खनन अगर होगा तो इससे फायदा और नुकसान दोनों होगा, मुआवजे में वे पैसा दे देंगे लेकिन रोजगार नहीं दे सकते, विस्थापितों को अपना घर छोड़ किराये के घर में रहने में कितनी तकलीफ होती है”?

अनिल कुमार।

 

हालांकि बोरमा गांव के कई लोग इस प्रस्तावित माइनिंग प्रोजेक्ट को लेकर आशान्वित भी हैं। बोरमा के रहने वाले व कांग्रेस की मेहरमा प्रखंड इकाई के अध्यक्ष नरेंद्र शेखर आजाद कहते हैं, “हम चाहते हैं कि कोयला माइनिंग यहां हो, करीब चार साल पहले सर्वे टीम यहां आयी थी और मेरे घर का भी जायजा लेकर गयी, लेकिन उसके बाद कुछ हुआ नहीं”। बातचीत के दौरान वे कहते हैं, “खनन होगा तो नौकरी, मुआवजा मिलेगा, वे हमारी जमीन लेंगे तो दूसरी देंगे”। इस सवाल पर कि कई अन्य कोयला खनन क्षेत्र में जरूरी अर्हता पूरी करने वाले बड़ी संख्या में ऐसे लोग है जो रोजगार से वंचित हैं तो आप कैसे आशान्वित हैं, वे कहते हैं – जब माइनिंग की प्रक्रिया शुरू होगी तो हम सब इस पर बैठ कर बात करेंगे।

नरेंद्र शेखर आजाद।

 

सिंघाड़ी हो या बोरमा, ज्यादातर लोगों से बातचीत में यह अहसास हुआ कि वे यह मानते हैं कि सरकार अगर उनके गांव में माइनिंग करेगी तो वह होकर रहेगा और वे इसमें कुछ कर नहीं सकते। सिंघाड़ी के 60 वर्षीय संतलाल रविदास ने कहा, “सरकार का अगर कोयला निकालने का मन है तो हमलोगों के चाहने से क्या होगा, घर का नुकसान होगा, मुआवजा मिलेगा लेकिन उससे हमारा काम नहीं चलेगा”।

 

इसी गांव के साकिम अंसारी कहते हैं, “गांव से 200 गज की दूरी पर उनके यहां सर्वे हुआ था, अगर माइनिंग होगा तो भी ठीक है, नहीं होगा तो भी ठीक है”। वे एक सीधे-सरल ग्रामीण हैं और नफा-नुकसान के सवाल पर भ्रमित नजर आते हैं।

कई लोगों ने इस परियोजना को मुश्किल भरा भी बताया। बोरमा के कुमुद तांती कहते हैं, “यहां कोयला जमीन के बहुत नीचे हैं और सरकार उसे निकाल सकेगी इसमें संदेह है”। ऐसी बात कुछ और लोगों ने इस संवाददाता से कही। ऐसी संभावनाएं व्यक्त करने की वजह भी है।

कुमुद तांती।

 

यह क्षेत्र बिहार के बांका व भागलपुर जिलों से सटता है। कुछ साल पहले बिहार में इससे सटे क्षेत्र में पहला कोयला खदान को लेकर खूब मीडिया रिपोर्टें आयीं। लेकिन, बाद में उस परियोजना को काफी महंगा बताया गया जिसको शुरू करना मुश्किल था। खराब कोयला गुणवत्ता की वजह से बीसीसीएल के लिए एक सफेद हाथी का सौदा था, जिससे यह मामला ठंडे बस्से में चला गया। वहीं, प्रस्तावित पीरपैंती-बाराहाट कोयला परियोजन की वजहें से विकास कार्याें की रफ्तार प्रभावित हुई, जिसमें गोड्डा-पीरपैंती-जसीडीह रेल परियोजना भी है।

सिंघाड़ी गांव स्थित स्कूल।

 

बहरहाल, आशंकाओं के बावजूद लोग इस द्वंद्व में हैं कि कोयला खनन परियोजना हो या नहीं हो। लेकिन, यह तय है कि कोयला परियोजना होने से गंगा के इस मैदानी हिस्से में ऐसी हरियाली नहीं रहेगी और प्रदूषण-विस्थापन और नौकरियों के लिए दशकों लंबी प्रतीक्षा सूची में शामिल हो जाना लोगों की नियति बन जाएगी।