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अदानी का गोड्डा पॉवर प्रोजेक्ट और सतत विकास के पैरोकार एक गांधीवादी शिक्षक के संघर्ष की कहानी

72 साल के सेवानिवृत्त शिक्षक चिंतामणि साह जैविक खेती करते हैं, आश्रम चलाते हैं और गांधीवादी तरीके से जीवन यापन करने पर यकीन करते हैं। उनकी आवश्यकताएं न्यूनतम हैं और प्रकृति, पर्यावरण संरक्षण पर उनका जोर अधिक। चिंतामणि झारखंड के गोड्डा शहर से करीब आठ-दस किमी की दूरी पर स्थित मोतिया गांव में अपनी उस पुस्तैनी जमीन पर कृषि, सोलर इनर्जी एवं सतत विकास को लेकर इस उम्र में भी अनूठे प्रयोग कर रहे है, जिसके ठीक सामने अदानी पॉवर का 1600 मेगावाटर का विशाल अल्ट्रा थर्मल पॉवर प्लांट बन रहा है। यह थर्मल पॉवर प्लांट उर्जा क्षेत्र के अध्याताओं के लिए वर्तमान में प्रमुख विषयों में एक है।

मोतिया गांव स्थित अदानी पॉवर प्लांट का परिसर। फोटो : राहुल सिंह।

राहुल सिंह

72 साल के सेवानिवृत्त शिक्षक चिंतामणि साह जैविक खेती करते हैं, आश्रम चलाते हैं और गांधीवादी तरीके से जीवन यापन करने पर यकीन करते हैं। उनकी आवश्यकताएं न्यूनतम हैं और प्रकृति, पर्यावरण संरक्षण पर उनका जोर अधिक। चिंतामणि झारखंड के गोड्डा शहर से करीब आठ-दस किमी की दूरी पर स्थित मोतिया गांव में अपनी उस पुस्तैनी जमीन पर कृषि, सोलर इनर्जी एवं सतत विकास को लेकर इस उम्र में भी अनूठे प्रयोग कर रहे है, जिसके ठीक सामने अदानी पॉवर का 1600 मेगावाटर का विशाल अल्ट्रा थर्मल पॉवर प्लांट बन रहा है। यह थर्मल पॉवर प्लांट उर्जा क्षेत्र के अध्याताओं के लिए वर्तमान में प्रमुख विषयों में एक है।

 

चिंतामणि साह चार भाइयों में तीसरे नंबर पर हैं और उनके दावे के अनुसार, उनके परिवार की पांच एकड़ जमीन पॉवर प्लांट के लिए अधिग्रहित की गयी, जिसमें वे एकमात्र शख्स हैं जिसने सैद्धांतिक आधार पर अपना मुआवजा नहीं लिया। साह कहते हैं, विज्ञान शिक्षक हूं, किसान घर से हूं, किसानी से यह शरीर बना है, किसानी का मर्म मैं जानता हूं।

वे आगे कहते हैं यह क्षेत्र वाटर क्राइसिस जोन है, उस पर यहां एसपीटी एक्ट लागू है, इसलिए वैधानिक रूप से यहां की जमीन ऐसे कार्याें के लिए ट्रांसफर नहीं की जा सकती है। वे नियम-कानून पर चर्चा करते हुए कहते हैं कि भू अर्जन कानून 2013 के सेक्शन 10 में स्पष्ट उल्लेख है कि खेतिहर जमीन का किसी परियोजना के लिए उपयोग नहीं हो सकता है।

अडानी के पॉवर प्लांट के खिलाफ लंबा आंदोलन चलाने वाले चिंतामणि साह। Photo – Rahul Singh.

 

अदानी पॉवर का गोड्डा प्रोजेक्ट

ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर के अनुसार, अदानी पॉवर ने फरवरी 2016 में अदानी पॉवर ने गोड्डा जिले में 2 गुणा 800 मेगावाट कोयला से चलने वाले दो बिजली स्टेशन के निर्माण के लिए टर्म ऑफ रिफरेंस के लिए आवेदन किया। 11 अगस्त 2016 को अदानी पॉवर ने बांग्लादेश पॉवर डेवलपमेंट बोर्ड के साथ भारत में बिल्ड-ओन-ऑपरेट के आधार पर 800 मेगावाट क्षमता के दो थर्मल पॉवर प्लांट की स्थापना के लिए एमओयू पर हस्ताक्षर किया। इसके लिए जुलाई 2016 में टर्म ऑफ रिफरेंस को स्वीकृति दी गयी थी और इनवायरमेंट इंपेक्ट एसेसमेंट अप्रैल 2017 में प्रस्तुत किया गया। इसके बाद 31 अगस्त 2017 को इसे पर्यावरणीय मंजूरी मिल गयी। यह पॉवर स्टेशन अल्ट्रा सुपरक्रिटिकल होगा।

इस पॉवर प्लांट के लिए जमीन पर कब्जे की प्रक्रिया शुरू होने के बाद 2018 में यह देश-विदेश की मीडिया में चर्चा में आया और कई प्रमुख समाचार माध्यमों ने इसे प्रमुखता से कवर किया था।

गोड्डा के मोतिया गांव में निर्माणाधीन अडानी पॉवर प्लांट।

 

रिपोर्ट के अनुसार, 2019 में केंद्र सरकार ने विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसइजेड) का लाभ प्राप्त करने के लिए भारत में पहली स्टैंडअलोन बिजली परियोजना बनाने के लिए इस संयंत्र का रास्ता साफ कर दिया, जिससे शुल्क माफी, छूट और तेजी से मंजूरी तक इस परियोजना की पहुंच आसान हो गयी। संशोधित दिशा-निर्देश में कहा गया है कि एसइजेड मेें उत्पादित बिजली का निर्यात किया जाना चाहिए। झारखंड के लिए इसका मायने यह है कि राज्य स्थानीय बिजली में अपना हिस्सा खो सकता है। अदानी परियोजना के लिए एसईजेड स्थिति को सक्षम करने के लिए सरकार को 2016 के दिशानिर्देशों में संशोधन करना पड़ा जो एक एसइजेड के अंदर एक स्टैंडअलोन बिजली परियोजना की स्थापना को प्रतिबंधित करता है। यहां यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण होगा कि झारखंड देश का करीब 17 प्रतिशत कोयला उत्पादित करता है, लेकिन बिजली उत्पादन में इस प्रदेश का हिस्सा दो प्रतिशत से भी कम है और हाल के महीनों में बिजली उपलब्धता के घंटे काफी प्रभावित हुए हैं।

प्रस्तावित वाटरपाइप लाइन का डीपीआर

अदानी के गोड्डा पॉवर प्लांट के लिए पड़ोस के साहिबगंज जिले से पानी की आपूर्ति की जाएगी। इसके लिए वाटरपाइप लाइन का उपयोग होगा। साहिबगंज एवं गोड्डा जिले में 92.5 किमी का वाटर पाइप लाइन रूट स्थापित किया जाएगां। डीपीआर के अनुसार, अदानी पॉवर की ओर से तीन रूट का प्रस्ताव दिया गया था, जिसमें स्वीकृत रूट को इस आधार पर मंजूरी दी गयी कि इससे फॉरेस्ट डायवर्सन न्यूनतम होगा। यह पाइप लाइन साहिबगंज के चार ब्लॉक व गोड्डा के छह ब्लॉक व 97 गांव से गुजरेगी। इसके लिए 172.9577 हेक्टेयर प्राइवेट लैंड और 7.3133 हेक्टेयर फॉरेस्ट लैंड की जरूरत डीपीआर में चिह्नित की गयी है।

बात फिर मोतिया के गांव के लोगों की

मोतिया गांव में प्रवेश करने पर हमारी मुलाकात मनोज यादव से होती है, वे कहते हैं कि इससे हमें कोई लाभ नहीं है, न तो कोई विकास कार्य कराया गया है और न ही रोजगार की उम्मीद है। वहीं, ग्रामीण सत्यनारायण यादव कहते हैं, हमारे पर किसी शख्स का सूद पर जमीन बंधक थी, लेकिन वह जमीन कंपनी के कब्जे में चली गयी और हमारा पैसा भी डूब गया।

गांधीवादी चिंतामणि साह पॉवर प्लांट पर लंबी चर्चा करते हुए कहते हैं, उर्जा आधारित विकास की बात विरोधाभाषी है। वे कहते हैं कि साल 2015 के आखिरी महीनों में उन्हें स्थानीय गतिविधियों से यह अहसास हुआ कि यहां कोई परियोजना लगने वाली है और फिर 2016 में तो वह मंजूर ही हो गयी। साह कहते हैं कि यह पूरा खेतिहार इलाका इससे बर्बाद हो जाएगा और हमने इसके खिलाफ आसपास के प्रभावित गांव के लोगों को जागरूक किया, गांव-गांव में 12-12 घंटे का उपवास रखा गया।

इस परियोजना के डीपीआर का अच्छे से अध्ययन का दावा करते हुए हुए चिंतामणि साह कहते हैं, परियोजना के लिए 12 मौजे की 2280 एकड़ जमीन अधिग्रहित की जानी थी, लेकिन हमारे आंदोलन का परिणाम यह हुआ कि यह चार मौजे की 917 एकड़ जमीन में सीमित रह गयी। स्थानीय स्तर पर बनायी गयी भूमि बचाओ संघर्ष समिति के संयोजक चिंतामणि साह परियोजना से करीब 100 परिवार प्रभावित हुए हैं, जिसमें आदिवासी सहित विभिन्न वर्गाें के लोग है।

मोतिया के ग्रामीण मनोज यादव व सत्यनारायण यादव।

 

साह कहते हैं कि यह निजी प्रोजेक्ट है न कि लोक प्रयोजनकारी, इससे स्थानीय स्तर पर लोगों को रोजगार का भी लाभ नही ंके बराबर होगा और इससे होने वाले प्रदूषण का प्रभाव 15 किलोमीटर रेडियस में पड़ेगा। उनका दावा है कि यहां 18 से 20 हजार टन कोयला हर दिन चलेगा और एक तिहाई राख निकलेगा। लंबी बातचीत के दौरान वे आंदोलन में साथी रहे अपने दिवंगत साथी रामजीवन पासवान को याद करते हैं और कहते हैं कि पहले झारखंड-बिहार की सीमा पर स्थित चीर नदी से परियोजना के लिए पानी लेने की सुगबुगाहट थी, जिसकी भनक लगने के बाद हमने ग्रामीणों को इसके लिए जागरूक किया और लोग उठ खड़े हुए, क्योंकि वे उससे सिंचाई करते हैं।

साह इस मामले को कोर्ट में लेकर गए और उन्हें यह अहसास है कि यह पॉवर प्लांट निकट भविष्य में शुरू हो जाएगा, जिसमें संसाधन उनका व उनके जैसे दूसरे लोगों का लगा होगा लेकिन बिजली पड़ोसी देश को जाएगी। यह भी उनके विरोध का एक आधार है। बहरहाल, उम्र की इस ढलान पर वे सतत विकास व कृषि के अपने गांधीवादी मार्ग पर डंटे हैं और अपने परिसर में अपने जीते जी अपनी कब्र खोद चुके हैं, जहां उन्हें दफनाना है, ताकि प्रदूषण न हो।