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दुमका के चापुड़िया गांव में आदिवासी परिवारों को पीने के लिए गड्ढे से निकालना पड़ता है पानी

हर घर को स्वच्छ पेयजल पहुंचाने के सरकारों के वादे पर दुमका जिले के चापुड़िया गांव की यह तसवीर बड़ा सवाल है।

दुमका : दुमका जिले के मसलिया प्रखंड के कठलिया पंचायत के अंतर्गत पहाड़ के नीचे और नदी के बगल बसा 25 आदिवासी परिवारों का एक गांव चापुड़िया स्थित है। यह गांव मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। आजादी के इतने वर्षो बाद भी यह गांव सड़क से अभी तक नहीं जुड़ पाया है। हालांकि एक महीने से गांव को सड़क से जोड़ने का काम प्रगति पर है।

इस गांव में पीने के पानी का घोर समस्या है। इस गांव में मात्र दो चापानल हैं, जिसे करीब 10 वर्ष पूर्व वन विभाग ने लगवाया था। यहां कहीं भी सोलर टंकी नहीं लगा हुई है। कोलम टुडू के घर के सामने का चापानल करीब 7 वर्षो से ख़राब है और राजा हेम्ब्रोम के घर के सामने का चापानल भी कई महीनों से ठीक से काम नहीं कर रहा है।

बहुत देर चापानल चलाने से चार-पांच बाल्टी ही पानी निकलता है, फिर एक-दो घंटा बाद पानी निकलता है। ग्रामीणों का कहना है कि पीने का पानी के लिए हम लोगों को रोजाना संघर्ष करना पड़ता है। अन्य प्राकृतिक स्रोतों से प्रदूषित पानी का व्यवस्था पीने के लिए करनी होती है। रोज एक किलोमीटर के करीब इस चिलचिलाती गर्मी में पहाड़ से सटा एक तालाब पर स्थित झरना से पानी लाने के लिए लोगों को मजबूर होना होता है। झरना से भी पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता है। बर्तनों में एक छोटी-सी कटोरी के माध्यम से धीरे-धीरे कर पानी भरा जाता है। जहाँ यह झरना स्थित है, वहां जाने-आना में भी खतरा बना रहता है। पगडंडी संकीर्ण होने के कारण नीचे गिरने का डर भी हर हमेशा बना रहता है। दूसरा पानी का स्रोत गांव से करीब एक किलोमीटर दूर नदी किनारे स्थित डोभा है, जिसे ईटा-पत्थर से बांध कर कुआं का रूप दिया गया है। ग्रामीण वहां से पीने का पानी का व्यवस्था करते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि दोनों स्रोतों का पानी प्रदूषित है, लेकिन मजबूरन इस पानी का व्यवहार करना पड़ता है। शादी या किसी अन्य कार्यक्रम के समय पीने के पानी की और अधिक दिक्कत हो जाती है। उस समय नदी का पानी व्यवहार करते हैं।

ग्रामीणों का यह भी कहना है कि जब मेहमान घर आते हैं और घर वाले पानी लाने के लिए झरना में जाते हैं, तो मेहमानों को यह लगता है कि घर वाले मेहमान देखकर दूर चले गये हैं। ग्रामीणों का कहना है कि गांव में पानी समस्या के समाधान के लिए वर्षो से गुहार लगाते आए हैं, लेकिन कोई स्थायी समाधान नहीं हो पाया है। इसके लिए विधायक, सांसद, पंचायत प्रतिनिधि और प्रखंड विकास पदाधिकारी को भी लिखित आवेदन दिया गया है, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हो रहा है। ग्रामीणों का यहाँ तक कहना है कि कई नेता मंत्री बन गये, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ। ग्रामीण कह रहे हैं कि पूर्व से अब तक सभी विधायकें को लिखित आवेदन दिया, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ है। इस इलाके के पूर्व विधायक स्टीफन मरांडी, हेमंत सोरेन, लुईस मरांडी, वर्तमान विधायक बसंत सोरेन और सांसद सुनील सोरेन से भी गुहार लगाया, लेकिन समाधान नहीं हुआ।

ग्रामीणों का यह भी कहना है कि अबुवा दिसोम रे अबुवा राज होने के बाद भी समस्या का समाधान नहीं हो रहा है। ग्रामीण बहुत नाराज हैं, वे कहते हैं कि पंचायत चुनाव से लेकर विधानसभा और लोकसभा के चुनाव में वोट देते आए हैं, लेकिन क्या फायदा अगर पीने के पानी की समस्या का समाधान ना हो। ग्रामीणों ने प्रशासन, उपायुक्त और जन प्रतिनिधियों से मांग की है कि गांव में दो नया चापानल दिया जाए। इस मौके में कालेशोल हांसदा, प्रशन कुमार हांसदा, हीरामणी हेम्ब्रम, चुड़की मुर्मू, ताला कुड़ी किस्कु, जियसी मुर्मू, जोबामुनि टुडू, पकलु मुर्मू, पेरमिरा किस्कु, लबनी बास्की, मकलु मरांडी, अनिता मुर्मू, बेलमुनि हेम्ब्रम, डुमनी टुडू, बसंती सोरेन, सबरी सोरेन, पर्वती टुडू आदि ग्रामीण उपस्थित थे।