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ग्राउंड रिपोर्ट : निरसा खदान हादसे के बाद मौत की वजहों को कबूल कर पाना भी परिजनों के लिए मुश्किल

धनबाद जिले के निरसा में इस महीने की पहली तारीख को एक साथ तीन कोयला खदानों में हुए हादसे में मृतकों की संख्या काफी अधिक हो जाने से यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया। हालांकि अत्यधिक माइनिंग वाले प्रदेश झारखंड में ऐसे हादसे अक्सर होते रहते हैं। निरसा में इन हादसों की वजह को टटोलती पढिए यह विशेष ग्राउंड रिपोर्ट…

धनबाद जिले के निरसा में स्थित गोपीनाथपुर कोयला खदान, इसी जगह पर एक फरवरी 2022 को हुए हादसे में कई लोगों की मौत हो गयी थी। फोटो : राहुल सिंह।

राहुल सिंह

हाल ही में अपनी पत्नी व बेटी खो चुके उस शख्स के लिए यह स्वीकार करना मुश्किल है कि उसकी पत्नी कुंती देवी और बेटी पायल की मौत आजीविका कमाने के लिए एक बेहद असुरक्षित कोयला खदान से कोयला निकालने के दौरान हुए हादसे में हुई। धनबाद के निरसा के रहने वाले कुंती के पति और पायल के पिता मनोज शर्मा बढई मिस्त्री का काम करते हैं और गोपीनाथपुर कोयला खदान से सटी तंग बस्ती में रहते हैं जो देश के सबसे व्यस्त राजमार्गाें में एक जीटी रोड के किनारे बसा है। मनोज बातचीत के दौरान कहते हैं, उनकी पत्नी और बेटी घर के उपयोग के लिए कोयला निकालने गयी थीं। कोयला को बेचने के लिए निकालने वाले जब कोयला निकाल लेते थे और जो कुछ बचता उसे मां-बेटी चुनती थीं और घर में जलावन के लिए उपयोग करती थीं। मनोज के परिवार में अब उनके अलावा उनका एक छह साल का बेटा बचा है।

मृतका कुंती के पति व पायल के पिता मनोज शर्मा।

 

धनबाद जिले के निरसा के गोपीनाथपुर ओसीपी में एक फरवरी 2022 को तड़के चार बजे के करीब हुए हादसे में कुंती और उनकी बेटी 15 साल की पायल की मौत हुई थी। सवाल यह है कि करीब 250-300 फीट गहरी असुरक्षित खाई नुमा खदान में कोई व्यक्ति सिर्फ घर के जलावन के लिए कोयला हासिल करने के लिए प्रवेश करेगा? निचले स्तर पर काम करने वाले कोयला मजदूरों व उनके परिजनों के लिए दोहरा संकट होता है। उन्हें यह भय होता कि अगर वे ऐसे काम को आजीविका के लिए करने की बात कहेंगे तो पुलिस व कानूनी मामलों में फंस जाएंगे और हो सकता है कि वे जिस तंत्र के हिस्से के रूप में काम कर रहे हैं उधर से भी प्रताड़ना मिले।

स्थानीय अखबार प्रभात खबर ने इस दुर्घटना के बाद रिपोर्ट किया था कि कुंती देवी को अपनी बेटी पायल की शादी की चिंता थी, लॉकडाउन के बाद परिस्थितियों में पति मनोज की बढईगीरी का काम बहुत अच्छा नहीं चल रहा था और ऐसे में कुंती कोयला के जरिए पायल की शादी के लिए पैसे जोड़ना चाहती थीं।

एक फरवरी की सुबह निरसा की तीन खदानों में हादसा हुआ था, जिसमें इसीएल का गोपीनाथपुर ओसीपी, कापासारा खदान और बीसीसीएल की दहीबाड़ी आउटसोर्सिंग पैच शामिल है। इन तीनों हादसों के बाद छह लोगों की मौत की बात आधिकारिक रूप से कही गयी, हालांकि प्रभात खबर अखबार ने 14 मृतकों का नाम छापा और उनकी पहचान भी बतायी। पश्चिम बंगाल की सीमा पर इस इलाके के स्थित होने के कारण वहां के श्रमिक भी कोयला निकालने आते हैं। ऐसे में कम से कम दो मृतकों का शव पश्चिम बंगाल ले जाने का भी उल्लेख रिपोर्ट में किया गया।

इस पूरे मामले को जानने-समझने वाले कुछ उच्च पदस्थ सूत्रों ने हादसे में मृतकों की संख्या 20 के पार तक होने की संभावना जतायी है। हादसों में मृतकों की संख्या, दर्ज एफआइआर आदि के बारे में जानकारी के लिए निरसा थाना प्रभारी के उपलब्ध नंबर पर इस संवाददाता ने फोन किया, लेकिन फोन रिसीव करने वाले शख्स ने कहा कि थानेदार अभी हैं नहीं और अपेक्षित जवाब के लिए थाना आने को कहा।

कोल इंडिया की सहायक कंपनी इसीएल के नियंत्रण वाला गोपीनाथपुर ओसीपी का कार्यालय परिसर। फोटो : राहुल सिंह।

 

खदान के कर्मी, आसपास के लोग कुछ बोलने को तैयार नहीं

गोपीनाथपुर खदान के कर्मी और आसपास के लोग इस हादसे को लेकर कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है। इस संवाददाता ने गोपीनाथपुर ओसीपी के कार्यालय में इसके लिए संपर्क किया। वहां मौजूद कर्मियों ने कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया। एक कर्मचारी ने खदान मैनेजर के बाद दूसरे प्रभारी व्यक्ति के बारे में इस संवाददाता को इंगित किया कि उनसे बात करें, लेकिन उस व्यक्ति ने अपना नाम, पहचान बताने से इनकार कर दिया। यहां तक कि खदान मैनेजर का नाम और मोबाइल नंबर भी देने से इनकार कर दिया और सवालों के जवाब में सिर्फ यह कहा कि साहब लोग हैं, कब आते-कब जाते हैं, पता नहीं, अभी हैं नहीं, बाद में आइएगा।

गोपीनाथपुर खदान के पास स्थित मंदिर के अहाते में बैठे दो-तीन लड़कों ने हादसे की जगह बतायी और कहा कि उस जगह के आसपास सिर्फ एक डेंजर लिखी प्लास्टिक पट्टी से घेर कर सुरक्षा की खानापूर्ति कर दी गयी है और वह भी अब नीचे गिर गयी है। वहीं, पड़ोस के एक दुकानदार ने इस संबंध में पूछे जाने पर हमको पता नहीं है, कह कर बोलने से इनकार कर दिया। एक अन्य युवा ने बताया कि हादसे के शिकार बगल की बस्ती के कई लोग थे और सुबह अंधेरे कोयला निकालने के लिए वे लोग जुटते हैं।

गोपीनाथपुर कोयला खदान का दृश्य।

 

निरसा : कोयला खनन-कोयला भट्टियों के लिए मशहूर और जनप्रतिनिधियों के सवाल

निरसा धनबाद जिले का एक प्रखंड है, जो पश्चिम बंगाल की सीमा पर स्थित है और इसके दक्षिण में दामोदर तो पूरब में बराकर नदी बहती है। जीटी रोड पर स्थित इस छोटे से कस्बे के आसपास के इलाकों में कई कंपनियां कोयला खनन का काम करती हैं। यह इसीएल के मुगमा क्षेत्र के अंतर्गत है और यहां बीसीसीएल भी माइनिंग का काम करता है। इस इलाके में 14 से अधिक चालू और बंद कोयला खदानें हैं और लोगों की जिंदगी पूरी तरह से कोयला और कोयला आधारित उद्योगों पर निर्भर है।

निरसा कस्बे में कई मलिन बस्तियां हैं जो यहां व्याप्त गरीबी का प्रमाण है। इन मलिन बस्तियों के अधिकांश लोग अपनी रोजी-रोटी के लिए प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कोयला व कोयला आधारित उद्योग पर निर्भर हैं। पूरे क्षेत्र में दर्जनों की संख्या में कोल भट्टियां हर समय धुआं उगलते नजर आती हैं और सड़क कोयले के डंफर-ट्रक के आवागमन से धूल का गुबार उड़ता रहता है।

ऐसा भी नहीं है कि निरसा में सिर्फ गरीबी ही है। कोयले की कमाई ने कुछ लोगों को अत्यधिक संपन्न बनाया है, जबकि बहुतायत लोग जो इस पूरे सिस्टम में निचले पर असुरक्षित काम करते हैं वे बेहद गरीब हैं।

निरसा के पूर्व विधायक व वामपंथी नेता अरूप चटर्जी ने इस संवाददाता से कहा, “यहां कई कोयला भट्टियां हैं और उसमें कोयला से जुड़े काम होते हैं। वे कहते हैं एक हार्ड कोक होता है, जो कुछ जगहों पर मिलता है। दूसरा सॉफ्ट कोक होता है, जो किसी भी ग्रेड के कोयला को जला देने से हल्का हो जाता है और फिर यहा कोयला के चूरे का गुल बनता है। वे कहते हैं कि बाहर से सस्ता कोयला लेकर उसे यहां के कोयले में मिक्स किया जाता है”।

अरूप चटर्जी कहते हैं कि पुलिस प्रशासन, कोयला माफिया और अन्य तत्वों का एक ऐसा नेटवर्क है जिससे यहां कोयला का अवैध और असुरक्षित काम होता है। अरूप के अनुसार, उनके क्षेत्र में वैध के अलावा 50 के करीब अवैध कोक भट्टियां होंगीं और ऐसी भट्टियां भी हैं जो साड़ी के घेरे में चल रही हैं उनके लिए किसी लाइसेंस और पाल्यूशन सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं होती है। क्षेत्र में कोयला के एक समानांतर कारोबार का तंत्र बेहद मजबूत और लोग उस तंत्र से भय खाते हैं।

निरसा के पूर्व विधायक अरूप चटर्जी ऐसी घटनाओं के पीछे एक संगठित साठगांठ को वजह बताते हैं।

 

इस संवाददाता से चर्चा के दौरान अरूप चटर्जी कोयले के अवैध कारोबार का अर्थतंत्र और सामाजिक ताने-बाने को समझाया। उन्होंने कहा, “सुरक्षा के लिए तैनात लोगों की मौजूदगी में खदान के बगल में अवैध कोयले का तोलाई होती है और वे स्वयं इन मुद्दों और मजदूरों की सुरक्षा के सवाल पर मुखर रहे हैं। अब एक नया ट्रेंड देखने में आ रहा है, पहले लोग साइकिल से कोयला ले जाते थे, लेकिन पिछले छह महीने से मोटरसाइकिल, स्कूटर और यहां तक कि ट्रैक्टर से कोयले की ढुलाई होने लगी है”।

निरसा की विधायक व झारखंड भाजपा की उपाध्यक्ष अपर्णा सेनगुप्ता ने हादसे से जुड़े सवालों पर इस संवाददाता से कहा, इसकी वजह इसीएल, बीसीसीएल और अवैध कोयला कारोबारियों की मिलीभगत है। वे अपने इलाके में 30 से 40 के बीच अवैध कोयला भट्टियां होने का अनुमान व्यक्त करती हैं। वे भी अरूप चटर्जी के तरह सीधा आरोप लगता हैं कि अवैध कोयला कोयला भट्टों में जाता है। और, इसके लिए आसपास के मजदूर असुरक्षित उठाव का काम करते हैं। उन्होंने कहा कि झारखंड विधानसभा के 25 फरवरी से शुरू होने वाले बजट सत्र में वे यह मामला उठाएंगी और कोयला मंत्रालय को भी इस संबंध में पत्र लिखेंगी।

अपर्णा सेनगुप्ता कहती हैं कि उन्होंने भाजपा विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी के साथ हादसे वाले इलाकों का तीन फरवरी को दौरा किया था। इस दौरान पीड़ितों ने उन्हें हादसे में परिजनों की मौत हो जाने की बात रोते हुए बतायी।

निरसा बाजार का दृश्य, जो जीटी रोड पर स्थित है।

ऐसे हालाता क्यों? 

फरवरी महीने के पहले 10 दिन में ही झारखंड के कई हिस्सों से खदानों के धंसने और असुरिक्षत खनन में शामिल लोगों के मारे जाने की खबरें आ चुकी हैं। आठ फरवरी को धनबाद के महुदा में अवैध खनन के दौरान चाल धंसने से दो लोगों विनोद महतो 28 वर्ष एवं रोशनी कुमारी 14 वर्ष की मौत हुई। इसके अलावा गिरिडीह जिले के तिसरी में माइका खदान में चाल धंसने से एक लड़की की मौत हुई। झारखंड के विभिन्न खनन क्षेत्रों, खासकर कोयला खनन इलाकों से ऐसी खबरें स्थानीय मीडिया में आती रहती हैं

एक फरवरी को एक साथ तीन जगहों पर हुए हादसे में हताहतों की संख्या काफी अधिक होने की वजह से यह राष्ट्रीय मीडिया में चर्चा में आया। सामान्यतः मृतक बेहद कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि के होते हैं और उन्हें ऐसे असुरक्षित कार्याें से एक सामान्य मजदूर को मिलने वाली दिहाड़ी के बराबर या कई बार उससे भी कम आय होती है। एक महत्वपूर्ण बात यह कि ऐसे हादसों में मरने वालों में महिलाओं व लड़कियों की संख्या या तो बराबर या कई बार अधिक होती है, जिससे यह तथ्य भी स्पष्ट होता है कि महिलाएं परिवार के लिए आर्थिक मदद व अतिरिक्त आय के लिए ऐसे असुरक्षित काम में शामिल होती हैं। निरसा हादसे में ही 12 महिलाओं की मौत की रिपोर्ट आयी है।

गोपीनाथपुर ओसीपी के पास एक ढेर से कोयला चुनती एक बच्ची।

 

धनबाद स्थित कोयलांचल विश्वविद्यालय में पत्रकारिता एवं जनसंचार के सहायक प्राध्यापक पवन कुमार पांडेय ऐसे हादसों के सवाल पर कहते हैं, इलाके में रोजगार के लिए कोयला के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है, ऐसे में लोग नहीं चाहते हुए भी अपनी जान को जोखिम में डाल कर इसके धंधे से जुड़ जाते हैं। ऐसी स्थिति से बचने के लिए स्थानीय स्तर पर अर्थव्यवस्था का विविधीकरण आवश्यक है। साथ ही अवैध खनन को लेकर कड़े कानून की भी आवश्यकता है। पवन पांडेय जो बातें कह रहे हैं, वैसी ही चिंता हाल में कोल ट्रांजिशन पर आयी विविध अध्ययन रिपोर्टाें में जाहिर की गयी है। नही ंतो रोजगार का संकट और ऐसे हादसों का सिलसिला जारी रहेगा।