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झारखंड में ई-वेहकिल से बदल रही हैं जिंदगी, लेकिन कायम हैं कई चुनौतियां

झारखंड की सांस्कृतिक राजधानी देवघर में ई-रिक्शा का परिचालन बहुतायत में हो रहा है। देखते-देखते स्थानीय परिवहन के बड़े हिस्से पर इसने कब्जा कर लिया, लेकिन नीतिगत अस्पष्टता की वजह से कई दिक्कतों का लगभग सभी पक्ष को सामना करना पड़ रहा है…

देवघर रेलवे स्टेशन के बाहर बहुतायत में ई-रिक्शा ही नजर आते हैं। फोटो : राहुल सिंह।

राहुल सिंह

देवघर : देवघर बड़ी संभावनाओं वाला एक छोटा-सा शहर है। यह पूर्वी भारत का एक प्रमुख हिंदू धार्मिक स्थल एवं पर्यटन स्थल है, जिस वजह से बड़ी संख्या में लोगों का यहां आना-आना लगा रहता है। और, इस आवागमन में तीर्थयात्रियों, पर्यटकों के लिए एक अहम माध्यम ई-रिक्शा बनता है, जिसे स्थानीय बोली में टोटो भी कहा जाता है। झारखंड के ज्यादातर शहरों से आपको देवघर की सड़कों पर अनुपातिक रूप से कहीं अधिक ई-रिक्शा नजर आएंगे। पिछले तीन सालों में ई-रिक्शा ने स्थानीय परिवहन की छोटी दूरी के कारोबार पर एक तरह से कब्जा कर लिया है और डीजल व पेट्रोल संचालित ऑटो का उपयोग पांच किमी या उससे अधिक दूरी के लिए ही यात्री करते हैं। इस शहर में ई-रिक्शा ने लोगों की जिंदगी को कई मायनों में आसान किया है।

देवघर के रिखिया रोड के रहने वाले 30 वर्षीय युवा संतोष कुमार मिश्रा कहते हैं कि ई-रिक्शा चलने से ध्वनि व वायु प्रदूषण कम हुआ है और स्वास्थ्य से जुड़े खतरे कम हुए हैं। वे ई-रिक्शा चलने को राहत वाली बात मानते हैं।

हालांकि देवघर में बड़ी संख्या में ई-रिक्शा के संचालन से परंपरागत ऑटो चालक परेशान हैं। जसीडीह टेंपो मालिक सह चालक संघ के अध्यक्ष देवनंदन झा उर्फ नुनू झा कहते हैं, “शहर में अचानक तेजी से ई-रिक्शा की संख्या बढ जाने से ऑटो चालकों व मालिकों पर प्रतिकूल असर पड़ा है, इससे उनकी कमाई कम हो गयी है और ई-रिक्शा उस रूट में चल रहा है, जहां उसे नियमतः नहीं चलना चाहिए”। वे चिंता व्यक्त करते हैं हुए कहते हैं, “असेंबल ई-रिक्शा ही शहर में बहुतायत में चल रहे हैं, जो गैर कानूनी है और सुरक्षा मानकों के भी विरुद्ध है। ई-रिक्शा देवघर-जसीडीह, देवघर-दुमका, देवघर-कटोरिया हाइवे पर भी चल रहे हैं, जबकि सुरक्षा वजहों से उनके हाइवे पर चलने पर रोक है, वे सिर्फ स्थानीय परिवहन के लिए है”। देवनंदन झा कहते हैं, “24 फरवरी 2022 को डीसी (जिलाधिकारी) की अध्यक्षता में सड़क सुरक्षा समिति की बैठक वीडियो कान्फ्रेेंसिंग के माध्यम से हुई थी, जिसमें मैंने यह मामला उठाया था, जिस पर उपायुक्त ने जिला परिवहन पदाधिकारी को रोक लगाने का निर्देश दिया था, लेकिन कुछ नहीं हुआ। इससे ऑटो वालों को नुकसान उठाना पड़ रहा है”।

ई-रिक्शा चालक गुड्डू जिनका कहना है कि कार चलाने से इसमें अधिक कमाई है।

 

क्या इलेक्ट्रिक विहकिल के लिए कोई नियम-कानून है?

झारखंड में इलेक्ट्रिक वेहकिल के लिए अबतक कोई नीति या नियमावली नहीं है। ऐसे में परिवहन विभाग के अधिकारी भी इससे जुड़े सवालों पर असहज दिखते हैं। देवघर के जिला परिवहन पदाधिकारी शैलेंद्र कुमार रजक सवालों का जवाब देने के लिए उपलब्ध नहीं थे। वहीं, मोटर वेहकिल इंसपेक्टर संजय हांसदा ने कहा, “हम कामर्सियल गाड़ियों को फीटनेस सर्टिफिकेट देते हैं, लेकिन यह बीच की गाड़ी है”। उन्होंने कहा, “ई-वाहनों को रेगुलेट करने का अभी कोई नियम नहीं है और हमारे पास स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं है”। एक रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड में 2026 तक ई-विहकिल पॉलिसी तैयार होने की संभावना है और अभी इसके लिए लंबा इंतजार करना होगा। देश में जहां 2030 तक 30 प्रतिशत इलेक्ट्रिक वाहनों के लक्ष्य पर चर्चा हो रही है, वहीं झारखंड मार्च 2026 तक 10 प्रतिशत इलेक्ट्रिक वाहनों के लक्ष्य को लेकर आगे बढ रहा है।

पिछले साल अगस्त में आयोजित एक इनवेस्टर सम्मिट में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इलेक्ट्रिक वेहकिल पॉलिसी के ड्राफ्ट की चर्चा की थी। सरकार ने निवेशकों को लुभाने के लिए कई बातें कहीं। तत्कालीन उद्योग सचिव पूजा सिंघल ने कहा था, हम इलेक्ट्रिक वाहन रजिस्ट्रेशन एवं रोड टैक्स में 100 प्रतिशत छूट देने का प्रस्ताव कर रहे हैं।

 

कंपनी निर्मित और असेंबल इ-रिक्शा में क्या है अंतर?

 

देवघर के रांगा मोड़ा चौराहे पर स्थित एक ई-रक्शा के अधिकृत शो-रूम के मैनेजर मो इमरान कहते हैं, “फिलहाल ई-रिक्शा की मांग थोड़ी कम है, बाजार में बहुत गाड़ियां हो गयी हैं। वे कहते हैं, असेंबल इ-रिक्शा जहां 80 से 90 हजार रुपये में मिल जाता है, वहीं कंपनी निर्मित ई-रिक्शा की कीमत 1.75 से 1.80 लाख रुपये होती है। दोनों वाहनों में सवारी समान ही बैठती है और कमाई एक जैसी होती है। इसलिए असेंबल इ-रिक्शा की तरफ लोगों का जोर ज्यादा होता है, हालांकि प्रशासन द्वारा उनके खिलाफ कार्रवाई किए जाने के बाद दो महीने से असेंबलिंग बंद है”।

मो इमरान असेंबल और कंपनी निर्मित ई-रिक्शा के बीच अंतर समझाते हैं। वे कहते हैं, “कंपनी निर्मित ई-रिक्शा के पास आइ-कैट (इंटरनेशनल सेंटर फॉर ऑटोमोटिव टेक्नोलॉजी) अप्रूवल होता है, जिसमें गाड़ी का हैंडल कितना घूमता है, कौन-सा मोटर लगा है, शीशा का जिक्र होता है और ड्राइवर व पैसेेंजर के शेफ्टी का भी जिक्र होता है, लेकिन असेंबल रिक्शा में ऐसा कुछ नहीं होता”। उसका परिचालन खतरनाक है। वे कहते हैं, “महिंद्रा, एक्साइड, केट्रॉन, उड़ान आदि कंपनियों के ई-रिक्शा उपलब्ध हैं, जो मानकों को पूरा करते हैं”।

देवघर के एमवीआइ संजय हांसदा कहते हैं, “हमलोगों ने अनधिकृत रूप से ई-रिक्शा बेचने वालों पर कार्रवाई की थी”। देवघर-कटोरिया रोड में उड़ान कंपनी के ई-रिक्शा का शोरूम संचालक रणवीर कुमार कहते हैं, “प्रशासन की कार्रवाई के बाद दुकान खोल कर अब कोई असेंबलिंग कर ई-रिक्शा नहीं बेच जा रहा है, हालांकि पीछे से ऐसा काम जारी होने की संभावना खत्म नहीं हुई है”।

देवघर के एमवीआइ संजय हांसदा।

 

रणवीर कुमार कहते हैं, “कंपनी के ई-रिक्शा का रजिस्ट्रेशन होता है, उसमें वाहन मालिक के नाम पर 15 लाख का दुर्घटना बीमा होता है, अगर वह किसी ड्राइवर को गाड़ी चलाने देता है तो उसके लिए भी एक लाख का दुर्घटना बीमा होता है, ऐसा असेंबल ई-रिक्शा में नहीं होता है। कंपनी के ई-रिक्शा के लिए बैंक से कर्ज भी मिल जाता है और हम उसका रजिस्ट्रेशन भी करवा कर देते हैं”।

 

देवघर में कितना ऑटो रिक्शा, कितना ई-रिक्शा?

जसीडीट ऑटो संघ के अध्यक्ष नुनू झा कहते हैं, “देवघर-जसीडीह में करीब साढे तीन हजार ऑटो हैं, जबकि हमारा अनुमान है कि पांच हजार इ-रिक्शा हो सकता है”। वे कहते हैं, “सारे ऑटो डीजल संचालित हैं, कुछ साल पहले पेट्रोल ऑटो का परिचालन बंद हो गया, महंगे पेट्रोल की वजह से वाहन मालिकों ने उसे या तो बेच दिया या घर पर खड़ा कर दिया”। वे एक सवाल के जवाब में कहते हैं कि अगर उन्नत तकनीक के साथ इलेक्ट्रिक ऑटो उपलब्ध हो तो ऑटो चालक उसका स्वागत करेंगे।

देवघर परिवहन विभाग का कार्यालय।

 

देवघर परिवहन कार्यालय से 14 जून 2022 को प्राप्त जानकारी के अनुसार, जिले में अबतक 717 रजिस्टर्ड ई-रिक्शा हैं। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इससे कई गुणा अधिक असेंबल इ-रिक्शा चल रहे हैं।

 

ई-रिक्शा से कैसे बदल रही है जिंदगी?

देवघर कॉलेज के पास रहने वाले वाला 28 साल का गुड्डू चौधरी कुछ साल पहले तक प्राइवेट गाड़ी चलाते थे, लेकिन अब वह ई-रिक्शा चलाते हैं। गुड्डू ने बताया, उनके परिवार में सभी लोग ड्राइविंग लाइन में हैं, वह भी गाड़ी चलाते थे, जिससे उसे सात हजार महीने में कमाई होती थी, फिर उसने किराये पर लेकर दूसरे का ई-रिक्शा चलाना शुरू किया जिससे उसे 300-400 कमाई होने लगी और अब डेढ साल से खुद का ई-रिक्शा चलाते हैं, जिससे 600-700 रुपये औसत कमाई हो जाती है। यानी ई-रिक्शा ने
उनकी आय को बढाया।

जसीडीह ऑटो चालक संघ के अध्यक्ष देवनंदन झा उर्फ नुनू झा।

 

इसी तरह करीब 55 साल के नारायण कुछ साल पहले तक हाथ रिक्शा चलाते थे, लेकिन अब वे ई-रिक्शा चलाते हैं। इससे उनकी कमाई भी बढी है और बढती उम्र के मद्देनजर शरीर पर जोर भी नहीं लगता। इ-रिक्शा विक्रेता रणवीर कुमार कहते हैं कि इससे उन लोगों को फायदा हुआ जिनका शरीर हाथ रिक्शा चलाने में अब उतना सक्षम नहीं था। इससे वे अगले पांच या 10 साल और कमाई करने में सक्षम हो गए। रणवीर यह भी कहते हैं कि इससे बहुतों को रोजगार मिला है, जिससे बेरोजगारी की वजह से होने वाला अपराध भी कम हुआ है। लेकिन, ई-रिक्शा के संचालन को लेकर अभी कई अनुत्तरित सवाल हैं। जैसा कि बिना नंबर प्लेट वाला ई-रिक्शा चलाने वाला 18 साल का रिंटु कुमार(बदला हुआ नाम) का कहना है कि उनके पास लाइसेंस नहीं है और पिछले एक साल से वे पढाई करते हुए ई-रिक्शा इसलिए चला रहे हैं ताकि परिवार की आर्थिक मदद कर सकें। सरकार को ई-वेहकिल पॉलिसी बनाते समय इस तबके का भी ध्यान रखना होगा।

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