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झारखंड में भावी अर्थव्यवस्था के लिए जलवायु अनुकूल रणनीतियों पर अमल जरूरी

राज्य को फ्यूचर रेडी बनाने के लिए क्लाइमेट एडप्टेशन और मिटिगेशन के रोडमैप पर परिचर्चा

रांची : वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, झारखंड सरकार, सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एंड एनर्जी डेवलपमेंट सीड और सोशल इनिशिएटिव थ्रू डेवलपमेंट एंड हुमैनिटेरियन एक्शन एसआईडीएचए ने संयुक्त रूप से मंगलवार को एक कान्फ्रेंस बिल्डिंग क्लाइमेट रेसिलिएंट झारखंड: एडप्टेशन एंड मिटिगेशन का आयोजन किया। इसका मकसद राज्य की अर्थव्यवस्था को जलवायु परिवर्त्तन की चुनौतियों से निबटने में सक्षम बनाने के लिए जरूरी नीतियों एवं कार्ययोजना पर विचार-विमर्श करना था। इस कान्फ्रेंस में विविध विभागों, थिंकटैंक एवं अकादमिक, वित्तीय क्षेत्र और उद्योग-व्यापार एसोसिएशन के प्रतिनिधियों ने जलवायु परिवर्तन के जोखिम के संदर्भ में क्लाइमेट एडप्टेशन और मिटिगेशन से संबंधित भावी डेवलपमेंट रोडमैप को प्रस्तुत किया, जिस पर ठोस नीतिगत पहल ली जाएगी।

कान्फ्रेंस के व्यापक संदर्भ और उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं झारखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष एके रस्तोगी ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव भौगोलिक सीमाओं से परे सभी लोगों के जीवन को प्रभावित कर रहे हैं, ऐसे में योजना एवं नीति-निर्माण प्रक्रिया में जलवायु परिवर्तन के वैज्ञानिक समाधानों को स्थानीय परिवेश के हिसाब से जोड़े जाने की जरूरत है। राज्य में समावेशी, सततशील और खुशहाल समाज और अर्थव्यवस्था के लिए सभी पक्षों के साथ कन्वर्जेन्स मॉडल पर कार्य करने की जरूरत है।

अध्ययन बताते हैं कि देश में जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों के कारण करोड़ों लोग वापस गरीबी की स्थिति में जाने को विवश हो सकते हैं। क्लाइमेट चेंज एवं मौसम के अप्रत्याशित परिवर्तन से कृषि एवं आजीविका पर पड़ने वाले असर से खाद्य संकट गहरा रहा है। जलवायु परिवर्तन के जोखिमों के लिहाज से झारखंड देश के सबसे संवेदनशील इलाकों में गिना जाता है, जहां करीब 14 जिले सबसे कमजोर क्षेत्रों के रूप में चिह्नित किए गए हैं।

कान्फ्रेंस को संबोधित करते हुए राज्य के विकास आयुक्त और स्वास्थ्य विभाग झारखंड के अपर मुख्य सचिव अरुण कुमार सिंह ने कहा कि जलवायु अनुकूलन यानी क्लाइमेट रेसिलिएंट समाधानों में मुख्य तौर पर वे रणनीतियां, प्राथमिकताएं एवं पहल आते हैं, जो इसके जोखिमों को कम करते हैं और इसके लिए अर्थव्यवस्था को तैयार करते हैं। विकास योजना और अनुकूलन रणनीतियां एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। राज्य सरकार स्टेट क्लाइमेट एक्शन प्लान को पूरी गंभीरता से लागू कर रही है और बीते वर्षों में कई निर्णायक कदम उठाए गए हैं। हम अर्थव्यवस्था को सशक्त और सक्षम बनाने लिए प्रतिबद्ध हैं।

इस अवसर पर अबूबकर सिद्दीक़ी, सचिव, कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग ने कहा कि कार्बन मुक्त अर्थव्यवस्था और जलवायु परिवर्तन के समाधानों के रास्ते पर चलने से आर्थिक वृद्धि को गति मिलेगी और सततशील विकास लक्ष्यों को हासिल करने में मदद मिलेगी। कृषि क्षेत्र के सर्वांगीण विकास के लिए क्लाइमेट रेसिलिएंट और सस्टेनेबल एग्रीकल्चर प्रैक्टिसेज बेहद जरूरी है। जलवायु परिवर्तन से जुड़ी ठोस पहलों को रणनीतियों और कार्यक्रमों में प्रमुखता से जगह देनी चाहिए और इसे जमीनी स्तर पर ठोस ढंग से लागू किया जाना चाहिए।

जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्रसंघ के सम्मलेनों खासकर पेरिस समझौते 2015 और ग्लासगो कन्वेंशन 2021 ने नेट जीरो एमिशन हासिल करने और क्लाइमेट रेसिलिएंट इकोनॉमी बनाने पर जोर दिया है। केंद्र सरकार द्वारा इन सम्मेलनों से काफी पहले वर्ष 2008 में नेशनल एक्शन प्लान लागू किया गया और इसके तहत आठ नेशनल मिशन शुरू किए गए। झारखंड सरकार द्वारा भी वर्ष 2014 में स्टेट क्लाइमेट एक्शन प्लान बना कर लागू किया गया।

राज्य में फ्यूचर रेडी इकोनॉमी के लिए गवर्नेंस के कन्वर्जेन्स मॉडल की आवश्यकता पर बल देते हुए सीड के सीईओ श्री रमापति कुमार ने कहा कि स्टेट क्लाइमेट एक्शन प्लान को ठोस ढंग से लागू करने के लिए विविध विभागों एवं एजेंसियों को एक विजन के साथ मिलकर काम करना चाहिए। इसमें विविध क्षेत्रों के विशेषज्ञों को जोड़ कर एक संस्थानिक प्रणाली और जन भागीदारी के जरिए ठोस कार्यरूप दिया जाना चाहिए। पेरिस समझौते और ग्लासगो कन्वेंशन के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को देखते हुए अब राज्य के स्टेट क्लाइमेट एक्शन प्लान को अपडेट करने और ज्यादा विजनरी बनाने की जरूरत है।

कान्फ्रेंस के पहले सत्र में क्लाइमेट चेंज के जोखिमों, कमजोरी और अनुकूलता से संबंधित चुनौतियों एवं अवसरों पर विचार किया गया। दूसरे सत्र में जलवायु अनुकूलता और समाधान के उपायों पर चर्चा की गयी और तीसरे सत्र में राज्य में क्लाइमेट गवर्नेंस को मजबूत करने में वित्त-पोषण, तकनीक एवं प्रासंगिक नीतियों के महत्व पर प्रकाश डाला गया।

कान्फ्रेंस में मुख्य तौर पर मल्टी स्टेकहोल्डर एप्रोच एडप्टेशन और मिटिगेशन से जुड़े तकनीकी उपायों, स्वच्छ ऊर्जा समाधानों, क्षमतावर्धन और शोध विकास से जुड़े पहलुओं पर विस्तृत चर्चा हुई। सभी प्रतिभागी इस बात पर सहमत हुए कि सततशीलता के सिद्धांतों पर आधारित जलवायु अनुकूलन नीतियों से राज्य में जीविकोपार्जन सुरक्षा, वैकल्पिक आर्थिक अवसर और सामाजिक अधिसंरचना के विकास को बढ़ावा मिलेगा।

कान्फ्रेंस में प्रमुख वक्ताओं में एचएस गुप्ता पूर्व पीसीसीएफ.वाइल्ड लाइफ, डीके सक्सेना, सीसीएफ झारखंड, वाईके दास, मेंबर सेक्रेटरी जेएसपीसीबी, प्रो कामिनी कुमार कार्यवाहक कुलपति रांची विवि, रवि रंजन रंजन आईएफएस, हेमंत कुमार एसआईडीएचए, डॉ नितिन कुलकर्णी इंस्टिट्यूट फॉरेस्ट प्रोडक्टिविटी, रंजीत टिबड़ेवाल फिक्की, विनय पटनायक विश्वबैंक, संजय मोहन श्रीवास्तव टाटा स्टील, डॉ केके शर्मा इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ रेसिन एन्ड गम और डॉ मनीष कुमार सीड प्रमुख थे। कान्फ्रेंस में योजना, ऊर्जा, उद्योग, वित्त आदि विभागों के अलावा प्रसिद्ध थिंकटैंक, अकादमिक संस्थान, उद्योग एवं व्यापार संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए।

 

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