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अडानी-अंबानी की संपत्ति बढ रही है और गरीबी रेखा से नीचे जीने वालों की संख्या भी बढ रही है

नवगछिया (भागलपुर) : सामाजिक न्याय आंदोलन बिहार, बिहार फुले-अंबेडकर युवा मंच और बहुजन स्टूडेंट्स यूनियन बिहार के संयुक्त बैनर तले राष्ट्रीय सामाजिक न्याय दिवस के मौके पर मंगलवार को नवगछिया के बिहारी धर्मशाला में बहुजन दावेदारी सम्मेलन आयोजित किया गया।

इस मौके पर चर्चित बहुजन बुद्धिजीवी डॉ विलक्षण रविदास ने कहा कि वर्ण जाति के आधार पर बहुजन अन्याय व वंचना के शिकार हुए हैं और अभी भी वह जारी है। इस अन्याय व वंचना को खत्म करने का सवाल ही सामाजिक न्याय का सवाल है। उन्होंने कहा कि 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद सामाजिक न्याय पर हमलों और सामाजिक न्याय के मोर्चे पर हासिल उपलब्धिओं को खत्म करने का नया दौर शुरू हुआ है।

सत्ता, शासन, संपत्ति, संसाधनों, सम्मान, शिक्षा व अन्य क्षेत्रों में बहुजनों के पास जो कुछ है, जो भी हासिल उपलब्धियां हैं, अंतिम तौर पर छीन लेने की मुहिम चल रही है। मुसलमानों को निशाने पर लेकर सांप्रदायिकता के खाद-पानी के जरिए हिंदू पहचान को उभारने के साथ ही मनुवादी वर्चस्व व कॉरपोरेट कब्जा मुहिम को आगे बढ़ाया जा रहा है। हमें भाजपा-आरएसएस से निर्णायक मुकाबला करना होगा।

इस मौके पर पटना से आए बहुजन चिंतक ई हरिकेश्वर राम ने कहा कि आज का दिन सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करने वाले नायकों और अपने संघर्ष के इतिहास से प्रेरणा लेकर संघर्ष की विरासत को बुलंद करते हुए सामाजिक न्याय के मोर्चे पर हासिल उपलब्धियों को बचाने और सामाजिक न्याय का दायरा जीवन के तमाम क्षेत्रों और व्यवस्था के सभी अंगों में विस्तृत करने का संकल्प लेने के लिए है। आज भी एससी-एसटी व ओबीसी हर क्षेत्र में पीछे हैं।

नौकरशाही, न्यायपालिका, मीडिया, शिक्षा, धन-धरती में हमारी समुचित हिस्सेदारी नहीं है।

उन्होंने कहा कि आज भी केंद्र सरकार की नौकरियों में एससी-एसटी और ओबीसी का प्रतिनिधित्व और आरक्षित पदों पर रिक्तियाँ बहुत ही ख़ौफ़नाक हैं। एससी-एसटी और ओबीसी के लिए क्रमशः 15 प्रतिशत, 7.5 प्रतिशत और 27 प्रतिशत आरक्षण होने के बावजूद भी ग्रुप ए में एससी का प्रतिनिधित्व सिर्फ 12.86 प्रतिशत, एसटी का 5.64 प्रतिशत और ओबीसी का 16.88 प्रतिशत है।

सामाजिक न्याय आंदोलन बिहार के गौतम कुमार प्रीतम ने कहा कि 26 जुलाई 1902 भारत के इतिहास में वह दिन है, जब बीसवीं सदी में भारत में सामाजिक न्याय की औपचारिक शुरुआत हुई थी। आधुनिक आरक्षण व्यवस्था की शुरुआत शाहूजी महाराज ने 1902 में की थी। उन्होंने 26 जुलाई को ही सरकारी आदेश निकालकर अपनी रियासत के 50 प्रतिशत प्रशासनिक पदों को दलितों-आदिवासियों व पिछड़ों के लिए आरक्षित किया था। इसलिए आज के दिन को हम राष्ट्रीय सामाजिक न्याय दिवस के रूप में मनाते हैं।

सामाजिक न्याय आंदोलन बिहार के रिंकु यादव ने कहा कि अडानी-अंबानी की संपत्ति बढ़ रही है तो गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की तादाद बढ़ रही है। नरेन्द्र मोदी सरकार के 8 साल में 14 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे चले गये हैं। 80 करोड़ लाभार्थी बनकर जीवन गुजार रहे हैं और सरकार कुछ अनाज देकर अपना पीठ थपथपा रही है, जबकि सच यह है कि 80 करोड़ लोग भिखारियों की स्थिति में हैं। लाभार्थी होना गुलामी व अपमान में जीना है। जन वितरण प्रणाली को खत्म कर देने की साजिश आगे बढ़ रही है तो मनमाना पैमाना तय कर राशन कार्ड छीना जा रहा है। अभी-अभी जरूरी खाद्य सामग्री को भी जीएसटी के दायरे में लाकर गरीबों के जीवन की मुश्किलें बढ़ा दी गयी। खाद्य सामग्री की कीमतें और बढ़ जाएंगी।

इस मौके पर बिहार फुले अंबेडकर युवा मंच के प्रभारी अजय कुमार राम और बहुजन स्टूडेंट्स यूनियन के सचिव अनुपम आशीष ने कहा कि केंद्र सरकार मुल्क की आजादी को गिरवी रख रही है। सरकार की देसी-विदेशी पूंजीपतियों का लूट व मुनाफा बढ़ाने वाली अर्थनीति-सार्वजनिक क्षेत्रों का अबाध निजीकरण खासतौर से बहुजनों की बेदखली व अधिकारहीनता के साथ बेरोजगारी भी बढ़ा रही है। रेलवे सहित अन्य सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण से रोजगार के अवसर भी घट रहे हैं। निजी क्षेत्र के रोजगार में सम्मान-सुविधा व वेतन कम और गुलामी ज्यादा है। रेलवे में हजारों नौकरियां खत्म की जा चुकी हैं। इसी बीच सेना में भी 4 साल के ठेका पर बहाली की अग्निपथ योजना थोप दी गयी है। निजीकरण और सरकारी नौकरियां खत्म करने की मार सबसे ज्यादा बहुजनों पर ही पड़ती है, क्योंकि निजी क्षेत्र में आरक्षण नहीं है। एससी-एसटी,ओबीसी के आरक्षण पर 10 प्रतिशत सवर्ण आरक्षण की मार तो पड़ ही रही है, लैटरल एंट्री भी जारी है और पहले से आरक्षण को लागू करने में जारी गड़बड़ी व बेईमानी भी बढ़ गयी है।

इस मौके फुले-अंबेडकर युवा मंच के अखिलेश रमण और बहुजन स्टूडेंट्स यूनियन के पांडव शर्मा ने कहा कि पहले से ही बदहाल बर्बाद सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर नई शिक्षा नीति 2020 के जरिए अधिकतम हमला बोल दिया गया है। इस शिक्षा नीति में सामाजिक न्याय के लिए कोई जगह नहीं है। यह खासतौर से बहुजनों के शिक्षा के अधिकार से बेदखली का फरमान ही है। पाठ्यक्रमों को भी बदला जा रहा है। अंतिम तौर पर मनुवादी वर्चस्व व कॉरपोरेट हितों के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था को पुनर्गठित किया जा रहा है।

सम्मेलन की अध्यक्षता पूर्व मुखिया रवींद्र कुमार दास और संचालन नसीब रविदास और गौतम कुमार प्रीतम ने किया। अन्य वक्ताओं में दीपक दीवान, सुबोध कुमार दास, प्रभाष पासवान, दीपक पासवान, राजेन्द्र पासवान, निर्भय कुमार, अमित, ऋतु राज आदि थे।

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