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पितृपक्ष में पितरों को रहती है अपने पुत्र-पौत्र से आस, जानें क्यों करना चाहिए अपने पितरों का श्राद्ध

pitru paksha 2021

समृद्ध डेस्क: हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार अपने पुत्र -पौत्र के द्वारा श्राद्ध करने से पितृ और पूर्वजों को संतुष्टि प्राप्त होती है. श्राद्ध का अर्थ होता है श्रद्धा पूर्वक किया हुआ वह संस्कार जिससे पितृ संतुष्टि प्राप्त करते हैं.

ऐसा कहा जाता है कि पितृ या पूर्वज ही हमें जीवन में आई विपरीत परिस्थितियों से उबारने में मदद करते हैं. हमारे साथ कई बार ऐसा होता है कि हम किसी विपरीत परिस्थिति में फंसे होते हैं और समझ नहीं आता है कि क्या सही है और क्या गलत तो उस समय हमें इनट्यूशन यानी सहज ज्ञान होता है, जिसके माध्यम से हम किसी फैसले को लेने में सक्षम होते हैं. माना जाता है कि यह सहज ज्ञान का बोध हमें हमारे पितृ द्वारा भेजी गई मदद होती है.

कल से प्रारंभ होगा पितृपक्ष

पितृपक्ष की शुरुआत हमेशा ही आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से होती है जो अमावस्या तक चलती है. आज पूर्णिमा तिथि के बाद कल से पितृपक्ष का प्रारंभ हो जाएगा. इस वर्ष 21 सितंबर प्रातः काल 4:48 से आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि लगने के साथ ही श्राद्ध कर्म का पवित्र पितृपक्ष प्रारंभ हो जाएगा पत्र प्राप्त की समाप्ति 6 अक्टूबर यानी अमावस्या के दिन होगा.
ऐसा माना जाता है की इस दौरान हम अपने पितरों का तर्पण एवं श्राद्ध कर्म, ब्राह्मण भोज, आदि करते हैं. ऐसा करने से समस्त सुख समृद्धि और वंश वृद्धि होती है. इसलिए पितृपक्ष में पितरों का स्मरण पूजन एवं तर्पण शुभ दायक माना जाता है.

क्यों किया जाता है श्राद्ध

मार्कण्डेय ऋषि कहते हैं कि ‘पितृ सूक्ष्म स्वरुप में अपनी संतान के घर के द्वार पर सूर्योदय से ही आकर बैठ जाते हैं. इस उम्मीद में कि उनके पुत्र-पौत्र भोजन से उन्हें तृप्त कर देंगे. लेकिन अगर सूर्यास्त तक ऐसा नहीं होता है तो पितृ निराश होकर पितृलोक लौट जाते हैं. ऐसा भी माना गया है कि भोजन नहीं मिलने के कारण पितृ निराश और असंतुष्ट होकर श्राप देते हैं. कहा जाता है कि देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी होता है. इसलिए शास्त्रों में श्राद्ध करने की अनिवार्यता बताई गई है. शास्त्रों के अनुसार ऐसा माना गया है कि मृत्यु के औद्यर्वदैहिक संस्कार, पिंडदान, तर्पण, श्राद्ध, एकादशी आदि करने से पापों के विधान का प्रायश्चित होता है.

पितरों की मृत्यु की तिथि के अनुसार किया जाता है श्राद्ध

शास्त्रों के अनुसार पित्र पक्ष में पितरों की मृत्यु की तिथि के अनुसार श्राद्ध कर्म किया जाता है. अगर किसी मृत व्यक्ति की तिथि ज्ञात नहीं हो तो ऐसी स्थिति में अमावस्या तिथि पर श्राद्ध किया जाता है इस दिन सर्वपितृ श्राद्ध योग माना जाता है. ऐसा माना गया है कि किसी विद्वान ब्राह्मण के जरिए ही श्राद्ध कर्म यानी पिंडदान और तर्पण करवाना चाहिए. श्राद्ध कर्म में पूरी श्रद्धा के साथ ब्राह्मणों को दान देना चाहिए और अपनी क्षमता के अनुसार किसी गरीब या जरूरतमंद की मदद करनी चाहिए. ऐसा करने से पुण्य की प्राप्ति होती है. इसके साथ-साथ गाय कुत्ते को हुए आदि पशु पक्षियों के लिए भी भोजन का एक अंश जरूर डालना चाहिए. इसके अलावा अगर संभव हो तो गंगा नदी के किनारे पर श्राद्ध कर्म करवाना चाहिए. अगर ऐसा संभव नहीं हो तो घर पर या किसी नदी किनारे भी इसे किया जा सकता है. श्राद्ध कर्म की पूजा दोपहर के समय शुरू करनी चाहिए. पूजा के बाद जल तर्पण करना चाहिए और इसके बाद जो भोग लगाया जा रहा है उसमें से एक गाय कुत्ते कव्वे आदि का हिस्सा अलग कर उन्हें भोजन डालते समय अपने पितरों का स्मरण करना चाहिए और मन ही मन उन्हें श्राद्ध ग्रहण करने का निवेदन करना चाहिए.

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