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वो रघुवंश बाबू जिन्हें बोलने के लिए माइक और ‘अब’ राजनीति करने के लिए पार्टी की जरूरत नहीं थी…

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राहुल सिंह

74 साल की उम्र में समाजवादी राजनेता रघुवंश प्रसाद सिंह का रविवार को दिल्ली के एम्स में निधन हो गया. कोरोना संक्रमण ने उनके शरीर को कमजोर कर दिया था और इससे ठीक के बाद फिर उनकी सेहत बिगड़ी और उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़ा. वे लालू प्रसाद यादव से उनके बेटे के राजनैतिक फैसले पर नाराजगी जताते हुए और नीतीश कुमार को बिहार व अपने इलाके लिए कई काम सुझाव व सलाह देते हुए इस दुनिया से रुखसत कर गए.

रघुवंश बाबू एक ऐसे राजनैतिक कार्यकर्ता थे जो आखिरी समय तक सिद्धांतों की बात करते रहे और उस व्यक्ति को भी नेक मशविरा देते रहे जिनका वे राजनैतिक रूप से विरोध करते रहे. इससे यह भ्रम भी पैदा होता रहा कि क्या वे राजद छोड़ जदयू में चले जाएंगे, लेकिन कुछ पखवाड़े पहले के उनके बयानों व ट्वीट पर गौर करने से वह भ्रम सिर्फ भ्रम ही लगता है. पिछले कई सालों-दशकों की तरह अपने मित्र और राजनैतिक बाॅस लालू प्रसाद यादव से मुद्दों पर लड़ते-झगड़ते और तनातनी करते वे गए.

90 के दशक में भारतीय राजनीति में परवान चढे समाजवादी राजनीति के वे उन अपवादों में थे जिन्होंने कभी भी जेबी पार्टी नहीं बनायी, लेकिन उनका राजनैतिक कद, स्वीकार्यता व सम्मान ऐसा करने वालों से कम नहीं था. हाल में जदयू नेता व नीतीश कुमार के बेहद विश्वासपात्र ललन सिंह ने एक प्रेस कान्फ्रेंस में कहा था कि रघुवंश बाबू किसी भी पार्टी के लिए एसेट हैं.

उनके निधन पर आरएसएस के बैकग्राउंड वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेसी जयराम रमेश ने जिस प्रकार से भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की है, वो देश की राजनीति में उनके महत्व और योगदान को बताने के लिए काफी है.

6 जून 1946 को बिहार के वैशाली जिले के शाहपुर में जन्मे रघुवंश बाबू ने औपचारिक राजनीति की शुरुआत 1973 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के सीतामढी जिले के सचिव के रूप में की. उन्होंने 1977 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर पहली बार विधानसभा चुनाव जीता और यहां से उनकी संसदीय राजनीति की पारी की शुरुआत हुई और उसके बाद वे बिहार में लालू के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री रहे. फिर केंद्र में संयुक्त मोर्चा सरकार में 1996-97 के दौर में मंत्री रहे.

इसके बाद 2004 में डाॅ मनमोहन सिंह के नेतृत्व में जब यूपीए-1 सरकार बनी तो उन्हें ग्रामीण विकास मंत्री बनाया गया. देश का ग्रामीण विकास मंत्री बनना उनके राजनैतिक कैरियर का वह मोड़ था जहां उन्हें खुद को साबित करने का मौका मिला. गणितज्ञ रघुवंश बाबू राजनीति में कोई गुणा-गणित नहीं करते, सीधी और तीखी बात करते. मुद्दे से वे न भटकते और न सामने वाले को भटकने देते. वे ठेठ गंवई इंसान थे और ग्रामीण विकास मंत्री के रूप में गांव, गरीब, खेत, खलिहान और खेतिहर मजदूरों को समझने-जानने वाला एक सच्चा इंसान मिला.

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कहा यह जाता है कि जिस नरेगा-मनरेगा का श्रेय देश के बड़े राजनैतिक चेहरों से लेकर सिविल सोसाइटी के चेहरों तक को मिला, उसके असली शिल्पकार रघुवंश बाबू ही थे. उनके कार्यकाल में ही 2005 में संसद में मनरेगा कानून पेश व पास हुआ. तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आजादी के बाद के इस सबसे प्रभावकारी ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून का श्रेय रघुवंश बाबू को ही देना चाहते हैं, लेकिन इसका श्रेय अन्यों ने बटोरा. रघुवंश बाबू जैसे औघड़ आदमी व ब्रह्म बाबा को यूं भी श्रेय लेने की कोई जरूरत थी नहीं.

भदेस रघुवंश उच्च शिक्षित थे और उनके बोल-व्यवहार में कोई कृत्रिमता नहीं थी. वे हर किसी के लिए एक जैसे थे. चाहे वह बड़ा से बड़ा आदमी हो या एक साधारण-सा व्यक्ति.

रघुवंश बाबू 1996 में पहली बार 11वीं लोकसभा के लिए चुने गए और तब से वे 2009 तक लगातार वैशाली से लोकसभा चुनाव जीतते रहे. वे 11वीं से 15वीं लोकसभा तक लगातार पांच बार सांसद चुने गए. हालांकि 2014 में 16वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में मोदी लहर में हार गए और फिर 2019 में भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

रघुवंश बाबू अपने 37 साल लंबे संसदीय जीवन में 18 साल तक लगातार लोकसभा सांसद रहे. बढती उम्र में भी उनकी आवाज संसद में बहुत मजबूत व जोरदार होती थी. उन्हें अपने संबोधन के लिए संसद के अंदर व बाहर भी साामन्तः माइक की बहुत अधिक जरूरत नहीं पड़ती.

जब बिना माइक आॅन किए भी रघुवंश बाबू लोकसभा में हस्तक्षेप करते या बोलते तो उनकी टनक दार आवाज गूंजती थी.

अपने राजनैतिक जीवन के उत्तरार्द्ध में उन्होंने अपने योगदान व कामकाज से ऐसी जगह पा ली थी जहां उनके लिए राजनीति करने हेतु किसी पार्टी या दल की आवश्यकता नहीं थी. वे स्वयं में एक मुकम्मल राजनैतिक इकाई थे.

भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर आसानी से विपक्षियों के निशाने पर आ जाने वाले लालू प्रसाद यादव व उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के लिए रघुवंश बाबू एक ऐसा बेदाग चेहरा थे जो एक प्रकार से उन आरोपों से बचाव के लिए ढाल का काम करता था.

रघवुंश बाबू लालू प्रसाद यादव के लिए इतने अहम थे कि वे उनके लिए अपने बेटों को फटकार सकते थे और यह कह सकते थेे कि ब्रह्म बाबा जैसा कहते हैं, वैसा करो. लालू प्रसाद यादव को यह पता होता था कि रघुवंश खुद के लिए नहीं पार्टी के व्यापक हित के लिए नाराज होते हैं.

रघुवंश के अब साथ नहीं होने की लालू की पीड़ा को इस बात से समझा जा सकता है कि उन्होंने ट्वीट कर कहा कि मैंने परसों ही आपसे कहा था कि आप कहीं नहीं जा रहे हैं, लेकिन आप इतनी दूर चले गए. निःशब्द हूं, दुःखी हूं, बहुत याद आएंगे. लालू को मित्र व सहयोगी रघुवंश का जाने का यह अंदाज सालों सालता रहेगा.

 

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