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प्रशांत किशोर ने कांग्रेस को क्यों सुझाया शरद पवार को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाने का फार्मूला?

NCP Chief Sharad Pawar. ANI Photo.

शरद पवार के नाम पर बीजद प्रमुख नवीन पटनायक को साधने की होगी कोशिश

नयी दिल्ली : चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर की मंगलवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मुलाकात को राजनीतिक जगत में असामान्य घटना माना जा रहा है। इस मुलाकात के भारतीय राजनीति पर आने वाले दिनों में असर देखने को मिलेंगे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, करीब पांच साल बाद हुई इस मुलाकात में राहुल गांधी को प्रशांत किशोर ने शरद पवार को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाने का सुझाव दिया है।

राहुल व पीके की मुलाकात में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांाधी वाड्रा मौजूद थीं और कहा जा रहा है कि वर्चुअली कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी भी इसमें शामिल हुईं थीं। इसी दौरान शरद पवार का नाम शीर्ष पद के लिए बढाया गया।

शरद पवार भारतीय राजनीति के सबसे कद्दावर शख्सियत में शुमार हैं और उनकी व्यापाक स्वीकार्यता है। प्रशांत किशोर इसी आधार पर विपक्ष को शीर्ष पद के लिए उनके नाम पर एकजुट होने का सुझाव दे रहे हैं।

प्रशांत किशोर ने हाल के सालों में कई बड़े विपक्षी नेताओं के चुनाव प्रबंधन की कमान संभाली है और उनसे उनके बेहतर रिश्ते हैं। टीएमसी चीफ व पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, डीएमके चीफ व तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन, अरविंद केजरीवाल, उद्धव ठाकरे, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन रेड्डी आदि से उनके मधुर रिश्ते हैं।

प्रशांत किशोर के प्रबंधन में लड़े गए बंगाल जैसे बड़े राज्यों में ममता बनर्जी ने मजबूत वापसी की है। वहीं, तमिलनाडु व महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भाजपा विरोधी दलों की सरकार है।

पीके के फार्मूले को अगर विपक्षी रणनीति के रूप में स्वीकार किया गया तो इलेक्टोरल कॉलेज वोटों के मामले में तीन बड़े राज्यों का विपक्ष को लाभ हो सकता है। आशंकाएं ओडिशा को लेकर है, जहां बीजू जनता दल की सरकार है। ध्यान रहे कि बीजद का रुख संवैधानिक पदों के चुनाव के लिए अहम साबित होता रहा है।

भाजपा की विरोधी होने के बावजूद ऐसे चुनाव में उसका समर्थन सत्ता पक्ष को मिलने से पासा पलट जाता रहा है।

ऐसे में शरद पवार जैसे कद्दावर शख्स के नाम पर नवीन पटनायक को साधने की कोशिश की जाएगी।

विपक्षी रणनीति यह है कि अगर वे राष्ट्रपति चुनाव में बाजी पलटने में कामयाब रहते हैं तो 2024 के लोकसभा चुनाव में साझा विपक्षी एकजुटता अधिक मजबूत होगी।

 

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