ग्राउंड रिपोर्ट : विस्थापन-प्रदूषण का दंश और कोयला-पत्थर के बाद पाकुड़ के भविष्य पर सवाल

पचवाड़ा नार्थ कोयला खदान। फोटो : राहुल सिंह।

राहुल सिंह की रिपोर्ट

18 साल की सिलवंती हेंब्रम ने अपने बचपन में तब विस्थापन देखा, जब उसका गांव कठालडील उजड़ गया और करीब छह-सात की उम्र में न्यू कठालडीह के नाम से बसे एक गांव में वह अपने माता-पिता व दो भाइयों के साथ रहने आ गयी। उसके नए गांव को बस न्यू शब्द जोड़ कर पुराना नाम इसलिए दिया गया ताकि वह अहसास जीवित रहे जो उसने और उसके जैसे दूसरे कठालडीह निवासी अपने पुरखों के गांव में महसूस करते थे। लेकिन, अब ऐसा कुछ है नहीं। विस्थापन के एवज में बनवाए गए पक्के मकानों व कॉलोनी नुमा बसावट वाले गांव में रहने के बावजूद उनके अहसास में एक पीड़ा-टीस है।

दुमका में इंटर आर्ट्स सकेंड ईयर की छात्रा सिलवंती हेंब्रम ने हमसे बातचीत की शुरुआत तो संताली में की थी, लेकिन मेरे साथी (जो संताली में बातचीत में सहज थे)  के आग्रह पर वह हिंदी में बातचीत के लिए तैयार हो गयी। सिलवंती के अनुसार, छह-सात साल की उम्र में वह अपने पुराने गांव से नए गांव में आ गयी, क्योंकि उस पुराने गांव में कोयला निकाला जाना था। आधारभूत सुविधाओं व खेतीबाड़ी पर चर्चा करते हुए वह कहती है, “सबकुछ खत्म हो गया”।

सिलवंती हेंब्रम। फोटो : दिनेश भगत।

 

सिलवंती का नया गांव उत्तर-पूर्व झारखंड के पश्चिम बंगाल से सटे पाकुड़ जिले के आमड़ापाड़ा ब्लॉक में पचवाड़ा कोयला खनन क्षेत्र से बामुश्किल दो-ढाई किमी दूरी पर पठार व जंगल के बीच स्थित है, जबकि पुराना गांव कोयला खदान के गर्भ में समा चुका है। पचवाड़ा कोयला क्षेत्र अलग-अलग हिस्सों में बंटा है। पचवाड़ा नार्थ में पश्चिम बंगाल सरकार की विद्युत उत्पादन इकाई के लिए कोयला का खनन होता है। भारत सरकार के कोयला मंत्रालय ने पचवाड़ा नार्थ कोल माइन को वेस्ट बंगाल पॉवर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड को 2015 में आवंटित किया था। दिसंबर 2018 में कोयला नियंत्रक, भारत सरकार से इसे खोलने की अनुमति प्राप्त हुई और उसी महीने यहां से कोयला खनन का कार्य फिर शुरू हुआ।

पचवाड़ा नार्थ कोल ब्लॉक इसीएल यानी ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड के राजमहल क्षेत्र में आता है और यह राजमहल बेसिन का हिस्सा है। इस खदान में 389 मिलियन टन कोयला का भंडार होने का अनुमान है और खदान की अधिकतम उत्पादन क्षमता 15 मिलियन मिट्रिक टन प्रतिवर्ष है। वहीं ग्लोबल इनर्जी मॉनिटर विकी के अनुसार, प्रस्तावित पचवाड़ा साउथ कोल माइन एनसीएल इंडिया लिमिटेड द्वारा ऑपरेटेड है और यहां अभी उत्पादन आरंभ नहीं हुआ है। कभी यहां पंजाब सरकार के लिए पैनम नामक कंपनी भी कोयला खनन करती थी और वह अलग-अलग वजहों से चर्चा में रहा।

पचवाड़ा का कोयला खदान जिससे बंगाल सरकार के बिजली उत्पादन के लिए कोयला निकाला जाता है।

 

आलूबेड़ा पंचायत में पड़ने वाले कठालडीह गांव के प्रधान नायकी सोरेन ने कहा कि पहले कई तरह की सहायता मिलती थी और वह अभी बंद है। 22 साल के गणेश सोरेन जो असम में रह कर पढाई करते हैं, इन दिनों अपने गांव में हैं। गणेश कहते हैं कि पहले खेती की जमीन थी अब है नहीं। गांव के 35 वर्षीय सुकुल मुर्मू या 16 साल के मिथुन हेंब्रम विस्थापन और सुविधाओं के अभाव की पीड़ा ही साझा करते हैं।

कठालडीह के ग्रामीण।

 

लंबी सड़क पर धूल का गुबार, प्रदूषण और…

आमड़ापाड़ा बाजार से पचवाड़ा करीब 15 किमी की दूरी पर है और आमड़ापाड़ा से पचवाड़ा की ओर जाने वाली सड़क के मुहाने से यह मालूम पड़ जाता है कि यह रास्ता कोयला क्षेत्र में जाता है। पूरे रास्ते व उसके किनारे बने गांवों में कोयला डस्ट कोयला ट्रकों के परिवहन के कारण उड़ता रहता है और थोड़ी-थोड़ी देर पर उस पर पानी का छिड़काव किया जाता है। रास्ते में महिलाएं व लड़कियां ट्रकों से गिरे कोयले को चुनती नजर आती हैं। एक जगह ट्रक के सामने कोयला के बड़े चट्टानों से मार्ग को अवरुद्ध कर दिए जाने को लेकर अपने स्थानीय साथी से पूछने पर उन्होंने कहा कि यहां के ग्रामीणों की कोई मांग होगी इसलिए ऐसा किया गया होगा।

आमड़ापाड़ा से पचवाड़ा की ओर जाने वाली सड़क। फोटो : दिनेश भगत।

 

पाकुड़ की अर्थव्यवस्था, रोजगार, खनन और डीएमएफ व ट्रांजिशन की चुनौतियां

पाकुड़ कोयले से अधिक अपनी उन्नत किस्म के स्टोन चिप्स (गिट्टी) के लिए मशहूर है। पाकुड़ और इसका पड़ोसी साहिबगंज जिले में झारखंड में सबसे अधिक संख्या में स्वीकृत माइनिंग हैं। इस आदिवासी बहुल जिले में बड़ी संख्या में जनजातीय लोग स्टोन क्रेशर में काम करते हैं, सामान्यतः खुद वे इसके संचालक नहीं होते। माइनिंग उनकी जमीन पर होती है, क्रेशर उनके गांव में होता है और प्रदूषण व बीमारियां वे झेलते हैं, लेकिन इसका आर्थिक लाभ दूसरे समुदाय के लोगों को होता है।

पाकुड़ जिला प्रशासन के डीएमएफ रिपोर्ट के अनुसार, यहां 329 माइंस और 800 क्रशर हैं, जिसमें एक लाख लोग रोजगार पाते हैं। पत्थर उद्योग से 20 से 30 करोड़ का वार्षिक राजस्व मिलता है। वित्त वर्ष 2019-20 में डीएमएफ को 25.68 करोड़ रुपये प्राप्त हुए जिसमें माइनर मिनरल से 1940 करोड़ जबकि कोयला से 6.28 करोड़ रुपये हासिल हुए। इस आंकड़े से ही पत्थर उद्योग के यहां की अर्थव्यवस्था में महत्व को समझा जा सकता है, जिसकी प्रदूषण और पर्यावरण संकट के रूप में भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।

डॉउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट के अनुसार, बेतहाशा माइनिंग की वजह से झारखंड देश के वैसे प्रमुख राज्यों में है जो तेजी से मरूस्थलीकरण की ओर बढ रहा है, जबकि पाकुड़ एक ऐसा जिला है जहां अनुपातिक रूप से कई गुणा अधिक माइनिंग होती है।

पाकुड़ के पत्थर उद्योग का एक दृश्य। फोटो : टिंकु।

 

पाकुड़ बीड़ी निर्माण के लिए मशहूर है। यहां मुसलिम के अलावा गैर मुसलिम समुदाय के लोग बड़ी संख्या में घरों में जाने-पहचाने बीड़ी ब्रांड के लिए बीड़ी बनाने का काम करते हैं। स्थानीय पत्रकार राम प्रसाद सिन्हा के अनुसार, जिले में ऐसे बीड़ी मजदूरों की संख्या 30 हजार से भी अधिक हो सकती है।

पत्थर और बीड़ी में रोजगार पाने के बाद यहां से बड़ी संख्या में खेतिहर मजदूर पश्चिम बंगाल खेती करने के लिए जाते हैं। मोटे अनुमान के अनुसार, 20 हजार के करीब लोग पश्चिम बंगाल के वीरभूम, मुर्शिदाबाद, बोलपुर आदि जगहों पर धान रोपने व काटने के लिए जाते हैं और इनमें से अधिसंख्य आदिवासी समुदाय के लोग होते हैं। वहां उन्हें भोजन, अनाज व नकदी तीनों मिल जाता है।

2011 की जनगणना के अनुसार, नौ लाख से कुछ अधिक की आबादी वाले पाकुड़ में आदिवासी वर्ग की संख्या 42.1 प्रतिशत है। इस जिले में रोजगार का कोई औपचारिक माध्यम नहीं है। नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया ने इसे ट्रांजिशन के दौर में देश के सबसे संवेदनशील जिलों में रखा है और झारखंड के दो अन्य जिलों रांची व पलामू के बाद यह तीसरा जिला है जो इस श्रेणी में आता है। एनएफआइ के अध्ययन आधार कोयला व उस पर आधारित उद्योग तीन प्रमुख उद्योग – पॉवर प्लांट, स्पंज आयरन व स्टील प्लांट हैं। पाकुड़ में इन तीनों में कोई इकाई नहीं है। यानी यहां चुनौतियां अधिक मुश्किल भरी होंगी।

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