अध्ययन रिपोर्टाें में एनर्जी ट्रांजिशन की चुनौतियां और पूर्व के अनुभवों से झारखंड के लिए सबक

एनर्जी ट्रांजिशन पर वैश्विक बहसें चल रही हैं। भारत में भी इसको लेकर तमाम तरह के सवाल हैं। एनर्जी ट्रांजिशन से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले राज्य झारखंड में इसका स्वरूप कैसा हो, क्या चुनौतियां हैं, इस पर हाल में आए विभिन्न अध्ययनों के कुछ प्रमुख बिंदुओं को समेटता यह आलेख…

झारखंड के बोकारो जिले के करगली क्षेत्र में एक बंद पड़ी कोल वाशरी। फोटो : राहुल सिंह, अक्टूबर 2021।

राहुल सिंह

दुनिया अगले चरण के एनर्जी ट्रांजिशन में प्रवेश कर चुकी है। यह इसका शुरुआती दौर है और यह विविध चरणों में 2050 या 2070 तक पूरा होगा। इस ट्रांजिशन से भारत का उत्तर पूर्वी क्षेत्र और उसमें भी झारखंड सबसे ज्याद प्रभावित होगा। एनएफआइ के नए अध्ययन के मुताबिक, झारखंड के 15 जिले कोयला के ट्रांजिशन से सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। एनर्जी या कोल ट्रांजिशन से देश के किसी भी सूबे में प्रभावित होने वाले जिलों की यह सबसे बड़ी संख्या है। झारखंड के लिए यह ट्रांजिशन पुराने कड़वे अनुभवों के मद्देनजर अधिक अहम होगा, रोजगार, सुरक्षित आजीविका, पुनर्वास और प्रदूषण जैसे मानकों पर। झारखंड के सामाजिक-आर्थिक-शैक्षणिक ताने-बाने व उसकी स्थिति को ध्यान में रखते हुए नीतियां तय करनी होंगी और इसमें चूक झारखंड को मौजूदा स्थिति से भी पीछे धकेल सकता है, जहां सेंटर फॉर स्ट्रेटजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (Center for Strategic and International Studies – CSIS) एवं क्लाइमेट इन्वेस्टमेंट फंड की साझा पहल जस्ट ट्रांजिशन इनिसिएटिव के लिए संदीप पई के नेतृत्व में एक टीम द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक, बेरोजगारी दर यहां भारत से दो प्रतिशत अधिक है, प्रति व्यक्ति जीडीपी भारत के जीडीपी (भारत का 1900 यूएस डॉलर-  झारखंड का 1173 यूएस डॉलर प्रतिवर्ष 2020 में) के दो तिहाई से भी कम है। वहीं, देश के कुल 779 मिट्रिक टन कोयला उत्पादन में 130 मिट्रिक टन की हिस्सेदारी झारखंड की है, जो कुल उत्पादन का 16.68 प्रतिशत हिस्सा है। वहीं, देश के कुल कोल पॉवर प्लांट क्षमता में इसकी हिस्सेदारी दो प्रतिशत से थोड़ी कम ही है। देश की क्षमता जहां 208 गीगावाट है, वहीं झारखंड की दो गीगावाट।

एनएफआइ ने हाल में एनर्जी ट्रांजिशन पर दो रिपोर्ट जारी की है। पहली रिपोर्ट के कुछ प्रमुख बिंदुओं को आप यहां पढ सकते हैं, जो भारत के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने के संबंध में है। एनएफआइ की दूसरी रिपोर्ट को ग्लोबल कोल ट्रांजिशन : पास्ट एंड प्रजेंट नाम दिया गया है। इस अध्ययन रिपोर्ट को एनएफआइ की स्वाति डिसूजा ने तैयार किया है, जो एनएफआइ में क्लामेट एक्शन लीड हैं।

अध्ययन यह इंगित करता है कि दुनिया ऊर्जा संक्रमण या एनर्जी ट्रांजिशन के अगले चरण में प्रवेश कर चुकी है। पहला ट्रांजिशन कोयला ऊर्जा का था, जो 1800 से 1920 तक चला। इसमें सीधे तौर पर कोयला ऊर्जा का प्रमुख स्रोत था। एनर्जी ट्रांजिशन का दूसरा चरण 1920 से 2050 तक चलेगा। यह चरण एशिया-अफ्रीका के कई ऊर्जा निर्धन क्षेत्रों में अब भी चल रहा है। इसमें बिजली और पेट्रोलियम ऊर्जा पर दुनिया निर्भर हो गयी। बिजली का उत्पादन मुख्यतः कोयले से हुआ, जिसके परिवहन में इससे पूर्व के चरण में दिक्कतें थीं।

ऊर्जा संक्रमण का तीसरा चरण पूरी तरह से 2051 तक शुरू हो जाएगा, जब दुनिया नवीकरणीय और ऐसे ऊर्जा स्रोतों पर निर्भर हो जाएगी जिससे इस सदी के अंत तक वैश्विक तापमान को 1.5 से 2.0 डिग्री सेल्सियस तक रखना संभव हो जाएगा।

ऊर्जा संक्रमण का दूसरा चरण जो 1920 से शुरू हुआ, जिसमें अत्यधिक खनन गतिविधियों के कारण देश के उत्तर पूर्वी राज्य सबसे अधिक प्रभावित हुए, जिसमें झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा व छत्तीसगढ शामिल हैं। देश की ऊर्जा का प्रमुख स्रोत होने के बावजूद पिछले 100 साल में यह इलाका मोटे तौर पर देश का सबसे गरीब हिस्सा
बना रहा और इसके लिए ट्रांजिशन प्रोग्राम को को व्यवस्थित ढंग से लागू नहीं करने को मुख्य वजह मानने के कई आधार व तर्क हैं। ट्रांजिशन का लाभ स्थानीय लोगों, वहां के मूल निवासियों को नहीं मिला, जो इस प्रक्रिया के शुरू होने से पहले वहां रह रहे थे, बल्कि उन्हें विस्थापन एवं प्रदूषण की मार झेलनी पड़ी।

रामगढ़ के भुरकुंडा में बंद पड़ी बलकुदरा कोयला खदान। फोटो : सुमित कुमार, अक्टूबर 2021।

 

कोयला से झारखंड को अबतक लाभ हुआ या नुकसान?


पर्यावरण पर काम करने वाली संस्था असर
से जुड़े पर्यावरण कार्यकर्ता मुन्ना कुमार झा तीसरे चरण के ट्रांजिशन की शुरुआत और झारखंड के सामने चुनौतियों के सवाल पर कहते हैं, “यहां लोग कोयला खनन से विस्थापित हुए हैं और अब एकेडमिक बातों से काम नहीं चलेगा। जब नए एनर्जी ट्रांजिशन में सोलर व अन्य ऊर्जा स्रोतों पर काम होगा तो स्थानीय लोग स्कील में पिछड़ जाएंगे”। मुन्ना कुमार झा कहते हैं, “जब तक सोशल जस्टिस के नजरिए से इस विषय को नहीं देखेंगे तबतक लाभ नहीं होगा”। वे कहते हैं कि खनन से विस्थापित लोगों से बात करें, संवाद करें, तो समझ पाएंगे कि वे इसे कैसे समझ-देख रहे हैं।

 

पयार्ववरण व एनर्जी ट्रांजिशन पर काम करने वाली संस्था सीड के सीइओ रामापति कुमार से हमने एनर्जी ट्रांजिशन को लेकर झारखंड की चुनौतियों से जुड़े सवाल पूछे, तो उन्होंने कहा, “आप सोचिए कोयला से झारखंड को अबतक नुकसान हुआ है या लाभ। यह प्रदेश देश का सबसे बड़ा कोयला आपूर्तिकर्ता (17 प्रतिशत) है, लेकिन यहां दो मात्र दो प्रतिशत बिजली उत्पादन होता है”।

रामापति कुमार कहते हैं, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लासगो में 2070 तक भारत के कार्बन न्यूट्रल बनने का लक्ष्य दिया है, यह थोड़ा लंबा है, लेकिन चलिए ठीक है, पर हम बिना काम किए कार्बन न्यूट्रल नहीं बन सकते हैं”। वे कहते हैं, “अत्यधिक उत्खनन से झारखंड जैसा हरित प्रदेश मरूस्थलीकरण की ओर बढ़ रहा है। यहां की खेती प्रभावित हो रही है, विस्थापन व गरीबी इसके कुप्रभाव हैं”। वे एक सीधा और बड़ा सवाल उछालते हैं कि कोयला से झारखंड को नुकसान हुआ है या फायदा?

कुमार किसी देश या प्रदेश की अर्थव्यवस्था के जीवाष्म ईंधन पर निर्भरता और उसके ट्रांजिशन का हवाला देते हुए कहते हैं, “70 के दशक में यूनाइटेड अरब अमीरात की अर्थव्यवस्था 50 प्रतिशत तक पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भर करती थी, लेकिन उसने खुद को बदला और पर्यटन पर ध्यान केंद्रित किया, आज वहां की अर्थव्यवस्था में पेट्रोलियम का योगदान मात्र नौ प्रतिशत है”।

रामापति कुमार कहते हैं, “यूएइ ने अपने संसाधनों के प्रयोग पर फोकस किया, झारखंड में ही ऐसा ही करना होगा। उनकी बातें को झारखंड के संदर्भ में रामगढ़ जिले को लेकर किए गए एक हालिया अध्ययन से भी समझा जा सकता है”।

आइ फॉरेस्ट के हाल के एक अध्ययन में यह बात सामने आयी है कि रामगढ़ जो कोयला खदानों के बंद होने से अत्यधिक प्रभावित जिलों में एक है, वहां की जीडीपी में कोयले का योगदान जैसे-जैसे कम हुआ है, वैसे-वैसे कृषि का योगदान बढा है।

देवघर के खून गांव में एक कोयला खदान से कोयला ले जाते श्रमिक, जो उनकी आजीविका का आधार है। फोटो : राहुल सिंह, अक्टूबर 2021।


जीडीपी में कोयला का हिस्सा घटा तो अन्य का बढा

चंद्र भूषण, श्रेष्ठा बनर्जी एवं श्रुति अग्रवाल द्वारा जस्ट ट्रांजिशन इन इंडिया : एन इन्क्वायरी इनटू द चैलेंजेज अपरट्यूनिटीज फॉर ए पोस्ट कोल फ्यूचर (Just Transition in India: An inquiry into the challenges and opportunities of a post-coal future) नाम से लिखी गयी इस रिपोर्ट में रामगढ जिले को एक केस स्टडी के रूप में लिया गया है। इस अध्ययन में कहा गया है कि 2015-16 रामगढ़ का वार्षिक कोयला उत्पादन 14 मिट्रिक टन था, जो 119-20 में घट कर 11 मिट्रिक टन हो गया। इस रिपोर्ट में सरकारी स्रोत से प्राप्त आकड़े बताते हैं कि जैसे-जैसे रामगढ़ जिले के कोयले का उत्पादन कम हुआ, वैसे-वैसे जीडीपी में उसका प्रतिशत घटता गया और अन्य सेक्टर का हिस्सा बढा। जैसे 2008-09 में कृषि क्षेत्र का रामगढ़ के जीडीपी में 5.5 प्रतिशत का हिस्सा था। 2018-19 में बढ़कर 8.1 प्रतिशत अनुमानित हो गया। वन उत्पादों की हिस्सेदारी इसी अवधि में 1.9 प्रतिशत से बढ कर 3.3 प्रतिशत हो गयी। मत्स्य पालन की हिस्सेदारी 0.4 प्रतिशत से बढ़कर 0.5 प्रतिशत हो गयी। वहीं, माइनिंग एवं क्वायरिंग सेक्टर की हिस्सेदारी इस 10 साल की अवधि में 21.3 प्रतिशत से घट कर 20.4 प्रतिशत हो गयी। ये उपक्षेत्र हैं जो रामगढ़ की जीडीपी के प्राथमिक क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं।

ट्रांजिशन की पुनर्कल्पना व उसे संदर्भ विशिष्ट बनाना जरूरी

अब एक बार फिर बात एनएफआइ के ग्लोबल कोल ट्रांजिशन रिपोर्ट की। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पूर्व में जर्मनी के रूहर (Ruhr, जिसे हिंदी में रूर भी लिखा जाता है)  और ग्रेट ब्रिटेन में कोल ट्रांजिशन अव्यवस्थित व जटिल रहा है। जर्मनी के कोयला उत्पादक क्षेत्र रूहर में ट्रांजिशन की प्रक्रिया को पूरा करने में छह दशक लगने के बाद भी उसके उत्तरी क्षेत्र में बेरोजगारी एक समस्या है। ब्रिटेन में 1920 में यह प्रक्रिया शुरू हुई और अब भी जारी है। स्थानीय समुदाय एवं खनन कंपनियों में प्रतिरोध, स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधियों व कंपनियों में मिलीभगत, राज्य की नीतियां और अप्रतिस्पर्धी कारोबार को सब्सिडी और सरकारी सहायता, आर्थिक व वित्तीय गिरावट को लेकर दूरदर्शिता की कमी, ऊपर से लेकर नीचे तक खंडित निर्णय लेने की प्रक्रिया, इन सबने संक्रमण प्रक्रिया को अवरुद्ध या बाधित किया।

भुरकुंडा के एक कोयला विस्थापित बस्ती के बच्चे, जहां बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। फोटो : राहुल सिंह, अक्टूबर 2021।

 

ट्रांजिशन को लागू करने में कार्य बल या श्रमिकों की शिक्षा के स्तर का विशेष ध्यान रखना होगा। इंटरनेशनल लेबर आर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट के अनुसार, 30 प्रतिशत श्रमिक बल अशिक्षित है, 52 प्रतिशत सेकेंडरी स्तर तक शिक्षित हैं, 7.2 प्रतिशत के पास सामान्य आकादमिक प्रशिक्षण है और मात्र तीन प्रतिशत के पास तकनीकी शिक्षा है। वहीं, भारत जैसे देश में 81 प्रतिशत कार्यबल अनौपचारिक क्षेत्र में रोजगार पा रहा है। यानी चुनौतियां जटिल हैं।

ऐसे में एनएफआइ की ग्लोबल कोल ट्रांजिशन रिपोर्ट में खुद के व इस विषय पर अन्य के अध्ययन के आधार पर सुझाव दिया गया है कि इसलिए विकासशील देशों को उचित ट्रांजिशन प्रोसेस यानी उचित संक्रमण प्रक्रिया की फिर से परिकल्पना करने की जरूरत है और स्थानीय और संदर्भ विशिष्ट बनाने की जरूरत है। जाहिर है, यह सुझाव झारखंड व इस जैसे कोयला उत्पादक राज्यों के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, जिसे केंद्र व राज्य को जिलों व स्थानीय समुदाय के साथ मिलकर लागू करना होगा।

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