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वे यह मानने को तैयार नहीं हैं कि अब जिंदगी कोयले के बिना चलानी होगी

बड़का सयाल क्षेत्र में रेल साइडिंग पर काम करते श्रमिक। Photo - Rahul Singh.

राहुल सिंह

जब हम झारखंड की राजधानी रांची से खूबसूरत पतरातू घाटी को पार करते हुए उससे नीचे उतरते हैं तो पॉवर प्लांट की चिमनियां किसी औद्योगिक कस्बे में होने का अहसास कराती हैं। यहां पतरातू थर्मल पॉवर स्टेशन है और उसकी एक दूसरी इकाई में भारत के सबसे बड़े थर्मल पॉवर प्लांट में एक (क्षमता 4000 मेगावाट) का तीव्र गति से निर्माण हो रहा है। यह एनटीपीसी और झारखंड सरकार के उपक्रम जेबीवीएनएल का संयुक्त उपक्रम है, जिसका बहुलांश एनटीपीसी के पास है। यहां सैकड़ों मजदूरों को काम करते हुए, सामान और अधिकारियों की गाड़ियों की भारी आवाजाही को देख कर यह सहज समझ आ जाता है कि सरकार ऊर्जा जरूरतों के मद्देनजर इस पॉवर प्लांट को पूरा कर लेने और उत्पादन को शुरू करने को लेकर कितनी जल्दबाजी में है। यह जीवाष्म ईधन आधारित विकास का एक मजबूत प्रतीक नजर आता है। लेकिन, उससे बामुश्किल आधा-पौने किलोमीटर आगे बढने पर परिदृश्य बदलता दिखने लगता है और कोयले के बिना वैकल्पिक आर्थिक ढांचे के अभाव में आजीविका के लिए जद्दोजहद करते लोगों से मुलाकात होती है।

पतरातू स्टेशन से आगे बढने पर दिखने वाला दृश्य।

 

निर्माणाधीन पॉवर प्लांट के आगे रेलवे लाइन को पार करने के साथ हरे झीने परदे से बड़े क्षेत्र में घिर कोयले का ढेर दिखता है और वहां खड़े दर्जनों वाहन जो उसकी ढुलाई का काम करते हैं। आगे भुरकुंडा है, जहां की सभी चार कोयला खदानें बंद हैं और इसकी अलग-अलग वजहें हैं। भुरकुंडा से आगे जिस रास्ते में बढेंगे कोयला ही कोयला दिखेगा, उस पर आधारित चालू या बंद संयंत्र दिखेंगे। और, दिखेंगी कहीं बंद पड़ी तो कहीं चालू खदानें, श्रमिक, बंद पड़ी वाशरी, कोयला अर्थव्यवस्था आधारित जिंदगी जीने के लिए जद्दोजहद करते लोग।

कोयला मजदर रामनरेश जो अब बेरोजगार हैं।

 

बड़का सयाल स्थित सीसीएल के एरिया ऑफिस के बाहर त्रिभुवन मांझी और रामनरेश से भेंट हुई। त्रिभुवन कोयला खदान में टाइगर खलासी का काम करते थे, लेकिन इन दिनों खदान बंद होने की वजह से वे चौकीदारी का काम करते हैं। उनकी नौकरी पक्की है, तो कोई दिक्कत नहीं है। वहीं, रामनरेश ने भी बताया कि वे कोयला खदान में काम करते थे, लेकिन फिलहाल बेरोजगार हैं।

त्रिभुवन मांझी ।

 

बड़का सयाल और भुरकुंडा के बीच कोयला रेक की दो रेल साइडिंग है। एक निजी कंपनी की और और दूसरी सीसीएल की। निजी कंपनी के रेलवे साइडिंग (जिसे सेंट्रल सौंदा साइडिंग भी कहते हैं) से पंजाब के नोवा पॉवर प्लांट के लिए कोयला भेजा जाता है। वहां झुंड में 9-10 की संख्या में युवा दिखे, जिन्होंने बताया कि वे लोग कोयला मजदूरों द्वारा पॉवर प्लांट के लिए कोयला तोड़े जाने की गुणवत्ता व उसकी लोडिंग की निगरानी करते हैं। अगर कोयला उचित साइज में नहीं टूटा तो प्लांट में परेशानी आ सकती है और इन लोगों तक उसकी शिकायत पहुंच जाती है।

कोयला उठाव की रेल साइडिंग।

 

सेंट्रल सौंदा साइडिंग के कैलाश नामक एक कर्मचारी ने बताया कि यहां 20 से 30 के बीच लोग काम करते हैं और उसके अलावा मजदूर हैं। यहीं कोयला तोड़ने का काम कर रहे एक मजदूर राजेश ने बताया कि इस काम से उसकी 200-250 रुपये की कमाई हर दिन होती है और इसके अलावा उसके पास यहां रोजगार का दूसरा विकल्प नहीं है। इन मजदूरों के फेफड़े में कोयला तोड़ने के दौरान उसका धूल समाता रहता है। इनके लिए मास्क या कोई अन्य रक्षात्मक प्रबंध नहीं होता।

कोयला से जुड़े सहायक कार्याें में 10 गुणा रोजगार

हजारीबाग के गिद्दी कोयला क्षेत्र के निवासी व 45 सालों से कोयला यूनियन में सक्रिय सीटू के प्रदेश अध्यक्ष मिथिलेश सिंह कहते हैं, “कोयला खदानों में चार तरह के श्रमिक काम करते हैं, लेकिन उनसे 10 गुणा अधिक ऐसे श्रमिक हैं, जो कोयला पर आजीविका के लिए निर्भर हैं। ये साइकिल कोयला मजदूर, कोयला को फोड़ा बनाकर बेचने वाले लोग व अन्य कई सहायक कार्याें से जुड़े हैं। इनके साथ दिक्कत यह है कि इनका कोई संगठन भी नहीं है और ये अपनी बात किसी माध्यम से न तो कह सकते हैं और न उठा सकते हैं”।

मिथिलेश सिंह कहते हैं, “डीएमएफटी और सीएसआर का उचित ढंग से उपयोग नहीं होता है और कोयला क्षेत्र में माइनिंग कंपनियों द्वारा चलाया जाने वाला वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर बहुत प्रभावी नहीं है”।

हजारीबाग के गिद्दी में बंद हो चुकी कोल वाशरी।

 

मिथिलेश सिंह अपने अनुभवों के आधार पर कहते हैं, “गिद्दी बासरी एक साल पहले बंद हो गयी जिससे 1000 लोग बेरोजगार हो गए, कोयला क्षेत्र में बदलाव हो रहा है, लेकिन लोग इसे मानने को तैयार नहीं हैं। उन्हें लगता है कि जिंदगी आगे भी कोयला से ही चलेगी”।

गिद्दी के स्थानीय पत्रकार अजय वर्मा कहते हैं, “कोयला आधारित अर्थव्यवस्था के कारण इस क्षेत्र में कई बदलाव हुए, उसकी आय से लोगों का जीवन व शिक्षा का स्तर ऊंचा हुआ, लेकिन अब चुनौतियां हैं”। वे कहते हैं, “सीसीएल के नियंत्रण वाली गिद्दी कोल वाशरी यह कह कर बंद किया गया कि वॉश किए कोयले की मांग नहीं है”। वे कहते हैं कोयला क्षेत्र में बहुत माल ढोने वाली गाड़ियां चलती हैं, उनका स्पेयर पार्ट स्थानीय स्तर पर खरीदा जाता था लेकिन अब उसका ई-ऑक्शन होता है।

गिद्दी के स्थानीय पत्रकार अजय वर्मा।

 

रामगढ़ में स्वयंसेवी संस्था अग्रगति के प्रमुख किरण शंकर दत्ता कृषि एवं उसमें नवीकरणीय ऊर्जाके प्रयोग के जरिए महिला किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के काम से जुड़े हैं। वे कहते हैं, “कोयला क्षेत्र में इंटीग्रेटेड प्लानिंग के बारे में सोचना चाहिए। लोगों के लिए कौशल विकास एवं रोजगार से जुड़े प्रशिक्षण होने चाहिए”।

सभी तसवीरें : राहुल सिंह।

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