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लता मंगेशकर : एक “छोटी-सी गायिका” जो भारतीय गानों और भारतीयता की सशक्त प्रतीक बन गयीं…

राहुल

जिन विषयों की ज्यादा समझ न हो अगर उससेजुड़ी किसी शख्सियत पर बार-बार लिखने को मन उमड़ रहा हो तो व्यक्तित्व के चुुंबकत्व व प्रभाव को समझा जा सकता है। एक बेहद सामान्य श्रोता होने के अलावा मुझे संगीत की कोई समझ नहीं है और ऐसे विषयों पर कभी लिखने की कोशिश नहीं की, लेकिन बात अगर लता दीदी की हो तो बार-बार टालने की कोशिश के बावजूद मन मानने को तैयार नहीं है। और, यह उन्हें एक श्रद्धांजलि भर है।

 

हमें यह ठीक से याद भी नहीं है कि हमने लता मंगेशकर या लता दीदी का नाम बालपन में पहली बार कब सुना था। वह जमाना हाथ में टंगे रेडियो का था, जिसे लोग गलियों में घर के दलान पर, गांव में खुली जगह पर हाथ में लेकर या खेत के मेड़ पर बैठ कर सुना करते थे; और उसके तीन ही उपयोग थे, पहला समाचार सुनना, दूसरा क्रिकेट या ऐसे अति लोकप्रिय खेलों की कमेंट्री सुननी और तीसरा हिंदी फिल्मों के सदाबहार गाने सुनना। और हां, वह दौर टेप रिकार्डर का भी था।

शायद, तभी हमने लता दीदी का पहली बार नाम सुना होगा। तब उद्घोषक खुद यह बताते कि यह आवाज लता मंगेशकर की है या फिर लोग यह कहते – वाह, लता की आवाज है। जब हम बड़े हुए तो एक रेडियो हमने बीबीसी हिंदी सेवा, समाचार और गाने सुनने के लिए रख लिया था, जिस पर धीमी आवाज में अक्सर रात में हिंदी गाने सुनते हुए कब नींद आ जाती, पता नहीं चलता और फिर आधी रात में उठने पर उसे बंद करते। उनमें कई गाने लता दीदी के होते थे और शायद सुकून भरी नींद उसी वजह से आती थी।

लता मंगेशकर का एक वीडियो है उनके ट्विटर एकाउंट पर इस साल के एक जनवरी को पोस्ट किया गया, जिसमें वे अपने पूज्य पिता दीनानाथ मंगेशकर को याद करते हुए खुद को एक छोटी गायिका बताती हैं। उनका खुद का यह भाव उनको “बड़ा” माने जाने की अहम वजहों में एक है। वे कहती हैं, “उनके पूज्य पिताजी इतनी बड़ी दुनिया में हमें अकेला छोड़ कर चले गए, लेकिन मैंने उन्हें हमेशा ही अपने पास पाया, कई बार लगा कि वे मेरे पास बैठे हैं, मुझे गाना सीखा रहे हैं। वे कहती हैं कि अगर मुझे कभी किसी बात का डर लगता था तो वे मेरे सिर पर हाथ रख कर कह रहे होते थे – डरो नहीं लता, मैं हूं। इसी तरह हमारे 50 वर्ष गुजरे हैं, अगर वे हमारे पास नहीं होते तो सोचिए क्या मुझ जैसी बहुत छोटी-सी गायिका, उसे इतनी शोहरत-इज्जत मिलती। मुझे नहीं लगता! यह उनका आशीर्वाद है जो आज मुझे इतना नाम मिला है”।

लता मंगेशकर के पिता संगीतकार, गायक व मराठी थिएटर अभिनेता दीनानाथ मंगेशकर की जयंती 29 दिसंबर हो होती है। उस मौके पर भी वे अपने व परिवार की ओर से उनसे आशीर्वाद मांगती हैं। लता मंगेशकर इस साल की शुरुआत पर सभी को मंगलकामनाएं देते हुए कामना करती हैं कि कोरोना के संकट से पूरी दुनिया को मुक्ति मिले।

लता मंगेशकर ने पिछले ही साल 16 दिसंबर को अपनी गायिकी की 80वीं वर्षगांठ भी अपने अंदाज में मनायी थी। उन्होंने एक ट्वीट किया था, 16 दिसंबर 1941 को ईश्वर का पूज्य माई और बाबा का आशीर्वाद लेकर मैंने रेडियो के लिए पहली बार स्टूडियो में 2 गीत गाए थे। आज इस बात को 80 साल पूरे हो रहे हैं। इन 80 सालों में मुझे जनता का असीम प्यार और आशीर्वाद मिला है। मुझे विश्वास है की आपका प्यार, आशीर्वाद मुझे हमेशा यूँ ही मिलता रहेगा।

लता मंगेशकर अपने गायन, विचार व व्यवहार से भारतीयता की सच्ची प्रतीक थीं, हैं और रहेंगी। अभिनेता दिलीप कुमार और मशहूर गायक मुकेश के साथ उनका भाई-बहन का रिश्ता था। दिलीज साहब के लिए वे यूसुफ भाई संबोधन का प्रयोग करती थीं तो मुकेश कुमार के लिए मुकेश भैया का। दिलीप कुमार ही वह शख्स थे जिनकी प्रेरणा से उन्होंने उर्दू शिक्षक रख कर यह भाषा सीखी ताकि अपने गायन में अधिक मिठास घोल सकें। वे आरडी बर्मन से छोटे-सा स्नेह रखतीं तो उनके पिता एसडी बर्मन के प्रति पिता-सा सम्मान। वे मीना कुमारी व केएल सहगल की प्रशंसक थीं।

लता मंगेशकर ने कहा था, “लोग मुझे ऐसे याद करें कि मैंने कभी किसी का बुरा सोचा नहीं, किसी का बुरा किया नहीं और अपने गाने के जरिए देश की सेवा करने की कोशिश की; कितनी की, वो मुझ मालूम नहीं, क्योंकि मैं फिल्मों में गाती हूं, पर इसके अलावा मैं बता नहीं सकती हूं, इच्छा बहुत है”।