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                <title>समाज - Samridh Jharkhand</title>
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                <description>समाज RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>सोशल मीडिया और भारतीय युवा: अवसरों के साथ बढ़ती चुनौतियाँ</title>
                                    <description><![CDATA[भारत का युवा वर्ग तेजी से डिजिटल दुनिया से जुड़ रहा है। स्मार्टफोन और इंटरनेट की बढ़ती पहुंच ने सोशल मीडिया को युवाओं के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया है। इससे शिक्षा, रोजगार, कौशल विकास और उद्यमिता के नए अवसर मिले हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/social-media-and-indian-youth-opportunities-and-growing-challenges/article-23058"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/811f309c-b5e8-4fe6-b012-7dbb3f56a036_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में से एक है। डिजिटल क्रांति ने युवाओं के जीवन, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक संबंधों को गहराई से प्रभावित किया है। स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट की उपलब्धता ने सोशल मीडिया को युवाओं की दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बना दिया है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, व्हाट्सएप और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म आज संचार और मनोरंजन के प्रमुख माध्यम बन चुके हैं।</p>
<p>भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा वर्ष 2025 में जारी "कॉम्प्रिहेन्सिव मॉड्यूलर सर्वे : टेलीकॉम" के अनुसार 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 97 प्रतिशत युवाओं ने पिछले तीन महीनों में मोबाइल फोन का उपयोग किया, जबकि लगभग 94 प्रतिशत युवाओं ने इंटरनेट का उपयोग किया। सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि इस आयु वर्ग के मोबाइल धारकों में 95 प्रतिशत से अधिक के पास स्मार्टफोन उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त देश के 85.5 प्रतिशत परिवारों के पास कम से कम एक स्मार्टफोन तथा 86.3 प्रतिशत परिवारों के पास इंटरनेट सुविधा उपलब्ध है।</p>
<p>इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि भारत का युवा वर्ग तेजी से डिजिटल दुनिया से जुड़ रहा है। सोशल मीडिया ने शिक्षा, सूचना, कौशल विकास और उद्यमिता के नए अवसर प्रदान किए हैं। अनेक युवा ऑनलाइन माध्यमों से रोजगार, व्यवसाय और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।<br />हालाँकि इसके कुछ नकारात्मक प्रभाव भी सामने आ रहे हैं। अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग के कारण युवाओं में तनाव, चिंता, अवसाद, आत्म-सम्मान में कमी और सामाजिक तुलना जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। कई युवा वास्तविक जीवन की अपेक्षा आभासी दुनिया में अधिक समय बिताने लगे हैं। लाइक्स, कमेंट्स और फॉलोअर्स की होड़ उन्हें मानसिक दबाव की ओर धकेल सकती है।</p>
<p>शिक्षा के क्षेत्र में भी इसका प्रभाव देखा जा रहा है। पढ़ाई के दौरान बार-बार मोबाइल देखना, रील्स और शॉर्ट वीडियो में समय व्यतीत करना तथा एकाग्रता में कमी विद्यार्थियों के शैक्षणिक प्रदर्शन को प्रभावित कर रही है। वहीं साइबर बुलिंग, फेक न्यूज़ और ऑनलाइन धोखाधड़ी जैसी समस्याएँ भी युवाओं के सामने गंभीर चुनौती बनकर उभरी हैं।</p>
<p>सामाजिक दृष्टि से भी स्थिति चिंताजनक है। ऑनलाइन मित्रों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन परिवार और समाज के साथ प्रत्यक्ष संवाद कम होता जा रहा है। इससे अकेलेपन और सामाजिक अलगाव की भावना विकसित हो सकती है। इसके अतिरिक्त देर रात तक मोबाइल उपयोग करने से नींद की गुणवत्ता प्रभावित होती है, जिससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।<br />सोशल मीडिया को समस्या नहीं, बल्कि एक साधन के रूप में देखना चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि युवा इसका उपयोग संतुलित और जिम्मेदारीपूर्ण ढंग से करें। अभिभावकों, शिक्षकों और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों को युवाओं में डिजिटल साक्षरता, समय प्रबंधन और स्वस्थ ऑनलाइन व्यवहार को बढ़ावा देना चाहिए।</p>
<p>भारत का भविष्य उसके युवाओं पर निर्भर करता है। यदि सोशल मीडिया का उपयोग ज्ञान, कौशल और सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन के लिए किया जाए तो यह राष्ट्र निर्माण का सशक्त माध्यम बन सकता है। लेकिन यदि इसका उपयोग अनियंत्रित रूप से किया गया, तो इसके दुष्परिणाम व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर गंभीर हो सकते हैं। इसलिए डिजिटल युग में संतुलन, जागरूकता और आत्म-अनुशासन ही सफलता की कुंजी हैं।</p>
<p><strong>राममूरत उपाध्याय</strong><br /><strong>शोधार्थी समाज कार्य विभाग </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 15:25:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>डिजिटल ठगी का नया चेहरा: जब बैंकिंग व्यवस्था बन जाती है हथियार</title>
                                    <description><![CDATA[रांची में पकड़े गए कथित साइबर गिरोह ने एक बार फिर डिजिटल बैंकिंग सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गोंडा थाना क्षेत्र के एक फ्लैट से बरामद दर्जनों पासबुक, डेबिट कार्ड, चेकबुक और फर्जी पहचान पत्र इस बात का संकेत हैं कि साइबर अपराध अब केवल फोन कॉल या ओटीपी ठगी तक सीमित नहीं रहा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/digital-fraud-new-face-fake-kyc-cyber-crime-ranchi-network/article-22717"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/986bca7e-0404-43f8-b08b-007456062cf7_samridh_1200x720-(1).jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>आलोक वर्मा</strong></p>
<p>साइबर अपराध का जिक्र होते ही ज़ेहन में अक्सर एक ही तस्वीर उभरती है — कोई अनजान नंबर से फोन आता है, 'बैंक अधिकारी' बनकर OTP मांगी जाती है और खाता खाली हो जाता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस अपराध ने एक ऐसा रूप धारण कर लिया है, जो न केवल ज़्यादा परिष्कृत है, बल्कि उसकी जड़ें बैंकिंग व्यवस्था की बुनियाद तक पहुंच चुकी हैं।</p>
<p>झारखंड की राजधानी रांची से हाल ही में सामने आए एक मामले ने इस खतरे को एक बार फिर उजागर किया है। पुलिस ने गोंडा थाना क्षेत्र के एक साधारण से अपार्टमेंट पर छापा मारा और पांच संदिग्धों को गिरफ्तार किया। बाहर से यह एक सामान्य किराये का फ्लैट लग रहा था, लेकिन भीतर एक सुव्यवस्थित साइबर अपराध नेटवर्क का अड्डा चल रहा था। मौके से बरामद सामग्री ने जांचकर्ताओं को भी चौंका दिया: दर्जनों पासबुक, डेबिट कार्ड, चेकबुक, मोबाइल फोन और अलग-अलग नामों के पहचान दस्तावेज़।</p>
<p>यह सब क्या था? यह था एक सोची-समझी रणनीति का परिणाम, जिसमें फर्जी दस्तावेज़ों के सहारे अलग-अलग नामों से बैंक खाते खुलवाए गए और फिर उन्हें साइबर ठगी से प्राप्त धनराशि के लेनदेन का माध्यम बनाया गया।</p>
<h3><strong>केवाईसी: रक्षा कवच या कमज़ोर कड़ी?</strong></h3>
<p>'नो योर कस्टमर' यानी केवाईसी — बैंकिंग की वह प्रक्रिया, जिसे किसी भी खाताधारक की पहचान सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। नीयत थी जालसाज़ी रोकना, लेकिन विडंबना यह है कि आज यही प्रक्रिया अपराधियों के निशाने पर है।</p>
<p>जब कोई व्यक्ति नकली आधार कार्ड, जाली पैन कार्ड या किसी दूसरे की चुराई हुई जानकारी से बैंक खाता खुलवाता है, तो उसे 'KYC फ्रॉड' कहा जाता है। और यही खाते फिर साइबर अपराध की रीढ़ बन जाते हैं। उनमें ठगी का पैसा जमा होता है, एक से दूसरे में ट्रांसफर होता है और अंततः असली अपराधी तक पहुंचते-पहुंचते लेन-देन की परतें इतनी उलझ जाती हैं कि जांच एजेंसियां भी भटक जाती हैं।</p>
<p>"ये खाते डिजिटल मनी लॉन्ड्रिंग के 'मनी म्यूल' हैं, जिनके ज़रिए अपराध की कमाई को वैध रूप देने की कोशिश होती है। जितने ज़्यादा खाते, उतनी ज़्यादा परतें और उतनी ही मुश्किल जांच।"</p>
<h4><strong>वीडियो केवाईसी की चुनौती: आंखें देखती हैं, कैमरा धोखा खाता है</strong></h4>
<p>डिजिटल बैंकिंग के युग में पहचान सत्यापन के लिए वीडियो-आधारित केवाईसी का चलन बढ़ा है। बैंक और वित्तीय संस्थान अब ग्राहक को पलक झपकाने, सिर घुमाने या मुस्कुराने जैसी 'लाइवनेस जांच' के जरिये यह सुनिश्चित करने की कोशिश करते हैं कि सामने असली इंसान है, कोई रिकॉर्डेड वीडियो नहीं। लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यह प्रणाली पर्याप्त परिष्कृत न हो, तो उसे भी चकमा दिया जा सकता है।</p>
<p>यही कारण है कि अब 'एडवांस्ड लाइवनेस चेक' तकनीकों का विकास तेज़ी से हो रहा है, जो केवल हावभाव नहीं, बल्कि गहरे बायोमेट्रिक संकेतों को परखती हैं। रांची प्रकरण जैसे मामले इस तकनीकी दौड़ में और तेज़ी की मांग करते हैं।</p>
<h4><strong>संगठित नेटवर्क, बिखरे हुए सुराग</strong></h4>
<p>30 से ज़्यादा वर्षों की पत्रकारिता में मैंने विभिन्न आपराधिक घटनाओं को कवर करते हुए यह समझा है कि संगठित अपराध हमेशा व्यवस्था की सबसे कमज़ोर कड़ी को निशाना बनाता है। रांची का यह गिरोह भी वैसा ही था — एक किराये के मकान में बैठकर देशभर में फैले पीड़ितों के बैंक खातों पर हाथ साफ करना।</p>
<p>जांच एजेंसियां अब वित्तीय लेन-देन की श्रृंखला का विश्लेषण कर यह पता लगाने में जुटी हैं कि नेटवर्क में और कितने लोग शामिल थे, धनराशि किन-किन खातों से होकर गुज़री और अंतिम लाभार्थी तक वह किस रास्ते पहुंची। यह एक जटिल डिजिटल जासूसी है, जिसमें हर लेन-देन एक सुराग है।</p>
<h4><strong>नागरिक सावधान: आपकी जागरूकता ही आपकी सुरक्षा है</strong></h4>
<p>तकनीकी और कानूनी उपायों के साथ-साथ आम नागरिक की सतर्कता केवाईसी फ्रॉड के खिलाफ सबसे कारगर हथियार है। कुछ बातें हमेशा याद रखें:</p>
<p>आधार, पैन या बैंक स्टेटमेंट जैसे दस्तावेज़ कभी भी किसी अनजान व्यक्ति या अनधिकृत प्लेटफॉर्म पर साझा न करें। सोशल मीडिया और व्हाट्सएप पर इनकी तस्वीर भेजना भी जोखिम भरा हो सकता है। केवाईसी अपडेट के लिए हमेशा बैंक की आधिकारिक वेबसाइट, ऐप या शाखा का ही उपयोग करें — किसी कॉल या लिंक के आधार पर नहीं। अपने खाते की हर गतिविधि पर नज़र रखें। बैंकिंग अलर्ट चालू रखें और कोई भी अज्ञात लेन-देन दिखे, तो तुरंत बैंक और साइबर हेल्पलाइन (1930) को सूचित करें।</p>
<h4><strong>व्यवस्था की ज़िम्मेदारी</strong></h4>
<p>रांची प्रकरण यह भी याद दिलाता है कि बैंकों और वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही कम नहीं होनी चाहिए। फर्जी दस्तावेज़ों पर खाते खुलना यह दर्शाता है कि केवाईसी प्रक्रिया में कहीं न कहीं चूक हुई है। नियामक संस्थाओं को चाहिए कि वे डिजिटल सत्यापन के मानक कड़े करें, बैंक कर्मचारियों को संदिग्ध दस्तावेज़ों की पहचान के लिए बेहतर प्रशिक्षण दें और 'मनी म्यूल' खातों की पहचान के लिए AI-आधारित लेन-देन निगरानी तंत्र को मज़बूत करें।</p>
<p>डिजिटल भारत का सपना तभी साकार होगा, जब डिजिटल सुरक्षा उतनी ही मज़बूत हो। रांची में पकड़ा गया कथित गिरोह उस बड़े सच की छोटी-सी झलक है कि साइबर अपराध अब कमरे में बंद नहीं है, वह </p>
<p>बैंकिंग व्यवस्था की नसों में दौड़ रहा है। इसे रोकने के लिए तकनीक, कानून और नागरिक जागरूकता — तीनों का एक साथ होना जरूरी </p>
<p>है।</p>
<p><img class="xhtitgo xh8yej3 x5yr21d _ao3e" src="https://media-ccu2-2.cdn.whatsapp.net/v/t61.24694-24/696498940_1495975811912113_3080514701079527125_n.jpg?ccb=11-4&amp;oh=01_Q5Aa4gHuCqCDLT2NJTG6y4sUP-0u7SpMtD5k4klAD3nJl9ycdw&amp;oe=6A2E50D6&amp;_nc_sid=5e03e0&amp;_nc_cat=108" alt="" width="107" height="107"></img><strong>लेखक- आलोक वर्मा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 04 Jun 2026 14:46:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Article: कागज़ों में कैद नागरिक: पहचान, अधिकार और भारतीय लोकतंत्र का बदलता चेहरा</title>
                                    <description><![CDATA[यह आलेख भारत में नागरिक पहचान, दस्तावेज़ीकरण और डिजिटल प्रशासन के बढ़ते प्रभाव पर एक गहरी सामाजिक और लोकतांत्रिक बहस प्रस्तुत करता है। आधार, KYC, बायोमेट्रिक सत्यापन और विभिन्न प्रमाण पत्रों की अनिवार्यता ने आम नागरिक के जीवन को जटिल बना दिया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/kagazon-mein-citizen-identity-democracy-analysis-india/article-22370"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/image-(17)_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><div class="qMYqUG_convSearchResultHighlightRoot">
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<p><strong><em>आलेख — राजकुमार अग्रवाल</em></strong></p>
<p>भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है। संविधान हर नागरिक को समानता, स्वतंत्रता, गरिमा और जीवन जीने का अधिकार देता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में आम भारतीय नागरिक के जीवन का एक बड़ा हिस्सा कागज़ों, प्रमाण पत्रों, बायोमेट्रिक सत्यापन, डिजिटल पहचान और सरकारी प्रक्रियाओं में उलझता चला गया है। आज भारत का नागरिक अपने अस्तित्व को साबित करने के लिए बार-बार सरकार के सामने खड़ा दिखाई देता है। वह जन्म लेता है तो जन्म प्रमाण पत्र चाहिए, स्कूल जाता है तो आधार चाहिए, मोबाइल लेना है तो बायोमेट्रिक चाहिए, बैंक खाता खोलना है तो केवाईसी चाहिए, शादी करनी है तो विवाह प्रमाण पत्र चाहिए, यात्रा करनी है तो पहचान पत्र चाहिए, जमीन खरीदनी है तो दर्जनों दस्तावेज चाहिए, सरकारी योजना लेनी है तो हर महीने जीवित होने का प्रमाण चाहिए।</p>
<p>यह स्थिति केवल प्रशासनिक व्यवस्था का विस्तार नहीं रह गई है, बल्कि धीरे-धीरे नागरिक और राज्य के बीच अविश्वास का प्रतीक बनती जा रही है। सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में नागरिक सरकार के लिए बना है या सरकार नागरिकों के लिए? क्या किसी व्यक्ति की पहचान केवल कागज़ों और बायोमेट्रिक डेटा से तय होगी? क्या इंसान की गरिमा से बड़ा कोई दस्तावेज हो सकता है?</p>
<h3><strong>पहचान का संकट: नागरिक या दस्तावेज?</strong></h3>
<p>भारत में आज एक सामान्य नागरिक के पास कई प्रकार के पहचान पत्र होते हैं—आधार कार्ड, वोटर कार्ड, राशन कार्ड, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट, परिवार पहचान पत्र, जन्म प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र, बैंक पासबुक, बिजली बिल, गैस कनेक्शन, स्वास्थ्य कार्ड और न जाने कितने अन्य दस्तावेज।</p>
<p>विडंबना यह है कि इनमें से कोई भी दस्तावेज हर जगह मान्य नहीं होता। एक विभाग कहता है आधार लाओ, दूसरा कहता है राशन कार्ड चाहिए, तीसरा कहता है परिवार पहचान पत्र जरूरी है, चौथा कहता है केवल पासपोर्ट चलेगा। नागरिक की पहचान कभी पूरी नहीं मानी जाती।</p>
<p>यह स्थिति केवल तकनीकी अव्यवस्था नहीं है, बल्कि प्रशासनिक सोच का परिणाम है, जिसमें नागरिक को हमेशा “संदेह” की नजर से देखा जाता है। सरकारें मानकर चलती हैं कि व्यक्ति गलत जानकारी दे सकता है, इसलिए हर कदम पर प्रमाण मांगो, सत्यापन कराओ, बायोमेट्रिक लो, फोटो लो, हस्ताक्षर मिलाओ, फाइल बनाओ और नागरिक को दफ्तर-दफ्तर भटकाओ।</p>
<p>एक गरीब मजदूर, किसान, विधवा महिला या बुजुर्ग व्यक्ति के लिए यह प्रक्रिया किसी यातना से कम नहीं होती। वह सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाता है, साइबर कैफे में पैसे खर्च करता है, लाइन में खड़ा रहता है और अंत में अक्सर सुनता है—“सिस्टम डाउन है, कल आना।”</p>
<h3><strong>डिजिटल इंडिया: सुविधा या नया बोझ?</strong></h3>
<p>डिजिटल इंडिया का विचार सुनने में आकर्षक लगता है। सरकार ने दावा किया कि डिजिटल तकनीक भ्रष्टाचार कम करेगी, पारदर्शिता बढ़ाएगी और लोगों को सुविधा देगी। लेकिन जमीनी सच्चाई अलग दिखाई देती है।</p>
<p>आज गांवों में लाखों लोग ऐसे हैं, जिनके पास स्मार्टफोन नहीं है। इंटरनेट की गुणवत्ता खराब है। बुजुर्गों को तकनीक समझ नहीं आती। पढ़े-लिखे लोग भी कई बार ऑनलाइन पोर्टल और ऐप्स की जटिलता से परेशान हो जाते हैं।</p>
<p>सरकारें मान बैठी हैं कि हर नागरिक डिजिटल रूप से सक्षम है, लेकिन भारत की वास्तविकता यह नहीं है। यहां अभी भी करोड़ों लोग ऐसे हैं, जो ऑनलाइन फॉर्म भरने, ऐप डाउनलोड करने, ओटीपी डालने और दस्तावेज अपलोड करने की प्रक्रिया से डरते हैं।</p>
<p>डिजिटल इंडिया का सपना तब तक अधूरा रहेगा, जब तक तकनीक इंसान के लिए सरल नहीं बनती। अगर तकनीक नागरिक को और अधिक परेशान करे, तो वह सुविधा नहीं बल्कि नया बोझ बन जाती है।</p>
<h3><strong>आधार और बायोमेट्रिक का जाल</strong></h3>
<p>आधार कार्ड को शुरू में केवल एक पहचान परियोजना बताया गया था। बाद में धीरे-धीरे इसे हर चीज से जोड़ दिया गया—बैंक खाते, मोबाइल नंबर, राशन, पेंशन, छात्रवृत्ति, गैस सब्सिडी, स्कूल दाखिला, अस्पताल और यहां तक कि मृत्यु प्रमाण पत्र तक।</p>
<p>आज स्थिति यह है कि अगर किसी व्यक्ति का फिंगरप्रिंट मशीन में मैच नहीं हुआ, तो उसका राशन रुक सकता है। बुजुर्गों के अंगूठे कई बार मशीन नहीं पहचानती। मजदूरों के हाथों की रेखाएं मिट जाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट नहीं चलता। लेकिन सिस्टम कहता है—“ऑथेंटिकेशन फेल।”</p>
<p>सवाल यह है कि क्या किसी इंसान का जीवन एक मशीन के सफल या असफल होने पर निर्भर होना चाहिए?</p>
<p>तकनीक का उद्देश्य इंसान की मदद करना होना चाहिए, न कि इंसान को मशीन के सामने असहाय बना देना।</p>
<h3><strong>नाम पर भी नियंत्रण?</strong></h3>
<p>भारतीय समाज में नाम केवल पहचान नहीं होता, वह संस्कृति, परिवार, परंपरा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा होता है। लेकिन आज नाम बदलना भी एक कठिन प्रशासनिक प्रक्रिया बन चुका है।</p>
<p>कई राज्यों में स्कूल रिकॉर्ड, आधार, परिवार पहचान पत्र, बैंक खाते और अन्य दस्तावेजों में नाम की छोटी सी गलती सुधारने में महीनों नहीं, बल्कि वर्षों लग जाते हैं।</p>
<p>हरियाणा जैसे राज्यों में पुराने रिकॉर्ड बदलवाना लगभग असंभव माना जाता है। जिन लोगों के नाम 1970 या 1980 के दशक में स्कूलों में गलत दर्ज हो गए थे, वे आज तक सुधार के लिए संघर्ष कर रहे हैं।</p>
<p>लोकतंत्र में किसी व्यक्ति को अपने नाम, पहचान और निजी जीवन पर अधिकार होना चाहिए। लेकिन जब एक नागरिक अपने ही नाम में बदलाव नहीं करवा पाता, तब यह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं रहती, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रश्न में बदल जाती है।</p>
<h3><strong>हरियाणा की “जीवंत प्रमाण” व्यवस्था और महिलाओं का अपमान</strong></h3>
<p>हरियाणा सरकार की दीन दयालु लाडो लक्ष्मी योजना ने एक गंभीर बहस को जन्म दिया है। योजना के तहत आर्थिक सहायता पाने वाली महिलाओं से हर महीने “जीवित होने का प्रमाण” मांगा जा रहा है। मोबाइल पर संदेश भेजे जाते हैं, जिनमें महिलाओं से अपनी फोटो अपलोड करने को कहा जाता है, ताकि वे साबित कर सकें कि वे जीवित हैं।</p>
<p>यह केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं है। यह एक सामाजिक और मानवीय प्रश्न है।</p>
<p>एक ओर सरकार महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की बात करती है, दूसरी ओर उन्हीं महिलाओं से हर महीने जिंदा होने का सबूत मांगती है।</p>
<p>ग्रामीण क्षेत्रों में हजारों महिलाएं ऐसी हैं, जिनके पास स्मार्टफोन नहीं है। उन्हें साइबर कैफे या दूसरों के मोबाइल पर निर्भर रहना पड़ता है। कई महिलाएं तकनीकी जानकारी के अभाव में योजना से वंचित हो सकती हैं।</p>
<p>सवाल यह भी है कि जब बुजुर्ग पेंशन, विधवा पेंशन और अन्य योजनाओं में हर महीने ऐसा प्रमाण नहीं मांगा जाता, तो केवल महिलाओं के लिए यह व्यवस्था क्यों?</p>
<p>आर्थिक सहायता देना स्वागत योग्य कदम हो सकता है, लेकिन सहायता के बदले किसी नागरिक की गरिमा को ठेस पहुंचाना लोकतांत्रिक संवेदनशीलता नहीं कहलाता।</p>
<h3><strong>सरकारी अविश्वास की राजनीति</strong></h3>
<p>भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में एक गहरी मानसिकता दिखाई देती है—नागरिक पर भरोसा मत करो।</p>
<p>अगर कोई व्यक्ति पेंशन ले रहा है, तो उससे बार-बार जीवित होने का प्रमाण मांगो। अगर कोई किसान सब्सिडी चाहता है, तो उससे कई प्रमाण पत्र मांगो। अगर कोई छात्र छात्रवृत्ति चाहता है, तो उसकी पहचान, आय, निवास, जाति और बैंक खाते का बार-बार सत्यापन करो।</p>
<p>सरकारें यह भूल जाती हैं कि हर अतिरिक्त दस्तावेज गरीब व्यक्ति के लिए अतिरिक्त बोझ होता है।</p>
<p>जिस देश में करोड़ों लोग रोज कमाकर खाते हैं, वहां बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाना आर्थिक और मानसिक दोनों प्रकार का उत्पीड़न बन जाता है।</p>
<h3><strong>क्या नागरिक की स्वतंत्रता घट रही है?</strong></h3>
<p>भारतीय संविधान व्यक्ति को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। लेकिन आज नागरिक का जीवन लगातार निगरानी, सत्यापन और डेटा संग्रह के दायरे में आ रहा है।</p>
<p>मोबाइल नंबर से लेकर बैंक खाते तक, यात्रा से लेकर खरीदारी तक, लगभग हर गतिविधि किसी न किसी डिजिटल रिकॉर्ड में दर्ज हो रही है।</p>
<p>सरकारें इसे सुरक्षा और पारदर्शिता का नाम देती हैं। लेकिन लोकतंत्र में सबसे बड़ा सवाल हमेशा यह होता है—राज्य की शक्ति की सीमा क्या होनी चाहिए?</p>
<p>अगर सरकार नागरिक के हर कदम पर निगरानी रखे, हर सुविधा के बदले पहचान मांगे और हर अधिकार को कागजी प्रक्रिया से जोड़ दे, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे नियंत्रण तंत्र में बदल सकता है।</p>
<h3><strong>संघीय ढांचा और अलग-अलग राज्यों की समस्याएं</strong></h3>
<p>भारत एक संघीय लोकतंत्र है। अलग-अलग राज्यों की अपनी प्रशासनिक व्यवस्थाएं हैं। लेकिन लगभग हर राज्य में नागरिक दस्तावेजों और सत्यापन की समस्याओं से जूझ रहा है।</p>
<p><strong>उत्तर प्रदेश:</strong> जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र और आय प्रमाण पत्र के लिए लंबी प्रक्रियाएं आम शिकायत हैं।</p>
<p><strong>बिहार:</strong> भूमि रिकॉर्ड और पहचान दस्तावेजों में त्रुटियां वर्षों तक लोगों को परेशान करती हैं।</p>
<p><strong>राजस्थान:</strong> डिजिटल सेवाओं के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीकी पहुंच सीमित है।</p>
<p><strong>पंजाब:</strong> भूमि रजिस्ट्रेशन और राजस्व रिकॉर्ड में देरी आम समस्या है।</p>
<p><strong>महाराष्ट्र:</strong> शहरी क्षेत्रों में ऑनलाइन सिस्टम होने के बावजूद कई सेवाओं में दस्तावेजों की पुनरावृत्ति होती है।</p>
<p><strong>हरियाणा:</strong> परिवार पहचान पत्र, सामाजिक योजनाओं और दस्तावेज सत्यापन की जटिलता लगातार विवाद का विषय रही है।</p>
<p>इससे स्पष्ट है कि समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। यह पूरे प्रशासनिक ढांचे की सोच से जुड़ा मुद्दा है।</p>
<h3><strong>गरीब सबसे ज्यादा क्यों परेशान होता है?</strong></h3>
<p>एक अमीर व्यक्ति एजेंट रख सकता है, वकील कर सकता है, निजी सुविधा ले सकता है। लेकिन गरीब व्यक्ति के पास समय, संसाधन और तकनीकी सहायता नहीं होती।</p>
<p>अगर किसी मजदूर का राशन कार्ड बंद हो जाए, तो उसका परिवार भूखा रह सकता है। अगर किसी बुजुर्ग की पेंशन रुक जाए, तो उसकी दवा बंद हो सकती है। अगर किसी महिला का दस्तावेज गलत हो जाए, तो वह सरकारी योजना से बाहर हो सकती है।</p>
<p>कागजी व्यवस्था का सबसे बड़ा बोझ हमेशा कमजोर वर्ग पर पड़ता है।</p>
<h3><strong>क्या यह विकास का मॉडल है?</strong></h3>
<p>सरकारें अक्सर कहती हैं कि यह सब “सिस्टम सुधार” के लिए जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास का अर्थ केवल डेटा संग्रह और सत्यापन है?</p>
<p>विकास का वास्तविक अर्थ होना चाहिए—</p>
<ul>
<li>शिक्षा की सरल पहुंच</li>
<li>स्वास्थ्य सुविधाएं</li>
<li>रोजगार</li>
<li>सुरक्षित जीवन</li>
<li>न्याय तक आसान पहुंच</li>
<li>सम्मानजनक प्रशासन</li>
</ul>
<p>अगर नागरिक अपना अधिकांश समय केवल प्रमाण पत्र बनवाने में बिताने लगे, तो यह विकास नहीं बल्कि प्रशासनिक जटिलता का विस्तार कहलाएगा।</p>
<h3><strong>लोकतंत्र का मूल प्रश्न: सरकार किसके लिए?</strong></h3>
<p>लोकतंत्र का आधार नागरिक होता है। सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है, ताकि वह जनता की सुविधा और अधिकारों की रक्षा कर सके।</p>
<p>लेकिन जब नागरिक ही सरकार के सामने बार-बार अपनी पहचान साबित करने लगे, तब लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ने लगता है।</p>
<p>सरकार का काम नागरिक को सम्मान देना है, न कि उसे हर समय शक की निगाह से देखना।</p>
<p>अगर कोई व्यक्ति दस्तावेज नहीं बनवाना चाहता, तो उसे बुनियादी अधिकारों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। नागरिकता का अर्थ केवल सरकारी डेटाबेस में दर्ज होना नहीं है। नागरिकता एक संवैधानिक और मानवीय संबंध है।</p>
<h3><strong>कोरोना काल और पहचान की राजनीति</strong></h3>
<p>कोरोना महामारी के दौरान भी लोगों को कई प्रकार के प्रमाण और दस्तावेजों से गुजरना पड़ा। कई जगह राशन, यात्रा और सहायता योजनाओं के लिए पहचान आधारित प्रक्रियाएं लागू की गईं।</p>
<p>इस दौरान यह स्पष्ट हुआ कि भारत की प्रशासनिक व्यवस्था संकट के समय भी कागजी नियंत्रण से बाहर नहीं निकल पाती।</p>
<p>जब लोगों को तत्काल राहत चाहिए थी, तब भी कई स्थानों पर दस्तावेज प्राथमिकता बन गए।</p>
<h3><strong>क्या समाधान संभव है?</strong></h3>
<p>समस्या केवल आलोचना से हल नहीं होगी। कुछ बुनियादी सुधार जरूरी हैं—</p>
<ol>
<li><strong>एकीकृत पहचान व्यवस्था</strong><br />अगर सरकार पहचान प्रणाली बना चुकी है, तो एक ही पहचान हर विभाग में मान्य होनी चाहिए।</li>
<li><strong>मानव आधारित विकल्प</strong><br />जहां डिजिटल सत्यापन असफल हो, वहां मानवीय विकल्प उपलब्ध होना चाहिए।</li>
<li><strong>ग्रामीण डिजिटल सहायता</strong><br />हर गांव में मुफ्त तकनीकी सहायता केंद्र स्थापित होने चाहिए।</li>
<li><strong>दस्तावेजों की संख्या कम हो</strong><br />सरकारी सेवाओं में आवश्यक दस्तावेजों की सीमा तय होनी चाहिए।</li>
<li><strong>सम्मानजनक प्रशासन</strong><br />किसी भी योजना में ऐसी भाषा और प्रक्रिया न हो, जो नागरिक की गरिमा को ठेस पहुंचाए।</li>
<li><strong>डेटा सुरक्षा कानून</strong><br />नागरिकों के बायोमैट्रिक और निजी डेटा की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।</li>
</ol>
<h3><strong>सबसे बड़ा सवाल</strong></h3>
<p>सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है—क्या सरकार नागरिक पर भरोसा करती है?</p>
<p>अगर हर महीने किसी महिला से पूछा जाए कि “साबित करो कि तुम जीवित हो,” तो यह केवल तकनीकी सत्यापन नहीं बल्कि राज्य और नागरिक के बीच अविश्वास का प्रतीक बन जाता है।</p>
<p>एक लोकतंत्र में सरकार का दायित्व नागरिक को सम्मान देना है, न कि उसे हर समय प्रमाण देने के लिए मजबूर करना।</p>
<p>भारत एक महान लोकतांत्रिक राष्ट्र है, लेकिन लोकतंत्र केवल चुनावों से मजबूत नहीं होता। लोकतंत्र तब मजबूत होता है, जब नागरिक सम्मान महसूस करे, जब प्रशासन सरल हो, जब सरकार जनता पर भरोसा करे और जब व्यक्ति की गरिमा को कागजों से ऊपर रखा जाए।</p>
<p>आज जरूरत इस बात की है कि भारत डिजिटल और प्रशासनिक सुधारों को मानवीय दृष्टिकोण से देखे। तकनीक नागरिक की सेवक बने, मालिक नहीं। दस्तावेज सुविधा का माध्यम बनें, उत्पीड़न का नहीं।</p>
<p>अगर भारत को वास्तव में विकसित राष्ट्र बनना है, तो उसे केवल डिजिटल डेटा नहीं बल्कि मानवीय गरिमा को केंद्र में रखना होगा। क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की असली पहचान उसके नागरिकों के सम्मान से होती है, न कि उनके पास मौजूद कागजों की संख्या से।</p>
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                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 27 May 2026 16:42:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जमुआ: एक्साइज इंस्पेक्टर सुबोध कुशवाहा की ‘प्रयास पहल’ संस्था से संवर रहा हजारों बच्चों का भविष्य, बरगद के पेड़ से शुरू हुआ सफर</title>
                                    <description><![CDATA[जमुआ में एक्साइज इंस्पेक्टर सुबोध कुशवाहा द्वारा शुरू की गई ‘प्रयास पहल’ आज ग्रामीण शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी मिसाल बन चुकी है। कोरोना काल में बरगद के पेड़ के नीचे शुरू हुई यह पहल अब 10 शिक्षण केंद्रों तक फैल चुकी है। संस्था हजारों बच्चों को निशुल्क शिक्षा, पुस्तकालय सुविधा, खेल, स्वास्थ्य शिविर और पौधारोपण जैसे अभियानों से जोड़ रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/giridih/jamuas-prayas-pahal-is-shaping-the-future-of-thousands-of/article-21907"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/image-(4)_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>गिरिडीह:</strong> प्रयास पहल के संस्थापक एवं एक्साइज इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत सुबोध कुशवाहा ने अपने प्रयासों से ग्रामीण शिक्षा के क्षेत्र में नई मिसाल कायम की है। उनके द्वारा शुरू की गई ‘प्रयास पहल’ आज हजारों ग्रामीण बच्चों के भविष्य को शिक्षा के उजियारे से रोशन कर रही है।</p>
<p>खोरीमहुआ अनुमंडल क्षेत्र के बीघा, कोदम्बरी में प्रयास पहल संस्था का कार्यालय है। वर्ष 2020 में, जब कोरोना महामारी के कारण पूरी दुनिया थम गई थी और स्कूल-कॉलेज बंद थे, तब सुबोध कुशवाहा ने अपने गांव ‘बीघा’ के बच्चों के भविष्य को लेकर चिंता जताई। उन्होंने मंटू वर्मा के साथ मिलकर एक बरगद के पेड़ के नीचे ‘प्रयास क्लासेस’ की नींव रखी। सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क के साथ शुरू हुई यह छोटी-सी कोशिश आज एक बड़े सामाजिक आंदोलन का रूप ले चुकी है।</p>
<p>वर्तमान में ‘प्रयास पहल’ के 10 विभिन्न शिक्षण केंद्र संचालित हैं। खास बात यह है कि ये क्लासेस किसी आलीशान भवन में नहीं, बल्कि प्रकृति की गोद में, पेड़ों के नीचे चलती हैं। यहाँ गांव के ही उच्च शिक्षा प्राप्त युवा स्वेच्छा से अपना समय दान करते हैं। अब तक सैकड़ों शिक्षक इस निस्वार्थ भाव से संस्था से जुड़ चुके हैं।</p>
<h4><strong>समाज के सर्वांगीण विकास के लिए बहुआयामी प्रयास</strong></h4>
<p>प्रयास पहल केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बच्चों के संपूर्ण व्यक्तित्व विकास पर केंद्रित है। प्रयास पहल के बच्चों को शैक्षणिक सामग्री, प्रशिक्षण व विभिन्न प्रकार के आयोजन कराने तथा संस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए आर्थिक जरूरतों हेतु 150 से अधिक नियमित सदस्य जुड़े हुए हैं, जो अपनी इच्छा शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार आर्थिक सहयोग करते हैं।</p>
<h4><strong>प्रयास पहल की समाज के लिए कुछ महत्वपूर्ण पहल</strong></h4>
<p><strong>प्रयास पुस्तकालय:</strong> गाँव-समाज के सभी बच्चों तक ज्ञानवर्धक पुस्तकें पहुँचाने और शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए कई स्थानों पर प्रयास पुस्तकालय खोले गए हैं, जहाँ हजारों पुस्तकें बच्चों के लिए निशुल्क उपलब्ध हैं।</p>
<p><strong>प्रयास सांस्कृतिक कार्यक्रम:</strong> ग्रामीण बच्चों की प्रतिभा को निखारने और उन्हें बेहतर मंच उपलब्ध कराने के साथ-साथ विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर जागरूक करने में यह पहल महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।</p>
<p><strong>प्रयास स्पोर्ट्स:</strong> विभिन्न शिक्षण केंद्रों के बच्चों के लिए आयोजित यह मल्टीस्पोर्ट टूर्नामेंट अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने का एक बेहतरीन मंच साबित हुआ है। इस टूर्नामेंट में लड़कों के साथ-साथ लड़कियों की भी सक्रिय भागीदारी रही।</p>
<p><strong>प्रयास स्वास्थ्य शिविर:</strong> ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा व स्वास्थ्य से संबंधित जागरूकता के लिए यह पहल महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। नवजीवन नर्सिंग होम, गिरिडीह के विशेषज्ञ डॉक्टरों ने अनेक लोगों को निःशुल्क चिकित्सा परामर्श व दवा उपलब्ध कराई।</p>
<p><strong>प्रयास पौधारोपण अभियान:</strong> पेड़ प्रकृति का अनमोल उपहार हैं। पेड़ों के कारण ही हमारा जीवन संभव है। पेड़-पौधे हमें अनगिनत तरीकों से लाभ पहुँचाते हैं। पर्यावरण संरक्षण हमारी सामाजिक व नैतिक जिम्मेदारी है। प्रयास पहल संस्था द्वारा अब तक हजारों नए पौधे लगाए जा चुके हैं।</p>
<p>‘स्माइल फॉर ऑल’, जयपुर के सहयोग से 22 विभिन्न गांवों के 53 ऐसे बच्चों, जिनके अभिभावक नहीं हैं या जिनकी आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय है, उनका नामांकन नजदीकी निजी विद्यालयों में कराया गया है। उन सभी बच्चों का मासिक शुल्क संस्था द्वारा वहन किया जाता है।</p>
<p>‘वन टीचर वन साइंटिस्ट’ संस्था के ‘स्लेट पाठ्यक्रम’ के माध्यम से बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराई जाती है, जो शिक्षण की एक नवीन पद्धति है। वैशाली गुप्ता द्वारा विकसित यह पद्धति बच्चों के सीखने और उनके सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।</p>
<h4><strong>अनेकों युवा व युवतियाँ इस अभियान का हिस्सा बने</strong></h4>
<p>इस सकारात्मक पहल को देखते हुए विकास कृष्ण मंडल, पंकज कुमार, मोहुआ चटर्जी, सुमन वर्मा, तेजलाल वर्मा, आदित्य वर्मा, देवनंदन वर्मा, आदर्श कुमार, राजू राय, महावीर बर्मा, राजू विश्वकर्मा, आरती कुमारी, कुंदन कुमार, रौशन कुमार, सिंकी कुमारी, पवन वर्मा, करण मोहली, संतोष कुशवाहा, सुनील कुमार, ज्योति कुमारी, प्रवेश वर्मा, मनीषा कुमारी सहित अनेक युवा व युवतियाँ इस अभियान का हिस्सा बने, जिसके सहयोग से प्रयास पहल ने आसपास के 10 विभिन्न गांवों में अपने शिक्षण केंद्र स्थापित किए और हजारों बच्चों को निरंतर निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराई जाने लगी।</p>
<h4><strong>समाज के प्रति जिम्मेदारी भी जरूरी है: सुबोध कुशवाहा</strong></h4>
<p>प्रयास पहल के संस्थापक एवं एक्साइज इंस्पेक्टर सुबोध कुशवाहा ने कहा कि जिस तरह बड़े होकर हम अपने माता-पिता और परिवार की सेवा के प्रति उत्तरदायी होते हैं, उसी तरह हमें समाज के प्रति भी जिम्मेदारी निभानी चाहिए और बेहतर समाज निर्माण में अपनी भूमिका निभानी चाहिए।</p>
<p>उन्होंने कहा कि सरकारी सेवा में आने के बाद प्रयास पहल से जुड़े सभी महत्वपूर्ण कार्यों की जिम्मेदारी संस्था के अध्यक्ष पंकज कुमार, सचिव विकास कृष्ण मंडल सहित अन्य सदस्यों के कंधों पर है। ये सभी लोग बहुत ही मेहनत, लगन और समर्पण के साथ कार्य कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इस सामाजिक परिवर्तन के महायज्ञ में उनका सहयोग हमेशा बना रहेगा और भविष्य में भी प्रयास पहल व जरूरतमंद लोगों के लिए वे उपलब्ध रहेंगे।</p>
<p>सबसे पहले 20 मई 2020 को बीघा शिक्षण केंद्र खुला। इसके बाद छपरा शिक्षण केंद्र, गुंडरी शिक्षण केंद्र, कोदम्बरी शिक्षण केंद्र, जमखोखरो शिक्षण केंद्र, लबनिया शिक्षण केंद्र, भूचरोबाद शिक्षण केंद्र, करिहारी शिक्षण केंद्र, रांची शिक्षण केंद्र, चिकनाडीह शिक्षण केंद्र, गिरिडीह शिक्षण केंद्र, भुलवाही शिक्षण केंद्र, एकड़रिवा शिक्षण केंद्र, गादीकला शिक्षण केंद्र आदि शामिल हैं। प्रयास पहल संस्था द्वारा सुदूरवर्ती बच्चों को शिक्षा के प्रति जागरूक किया जाता है। पूरे वर्ष संस्था द्वारा विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>गिरिडीह</category>
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                                            <category>समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 20 May 2026 14:34:11 +0530</pubDate>
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                <title>गाँव की चौपाल से डिजिटल समाज तक: बदलते भारत की नई कहानी</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय समाज की पहचान सदियों तक गाँवों की चौपालों, सामूहिक जीवनशैली और आत्मीय संबंधों से रही है। लेकिन तकनीकी क्रांति और डिजिटल युग ने समाज की संरचना को तेजी से बदल दिया है। अब संवाद चौपालों से निकलकर मोबाइल स्क्रीन और सोशल मीडिया तक पहुंच गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/gaon-ki-chaupal-se-digital-samaj-tak-badalta-bharat/article-21704"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/7c0b2f3a-1005-454d-bd3e-b879cfc1cddb_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>आशुतोष प्रसाद</strong></p>
<p>भारतीय समाज की आत्मा सदैव उसके गाँवों में बसती रही है। इन गाँवों की पहचान केवल खेत-खलिहानों, नदी-तालाबों या मिट्टी की सोंधी गंध से ही नहीं थी, बल्कि वहाँ की सामूहिक जीवन-शैली, पारस्परिक संबंधों और चौपालों से भी थी। चौपाल केवल गाँव का एक स्थान नहीं था; वह लोकजीवन की धड़कन थी। वहीं पर निर्णय होते थे, रिश्ते बनते थे, गीत गाए जाते थे, दुःख बाँटे जाते थे और समाज अपनी सामूहिक चेतना को जीवित रखता था। किंतु समय के चक्र ने समाज को एक नई दिशा दी है। आज वही समाज डिजिटल माध्यमों से संचालित हो रहा है। मोबाइल स्क्रीन ने चौपाल की जगह ले ली है और संवाद अब आमने-सामने नहीं, बल्कि ऑनलाइन होने लगे हैं। गाँव की चौपाल से डिजिटल समाज तक की यह यात्रा केवल तकनीकी परिवर्तन नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों, संस्कृति और जीवन-मूल्यों के परिवर्तन की भी कहानी है।</p>
<p>पुराने समय में गाँव की चौपाल सामाजिक लोकतंत्र का जीवंत उदाहरण हुआ करती थी। पीपल या बरगद के विशाल वृक्ष के नीचे बनी चौपाल में गाँव के बुजुर्ग, किसान, युवा और बच्चे एकत्रित होते थे। वहाँ राजनीतिक चर्चा भी होती थी, खेती-बारी के उपाय भी तय होते थे और लोकगीतों की मधुर स्वर-लहरियाँ भी गूँजती थीं। चौपाल समाज को जोड़ने वाली वह डोर थी, जिसमें आत्मीयता और विश्वास का अद्भुत संगम दिखाई देता था। किसी परिवार में संकट हो या किसी घर में उत्सव, चौपाल पूरे गाँव को एक सूत्र में बाँध देती थी। वहाँ संवाद में धैर्य था, विचारों में संवेदना थी और संबंधों में अपनापन।</p>
<p>किन्तु आधुनिकता और तकनीकी क्रांति ने इस परिदृश्य को तेजी से बदल दिया। इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया ने मनुष्य के जीवन को अभूतपूर्व गति प्रदान की। आज सूचना का आदान-प्रदान सेकंडों में हो जाता है। शिक्षा, व्यापार, बैंकिंग, चिकित्सा और शासन—सब कुछ डिजिटल माध्यमों से जुड़ गया है। जिस सूचना तक पहुँचने में कभी कई दिन लगते थे, वह अब एक क्लिक पर उपलब्ध है। डिजिटल समाज ने ज्ञान और अवसरों के नए द्वार खोले हैं। गाँवों में भी ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल भुगतान और ई-गवर्नेंस जैसी सुविधाओं ने जीवन को अधिक सरल और सुविधाजनक बनाया है।</p>
<p>कोविड-19 महामारी के दौरान डिजिटल समाज की उपयोगिता सबसे अधिक दिखाई दी। जब दुनिया घरों में सीमित हो गई थी, तब इंटरनेट ने ही लोगों को शिक्षा, रोजगार और संवाद से जोड़े रखा। दूर बैठे लोग वीडियो कॉल के माध्यम से एक-दूसरे के निकट बने रहे। इस दृष्टि से डिजिटल क्रांति ने समाज को नई ऊर्जा और नई संभावनाएँ प्रदान की हैं।</p>
<p>किन्तु हर परिवर्तन अपने साथ कुछ प्रश्न और चुनौतियाँ भी लेकर आता है। डिजिटल समाज ने जहाँ सुविधाएँ बढ़ाई हैं, वहीं मानवीय संबंधों में दूरी भी पैदा की है। चौपाल में बैठकर जो सामूहिकता अनुभव होती थी, वह मोबाइल की स्क्रीन पर संभव नहीं हो पाती। पहले लोग एक-दूसरे के दुःख-सुख में सहभागी बनते थे, आज वे केवल “लाइक” और “इमोजी” तक सीमित होते जा रहे हैं। संवाद की आत्मीयता कहीं न कहीं कृत्रिमता में बदलती दिखाई देती है।</p>
<p>डिजिटल समाज का एक बड़ा संकट सूचना की अति भी है। आज मनुष्य के पास जानकारी तो बहुत है, परंतु ज्ञान और विवेक का अभाव बढ़ता जा रहा है। सोशल मीडिया पर फैलती अफवाहें, झूठी खबरें और नकारात्मकता समाज को विभाजित भी कर रही हैं। चौपाल में संवाद प्रत्यक्ष होता था, इसलिए उत्तरदायित्व भी बना रहता था; परंतु डिजिटल माध्यमों में अनामता के कारण असंवेदनशीलता और कटुता बढ़ती दिखाई देती है।</p>
<p>इसके अतिरिक्त डिजिटल संस्कृति ने नई पीढ़ी को लोकजीवन और परंपराओं से भी दूर किया है। कभी गाँवों में लोकगीत, लोककथाएँ और पारंपरिक उत्सव सामूहिक जीवन का हिस्सा थे, किंतु अब युवा पीढ़ी का अधिक समय आभासी दुनिया में बीतने लगा है। </p>
<p>परिणामस्वरूप लोकसंस्कृति और सामाजिक आत्मीयता का क्षरण दिखाई देता है। यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि किसी भी समाज की पहचान उसकी सांस्कृतिक जड़ों से होती है।<br />फिर भी यह कहना उचित नहीं होगा कि डिजिटल समाज केवल नकारात्मक परिवर्तन लेकर आया है। आवश्यकता इस बात की है कि हम तकनीक को साधन के रूप में उपयोग करें, साध्य के रूप में नहीं। यदि चौपाल की आत्मीयता और डिजिटल युग की सुविधा का संतुलित समन्वय हो सके, तो समाज अधिक समृद्ध और मानवीय बन सकता है। आज भी कई गाँवों में डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से लोककला, हस्तशिल्प और कृषि उत्पादों को वैश्विक पहचान मिल रही है। ऑनलाइन माध्यमों से लोकसाहित्य और क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण का कार्य भी हो रहा है। यह इस बात का संकेत है कि तकनीक यदि संवेदना से जुड़ जाए, तो वह संस्कृति की संरक्षक भी बन सकती है।</p>
<p>वास्तव में, गाँव की चौपाल से डिजिटल समाज तक की यात्रा मानव सभ्यता की निरंतर गतिशीलता का प्रतीक है। समय बदलता है, साधन बदलते हैं, लेकिन समाज की आत्मा तभी जीवित रहती है जब संवाद में संवेदना, संबंधों में आत्मीयता और जीवन में मानवीयता बनी रहे। यदि डिजिटल युग में भी हम चौपाल की सामूहिक चेतना, अपनापन और सामाजिक उत्तरदायित्व को बचाए रख सकें, तो यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मानवीय विकास की दिशा में एक सार्थक कदम सिद्ध होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 18 May 2026 13:59:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>साइबर ठगी में गया पैसा वापस पाने का सरकारी रास्ता, जिससे आज भी अनजान हैं अधिकांश लोग</title>
                                    <description><![CDATA[देश में बढ़ते साइबर अपराध के बीच अब ठगी का पैसा वापस पाने का सरकारी रास्ता भी मौजूद है। गृह मंत्रालय के राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल और 1930 हेल्पलाइन के जरिए पीड़ित समय रहते शिकायत दर्ज कर अपने पैसे को फ्रीज करवा सकते हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/government-way-to-get-back-money-lost-in-cyber-fraud/article-21598"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/84380959-8409-4843-b75f-adfd46aa424a_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong><em>आलोक वर्मा</em></strong></p>
<p>रात के करीब दस बजे थे। लखनऊ के इंदिरानगर में रहने वाले रमेश वर्मा के मोबाइल पर एक कॉल आई। आवाज़ सधी हुई थी और लहजा बिल्कुल बैंक कर्मचारी जैसा। कॉल करने वाले ने कहा, “सर, आपका केवाईसी अपडेट नहीं हुआ है, खाता बंद हो जाएगा।” अगले बीस मिनट में रमेश के खाते से 28 हजार रुपये उड़ चुके थे।</p>
<p>यह कोई अकेला मामला नहीं है। देशभर में हर दिन ऐसे हजारों मामले सामने आते हैं। कोई नकली बिजली बिल के बहाने ठगा जाता है, तो कोई शेयर बाजार में मोटे मुनाफे का लालच देकर लूट लिया जाता है। अधिकांश पीड़ित थाने और बैंक के चक्कर लगाने के बाद यह मान लेते हैं कि एक बार पैसा चला गया तो वापस नहीं मिलेगा। लेकिन अब यह धारणा पूरी तरह सही नहीं रह गई है।</p>
<p>गृह मंत्रालय के अंतर्गत संचालित राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल का “धनराशि पुनर्प्राप्ति मंच” एक ऐसी व्यवस्था है, जो बैंकों, पुलिस और साइबर एजेंसियों को एक मंच पर जोड़ती है। इसका उद्देश्य साफ है — ठगी की सूचना समय रहते मिल जाए तो संदिग्ध खातों को तुरंत फ्रीज कर ठगों द्वारा रकम निकालने से रोका जा सके और पीड़ित का पैसा वापस दिलाया जा सके।</p>
<p>साइबर ठगी के मामलों में शुरुआती 24 घंटे सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं। जितनी देर शिकायत करने में होती है, उतनी ही जल्दी ठग पैसे को अलग-अलग खातों में ट्रांसफर कर देते हैं या नकद निकाल लेते हैं। इसलिए ठगी होते ही राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करना या सरकारी पोर्टल पर शिकायत दर्ज करना बेहद जरूरी है।</p>
<p>पोर्टल की प्रक्रिया काफी सरल है। शिकायतकर्ता को मोबाइल नंबर और ओटीपी के जरिए सत्यापन करना होता है। इसके बाद शिकायत की जानकारी संबंधित बैंक और पुलिस तक पहुंच जाती है। बैंक संदिग्ध खाते को रोक देता है और भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र फर्जी खातों की पहचान करने में जुट जाता है।</p>
<p>शिकायत दर्ज करने के लिए लेनदेन की पहचान संख्या, ठगी की तारीख और समय, रकम, बैंक खाता विवरण और स्क्रीनशॉट जैसी जानकारियां जरूरी होती हैं। शिकायत दर्ज होने के बाद एक ट्रैकिंग नंबर मिलता है, जिससे पीड़ित अपने मामले की स्थिति देख सकता है।</p>
<p>हालांकि, हर मामले में पैसा वापस मिलना संभव नहीं होता। यदि रकम विदेश भेज दी गई हो या ठग पहले ही पैसा निकाल चुके हों, तो वापसी मुश्किल हो सकती है। बड़ी रकम की ठगी में साइबर थाने में एफआईआर दर्ज कराना भी जरूरी माना जाता है।</p>
<p>विशेषज्ञों का कहना है कि आज भी बड़ी संख्या में लोग इस सरकारी व्यवस्था के बारे में नहीं जानते। कई बार बैंक और स्थानीय स्तर पर भी इसकी जानकारी लोगों तक नहीं पहुंच पाती। यही कारण है कि कई पीड़ित समय रहते शिकायत नहीं कर पाते।</p>
<p>रमेश वर्मा के मामले में उनके बेटे ने कुछ घंटों के भीतर 1930 हेल्पलाइन पर कॉल कर शिकायत दर्ज कराई। करीब तीन सप्ताह बाद 28 हजार रुपये में से 22 हजार रुपये वापस मिल गए। यह व्यवस्था चमत्कार नहीं करती, लेकिन समय पर उठाया गया कदम नुकसान को काफी हद तक कम कर सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 17 May 2026 15:50:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बेज़ुबानों को पिला रहे पानी, इंसानियत की मिसाल बनी “दाना-पानी” पहल</title>
                                    <description><![CDATA[भीषण गर्मी में जब इंसान सुरक्षित स्थानों और पानी की व्यवस्था कर लेता है, वहीं बेजुबान पक्षी और जानवर प्यास से बेहाल रहते हैं। इसी संवेदनशीलता को समझते हुए शहर की संस्था बीइंग रेस्पॉन्सिबल द्वारा “दाना-पानी” अभियान चलाया जा रहा है। इस वर्ष संस्था ने 200 से अधिक मिट्टी के सकोरे और दाने वितरित किए हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/dana-pani-abhiyan-bezubaan-pakshi-pani-samaj-sewa-being-responsible/article-21292"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/f0eabac9-dc0d-4dae-91fe-c0912a05e34f_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>नेशनल डेस्क: </strong>इंसानियत सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं होती—इस बात को चरितार्थ कर रही है शहर की सामाजिक संस्था “बीइंग रेस्पॉन्सिबल” द्वारा चलाई जा रही “दाना-पानी” पहल। भीषण गर्मी के इस मौसम में जब इंसान पानी और छांव की तलाश में सुरक्षित स्थानों तक पहुँच जाता है, वहीं बेजुबान पक्षी और जानवर प्यास से बेहाल सड़कों, छतों और खुले इलाकों में भटकते नजर आते हैं।</p>
<p>तेज धूप में जब कोई चिड़िया अपनी प्यास बुझाने के लिए आसमान की ओर बेबस निगाहों से देखती है, तो यह दृश्य हर संवेदनशील व्यक्ति के मन को झकझोर देता है। ऐसे ही हालात में यह पहल इन बेजुबानों के लिए राहत बनकर सामने आई है।</p>
<p>संस्था बीइंग रेस्पॉन्सिबल पिछले लगभग चार वर्षों से लगातार हर गर्मी में “दाना-पानी” अभियान चला रही है। इस वर्ष भी संस्था ने शहर के विभिन्न इलाकों में 200 से अधिक मिट्टी के सकोरे और दाने वितरित किए हैं, ताकि पक्षियों और जानवरों को गर्मी में पानी और भोजन की सुविधा मिल सके।</p>
<p>संस्था का मानना है कि यदि हर व्यक्ति अपने घर की छत, आंगन या दरवाजे के बाहर एक सकोरा रखकर उसमें नियमित पानी भर दे, तो हजारों बेजुबान जीवों की जान बचाई जा सकती है। यह छोटा-सा प्रयास कई मासूम जिंदगियों के लिए जीवनदान साबित हो सकता है।</p>
<p>यह पहल केवल सेवा कार्य नहीं, बल्कि एक संवेदनशील विचार है, जो यह संदेश देता है कि पृथ्वी पर हर जीव का समान अधिकार है। जब एक पक्षी प्यास से तड़पता है, तो वह केवल एक जीव नहीं बल्कि हमारी इंसानियत का प्रतिबिंब होता है।</p>
<p>बीइंग रेस्पॉन्सिबल द्वारा चलाई जा रही यह मुहिम बिना किसी शोर-शराबे और दिखावे के लगातार आगे बढ़ रही है। धीरे-धीरे लोग भी इस पहल से जुड़ रहे हैं और अपने घरों में सकोरे रखकर बेजुबानों की मदद कर रहे हैं।</p>
<p>संस्था का कहना है कि शहरों में विकास की दौड़ में पेड़ और जल स्रोत कम होते जा रहे हैं, जिसका सबसे अधिक असर इन बेजुबान जीवों पर पड़ रहा है। ऐसे में यह सकोरे उनके लिए जीवन की डोर बनते जा रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 12 May 2026 17:58:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बैंक के भीतर से बढ़ता साइबर खतरा: हालिया मामलों ने क्यों बढ़ाई चिंता</title>
                                    <description><![CDATA[भारत में साइबर फ्रॉड के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है, लेकिन अब एक नया खतरा सामने आया है—बैंकिंग सिस्टम के भीतर से होने वाला इनसाइडर फ्रॉड। हालिया मामलों में बैंक कर्मचारियों की मिलीभगत से म्यूल अकाउंट के जरिए करोड़ों रुपये की ठगी को अंजाम दिया गया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/banking-system-cyber-fraud-insider-threat-india/article-20943"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/f45dd5f2-8a28-40aa-bedc-8dcac4a5b479_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>आलोक वर्मा</strong></p>
<p>भारत में साइबर फ्रॉड के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन हालिया घटनाओं ने इस समस्या के एक नए और चिंताजनक पहलू को उजागर किया है। अब यह साफ होता जा रहा है कि साइबर अपराध केवल बाहरी गिरोहों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बैंकिंग सिस्टम के भीतर से भी उन्हें सहयोग मिल रहा है।</p>
<p>हाल ही में हैदराबाद पुलिस की एक बहु-राज्यीय कार्रवाई में “ऑपरेशन ऑक्टोपस 2.0” के तहत 50 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें 30 से ज्यादा बैंक कर्मचारी शामिल थे। जांच में सामने आया कि इन कर्मचारियों ने केवाईसी नियमों की अनदेखी कर सैकड़ों म्यूल अकाउंट खुलवाए, जिनके जरिए लगभग 150 करोड़ रुपये के संदिग्ध लेनदेन को अंजाम दिया गया। यह मामला इस बात का स्पष्ट संकेत है कि बैंक के अंदर की मिलीभगत साइबर अपराध को किस स्तर तक पहुंचा सकती है।</p>
<p>इसी तरह पिछले कुछ महीनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां बैंक कर्मचारियों पर फर्जी खातों को मंजूरी देने या संदिग्ध लेनदेन को नजरअंदाज करने के आरोप लगे हैं। जांच एजेंसियों के अनुसार, साइबर अपराधी अब सीधे बैंक कर्मचारियों से संपर्क स्थापित कर रहे हैं और उन्हें कमीशन के बदले सहयोग के लिए तैयार कर रहे हैं।</p>
<p>म्यूल अकाउंट इस पूरे नेटवर्क की रीढ़ बन चुके हैं। ये ऐसे बैंक खाते होते हैं जिनका उपयोग केवल पैसे के प्रवाह को छिपाने के लिए किया जाता है। पीड़ित से ठगी की गई राशि पहले इन खातों में डाली जाती है, फिर कई स्तरों पर ट्रांसफर कर अंततः निकाल ली जाती है। इस प्रक्रिया में बैंकिंग सिस्टम की आंतरिक जानकारी का दुरुपयोग किया जाता है, जिससे जांच और भी कठिन हो जाती है।</p>
<p>विशेषज्ञों का मानना है कि इनसाइडर मिलीभगत के कारण साइबर फ्रॉड का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। जब बैंक के भीतर से ही नियमों में ढील दी जाती है, तो सुरक्षा की पूरी व्यवस्था कमजोर पड़ जाती है। इससे न केवल वित्तीय नुकसान होता है, बल्कि आम लोगों का बैंकिंग सिस्टम पर भरोसा भी प्रभावित होता है।</p>
<p>डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन बैंकिंग के तेजी से विस्तार के साथ यह समस्या और गंभीर होती जा रही है। भारत में करोड़ों लोग अब मोबाइल और इंटरनेट के माध्यम से लेनदेन कर रहे हैं। ऐसे में यदि बैंक के भीतर नियंत्रण कमजोर पड़ते हैं, तो इसका असर व्यापक स्तर पर पड़ सकता है।</p>
<p>इस स्थिति से निपटने के लिए बैंकों को अपनी आंतरिक निगरानी प्रणाली को मजबूत करना होगा। कर्मचारियों की जवाबदेही तय करना, केवाईसी प्रक्रिया को सख्ती से लागू करना और संदिग्ध लेनदेन पर तुरंत कार्रवाई करना जरूरी है। साथ ही, नियामक संस्थाओं को भी इस तरह के मामलों पर कड़ी नजर रखनी होगी।</p>
<p>कानूनी कार्रवाई भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि बैंक अधिकारी जानबूझकर साइबर फ्रॉड में शामिल पाए जाते हैं, तो उनके खिलाफ कड़े प्रावधानों के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। इससे न केवल दोषियों को सजा मिलेगी, बल्कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर रोक लगाने में भी मदद मिलेगी।</p>
<p>अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि साइबर फ्रॉड का खतरा अब केवल तकनीकी नहीं बल्कि संस्थागत चुनौती बन चुका है। जब बैंक के भीतर से ही सहयोग मिलने लगे, तो समस्या का समाधान और जटिल हो जाता है। ऐसे में पारदर्शिता, सख्त निगरानी और जागरूकता ही इस बढ़ते खतरे से निपटने का रास्ता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/article/banking-system-cyber-fraud-insider-threat-india/article-20943</link>
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                <pubDate>Mon, 04 May 2026 14:23:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अंधविश्वास पर हर साल 2 करोड़ खर्च, फिर भी नहीं थम रही मौतें; जानिए 4 साल में कितनी जानें गईं</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>समृद्ध डेस्क:</strong> झारखंड में अंधविश्वास आज भी एक बड़ी सामाजिक समस्या बना हुआ है, जहां हर साल कई निर्दोष लोग इसकी भेंट चढ़ जाते हैं. सरकारी स्तर पर जागरूकता और रोकथाम के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद हालात पूरी तरह नियंत्रण में नहीं आ सके हैं. आंकड़े बताते हैं कि राज्य में अंधविश्वास के कारण औसतन हर साल करीब 18 लोगों की जान चली जाती है, जो समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है.</p>

<div style="font-family:Arial, sans-serif;background:#ffffff;padding:16px;margin:20px 0;">
<div style="font-size:20px;font-weight:bold;color:#b30000;margin-bottom:12px;text-align:center;">चार साल में अंधविश्वास से मौत के मामले: जिला-वार आंकड़े (2022–2025)</div>
<table style="width:100%;border-collapse:collapse;min-width:600px;">
<thead>
<tr style="color:#ffffff;">
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">जिला</th>
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2025</th>
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2024</th>
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2023</th>
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2022</th>
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">कुल</th>
</tr>
</thead>
<tbody>
<tr>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">रांची</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td></tr></tbody></table></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/jharkhand-andhvishwas-deaths-73-in-4-years-2-crore-spent-awareness-data/article-19959"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-04/chatgpt-image-apr-3,-2026,-08_16_44-pm.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>समृद्ध डेस्क:</strong> झारखंड में अंधविश्वास आज भी एक बड़ी सामाजिक समस्या बना हुआ है, जहां हर साल कई निर्दोष लोग इसकी भेंट चढ़ जाते हैं. सरकारी स्तर पर जागरूकता और रोकथाम के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद हालात पूरी तरह नियंत्रण में नहीं आ सके हैं. आंकड़े बताते हैं कि राज्य में अंधविश्वास के कारण औसतन हर साल करीब 18 लोगों की जान चली जाती है, जो समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है.</p>

<div style="font-family:Arial, sans-serif;background:#ffffff;padding:16px;margin:20px 0;">
<div style="font-size:20px;font-weight:bold;color:#b30000;margin-bottom:12px;text-align:center;">चार साल में अंधविश्वास से मौत के मामले: जिला-वार आंकड़े (2022–2025)</div>
<table style="width:100%;border-collapse:collapse;min-width:600px;">
<thead>
<tr style="color:#ffffff;">
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">जिला</th>
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2025</th>
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2024</th>
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2023</th>
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2022</th>
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">कुल</th>
</tr>
</thead>
<tbody>
<tr>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">रांची</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">3</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">7</td>
</tr>
<tr style="background:#fafafa;">
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">गिरिडीह</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">3</td>
</tr>
<tr>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">दुमका</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">3</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">5</td>
</tr>
<tr style="background:#fafafa;">
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">जामताड़ा</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">1</td>
</tr>
<tr>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">देवघर</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">1</td>
</tr>
<tr style="background:#fafafa;">
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">साहिबगंज</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">1</td>
</tr>
<tr>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">पाकुड़</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">2</td>
</tr>
<tr style="background:#fafafa;">
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">चतरा</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">3</td>
</tr>
<tr>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">खूंटी</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">3</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">5</td>
</tr>
<tr style="background:#fafafa;">
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">गुमला</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">3</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">9</td>
</tr>
<tr>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">सिमडेगा</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">2</td>
</tr>
<tr style="background:#fafafa;">
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">लोहरदगा</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">3</td>
</tr>
<tr>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">पश्चिमी सिंहभूम</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">4</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">5</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">13</td>
</tr>
<tr style="background:#fafafa;">
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">सरायकेला</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">4</td>
</tr>
<tr>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">पूर्वी सिंहभूम</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">1</td>
</tr>
<tr style="background:#fafafa;">
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">पलामू</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">3</td>
</tr>
<tr>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">लातेहार</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">3</td>
</tr>
<tr style="background:#fafafa;">
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">गढ़वा</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">6</td>
</tr>
<tr>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">हजारीबाग</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">3</td>
</tr>
<tr style="background:#fff3f3;font-weight:bold;color:#b30000;">
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">कुल</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">11</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">15</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">20</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">27</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">73</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<div style="font-size:12px;color:#666;margin-top:8px;text-align:right;">स्रोत: आधिकारिक पुलिस रिकॉर्ड</div>
</div>

<div style="max-width:100%;margin:22px auto;font-family:Arial, Helvetica, sans-serif;">
<div style="padding:2px;">
<div style="background:#ffffff;padding:20px 22px;font-size:16px;line-height:1.75;color:#111111;">
<div style="background:#d80000;color:#ffffff;padding:4px 12px;font-size:12px;font-weight:bold;letter-spacing:0.5px;">IMPORTANT</div>

<div style="font-size:34px;color:#d80000;font-weight:bold;">❝</div>

<div style="padding-left:26px;font-weight:600;">अंधविश्वास के कारण पिछले चार सालों में पश्चिमी सिंहभूम में सबसे ज्यादा 13 हत्याएं हुई हैं. गुमला में 9 लोगों की जान गई है. वहीं गढ़वा में 6 और दुमका व खूंटी में 5-5 हत्याएं हुई हैं. राजधानी रांची भी इससे अछूती नहीं है. यहां भी अंधविश्वास के कारण चार साल में 7 लोगों की हत्या हो चुकी है. यह बताता है कि राज्य में जागरूकता के बावजूद सामाजिक दबाव हावी है.</div>
</div>
</div>
</div>
<h5><strong>बजट की 60% राशि बैनर और नुक्कड़ नाटक पर खर्च</strong></h5>
<p>दैनिक भास्कर के रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड सरकार अंधविश्वास और डायन-बिसाही जैसी कुप्रथाओं को रोकने के लिए हर वर्ष लगभग 2 करोड़ रुपये खर्च करती है. इसके तहत जागरूकता अभियान, प्रशिक्षण कार्यक्रम और ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को वैज्ञानिक सोच अपनाने के लिए प्रेरित करने जैसी गतिविधियां चलाई जाती हैं. बावजूद इसके, कई दूरदराज के इलाकों में अशिक्षा, गरीबी और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण लोग आज भी झाड़-फूंक और टोना-टोटका जैसी मान्यताओं पर विश्वास करते हैं.</p>
<p>राज्य में डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम लागू होने के बावजूद अपराधी बेखौफ हैं. झारखंड पुलिस के आंकड़ों के अनुसार इन मामलों में सजा की दर महज 5 प्रतिशत है. ग्रामीण इलाकों में सामाजिक दबाव इतना अधिक होता है कि गवाह कोर्ट पहुंचने से पहले ही मुकर जाते हैं. इसके कारण हत्यारे कानूनी पेचीदगियों का फायदा उठाकर साफ बच निकलते हैं.</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/article/society/jharkhand-andhvishwas-deaths-73-in-4-years-2-crore-spent-awareness-data/article-19959</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/article/society/jharkhand-andhvishwas-deaths-73-in-4-years-2-crore-spent-awareness-data/article-19959</guid>
                <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 20:19:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Media Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>“बस देख लेंगे”: भारतीय टालमटोल संस्कृति पर तीखा व्यंग्य</title>
                                    <description><![CDATA[“बस देख लेंगे” शीर्षक यह व्यंग्यात्मक लेख भारतीय समाज में प्रचलित उस मानसिकता पर रोशनी डालता है, जहाँ समस्याओं का समाधान करने की बजाय उन्हें टालने की प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है। घर के छोटे कामों से लेकर दफ्तर और राजनीति तक, यह तीन शब्दों का वाक्य अक्सर जिम्मेदारियों को आगे बढ़ाने का माध्यम बन जाता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/just-see-is-a-sharp-satire-on-the-indian-procrastination/article-18753"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/c59ea66b-03b3-4889-8244-cce50a2c64ea_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>“बस देख लेंगे।”</strong></p>
<p>यह तीन शब्दों का वाक्य भारतीय आश्वासन का सार्वभौमिक प्रतीक है। इसमें समाधान भी है, टालमटोल भी; साहस भी है और सुविधाजनक अनिर्णय भी।</p>
<p>यह वाक्य इतना लचीला है कि हर परिस्थिति में फिट हो जाता है—जैसे एक ही चाबी से सारे ताले खुल जाएँ, या कम-से-कम खुलने का भरोसा बना रहे।</p>
<p>घर में नल टपक रहा है।<br />पत्नी कहती हैं—“प्लंबर बुला लीजिए।”<br />उत्तर आता है—“हाँ, बस देख लेंगे।”<br />नल टपकता रहता है, पर वाक्य अपनी जगह अडिग रहता है।</p>
<p>यह वाक्य समस्या का समाधान नहीं करता, समस्या को स्थगित करता है—सम्मानपूर्वक।</p>
<p>कार्यालय में फाइल अटकी है।<br />कर्मचारी पूछता है—“सर, यह कब तक हो जाएगा?”<br />सर गंभीर मुद्रा में कहते हैं—“देख लेंगे।”</p>
<p>यह ‘देख लेंगे’ सुनते ही कर्मचारी समझ जाता है कि अब फाइल का भाग्य ईश्वर के हाथ में है।</p>
<p>राजनीति में तो यह वाक्य अमरत्व को प्राप्त हो चुका है।<br />जनता पूछती है—“सड़क कब बनेगी?”<br />उत्तर—“देख लेंगे।”</p>
<p>यानी सड़क का भविष्य उज्ज्वल है, बस समय अस्पष्ट है।</p>
<p>“बस देख लेंगे” दरअसल हमारे निर्णय-भय का सभ्य संस्करण है।<br />हम सीधे ‘न’ नहीं कहना चाहते और ‘हाँ’ कहकर बंधना भी नहीं चाहते।</p>
<p>इसलिए बीच का रास्ता चुन लेते हैं—देख लेंगे।</p>
<p>यह वाक्य वादा नहीं, संभावना है।<br />यह आश्वासन नहीं, आशा का मसौदा है।</p>
<p>परीक्षा से पहले छात्र से पूछा जाए—“तैयारी हो गई?”<br />वह मुस्कराकर कहेगा—“देख लेंगे।”</p>
<p>इसमें आत्मविश्वास भी छिपा है और किस्मत पर भरोसा भी।<br />मानो प्रश्नपत्र उससे पूछेगा—“तुमने पढ़ा है?”<br />और वह उत्तर देगा—“बस, देख लेंगे।”</p>
<p>रिश्तों में भी यह वाक्य खूब चलता है।<br />कोई कहे—“कभी मिलते क्यों नहीं?”<br />उत्तर—“अरे, देख लेंगे।”</p>
<p>मुलाकात भविष्य के कोहरे में विलीन हो जाती है, पर संबंध की औपचारिकता बची रहती है।</p>
<p>यह वाक्य हमारी सामाजिक शिष्टता का सुरक्षा-कवच है।<br />सीधे मना कर देंगे तो सामने वाला आहत होगा।<br />स्पष्ट प्रतिबद्धता दे देंगे तो खुद बँध जाएँगे।</p>
<p>इसलिए ‘देख लेंगे’ कहकर हम दोनों से बच निकलते हैं।</p>
<p>कभी-कभी यह वाक्य आत्म-संवेदना का भी माध्यम बन जाता है।<br />हम खुद से कहते हैं—</p>
<p>“व्यायाम शुरू करेंगे।”<br />“नई भाषा सीखेंगे।”<br />“पुरानी किताबें पढ़ेंगे।”</p>
<p>और फिर जोड़ देते हैं—“देख लेंगे।”</p>
<p>यह ‘देख लेंगे’ हमारे संकल्पों की शीत-निद्रा है।<br />संकल्प सो जाते हैं, वाक्य जागता रहता है।</p>
<p>रोचक यह है कि ‘देख लेंगे’ का अर्थ हर व्यक्ति अपने हिसाब से समझता है।<br />किसी के लिए इसका अर्थ है—“अभी नहीं।”<br />किसी के लिए—“शायद कभी।”<br />और किसी के लिए—“कभी नहीं।”</p>
<p>फिर भी यह वाक्य इतना लोकप्रिय है, क्योंकि यह आशा को जीवित रखता है।</p>
<p>यह दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं करता, बस आधा खुला छोड़ देता है।<br />और आधा खुला दरवाज़ा, पूरी तरह बंद दरवाज़े से अधिक सुकून देता है।</p>
<p>पर जीवन की कुछ स्थितियाँ ऐसी भी होती हैं, जहाँ ‘देख लेंगे’ पर्याप्त नहीं होता।<br />वहाँ निर्णय चाहिए, स्पष्टता चाहिए, साहस चाहिए।</p>
<p>हर बार स्थगन संभव नहीं।</p>
<p>कभी-कभी नल बंद करना पड़ता है, फाइल पर हस्ताक्षर करने पड़ते हैं, सड़क बनानी पड़ती है और संबंध निभाने पड़ते हैं।</p>
<p>शायद ‘बस देख लेंगे’ का असली सौंदर्य तभी है, जब वह अस्थायी हो—स्थायी नीति नहीं।</p>
<p>यह वाक्य विश्राम हो सकता है, मंज़िल नहीं।</p>
<p>फिर भी, मान लीजिए आप यह निबंध पढ़कर सोच रहे हों—<br />“अच्छा लिखा है… पर इस पर कुछ कहेंगे?”</p>
<p>तो आप भी मन ही मन कह रहे होंगे—<br />“देख लेंगे।”</p>
<p>और मैं भी मुस्कुराकर यही कहूँगा—<br />हाँ, कभी न कभी…<br />बस, देख लेंगे।</p>
<p>✍️ <strong>डॉ. आशुतोष प्रसाद</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 11 Mar 2026 18:01:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कुपोषण और आदिवासी बच्चे: योजनाएं कागजों पर ही? NFHS-5 आंकड़े चौंकाने वाले</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>समृद्ध डेस्क: </strong>झारखंड के आदिवासी इलाकों में कुपोषण आज भी एक गंभीर चुनौती बना हुआ है, जहां सरकारी योजनाएं कागजों पर तो चमक रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयान करती हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में 36 लाख 64 हजार बच्चों में से 15 लाख बच्चे कुपोषित (42%) हैं. वहीं करीब 03 लाख (9%) बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं, और खासकर अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय के 56 प्रतिशत बच्चे कुपोषण उपचार केंद्रों तक पहुंचते हैं। इन आंकड़ों के बीच रांची के रिम्स रेफरल कुपोषण उपचार केंद्र में पिछले डेढ़</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/malnutrition-and-tribal-children-schemes-are-only-on-paper-nfhs-5/article-18092"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/6413d75008ea69001e41b168.jpg" alt=""></a><br /><p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>समृद्ध डेस्क: </strong>झारखंड के आदिवासी इलाकों में कुपोषण आज भी एक गंभीर चुनौती बना हुआ है, जहां सरकारी योजनाएं कागजों पर तो चमक रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयान करती हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में 36 लाख 64 हजार बच्चों में से 15 लाख बच्चे कुपोषित (42%) हैं. वहीं करीब 03 लाख (9%) बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं, और खासकर अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय के 56 प्रतिशत बच्चे कुपोषण उपचार केंद्रों तक पहुंचते हैं। इन आंकड़ों के बीच रांची के रिम्स रेफरल कुपोषण उपचार केंद्र में पिछले डेढ़ साल में महज 84 बच्चों का इलाज ही हो सका, क्योंकि अभिभावकों को इसकी सही जानकारी ही नहीं मिल पा रही।</p>
<hr />
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>झारखंड का पूरा NFHS-5 रिपोर्ट पीडीएफ 👇</strong><br /><span style="background-color:rgb(191,237,210);"><a style="background-color:rgb(191,237,210);" href="https://drive.google.com/file/d/1j_UP2jx6d8xgPrj6RmUJGbKikxJ8oR57/view?usp=sharing">https://drive.google.com/file/d/1j_UP2jx6d8xgPrj6RmUJGbKikxJ8oR57/view?usp=sharing</a></span></p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>आदिवासी बच्चों पर कुपोषण का कहर</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">झारखंड के आदिवासी बहुल जिलों जैसे गुमला, पश्चिम सिंहभूम और कोडरमा में कुपोषण ने नौनिहालों का भविष्य दांव पर लगा रखा है। कुपोषण उपचार केंद्रों (एमटीसी) में भर्ती 53 प्रतिशत गंभीर कुपोषित बच्चे लड़कियां हैं, और दो साल से कम उम्र के बच्चों का हिस्सा आधे से ज्यादा है। ग्रामीण आदिवासी आबादी में 0-6 साल के बच्चों में प्रोटीन-कैलोरी कुपोषण की दर 57 प्रतिशत तक है, जो गरीबी, जंगलों पर निर्भरता और पोषण की कमी से जुड़ी हुई है। इतना ही नहीं, 67.5 प्रतिशत बच्चों में एनीमिया की समस्या ने उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को चरमरा दिया है, जिससे छोटी-मोटी बीमारियां भी जानलेवा साबित हो रही हैं।</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>सरकारी योजनाएं: घोषणाएं बनाम हकीकत</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">झारखंड सरकार ने कुपोषण मुक्त अभियान के तहत कई कदम उठाए हैं, जैसे 96 एमटीसी केंद्र जहां प्रतिदिन 130 रुपये की दर से सब्जियां और स्पेशल आहार दिया जाता है। हाल ही में 18 जनवरी 2025 से शुरू हुई 'शिशु शक्ति खाद्य पैकेट योजना' पश्चिम सिंहभूम के चक्रधरपुर से पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चली, जिसमें प्रोटीन, विटामिन और सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर पैकेट वितरित हो रहे हैं। अब एमटीसी में कुपोषित बच्चों की मांओं को भी पौष्टिक भोजन और आयरन-फोलिक एसिड गोलियां दी जा रही हैं, जो रिम्स के पीएसएम विभाग की रिसर्च पर आधारित है। आकांक्षी जिला कार्यक्रम के तहत गुमला जैसे क्षेत्रों में आंगनबाड़ी केंद्रों पर पोषण माह मनाया जा रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर मैनपावर की कमी और जागरूकता के अभाव ने इन योजनाओं को सीमित कर दिया है।</p>
<hr />
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong><span class="inline-flex">सरकारी ओपन डेटा पोर्टल: जिसमें जिला-स्तर के NFHS-5 डेटा फ़ैक्टशीट्स मिलते हैं। 👇</span></strong></p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><span class="inline-flex"><span style="background-color:rgb(191,237,210);"><a style="background-color:rgb(191,237,210);" href="https://www.data.gov.in/">https://www.data.gov.in/</a></span>​</span></p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>जमीनी बाधाएं और विफलताएं</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">हकीकत यह है कि आदिवासी परिवारों तक योजनाओं का लाभ पहुंच ही नहीं पा रहा। रिम्स सेंटर में न्यूट्रिशनिस्ट, रसोइया और वार्ड बॉय की कमी के कारण पहले तो भोजन व्यवस्था ठप रही, और अब भी अभिभावक दूरदराज के गांवों से इलाज के लिए नहीं पहुंच पाते। एनएफएचएस-5 के मुताबिक, शहरी क्षेत्रों में 26.8 प्रतिशत बच्चे बौनेपन के शिकार हैं, जबकि अति गंभीर कुपोषण 9.1 प्रतिशत है, लेकिन सरकारी दावों के बावजूद 2014 के आंकड़ों जैसी स्थिति बनी हुई है। आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका बढ़ाने की बात तो होती है, मगर निगरानी की कमी से पैकेट और दवाएं गांवों तक नहीं पहुंच रही।<span class="inline-flex">​</span></p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>आगे की राह: क्या हो समाधान?</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">कुपोषण की इस जंग को जीतने के लिए जिला स्तर पर सख्त निगरानी, रेफरल सेंटर्स का व्यापक प्रचार-प्रसार और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को सशक्त बनाना जरूरी है। आदिवासी समुदायों में जागरूकता अभियान चलाकर मां-बच्चों को पोषण शिक्षा देनी होगी, ताकि सरकारी योजनाएं कागजों से निकलकर जिंदगियों में उतरें। अगर तत्काल कदम नहीं उठे, तो झारखंड का भविष्य कुपोषण के आगोश में खो सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 12 Feb 2026 20:35:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sujit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सोशल मीडिया ट्रोलिंग: अभिव्यक्ति की आज़ादी या डिजिटल बदतमीज़ी? ट्रोलिंग केस और कानून </title>
                                    <description><![CDATA[<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>समृद्ध डेस्क: </strong>सोशल मीडिया ट्रोलिंग आज हर आम इंसान से लेकर बड़े सेलिब्रिटी तक की जिंदगी में घुस चुकी है। ये सवाल उठता है कि क्या ये सिर्फ अपनी राय रखने की आजादी है या फिर डिजिटल दुनिया में बेलगाम बदतमीजी का रूप?</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>ट्रोलिंग का बढ़ता चलन</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">भारत में सोशल मीडिया यूजर्स की तादाद 50 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है, और इसी के साथ ट्रोलिंग के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं। खासकर 2025-26 में राजनीतिक बहसों, सेलिब्रिटी पोस्ट्स और पर्सनल डिस्प्यूट्स पर ट्रोल्स की बाढ़ आ गई है। एक हालिया केरल केस में, जहां एक बस में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/social-media-trolling-freedom-of-expression-or-digital-abuse-trolling/article-18089"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/gemini_generated_image_h0sbngh0sbngh0sb.jpg" alt=""></a><br /><p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>समृद्ध डेस्क: </strong>सोशल मीडिया ट्रोलिंग आज हर आम इंसान से लेकर बड़े सेलिब्रिटी तक की जिंदगी में घुस चुकी है। ये सवाल उठता है कि क्या ये सिर्फ अपनी राय रखने की आजादी है या फिर डिजिटल दुनिया में बेलगाम बदतमीजी का रूप?</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>ट्रोलिंग का बढ़ता चलन</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">भारत में सोशल मीडिया यूजर्स की तादाद 50 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है, और इसी के साथ ट्रोलिंग के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं। खासकर 2025-26 में राजनीतिक बहसों, सेलिब्रिटी पोस्ट्स और पर्सनल डिस्प्यूट्स पर ट्रोल्स की बाढ़ आ गई है। एक हालिया केरल केस में, जहां एक बस में कंटेंट क्रिएटर शिम्जिथा मुस्तफा ने सेल्स मैनेजर दीपक यू पर गलत छेड़छाड़ का आरोप लगाते हुए वीडियो पोस्ट किया, तो ट्रोल्स ने दीपक को इतना घेरा कि वो सुसाइड कर लिया। ये घटना दिखाती है कि कैसे एक वीडियो वायरल होते ही बिना जांच के लोग ट्रायल कर देते हैं, जो जिंदगियां बर्बाद कर सकता है। सर्वे बताते हैं कि टीनएजर्स में साइबरबुलिंग के केस 2025 में दोगुने हो गए, जहां ट्रोलिंग से मेंटल हेल्थ पर बुरा असर पड़ रहा है।<span class="inline-flex">​</span></p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>अभिव्यक्ति की आजादी की सीमाएं</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर नागरिक को है, लेकिन ये असीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि फ्री स्पीच दूसरों की गरिमा और प्राइवेसी का सम्मान करे। 2025 में विदेश सचिव विक्रम मिसरी को ट्रोलिंग और डॉक्सिंग का शिकार बनाया गया, जहां उनकी बेटी तक को निशाना बनाया गया, लेकिन सरकार ने कोई ठोस एक्शन नहीं लिया। कोर्ट ने साफ कहा कि आर्टिकल 21 (जीवन का अधिकार) आर्टिकल 19 से ऊपर है, और ट्रोलिंग अगर हेट स्पीच या धमकी बने तो कार्रवाई होनी चाहिए। हाल ही में फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पोस्ट्स पर ऑटोमैटिक एक्शन न लेने के निर्देश दिए, लेकिन साम्प्रदायिक या हिंसा भड़काने वाले मामलों में सख्ती बरतने को कहा।</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>कानूनी हथियार ट्रोल्स के खिलाफ</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">भारत में ट्रोलिंग रोकने के लिए स्पेसिफिक लॉ नहीं है, लेकिन आईटी एक्ट 2000 की धारा 67 (अश्लील कंटेंट) और धारा 66E (प्राइवेसी ब्रेक) से निपटा जा सकता है। आईपीसी की धारा 354D (स्टॉकिंग), 507 (अनाम धमकी) और 503 (क्रिमिनल इंटिमिडेशन) भी ट्रोल्स पर लगाई जाती हैं। श्रेया सिंघल केस में धारा 66A हटा दी गई क्योंकि वो फ्री स्पीच के खिलाफ थी, लेकिन बाकी सेक्शन्स अभी सख्ती से लागू हो सकते हैं। आंध्र हाईकोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया पर गलत जानकारी या अश्लील कमेंट्स कानूनन अपराध हैं, प्लेटफॉर्म्स को छूट नहीं। फिर भी, गुमनाम अकाउंट्स की वजह से एक्शन लेना मुश्किल होता है।</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>समाज पर गहरा असर</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">ट्रोलिंग न सिर्फ पीड़ित को तोड़ती है, बल्कि पूरे समाज में नफरत फैलाती है। महिलाएं, माइनॉरिटीज और पब्लिक फिगर्स सबसे ज्यादा टारगेट होते हैं, जो डिबेट को दबा देती है। जर्नल स्टडीज दिखाती हैं कि ट्रोलिंग मिसइंफॉर्मेशन फैलाती है और पॉलिटिकल डिस्कोर्स को खराब करती है। सुप्रीम कोर्ट के जज भी ट्रोल्स के शिकार हो चुके हैं, जहां उन्होंने इसे 'नृशंस' बताया लेकिन इग्नोर करने की सलाह दी।</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>आगे की राह</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">ट्रोलिंग को कंट्रोल करने के लिए स्ट्रॉन्ग रेगुलेशन्स, डिजिटल लिटरेसी और प्लेटफॉर्म्स पर बेहतर मॉडरेशन जरूरी है। ड्राफ्ट डीपीडीपी रूल्स 2025 कुछ राहत दे सकते हैं, लेकिन इंप्लीमेंटेशन की चुनौती बनी हुई है। यूजर्स को भी जिम्मेदार बनना होगा ताकि डिजिटल स्पेस डेमोक्रेटिक रहे, बदतमीजी का अड्डा न बने।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Thu, 12 Feb 2026 18:41:44 +0530</pubDate>
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