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                <title>समाज - Samridh Jharkhand</title>
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                <description>समाज RSS Feed</description>
                
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                <title>जमुआ: एक्साइज इंस्पेक्टर सुबोध कुशवाहा की ‘प्रयास पहल’ संस्था से संवर रहा हजारों बच्चों का भविष्य, बरगद के पेड़ से शुरू हुआ सफर</title>
                                    <description><![CDATA[जमुआ में एक्साइज इंस्पेक्टर सुबोध कुशवाहा द्वारा शुरू की गई ‘प्रयास पहल’ आज ग्रामीण शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी मिसाल बन चुकी है। कोरोना काल में बरगद के पेड़ के नीचे शुरू हुई यह पहल अब 10 शिक्षण केंद्रों तक फैल चुकी है। संस्था हजारों बच्चों को निशुल्क शिक्षा, पुस्तकालय सुविधा, खेल, स्वास्थ्य शिविर और पौधारोपण जैसे अभियानों से जोड़ रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/giridih/jamuas-prayas-pahal-is-shaping-the-future-of-thousands-of/article-21907"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/image-(4)_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>गिरिडीह:</strong> प्रयास पहल के संस्थापक एवं एक्साइज इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत सुबोध कुशवाहा ने अपने प्रयासों से ग्रामीण शिक्षा के क्षेत्र में नई मिसाल कायम की है। उनके द्वारा शुरू की गई ‘प्रयास पहल’ आज हजारों ग्रामीण बच्चों के भविष्य को शिक्षा के उजियारे से रोशन कर रही है।</p>
<p>खोरीमहुआ अनुमंडल क्षेत्र के बीघा, कोदम्बरी में प्रयास पहल संस्था का कार्यालय है। वर्ष 2020 में, जब कोरोना महामारी के कारण पूरी दुनिया थम गई थी और स्कूल-कॉलेज बंद थे, तब सुबोध कुशवाहा ने अपने गांव ‘बीघा’ के बच्चों के भविष्य को लेकर चिंता जताई। उन्होंने मंटू वर्मा के साथ मिलकर एक बरगद के पेड़ के नीचे ‘प्रयास क्लासेस’ की नींव रखी। सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क के साथ शुरू हुई यह छोटी-सी कोशिश आज एक बड़े सामाजिक आंदोलन का रूप ले चुकी है।</p>
<p>वर्तमान में ‘प्रयास पहल’ के 10 विभिन्न शिक्षण केंद्र संचालित हैं। खास बात यह है कि ये क्लासेस किसी आलीशान भवन में नहीं, बल्कि प्रकृति की गोद में, पेड़ों के नीचे चलती हैं। यहाँ गांव के ही उच्च शिक्षा प्राप्त युवा स्वेच्छा से अपना समय दान करते हैं। अब तक सैकड़ों शिक्षक इस निस्वार्थ भाव से संस्था से जुड़ चुके हैं।</p>
<h4><strong>समाज के सर्वांगीण विकास के लिए बहुआयामी प्रयास</strong></h4>
<p>प्रयास पहल केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बच्चों के संपूर्ण व्यक्तित्व विकास पर केंद्रित है। प्रयास पहल के बच्चों को शैक्षणिक सामग्री, प्रशिक्षण व विभिन्न प्रकार के आयोजन कराने तथा संस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए आर्थिक जरूरतों हेतु 150 से अधिक नियमित सदस्य जुड़े हुए हैं, जो अपनी इच्छा शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार आर्थिक सहयोग करते हैं।</p>
<h4><strong>प्रयास पहल की समाज के लिए कुछ महत्वपूर्ण पहल</strong></h4>
<p><strong>प्रयास पुस्तकालय:</strong> गाँव-समाज के सभी बच्चों तक ज्ञानवर्धक पुस्तकें पहुँचाने और शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए कई स्थानों पर प्रयास पुस्तकालय खोले गए हैं, जहाँ हजारों पुस्तकें बच्चों के लिए निशुल्क उपलब्ध हैं।</p>
<p><strong>प्रयास सांस्कृतिक कार्यक्रम:</strong> ग्रामीण बच्चों की प्रतिभा को निखारने और उन्हें बेहतर मंच उपलब्ध कराने के साथ-साथ विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर जागरूक करने में यह पहल महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।</p>
<p><strong>प्रयास स्पोर्ट्स:</strong> विभिन्न शिक्षण केंद्रों के बच्चों के लिए आयोजित यह मल्टीस्पोर्ट टूर्नामेंट अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने का एक बेहतरीन मंच साबित हुआ है। इस टूर्नामेंट में लड़कों के साथ-साथ लड़कियों की भी सक्रिय भागीदारी रही।</p>
<p><strong>प्रयास स्वास्थ्य शिविर:</strong> ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा व स्वास्थ्य से संबंधित जागरूकता के लिए यह पहल महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। नवजीवन नर्सिंग होम, गिरिडीह के विशेषज्ञ डॉक्टरों ने अनेक लोगों को निःशुल्क चिकित्सा परामर्श व दवा उपलब्ध कराई।</p>
<p><strong>प्रयास पौधारोपण अभियान:</strong> पेड़ प्रकृति का अनमोल उपहार हैं। पेड़ों के कारण ही हमारा जीवन संभव है। पेड़-पौधे हमें अनगिनत तरीकों से लाभ पहुँचाते हैं। पर्यावरण संरक्षण हमारी सामाजिक व नैतिक जिम्मेदारी है। प्रयास पहल संस्था द्वारा अब तक हजारों नए पौधे लगाए जा चुके हैं।</p>
<p>‘स्माइल फॉर ऑल’, जयपुर के सहयोग से 22 विभिन्न गांवों के 53 ऐसे बच्चों, जिनके अभिभावक नहीं हैं या जिनकी आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय है, उनका नामांकन नजदीकी निजी विद्यालयों में कराया गया है। उन सभी बच्चों का मासिक शुल्क संस्था द्वारा वहन किया जाता है।</p>
<p>‘वन टीचर वन साइंटिस्ट’ संस्था के ‘स्लेट पाठ्यक्रम’ के माध्यम से बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराई जाती है, जो शिक्षण की एक नवीन पद्धति है। वैशाली गुप्ता द्वारा विकसित यह पद्धति बच्चों के सीखने और उनके सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।</p>
<h4><strong>अनेकों युवा व युवतियाँ इस अभियान का हिस्सा बने</strong></h4>
<p>इस सकारात्मक पहल को देखते हुए विकास कृष्ण मंडल, पंकज कुमार, मोहुआ चटर्जी, सुमन वर्मा, तेजलाल वर्मा, आदित्य वर्मा, देवनंदन वर्मा, आदर्श कुमार, राजू राय, महावीर बर्मा, राजू विश्वकर्मा, आरती कुमारी, कुंदन कुमार, रौशन कुमार, सिंकी कुमारी, पवन वर्मा, करण मोहली, संतोष कुशवाहा, सुनील कुमार, ज्योति कुमारी, प्रवेश वर्मा, मनीषा कुमारी सहित अनेक युवा व युवतियाँ इस अभियान का हिस्सा बने, जिसके सहयोग से प्रयास पहल ने आसपास के 10 विभिन्न गांवों में अपने शिक्षण केंद्र स्थापित किए और हजारों बच्चों को निरंतर निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराई जाने लगी।</p>
<h4><strong>समाज के प्रति जिम्मेदारी भी जरूरी है: सुबोध कुशवाहा</strong></h4>
<p>प्रयास पहल के संस्थापक एवं एक्साइज इंस्पेक्टर सुबोध कुशवाहा ने कहा कि जिस तरह बड़े होकर हम अपने माता-पिता और परिवार की सेवा के प्रति उत्तरदायी होते हैं, उसी तरह हमें समाज के प्रति भी जिम्मेदारी निभानी चाहिए और बेहतर समाज निर्माण में अपनी भूमिका निभानी चाहिए।</p>
<p>उन्होंने कहा कि सरकारी सेवा में आने के बाद प्रयास पहल से जुड़े सभी महत्वपूर्ण कार्यों की जिम्मेदारी संस्था के अध्यक्ष पंकज कुमार, सचिव विकास कृष्ण मंडल सहित अन्य सदस्यों के कंधों पर है। ये सभी लोग बहुत ही मेहनत, लगन और समर्पण के साथ कार्य कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इस सामाजिक परिवर्तन के महायज्ञ में उनका सहयोग हमेशा बना रहेगा और भविष्य में भी प्रयास पहल व जरूरतमंद लोगों के लिए वे उपलब्ध रहेंगे।</p>
<p>सबसे पहले 20 मई 2020 को बीघा शिक्षण केंद्र खुला। इसके बाद छपरा शिक्षण केंद्र, गुंडरी शिक्षण केंद्र, कोदम्बरी शिक्षण केंद्र, जमखोखरो शिक्षण केंद्र, लबनिया शिक्षण केंद्र, भूचरोबाद शिक्षण केंद्र, करिहारी शिक्षण केंद्र, रांची शिक्षण केंद्र, चिकनाडीह शिक्षण केंद्र, गिरिडीह शिक्षण केंद्र, भुलवाही शिक्षण केंद्र, एकड़रिवा शिक्षण केंद्र, गादीकला शिक्षण केंद्र आदि शामिल हैं। प्रयास पहल संस्था द्वारा सुदूरवर्ती बच्चों को शिक्षा के प्रति जागरूक किया जाता है। पूरे वर्ष संस्था द्वारा विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>गिरिडीह</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 20 May 2026 14:34:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गाँव की चौपाल से डिजिटल समाज तक: बदलते भारत की नई कहानी</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय समाज की पहचान सदियों तक गाँवों की चौपालों, सामूहिक जीवनशैली और आत्मीय संबंधों से रही है। लेकिन तकनीकी क्रांति और डिजिटल युग ने समाज की संरचना को तेजी से बदल दिया है। अब संवाद चौपालों से निकलकर मोबाइल स्क्रीन और सोशल मीडिया तक पहुंच गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/gaon-ki-chaupal-se-digital-samaj-tak-badalta-bharat/article-21704"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/7c0b2f3a-1005-454d-bd3e-b879cfc1cddb_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>आशुतोष प्रसाद</strong></p>
<p>भारतीय समाज की आत्मा सदैव उसके गाँवों में बसती रही है। इन गाँवों की पहचान केवल खेत-खलिहानों, नदी-तालाबों या मिट्टी की सोंधी गंध से ही नहीं थी, बल्कि वहाँ की सामूहिक जीवन-शैली, पारस्परिक संबंधों और चौपालों से भी थी। चौपाल केवल गाँव का एक स्थान नहीं था; वह लोकजीवन की धड़कन थी। वहीं पर निर्णय होते थे, रिश्ते बनते थे, गीत गाए जाते थे, दुःख बाँटे जाते थे और समाज अपनी सामूहिक चेतना को जीवित रखता था। किंतु समय के चक्र ने समाज को एक नई दिशा दी है। आज वही समाज डिजिटल माध्यमों से संचालित हो रहा है। मोबाइल स्क्रीन ने चौपाल की जगह ले ली है और संवाद अब आमने-सामने नहीं, बल्कि ऑनलाइन होने लगे हैं। गाँव की चौपाल से डिजिटल समाज तक की यह यात्रा केवल तकनीकी परिवर्तन नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों, संस्कृति और जीवन-मूल्यों के परिवर्तन की भी कहानी है।</p>
<p>पुराने समय में गाँव की चौपाल सामाजिक लोकतंत्र का जीवंत उदाहरण हुआ करती थी। पीपल या बरगद के विशाल वृक्ष के नीचे बनी चौपाल में गाँव के बुजुर्ग, किसान, युवा और बच्चे एकत्रित होते थे। वहाँ राजनीतिक चर्चा भी होती थी, खेती-बारी के उपाय भी तय होते थे और लोकगीतों की मधुर स्वर-लहरियाँ भी गूँजती थीं। चौपाल समाज को जोड़ने वाली वह डोर थी, जिसमें आत्मीयता और विश्वास का अद्भुत संगम दिखाई देता था। किसी परिवार में संकट हो या किसी घर में उत्सव, चौपाल पूरे गाँव को एक सूत्र में बाँध देती थी। वहाँ संवाद में धैर्य था, विचारों में संवेदना थी और संबंधों में अपनापन।</p>
<p>किन्तु आधुनिकता और तकनीकी क्रांति ने इस परिदृश्य को तेजी से बदल दिया। इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया ने मनुष्य के जीवन को अभूतपूर्व गति प्रदान की। आज सूचना का आदान-प्रदान सेकंडों में हो जाता है। शिक्षा, व्यापार, बैंकिंग, चिकित्सा और शासन—सब कुछ डिजिटल माध्यमों से जुड़ गया है। जिस सूचना तक पहुँचने में कभी कई दिन लगते थे, वह अब एक क्लिक पर उपलब्ध है। डिजिटल समाज ने ज्ञान और अवसरों के नए द्वार खोले हैं। गाँवों में भी ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल भुगतान और ई-गवर्नेंस जैसी सुविधाओं ने जीवन को अधिक सरल और सुविधाजनक बनाया है।</p>
<p>कोविड-19 महामारी के दौरान डिजिटल समाज की उपयोगिता सबसे अधिक दिखाई दी। जब दुनिया घरों में सीमित हो गई थी, तब इंटरनेट ने ही लोगों को शिक्षा, रोजगार और संवाद से जोड़े रखा। दूर बैठे लोग वीडियो कॉल के माध्यम से एक-दूसरे के निकट बने रहे। इस दृष्टि से डिजिटल क्रांति ने समाज को नई ऊर्जा और नई संभावनाएँ प्रदान की हैं।</p>
<p>किन्तु हर परिवर्तन अपने साथ कुछ प्रश्न और चुनौतियाँ भी लेकर आता है। डिजिटल समाज ने जहाँ सुविधाएँ बढ़ाई हैं, वहीं मानवीय संबंधों में दूरी भी पैदा की है। चौपाल में बैठकर जो सामूहिकता अनुभव होती थी, वह मोबाइल की स्क्रीन पर संभव नहीं हो पाती। पहले लोग एक-दूसरे के दुःख-सुख में सहभागी बनते थे, आज वे केवल “लाइक” और “इमोजी” तक सीमित होते जा रहे हैं। संवाद की आत्मीयता कहीं न कहीं कृत्रिमता में बदलती दिखाई देती है।</p>
<p>डिजिटल समाज का एक बड़ा संकट सूचना की अति भी है। आज मनुष्य के पास जानकारी तो बहुत है, परंतु ज्ञान और विवेक का अभाव बढ़ता जा रहा है। सोशल मीडिया पर फैलती अफवाहें, झूठी खबरें और नकारात्मकता समाज को विभाजित भी कर रही हैं। चौपाल में संवाद प्रत्यक्ष होता था, इसलिए उत्तरदायित्व भी बना रहता था; परंतु डिजिटल माध्यमों में अनामता के कारण असंवेदनशीलता और कटुता बढ़ती दिखाई देती है।</p>
<p>इसके अतिरिक्त डिजिटल संस्कृति ने नई पीढ़ी को लोकजीवन और परंपराओं से भी दूर किया है। कभी गाँवों में लोकगीत, लोककथाएँ और पारंपरिक उत्सव सामूहिक जीवन का हिस्सा थे, किंतु अब युवा पीढ़ी का अधिक समय आभासी दुनिया में बीतने लगा है। </p>
<p>परिणामस्वरूप लोकसंस्कृति और सामाजिक आत्मीयता का क्षरण दिखाई देता है। यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि किसी भी समाज की पहचान उसकी सांस्कृतिक जड़ों से होती है।<br />फिर भी यह कहना उचित नहीं होगा कि डिजिटल समाज केवल नकारात्मक परिवर्तन लेकर आया है। आवश्यकता इस बात की है कि हम तकनीक को साधन के रूप में उपयोग करें, साध्य के रूप में नहीं। यदि चौपाल की आत्मीयता और डिजिटल युग की सुविधा का संतुलित समन्वय हो सके, तो समाज अधिक समृद्ध और मानवीय बन सकता है। आज भी कई गाँवों में डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से लोककला, हस्तशिल्प और कृषि उत्पादों को वैश्विक पहचान मिल रही है। ऑनलाइन माध्यमों से लोकसाहित्य और क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण का कार्य भी हो रहा है। यह इस बात का संकेत है कि तकनीक यदि संवेदना से जुड़ जाए, तो वह संस्कृति की संरक्षक भी बन सकती है।</p>
<p>वास्तव में, गाँव की चौपाल से डिजिटल समाज तक की यात्रा मानव सभ्यता की निरंतर गतिशीलता का प्रतीक है। समय बदलता है, साधन बदलते हैं, लेकिन समाज की आत्मा तभी जीवित रहती है जब संवाद में संवेदना, संबंधों में आत्मीयता और जीवन में मानवीयता बनी रहे। यदि डिजिटल युग में भी हम चौपाल की सामूहिक चेतना, अपनापन और सामाजिक उत्तरदायित्व को बचाए रख सकें, तो यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मानवीय विकास की दिशा में एक सार्थक कदम सिद्ध होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 18 May 2026 13:59:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>साइबर ठगी में गया पैसा वापस पाने का सरकारी रास्ता, जिससे आज भी अनजान हैं अधिकांश लोग</title>
                                    <description><![CDATA[देश में बढ़ते साइबर अपराध के बीच अब ठगी का पैसा वापस पाने का सरकारी रास्ता भी मौजूद है। गृह मंत्रालय के राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल और 1930 हेल्पलाइन के जरिए पीड़ित समय रहते शिकायत दर्ज कर अपने पैसे को फ्रीज करवा सकते हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/government-way-to-get-back-money-lost-in-cyber-fraud/article-21598"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/84380959-8409-4843-b75f-adfd46aa424a_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong><em>आलोक वर्मा</em></strong></p>
<p>रात के करीब दस बजे थे। लखनऊ के इंदिरानगर में रहने वाले रमेश वर्मा के मोबाइल पर एक कॉल आई। आवाज़ सधी हुई थी और लहजा बिल्कुल बैंक कर्मचारी जैसा। कॉल करने वाले ने कहा, “सर, आपका केवाईसी अपडेट नहीं हुआ है, खाता बंद हो जाएगा।” अगले बीस मिनट में रमेश के खाते से 28 हजार रुपये उड़ चुके थे।</p>
<p>यह कोई अकेला मामला नहीं है। देशभर में हर दिन ऐसे हजारों मामले सामने आते हैं। कोई नकली बिजली बिल के बहाने ठगा जाता है, तो कोई शेयर बाजार में मोटे मुनाफे का लालच देकर लूट लिया जाता है। अधिकांश पीड़ित थाने और बैंक के चक्कर लगाने के बाद यह मान लेते हैं कि एक बार पैसा चला गया तो वापस नहीं मिलेगा। लेकिन अब यह धारणा पूरी तरह सही नहीं रह गई है।</p>
<p>गृह मंत्रालय के अंतर्गत संचालित राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल का “धनराशि पुनर्प्राप्ति मंच” एक ऐसी व्यवस्था है, जो बैंकों, पुलिस और साइबर एजेंसियों को एक मंच पर जोड़ती है। इसका उद्देश्य साफ है — ठगी की सूचना समय रहते मिल जाए तो संदिग्ध खातों को तुरंत फ्रीज कर ठगों द्वारा रकम निकालने से रोका जा सके और पीड़ित का पैसा वापस दिलाया जा सके।</p>
<p>साइबर ठगी के मामलों में शुरुआती 24 घंटे सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं। जितनी देर शिकायत करने में होती है, उतनी ही जल्दी ठग पैसे को अलग-अलग खातों में ट्रांसफर कर देते हैं या नकद निकाल लेते हैं। इसलिए ठगी होते ही राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करना या सरकारी पोर्टल पर शिकायत दर्ज करना बेहद जरूरी है।</p>
<p>पोर्टल की प्रक्रिया काफी सरल है। शिकायतकर्ता को मोबाइल नंबर और ओटीपी के जरिए सत्यापन करना होता है। इसके बाद शिकायत की जानकारी संबंधित बैंक और पुलिस तक पहुंच जाती है। बैंक संदिग्ध खाते को रोक देता है और भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र फर्जी खातों की पहचान करने में जुट जाता है।</p>
<p>शिकायत दर्ज करने के लिए लेनदेन की पहचान संख्या, ठगी की तारीख और समय, रकम, बैंक खाता विवरण और स्क्रीनशॉट जैसी जानकारियां जरूरी होती हैं। शिकायत दर्ज होने के बाद एक ट्रैकिंग नंबर मिलता है, जिससे पीड़ित अपने मामले की स्थिति देख सकता है।</p>
<p>हालांकि, हर मामले में पैसा वापस मिलना संभव नहीं होता। यदि रकम विदेश भेज दी गई हो या ठग पहले ही पैसा निकाल चुके हों, तो वापसी मुश्किल हो सकती है। बड़ी रकम की ठगी में साइबर थाने में एफआईआर दर्ज कराना भी जरूरी माना जाता है।</p>
<p>विशेषज्ञों का कहना है कि आज भी बड़ी संख्या में लोग इस सरकारी व्यवस्था के बारे में नहीं जानते। कई बार बैंक और स्थानीय स्तर पर भी इसकी जानकारी लोगों तक नहीं पहुंच पाती। यही कारण है कि कई पीड़ित समय रहते शिकायत नहीं कर पाते।</p>
<p>रमेश वर्मा के मामले में उनके बेटे ने कुछ घंटों के भीतर 1930 हेल्पलाइन पर कॉल कर शिकायत दर्ज कराई। करीब तीन सप्ताह बाद 28 हजार रुपये में से 22 हजार रुपये वापस मिल गए। यह व्यवस्था चमत्कार नहीं करती, लेकिन समय पर उठाया गया कदम नुकसान को काफी हद तक कम कर सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 17 May 2026 15:50:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बेज़ुबानों को पिला रहे पानी, इंसानियत की मिसाल बनी “दाना-पानी” पहल</title>
                                    <description><![CDATA[भीषण गर्मी में जब इंसान सुरक्षित स्थानों और पानी की व्यवस्था कर लेता है, वहीं बेजुबान पक्षी और जानवर प्यास से बेहाल रहते हैं। इसी संवेदनशीलता को समझते हुए शहर की संस्था बीइंग रेस्पॉन्सिबल द्वारा “दाना-पानी” अभियान चलाया जा रहा है। इस वर्ष संस्था ने 200 से अधिक मिट्टी के सकोरे और दाने वितरित किए हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/dana-pani-abhiyan-bezubaan-pakshi-pani-samaj-sewa-being-responsible/article-21292"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/f0eabac9-dc0d-4dae-91fe-c0912a05e34f_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>नेशनल डेस्क: </strong>इंसानियत सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं होती—इस बात को चरितार्थ कर रही है शहर की सामाजिक संस्था “बीइंग रेस्पॉन्सिबल” द्वारा चलाई जा रही “दाना-पानी” पहल। भीषण गर्मी के इस मौसम में जब इंसान पानी और छांव की तलाश में सुरक्षित स्थानों तक पहुँच जाता है, वहीं बेजुबान पक्षी और जानवर प्यास से बेहाल सड़कों, छतों और खुले इलाकों में भटकते नजर आते हैं।</p>
<p>तेज धूप में जब कोई चिड़िया अपनी प्यास बुझाने के लिए आसमान की ओर बेबस निगाहों से देखती है, तो यह दृश्य हर संवेदनशील व्यक्ति के मन को झकझोर देता है। ऐसे ही हालात में यह पहल इन बेजुबानों के लिए राहत बनकर सामने आई है।</p>
<p>संस्था बीइंग रेस्पॉन्सिबल पिछले लगभग चार वर्षों से लगातार हर गर्मी में “दाना-पानी” अभियान चला रही है। इस वर्ष भी संस्था ने शहर के विभिन्न इलाकों में 200 से अधिक मिट्टी के सकोरे और दाने वितरित किए हैं, ताकि पक्षियों और जानवरों को गर्मी में पानी और भोजन की सुविधा मिल सके।</p>
<p>संस्था का मानना है कि यदि हर व्यक्ति अपने घर की छत, आंगन या दरवाजे के बाहर एक सकोरा रखकर उसमें नियमित पानी भर दे, तो हजारों बेजुबान जीवों की जान बचाई जा सकती है। यह छोटा-सा प्रयास कई मासूम जिंदगियों के लिए जीवनदान साबित हो सकता है।</p>
<p>यह पहल केवल सेवा कार्य नहीं, बल्कि एक संवेदनशील विचार है, जो यह संदेश देता है कि पृथ्वी पर हर जीव का समान अधिकार है। जब एक पक्षी प्यास से तड़पता है, तो वह केवल एक जीव नहीं बल्कि हमारी इंसानियत का प्रतिबिंब होता है।</p>
<p>बीइंग रेस्पॉन्सिबल द्वारा चलाई जा रही यह मुहिम बिना किसी शोर-शराबे और दिखावे के लगातार आगे बढ़ रही है। धीरे-धीरे लोग भी इस पहल से जुड़ रहे हैं और अपने घरों में सकोरे रखकर बेजुबानों की मदद कर रहे हैं।</p>
<p>संस्था का कहना है कि शहरों में विकास की दौड़ में पेड़ और जल स्रोत कम होते जा रहे हैं, जिसका सबसे अधिक असर इन बेजुबान जीवों पर पड़ रहा है। ऐसे में यह सकोरे उनके लिए जीवन की डोर बनते जा रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/article/environment/dana-pani-abhiyan-bezubaan-pakshi-pani-samaj-sewa-being-responsible/article-21292</link>
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                <pubDate>Tue, 12 May 2026 17:58:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बैंक के भीतर से बढ़ता साइबर खतरा: हालिया मामलों ने क्यों बढ़ाई चिंता</title>
                                    <description><![CDATA[भारत में साइबर फ्रॉड के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है, लेकिन अब एक नया खतरा सामने आया है—बैंकिंग सिस्टम के भीतर से होने वाला इनसाइडर फ्रॉड। हालिया मामलों में बैंक कर्मचारियों की मिलीभगत से म्यूल अकाउंट के जरिए करोड़ों रुपये की ठगी को अंजाम दिया गया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/banking-system-cyber-fraud-insider-threat-india/article-20943"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/f45dd5f2-8a28-40aa-bedc-8dcac4a5b479_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>आलोक वर्मा</strong></p>
<p>भारत में साइबर फ्रॉड के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन हालिया घटनाओं ने इस समस्या के एक नए और चिंताजनक पहलू को उजागर किया है। अब यह साफ होता जा रहा है कि साइबर अपराध केवल बाहरी गिरोहों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बैंकिंग सिस्टम के भीतर से भी उन्हें सहयोग मिल रहा है।</p>
<p>हाल ही में हैदराबाद पुलिस की एक बहु-राज्यीय कार्रवाई में “ऑपरेशन ऑक्टोपस 2.0” के तहत 50 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें 30 से ज्यादा बैंक कर्मचारी शामिल थे। जांच में सामने आया कि इन कर्मचारियों ने केवाईसी नियमों की अनदेखी कर सैकड़ों म्यूल अकाउंट खुलवाए, जिनके जरिए लगभग 150 करोड़ रुपये के संदिग्ध लेनदेन को अंजाम दिया गया। यह मामला इस बात का स्पष्ट संकेत है कि बैंक के अंदर की मिलीभगत साइबर अपराध को किस स्तर तक पहुंचा सकती है।</p>
<p>इसी तरह पिछले कुछ महीनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां बैंक कर्मचारियों पर फर्जी खातों को मंजूरी देने या संदिग्ध लेनदेन को नजरअंदाज करने के आरोप लगे हैं। जांच एजेंसियों के अनुसार, साइबर अपराधी अब सीधे बैंक कर्मचारियों से संपर्क स्थापित कर रहे हैं और उन्हें कमीशन के बदले सहयोग के लिए तैयार कर रहे हैं।</p>
<p>म्यूल अकाउंट इस पूरे नेटवर्क की रीढ़ बन चुके हैं। ये ऐसे बैंक खाते होते हैं जिनका उपयोग केवल पैसे के प्रवाह को छिपाने के लिए किया जाता है। पीड़ित से ठगी की गई राशि पहले इन खातों में डाली जाती है, फिर कई स्तरों पर ट्रांसफर कर अंततः निकाल ली जाती है। इस प्रक्रिया में बैंकिंग सिस्टम की आंतरिक जानकारी का दुरुपयोग किया जाता है, जिससे जांच और भी कठिन हो जाती है।</p>
<p>विशेषज्ञों का मानना है कि इनसाइडर मिलीभगत के कारण साइबर फ्रॉड का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। जब बैंक के भीतर से ही नियमों में ढील दी जाती है, तो सुरक्षा की पूरी व्यवस्था कमजोर पड़ जाती है। इससे न केवल वित्तीय नुकसान होता है, बल्कि आम लोगों का बैंकिंग सिस्टम पर भरोसा भी प्रभावित होता है।</p>
<p>डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन बैंकिंग के तेजी से विस्तार के साथ यह समस्या और गंभीर होती जा रही है। भारत में करोड़ों लोग अब मोबाइल और इंटरनेट के माध्यम से लेनदेन कर रहे हैं। ऐसे में यदि बैंक के भीतर नियंत्रण कमजोर पड़ते हैं, तो इसका असर व्यापक स्तर पर पड़ सकता है।</p>
<p>इस स्थिति से निपटने के लिए बैंकों को अपनी आंतरिक निगरानी प्रणाली को मजबूत करना होगा। कर्मचारियों की जवाबदेही तय करना, केवाईसी प्रक्रिया को सख्ती से लागू करना और संदिग्ध लेनदेन पर तुरंत कार्रवाई करना जरूरी है। साथ ही, नियामक संस्थाओं को भी इस तरह के मामलों पर कड़ी नजर रखनी होगी।</p>
<p>कानूनी कार्रवाई भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि बैंक अधिकारी जानबूझकर साइबर फ्रॉड में शामिल पाए जाते हैं, तो उनके खिलाफ कड़े प्रावधानों के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। इससे न केवल दोषियों को सजा मिलेगी, बल्कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर रोक लगाने में भी मदद मिलेगी।</p>
<p>अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि साइबर फ्रॉड का खतरा अब केवल तकनीकी नहीं बल्कि संस्थागत चुनौती बन चुका है। जब बैंक के भीतर से ही सहयोग मिलने लगे, तो समस्या का समाधान और जटिल हो जाता है। ऐसे में पारदर्शिता, सख्त निगरानी और जागरूकता ही इस बढ़ते खतरे से निपटने का रास्ता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 May 2026 14:23:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अंधविश्वास पर हर साल 2 करोड़ खर्च, फिर भी नहीं थम रही मौतें; जानिए 4 साल में कितनी जानें गईं</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>समृद्ध डेस्क:</strong> झारखंड में अंधविश्वास आज भी एक बड़ी सामाजिक समस्या बना हुआ है, जहां हर साल कई निर्दोष लोग इसकी भेंट चढ़ जाते हैं. सरकारी स्तर पर जागरूकता और रोकथाम के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद हालात पूरी तरह नियंत्रण में नहीं आ सके हैं. आंकड़े बताते हैं कि राज्य में अंधविश्वास के कारण औसतन हर साल करीब 18 लोगों की जान चली जाती है, जो समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है.</p>

<div style="font-family:Arial, sans-serif;background:#ffffff;padding:16px;margin:20px 0;">
<div style="font-size:20px;font-weight:bold;color:#b30000;margin-bottom:12px;text-align:center;">चार साल में अंधविश्वास से मौत के मामले: जिला-वार आंकड़े (2022–2025)</div>
<table style="width:100%;border-collapse:collapse;min-width:600px;">
<thead>
<tr style="color:#ffffff;">
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">जिला</th>
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2025</th>
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2024</th>
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2023</th>
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2022</th>
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">कुल</th>
</tr>
</thead>
<tbody>
<tr>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">रांची</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td></tr></tbody></table></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/jharkhand-andhvishwas-deaths-73-in-4-years-2-crore-spent-awareness-data/article-19959"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-04/chatgpt-image-apr-3,-2026,-08_16_44-pm.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>समृद्ध डेस्क:</strong> झारखंड में अंधविश्वास आज भी एक बड़ी सामाजिक समस्या बना हुआ है, जहां हर साल कई निर्दोष लोग इसकी भेंट चढ़ जाते हैं. सरकारी स्तर पर जागरूकता और रोकथाम के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद हालात पूरी तरह नियंत्रण में नहीं आ सके हैं. आंकड़े बताते हैं कि राज्य में अंधविश्वास के कारण औसतन हर साल करीब 18 लोगों की जान चली जाती है, जो समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है.</p>

<div style="font-family:Arial, sans-serif;background:#ffffff;padding:16px;margin:20px 0;">
<div style="font-size:20px;font-weight:bold;color:#b30000;margin-bottom:12px;text-align:center;">चार साल में अंधविश्वास से मौत के मामले: जिला-वार आंकड़े (2022–2025)</div>
<table style="width:100%;border-collapse:collapse;min-width:600px;">
<thead>
<tr style="color:#ffffff;">
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">जिला</th>
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2025</th>
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2024</th>
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2023</th>
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2022</th>
<th style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">कुल</th>
</tr>
</thead>
<tbody>
<tr>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">रांची</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">3</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">7</td>
</tr>
<tr style="background:#fafafa;">
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">गिरिडीह</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">3</td>
</tr>
<tr>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">दुमका</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">3</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">5</td>
</tr>
<tr style="background:#fafafa;">
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">जामताड़ा</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">1</td>
</tr>
<tr>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">देवघर</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">1</td>
</tr>
<tr style="background:#fafafa;">
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">साहिबगंज</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">1</td>
</tr>
<tr>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">पाकुड़</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">2</td>
</tr>
<tr style="background:#fafafa;">
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">चतरा</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">3</td>
</tr>
<tr>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">खूंटी</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">3</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">5</td>
</tr>
<tr style="background:#fafafa;">
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">गुमला</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">3</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">9</td>
</tr>
<tr>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">सिमडेगा</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">2</td>
</tr>
<tr style="background:#fafafa;">
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">लोहरदगा</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">3</td>
</tr>
<tr>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">पश्चिमी सिंहभूम</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">4</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">5</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">13</td>
</tr>
<tr style="background:#fafafa;">
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">सरायकेला</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">4</td>
</tr>
<tr>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">पूर्वी सिंहभूम</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">1</td>
</tr>
<tr style="background:#fafafa;">
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">पलामू</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">3</td>
</tr>
<tr>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">लातेहार</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">3</td>
</tr>
<tr style="background:#fafafa;">
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">गढ़वा</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">2</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">6</td>
</tr>
<tr>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">हजारीबाग</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">0</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">1</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;font-weight:bold;">3</td>
</tr>
<tr style="background:#fff3f3;font-weight:bold;color:#b30000;">
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">कुल</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">11</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">15</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">20</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">27</td>
<td style="padding:10px;border:1px solid #e6e6e6;">73</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<div style="font-size:12px;color:#666;margin-top:8px;text-align:right;">स्रोत: आधिकारिक पुलिस रिकॉर्ड</div>
</div>

<div style="max-width:100%;margin:22px auto;font-family:Arial, Helvetica, sans-serif;">
<div style="padding:2px;">
<div style="background:#ffffff;padding:20px 22px;font-size:16px;line-height:1.75;color:#111111;">
<div style="background:#d80000;color:#ffffff;padding:4px 12px;font-size:12px;font-weight:bold;letter-spacing:0.5px;">IMPORTANT</div>

<div style="font-size:34px;color:#d80000;font-weight:bold;">❝</div>

<div style="padding-left:26px;font-weight:600;">अंधविश्वास के कारण पिछले चार सालों में पश्चिमी सिंहभूम में सबसे ज्यादा 13 हत्याएं हुई हैं. गुमला में 9 लोगों की जान गई है. वहीं गढ़वा में 6 और दुमका व खूंटी में 5-5 हत्याएं हुई हैं. राजधानी रांची भी इससे अछूती नहीं है. यहां भी अंधविश्वास के कारण चार साल में 7 लोगों की हत्या हो चुकी है. यह बताता है कि राज्य में जागरूकता के बावजूद सामाजिक दबाव हावी है.</div>
</div>
</div>
</div>
<h5><strong>बजट की 60% राशि बैनर और नुक्कड़ नाटक पर खर्च</strong></h5>
<p>दैनिक भास्कर के रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड सरकार अंधविश्वास और डायन-बिसाही जैसी कुप्रथाओं को रोकने के लिए हर वर्ष लगभग 2 करोड़ रुपये खर्च करती है. इसके तहत जागरूकता अभियान, प्रशिक्षण कार्यक्रम और ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को वैज्ञानिक सोच अपनाने के लिए प्रेरित करने जैसी गतिविधियां चलाई जाती हैं. बावजूद इसके, कई दूरदराज के इलाकों में अशिक्षा, गरीबी और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण लोग आज भी झाड़-फूंक और टोना-टोटका जैसी मान्यताओं पर विश्वास करते हैं.</p>
<p>राज्य में डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम लागू होने के बावजूद अपराधी बेखौफ हैं. झारखंड पुलिस के आंकड़ों के अनुसार इन मामलों में सजा की दर महज 5 प्रतिशत है. ग्रामीण इलाकों में सामाजिक दबाव इतना अधिक होता है कि गवाह कोर्ट पहुंचने से पहले ही मुकर जाते हैं. इसके कारण हत्यारे कानूनी पेचीदगियों का फायदा उठाकर साफ बच निकलते हैं.</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/article/society/jharkhand-andhvishwas-deaths-73-in-4-years-2-crore-spent-awareness-data/article-19959</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/article/society/jharkhand-andhvishwas-deaths-73-in-4-years-2-crore-spent-awareness-data/article-19959</guid>
                <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 20:19:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Media Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>“बस देख लेंगे”: भारतीय टालमटोल संस्कृति पर तीखा व्यंग्य</title>
                                    <description><![CDATA[“बस देख लेंगे” शीर्षक यह व्यंग्यात्मक लेख भारतीय समाज में प्रचलित उस मानसिकता पर रोशनी डालता है, जहाँ समस्याओं का समाधान करने की बजाय उन्हें टालने की प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है। घर के छोटे कामों से लेकर दफ्तर और राजनीति तक, यह तीन शब्दों का वाक्य अक्सर जिम्मेदारियों को आगे बढ़ाने का माध्यम बन जाता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/just-see-is-a-sharp-satire-on-the-indian-procrastination/article-18753"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/c59ea66b-03b3-4889-8244-cce50a2c64ea_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>“बस देख लेंगे।”</strong></p>
<p>यह तीन शब्दों का वाक्य भारतीय आश्वासन का सार्वभौमिक प्रतीक है। इसमें समाधान भी है, टालमटोल भी; साहस भी है और सुविधाजनक अनिर्णय भी।</p>
<p>यह वाक्य इतना लचीला है कि हर परिस्थिति में फिट हो जाता है—जैसे एक ही चाबी से सारे ताले खुल जाएँ, या कम-से-कम खुलने का भरोसा बना रहे।</p>
<p>घर में नल टपक रहा है।<br />पत्नी कहती हैं—“प्लंबर बुला लीजिए।”<br />उत्तर आता है—“हाँ, बस देख लेंगे।”<br />नल टपकता रहता है, पर वाक्य अपनी जगह अडिग रहता है।</p>
<p>यह वाक्य समस्या का समाधान नहीं करता, समस्या को स्थगित करता है—सम्मानपूर्वक।</p>
<p>कार्यालय में फाइल अटकी है।<br />कर्मचारी पूछता है—“सर, यह कब तक हो जाएगा?”<br />सर गंभीर मुद्रा में कहते हैं—“देख लेंगे।”</p>
<p>यह ‘देख लेंगे’ सुनते ही कर्मचारी समझ जाता है कि अब फाइल का भाग्य ईश्वर के हाथ में है।</p>
<p>राजनीति में तो यह वाक्य अमरत्व को प्राप्त हो चुका है।<br />जनता पूछती है—“सड़क कब बनेगी?”<br />उत्तर—“देख लेंगे।”</p>
<p>यानी सड़क का भविष्य उज्ज्वल है, बस समय अस्पष्ट है।</p>
<p>“बस देख लेंगे” दरअसल हमारे निर्णय-भय का सभ्य संस्करण है।<br />हम सीधे ‘न’ नहीं कहना चाहते और ‘हाँ’ कहकर बंधना भी नहीं चाहते।</p>
<p>इसलिए बीच का रास्ता चुन लेते हैं—देख लेंगे।</p>
<p>यह वाक्य वादा नहीं, संभावना है।<br />यह आश्वासन नहीं, आशा का मसौदा है।</p>
<p>परीक्षा से पहले छात्र से पूछा जाए—“तैयारी हो गई?”<br />वह मुस्कराकर कहेगा—“देख लेंगे।”</p>
<p>इसमें आत्मविश्वास भी छिपा है और किस्मत पर भरोसा भी।<br />मानो प्रश्नपत्र उससे पूछेगा—“तुमने पढ़ा है?”<br />और वह उत्तर देगा—“बस, देख लेंगे।”</p>
<p>रिश्तों में भी यह वाक्य खूब चलता है।<br />कोई कहे—“कभी मिलते क्यों नहीं?”<br />उत्तर—“अरे, देख लेंगे।”</p>
<p>मुलाकात भविष्य के कोहरे में विलीन हो जाती है, पर संबंध की औपचारिकता बची रहती है।</p>
<p>यह वाक्य हमारी सामाजिक शिष्टता का सुरक्षा-कवच है।<br />सीधे मना कर देंगे तो सामने वाला आहत होगा।<br />स्पष्ट प्रतिबद्धता दे देंगे तो खुद बँध जाएँगे।</p>
<p>इसलिए ‘देख लेंगे’ कहकर हम दोनों से बच निकलते हैं।</p>
<p>कभी-कभी यह वाक्य आत्म-संवेदना का भी माध्यम बन जाता है।<br />हम खुद से कहते हैं—</p>
<p>“व्यायाम शुरू करेंगे।”<br />“नई भाषा सीखेंगे।”<br />“पुरानी किताबें पढ़ेंगे।”</p>
<p>और फिर जोड़ देते हैं—“देख लेंगे।”</p>
<p>यह ‘देख लेंगे’ हमारे संकल्पों की शीत-निद्रा है।<br />संकल्प सो जाते हैं, वाक्य जागता रहता है।</p>
<p>रोचक यह है कि ‘देख लेंगे’ का अर्थ हर व्यक्ति अपने हिसाब से समझता है।<br />किसी के लिए इसका अर्थ है—“अभी नहीं।”<br />किसी के लिए—“शायद कभी।”<br />और किसी के लिए—“कभी नहीं।”</p>
<p>फिर भी यह वाक्य इतना लोकप्रिय है, क्योंकि यह आशा को जीवित रखता है।</p>
<p>यह दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं करता, बस आधा खुला छोड़ देता है।<br />और आधा खुला दरवाज़ा, पूरी तरह बंद दरवाज़े से अधिक सुकून देता है।</p>
<p>पर जीवन की कुछ स्थितियाँ ऐसी भी होती हैं, जहाँ ‘देख लेंगे’ पर्याप्त नहीं होता।<br />वहाँ निर्णय चाहिए, स्पष्टता चाहिए, साहस चाहिए।</p>
<p>हर बार स्थगन संभव नहीं।</p>
<p>कभी-कभी नल बंद करना पड़ता है, फाइल पर हस्ताक्षर करने पड़ते हैं, सड़क बनानी पड़ती है और संबंध निभाने पड़ते हैं।</p>
<p>शायद ‘बस देख लेंगे’ का असली सौंदर्य तभी है, जब वह अस्थायी हो—स्थायी नीति नहीं।</p>
<p>यह वाक्य विश्राम हो सकता है, मंज़िल नहीं।</p>
<p>फिर भी, मान लीजिए आप यह निबंध पढ़कर सोच रहे हों—<br />“अच्छा लिखा है… पर इस पर कुछ कहेंगे?”</p>
<p>तो आप भी मन ही मन कह रहे होंगे—<br />“देख लेंगे।”</p>
<p>और मैं भी मुस्कुराकर यही कहूँगा—<br />हाँ, कभी न कभी…<br />बस, देख लेंगे।</p>
<p>✍️ <strong>डॉ. आशुतोष प्रसाद</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 11 Mar 2026 18:01:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कुपोषण और आदिवासी बच्चे: योजनाएं कागजों पर ही? NFHS-5 आंकड़े चौंकाने वाले</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>समृद्ध डेस्क: </strong>झारखंड के आदिवासी इलाकों में कुपोषण आज भी एक गंभीर चुनौती बना हुआ है, जहां सरकारी योजनाएं कागजों पर तो चमक रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयान करती हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में 36 लाख 64 हजार बच्चों में से 15 लाख बच्चे कुपोषित (42%) हैं. वहीं करीब 03 लाख (9%) बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं, और खासकर अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय के 56 प्रतिशत बच्चे कुपोषण उपचार केंद्रों तक पहुंचते हैं। इन आंकड़ों के बीच रांची के रिम्स रेफरल कुपोषण उपचार केंद्र में पिछले डेढ़</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/malnutrition-and-tribal-children-schemes-are-only-on-paper-nfhs-5/article-18092"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/6413d75008ea69001e41b168.jpg" alt=""></a><br /><p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>समृद्ध डेस्क: </strong>झारखंड के आदिवासी इलाकों में कुपोषण आज भी एक गंभीर चुनौती बना हुआ है, जहां सरकारी योजनाएं कागजों पर तो चमक रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयान करती हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में 36 लाख 64 हजार बच्चों में से 15 लाख बच्चे कुपोषित (42%) हैं. वहीं करीब 03 लाख (9%) बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं, और खासकर अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय के 56 प्रतिशत बच्चे कुपोषण उपचार केंद्रों तक पहुंचते हैं। इन आंकड़ों के बीच रांची के रिम्स रेफरल कुपोषण उपचार केंद्र में पिछले डेढ़ साल में महज 84 बच्चों का इलाज ही हो सका, क्योंकि अभिभावकों को इसकी सही जानकारी ही नहीं मिल पा रही।</p>
<hr />
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>झारखंड का पूरा NFHS-5 रिपोर्ट पीडीएफ 👇</strong><br /><span style="background-color:rgb(191,237,210);"><a style="background-color:rgb(191,237,210);" href="https://drive.google.com/file/d/1j_UP2jx6d8xgPrj6RmUJGbKikxJ8oR57/view?usp=sharing">https://drive.google.com/file/d/1j_UP2jx6d8xgPrj6RmUJGbKikxJ8oR57/view?usp=sharing</a></span></p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>आदिवासी बच्चों पर कुपोषण का कहर</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">झारखंड के आदिवासी बहुल जिलों जैसे गुमला, पश्चिम सिंहभूम और कोडरमा में कुपोषण ने नौनिहालों का भविष्य दांव पर लगा रखा है। कुपोषण उपचार केंद्रों (एमटीसी) में भर्ती 53 प्रतिशत गंभीर कुपोषित बच्चे लड़कियां हैं, और दो साल से कम उम्र के बच्चों का हिस्सा आधे से ज्यादा है। ग्रामीण आदिवासी आबादी में 0-6 साल के बच्चों में प्रोटीन-कैलोरी कुपोषण की दर 57 प्रतिशत तक है, जो गरीबी, जंगलों पर निर्भरता और पोषण की कमी से जुड़ी हुई है। इतना ही नहीं, 67.5 प्रतिशत बच्चों में एनीमिया की समस्या ने उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को चरमरा दिया है, जिससे छोटी-मोटी बीमारियां भी जानलेवा साबित हो रही हैं।</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>सरकारी योजनाएं: घोषणाएं बनाम हकीकत</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">झारखंड सरकार ने कुपोषण मुक्त अभियान के तहत कई कदम उठाए हैं, जैसे 96 एमटीसी केंद्र जहां प्रतिदिन 130 रुपये की दर से सब्जियां और स्पेशल आहार दिया जाता है। हाल ही में 18 जनवरी 2025 से शुरू हुई 'शिशु शक्ति खाद्य पैकेट योजना' पश्चिम सिंहभूम के चक्रधरपुर से पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चली, जिसमें प्रोटीन, विटामिन और सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर पैकेट वितरित हो रहे हैं। अब एमटीसी में कुपोषित बच्चों की मांओं को भी पौष्टिक भोजन और आयरन-फोलिक एसिड गोलियां दी जा रही हैं, जो रिम्स के पीएसएम विभाग की रिसर्च पर आधारित है। आकांक्षी जिला कार्यक्रम के तहत गुमला जैसे क्षेत्रों में आंगनबाड़ी केंद्रों पर पोषण माह मनाया जा रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर मैनपावर की कमी और जागरूकता के अभाव ने इन योजनाओं को सीमित कर दिया है।</p>
<hr />
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong><span class="inline-flex">सरकारी ओपन डेटा पोर्टल: जिसमें जिला-स्तर के NFHS-5 डेटा फ़ैक्टशीट्स मिलते हैं। 👇</span></strong></p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><span class="inline-flex"><span style="background-color:rgb(191,237,210);"><a style="background-color:rgb(191,237,210);" href="https://www.data.gov.in/">https://www.data.gov.in/</a></span>​</span></p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>जमीनी बाधाएं और विफलताएं</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">हकीकत यह है कि आदिवासी परिवारों तक योजनाओं का लाभ पहुंच ही नहीं पा रहा। रिम्स सेंटर में न्यूट्रिशनिस्ट, रसोइया और वार्ड बॉय की कमी के कारण पहले तो भोजन व्यवस्था ठप रही, और अब भी अभिभावक दूरदराज के गांवों से इलाज के लिए नहीं पहुंच पाते। एनएफएचएस-5 के मुताबिक, शहरी क्षेत्रों में 26.8 प्रतिशत बच्चे बौनेपन के शिकार हैं, जबकि अति गंभीर कुपोषण 9.1 प्रतिशत है, लेकिन सरकारी दावों के बावजूद 2014 के आंकड़ों जैसी स्थिति बनी हुई है। आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका बढ़ाने की बात तो होती है, मगर निगरानी की कमी से पैकेट और दवाएं गांवों तक नहीं पहुंच रही।<span class="inline-flex">​</span></p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>आगे की राह: क्या हो समाधान?</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">कुपोषण की इस जंग को जीतने के लिए जिला स्तर पर सख्त निगरानी, रेफरल सेंटर्स का व्यापक प्रचार-प्रसार और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को सशक्त बनाना जरूरी है। आदिवासी समुदायों में जागरूकता अभियान चलाकर मां-बच्चों को पोषण शिक्षा देनी होगी, ताकि सरकारी योजनाएं कागजों से निकलकर जिंदगियों में उतरें। अगर तत्काल कदम नहीं उठे, तो झारखंड का भविष्य कुपोषण के आगोश में खो सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/article/society/malnutrition-and-tribal-children-schemes-are-only-on-paper-nfhs-5/article-18092</link>
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                <pubDate>Thu, 12 Feb 2026 20:35:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sujit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सोशल मीडिया ट्रोलिंग: अभिव्यक्ति की आज़ादी या डिजिटल बदतमीज़ी? ट्रोलिंग केस और कानून </title>
                                    <description><![CDATA[<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>समृद्ध डेस्क: </strong>सोशल मीडिया ट्रोलिंग आज हर आम इंसान से लेकर बड़े सेलिब्रिटी तक की जिंदगी में घुस चुकी है। ये सवाल उठता है कि क्या ये सिर्फ अपनी राय रखने की आजादी है या फिर डिजिटल दुनिया में बेलगाम बदतमीजी का रूप?</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>ट्रोलिंग का बढ़ता चलन</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">भारत में सोशल मीडिया यूजर्स की तादाद 50 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है, और इसी के साथ ट्रोलिंग के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं। खासकर 2025-26 में राजनीतिक बहसों, सेलिब्रिटी पोस्ट्स और पर्सनल डिस्प्यूट्स पर ट्रोल्स की बाढ़ आ गई है। एक हालिया केरल केस में, जहां एक बस में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/social-media-trolling-freedom-of-expression-or-digital-abuse-trolling/article-18089"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/gemini_generated_image_h0sbngh0sbngh0sb.jpg" alt=""></a><br /><p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>समृद्ध डेस्क: </strong>सोशल मीडिया ट्रोलिंग आज हर आम इंसान से लेकर बड़े सेलिब्रिटी तक की जिंदगी में घुस चुकी है। ये सवाल उठता है कि क्या ये सिर्फ अपनी राय रखने की आजादी है या फिर डिजिटल दुनिया में बेलगाम बदतमीजी का रूप?</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>ट्रोलिंग का बढ़ता चलन</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">भारत में सोशल मीडिया यूजर्स की तादाद 50 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है, और इसी के साथ ट्रोलिंग के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं। खासकर 2025-26 में राजनीतिक बहसों, सेलिब्रिटी पोस्ट्स और पर्सनल डिस्प्यूट्स पर ट्रोल्स की बाढ़ आ गई है। एक हालिया केरल केस में, जहां एक बस में कंटेंट क्रिएटर शिम्जिथा मुस्तफा ने सेल्स मैनेजर दीपक यू पर गलत छेड़छाड़ का आरोप लगाते हुए वीडियो पोस्ट किया, तो ट्रोल्स ने दीपक को इतना घेरा कि वो सुसाइड कर लिया। ये घटना दिखाती है कि कैसे एक वीडियो वायरल होते ही बिना जांच के लोग ट्रायल कर देते हैं, जो जिंदगियां बर्बाद कर सकता है। सर्वे बताते हैं कि टीनएजर्स में साइबरबुलिंग के केस 2025 में दोगुने हो गए, जहां ट्रोलिंग से मेंटल हेल्थ पर बुरा असर पड़ रहा है।<span class="inline-flex">​</span></p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>अभिव्यक्ति की आजादी की सीमाएं</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर नागरिक को है, लेकिन ये असीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि फ्री स्पीच दूसरों की गरिमा और प्राइवेसी का सम्मान करे। 2025 में विदेश सचिव विक्रम मिसरी को ट्रोलिंग और डॉक्सिंग का शिकार बनाया गया, जहां उनकी बेटी तक को निशाना बनाया गया, लेकिन सरकार ने कोई ठोस एक्शन नहीं लिया। कोर्ट ने साफ कहा कि आर्टिकल 21 (जीवन का अधिकार) आर्टिकल 19 से ऊपर है, और ट्रोलिंग अगर हेट स्पीच या धमकी बने तो कार्रवाई होनी चाहिए। हाल ही में फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पोस्ट्स पर ऑटोमैटिक एक्शन न लेने के निर्देश दिए, लेकिन साम्प्रदायिक या हिंसा भड़काने वाले मामलों में सख्ती बरतने को कहा।</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>कानूनी हथियार ट्रोल्स के खिलाफ</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">भारत में ट्रोलिंग रोकने के लिए स्पेसिफिक लॉ नहीं है, लेकिन आईटी एक्ट 2000 की धारा 67 (अश्लील कंटेंट) और धारा 66E (प्राइवेसी ब्रेक) से निपटा जा सकता है। आईपीसी की धारा 354D (स्टॉकिंग), 507 (अनाम धमकी) और 503 (क्रिमिनल इंटिमिडेशन) भी ट्रोल्स पर लगाई जाती हैं। श्रेया सिंघल केस में धारा 66A हटा दी गई क्योंकि वो फ्री स्पीच के खिलाफ थी, लेकिन बाकी सेक्शन्स अभी सख्ती से लागू हो सकते हैं। आंध्र हाईकोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया पर गलत जानकारी या अश्लील कमेंट्स कानूनन अपराध हैं, प्लेटफॉर्म्स को छूट नहीं। फिर भी, गुमनाम अकाउंट्स की वजह से एक्शन लेना मुश्किल होता है।</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>समाज पर गहरा असर</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">ट्रोलिंग न सिर्फ पीड़ित को तोड़ती है, बल्कि पूरे समाज में नफरत फैलाती है। महिलाएं, माइनॉरिटीज और पब्लिक फिगर्स सबसे ज्यादा टारगेट होते हैं, जो डिबेट को दबा देती है। जर्नल स्टडीज दिखाती हैं कि ट्रोलिंग मिसइंफॉर्मेशन फैलाती है और पॉलिटिकल डिस्कोर्स को खराब करती है। सुप्रीम कोर्ट के जज भी ट्रोल्स के शिकार हो चुके हैं, जहां उन्होंने इसे 'नृशंस' बताया लेकिन इग्नोर करने की सलाह दी।</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>आगे की राह</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">ट्रोलिंग को कंट्रोल करने के लिए स्ट्रॉन्ग रेगुलेशन्स, डिजिटल लिटरेसी और प्लेटफॉर्म्स पर बेहतर मॉडरेशन जरूरी है। ड्राफ्ट डीपीडीपी रूल्स 2025 कुछ राहत दे सकते हैं, लेकिन इंप्लीमेंटेशन की चुनौती बनी हुई है। यूजर्स को भी जिम्मेदार बनना होगा ताकि डिजिटल स्पेस डेमोक्रेटिक रहे, बदतमीजी का अड्डा न बने।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 12 Feb 2026 18:41:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Media Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दृष्टिकोण: वर्ष बहुत कुछ सिखाते हैं, जो दिन कभी नहीं जानते</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>समृद्ध डेस्क: </strong>समय सिर्फ़ बीतता नहीं है, वह इंसान को गढ़ता और परखता भी है। हर दिन हमें छोटे-छोटे अनुभव देता है, लेकिन पूरे साल के गुज़र जाने के बाद जो परिपक्वता, धैर्य और संतुलन हमें मिलता है, वह किसी एक दिन के अनुभव से कहीं अधिक गहरा होता है। यही कारण है कि कहा जाता है – <em>“वर्ष बहुत कुछ सिखाते हैं, जो दिन कभी नहीं जानते।”</em>  सालों का अनुभव ही इंसान की असली कमाई होती है, क्योंकि वे केवल घटनाएँ नहीं, बल्कि जीवन के गहरे सबक बनकर साथ चलते हैं।</p>
<hr class="bg-offsetPlus h-px border-0" />
<h5><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>दिन और वर्ष का अंतर</strong></span></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">एक दिन की</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/views-teach-a-lot-of-years-that-never-know-the/article-15824"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-08/istockphoto-1407458083-640x640.jpg" alt=""></a><br /><p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>समृद्ध डेस्क: </strong>समय सिर्फ़ बीतता नहीं है, वह इंसान को गढ़ता और परखता भी है। हर दिन हमें छोटे-छोटे अनुभव देता है, लेकिन पूरे साल के गुज़र जाने के बाद जो परिपक्वता, धैर्य और संतुलन हमें मिलता है, वह किसी एक दिन के अनुभव से कहीं अधिक गहरा होता है। यही कारण है कि कहा जाता है – <em>“वर्ष बहुत कुछ सिखाते हैं, जो दिन कभी नहीं जानते।”</em> सालों का अनुभव ही इंसान की असली कमाई होती है, क्योंकि वे केवल घटनाएँ नहीं, बल्कि जीवन के गहरे सबक बनकर साथ चलते हैं।</p>
<hr class="bg-offsetPlus h-px border-0" />
<h5><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>दिन और वर्ष का अंतर</strong></span></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">एक दिन की घटनाएँ हमेशा क्षणिक होती हैं। हम सुबह से शाम तक कई तरह की परिस्थितियों का सामना करते हैं – कभी खुशी, कभी ग़म, कभी कामयाबी तो कभी असफलता। लेकिन यह अनुभव अक्सर सतही रह जाते हैं। इसके विपरीत, जब एक पूरा वर्ष हमारे सामने गुजरता है, तब वही घटनाएँ एक दृष्टिकोण में बदल जाती हैं।</p>
<h6 class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>दिन हमें क्षण सिखाते हैं, वर्ष हमें दृष्टिकोण देते हैं।</strong></h6>
<ul>
<li class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">दिन समस्याओं से तत्काल जूझना सिखाते हैं, लेकिन वर्ष हमें स्थायी समाधान तलाशना सिखाते हैं।<br />दिन हमारी व्यस्तता का हिस्सा बनते हैं, वहीं साल हमें आत्ममंथन और समीक्षा का अवसर देते हैं।</li>
</ul>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">इसीलिए जिंदगी का असली सबक रोज़मर्रा की घटनाओं से नहीं, बल्कि सालभर के अनुभवों के संग्रह से मिलता है।</p>
<hr class="bg-offsetPlus h-px border-0" />
<h5 class="mb-2 mt-4 font-semimedium text-base first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>व्यक्तिगत जीवन में वर्षों का महत्व</strong></span></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">किसी छात्र का जीवन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। एक दिन की पढ़ाई से वह कोई बड़ा बदलाव महसूस नहीं करता, लेकिन जब यह प्रक्रिया पूरे साल जारी रहती है, तो वही छोटे-छोटे अभ्यास ज्ञान का विशाल भंडार बन जाते हैं। UPSC, IIT या NEET जैसी कठिन परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र जानते हैं कि सफलता एक-दो दिन के प्रयास का परिणाम नहीं, बल्कि वर्षों की निरंतर मेहनत और समर्पण का फल होती है।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">इसी तरह नौकरी या व्यवसाय में भी यही सच लागू होता है। किसी एक दिन की असफलता हमें हताश कर सकती है, लेकिन पूरे साल या कई सालों का अनुभव हमें यह सिखाता है कि असफलताओं को अगले कदम की तैयारी और सीख के रूप में देखना चाहिए। एक अनुभवी व्यापारी जानता है कि घाटा किसी दिन का अंत नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की नई रणनीति की नींव है।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">रिश्तों में भी वर्षों का महत्व अधिक होता है। कोई एक दिन की मुलाक़ात हमें भावनात्मक रूप से जोड़ सकती है, लेकिन सालों का साथ ही रिश्तों को मज़बूत और स्थायी बनाता है।</p>
<hr class="bg-offsetPlus h-px border-0" />
<h5 class="mb-2 mt-4 font-semimedium text-base first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>समाज और इतिहास का दृष्टिकोण</strong></span></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">इतिहास हमें यही सबक बार-बार देता है कि बड़े बदलावों और गहन सीख के लिए सालों का धैर्य ज़रूरी होता है। 1942 का <em>भारत छोड़ो आंदोलन</em> केवल एक दिन की घटना नहीं था। इससे पहले वर्षों तक चली तैयारियाँ, आंदोलन और बलिदानों ने लोगों को मानसिक और सामाजिक रूप से तैयार किया था। यही लंबा संघर्ष 1947 में स्वतंत्रता के रूप में सामने आया। यदि हम केवल एक दिन को देखें तो कहानी अधूरी लगेगी, लेकिन पूरी अवधि देखने पर मिलता है असली सबक।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">वैज्ञानिक खोजें भी इसका प्रमाण हैं। न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत केवल एक पल के निरीक्षण से पैदा नहीं हुआ। वह वर्षों तक किए गए अध्ययन और प्रयोग का परिणाम था। यही बात आइनस्टाइन के सिद्धांतों पर भी लागू होती है। उनकी कल्पना और मेहनत सालों में पकी और परिपक्व हुई।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">सच तो यह है कि सभ्यता और समाज के किसी भी बड़े परिवर्तन को सालों की कसौटी पर ही मापा जाता है, दिनों की गणना से नहीं।</p>
<hr class="bg-offsetPlus h-px border-0" />
<h5 class="mb-2 mt-4 font-semimedium text-base first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>दर्शन और विचार की गहराई</strong></span></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">समय के साथ आने वाले अनुभव को ही असली संपत्ति कहा जा सकता है। यही कारण है कि उम्रदराज़ लोग अक्सर युवाओं से कहीं अधिक परिपक्व निर्णय लेने में सक्षम होते हैं। उनके पीछे सिर्फ़ कुछ दिनों का अनुभव नहीं, बल्कि सालों की यात्रा होती है।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">महात्मा गांधी ने कहा था – <em>“अनुभव ही सच्चा शिक्षक है।”</em> यह अनुभव दिनों की घटनाओं से नहीं, बल्कि वर्षों की निरंतर कोशिशों, असफलताओं और सफलताओं से मिलता है। जीवन का दर्शन यही है कि समय हमें धीरे-धीरे गढ़ता है, और यह प्रक्रिया वर्षों के अनुभव में ही पूरी होती है।</p>
<hr class="bg-offsetPlus h-px border-0" />
<h5 class="mb-2 mt-4 font-semimedium text-base first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>तेज़-रफ्तार दुनिया और समय का सबक</strong></span></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">आज की तेज़-रफ्तार दुनिया में लोग जल्दी परिणाम चाहते हैं। हर काम की सफलता तुरंत चाहिए, परिणाम आज चाहिए, और उपलब्धि कल। लेकिन यह कथन हमें याद दिलाता है कि असली सीख समय के साथ ही मिलती है।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">स्टार्टअप चलाने वाले युवाओं को लगता है कि पहले साल में ही सब कुछ हासिल हो जाएगा। लेकिन असलियत यह है कि व्यवसाय की स्थिरता कई सालों के संघर्ष और धैर्य से ही आती है। UPSC या किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले युवाओं का अनुभव भी यही सिखाता है कि एक दिन की पढ़ाई से कुछ हासिल नहीं होगा। निरंतर अभ्यास, सालों की पढ़ाई और धैर्य ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">इसी तरह सामान्य जीवन में भी यही सच है। कोई बीमारी एक दिन में ठीक नहीं होती, बल्कि महीनों या सालों के इलाज और धैर्य से ही शरीर स्वस्थ होता है। एक पेड़ भी दिनभर में नहीं बढ़ता, बल्कि सालों की जड़ों और मौसमों के उतार-चढ़ाव से मज़बूत होता है।</p>
<hr class="bg-offsetPlus h-px border-0" />
<h5 class="mb-2 mt-4 font-semimedium text-base first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>वर्ष हमें भविष्य के लिए तैयार करते हैं</strong></span></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">हर बीता साल हमारे लिए एक शिक्षक होता है। यह हमें हमारी ग़लतियों का आईना दिखाता है, हमारी उपलब्धियों को याद दिलाता है और आने वाले वर्षों के लिए नई योजनाएँ और संकल्प बनाने का अवसर देता है। यही कारण है कि साल के अंत में लोग आत्ममंथन करते हैं और नए साल के लिए रिज़ॉल्यूशन बनाते हैं।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">समय ऐसा शिक्षक है जो बिना किसी शुल्क के हमें शिक्षा देता है, अगर हम उसे समझने और आत्मसात करने की क्षमता रखें।</p>
<hr class="bg-offsetPlus h-px border-0" />
<h5 class="mb-2 mt-4 font-semimedium text-base first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>वर्ष ही असली शिक्षक हैं</strong></span></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">अंततः यही कहा जा सकता है कि दिन हमें क्षणिक अनुभव देते हैं, लेकिन वर्ष हमें गहरी समझ, परिपक्वता और धैर्य सिखाते हैं। यदि हम केवल दिनों पर ध्यान दें तो जीवन की सीख अधूरी रह जाएगी। असली शिक्षा वर्षों की कसौटी से गुजरने के बाद ही मिलती है।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">इसलिए हमें धैर्य का दामन थामना चाहिए और समय को अपना सबसे बड़ा गुरु मानना चाहिए। सच यही है कि – <em>“वर्ष बहुत कुछ सिखाते हैं, जो दिन कभी नहीं जानते।”</em></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>शिक्षा</category>
                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 26 Aug 2025 18:28:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sujit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दृष्टिकोण: विचार एक दुनिया खोजता है और एक बनाता भी है</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>समृद्ध डेस्क</strong>: इंसान की सबसे बड़ी ताकत उसके विचारों में छिपी है। यह विचार ही हैं जो उसे बाकी जीव-जंतुओं से अलग बनाते हैं। विचार केवल वास्तविकता को समझते नहीं, बल्कि नई वास्तविकताएँ गढ़ते भी हैं। यही कारण है कि मानव सभ्यता की पूरी यात्रा गुफाओं से लेकर अंतरिक्ष तक विचारों के सहारे तय हुई है। जैसा कि एक महान चिंतक ने कहा था – “जैसा तुम सोचते हो, वैसा ही तुम बन जाते हो।”</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>विचार खोजते हैं नई सच्चाइयाँ</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">इतिहास में हर बड़ी खोज की शुरुआत एक साधारण से सवाल या जिज्ञासा से हुई। जब न्यूटन ने पेड़</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/story/the-view-idea-finds-a-world-and-also-makes-one/article-15805"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-08/1756128975722~2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>समृद्ध डेस्क</strong>: इंसान की सबसे बड़ी ताकत उसके विचारों में छिपी है। यह विचार ही हैं जो उसे बाकी जीव-जंतुओं से अलग बनाते हैं। विचार केवल वास्तविकता को समझते नहीं, बल्कि नई वास्तविकताएँ गढ़ते भी हैं। यही कारण है कि मानव सभ्यता की पूरी यात्रा गुफाओं से लेकर अंतरिक्ष तक विचारों के सहारे तय हुई है। जैसा कि एक महान चिंतक ने कहा था – “जैसा तुम सोचते हो, वैसा ही तुम बन जाते हो।”</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>विचार खोजते हैं नई सच्चाइयाँ</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">इतिहास में हर बड़ी खोज की शुरुआत एक साधारण से सवाल या जिज्ञासा से हुई। जब न्यूटन ने पेड़ से गिरते हुए सेब को देखा, तो उसके विचार ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत दिया। डार्विन ने जीव-जगत का अध्ययन किया और विकासवाद का विचार सामने रखा। इन खोजों ने न केवल विज्ञान को आगे बढ़ाया, बल्कि पूरी सभ्यता के सोचने का तरीका बदल दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">विचार ज्ञान के नए आयाम खोलते हैं। वे ऐसी सच्चाइयाँ सामने लाते हैं, जिनसे पहले हम अनजान थे। यही कारण है कि विचारों को अक्सर “मानव प्रगति की पहली सीढ़ी” कहा जाता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>विचार बनाते हैं नई दुनिया</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">इतिहास केवल खोजों से नहीं, बल्कि निर्माणों से भी बना है। विचार निर्माण की दिशा देते हैं। महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा का विचार रखा, जिसने भारत की आज़ादी की लड़ाई को दिशा दी। उनके विचार ने पूरी दुनिया में शांति और न्याय की नई राह दिखाई।</p>
<p style="text-align:justify;">आधुनिक युग में भी यही क्रम जारी है। स्टीव जॉब्स ने तकनीक को सुंदर और सरल बनाने का विचार रखा और उसी ने स्मार्टफोन क्रांति को जन्म दिया। फेसबुक और सोशल मीडिया का विचार मार्क जुकरबर्ग ने दिया और दुनिया के सामाजिक संबंधों की संरचना ही बदल गई।</p>
<p style="text-align:justify;">स्वामी विवेकानंद ने कहा था – “हम वही बनते हैं, जो हमारे विचार हमें बनाते हैं।” यह वाक्य इस सच्चाई को रेखांकित करता है कि विचार केवल सोच तक सीमित नहीं रहते, वे पूरी दुनिया का चेहरा बदल सकते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>विचारों की नकारात्मकता भी</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, यह मान लेना कि हर विचार सकारात्मक होगा, एक बड़ी भूल है। इतिहास में कई ऐसे उदाहरण हैं जब गलत दिशा में गए विचारों ने मानवता को भारी नुकसान पहुँचाया। हिटलर का नस्लवादी विचार इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। उसके विचार ने द्वितीय विश्व युद्ध जैसी भयावह त्रासदी को जन्म दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">यही कारण है कि विचारों की शक्ति को दोधारी तलवार माना जाता है। वे सभ्यता को आगे बढ़ा सकते हैं, लेकिन गलत दिशा में ले जाएँ तो विनाश भी कर सकते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>वर्तमान समय में विचारों की भूमिका</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">आज की दुनिया कई गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है। जलवायु परिवर्तन का संकट पूरी मानवता के अस्तित्व पर सवाल खड़ा कर रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तेज़ी से नई संभावनाएँ और नई दुविधाएँ पैदा कर रहा है। वैश्विक राजनीति की जटिलताएँ अंतर्राष्ट्रीय शांति को चुनौती दे रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इन सभी समस्याओं का समाधान केवल विचारों की शक्ति से ही संभव है। जिस तरह औद्योगिक क्रांति और वैज्ञानिक क्रांति ने मानव सभ्यता की दिशा बदली, उसी तरह आज नए और रचनात्मक विचार ही आने वाले कल की दुनिया गढ़ेंगे।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>भारत की सोच और विचार परंपरा</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">भारत का इतिहास खुद इस बात का प्रमाण है कि विचार किसी भी राष्ट्र को नई दिशा दे सकते हैं। प्राचीन भारत में उपनिषदों और गीता जैसे ग्रंथों ने आध्यात्मिक और दार्शनिक चिंतन को जन्म दिया। आधुनिक युग में डॉ. भीमराव आंबेडकर का समानता और न्याय का विचार भारतीय लोकतंत्र की नींव बना।</p>
<p style="text-align:justify;">आज भी भारत में “विश्वगुरु” बनने की चर्चा होती है, और इसकी सबसे बड़ी शर्त यही है कि भारत अपने विचारों की शक्ति से पूरी दुनिया को नई दिशा दे।</p>
<p style="text-align:justify;">अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था – “कल्पना ज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि ज्ञान सीमित है, जबकि कल्पना पूरी दुनिया को घेर लेती है।” यही कारण है कि विचार केवल दुनिया को खोजते ही नहीं, बल्कि नई दुनिया बनाते भी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विचार ही मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि हैं और साथ ही उसकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी भी। जब तक विचार सकारात्मक और रचनात्मक रहेंगे, तब तक मानव सभ्यता आगे बढ़ती रहेगी। लेकिन अगर विचार गलत दिशा में गए, तो वही प्रगति विनाश में बदल सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज ज़रूरत है कि हम अपने विचारों को महान, सृजनात्मक और न्यायपूर्ण बनाएँ। तभी यह दुनिया न केवल खोजी जा सकेगी, बल्कि और भी सुंदर और बेहतर बनाई जा सकेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>स्टोरी </category>
                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 25 Aug 2025 19:11:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sujit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दृष्टिकोण: अपराध और समाज व्यवस्था, क्या अपराधी समाज की उपज है या उसकी विफलता?</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>समृद्ध डेस्क: </strong>अपराध मानव समाज की सबसे पुरानी और पेचीदा समस्याओं में से एक है। समाज में अपराध के विभिन्न रूप देखने को मिलते हैं चोरी, हत्या, धोखाधड़ी, बलात्कार, और अन्य अपराध। प्रश्न उठता है कि क्या अपराधी वास्तव में समाज की उत्पत्ति हैं या ये समाज की कोई विफलता हैं? इस विषय पर विचार करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि अपराध और समाज के बीच का यह रिश्ता हमारे समाज की संरचना, न्याय प्रणाली और सुधारात्मक उपायों को समझने में मदद करता है।</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 text-base font-[475] first:mt-0 dark:font-[450]"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>अपराध: क्या है उसकी जड़?</strong></span></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">अपराध को सामान्यतः वे क्रियाएं माना जाता है जो कानून द्वारा निषिद्ध</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/view-crime-and-social-system-is-the-product-of-criminal/article-15704"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-08/tyg.jpg" alt=""></a><br /><p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>समृद्ध डेस्क: </strong>अपराध मानव समाज की सबसे पुरानी और पेचीदा समस्याओं में से एक है। समाज में अपराध के विभिन्न रूप देखने को मिलते हैं चोरी, हत्या, धोखाधड़ी, बलात्कार, और अन्य अपराध। प्रश्न उठता है कि क्या अपराधी वास्तव में समाज की उत्पत्ति हैं या ये समाज की कोई विफलता हैं? इस विषय पर विचार करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि अपराध और समाज के बीच का यह रिश्ता हमारे समाज की संरचना, न्याय प्रणाली और सुधारात्मक उपायों को समझने में मदद करता है।</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 text-base font-[475] first:mt-0 dark:font-[450]"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>अपराध: क्या है उसकी जड़?</strong></span></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">अपराध को सामान्यतः वे क्रियाएं माना जाता है जो कानून द्वारा निषिद्ध हैं और जिनका समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। अपराध सिर्फ एक व्यक्ति का कृत्य नहीं होता, बल्कि विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक कारणों से उत्पन्न होता है। इसके पीछे कई सिद्धांत सामने आए हैं—जैसे कि सामाजिक संरचना की असमानताएं, गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा की कमी, और पारिवारिक टूट-फूट।</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 text-base font-[475] first:mt-0 dark:font-[450]"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>अपराधी समाज की उपज है?</strong></span></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">इसे समझने के लिए हमें 'समाज की उपज' का अर्थ स्पष्ट करना होगा। समाज की उपज होने का आशय है कि अपराधी का निर्माण उसी समाज की परिस्थितियों और वातावरण से होता है। उदाहरण के लिए, गरीबी और बेरोजगारी उन कारकों में से हैं जो लोगों को अपराध करने के लिए प्रेरित करते हैं। वे जिन्हें उनके मूलभूत अधिकार और आवश्यकताएं प्राप्त नहीं होतीं, वे अपने जीवन यापन के लिए अपराधी मार्ग अपना लेते हैं।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">शिक्षा की कमी भी एक बड़ा कारण है। अनेक शोध बताते हैं कि शिक्षा से वंचित व्यक्ति अपराधिक प्रवृत्ति की ओर बढ़ सकते हैं। जब व्यक्ति को सही मार्गदर्शन और अवसर नहीं मिलते, तो वह आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हो जाता है। परिवार और समाज की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। यदि परिवार में सही संस्कार और सहयोग न मिले, तो व्यक्ति अपराध की ओर झुकाव रख सकता है।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">इस संदर्भ में, कई समाजशास्त्री यह भी मानते हैं कि समाज का वह हिस्सा जिसमें लोगों के लिए समान अवसर नहीं होते, वह अपराधिक प्रवृत्तियों का गढ़ बनता है। यानी, समाज की आर्थिक और सामाजिक असमानताएं अपराधियों को जन्म देती हैं। यही कारण है कि अधिकतर अपराध कम विकसित या पिछड़े इलाकों से होते हैं।</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 text-base font-[475] first:mt-0 dark:font-[450]"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>अपराध समाज की विफलता भी है</strong></span></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">दूसरी ओर, अपराध को समाज की विफलता के रूप में भी देखा जाता है। जब समाज के विधान, न्याय व्यवस्था, और प्रशासनिक तंत्र अपराध को रोकने में असफल होते हैं, तब यह समाज की विफलता है। इसका मतलब है कि समाज के नियम और नैतिकता को स्थापित कर उसका पालन कराना ही समाज का काम है, जो यदि सही ढंग से न हो तो अपराध बढ़ता है।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">बहुतेरे अपराध यह दर्शाते हैं कि समाज अपने कमजोर वर्गों की संभाल ठीक से नहीं कर पा रहा है। न्याय पाने का असमान अवसर, पुलिस व्यवस्था में भ्रष्टाचार, एवं कानूनी प्रक्रिया में देरी जैसी समस्याएं भी अपराध बढ़ने का कारण हैं। यह स्थिति समाज की उस विफलता को उजागर करती है जो अपराध को जन्म देती है और उसे बढ़ावा देती है।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">सामाजिक नियमन और सुधार के अभाव में अपराधी प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है। यदि समाज में समानता, न्याय, और सुरक्षा की भावना नहीं होगी तो अपराध के खिलाफ प्रभावी लड़ाई संभव नहीं है। इसके अलावा, समाज का मनोवैज्ञानिक और नैतिक पतन भी अपराध की एक बड़ी वजह है। जब समाज में अस्तव्यस्तता, असहिष्णुता, और नैतिक मूल्यों का पतन होता है तो इससे अपराध की जड़ें और गहरी होती हैं।</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 text-base font-[475] first:mt-0 dark:font-[450]"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>दोनों ही दृष्टिकोणों में सत्य</strong></span></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">अपराध को सिर्फ समाज की उपज मानना या केवल समाज की विफलता ठहराना दोनों ही दृष्टिकोण आंशिक सत्य हैं। वास्तविकता में अपराध का कारण दोनों का संयोजन है। एक ओर, समाज की आर्थिक और सामाजिक समस्याओं से व्यक्ति अपराध की ओर प्रवृत्त होता है, और दूसरी ओर समाज की अपर्याप्त व्यवस्था उसे रोकने में असफल रहती है।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">अपराध रोकने के लिए जरूरी है कि समाज के अंतर्निहित कारणों को समझा जाए। गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा की कमी, और परिवारिक तनाव जैसे कारणों को दूर करते हुए समान अवसर प्रदान करना होगा। साथ ही न्याय व्यवस्था को प्रभावी, पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त बनाना होगा ताकि अपराध पर अंकुश लगाया जा सके।</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 text-base font-[475] first:mt-0 dark:font-[450]"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>निष्कर्ष</strong></span></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">अपराध और समाज व्यवस्था के बीच गहरा जुड़ाव है। अपराधी समाज की उपज हैं, जो अपने सामाजिक-आर्थिक परिवेश के कारण अपराध की ओर बढ़ते हैं। इसके साथ ही, अपराध समाज की उस विफलता का भी परिणाम हैं जहां न्याय, सुरक्षा, और समानता की सही व्यवस्था नहीं होती। इसलिए, अपराध की समस्या को हल करने के लिए समाज की संरचना सुधारनी होगी, न्याय व्यवस्था को सुदृढ़ करना होगा, और समान अवसर प्रदान करना होगा। तभी हम अपराध को कम कर एक स्वस्थ, सुरक्षित और न्यायसंगत समाज का निर्माण कर सकते हैं।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">इस प्रकार, अपराध न सिर्फ व्यक्ति का दोष है, बल्कि वह समाज के उन तमाम असमंजसों का प्रतिबिंब भी है जो समय रहते नियंत्रित एवं सुधारित नहीं किए गए। समाज और कानून की सामूहिक जिम्मेदारी है कि वे अपराध और उसके कारणों की जड़ तक पहुंच कर एक समृद्ध और सुरक्षित समाज के लिए ठोस कदम उठाएं।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>नोट: परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि अपराधियों को दंड न मिले। कानून का सिद्धांत है कि अपराध पर दंड अनिवार्य है ताकि न्याय और सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 21 Aug 2025 19:28:17 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sujit Sinha]]></dc:creator>
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