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                <title>स्वास्थ्य - Samridh Jharkhand</title>
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                <description>स्वास्थ्य RSS Feed</description>
                
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                <title>नामुमकिन हुआ मुमकिन, ‘लाइलाज’ समझी जा रही बीमारी का एम्स रायपुर में सफल उपचार</title>
                                    <description><![CDATA[छत्तीसगढ़ की गंभीर बीमारी से जूझ रही एक बालिका के स्वास्थ्य में एम्स रायपुर में उपचार के बाद करीब 80 प्रतिशत सुधार हुआ है। छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा की पहल, दंतेवाड़ा जिला प्रशासन के सहयोग और एम्स के विशेषज्ञ चिकित्सकों के प्रयास से बालिका को बेहतर उपचार मिल सका।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/national/aiims-raipur-successful-treatment-girl-serious-disease-80-percent-recovery/article-25756"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-08/0b3874136607e0dff70168437c6752cb_1116458330_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer"><strong>रायपुर:</strong> छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा की संवेदनशील पहल और निरंतर प्रयासों से गंभीर बीमारी से जूझ रही एक बालिका के जीवन में नई उम्मीद जगी है। जिस बालिका का शरीर धीरे-धीरे पत्थर जैसा होता जा रहा था और जिसकी स्थिति बेहद गंभीर थी, उसके स्वास्थ्य में एम्स रायपुर में उपचार के बाद अब लगभग 80 प्रतिशत तक सुधार हुआ है।</p>
<h4>गंभीर स्वास्थ्य स्थिति की जानकारी मिलने पर शुरू हुई पहल</h4>
<p>बालिका की गंभीर स्वास्थ्य स्थिति की जानकारी मिलने के बाद अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने मामले को गंभीरता से लेते हुए उसके बेहतर उपचार के लिए आवश्यक पहल की। उन्होंने दंतेवाड़ा कलेक्टर से चर्चा कर बालिका के उपचार, देखभाल और आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने का आग्रह किया।</p>
<p>अध्यक्ष डॉ. शर्मा की पहल पर दंतेवाड़ा कलेक्टर ने बालिका की देखभाल एवं आवश्यक समन्वय के लिए संबंधित अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी। जिला प्रशासन ने संवेदनशीलता के साथ इस जिम्मेदारी का निर्वहन किया और बालिका को बेहतर उपचार उपलब्ध कराने के लिए आवश्यक सहयोग एवं समन्वय सुनिश्चित किया।</p>
<h4>एम्स रायपुर में विशेषज्ञ चिकित्सकों ने संभाला उपचार</h4>
<p>इसके बाद बालिका को बेहतर एवं विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए एम्स रायपुर में उपचार की व्यवस्था सुनिश्चित की गई। एम्स के विशेषज्ञ चिकित्सकों ने बालिका की गंभीर स्थिति को देखते हुए लगातार उपचार, जांच एवं आवश्यक चिकित्सकीय देखभाल की।</p>
<p>एम्स रायपुर के त्वचा रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. सत्यकी गांगुली तथा डॉ. नम्रता छाबड़ा सहित बहुविषयक चिकित्सा टीम ने बालिका की स्थिति का विस्तृत मूल्यांकन किया। चिकित्सकों ने उसकी आवश्यकता के अनुरूप चरणबद्ध उपचार योजना तैयार की।</p>
<h4>त्वचा संबंधी समस्याओं के साथ पोषण पर भी दिया गया ध्यान</h4>
<p>उपचार के दौरान त्वचा संबंधी समस्याओं के साथ-साथ बालिका के समग्र स्वास्थ्य, पोषण, संक्रमण की रोकथाम तथा अन्य संबंधित चिकित्सकीय पहलुओं पर भी लगातार ध्यान दिया गया।</p>
<p>एम्स के चिकित्सकों के अथक प्रयास, दंतेवाड़ा जिला प्रशासन के सहयोग तथा अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा की सतत पहल और निगरानी के परिणामस्वरूप बालिका के स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सकारात्मक बदलाव आया है।</p>
<h4>स्वास्थ्य में करीब 80 प्रतिशत सुधार</h4>
<p>वर्तमान में बालिका के स्वास्थ्य में लगभग 80 प्रतिशत सुधार हो चुका है। यह उसके परिजनों और उपचार से जुड़े सभी लोगों के लिए बेहद उत्साहजनक है।</p>
<p>अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा लगातार बालिका के स्वास्थ्य की प्रगति की जानकारी लेती रहीं और संबंधित चिकित्सकों एवं अधिकारियों से समन्वय बनाए रखा। उनका उद्देश्य रहा कि गंभीर बीमारी से जूझ रही इस बालिका को समय पर बेहतर उपचार, पोषण और आवश्यक देखभाल मिल सके तथा वह स्वस्थ होकर सामान्य जीवन की ओर लौट सके।</p>
<h4>‘हर बच्चे को बेहतर स्वास्थ्य और सम्मान के साथ जीने का अधिकार’</h4>
<p>अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने गुरुवार को जानकारी देते हुए कहा, “हर बच्चे को बेहतर स्वास्थ्य, सुरक्षा और सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार है। इस बालिका के उपचार में एम्स के चिकित्सकों ने जिस समर्पण और अथक प्रयास के साथ कार्य किया है, वह अत्यंत सराहनीय है।”</p>
<p>उन्होंने कहा कि दंतेवाड़ा कलेक्टर एवं जिला प्रशासन ने भी बालिका की देखभाल के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित कर संवेदनशीलता के साथ सहयोग किया। बालिका के स्वास्थ्य में 80 प्रतिशत सुधार सभी के लिए संतोषजनक और उत्साहजनक है।</p>
<h4>पूरी तरह स्वस्थ होने की उम्मीद</h4>
<p>डॉ. शर्मा ने कहा कि प्रयास है कि बालिका पूरी तरह स्वस्थ होकर सामान्य जीवन की ओर लौटे और उसके चेहरे की मुस्कान हमेशा बनी रहे।</p>
<p>गंभीर बीमारी से जूझ रही इस बालिका के स्वास्थ्य में आया सुधार उसके परिवार के लिए राहत और खुशी का विषय है। साथ ही, यह इस बात की मिसाल भी है कि संवेदनशील पहल, समय पर विशेषज्ञ चिकित्सा, प्रशासनिक सहयोग और निरंतर प्रयासों से मुश्किल परिस्थितियों में भी उम्मीद की नई राह बनाई जा सकती है।</p>
<h2> </h2>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 14:56:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Ranchi News: ओथ फाउंडेशन एवं एम डॉक ने हिल टॉप स्कूल में लगाया निशुल्क शिविर, 200 बच्चों की दंत जांच</title>
                                    <description><![CDATA[रांची के बरियातू स्थित हिल टॉप पब्लिक स्कूल में ओथ फाउंडेशन एवं एम डॉक के संयुक्त तत्वावधान में निशुल्क दंत चिकित्सा शिविर सह दंत स्वास्थ्य जागरूकता सेमिनार आयोजित किया गया। शिविर में नर्सरी से 10वीं कक्षा तक के करीब 200 बच्चों के दांतों और मसूड़ों की जांच की गई।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/oth-foundation-m-doc-free-dental-camp-hill-top-school-ranchi/article-25363"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-08/44d24ad3-93d9-4984-aa81-f4f5232744be_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>रांची: </strong>सामाजिक संस्था ओथ फाउंडेशन एवं एम डॉक के संयुक्त तत्वावधान में शुक्रवार को बरियातू हिल व्यू रोड स्थित हिल टॉप पब्लिक स्कूल में एक दिवसीय निशुल्क दंत चिकित्सा शिविर सह दंत स्वास्थ्य जागरूकता सेमिनार का आयोजन किया गया। </p>
<p>दो सत्रों में आयोजित इस कार्यक्रम के प्रथम सत्र में स्कूल के कक्षा नर्सरी से 10वीं तक के लगभग 200 बच्चों के दांतों एवं मसूड़ों की जांच की गई। </p>
<p>डॉ. आशीष कुमार भगत डेंटल क्लिनिक के वरिष्ठ दंत चिकित्सक डॉ. आशीष भगत एवं डॉ. प्राची प्रिया ने बच्चों के मुख स्वास्थ्य का बारीकी से निरीक्षण किया। जांच के दौरान बच्चों में मुख्यतः दांतों में कैविटी (सड़न), मसूड़ों से खून आना, सूजन और पायरिया के शुरुआती लक्षण देखे गए, जिसके बाद डॉक्टरों ने बच्चों को सही चिकित्सीय परामर्श दिया। </p>
<p>शिविर में शामिल सभी बच्चों को टूथ ब्रश, टूथपेस्ट एवं आवश्यकतानुसार दवाइयों का भी निशुल्क वितरण किया गया।</p>
<p>​इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद ओथ फाउंडेशन के ट्रस्टी दीपक बंका एवं दीपा बंका (संचालिका, दीप कौचर बुटीक) ने कहा कि बचपन से ही बच्चों में स्वच्छता और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता जरूरी है। संस्था आगे भी समाज हित में ऐसे आयोजन करती रहेगी। वहीं विशिष्ट अतिथि के रूप में हिल टॉप पब्लिक स्कूल के निदेशक राजेश कुमार गुप्ता, प्राचार्या संगीता राज, उपप्राचार्या सुनीता श्रीवास्तव, एम डॉक के संस्थापक नवीन प्रकाश, उपसंस्थापक शशि कुमार, ओथ फाउंडेशन के सदस्य अमित कुमार एवं समाजसेवी आशुतोष द्विवेदी उपस्थित थे।</p>
<p>​कार्यक्रम के दूसरे सत्र में आयोजित सेमिनार के दौरान बच्चों ने डॉक्टरों से दांतों की देखभाल को लेकर कई सवाल पूछे, जिनका दंत चिकित्सकों ने सरल भाषा में समाधान किया। डॉक्टरों ने बच्चों को रोजाना दिन में दो बार ब्रश करने, अत्यधिक चॉकलेट व जंक फूड से परहेज करने और कुछ भी खाने के बाद कुल्ला करने की सलाह दी।</p>
<p>​कार्यक्रम का कुशल संचालन समाजसेवी आशुतोष द्विवेदी ने किया एवं धन्यवाद ज्ञापन इजराइल ने प्रस्तुत किया। </p>
<p>इस मौके पर इजराइल, सीमा, स्नेहा मुर्मू, प्रियंका, साधना, भारती, अमृता एवं मौसमी ने भी मौजूद रहकर कार्यक्रम को सफल बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। </p>
<p>यह जानकारी रूप राज ने दी। </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 17:07:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Hazaribagh  News: बड़कागांव सीएचसी में जच्चा-बच्चा की मौत पर जनाक्रोश, 9 घंटे बाद खत्म हुआ धरना</title>
                                    <description><![CDATA[हजारीबाग के बड़कागांव सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रसव के दौरान जच्चा और नवजात की मौत के बाद लोगों का आक्रोश फूट पड़ा। परिजनों, पत्रकारों, जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने करीब नौ घंटे तक सीएचसी परिसर में धरना दिया। प्रशासन के साथ वार्ता के बाद धरना समाप्त हुआ। चिकित्सा प्रभारी ने मृतक परिवार को सहायता, आउटसोर्सिंग के माध्यम से रोजगार और जांच के बाद दोषियों पर कार्रवाई का आश्वासन दिया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/hazaribagh/protest-ends-after-9-hours-due-to-public-anger-over/article-25242"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-08/75c08ce5-dbbe-4359-9dca-e57266c1edf5_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>हजारीबाग: </strong>जिले के बड़कागांव सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में प्रसव के दौरान कथित चिकित्सकीय लापरवाही से जच्चा और नवजात शिशु की मौत के बाद पूरे क्षेत्र में भारी आक्रोश व्याप्त है। घटना के विरोध में मंगलवार शाम से मृतक के परिजनों के समर्थन में पत्रकार, जनप्रतिनिधि, समाजसेवी एवं बड़ी संख्या में ग्रामीण शव के साथ सीएचसी परिसर में धरने पर बैठ गए। प्रदर्शनकारियों ने दोषी चिकित्सक पर कड़ी कार्रवाई, अस्पताल की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था में तत्काल सुधार तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने की मांग की।</p>
<p>धरना लगातार करीब नौ घंटे तक चला। देर रात बीडीओ जितेंद्र कुमार मंडल एवं अंचलाधिकारी मनोज कुमार की पहल पर प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच वार्ता हुई, जिसके बाद रात करीब तीन बजे धरना समाप्त हुआ।</p>
<p>वार्ता के दौरान चिकित्सा प्रभारी डॉ. अविनाश कुमार ने मृतक परिवार के एक सदस्य को आउटसोर्सिंग के माध्यम से रोजगार उपलब्ध कराने, आर्थिक सहायता दिलाने के लिए आवश्यक पहल करने, घटना में संलिप्त चिकित्सक के विरुद्ध जांचोपरांत कार्रवाई कराने तथा बड़कागांव सीएचसी की लचर स्वास्थ्य व्यवस्था में अविलंब सुधार और अनियमितताओं पर रोक लगाने का आश्वासन दिया। इसके बाद परिजनों ने थाना में लिखित आवेदन सौंपा और शव को पोस्टमार्टम के लिए हजारीबाग शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल भेजा गया।</p>
<p>इधर पोस्टमार्टम के दौरान हजारीबाग लोकसभा सांसद मनीष जायसवाल के निर्देश पर उनके लोकसभा क्षेत्र के सांसद मीडिया प्रतिनिधि रंजन चौधरी शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल पहुंचे और शोकाकुल परिजनों से मुलाकात कर उन्हें निष्पक्ष जांच एवं न्याय दिलाने का भरोसा दिया।</p>
<p>इसके बाद रंजन चौधरी सीधे हजारीबाग जिले के सिविल सर्जन डॉ. अशोक कुमार से कार्यालय पंहुचकर उनसे मिले और बड़कागांव सीएचसी में हुई जच्चा-बच्चा की मौत की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की। उन्होंने हाल ही में सामने आए दवाई चोरी मामले पर भी गंभीरता से संज्ञान लेते हुए दोषियों पर शीघ्र कार्रवाई तथा बड़कागांव सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का निरीक्षण कर स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने का आग्रह किया।</p>
<p>इस पर सिविल सर्जन डॉ. अशोक कुमार ने सांसद मीडिया प्रतिनिधि रंजन चौधरी को आश्वस्त किया कि जच्चा-बच्चा की मौत की घटना की जांच के लिए जल्द ही एक जांच समिति गठित की जा रही है और उसकी रिपोर्ट के आधार पर दोषियों के विरुद्ध आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। उन्होंने बताया कि दवाई चोरी प्रकरण में संबंधित दोषियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए जा चुके हैं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जल्द ही बड़कागांव सीएचसी का निरीक्षण कर वहां की स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।</p>
<p>धरना कार्यक्रम में मुख्य रूप से समाजसेवी सह पत्रकार एवं बड़कागांव सांसद मीडिया प्रतिनिधि उमेश दांगी, जिला परिषद सदस्य सुनीता देवी, बड़कागांव सांसद प्रतिनिधि पूनम साव, भाजपा मंडल अध्यक्ष शिवशंकर कुमार उर्फ शिबू, विवेक सोनी, पत्रकार शिवशंकर कुमार, संजय सागर, पिंटू कुशवाहा, संजय भुईयां, पंचायत समिति सदस्य रंजीत चौबे, चिकित्सा प्रभारी डॉ. अविनाश कुमार, मृतक परिवार के मुखलाल राणा, सीताराम राणा, अवध किशोर कुमार, उदय कुमार, रवि कुमार महतो, तीब्रकांत मौर्य सहित दर्जनों पत्रकार, जनप्रतिनिधि, समाजसेवी एवं ग्रामीण उपस्थित थे।</p>
<p>घटना के बाद पूरे क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अब लोगों की निगाहें प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की जांच तथा दोषियों पर होने वाली कार्रवाई पर टिकी हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>अपराध</category>
                                            <category>हजारीबाग</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 19:51:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Suman Kumari ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Ranchi News: सीआईटी में निःशुल्क नेत्र जाँच शिविर आयोजित, विद्यार्थियों और कर्मचारियों ने कराया परीक्षण</title>
                                    <description><![CDATA[रांची स्थित कैंब्रिज इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (सीआईटी) में बुधवार को निःशुल्क नेत्र जाँच शिविर का आयोजन किया गया। यह शिविर सीआईटी और अब्दुल रज्जाक मेमोरियल हॉस्पिटल की इकाई आराम आई हॉस्पिटल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हुआ।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/cit-ranchi-free-eye-checkup-camp-aaram-eye-hospital/article-25222"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-08/b8d1a56b-f339-4e62-9171-9dabe08438f9_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd"><strong>रांची: </strong>कैंब्रिज इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (सीआईटी) में बुधवार को निःशुल्क नेत्र जाँच शिविर का आयोजन किया गया। शिविर में संस्थान के दर्जनों विद्यार्थियों एवं कर्मचारियों ने अपनी आँखों की जाँच कराई।</p>
<p class="isSelectedEnd">यह शिविर कैंब्रिज इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी और अब्दुल रज्जाक मेमोरियल हॉस्पिटल की इकाई आराम आई हॉस्पिटल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया। शिविर में चिकित्सकों द्वारा मोतियाबिंद, रेटिना, प्टेरिजियम (Pterygium) सहित विभिन्न नेत्र रोगों की जाँच की गई।</p>
<p>इस अवसर पर संस्थान के प्राचार्य डॉ. एल. रंगनाथन, प्रो. दीपक वर्मा तथा अस्पताल के नेत्र चिकित्सक डॉ. रेहनामा फिरदौस, डॉ. कमरान रजा, डॉ. जावेद अहमद सहित अन्य लोग मुख्य रूप से उपस्थित थे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>शिक्षा</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 16:20:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रांची रिम्स में प्रसवपूर्व आनुवांशिक जांच शुरू, थैलेसीमिया-सिकल सेल की समय पर होगी पहचान</title>
                                    <description><![CDATA[रांची स्थित रिम्स के जेनेटिक्स एवं जीनोमिक्स विभाग ने प्रसवपूर्व आनुवांशिक जांच के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। अब गर्भ में पल रहे शिशु में थैलेसीमिया, सिकल सेल एनीमिया, ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्राफी और स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी जैसी गंभीर बीमारियों की समय रहते पहचान संभव होगी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/prenatal-genetic-testing-started-in-ranchi-rims-thalassemia-sickle-cell-will/article-24937"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-08/b549ebc9-369c-4fed-98c1-287e20e757e4_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>रांची: </strong>राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) के जेनेटिक्स एवं जीनोमिक्स विभाग ने प्रसवपूर्व आनुवांशिक जांच के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। अब गर्भ में पल रहे शिशु में थैलेसीमिया, सिकल सेल एनीमिया, ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्राफी, स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी सहित कई गंभीर आनुवांशिक बीमारियों की समय रहते पहचान की जा सकती है।</p>
<p>इस सुविधा से उन दंपतियों को विशेष राहत मिलेगी जिनके परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आनुवांशिक रोगों का इतिहास रहा है। रिम्स के जेनेटिक्स एवं जीनोमिक्स विभागाध्यक्ष डॉ. अनूपा प्रसाद के अनुसार, अधिकांश आनुवांशिक बीमारियों का अभी स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है। ऐसे में समय पर बीमारी की पहचान और आनुवांशिक परामर्श ही बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है।</p>
<p> डॉ. प्रसाद ने बताया कि उन्होंने डॉ. किरण त्रिवेदी के साथ मिलकर झारखंड में पहली बार इस सुविधा की शुरुआत की है। अब तक विभाग में थैलेसीमिया और सिकल सेल एनीमिया से संबंधित 26 प्रसवपूर्व आनुवांशिक परीक्षण किए जा चुके हैं। इन जांचों और विशेषज्ञ परामर्श के आधार पर अब तक दो बीटा-थैलेसीमियासे प्रभावित और दो सिकल सेल रोग से प्रभावित शिशुओं के जन्म को रोका गया।    </p>
<p>नइसके अलावा विभाग ने बीटा-कीटोथायोलेज की कमी जैसे अत्यंत दुर्लभ आनुवांशिक रोग का भी पहली बार सफल प्रसवपूर्व निदान किया है। यह रोग ACAT-1 जीन में परिवर्तन के कारण होता है। समय पर पहचान और परामर्श से इस रोग से प्रभावित शिशु के जन्म को भी रोका गया। रिम्स की यह पहल आनुवांशिक रोगों की रोकथाम की दिशा में झारखंड के लिए एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 14:30:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Susmita Rani]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Health News: वंदे भारत बनी जीवनरक्षक, सूरत से अहमदाबाद पहुंचाया गया लाइव हार्ट</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय रेलवे ने पहली बार वंदे भारत एक्सप्रेस के माध्यम से सूरत से अहमदाबाद तक जीवित हृदय (लाइव हार्ट) को सुरक्षित पहुंचाकर इतिहास रच दिया। हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए समय पर अंग पहुंचाना बेहद चुनौतीपूर्ण था, जिसे रेलवे, आरपीएफ, गुजरात पुलिस और चिकित्सा टीमों के बेहतर समन्वय से सफल बनाया गया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/health/vande-bharat-express-transports-live-heart-first-time-indian-railways-history/article-24903"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/3189934774aa880fa7fbf8da8f9e446d_111816753_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>नई दिल्ली: </strong>भारतीय रेल ने पहली बार वंदे भारत एक्सप्रेस के जरिए जीवित हृदय (लाइव हार्ट) को सूरत से अहमदाबाद सुरक्षित पहुंचा कर नया इतिहास बनाया है। इस हृदय का प्रत्यारोपण अहमदाबाद के यू.एन. मेहता इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोलॉजी एंड रिसर्च सेंटर में किया जाएगा।लाइव हार्ट को ट्रेन संख्या 20901 मुंबई सेंट्रल-गांधीनगर कैपिटल वंदेभारत एक्सप्रेस से अहमदाबाद लाया गया।</p>
<p>पूरा अभियान समय के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण था क्योंकि हृदय को तय समय के भीतर अस्पताल पहुंचाना जरूरी था। अहमदाबाद रेलवे स्टेशन से अस्पताल तक हृदय को ले जाने के लिए रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) और गुजरात पुलिस ने ग्रीन कॉरिडोर बनाया। इससे बिना किसी रुकावट के हृदय को सीधे अस्पताल पहुंचाया गया, ताकि प्रत्यारोपण में देरी न हो।</p>
<p>अहमदाबाद मंडल के मंडल रेल प्रबंधक वेदप्रकाश ने इस उपलब्धि को भारतीय रेलवे के लिए गर्व का क्षण बताते हुए कहा कि ऐसे जीवनरक्षक अभियानों में प्रत्येक मिनट महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने कहा कि भारतीय रेल, आरपीएफ, गुजरात पुलिस और चिकित्सा टीमों के बीच बेहतर समन्वय के कारण यह मिशन सफल हो सका। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति का जीवन बचाने में भारतीय रेलवे की भूमिका निभाना केवल जिम्मेदारी नहीं बल्कि सेवा और मानवता के प्रति सर्वोच्च दायित्व है।</p>
<p>रेलवे के अनुसार, वंदे भारत एक्सप्रेस की गति, समयपालन और विश्वसनीयता ने इस मिशन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह उपलब्धि दर्शाती है कि भारतीय रेल केवल यात्री और माल परिवहन तक सीमित नहीं है बल्कि आपातकालीन परिस्थितियों में जीवनरक्षक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भी प्रभावी माध्यम बन रही है।</p>
<p>इस अभियान की सफलता में भारतीय रेल के विभिन्न विभागों, रेलवे सुरक्षा बल, गुजरात राज्य पुलिस, चिकित्सकों, अंग प्रत्यारोपण समन्वयकों तथा अन्य संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। रेलवे ने कहा कि सभी एजेंसियों के बीच त्वरित और प्रभावी समन्वय के कारण यह चुनौतीपूर्ण मिशन सफलतापूर्वक पूरा किया जा सका।</p>
<p>भारतीय रेल ने कहा कि यह उपलब्धि उसकी त्वरित, सुरक्षित और विश्वसनीय सेवाओं के साथ-साथ मानव जीवन की रक्षा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का भी प्रतीक है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ताज़ा खबरें </category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 16:02:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सारकोमा का इलाज अब पहले से अधिक प्रभावी, जागरूकता और समय पर उपचार से बढ़ी उम्मीद</title>
                                    <description><![CDATA[जुलाई माह विश्वभर में सारकोमा जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है। सारकोमा एक दुर्लभ लेकिन गंभीर कैंसर है, जो शरीर के कनेक्टिव टिश्यू और हड्डियों में विकसित होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती गांठ, लगातार सूजन या हड्डियों में बिना कारण दर्द जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/health/sarcoma-awareness-month-rare-cancer-symptoms-treatment-hindi/article-24896"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/d0620b23-eb6c-4564-a458-59ab21ec4e79_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>डॉ. आयुष चौधरी</strong><br /><strong>एसोसिएट स्पेशलिस्ट</strong><br /><strong>मेडिकल इंडोर सर्विसेज</strong><br /><strong>टाटा मेन हॉस्पिटल </strong></p>
<p>जुलाई माह विश्वभर में सारकोमा जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य इस दुर्लभ लेकिन गंभीर प्रकार के कैंसर के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाना है, जिसके बारे में आमतौर पर बहुत कम जानकारी होती है। स्तन, फेफड़े या सर्वाइकल कैंसर की तुलना में सारकोमा के बारे में कम जानकारी होने के कारण इसकी समय पर पहचान और निदान में अक्सर देरी हो जाती है। जबकि जागरूकता बढ़ाकर इस स्थिति में महत्वपूर्ण सुधार लाया जा सकता है। समय रहते पहचान और विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा शीघ्र उपचार से रोगियों के बेहतर स्वास्थ्य परिणाम सुनिश्चित किए जा सकते हैं।</p>
<p>कल्पना कीजिए कि आपकी बांह या जांघ पर एक छोटी-सी, बिना दर्द वाली गांठ दिखाई देती है। अधिकांश लोग इसे सामान्य चर्बी की गांठ या किसी हल्की चोट का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। ज्यादातर मामलों में ऐसा होना सही भी होता है। लेकिन यदि यह गांठ लगातार बढ़ने लगे, तो इसकी चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है, क्योंकि कुछ मामलों में यह सारकोमा का संकेत भी हो सकती है।</p>
<p>सारकोमा कैंसर का एक ऐसा समूह है, जो शरीर के कनेक्टिव टिश्यू जैसे मांसपेशियों, वसा, नसों, रक्त वाहिकाओं, रेशेदार ऊतकों और हड्डियों में विकसित होता है। मुख्य रूप से इसे दो प्रकारों में बाँटा जाता है—सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा और बोन सारकोमा। सारकोमा के 70 से अधिक प्रकार पहचाने जा चुके हैं। यह एक दुर्लभ और कई प्रकारों वाला कैंसर है, इसलिए इसकी पहचान करना आसान नहीं होता। यही कारण है कि इसके प्रति जागरूकता और विशेषज्ञ डॉक्टरों से समय पर उपचार बेहद महत्वपूर्ण है।</p>
<p>हालाँकि, वयस्कों में होने वाले सभी कैंसर मामलों में सारकोमा की हिस्सेदारी 1% से भी कम है, लेकिन इसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक है। बच्चों और किशोरों में होने वाले लगभग 10–15% कैंसर सारकोमा के होते हैं और यह युवाओं में भी अपेक्षाकृत अधिक पाया जाने वाला कैंसर है। भारत में सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा के हर वर्ष लगभग 1–2 मामले प्रति एक लाख आबादी पर सामने आते हैं। लेकिन देश की बड़ी आबादी के कारण हर साल ऐसे हजारों नए मरीज सामने आते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है, क्योंकि कई मामलों की रिपोर्ट नहीं हो पाती, कुछ क्षेत्रों में कैंसर रजिस्ट्री की सीमित पहुंच है और बीमारी की पहचान में भी अक्सर देरी हो जाती है। सारकोमा के प्रति जागरूकता की कमी, इसका दुर्लभ होना और सामान्य गांठ जैसी दिखने वाली स्थितियों से मिलते-जुलते लक्षण होने के कारण कई मरीज तब तक डॉक्टर के पास नहीं पहुँचते, जब तक बीमारी काफी बढ़ नहीं जाती। इसलिए लोगों में इसके प्रति जागरूकता बढ़ाना, संदिग्ध लक्षणों की समय पर पहचान करना और मरीजों को शीघ्र विशेषज्ञ चिकित्सा केंद्रों तक पहुँचाना बेहद आवश्यक है।</p>
<p>सारकोमा जागरूकता माह का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि हर गांठ सामान्य नहीं होती। हालांकि अधिकांश गांठें कैंसर नहीं होतीं, लेकिन कुछ संकेतों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि कोई गांठ लगातार आकार में बढ़ रही हो, उसका आकार पाँच सेंटीमीटर से अधिक हो, वह त्वचा के नीचे गहराई में हो, पहले हटाए जाने के बाद दोबारा उभर आए या उसके साथ दर्द भी हो, तो तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। इसी तरह, हड्डियों में लगातार दर्द रहना, किसी हड्डी के आसपास सूजन होना या मामूली चोट लगने पर भी हड्डी टूट जाना जैसे लक्षण दिखाई दें, तो बिना देर किए चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।</p>
<p>यह समझना भी उतना ही जरूरी है कि इन लक्षणों का होना हमेशा सारकोमा होने का संकेत नहीं होता। अधिकांश गांठें और सूजन कैंसर नहीं होतीं। लेकिन यदि ऐसे लक्षण दिखाई दें, तो समय पर डॉक्टर से जांच कराना आवश्यक है। बीमारी की जल्द पहचान होने पर उपचार अधिक प्रभावी होता है और मरीज के पूरी तरह स्वस्थ होने की संभावना भी बढ़ जाती है।</p>
<p>सारकोमा की सही पहचान के लिए सुनियोजित जांच प्रक्रिया आवश्यक होती है। ट्यूमर का आकार और उसके फैलाव का पता लगाने के लिए एमआरआई या सी टी स्कैन  जैसी जांच की जाती है, जबकि बायोप्सी से बीमारी की पुष्टि होती है। चूंकि सारकोमा एक दुर्लभ कैंसर है और इसके कई प्रकार होते हैं, इसलिए इसकी जांच अनुभवी पैथोलॉजिस्ट द्वारा किया जाना बेहद जरूरी है। कई मामलों में मॉलिक्यूलर टेस्ट भी किए जाते हैं, जिससे बीमारी के प्रकार की सटीक पहचान हो सके और उचित उपचार तय किया जा सके। यह भी महत्वपूर्ण है कि बायोप्सी और उपचार की पूरी योजना सारकोमा विशेषज्ञों की मल्टीडिसिप्लिनरी टीम की देखरेख में बनाई जाए। बिना उचित योजना के की गई सर्जरी आगे के इलाज को अधिक जटिल बना सकती है।</p>
<p>पिछले दो दशकों में सारकोमा के उपचार में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, जिससे मरीजों के लिए बेहतर उम्मीदें जगी हैं। अब इसका इलाज केवल ट्यूमर निकालने तक सीमित नहीं है। इसके बजाय, विशेषज्ञों की एक मल्टीडिसिप्लिनरी टीम मिलकर प्रत्येक मरीज के लिए उसकी स्थिति के अनुसार उपचार की योजना तैयार करती है। इस टीम में सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट, ऑर्थोपेडिक ऑन्कोलॉजिस्ट, मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट, रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट, पैथोलॉजिस्ट, रिकंस्ट्रक्टिव सर्जन, फिजियोथेरेपिस्ट और रिहैबिलिटेशन विशेषज्ञ शामिल होते हैं। सभी विशेषज्ञ मिलकर मरीज को सर्वोत्तम उपचार उपलब्ध कराने का प्रयास करते हैं।</p>
<p>सारकोमा के उपचार में सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है लिंब-सेल्वेज सर्जरी का व्यापक उपयोग। पहले हाथ या पैर में होने वाले कई बोन और सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा के मामलों में एम्प्यूटेशन ही एकमात्र विकल्प माना जाता था। लेकिन आज बेहतर इमेजिंग तकनीक, उन्नत सर्जरी, एंडोप्रोस्थेटिक और माइक्रोसर्जिकल रिकंस्ट्रक्शन तथा आधुनिक सहायक उपचारों की बदौलत कई मरीजों में ट्यूमर को सफलतापूर्वक हटाते हुए प्रभावित अंग को सुरक्षित रखा जा सकता है। इससे मरीज पहले की तरह सामान्य जीवन जीने और अपने अंग का बेहतर उपयोग करने में सक्षम हो पाते हैं। हालाँकि, कुछ विशेष परिस्थितियों में कैंसर पर पूरी तरह नियंत्रण पाने के लिए अंग काटना अब भी आवश्यक हो सकता है, लेकिन अब यह हर मरीज के लिए अनिवार्य विकल्प नहीं रह गया है।</p>
<p>सारकोमा का उपचार अब पहले की तुलना में अधिक व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार किया जाता है। स्थानीय स्तर तक सीमित सारकोमा के अधिकांश मामलों में सर्जरी मुख्य उपचार है। कई बार दोबारा कैंसर होने की आशंका कम करने के लिए सर्जरी के साथ रेडियोथेरेपी भी दी जाती है। कुछ प्रकार के बोन सारकोमा में सर्जरी से पहले और बाद में कीमोथेरेपी देने से बेहतर परिणाम मिलते हैं। हाल के वर्षों में मॉलिक्यूलर पैथोलॉजी में हुई प्रगति के कारण सारकोमा के कुछ प्रकारों में विशेष जेनेटिक और मॉलिक्यूलर बदलावों की पहचान संभव हुई है। इससे ऐसे मरीजों के लिए टार्गेटेड थेरेपी का रास्ता खुला है, जिनमें इससे बेहतर लाभ मिलने की संभावना होती है। इसके अलावा, इम्यूनोथेरेपी और अन्य नई उपचार पद्धतियों पर लगातार शोध जारी है, जिससे भविष्य में सारकोमा के इलाज के और अधिक प्रभावी विकल्प उपलब्ध होने की उम्मीद है।</p>
<p>सारकोमा के उपचार में हुई इन प्रगतियों से यह स्पष्ट होता है कि अब सारकोमा का निदान निराशा का पर्याय नहीं रहा। यदि बीमारी का समय पर पता चल जाए, तो कई मरीजों का सफलतापूर्वक इलाज संभव है। वहीं, जिन मरीजों में बीमारी बढ़ चुकी होती है, उन्हें भी नई दवाओं, बेहतर सहायक उपचार और विशेषज्ञों की बहु-विषयक टीम की देखरेख से लाभ मिल सकता है। आज सारकोमा के उपचार का उद्देश्य केवल मरीज की जीवन-रक्षा करना ही नहीं, बल्कि उसके प्रभावित अंग की कार्यक्षमता बनाए रखना, जीवन की गुणवत्ता बेहतर करना और उपचार से लेकर पूरी तरह स्वस्थ होने तक हर चरण में उसका सहयोग करना भी है।</p>
<p>चूंकि सारकोमा एक दुर्लभ और कई प्रकार का कैंसर है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देश भी यही सलाह देते हैं कि इसका उपचार ऐसे केंद्रों में कराया जाए, जहां सारकोमा के इलाज का विशेष अनुभव और विशेषज्ञता उपलब्ध हो। ऐसे केंद्रों में सटीक जांच, विशेषज्ञों की बहु-विषयक टीम, उन्नत सर्जरी, आधुनिक रेडियोथेरेपी, दवा आधारित उपचार, रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी, रिहैबिलिटेशन और लंबे समय तक फॉलो-अप जैसी सभी सुविधाएं एक ही स्थान पर उपलब्ध होती हैं। इस समन्वित उपचार पद्धति से प्रत्येक मरीज को उसके सारकोमा के प्रकार और बीमारी की अवस्था के अनुसार सबसे उपयुक्त उपचार मिल पाता है।<br /> <br />सारकोमा जागरूकता माह के अवसर पर संदेश स्पष्ट और महत्वपूर्ण है—सारकोमा भले ही एक दुर्लभ कैंसर हो, लेकिन इसे कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि शरीर में कोई गांठ लगातार बढ़ रही हो, लंबे समय तक सूजन बनी रहे या हड्डियों में बिना किसी स्पष्ट कारण के लगातार दर्द हो, तो तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। समय पर बीमारी की पहचान ही सफल उपचार की सबसे बड़ी कुंजी है। आज सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी और विशेषज्ञों की बहु-विषयक टीम द्वारा किए जा रहे उपचार की बदौलत सारकोमा के कई मरीजों के बेहतर स्वास्थ्य परिणाम संभव हो रहे हैं।</p>
<p>जागरूकता से बीमारी की समय पर पहचान संभव होती है। समय पर पहचान से बेहतर इलाज मिल सकता है, और बेहतर इलाज हर मरीज के लिए नई उम्मीद लेकर आता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>जन स्वास्थ्य</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 15:27:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सदर अस्पताल की व्यवस्था सुधारने को डॉ. मुकेश को मिली नई जिम्मेदारी</title>
                                    <description><![CDATA[साहिबगंज सदर अस्पताल की व्यवस्था को और सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से सिविल सर्जन डॉ. रामदेव पासवान ने डॉ. मुकेश कुमार को उपाधीक्षक के प्रशासनिक कार्यों में सहयोग की जिम्मेदारी सौंपी है। डॉ. मुकेश अपने नियमित चिकित्सा कार्यों के साथ अस्पताल के विभिन्न विभागों के प्रशासनिक समन्वय में भी योगदान देंगे]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/sahibganj/dr-mukesh-gets-new-responsibility-to-improve-the-system-of/article-24498"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/947615ca-4656-4058-8125-a4025b9ceb15_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>साहिबगंज:</strong> सदर अस्पताल की व्यवस्था को और बेहतर बनाने के लिए सिविल सर्जन ने एक और डॉक्टर को प्रशासनिक जिम्मेदारी सौंपी है। सिविल सर्जन डॉ. रामदेव पासवान ने अस्पताल में प्रतिनियुक्त डॉ. मुकेश कुमार को उपाधीक्षक के कार्यों में सहयोग के लिए प्राधिकृत किया है।</p>
<p>जारी आदेश के अनुसार, डॉ. मुकेश कुमार अब अपने नियमित मरीज देखने के काम के साथ-साथ अस्पताल के विभिन्न विभागों के प्रशासनिक कामकाज में भी मदद करेंगे। उद्देश्य साफ है - मरीजों को मिलने वाली चिकित्सा सुविधा को और सुगम और व्यवस्थित करना। सिविल सर्जन ने डॉ. मुकेश को निर्देश दिया है कि वे अपने द्वारा किए जा रहे कार्यों की दैनिक रिपोर्ट उन्हें सौंपें, ताकि अस्पताल की गतिविधियों पर सीधी नजर रखी जा सके।</p>
<p>डॉ. रामदेव पासवान ने बताया कि डॉ. मुकेश कुमार के लिए यह कोई नई जिम्मेदारी नहीं है। इससे पहले भी वे इसी तरह के प्रशासनिक कार्यों को सफलतापूर्वक संभाल चुके हैं। उनके अनुभव को देखते हुए उन्हें फिर से यह अहम दायित्व दिया गया है। सिविल सर्जन के इस फैसले से उम्मीद जताई जा रही है कि सदर अस्पताल में मरीजों की भीड़ और विभागीय समन्वय से जुड़ी समस्याओं में सुधार होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>साहिबगंज</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 14:16:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Susmita Rani]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>देश में फिर बढ़ी कोविड-19 की चिंता, 12 नए मामले और 4 मौतें; विशेषज्ञों ने दी सतर्क रहने की सलाह</title>
                                    <description><![CDATA[देश में कोविड-19 के कुछ नए मामलों और चार मौतों के बाद एक बार फिर सतर्कता बढ़ गई है। आंध्र प्रदेश में 26 जून से 16 जुलाई के बीच 12 लोग संक्रमित पाए गए, जिनमें चार मरीजों की मौत हुई। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल देश में कोरोना की नई लहर या किसी खतरनाक वेरिएंट के संकेत नहीं हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/national/covid-19-india--12-new-cases-4-deaths-andhra-pradesh-health-alert/article-24284"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/91ecc33e-d6ad-4d93-aa55-ba232374d34e_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>नई दिल्ली: </strong>देश में कोविड-19 के कुछ नए मामलों और मौतों ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है, जिससे बीमारी की वापसी की आशंका जताई जा रही है। आंध्र प्रदेश में 26 जून से 16 जुलाई के बीच 12 लोग कोविड-19 से संक्रमित पाए गए, जिनमें से चार मरीजों की पहले से मौजूद गंभीर बीमारियों और कोरोना संक्रमण की चपेट में आने के कारण मौत हो गई। इन मौतों का अनुपात लगभग 30 प्रतिशत रहा, जिसने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। मरने वाले मरीजों को हाइपरटेंशन, डायबिटीज और किडनी संबंधी गंभीर समस्याएं थीं। शेष संक्रमितों में से तीन होम आइसोलेशन में हैं, दो अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं, जबकि तीन ठीक होकर घर जा चुके हैं। जुलाई के पहले पखवाड़े में देशभर में कुल 339 नए कोविड मामले दर्ज किए गए हैं, जो सतर्कता की आवश्यकता को दर्शाते हैं।</p>
<p>हालांकि, संक्रामक रोग विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल देश में कोरोना की कोई नई लहर नहीं है और न ही कोई खतरनाक वेरिएंट सामने आया है। आंध्र प्रदेश के मामले स्थानीय क्लस्टर प्रतीत होते हैं, न कि देशव्यापी फैलाव। जानकारों का कहना है कि बड़ी आबादी में अब हाइब्रिड इम्यूनिटी मौजूद है, जो गंभीर बीमारी से बचाने में मदद करती है। इन्फ्लूएंजा और कोविड के लक्षण मिलते-जुलते हैं, इसलिए जांच कराना महत्वपूर्ण है।</p>
<p>विशेषज्ञों ने खासकर बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पुरानी बीमारियों से ग्रसित लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है। उनका कहना है कि यदि बुखार 3 से 5 दिन से अधिक रहे, सांस लेने में तकलीफ हो, सीने में दर्द हो या भ्रम की स्थिति बढ़े, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।</p>
<p>मास्क के उपयोग पर विशेषज्ञों का कहना है कि हर किसी को मास्क लगाने की जरूरत नहीं है। हालांकि, यदि किसी को बुखार, खांसी, गले में खराश या नाक बहने जैसी समस्या हो, तो दूसरों में संक्रमण फैलने से रोकने के लिए मास्क जरूर पहनना चाहिए। अस्पताल जाते समय या भीड़भाड़ वाली बसों, ट्रेनों और फ्लाइट्स में भी मास्क का उपयोग करना उचित है। बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पुरानी बीमारियों से पीड़ित लोगों को भीड़भाड़ वाली बंद जगहों पर मास्क का इस्तेमाल करना चाहिए।</p>
<p>विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि भीड़भाड़ वाली जगहों पर मास्क पहनें, बाहर से आने के बाद हाथों को साबुन और पानी से अच्छी तरह धोएं, खांसी या जुकाम होने पर मास्क और सैनिटाइजर का उपयोग करें। यदि बच्चे बीमार हों, तो उन्हें स्कूल या खेलने के लिए न भेजें और घर में उचित वेंटिलेशन की व्यवस्था बनाए रखें। विशेषज्ञों का कहना है कि घबराने के बजाय सतर्कता और सावधानी ही इस स्थिति से निपटने का सबसे बेहतर उपाय है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 15:18:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>साहिबगंज सदर अस्पताल में बेड फुल, मरीज स्ट्रेचर और बरामदे में करा रहे इलाज</title>
                                    <description><![CDATA[साहिबगंज सदर अस्पताल में मौसमी बीमारियों के बढ़ते मामलों के कारण मरीजों की संख्या अचानक बढ़ गई है। अस्पताल के सभी बेड भर जाने के बाद कई मरीजों का इलाज बरामदे में स्ट्रेचर पर किया जा रहा है। पिछले एक सप्ताह में वायरल बुखार, पेट दर्द, उल्टी और दस्त के मरीजों की संख्या में तेजी आई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/sahibganj/in-sahibganj-sadar-hospital-bed-full-patients-are-undergoing-treatment/article-24282"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/aec889e9-54a5-4bce-9b23-88f886a691d7_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>साहिबगंज:</strong> बदलते मौसम की मार अब सीधे सदर अस्पताल पर पड़ रही है। बारिश-धूप के बीच मौसम बदलते ही मौसमी बीमारियों ने दस्तक दे दी और अस्पताल में मरीजों का सैलाब आ गया। नतीजा - अस्पताल के सारे बेड भरे हुए और मरीज बरामदे में स्ट्रेचर पर लेटे हुए नज़र आते हैं।    </p>
<p>गुरुवार को सदर अस्पताल की तस्वीर किसी अस्थायी कैंप जैसी दिख रही थी। वार्ड के अंदर एक भी बेड खाली नहीं था। नए आने वाले मरीजों को मजबूरी में बरामदे में ही भर्ती करना पड़ा। बांझी गांव के भागमत मुर्मू गुरुवार सुबह पेट दर्द और दस्त के साथ अस्पताल पहुंचे। बुखार और कमजोरी थी, तुरंत सलाइन लगनी थी। लेकिन वार्ड में जगह नहीं मिली। आखिरकार बरामदे में लगे स्ट्रेचर पर ही उनका इलाज शुरू हुआ।<br />       अस्पताल सूत्रों के अनुसार, पिछले 7 दिनों में ओपीडी और भर्ती मरीजों की संख्या अचानक बढ़ी है। वायरल, मौसमी बुखार, उल्टी-दस्त के केस सबसे ज्यादा आ रहे हैं। आलम ये है कि वार्ड के साथ-साथ बरामदा भी मरीजों से पट गया है। कुछ परिजन तो खुद ही बरामदे में मरीज का इलाज कराने पर अड़े दिखे।</p>
<p> चिकित्सकों का कहना है कि कभी तेज धूप, कभी बारिश और उमस की वजह से इम्यूनिटी कमजोर हो रही है। इसी कारण वायरल और पेट संबंधी बीमारियां बढ़ी हैं। चिकित्सकों ने अपील की है कि लोग उबला पानी पिएं, बासी खाना न खाएं और घर-आसपास साफ-सफाई रखें। लक्षण दिखते ही अस्पताल पहुंचें, लापरवाही न करें।</p>
<p>वहीं, अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि मौसमी बीमारियों के इलाज के लिए पर्याप्त दवाएं, सलाइन और अन्य जरूरी सामान उपलब्ध हैं। सभी मरीजों को सरकारी योजना के तहत मुफ्त इलाज दिया जा रहा है। जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त बेड और स्टाफ की व्यवस्था भी की जाएगी।<br />फिलहाल सदर अस्पताल में मरीजों का दबाव लगातार बढ़ रहा है। अगर अगले कुछ दिनों में मरीजों की संख्या इसी तरह बढ़ती रही तो प्रशासन के लिए अतिरिक्त व्यवस्था करना जरूरी हो जाएगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>साहिबगंज</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 15:01:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Susmita Rani]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बिना खाना खाए इंसान कितने दिन तक जिंदा रह सकता है? डॉक्टर ने बताया शरीर का पूरा विज्ञान</title>
                                    <description><![CDATA[क्या आपने कभी सोचा है कि बिना खाना खाए इंसान कितने दिन तक जीवित रह सकता है? जानिए डॉक्टर के अनुसार शरीर में होने वाले बदलाव और इससे जुड़े वैज्ञानिक तथ्य।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/health/how-long-can-a-human-survive-without-food-doctor-explains/article-23706"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/fhf.jpg" alt=""></a><br /><p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal"><strong>हेल्थ डेस्क: </strong>यह सवाल शायद कभी न कभी आपके मन में भी आया होगा कि अगर कोई इंसान खाना खाना बंद कर दे तो वह कितने दिनों तक जीवित रह सकता है? ग्रेटर नोएडा स्थित NIIMS मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के मेडिसिन विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. सुमोल रत्न के अनुसार इसका कोई एक निश्चित जवाब नहीं है, क्योंकि यह पूरी तरह से व्यक्ति की शारीरिक स्थिति पर निर्भर करता है। उनका कहना है कि किसी भी व्यक्ति की आयु, शारीरिक वजन, पहले से चली आ रही बीमारियां, शरीर में वसा की मात्रा और सबसे अहम बात यह कि उसे पानी मिल रहा है या नहीं इन सब बातों पर यह तय होता है कि वह व्यक्ति कितने समय तक जीवित रह सकता है। यदि पानी की आपूर्ति बनी रहे, तो सामान्य परिस्थितियों में एक इंसान लगभग एक से दो महीने तक जीवित रह सकता है। हालांकि इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि वह पूरी तरह स्वस्थ और सामान्य अवस्था में रहेगा।</p>
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<h4 class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal"><strong>शरीर में कब और कैसे शुरू होते हैं बदलाव?</strong></h4>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal">हमारा शरीर एक बेहद चतुर और जटिल तंत्र की तरह काम करता है। जैसे ही भोजन मिलना बंद होता है, शरीर तुरंत हार नहीं मानता बल्कि अपने भीतर संग्रहित ऊर्जा को उपयोग में लाने लगता है। शुरुआती अवस्था में शरीर पहले से उपलब्ध ग्लूकोज का इस्तेमाल करता है। उसके बाद यकृत (लिवर) और मांसपेशियों में भंडारित ग्लाइकोजन को ऊर्जा में परिवर्तित किया जाने लगता है। यह भंडार लगभग 24 घंटों के भीतर तेजी से समाप्त होने लगता है।</p>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal">जब ग्लाइकोजन का स्तर गिरने लगता है, तब शरीर शरीर में जमा चर्बी (वसा) को जलाकर ऊर्जा प्राप्त करना शुरू करता है। यही कारण है कि लंबे समय तक भूखे रहने पर व्यक्ति का वजन तेज गति से घटने लगता है। जब शरीर की वसा भी धीरे-धीरे खत्म होने लगती है, तो मजबूरी में शरीर मांसपेशियों को तोड़कर उनसे ऊर्जा बनाने लगता है। यही वह क्षण होता है जब शरीर अत्यंत तेजी से कमजोर होने की राह पर चल पड़ता है।</p>
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<h4 class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal"><strong>पानी न मिले तो और भी खतरनाक होती है स्थिति</strong></h4>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal">यदि भोजन के साथ-साथ पानी भी न मिले, तो स्थिति कहीं अधिक तेजी से बिगड़ती है। ऐसे में अधिकांश लोग मात्र 3 से 7 दिनों के भीतर गंभीर रूप से अस्वस्थ हो सकते हैं। गर्म मौसम, अत्यधिक पसीना, बुखार या पहले से मौजूद कोई बीमारी इस समयसीमा को और भी कम कर सकती है।</p>
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<h4 class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal"><strong>पहले 24 घंटों में क्या महसूस होता है?</strong></h4>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal">डॉ. बताते हैं कि भोजन न मिलने के पहले 24 घंटों में व्यक्ति को तीव्र भूख का अनुभव होता है। इसके साथ ही चिड़चिड़ापन, शारीरिक थकान, सिरदर्द और सामान्य कमजोरी के लक्षण उभरने लगते हैं। रक्त में शर्करा का स्तर गिरने के कारण कुछ लोगों को चक्कर भी आ सकते हैं। यदि पानी का सेवन पर्याप्त मात्रा में हो, तो शरीर धीरे-धीरे इस नई परिस्थिति के अनुसार स्वयं को ढालने की कोशिश करता है।</p>
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<h4 class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal"><strong>दूसरे से तीसरे दिन क्या होता है?</strong></h4>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal">दूसरे और तीसरे दिन तक शरीर वसा को ऊर्जा के मुख्य स्रोत के रूप में उपयोग में लाने लगता है। कुछ लोगों में भूख की तीव्रता थोड़ी कम हो सकती है, परंतु शारीरिक कमजोरी बढ़ती जाती है। इस अवस्था में सांस से एक अलग प्रकार की गंध आने लगती है, जिसका कारण शरीर में कीटोन्स (Ketones) का निर्माण होना है। यही प्रक्रिया लंबे उपवास या कीटो डाइट के दौरान भी देखी जाती है।</p>
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<h4 class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal"><strong>एक सप्ताह के बाद शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है?</strong></h4>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal">एक सप्ताह से अधिक समय तक भोजन न मिलने पर शरीर में विटामिन, खनिज और प्रोटीन की गंभीर कमी उत्पन्न होने लगती है। वजन में तेज गिरावट, मांसपेशियों का कमजोर होना और दैनिक कार्य करने में असमर्थता जैसे लक्षण प्रकट होने लगते हैं। इस समय शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कमजोर पड़ जाती है, जिससे संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।</p>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal">इस अवस्था में शरीर के लगभग सभी अंग प्रभावित होने लगते हैं। हृदय की मांसपेशियां क्षीण होने लगती हैं, जिसके फलस्वरूप धड़कन अनियमित या धीमी हो सकती है। रक्तचाप में गिरावट आती है और बार-बार चक्कर आने की समस्या होने लगती है। इसके अलावा गुर्दे और यकृत की कार्यक्षमता भी प्रभावित हो सकती है। शरीर का तापमान गिरने लगता है और व्यक्ति को लगातार ठंड का अनुभव होता रहता है।</p>
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<h4 class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal"><strong>हार्मोनल बदलाव भी होते हैं गंभीर</strong></h4>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal">लंबे समय तक भूखे रहने पर हार्मोन्स पर भी व्यापक प्रभाव पड़ता है। महिलाओं में मासिक धर्म बाधित हो सकता है, जबकि पुरुष और महिला दोनों में विभिन्न प्रकार के हार्मोनल असंतुलन देखने को मिल सकते हैं।</p>
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<h4 class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal"><strong>जब जान का खतरा बन जाती है भुखमरी</strong></h4>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal">स्थिति तब अत्यंत खतरनाक हो जाती है जब शरीर के पास ऊर्जा के लिए उपयोग योग्य न तो वसा बचती है और न ही मांसपेशियां। इस अवस्था में हृदय, मस्तिष्क, फेफड़े और गुर्दे जैसे अत्यावश्यक अंग सुचारु रूप से कार्य करने में असमर्थ हो जाते हैं। व्यक्ति अत्यधिक दुर्बल हो जाता है, चलना-फिरना कठिन हो जाता है और बेहोशी तक की नौबत आ सकती है। यदि समय पर उचित उपचार और पोषण नहीं दिया गया तो अंग विफलता, गंभीर संक्रमण या हृदय गति रुकने जैसी जानलेवा स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं।</p>
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<h4 class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal"><strong>लंबे समय बाद खाना खिलाने में भी बरतनी होती है सावधानी</strong></h4>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal">यह जानना भी बेहद जरूरी है कि यदि कोई व्यक्ति कई दिनों तक भूखा रहा हो, तो उसे एकदम से अधिक मात्रा में भोजन नहीं देना चाहिए। ऐसा करने पर शरीर में "रिफीडिंग सिंड्रोम" (Refeeding Syndrome) नामक गंभीर स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इस स्थिति में शरीर के इलेक्ट्रोलाइट्स में अचानक और तेज बदलाव होते हैं, जिससे हृदय, मस्तिष्क और अन्य अंगों पर हानिकारक प्रभाव पड़ सकता है। इसी कारण चिकित्सकों की निगरानी में धीरे-धीरे और संतुलित आहार देकर ऐसे व्यक्ति को सामान्य स्थिति में लाया जाता है।</p>
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<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal"><strong>डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी निर्णय या लंबे उपवास से पहले योग्य चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 27 Jun 2026 15:03:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Media Desk]]></dc:creator>
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                <title>जंक फूड और खराब लाइफस्टाइल बढ़ा रहे कैंसर का खतरा, समय पर जांच ही सबसे बड़ा बचाव: डॉ. जितेंद्र रोहिला</title>
                                    <description><![CDATA[शिमला में फोर्टिस कैंसर संस्थान, मोहाली के सीनियर कंसल्टेंट जीआई सर्जिकल ऑन्कोलॉजी एवं रोबोटिक सर्जन डॉ. जितेंद्र रोहिला ने कहा कि जंक फूड, खराब जीवनशैली, मोटापा और स्वास्थ्य जांच में लापरवाही कैंसर के बढ़ते मामलों की प्रमुख वजह हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/health/cancer-risk-junk-food-lifestyle-dr-jitendra-rohila-fortis-mohali/article-23308"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/3dd4f60b-90c9-4518-9a9e-00acc9f8a5cf_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd"><strong>शिमला:</strong> बदलती जीवनशैली, जंक फूड का बढ़ता चलन, शारीरिक गतिविधियों की कमी और नियमित स्वास्थ्य जांच को नजरअंदाज करना कैंसर के मामलों में लगातार वृद्धि का प्रमुख कारण बनता जा रहा है। फोर्टिस कैंसर संस्थान, मोहाली के सीनियर कंसल्टेंट जीआई सर्जिकल ऑन्कोलॉजी एवं रोबोटिक सर्जन डॉ. जितेंद्र रोहिला ने लोगों से समय रहते जांच कराने और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की अपील की है।</p><p class="isSelectedEnd">डॉ. रोहिला ने कहा कि कैंसर का सबसे प्रभावी उपचार उसकी शुरुआती पहचान में छिपा है। यदि बीमारी का पता शुरुआती चरण, विशेष रूप से स्टेज-1 में चल जाए, तो उपचार की सफलता की संभावना काफी बढ़ जाती है। लेकिन जागरूकता की कमी और लापरवाही के कारण अधिकांश मरीज तब अस्पताल पहुंचते हैं, जब कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों तक फैल चुका होता है।</p><p class="isSelectedEnd">उन्होंने बताया कि हाल ही में फोर्टिस अस्पताल मोहाली में 63 वर्षीय महिला का सफल उपचार किया गया, जो स्यूडोमायक्सोमा पेरिटोनी (पीएमपी) नामक दुर्लभ कैंसर से पीड़ित थीं। यह बीमारी बेहद दुर्लभ मानी जाती है और इसके मामले प्रति दस लाख आबादी में केवल एक से दो ही सामने आते हैं।</p><p class="isSelectedEnd">महिला लंबे समय से पेट में सूजन, भूख कम लगने और मल त्याग की आदतों में बदलाव जैसी समस्याओं से परेशान थीं। जांच में पता चला कि कैंसर अपेंडिक्स से शुरू होकर पेट की अंदरूनी परत पेरिटोनियम तक फैल चुका था। पीईटी-सीटी स्कैन में पेट के विभिन्न हिस्सों में ट्यूमर जमाव मिलने के बाद विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने साइटोरिडक्टिव सर्जरी (सीआरएस) और हाइपरथर्मिक इंट्रापेरिटोनियल कीमोथेरेपी (हाइपेक) प्रक्रिया अपनाने का निर्णय लिया।</p><p class="isSelectedEnd">करीब नौ घंटे तक चली जटिल सर्जरी के दौरान कैंसरग्रस्त ऊतकों और ट्यूमर को सफलतापूर्वक हटाया गया। इसके बाद लगभग 90 मिनट तक पेट के भीतर गर्म कीमोथेरेपी दी गई। विशेषज्ञों के अनुसार सीआरएस-हाइपेक तकनीक को इस प्रकार के कैंसर के लिए दुनिया भर में सबसे प्रभावी उपचार माना जाता है।</p><p class="isSelectedEnd">सफल उपचार के बाद मरीज को दस दिनों के भीतर अस्पताल से छुट्टी दे दी गई और अब वह सामान्य जीवन व्यतीत कर रही हैं।</p><p>डॉ. रोहिला ने कहा कि शरीर में किसी भी असामान्य लक्षण को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। नियमित स्वास्थ्य जांच, संतुलित आहार, व्यायाम और सक्रिय जीवनशैली अपनाकर कैंसर के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि जागरूकता और समय पर जांच ही कैंसर के खिलाफ सबसे मजबूत हथियार हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/news/health/cancer-risk-junk-food-lifestyle-dr-jitendra-rohila-fortis-mohali/article-23308</link>
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                <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 10:13:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Susmita Rani]]></dc:creator>
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