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                <title>साक्षात्कार - Samridh Jharkhand</title>
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                <title>हमारी लड़ाई दिकुओं से नहीं, शोषकों से है': शिबू सोरेन का 1987 का साक्षात्कार</title>
                                    <description><![CDATA[यह लेख शिबू सोरेन के साथ हुए एक साक्षात्कार पर आधारित है. इसमें शिबू सोरेन ने 'दिकू' शब्द के सही अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा था कि उनकी लड़ाई गैर-आदिवासियों से नहीं, बल्कि शोषण करने वालों से है. उन्होंने झारखंड आंदोलन, 'धान काटो आंदोलन' और भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ अपने संघर्षों पर खुलकर बात की थी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/our-fight-is-not-with-the-exploiters-but-shibu-sorens/article-15226"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-08/resized-image---2025-08-04t205854.519.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>हरिवंश नारायण सिंह</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>रांची:</strong> 'दिशोम गुरु' शिबू सोरेन आज नहीं रहे. स्मृति उनसे पहली मुलाकात की. दिसंबर का महीना. वर्ष, 1987. कोलकाता में ‘रविवार’ (आनंद बाजार पत्रिका समूह) में काम करता था. कोलकाता से उनसे बातचीत करने ही झारखंड (तब, अविभाजित बिहार का हिस्सा) आया था. शिबू सोरेन झारखंड आंदोलन की अगुवाई कर रहे थे. गांव-गांव में गुरुजी के नाम से लोकप्रिय. सिर्फ राजनीतिक नहीं, सामाजिक बदलाव की लड़ाई भी लड़ रहे थे. आदिवासियों ,झारखंडियों को शराब छोड़ने और शिक्षा से जुड़ने की प्रेरणा दे रहे थे. उनसे एक गांव में मुलाकात हुई. लंबी बातचीत हुई. तब शिबू सोरेन के आंदोलन का ही हवाला देकर 'दिकू' शब्द को लेकर भी भ्रम फैला था. उन्होंने बातचीत में बहुत ही स्पष्ट शब्दों में सब बताया था. आज, उनके न रहने पर, उनकी स्मृतियों को समर्पित करते हुए फिर से उस इंटरव्यू (‘रविवार’, 05 दिसंबर 1987) का एक अंश साझा कर रहा हूं. यह इंटरव्यू हाल ही में प्रकाशन संस्थान (नई दिल्ली) से प्रकाशित 'समय के सवाल' सीरीज के दूसरे खंड की किताब 'झारखंड: सम्पन्न धरती-उदास बसंत' में संकलित-प्रकाशित है.</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>हमारी लड़ाई 'दिकुओं' से नहीं शोषकों से है: शिबू सोरेन</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">शिबू सोरेन आदिवासियों के दूसरे 'मरांग गोमके' हैं. आज भी आदिवासियों के बीच वह मसीहा की तरह लोकप्रिय हैं. अपने लड़ाकू तेवर के कारण वह मशहूर रहे हैं. श्री सोरेन ने राजनीति पढ़-लिखकर नहीं सीखी, उनका जीवन ही कठिनाइयों के बीच आरम्भ हुआ. उनके अध्यापक पिता स्वतंत्रता की लड़ाई में काफी सक्रिय रहे थे. 1957 में महाजनों ने उनकी हत्या कर दी. तब वह छठी कक्षा में थे. सोरेन सात भाई-बहन थे. पिता के न रहने पर परिवार की पूरी जिम्मेदारी उन पर आ गयी. 1967-69 में बनियों के खिलाफ उनका धान काटो आन्दोलन गिरीडीह, हजारीबाग और धनबाद अंचल में काफी सफल रहा. उस वक्त उन्होंने जन-अदालतों का गठन किया और नारा दिया, 'जमीन का फैसला जमीन में होगा, कोर्ट-कचहरी में नहीं.' उन दिनों शिबू सोरेन के नेतृत्व में चलनेवाले आन्दोलन का यह आलम था कि रात के डेढ़-दो बजे भी नगाड़े की आवाज पर हजारों आदिवासी पलक झपकते एकजुट हो जाते थे. फिर ए.के. राय, विनोद बिहारी महतो और शिबू सोरेन के सामूहिक नेतृत्व में झारखंड मुक्ति मोरचा की जड़ें काफी फैलीं और मजबूत हुईं. अब एक बार फिर शिबू सोरेन पुराने तेवर के साथ झारखंड की लड़ाई में कूदने के लिए तैयार हैं और इसके लिए वह गाँव-गाँव घूम भी रहे हैं. एक आदिवासी गाँव में उनसे हुई बातचीत का ब्योरा.</p>
<h4><strong>सवाल : आपके ऊपर आरोप है कि झामुमो के अंदर आप कांग्रेस की राजनीति करते हैं?</strong></h4>
<p style="text-align:justify;"><strong>जवाब:</strong> यह आरोप उन लोगों ने लगाया है, जो मेरा चरित्र हनन करना चाहते हैं. वस्तुतः यह कुछ भ्रष्ट कांग्रेसियों, दूसरे दलों के ओछे नेताओं और नौकरशाहों की साजिश का परिणाम है. छोटानागपुर में जयपाल सिंह के बाद सबसे सशक्त आन्दोलन मेरे नेतृत्व में चला और चल रहा है. इस आन्दोलन से जिस स्वार्थी तबके को खतरा है, वह मुझे बदनाम करने पर तुला है और यह उसी द्वारा किया गया कुप्रचार है.</p>
<h4><strong>सवाल: झामुमो और आजसू के बीच क्या संबंध हैं?</strong></h4>
<p style="text-align:justify;"><strong>जवाब: </strong>आजसू का गठन हम लोगों ने ही किया था. हमारा उद्देश्य था कि विद्यार्थियों का राजनीतिक प्रशिक्षण हो, ताकि भविष्य में ये लोग सक्षम नेतृत्व दे सकें. महिला, मजदूर, बुद्धिजीवी आदि हर वर्ग में हमने अपना संगठन बनाया है.</p>
<h4><strong>सवाल: क्या आजसू आपकी कल्पनानुसार चल रहा है?</strong></h4>
<p style="text-align:justify;"><strong>जवाब:</strong> इसके अंदर बाद में कुछ अवांछित तत्त्व घुस आये, ऐसे लोगों का क्रियाकलाप संदिग्ध था. ये लोग हमारे संगठन, केंद्रीय समिति से बगैर परामर्श किये काम करने लगे थे.</p>
<h4><strong>सवाल: झारखंड की लड़ाई आप कैसे लड़ना चाहते हैं? 'दिकू' आप किसे मानते हैं?</strong></h4>
<p style="text-align:justify;"><strong>जवाब:</strong> झारखंड की लड़ाई संविधान के तहत, प्रजातांत्रिक तरीके से ही हम लड़ना चाहते हैं. हम चाहते हैं कि हमारे लिए अलग राज्य बने, जहाँ हमारी बात पर गौर हो, समस्याएँ सुनी जायें. पिछले वर्ष के अनुभवों को देखते हुए हमारी आशा खत्म हो गयी है. अब बिना अलग राज्य का गठन हुए हमारा शोषण खत्म नहीं हो सकता. प्रजातांत्रिक संस्थाओं में जब लोगों की आस्था खत्म होती है, तो हिंसा पनपती है. झारखंड इलाके से केंद्र और राज्य सरकार को सर्वाधिक आय होती है. हमारी संपत्ति को लेकर उलटे हमारे ऊपर ही तरह-तरह के आरोप लग रहे हैं. झारखंड की माँग के कारण हमारे ऊपर हमले हो रहे हैं.</p>
<p>हमारी माँग '50 के दशक में आरम्भ हुई. इसके बाद भाषा, संस्कृति और जातीयता के नाम पर अनेक नये राज्यों का गठन हुआ है. मसलन पंजाब, हरियाणा, गोवा, मिजोरम आदि. लेकिन हमारी माँग पूरी नहीं हुई. उलटे हमारे जंगल और भाई-बंधु शोषण के केंद्र बन गये. लकड़ी ढोने के लिए जंगलों तक सड़क बनी, लकड़ी ढोने और जंगल को तहस-नहस करने के बाद सड़क खत्म हो गयी. अब सरकार को ऐसी सड़कों से कोई लेना-देना नहीं है. जंगल का फॉरेस्ट गार्ड कहता है कि जंगल हमारा है. आदिवासी कहते हैं, इस पर हमारा हजारों वर्षों से आधिपत्य है. पुलिस, ठेकेदारों और जंगल अधिकारियों से मिली हुई है. इसलिए संघर्ष स्वाभाविक है.</p>
<p>'दिकू' हम उसे कहते हैं जिसके अंदर दिक्-दिक् (तंग करने) करने की प्रवृत्ति हो. दिक् करनेवाला हमारा आदमी भी हो सकता है. दिकू-गैर आदिवासी नहीं है. हजारों गैर आदिवासियों का झारखंड के प्रति समर्पण है. जब शोषकों के खिलाफ हमला होता है, तो कुछ लोग कुप्रचार करते हैं कि दिकुओं को भगाया जा रहा है, ताकि आन्दोलन के चरित्र उद्देश्य के बारे में लोगों का ध्यान मोड़ा जा सके.</p>
<h4><strong>सवाल : आजसू के छात्रों ने आदिवासी विधायकों-सांसदों से त्यागपत्र देने की माँग की है? आप लोग क्या कर रहे हैं? क्या आपकी लड़ाई हिंसक भी हो सकती है?</strong></h4>
<p><strong>जवाब:</strong> हमने पार्टी में पुनर्विचार किया था कि आखिर विधायक या सांसद बन जाने से क्या फायदे होते हैं? मेरे मन में यह बात आती थी कि जब कोई कारगर काम नहीं हो रहा है, तो हमें त्यागपत्र देना चाहिए. अफसर भ्रष्ट हैं. कोई बात सुनने को तैयार नहीं. लेकिन ऐसी बातों का निर्णय पार्टी की केंद्रीय समिति ही करेगी. आजसू के लोगों ने इस संबंध में अपने ढंग से अपना सिक्का जमाने के लिए यह 'काल' दिया है. कुछ ऐसे विधायक हैं, जो आजसू के द्वारा इस माँग को बढ़ावा दे रहे हैं, लेकिन वे खुद त्यागपत्र नहीं दे रहे हैं. आजसू के पीछे सही लोग नहीं हैं.</p>
<p>सांस्कृतिक रूप से, पैदा होते ही हम तीर-धनुष उठा लेते हैं. तीर-धनुष के बल जंगलों की सफाई कर हमने जमीन हासिल की. जंगली जानवरों ने तब हम पर हमला किया. आज जंगल पर दूसरे लोग काबिज हो गये हैं. ठेकेदार और सरकारी अफसर हम पर जो अमानुषिक अत्याचार करते हैं, उसका विरोध हम तीर-धनुष से करते हैं. बम, पिस्तौल या सेना हमारे पास नहीं है. हम झारखंड में हिंसात्मक माहौल नहीं बनने देना चाहते, लेकिन इस बात को सरकार नहीं समझ पा रही है.<br />विभिन्न परियोजनाओं के ठेकेदार, स्वर्णरखा के ठेकेदार और टाटा के ठेकेदार ये सभी हमें लूट रहे हैं. विभिन्न परियोजनाओं में या पूँजीपति के यहाँ ईंट-पत्थर आदि ढोने का काम हम करते हैं, लेकिन पैसा ठेकेदार लूटते हैं. ये ठेकेदार गुंडे पालते हैं. हमारी महिलाओं के साथ छेड़खानी करते हैं. न्यूनतम मजदूरी नहीं देते. न्यूनतम मजदूरी माँगने के सवाल पर हमारे दो कार्यकर्ता राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम में 2 वर्षों से बंद हैं. रामाश्रय सिंह (बिहार सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री) पिछले 7 साल से सिंहभूम में 20 सूत्री कार्यक्रम के प्रभारी बने हुए थे. उन्होंने अपने अफसरों को महत्त्वपूर्ण जगहों पर तैनात करा रखा था. ठेकेदार उनके अपने थे. झारखंड में लोग ऐसी स्थिति से उबल रहे हैं, ऊपर से पुलिस भी हमें परेशान करती है. राँची, जमशेदपुर और हजारीबाग में पिछले 10-10 सालों से एक ही थाने में एक ही थानेदार जमे हुए हैं. वस्तुतः ऐसे थानेदार आतंक और शोषण के केंद्र हैं. जबरन धमाका कर पैसे वसूलते हैं. आदिवासियों को प्रताड़ित करते हैं और आश्चर्य तो यह है कि ये पुलिस सुपरिंटेंडेंट से भी ज्यादा ताकतवर-पहुँच वाले हैं. पटना में पदासीन इनके आका इन्हें खुलेआम मदद करते हैं. छोटानागपुर से पचास लाख लोग बाहर गये हैं, रोजी-रोटी की तलाश में. सोचिए, बाहर के लोग यहाँ आ कर शोषण करें और हम रोजी-रोटी की तलाश में दर-दर भटकें और आबरू बेचें. वस्तुतः थाना, कोर्ट और बाजार में हर तरफ हमारा शोषण हो रहा है.</p>
<p><strong>हरिवंश नारायण सिंह, एक भारतीय पत्रकार और राजनेता हैं. वर्तमान में वह राज्यसभा के उप सभापति हैं.</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(206,212,217);">यह पोस्ट हरिवंश नारायण सिंह के फेसबुक वॉल से साभार ली गई है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>साक्षात्कार</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 Aug 2025 20:59:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sujit Sinha]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>पशुओं की हिंसा के डाटा की जगह जब पशुओं के खिलाफ होने वाली हिंसा का डाटा देने से खत्म होगी दूरियां: चारू खरे</title>
                                    <description><![CDATA[वह परिस्थितियां जब किसी इंसान या बेजुबान के लिए मुश्किल समय हो सकता है तो उन्हें एक साथ प्रदान करने के उद्देश्य और सोच के साथ ही इस सफर की शुरूआत हुई। द हेल्पिंग हैंड्स नाम रखने का भी ख्याल वहीं से आया था ताकि उन्हें मदद भी मिले।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/interview/when-data-on-violence-against-animals-is-given-instead-of/article-11285"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2024-09/107714283_2719265858309470_7646547322152846763_n-(1).jpg" alt=""></a><br /><p>राम की नगरी अयोध्या में जन्मी और देश के सबसे बड़े प्रदेश की राजधानी लखनऊ को अपनी कर्मभूमि बनाने वाली चारू खरे लखनऊ की उन चंद सबसे खूबसूरत शख्सियतों में से एक है जो बदलते दौर में सिर्फ इसलिए बेजुबानों की आवाज बन जाती हैं क्योंकि उन्होंने अपने पिता को सिर्फ इसलिए खो दिया क्योंकि जिस समय उन्हें अपनी जान बचाने के लिए सबसे ज्यादा लोगों के सहारे की जरूरत थी तो कोई उन्हें बचाने यानी अपना हेल्पिंग हैंड्स देने के लिए आगे नहीं आया। टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स जैसे देश की जानी-मानी प्रतिष्ठित मीडिया संस्थाऩों की नौकरी छोड़कर नए सफर की शुरूआत कर बीते 4 सालों में अपनी बहनों के साथ बचपन में अपने माता-पिता से मिले बेहद खूबसूरत संस्कारों के कारण आसरा: द हेल्पिंग हैंड्स अब किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। समृद्ध झारखंड के लिए चारू खरे से बात की निवेदिता झा ने, इस बातचीत के संपादित अंश: </p>
<h3><strong>समृद्ध झारखंड: आसरा द हेल्पिंग हैंड्स की शुरूआत कैसे हुई ?</strong></h3>
<p><strong>चारू खरे:</strong> मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम की नगरी अयोध्या में जन्में होने के कारण वह मेरी मातृभूमि है तो उत्तर प्रदेश की राजधानी और देश की सियासत का बड़ा केंद्र लखनऊ मेरी कर्मभूमि है। मीडिया की पढ़ाई करने और उसका बैकग्राउंड होने के कारण टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में नौकरी करने का मौका लेकिन साल 2020 में अपने जीवन में हुई सबसे बड़ी घटना में जमीन विवाद को लेकर अपने पिता की पहले पीट-पीटकर हत्या और फिर बॉडी को जला देने की घटना के कारण मीडिया का साथ पीछे छूट गया। अगले छह महीनों तक अपने पिता के लिए न्याय की लड़ाई लड़ते लड़ते ही ख्याल आया कि कैसे जब पापा को जब सबसे ज्यादा हेल्पिंग हैंड्स की जरूरत थी तो एक भी लोग उनकी मदद को सामने नहीं आए। ऐसे में वह परिस्थितियां जब किसी इंसान या बेजुबान के लिए मुश्किल समय हो सकता है तो उन्हें एक साथ प्रदान करने के उद्देश्य और सोच के साथ ही इस सफर की शुरूआत हुई। <a href="https://aasrathehelpinghands.com/">द हेल्पिंग हैंड्स</a> नाम रखने का भी ख्याल वहीं से आया था ताकि उन्हें मदद भी मिले।   </p>
<p> </p>
<h3><strong>समृद्ध झारखंड: एनजीओ शुरू करने की प्रेरणा कहां से मिली ?</strong></h3>
<p><strong>चारू खरे:</strong> इसकी सबसे बड़ी प्रेरणा मेरे पापा और मम्मी ही रहे हैं क्योंकि बचपन से ही अपने घर के माहौल को मैनें एनीमल फ्रेंडली वाला देखा है साथ ही पापा भी हमेशा से एनीमल लवर रहे थे। अपने कामकाज के अलावा उनका ज्यादातर समय इन बेजुबानों की मदद व उनकी देखभाल करने में बीतता था। सामाजिक कार्यों में पापा काफी बढ़चढ़ कर भाग लेते थे। उनकी एक बड़ी इच्छा भी थी कि वह इनके लिए एक बड़ा शेल्टर होम बनवाएं हालांकि जीते-जी उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो पाई लेकिन अब आसरा: द हेल्पिंग हैंड्य के माध्यम से इस अधूरी ख्वाहिश को पूरी करने की कोशिश अब हम सभी कर रहे हैं। बचपन की एक घटना भी आज तक मेरे जेहन में मौजूद है कि कैसे एक गाय रोज हमारे घर आती थी और घरवाले उन्हें रोज कुछ न कुछ देते थे लेकिन एक दिन यह हुआ कि किसी ने उस गाय पर एसिड फेंक दिया। इसे देखकर पापा और मम्मी बहुत दुखी हुए थे और उन्होंने उस गाय की काफी मदद की थी। कई छोटी-छोटी घटनाएं, बातें ही हमें इन बेजुबानों के लिए काम करने को प्रेरित करती रही हैं और आज जिस मुकाम पर यह हो रहा है, उसे देखकर काफी खुशी मिलती है।  </p>
<h3><strong>समृद्ध झारखंड: इन बेजुबान जरूरतमंदों तक पहुंचनें की प्रक्रिया कैसे होती है ?</strong></h3>
<p><strong>चारू खरे:</strong> मुख्य रूप से आसरा द हेल्पिंग हैंड्स संस्था अपने हेल्पलाइन के जरिए पूरे एक चेन के साथ अपने काम को अंजाम देता है। सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म के जरिए हेल्पलाइन नंबर को लोगों तक पहुंचाने के जरिए ही ऐसे बेजुबानों की तलाश होती है, जिन्हें मदद की जरूरत है। इसके अलावा बड़ी-बड़ी संस्थाएं जैसे पेटा इंडिया या पीपल फॉर एनीमल ट्रस्ट जैसे भी हैं, जो अपने कामों के लिए छोटे-छोटे एनजीओ की मदद लेते हैं। इसी तरह एनीमल लवर मेनका गांधी जैसे लोग भी हैं जो अपने कामों में छोटी-छोटी संस्थाओं की मदद लेते हैं और हम अपने कामों को अंजाम तक पहुंचाते हैं। हमारी संस्था या टीम फिलहाल अयोध्या, कानपुर और लखनऊ में काम कर रही है। लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि ऑउट ऑफ द रीच जाकर काम करना हमारी मजबूरी होती है और हम ऐसा करते हैं। जैसा अभी हाल ही में सहारपुर में हुआ है, 700 किलोमीटर दूर जाकर हमारी टीम ने पहले जरूरतमंद पशु को रेस्क्यू किया और उसे लेकर लखनऊ आए, यहां अपने पशु चिकित्सकों के माध्यम से उसका उपचार कर उसे वापस सहारनपुर छोड़कर आए क्योंकि किसी भी पशु को उसके मूल स्थान से अलग करना कानूनन जुर्म है। इस प्रकार हमारा एक काम ऐसे जरूरतमंद बेजुबानों का रेस्क्यू करना और उसे उपचार उपलब्ध कराना है। </p>
<p>दूसरा मुख्य काम जो हमारी संस्था करती है, वह है स्ट्रीट डोमेस्टिक एनीमल को घर दिलाना यानी उऩका एडॉप्शन कराना। इसके लिए एडॉप्शन कैंप का आयोजन किया जाता है। लखऩऊ में अब तक ऐसे 5-6 कैंपों का आयोजन हो चुका है। इन कैंपों का आयोजन मुख्य रूप से मेले में होता है क्योंकि वहां बड़ी संख्या में अलग-अलग प्रकार के लोग आते हैं और उन्हें अपनी जरूरत के अनुसार अलग-अलग प्रकार के PET एनीमल अपने लिए मिल जाते हैं। एडॉप्शन के लिए भी पूरी निर्धारित प्रकिया अपनाई जाती है, इसके अंतर्गत सभी एडॉप्टर से एक फॉर्म को भरवाया जाता है जिसमें निर्धारित सभी मानकों के पालन करने की सहमति ली जाती है ताकि एडॉप्शन के बाद कोई भी अपनी मर्जी से फिर ऐसे बेजुबानों को बेसहारा न छोड़ दे। </p>
<p>तीसरा मुख्य काम जो वर्तमान समय में महत्वपूर्ण हो चला है वह असहाय या निराश्रित बेजुबानों के बीच आए दिन होने वाले आपसी संघर्ष के मामलों को लेकर है या फिर उनकी ओर से लोगों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं भी सामने आती है और इसमें कई बार लोगों की मौत होने या उनके चोटिल होने के मामले आते हैं। तो वहीं कई बार बेजुबानों की मौत होने की खबरें भी आती रहती है, तो इसे रोकने या कम करने के लिए हमारी टीम स्कूल-कॉलेजों में अवेयरनेस कैंपेन चलाती है जिसमें बच्चों या लोगों को यह बताया जाता है कि कैसे वह इन स्ट्रीट एनीमल से अपनी सुरक्षा कर सकते हैं या उनसे फ्रेंडली हो सकते हैं। इसके अलावा पशुओं के साथ होने वाली हिंसा रोकने की दिशा में भी हम काम करते हैं जिसमें ऐसा करने वालों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करवाना और उन्हें कानून के तहत सजा दिलावाना मुख्य है। हालांकि इस दौरान कई बार जरूरत पड़ने पर लोगों की काउंसलिंग भी की जाती है कि उन्हें इन बेजुबानों के साथ अपना व्यवहार कैसा रखना है। अब तक संस्था ने 60-70 मामलों में प्राथमिकी दर्ज करवाया है या फिर काउंसलिंग करवाया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि लोग अब धीरे-धीरे जागरूक हो रहे हैं। जिसका परिणाम है कि इस तरह का काम करने वाले एनजीओ की संख्या भी बढ़ी है। </p>
<h3><strong>समृद्ध झारखंड: बेजुबानों के खिलाफ हुई हिंसा के मामलों को दर्ज करने में पुलिस की भूमिका कितनी संतोषजनक होती है या फिर हिंसा करने वालों के खिलाफ पुलिस क्या एक्शन लेती है ?</strong></h3>
<p><strong>चारू खरे:</strong> पुलिस का सहयोग अक्सर हमें मिलता है और उनकी ओर से होने वाली कार्रवाई कई बार संतोषजनक भी होती है तो कई बार सहयोगात्मक नहीं भी होता है क्योंकि कई बार पुलिस यह भी सोचती है कि हम क्या कर रहे हैं, कुत्ते-बिल्ली बचा रहे हैं और इससे क्या ही होगा। कई बार पुलिस के बेतुके सवालों से भी हमें दो-चार होना पड़ता है कि मामले सिर्फ हमसे ही जुड़े नहीं हो सकते हैं बल्कि वह कम्युनिटी एनीमल से भी जुड़े होते हैं या हो सकते हैं और ऐसे मामलों में भी बेजुबानों के साथ किसी भी प्रकार की हिंसा, दुर्व्यवहार या उन्हें उनके मूल स्थान से हटाकर कहीं और भेज देना भी एक तरह से कानूनन जुर्म है और ऐसा नहीं करना है क्योंकि कई बार इन प्रावधानों या कानूनों से पुलिस पदाधिकारी भी जागरूक नहीं होते हैं कि हिंसा केवल घरेलू पशुओं से ही नहीं बल्कि सामुदायिक पशुओं से भी क्रूरता कानूनन जुर्म है। ऐसे मामलों में कई बार हमें पूरे प्रमाणों व कानूनी प्रावधानों के सबूतों के साथ पुलिस के सामने जाना पड़ता है और अपनी बात रखनी पड़ती है जिसके बाद पुलिस वाले बातों को मानने के लिए बाध्य होते हैं। </p>
<h3><strong>समृद्ध झारखंड: इन बेजुबानों की मदद जैसे नेक काम करने के दौरान सोसायटी, परिवार या दोस्तों की कैसी प्रतिक्रिया देखने को मिलती है, समर्थन कैसा होता है?</strong></h3>
<p><strong>चारू खरे:</strong> इस तरह के कामों में निश्चित रूप से एक जैसी प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिलती है बल्कि अलग-अलग तरीके से लोग इसको रिस्पांड करते हैं। लेकिन सबसे बड़ा रोल परिवार का होता है कि परिवार का सपोर्ट कैसा मिलता है, ऐसे कामों में तो हमारे लिए अब तक का सफर काफी शानदार रहा है क्योंकि पहले दिन से ही परिवार के लोगों ने हमारा खूब सपोर्ट किया है। बचपन से जो चीजें हमारे परिवार से जुड़ी हुई हैं उसे हम आगे लेकर बढ़ रहे हैं, इसका हमें पूरा संतोष है और हम खुश भी हैं कि पापा के नहीं होने के बावजूद भी उऩका काम आजतक नहीं रूका है। ऐसे कामों में यह बहुत जरूरी होता है कि हम यह अंतर कर सकें कि कौन सा काम हम सही कर रहे हैं और क्या सही नहीं कर रहे हैं क्योंकि जो काम हम सही करते हैं तो उससे हमें आत्मिक संतुष्टि मिलती है, दिल को सुकून मिलता है, नींद अच्छी आती है। तो ऐसी परिस्थितियों में अपने विल पॉवर को बनाकर रखने की चुनौती सबसे महत्वपूर्ण होती है। यह देखना जरूरी नहीं होता है कि कौन आपके खिलाफ और क्यों खड़ा है। </p>
<p> </p>
<p>लेकिन यह जरूर है कि कई बार लोगों को कई प्रकार की परेशानियां होती हैं खासकर उस दौरान जब स्ट्रीट एनीमल को खिलाने का काम लोग या एनीमल लवर करते हैं तो कुछ लोग ऐसा करने से उन्हें रोकते हैं। कई बार लोग बेवजह इन बेजुबानों को मारने का भी काम करते हैं जबकि वह उन्हें किसी भी प्रकार की कोई परेशानी नहीं खड़ा करता है, तो इन परिस्थितियों में काम करना और वैसे लोगों को समझाने की बड़ी चुनौती होती है कि वह इन पशुओं के खिलाफ किसी प्रकार की कोई हिंसा नहीं करें क्योंकि इस तरह के लगातार व्यवहार से वह जानवर थोड़े समय में हिंसक हो जाता है और नुकसान पहुंचाने लगता है। तो यह जरूरी है कि पशुओं के साथ होने वाली हिंसा को रोकने व वैसा करने वालों को सबक सिखाने के लिए एक मजबूत पशु संरक्षण कानूनो की जरूरत है क्योंकि जब तक मजबूत कानून नहीं होगा, उसका अनुपालन सही ढंग से नहीं होगा तब तक ऐसी घटनाओं को रोकने या उन्हें करने वालों की मानसिकता कम नहीं होगी। हम सभी के लिए जरूरी है कि हम अपने एनीमल के लिए एक फ्रेंडली माहौल बनाएं क्योंकि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने एक आदेश में कहा है कि स्ट्रीट एनीमल को एक प्वाइंट पर खाना देना कोई जुर्म नहीं है बल्कि ऐसा करने वालों को रोकना जुर्म है, उन्हें परेशान करना जुर्म है। कई बार हमें काम करने के दौरान लोगों की धमकियां भी मिली है और लोग भीड़ के रूप में काम नहीं करने भी देते हैं खासकर जब रेस्क्यू जैसे कामों को करना होता है। ऐसी परिस्थितियों में लोगों की बातों को मानने के अलावा हमारे पास कोई रास्ता नहीं होता है क्योंकि लोग टीम की गाड़ियों को घेर लेते हैं। लेकिन फिर भी यही कहना सही है कि लोग क्या कहते हैं आपके कामों को लेकर, यह जरूरी नहीं है बल्कि आप अपने कामों को किस तरह से करते हैं, यह महत्वपूर्ण है। मीडिया या जर्नलिज्म छोड़ने को लेकर लोगों ने कई बार कहा तो हमेशा से मेरा मानना रहा है कि जर्नलिज्म मैंने नहीं छोड़ा है क्योंकि यह एक क्रांति है और यह क्रांति अब अलग तरीके से लोगों के जीवन में व उनकी सोच में लाने का कर रहे हैं। इसमें मुझे मेरी बहन पूर्ना खरे और दोस्त राहुल का भी साथ मिल रहा है। </p>
<h3><strong>समृद्ध झारखंड: इन बेजुबान जरूरतमंदों की मदद करने में आर्थिक मदद कैसे और किससे मिल रही है ?</strong></h3>
<p><strong>चारू खरे:</strong> हमें फिलहाल सरकार से कोई मदद नहीं मिलती है क्योंकि इसके लिए सरकारी काम को लेना पड़ता है। ऐसे में फिलहाल अपने कामों के लिए सोशल मीडिया के माध्यम से हम लोग क्राउड फंडिंग करते हैं हालांकि इससे भी हमारी जरूरत पूरी नहीं हो पाती है। तो ऐसी परिस्थिति में हम अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए फ्रीलॉसिंग का काम करते हैं, जिसका एक हिस्सा हम इन कामों के लिए जमा करने का काम करते हैं। फिलहाल हमारे पास बिल्लियां, डॉग्स और मंकी हैं जिसकी देखभाल कर रहे हैं।     </p>
<h3><strong>समृद्ध झारखंड: आने वाले समय के लिए आपकी और आपके टीम की क्या प्लानिंग है ?</strong></h3>
<p><strong>चारू खरे: </strong>फिलहाल यह काम हमारी टीम एक किराए के जगह को लेकर कर रही है और सीमित जगह होने के कारण सभी प्रकार के बेजुबानों की मदद हम नहीं कर पा रहे हैं खासकर बड़े जानवरों के मामले में परेशानियां आ रही है तो आने वाले समय में बड़ा शेल्टर बनाना मुख्य प्लानिंग है। इसके अलावा बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में काम करना भी हमारा एक और मकसद है ताकि सही समय पर सही ढंग की शिक्षा हम बच्चों को दे सकें और इसके जरिए उन्हें बेजुबानों के प्रति हिंसा की भावना को दूर करने में मदद कर पाएं तो निश्चित रूप से आने वाले समय में इस तरह की घटनाओं में भी काफी कमी आएगी क्योंकि हमें आसानी से यह जानकारी तो मिल जाती है कि कितने लोगों को कुत्ते ने काटा लेकिन कितने लोगों के खिलाफ पशु हिंसा के मामले हैं, इसका कोई डाटा नहीं मिलता है तो इस गैप को दूर कर सकें और हम सभी एनीमल्स के लिए एक बेहतर और फ्रेंडली माहौल बना सकें, यह मुख्य काम है।  </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>साक्षात्कार</category>
                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                            <category>उत्तर-प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 14 Sep 2024 19:45:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nivedita Jha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राधास्वामी संगठन से जुड़े हैं 10 लाख लोग, चुनाव में साथ मिलने का पूरा भरोसा: अनीशा सिन्हा</title>
                                    <description><![CDATA[जागरूक जनता पार्टी की ओर से अपनी उम्मीदवारी की बात कहने वाली अनीशा इस बात को लेकर आश्वास्त हैं कि बीते 15 सालों में गिरिडीह की जनता ने उन्हें जो प्यार, सम्मान और अपनापन के जरिए जो समर्थन दिखाया है, वह आने वाले विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिलेगा और चुनाव में जीत दर्ज कर अपने क्षेत्र की समस्याओं को दूर करने की सार्थक पहल करेंगी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/interview/10-lakh-people-are-associated-with-radhaswami-organization-full-confidence/article-11211"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2024-09/fotojet-(20)-(1).jpg" alt=""></a><br /><p><strong>गिरिडीह: </strong>बीते 15 सालों से <a href="https://radhaswami.in/">राधास्वामी संगठन</a> से जुड़ी अनीशा सिन्हा इस बार विधानसभा चुनावी रण में दिखने वाली हैं। गिरिडीह जिले के 10 लाख लोगों तक अपने सामाजिक कार्यों से पहुंच बनाने वाले राधास्वामी संगठन के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने वाली अनीशा सिन्हा इस बार गिरिडीह विधानसभा सीट से उम्मीदवार होंगी। जागरूक जनता पार्टी की ओर से अपनी उम्मीदवारी की बात कहने वाली अनीशा इस बात को लेकर आश्वास्त हैं कि बीते 15 सालों में गिरिडीह की जनता ने उन्हें जो प्यार, सम्मान और अपनापन के जरिए जो समर्थन दिखाया है, वह आने वाले विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिलेगा और चुनाव में जीत दर्ज कर अपने क्षेत्र की समस्याओं को दूर करने की सार्थक पहल करेंगी। समृद्ध झारखंड ने अनीशा सिन्हा से बातचीत की। इस बातचीत के संपादित अंश: </p>
<h3><strong>समृद्ध झारखंड: सामाजिक कार्यों से शुरू हुआ सफर राजनीति में उतरने तक कैसे पहुंचा? </strong></h3>
<p><strong>अनीशा सिन्हा: </strong>गिरिडीह में बीते 15 सालों से राधास्वामी संगठन के साथ जुड़कर सामाजिक कार्यों को कर रही हूं। राधास्वामी संगठन का जिला प्रभारी होने के नाते इस बार जागरूक जनता पार्टी ने चुनाव की जिम्मेदारी भी सौंपी है और राजनीति में आना कभी भी लक्ष्य या मानसिकता नहीं रही है, राजनीति में कदम रखने का काम केवल इसलिए है ताकि बीते 15 सालों में संगठन के जरिए जो सामाजिक कार्य हुए हैं, लोगों के जीवन में बदलाव लाने का प्रयास हुआ है उसे ज्यादा से ज्यादा गहराई प्रदान की जा सके। लोगों की मदद से यदि विधायक बनने का मौका मिला तो निश्चित रूप से यह एक बड़ा अवसर होगा कि जब संगठन के जरिए जनता का ज्यादा से ज्यादा विकास हो सकता है तो हम जनता से जुड़े कार्यों व समस्याओं को एक पद पर बैठकर समाधान करने के लिए और ज्यादा अवसर मिलेंगे ताकि समाज के वैसे तबके जिसके पास शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास आदि का अभाव है तो उनके लिए ज्यादा काम कर सकें।     </p>
<h3><strong>समृद्ध झारखंड: बीते 15 सालों में जिन समस्याओं या कामों को लेकर लोगों के बीच रहे, क्या उसे सुलझाने की दिशा में कभी कोई विधायक-सांसद ने पहल नहीं की ?</strong></h3>
<p><strong>अनीशा सिन्हा: </strong>विधायक-सांसदों के कामों को लेकर कोई टिप्पणी करना सही नहीं होगा क्योंकि हमेशा से हमारा जोर अपने व संगठन के कार्यों पर रहा है ताकि लोगों को ज्यादा से ज्यादा लोगों की भलाई कर सकें। राधास्वामी संगठन केवल झारखंड में ही काम नहीं कर रहा बल्कि देश के 18 राज्यों में काम कर रहा है और लाखों लोग इससे जुड़े हैं। केवल गिरिडीह में ही 10 से 15 बेटियों की शादी में संगठन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बेटियों की शादी के माता-पिता के उस बड़े सपने को साकार करने और बेटियों को विदा करने में हमने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके अलावा जरूरतमंद लोगों को आवास उपलब्ध कराने में भी राधास्वामी संगठन ने काफी बढ़िया काम किया है। कई लोगों को घर दिलाया गया और नए आवास बनाने को लेकर भी तैयारियां की जा रही है। जबकि सरकार की आवास योजनाओं का क्या हाल है, यह किसी से छुपा हुआ नहीं है। भ्रष्टाचार और लालफीताशाही के चक्कर में योजनाएं कागजों पर ही रह जा रही है। राधास्वामी संगठन गिरिडीह में आम लोगों के लिए 15 अलग-अलग प्रकार की योजनाओं पर काम करता है। जिसमें मुख्य रूप से शिक्षा पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है, विशेषकर लड़कियों की शिक्षा पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। इसके अलावा माइक्रो ऋण के जरिए भी लोगों को आत्मनिर्भर होने में संस्थान मदद करती है। </p>
<h3><strong>समृद्ध झारखंड: </strong><strong>आम लोगों के लिए सरकार की योजनाओं से जुड़कर भी क्या संगठन काम करती है खासकर लोकप्रिय योजनाओं से लोगों को जोड़ने की क्या कोशिश होती है?</strong></h3>
<p><strong>अनीशा सिन्हा:</strong> सरकार की योजनाओं चाहे वह केंद्र की हो या राज्य सरकार की, राधास्वामी संगठन इससे लोगों को जोड़ने में कोई योगदान नहीं देता है बल्कि वह अलग से ही काम करता है। संगठऩ का मुख्य जोर अपने कार्यों के जरिए लोगों को मजबूत करने का है। पूरे देश में राधास्वामी संगठन से एक करोड़ से अधिक लोग जुड़े हैं और इन सभी लोगों से संगठन का आह्वान है कि वह प्रतिदिन एक रूपए और एक मुट्ठी अंशदान कर संगठन को दें जिससे लोगों को मजबूत करने में मदद मिल रही है। </p>
<h3><strong>समृद्ध झारखंड: </strong><strong>चुनाव को लेकर संगठन या आपकी पार्टी किन मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर रही है?</strong></h3>
<p><strong>अनीशा सिन्हा: </strong>विधानसभा चुनाव को हमारी पार्टी पूरी मजबूती के साथ लड़ना चाहती है इसलिए पार्टी और राधास्वामी संगठन ने यह फैसला किया है कि हमलोग केवल आम लोगों से जुड़े जनमुद्दों पर अपना ध्यान केंद्रित करेंगे। इसके लिए प्रमुख रूप से शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य पर जोर होता है। जब तक बेहतर शिक्षा नहीं मिलेगी तब तक रोजगार की सुविधा उपलब्ध नहीं हो सकती है। इसके अलावा सड़क, नाली या जल जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराना सरकार का काम है, इसलिए संगठन ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया है। मुख्य रूप से शिक्षा पर ध्यान देकर लोगों को रोजगार उपलब्ध कराना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने से ही लोगों की आर्थिक स्थिति बेहतर हो सकेगी। इसके लिए सिर्फ गिरिडीह में ही 500 से अधिक निःशुल्क कोचिंग की व्यवस्था बच्चों के लिए की गई है और इसमें संबंधित शिक्षकों को वैक्लपिक रोजगार के तहत मानदेय भी उपलब्ध कराया गया है ताकि बच्चों की पढ़ाई बेहतर होने के साथ-साथ लोगों को कमाई का एक जरिया भी मिल गया है और इससे अपने क्षेत्र के विकास का भी अवसर मिल रहा है।  </p>
<h3><strong>समृद्ध झारखंड:</strong><strong> समाज सेवा के इस विकेंद्रीकृत स्वरूप का आइडिया कहां से आया ?</strong></h3>
<p><strong>अनीशा सिन्हा: </strong>यह आइडिया कहीं आने का नहीं है बल्कि बीते 15 साल से समाज सेवा से जुड़े रहने की प्रेरणा है। गिरिडीह के सभी मुद्दों को दूर करने को लेकर संगठन ने जो प्रयास इन सालों में किया है, उसकी वजह से ही अब राजनीति में आने को लोग प्रेरित कर रहे हैं। संगठन के रूप में काम करके लोगों का जो भरोसा मिला है वह निश्चित रूप से राजनीति के क्षेत्र में भी काम करके और मजबूत बनेगा। इससे स्वास्थ्य, शिक्षा के क्षेत्र में जो काम किया गया है वह महत्वपूर्ण है। </p>
<h3><strong>समृद्ध झारखंड:</strong><strong> मुख्य धारा वाली पार्टियों से अलग चुनावी राजनीति में आने के लिए नए दल को चुनने का फैसला कैसा रहा?</strong></h3>
<p><strong>अनीशा सिन्हा: </strong>जागरूक जनता पार्टी राधास्वामी संगठन की अपनी पार्टी है। राधास्वामी संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष दीपक शर्मा और जागरूक जनता पार्टी के अध्यक्ष मिथिलेश चौबे ने संयुक्त रूप से य़ह फैसला किया कि राधास्वामी संगठन के लोग आगामी चुनाव में पांच सीटों पर लड़ेंगे, जिसमें गिरिडीह जिले में दो सीटों पर प्रत्याशी बनाए गए हैं। गिरिडीह से मैं स्वंय अनीशा सिन्हा और गांडेय से शमीम अख्तर चुनाव लड़ेंगे। इसके अलावा राधास्वामी संगठन के लोग तीन अन्य सीटों भवनाथपुर, गढ़वा और विश्रामपुर से भी चुनाव लड़ेंगे। पार्टी राज्य के सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा करेगी। </p>
<h3><strong>समृद्ध झारखंड:</strong><strong> चुनाव में जीतने की कितनी संभावना है? </strong></h3>
<p><strong>अनीशा सिन्हा:</strong> चुनावी हार-जीत की संभावना का आकलन करना बेहद मुश्किल है। यह दावा कभी भी कोई नहीं कर सकता है कि चुनाव में किसकी जीत होगी और किसकी हार। इसे लेकर अपनी ओर से कोई टिप्पणी करना भी मेरे लिए सही नहीं होगा वैसे अनुमान लगाने की बात अलग है, हालांकि मुझे अपने किए गए काम पर पूरा भरोसा है और यह जनता को तय करना है कि राधास्वामी संगठन के जरिए अगर मैने काम किया है तो चुनाव में वोट देने का निर्णय ले। लेकिन मतदाताओं से यह जरूर अपील है कि वह सभी उम्मीदवारों को काम के आधार पर उऩका आकलन करे और उन्हें वोट दे, वैसे जनता का प्यार मुझे पूरा मिल रहा है क्योंकि जितनी सभाओं में जाना होता है वहां आधे से अधिक लोग पहले से ही राधास्वामी संगठन से जुड़े हैं और हमारे काम से परिचित हैं। तो ऐसे में आधे काम को जनता करने का मन बना चुकी है। वैसे चुनाव है सभी लोग जानते हैं कि चुनाव में क्या होता है और नहीं होता।  </p>
<h3><strong>समृद्ध झारखंड:</strong><strong> मुख्य धारा की पार्टियों की राजनीति को किस नजरिए से देखती हैं? </strong></h3>
<p><strong>अनीशा सिन्हा:</strong> देखिए, मुख्य धारा की पार्टियों के राजनीति को हम गलत नजरिए से नहीं देखते हैं, यह जनता ही तय करेगी कि उन्हें करना क्या है। क्योंकि एक-एक वोट चुनाव में मायने रखता है। आज 78 साल हो गया है लेकिन इस दौरान क्षेत्र का क्या और कितना विकास हुआ, यह जनता ही जानती है, हर पांच साल पर विधायक-सांसद बदलते रहे हैं, लेकिन उन्होंने क्या किया है अपने क्षेत्र के विकास के लिए, यह क्यों नहीं बताते हैं, जनता देख रही है कि उनका और समाज का कितना विकास हुआ है लेकिन बीते 15 सालों में राधास्वामी संगठन के जरिए विकास का जो भी काम हुआ उससे जनता पूरी तरह से संतुष्ट है। आज जनता को यदि कोई जरूरत है तो उसे पूरा करने के लिए वह संगठन के पास आती है तो ऐसे में उन्होंने अपना वोट किसे दिया और उन्होंने जनता के लिए क्या किया, यह जरूर पूछा जाता है। वैसे यह जरूर है कि यदि मुझे पांच सालों के लिए काम करने का मौका मिला तो जरूर वह विकास का एक नया मॉडल होगा कि काम कैसे होता है। </p>
<h5><strong> </strong></h5>
<h3><strong>समृद्ध झारखंड: राजनीति में आपका कोई रोल मॉडल या प्रेरक व्यक्तित्व रहा है? </strong></h3>
<p><strong>अनीशा सिन्हा:</strong> देखिए ऐसा कोई या कुछ नहीं है। हम केवल राधास्वामी संगठन को देखकर आए हैं। मेरे लिए कोई अच्छे या खराब हैं, ऐसी कोई मेरी कोई मंशा या सोच नहीं है। किसी राजनीतिक दल या नेता को देखकर नहीं बल्कि अपनी सोच या काम के लिए आए हैं। राधास्वामी संगठन ही हमारा सबकुछ है, उसके लिए काम करना ही मेरा एकमात्र लक्ष्य है। हम सफलतापूर्वक अपने काम को पूरा किए हैं और आने वाले समय में भी चाहते हैं कि हम अपना काम करते रहें चाहे विधायक बन भी जाएं तो समाजसेवा करते रहे हैं, करते रहेंगे। विधायक के रूप में जो भी दायित्व मिलेगा उसे भी पूरा करेंगे लेकिन मुख्य रूप से समाजसेवा ही मेरा काम है। </p>
<h3><strong>समृद्ध झारखंड: </strong><strong>वर्तमान राजनीति में यह ट्रेंड रहा है कि नए लोगों को जो मुख्य धारा वाली पार्टियों से नहीं है, उन्हें मौका नहीं देती है, यह कितनी बड़ी चुनौती है? </strong></h3>
<p><strong>अनीशा सिन्हा: </strong>मुझे किसी से कोई आपत्ति नहीं है, इसलिए मुझे किसी को कई चुनौती नहीं देना है। मेरा लक्ष्य केवल अपने लोगों का, अपने क्षेत्र का विकास करना है। जो राजनीति करेगा वह अपेन क्षेत्र का विकास नहीं करेगा। मुझे अपने क्षेत्र को बदलना है, क्षेत्र का विकास करना है। वर्तमान समय में राजनीतिक दल एक ब्रांड हो गए है, वह क्या किए हैं या नहीं. इस पर कुछ नहीं कहना है लेकिन मेरा अलग सोच है। जिसे अपने संगठन के माध्यम से पूरा करना है और उसी सोच से राजनीति में आए हैं। जनता की जो भी आकांक्षाएं पूरी हुई है, उसके आधार पर जनता तय करेगी कि उन्हें चुनाव में क्या करना है और किसे सपोर्ट करना है। </p>
<h3><strong>समृद्ध झारखंड: </strong><strong>सरकार की योजनाओं खासकर मंईयां सम्मान योजना समेत अन्य योजनाओं को लेकर क्या कहना है ? </strong></h3>
<p><strong>अनीशा सिन्हा: </strong> यह मंईयां सम्मान योजना पांच साल में क्यों आया है, जब चुनाव आया है तो सरकार इसे लागू कर रही है क्यों, क्योंकि उसे वोट हासिल करना है। वैसे यह मंईयां सम्मान नहीं बल्कि अपमान योजना है। क्योंकि जो काम सरकार आज लेकर आई है वह काम राधास्वामी संगठन 15 सालों से कर रही है। संगठन से जुड़ी बच्चियों के माताओं को पेंशन के रूप में संगठन की ओर से राशि दी जा रही है। यह सभी लोग जानते हैं कि इसके जरिए सरकार क्या हासिल करना चाहती है। रही बात अबुआ आवास योजना, तो इससे संगठन को कोई मतलब नहीं है क्योंकि संगठन अपने तरीके से घर बनाकर लोगों को दे रही है। योजना के तहत सरकार जो दो लाख की राशि दे रही है, उससे घर नहीं बनता है, उतना पैसा तो केवल पाइलिंग में ही खर्च हो जाता है, तो ऐसे में लोग लोन लेकर घर बनाने को मजबूर होते हैं। जबकि राधास्वामी संगठन पैसा नहीं बल्कि घर बनाकर दे रही है और संगठन ने यह गिरिडीह व गांडेय दोनों जगहों पर किया है। आने वाले समय में भी संगठन वैसे सभी लोगों को घर देगी जिनके पास घर नहीं है। </p>
<h3><strong>समृद्ध झारखंड:</strong><strong> चुनावी रणनीति क्या है, क्या किसी घोषणा पत्र के सहारे चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी है ?</strong></h3>
<p><strong>अनीशा सिन्हा: </strong>हम चुनावी घोषणा पत्र के आधार पर चुनाव लड़ने नहीं जा रहे हैं बल्कि गिरिडीह जिले में 10 लाख लोग राधास्वामी संगठन से जुड़े हुए हैं और लोगों को जैसे जैसे चुनाव लड़ने की तैयारी के बारे में पता चल रहा है तो लोग स्वंय सभाओं के लिए बुला रहे हैं, ऐसे में यह चुनाव राधास्वामी संगठन अपने परिवार के सहारे चुनाव लड़ेगा। लोग स्वंय इससे जुड़े रहे हैं। लगातार सोशल मीडिया में भी संगठन के कामों को लेकर प्रचार प्रसार हो रहा है, जनता भरपूर अपना प्यार व समर्थन दे रही है। सोशल मीडिया के जरिए भी चुनाव हो या संगठन का काम, लोगों के बीच आसानी से पहुंच जा रहा है निश्चित रूप से इसके जरिए प्रचार-प्रसार में मदद मिलती है। इसके अलावा स्थानीय मीडिया का भी भरपूर सहयोग मिल रहा है क्योंकि उन्होंने भी संगठन का देखा है और उसके आधार पर ही वह साथ देने को खड़े हो रहे हैं। </p>
<h3><strong>समृद्ध झारखंड: गिरिडीह में माइका उद्योग को लेकर क्या रणनीति है, क्योंकि इससे जिले का एक बड़ा वर्ग जुड़ा हुआ है ? </strong><br /><br /></h3>
<p><strong>अनीशा सिन्हा:</strong> देखिए, इस मुद्दे पर फिलहाल कुछ भी बोलना संभव नहीं है क्योंकि किसी जिम्मेदारी के पद पर नहीं हैं। यह मेरे लिए दूसरी वरीयता वाले मुद्दे हैं, क्योंकि अब तक जो भी काम किया है वह संगठन के जरिए किया है। ऐसे में जीतने के बाद क्या होगा, यह बाद में तय होगा।       </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p><iframe style="border:none;" src="https://www.facebook.com/plugins/post.php?href=https%3A%2F%2Fwww.facebook.com%2Fpermalink.php%3Fstory_fbid%3Dpfbid02E4o5TjKnGtQz4btoz4qya26p8aivnWY7P4w9oUg8DTUKza9w9cVrTAJAq8dmXcPFl%26id%3D100020186842474&amp;show_text=true&amp;width=500" width="500" height="600" frameborder="0" allowfullscreen=""></iframe></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>विधानसभा चुनाव 2024</category>
                                            <category>साक्षात्कार</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>गिरिडीह</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 10 Sep 2024 21:07:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Jharkhand]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>साक्षात्कार: पिछले दो दशक से राइट टू फूड पर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता जेम्स हेरेंज से खास बातचीत</title>
                                    <description><![CDATA[जमीन पर बदलाव तो दिख रहा है, पिछले पांच वर्षों में भूख से मौत की कोई खबर सामने नहीं आयी, इसका सबसे बड़ा कारण सभी जरुरतमंदों के हाथ में राशन कार्ड का होना है. जिस तरीके से हेमंत सरकार में करीबन 52 लाख पीएच, 9 लाख अंत्योदय और 5 लाख ग्रीन राशन कार्ड बनाया गया, उसका असर जमीन पर भी देखने को मिला. कमसे कम इस मोर्चे पर तो सरकार सफल दिख रही है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/interview-exclusive-conversation-with-james-herenz-a-social-activist-who/article-11205"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2024-09/jems-hereng-(1).jpg" alt=""></a><br /><p><strong>देवेन्द्र कुमार</strong>:  वर्ष 2017 में सिमडेगा की संतोषी कुमारी की भूख से मौत पर बड़ा हंगामा बरपा था, आज के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और उस वक्त के झाविमो सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी ने तब दावा किया था कि रघुवर दास की सरकार ने 11 लाख राशन कार्ड रद्द कर गरीबों के मुंह से निवाला छीना है, क्या हेमंत सरकार में जमीनी स्थिति में कोई बदलाव आया है?</p>
<p><strong>जेम्स हेरेंज</strong>: जमीन पर बदलाव तो दिख रहा है, पिछले पांच वर्षों में भूख से मौत की कोई खबर सामने नहीं आयी, इसका सबसे बड़ा कारण सभी जरुरतमंदों के हाथ में राशन कार्ड का होना है. जिस तरीके से हेमंत सरकार में करीबन 52 लाख पीएच, 9 लाख अंत्योदय और 5 लाख ग्रीन राशन कार्ड बनाया गया, उसका असर जमीन पर भी देखने को मिला. कमसे कम इस मोर्चे पर तो सरकार सफल दिख रही है.</p>
<p><strong>देवेन्द्र कुमार</strong>: चंपाई सोरेन के पालाबदल से सियासी गतिविधियां तेज है? इस सियासी उलटफेर पर आदिवासी-मूलवासी समाज में किस तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है.</p>
<p><strong>जेम्स हेरेंज</strong>: चंपाई सोरेन हो या लोबिन हेम्ब्रन इनका पूरा अतीत जल, जंगल और जमीन की सियासत में गुजरा है. बाबूलाल मरांडी की तरह यदि इन लोगों ने भी एक सियासी पार्टी बनाकर जल, जंगल और जमीन के मुद्दे के साथ एक नयी पारी की शुरुआत करते, तो शायद बन जाती, कुछ सीटों पर झामुमो को नुकसान भी संभव था, लेकिन जिस तरीके से वैचारिक रुप से यू टर्न लेते हुए हरा के भगवा टोपी धारण किया गया. आदिवासी-मूलवासी समाज के बीच इसका मैसेज ठीक नहीं गया. आदिवासी-मूलवासी के बीच इनकी छवि खलनायक की बन रही है. इनकी पूरी लड़ाई ही भाजपा की नीतियों के विरुद्ध में रही है, सियासत का यह यू टर्न आदिवासी-मूलवासी समाज स्वीकार करता हुआ दिखलायी नहीं पड़ता. </p>
<p><strong>देवेन्द्र कुमार:</strong> चंपाई सोरेन हो या लोबिन हेम्ब्रम दिशोम गुरु के साथ एक लम्बा रिश्ता रहा, ये सभी दिशोम गुरु के पाठशाला से निकले हुए बेहद अनुशासित और भरोसेमंद शिष्य माने जाते थें. आखिर कौन सी परिस्थितियां निर्मित हुई कि एक-एक कर सभी को साथ छोड़ना पड़ा. क्या हेमंत सोरेन पुराने नेताओं को साथ लेकर चलने में असमर्थ है.</p>
<p><strong>जेम्स हेरेंज:</strong> निश्चित रुप से कुछ कमियां तो रही होगी, यह ठीक है कि पालाबदल करने वालों की अपनी सियासी महत्वाकांक्षा भी होगी, जो शायद झामुमो के अंदर पूरी होती नजर नहीं आ रही होगी, लेकिन जिस तरीके से भाजपा की सवारी की गयी, इन लोगों के इस बगावत के साथ ही चार दशक की अपनी जमा पूंजी को भी दांव पर लगा दिया है. कोई उज्जवल भविष्य तो नजर नहीं आता.</p>
<p><strong>देवेन्द्र कुमार:</strong> आप को पूरे झारखंड के भ्रमण पर रहते हैं, संताल हो या कोल्हान, जनभावनाओं की नब्ज को बेहतर समझते हैं, क्या मधु कोड़ा का भाजपा में शामिल मात्र से झामुमो के हाथ से कोल्हान का किला निकलने वाला है.</p>
<p><strong>जेम्स हेरेंज</strong>: इसके पहले भी संताल से सीता और कोल्हान से गीता को लाकर प्रयोग किया गया था, लेकिन उसका परिणाम क्या निकला? आदिवासी-मूलवासी समाज के लिए किसी भी कीमत पर भाजपा विकल्प नहीं हो सकता, नेताओं के पालाबदल से आदिवासी समाज के नजरिये में कोई बदलाव आता हुआ दिखलाई नहीं पड़ता.</p>
<p><strong>देवेन्द्र कुमार</strong>: एक हेमंत को सात-सात पूर्व और वर्तमान मुख्यमंत्रियों के चक्रव्यूह में फंसाने की कोशिश जारी है. क्या हेमंत का हाल भी महाभारत के अभिमन्यू का होने वाला है. सियासी बलि चढ़ने वाली है.</p>
<p><strong>जेम्स हेरेंज:</strong> महाभारत काल से हम आधुनिक युग का सफर तय कर चुके हैं, अब अभिमन्यू चक्रव्यूह में नहीं फंसता है, अब वह दूसरों को फंसाता है, यदि ऐसा नहीं होता तो फिर सात सात महारथियों की जरुरत क्यों पड़ती, बोरो प्लेयर को मैदान में उतारना क्यों पड़ता. </p>
<p><strong>देवेन्द्र कुमार:</strong> चुनाव तो दूसरे कई राज्यों में भी है, लेकिन भाजपा अपना पूरा जोर झारखंड में ही क्यों  है. क्या इसकी वजह झारखंड की खनीज संपदा है, कॉरपोरेट का दवाब भी है, आदिवासी-मूलवासी की बात करने वाली सरकार के साथ कॉरपोरेट कंपनियां अपने आप को सहज नहीं पाती?</p>
<p><strong>जेम्स हेरेंज</strong>: देश के दो ऐसे राज्य है, जिसे भाजपा किसी भी कीमत पर हाथ से निकलने देना नहीं चाहती. पहला आर्थिक राजधानी महाराष्ट्र और दूसरा देश की 40 फीसदी खनिज संपदा वाला राज्य झारखंड. आज दोनों ही जगह भाजपा की स्थिति बेहद कमजोर है. आपने देखा होगा कि महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार बनाने के लिए कौन-कौन सा खेल नहीं हुआ, कितनी पार्टियां तोड़ी गयी, संवैधानिक प्रावधानों का धज्जियां उड़ाया गया. बावजूद इसके आज महाराष्ट्र में भाजपा कहां खड़ी है? कुछ यही स्थिति झारखंड की है. देश की कुल खनिज संपदा का 40 फीसदी इसकी धरती के नीचे समाहित होना, इस सियासी बेचैनी का मूल वजह है.</p>
<p><strong>देवेन्द्र कुमार</strong>: क्या चंपाई सोरेन के बगावत के साथ ही सरना धर्म कोड, 1932 का खतियान या फिर आदिवासी समाज के दूसरे ज्वलंत मुद्दे नेपथ्य में चले जायेंगे या आगे भी आदिवासी समाज की राजनीति इन्ही मुददों के इर्द-गिर्द घूमेगी. </p>
<p><strong>जेम्स हेरेंज</strong>: जितना मैं घूमा हूं, संताल से लेकर कोल्हान और पलामू से लेकर कोडरमा का खाक छाना है, हेमंत सरकार की वापसी को लेकर कोई संदेह नहीं है, बावजूद इसके यदि हेमंत सरकार सत्ता में नहीं आ पाती है, तो निश्चित रुप से आदिवासी-मूलवासी समाज के लिए एक बड़ा झटका होगा? क्योंकि सिर्फ हेमंत की सत्ता ही नहीं जायेगी, जल, जंगल और जमीन के साथ ही आदिवासी-मूलवासी समाज का, जो दूसरे सामाजिक- सियासी मुद्दे पर हैं, सभी एकबारगी नेपथ्य में डाल दिये जायेंगे, तब ना तो सरना धर्म कोड मिलेगा और ना ही 1932 के खतियान की बात होगी.</p>
<p><strong>देवेन्द्र कुमार:</strong> झाममो छोड़ते वक्त लोबिन हेम्ब्रम ने एक बड़ा आरोप लगाया है कि अब वह झामुमो नहीं रहा, जो गुरुजी के वक्त में हुआ करता था, आदिवासी-मूलवासियों की बात करनी वाली झामुमो में गैर झारखंडिय़ों की चलती है. सारे फैसले गैरझारखंडियों के हाथ में है. क्या वाकई झामुमो के अंदर गैर झारखंडियों का दवाब बढ़ रहा है, और इसके कारण आदिवासी समाज में भी एक नाराजगी है.</p>
<p><strong>जेम्स हेरेंज</strong>: निश्चित रुप से आदिवासी समाज के बीच यह धारणा बनती दिख रही है. इसके कारण एक सामाजिक-सियासी बेचैनी भी है. लेकिन मुश्किल यह है कि विकल्प क्या है? यही कारण है कि हमने कहा था कि यदि अपने आप को भाजपा में तिरोहित करने के बजाय लोबिन और चंपाई सोरेन ने खुद की सियासी पार्टी बनाकर एक आदिवासी-मूलवासी समाज के सामने एक विकल्प पेश करते तोचेहरे को सामाजिक स्वीकृति मिलती.</p>
<p><strong>देवेन्द्र कुमार</strong>: हेमंत सरकार 1932 का खतियान, सरना धर्म कोड, नियोजन नीति, स्थानीय कंपनियों में 75 स्थानीय युवकों को 75 फीसदी आरक्षण का वादा कर सत्ता में आयी थी. आप हेमंत सरकार को इस वादे से कितना दूर और कितना पास पाते हैं. यदि आपके पास 10 अंक हो तो कितना अंक देंगे</p>
<p><strong>जेम्स हेरेंज</strong>: सत्ता के साथ ही हेमंत सरकार को कोरेना महामारी की चुनौतियों से गुजरना पड़ा, पूरे देश से जो भयावह तस्वीर सामने आयी, उस तुलना में झारखंड में कोई कोहराम की स्थिति नहीं बनी, और सबसे बड़ी बात जब पूरे देश में मजदूरों को उनके भाग्य के भरोसे छोड़ दिया गया था, तब यह हेमंत सरकार ही थी, जिसने सारे झारखंडी मजदूरों को हर वापस लाने का काम किया. देश में पहली बार मजदूरों को हवाई जहाज से वापस लाया गया. रही बात प्रशासनिक मिशनरी की, यह सरकार इस मोर्चे पर कुछ कमजोर नजर आती है, और इसका कारण है कि कई अधिकारी भाजपा के माइंड सेटअप के हैं, जो काम ही नहीं करना चाहते, उनकी कोशिश सिर्फ फाइले लटकाने की होती है, इस मामले में रघुवर दास के समय शुरु की गया 181, जनसंवाद की व्यवस्था कहीं बेहतर थी, बावजूद इसके हम इस सरकार को 10 में 8 अंक देंगे.  </p>
<p><strong>देवेन्द्र कुमार</strong>: चुनाव के ठीक पहले मईया सम्मान योजना की शुरुआत, अबुआ आवास योजना पर फोकस, सर्वजन पेंशन, क्या ये सारी योजनाएं महज एक चुनावी झूनझुना है या इसका असर चुनाव में भी देखने को मिलेगा.</p>
<p><strong>जेम्स हेरेंज: </strong>अक्सर राजधानी में बैठकर देखने के बाद यही एहसास होता है, लेकिन कभी गांव-देहात का सफर कीजिये, और इन योजनाओं का प्रभाव देखिये. यदि अधिकारियों ने इस दो महीने में भी इन योजनाओं को इमानदारी के साथ सरजमीन पर उतार दिया तो इसका असर चुनाव में साफ साफ देखने को मिलेगा, खास कर मईया सम्मान योजना को लेकर गांव- देहात, आदिवासी मूलवासी समाज की महिलाओं के बीच बड़ा उम्मीद है.  </p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विधानसभा चुनाव 2024</category>
                                            <category>साक्षात्कार</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>चाईबासा</category>
                                            <category>लोहरदगा</category>
                                            <category>सरायकेला-खरसावाँ</category>
                                            <category>जामताड़ा</category>
                                            <category>खूंटी</category>
                                            <category>पाकुड़</category>
                                            <category>साहिबगंज</category>
                                            <category>लातेहार</category>
                                            <category>सिमडेगा</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 10 Sep 2024 18:29:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Devendra Kumar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>साक्षात्कार: टीबी का इलाज पूरा करना जरूरी, नहीं तो हो सकती हैं ये बीमारी: डॉ नीता झा</title>
                                    <description><![CDATA[<p>टीबी जैसे बीमारियों को लेकर इलाज तो हो रहे हैं और ये इलाज पहले से ज्यादा कारगर भी साबित हो रहा है. मगर आज भी ऐसे बहुत से लोग हैं जो जानकारी के अभाव में बीमारी को पनपने देते हैं जिसका अंजाम उनको और उनके परिवार को भुगतना पड़ता है. कई बार टीबी जैसी बीमारियां जानकारी के अभाव के कारण या फिर दवाइयों का कोर्स पूरा नहीं होने के कारण जानलेवा भी साबित होती है. आज हम टीबी से जुड़े लक्षण और उससे जुड़े जानकारियों के बारे में बताएंगे. इससे जुड़े जानकीरियों के लिए समृद्ध झारखंड संवाददाता <span style="color:#ff6600;"><strong>दीक्षा प्रियदर्शी</strong> </span>ने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/public-health/doctor-neeta-jha-interview-on-tuberculosis-and-its-consequences/article-9152"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2021-09/डॉ-नीता-झा.jpg" alt=""></a><br /><p>टीबी जैसे बीमारियों को लेकर इलाज तो हो रहे हैं और ये इलाज पहले से ज्यादा कारगर भी साबित हो रहा है. मगर आज भी ऐसे बहुत से लोग हैं जो जानकारी के अभाव में बीमारी को पनपने देते हैं जिसका अंजाम उनको और उनके परिवार को भुगतना पड़ता है. कई बार टीबी जैसी बीमारियां जानकारी के अभाव के कारण या फिर दवाइयों का कोर्स पूरा नहीं होने के कारण जानलेवा भी साबित होती है. आज हम टीबी से जुड़े लक्षण और उससे जुड़े जानकारियों के बारे में बताएंगे. इससे जुड़े जानकीरियों के लिए समृद्ध झारखंड संवाददाता <span style="color:#ff6600;"><strong>दीक्षा प्रियदर्शी</strong> </span>ने डॉक्टर नीता झा से इस बीमारी से जुड़ी जटिलताओं के बारे में बातचीत की है. डॉ नीता झा डायरेक्टर, सस्टेनेबल इंटरवेंशन, वर्ल्ड हेल्थ पार्टनर्स और वो पब्लिक हेल्थ स्पेशलिस्ट के तौर पर भी जानी जाती हैं. डॉ नीता 8 साल से टीबी पर रिसर्च कर रही हैं. इसके अलावा वें बिहार में 22 साल से पब्लिक हेल्थ सेक्टर में अपना कंट्रीब्यूशन दे रही हैं.</p>
<p>हम डॉ नीता झा से बात करेंगे और समझेंगे कि टीबी को रोकने और लोगों को जागरूक करने में उन्हें किन तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है.</p>
<p><strong>सवाल: टीबी बीमारी के लक्षण क्या हैं और इसका इलाज कैसे होता है ?</strong></p>
<p><strong><span style="color:#ff6600;">जवाब:</span> </strong>टीबी की बीमारी में जो मुख्य तौर पर लक्षण देखे जाते हैं वो ये है कि अगर दो हफ्ते से ज्यादा खासी, खासी के साथ हल्का बुखार महसूस हो रहा हो या फिर बलगम में खून आ रहा है तो जांच की जरूरत है और जांच कराना चाहिए.</p>
<p><strong>सवाल: आप किस प्रकार टीबी उन्मूलन कार्यक्रम में अपना सहयोग दे रही हैं ?</strong></p>
<p><strong><span style="color:#ff6600;">जवाब:</span> </strong>मैं वर्ल्ड हेल्थ पार्टनर संस्था से जुड़ी हुई हूँ. ये संस्था 2012 से ही टीबी उन्मूलन के लिए काम कर रही है. पहले फंड बाहर (दूसरे देश) से आते थे जिसकी मदद से हम काम करते थे. मगर 2019 से हमलोग ने बिहार सरकार के साथ टाई- अप किया है. 2019 से हम करीब 8 जिलों में बिहार सरकार के साथ मिलकर टीबी उन्मूलन के लिए काम कर रहे हैं. ये टाई- अप प्राइवेट सेक्टर में जो टीबी मरीज हैं उनकी देखभाल कैसे की जाए और उनके नोटिफिकेशन हो सके. 2012 के बाद टीबी को एक नोटिफाइबल डिजीज माना गया है. जब भी किसी को पता चलता है कि उसे टीबी है तो उसे गवर्मेंट में नोटिफाइड कराना पड़ता है.</p>
<p>ताकि निजी क्षेत्र में इलाज करवाने के जाने वाले मरीजों को भी सभी सुविधाएं मिल सके और वो इस दवाइयों का कोर्स पूरा कर सके. ये इसलिए भी जरूरी था क्योकि 70 प्रतिशत मरीज निजी क्षेत्र में ही इलाज के लिए जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि बेहतर इलाज प्राइवेट अस्पताल में ही होता है. जब ज्यादातर मरीज निजी क्षेत्र में इलाज करवा रहे हैं तो हमारे लिए ये जरुरी था कि हम उन्हें कैसें नोटिफाई करें और उन्हें मुफ्त जांच और दवाइयां मुहैया करवा सके. ताकि मरीज 6 महिने का टीबी के इलाज का कोर्स पूरा कर सके और 6 महिने तक समय-समय पर उनका फॉलोअप कर सके. हमारा काम होता है उनको फॉलोअप करता उन्हें समझाना कि आप अपने 6 महिने का दवाइयों का कोर्स पूरा करें तभी इस बीमारी से निजाद मिलेगी और इसलिए ही हमे सरकार ने नियूक्त किया है ताकि हम लोगों को समझा और लोग अपना बचाव कर सके.</p>
<p><strong>सवाल: प्राइवेट सेक्टर का सहयोग कितना महत्वपूर्ण है टीबी उन्मूलन कार्यक्रम के लिए?</strong></p>
<p><strong><span style="color:#ff6600;">जवाब:</span></strong> मैंने जैसा बताया कि ज्यादातर लोग इलाज के लिए प्राइवेट सेक्टर में ही जाते हैं और इसलिए प्राइवेट सेक्टर का योगदान बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है टीबी उन्मूलन के लिए. अगर 70 प्रतिशत मरिज निजी क्षेत्र में इलाज के लिए जा रहे हैं तो अधिकतर टीबी मरीज हमारे हाथ से छूट जाएंगे. इसलिए हमें प्राइवेट सेक्टर से तालमेल बिठा के रखना पड़ता है ताकि मरीजों को हम हर सुविधा मुहैया करा सके और इसलिए हम कह सकते हैं कि इनका योगदान बहुत महत्वपूर्ण होता है.</p>
<p><strong>सवाल: प्राइवेट सेक्टर के साथ मिलकर के काम करना कितना सहज है आपलोगों के लिए?</strong></p>
<p><span style="color:#ff6600;"><strong>जवाब:</strong></span> प्राइवेट सेक्टर से अगर हम समझते हैं कि हम जो काम कर रहे हैं वो एक मॉडल के रूप में कर रहे हैं. हमारे साथ मिलकर कुछ फील्ड वर्कर काम करते हैं जो हमारे साथ इंसेंटिव पर काम करते हैं. जैसे कि प्राइवेट सेक्टर से जुड़े कुछ कंपाउंडर या फिर डॉक्टर के असिस्टेंट जो इस काम में हमारा सहयोग करते हैं. हम गांव के भी जो प्रैक्टिशनर हैं उनको भी हम किसी तरह अपने साथ जोड़े रखते हैं ताकि वह मरीजों को शहर के बड़े डॉक्टर हैं उनके पास रेफर कर सके.</p>
<p>इसके अलावा जितने भी लैब हैं जहां टीबी का टेस्ट होता है उनको भी हमने अपने साथ जोड़ हुआ है ताकि हमें ज्यादा से ज्यादा मरीजों के बारे में पता चल सके और हम उन्हें नोटिफाइड कर सकें. सभी लोग को जोड़ करके हम लोगों ने एक मॉडल तैयार किया है ताकि कोई भी टीबी मरीज नहीं छूटे. गांव के जो प्रैक्टिशनर की बात करें तो वो जो लंबे समय से गांव में इलाज कर रहे हैं उन्हें भी हम इसकी ट्रेनिंग देते हैं ताकि वह लक्षण को समझ सके और मरीज को तुरंत एमबीबीएस डॉक्टर के पास रेफर कर सके.</p>
<p><strong>सवाल: अगर बिहार में प्रैक्टिशनर की बात करें तो छोटे- छोटे गांव में बहुत से ऐसे प्रैक्टिशनर हैं जिनके पास एमबीबीएस की डिग्री नहीं है, लेकिन वह लंबे समय से गांव में इलाज कर रहे हैं उनको ट्रेनिंग के लिए तैयार करना और समझाना आप लोगों के लिए कितना सहज होता है?</strong></p>
<p><strong><span style="color:#ff6600;">जवाब:</span></strong> गांव के जो प्रैक्टिशनर होते हैं ज्यादा समझते हैं इन चीजों को इसका कारण यह है क्योंकि उनके पास बहुत ज्यादा मरीज आते हैं. हमारा काम है हम उनसे संपर्क करते हैं और उनके गांव जाते हैं और उन्हें ट्रेनिंग देते हैं उन्हें समझाते हैं अगर आपको इन लक्षणों वाला मरीज मिलता है तो आप उनको तुरंत किसी एमबीबीएस डॉक्टर की पास रेफर कीजिए. हम एक लिंक बना देते हैं ताकि वह मरीज को किसी एमबीबीएस डॉक्टर के पास भेज सकें.</p>
<p><strong>सवाल: वर्तमान में आप और आपकी टीम टीबी उन्मूलन के लिए जो भी काम कर रही हैं, आप लोगों को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है आपको क्या लगता है कि आप की प्लानिंग के अनुसार कितना काम हो पा रहा है ?</strong></p>
<p> </p>
<p> </p>
<p><strong><span style="color:#ff6600;">जवाब:</span></strong> हम जो काम कर रहे हैं ज्यादातर हमारे अनुसार काम हो रहा है. लेकिन अभी भी हमें बहुत ही चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि हम चाह रहे हैं की प्राइवेट सेक्टर में सभी डॉक्टर जुड़े और सभी नोटिफाइड करें मगर ऐसा हो नहीं पा रहा है क्योंकि बहुत सारे डॉक्टर अभी कहते हैं जो भी बड़े डॉक्टर है वो कहते हैं कि हमारे पास समय नहीं है नोटिफिकेशन जैसे काम के लिए. इसलिए बड़े डॉक्टर अभी भी छूट रहे हैं. दूसरी तरफ जब हम लोगों की काउंसलिंग करते हैं तो वह अभी भी नहीं समझते हैं कि यह बीमारी ठीक हो सकती है और वह दवा नहीं छोड़े. मरीज एक महीने में अगर ठीक हो जा रहा है तो वह दवा छोड़ देता है. इसलिए हम लोगों को उनका फॉलोअप करवाना पड़ता है हम उनको बार- बार समझाते हैं कि अगर आप एक या दो महीने में दवा छोड़ देंगे तो आप का कोर्स पूरा नहीं होगा. इसलिए अगर आपको ठीक लग रहा है तो भी कोर्स पूरा करना है. नहीं तो आपको टीवी की एक नई बीमारी जो कि मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट ट्यूबरकुलोसिस (MDR-TB) है वो हो जाएगी. जिसके बाद ये दवा उन पर काम नहीं करेगी.</p>
<p><strong>सवाल: मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट ट्यूबरकुलोसिस (MDR-TB) किस तरह की बीमारी है और इस बीमारी के होने के बाद ठीक होने में कितना समय लगता है?</strong></p>
<p><strong>जवाब:</strong> मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट ट्यूबरकुलोसिस (MDR-TB)बोला जाता है. नॉर्मली जो टीवी की दवा है वह 6 महीने तक चलती है और बीमारी ठीक हो जाती है. लेकिन कोई मरीज अगर बीच में 1 या 2 महीने के बाद दवा खा कर छोड़ देता है तो उनको इन दवाओं से रेसिस्टेंट डेवलप हो जाता है. जिसके कारण उनके इलाज में दूसरी दवा लगती है जो कि और उस बीमारी का इलाज फिर एक या डेढ़ साल चलता है.</p>
<p> </p>
<p style="text-align:center;"><span style="color:#ff6600;"><strong>संदेश</strong></span></p>
<p style="text-align:center;">
<em>मैं पाठकों को यह संदेश देना चाहती हूँ कि वह लोगों तक ज्यादा से ज्यादा इस बात को फैलाए कि अगर इस तरह के लक्षण वाले कोई भी मरीज आस- पास हैं तो जाए डॉक्टर के पास अपना इलाज कराएं. इसके साथ ही 6 महीने तक दवाइयां खाएं इलाज पूरा करें ना कि बीच में छोड़ दें. इसके अलावा जितना ज्यादा हो सके जागरूक रहें.</em></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साक्षात्कार</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>जन स्वास्थ्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 Sep 2021 20:07:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Jharkhand]]></dc:creator>
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                <title>फादर ऑफ मार्डन मार्शल आर्ट्स&amp;#8217; डॉ जसबीर ने बनाया विश्व रिकॉर्ड</title>
                                    <description><![CDATA[<p>विश्वविख्यात शख्सियत जिन्हें लोग फादर ऑफ मार्डन मार्शल कहकर गुरू बनाकर पूजते हैं और जिन्होंने विश्व की हर बेटी हर बेटे को आत्मसुरक्षा की ट्रेनिंग मार्शल आर्ट्स से सुसज्जित, सशक्त करने का बीड़ा उठा रखा है जिनका आज के समय में मार्शल आर्ट्स में कोई सानी नहीं है वह हैं ग्लोबल सेलेब्रिटी ग्रैंड मास्टर डॉ जसबीर सिंह जिन्होंने भारत के कपूरथला पंजाब से लेकर अमेरिका, यूरोप, फिलीपींस, इंडोनेशिया, मलेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड, तमाम आयरलैंड में जाकर बच्चों को मार्शल आर्ट्स में जागरूक किया कि आप लोग आत्मसुरक्षा हेतु आत्मनिर्भरता बनो।</p>
<p>बता दें कि डॉ. जसबीर सिंह की ऐसी लोककल्याणकारी महान सोच</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/interview/father-of-modern-martial-arts-dr-jasbir-created-world-record/article-7236"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2020-08/e4f4614c-5a2a-472c-a92a-a314fe58ba6c.jpg" alt=""></a><br /><p>विश्वविख्यात शख्सियत जिन्हें लोग फादर ऑफ मार्डन मार्शल कहकर गुरू बनाकर पूजते हैं और जिन्होंने विश्व की हर बेटी हर बेटे को आत्मसुरक्षा की ट्रेनिंग मार्शल आर्ट्स से सुसज्जित, सशक्त करने का बीड़ा उठा रखा है जिनका आज के समय में मार्शल आर्ट्स में कोई सानी नहीं है वह हैं ग्लोबल सेलेब्रिटी ग्रैंड मास्टर डॉ जसबीर सिंह जिन्होंने भारत के कपूरथला पंजाब से लेकर अमेरिका, यूरोप, फिलीपींस, इंडोनेशिया, मलेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड, तमाम आयरलैंड में जाकर बच्चों को मार्शल आर्ट्स में जागरूक किया कि आप लोग आत्मसुरक्षा हेतु आत्मनिर्भरता बनो।</p>
<p>बता दें कि डॉ. जसबीर सिंह की ऐसी लोककल्याणकारी महान सोच और कार्यों को देखते हुए उन्हें ‘फादर ऑफ मार्डन मार्शल आर्ट्स उपाधि’ भी मिल चुकी है और चूंकि जसबीर सिंह जी वर्षों पहले भारत में स्पोर्ट्स मैग्जीन में एक बेहतरीन लेखक, पत्रकार व संपादक भी रहे हैं इस बेजोड़ लेखन के क्षेत्र में उन्हें कई सम्मान मिल चुके हैं।</p>
<p>बता दें कि लेफ्टिनेंट जनरल ग्रैंड मास्टर वर्ल्ड रिकार्ड होल्डर ऐडीटर डॉ जसबीर सिंह जी के नाम पहले भी कई तरह के वर्ल्ड रिकार्ड हैं पर आज उनके इस स्वर्णिम जीवन इतिहास में एक नगीना और जड़ गया है जिसका नाम है पूरे विश्व मीडिया में 51 दिन के अंदर 55 इंटरव्यू प्रकाशित होने का रिकॉर्ड।</p>
<p>गौरतलब है कि बहुमुखी प्रतिभा के धनी ग्रैंड मास्टर प्रो. डाॅ जसबीर सिंह वर्तमान में सबसे विश्व के सबसे शक्तिशाली वीटोपावरफुल देश अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एडवाइजरी बोर्ड के सदस्य हैं और सरकारी इंटरनेशनल यूनाईटेड किंगडम एसोसिएशन कॉमनवेल्थ (एक कॉमनवेल्थ राष्ट्र) के प्रेरणा व्यकित्व तथा उत्तर और दक्षिण अमेरिकी संघ (एनए. एस. ए. यू.) के रक्षा मंत्री हैं।</p>
<p>बता दें डॉ जसबीर सिंह के पास कई तरह के वर्ल्ड रिकार्ड व देशी विदेशी – सम्मानों<br />
का एक बहुत बड़ा भंडार हैं और फिर भी वह जमीन से जुड़े शांतिप्रिय व्यकित्व हैं। उन्होंने विश्व मीडिया को धन्यवाद देते हुये कहा कि आप सब कोरोना काल में भी डटे रहे आप सब बधाई<br />
के पात्र हैं। आपके समाचारपत्र के सभी लेखक और पाठक वर्ग को ढे़रसारी शुभकामनाएं प्रेषित करता हूं, आप हमेशा सच लिखते रहें, यही शुभकामनाएं है।</p>
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                                                            <category>साक्षात्कार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 22 Aug 2020 14:45:08 +0530</pubDate>
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