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                <title>ओपिनियन - Samridh Jharkhand</title>
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                            <item>
                <title>Opinion: होर्मुज की लहरों में डूबता सुपर पावर का गुमान और हार को जीत बताता ट्रंप का प्रलाप</title>
                                    <description><![CDATA[फारस की खाड़ी में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक राजनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। इस विश्लेषण में बताया गया है कि कैसे युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि रणनीति और धैर्य से जीता जाता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/iran-vs--usa-persian-gulf-crisis-hormuz-geopolitics-analysis/article-19774"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-04/download_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि युद्ध के मैदान में जब बंदूकें खामोश होने लगती हैं, तब झूठ के नगाड़े सबसे जोर से बजते हैं। आज फारस की खाड़ी के तपते पानी में जो कुछ घट रहा है, वह किसी हॉलीवुड थ्रिलर से कम नहीं है, लेकिन इस पटकथा का अंत वैसा नहीं है जैसा वॉशिंगटन के व्हाइट हाउस में बैठकर लिखा गया था। युद्ध में कौन जीत रहा है और कौन हार रहा है, इसे आंकने का पैमाना कभी भी मिसाइलों की संख्या या मलबे का ढेर नहीं होता। इसका सबसे सटीक पैमाना यह है कि शांति की भीख सबसे पहले किसने मांगी। आज जब हम अप्रैल 2026 की दहलीज पर खड़े हैं, तो दुनिया देख रही है कि जिस ईरान को प्रतिबंधों की बेड़ियों में जकड़कर घुटनों पर लाने का दावा किया गया था, वह आज तनकर खड़ा है और दुनिया का स्वयंभू थानेदार अब एग्जिट गेट की तलाश में हाथ-पांव मार रहा है।</p>
<p>इस पूरी कहानी को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे मुड़कर साल 2025 के उस ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को देखना होगा, जिसने उपमहाद्वीप के सैन्य इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया। भारत ने जब अपनी सीमा पार कर आतंकवाद के फनों को कुचला, तो वह केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि एक संदेश था। वह संदेश यह था कि शक्ति प्रदर्शन चीखने-चिल्लाने से नहीं, बल्कि सटीक प्रहार से होता है। पाकिस्तान का एयर डिफेंस सिस्टम जब ताश के पत्तों की तरह ढह रहा था और भारतीय विमान आकाश में अपनी मर्जी से चित्रकारी कर रहे थे, तब रावलपिंडी के जनरलों ने पहली बार शांति का राग अलापा था। वह हार की तड़प थी जिसे जीत के पदकों के पीछे छिपाने की नाकाम कोशिश की गई। आसिम मुनीर का खुद को ‘फील्ड मार्शल’ घोषित कर देना वैसा ही था जैसे कोई डूबता हुआ आदमी खुद को समंदर का राजा कह दे। लेकिन गड्ढे झूठ नहीं बोलते। सैटेलाइट की तस्वीरों ने वह सच दुनिया के सामने रख दिया था जिसे पाकिस्तान की पीआर मशीनरी दबाना चाहती थी।</p>
<p>आज मिडिल ईस्ट के रणक्षेत्र में डोनाल्ड ट्रंप वही गलती दोहरा रहे हैं जो कभी पाकिस्तानी जनरलों ने की थी। 28 फरवरी को जब ईरान के शीर्ष नेतृत्व पर हमला हुआ, तो अमेरिका को लगा कि तेहरान ताश की गड्डी की तरह बिखर जाएगा। लेकिन वे भूल गए कि जिस देश ने 40 साल से प्रतिबंधों की आग में खुद को तपाया हो, उसके लिए मिसाइलों की गड़गड़ाहट किसी उत्सव से कम नहीं होती। ईरान ने पलटवार किया और ऐसा किया कि पूरे मध्य पूर्व में फैले अमेरिकी अड्डों की सुरक्षा की कलई खुल गई। आज होर्मुज स्ट्रेट बंद है। दुनिया की रगों में दौड़ने वाला तेल अब ईरान की मर्जी का मोहताज है। वह देश जो कल तक दूसरे देशों को सुरक्षा की गारंटी बेचता था, आज अपने ही सैनिकों की जान बचाने के लिए उन रास्तों को ढूंढ रहा है जो तेहरान तक जाते हों।</p>
<p>ट्रंप का आज का अंदाज बिल्कुल मई 2025 के पाकिस्तान जैसा है। कैमरों के सामने आकर वे अपनी जीत के कसीदे पढ़ रहे हैं, ट्रुथ सोशल पर कैप्स लॉक में अपनी ताकत का बखान कर रहे हैं, लेकिन जमीन की हकीकत उनके दावों का मजाक उड़ा रही है। जब आप हार रहे होते हैं, तो आपकी भाषा में अहंकार और हताशा का एक अजीब मिश्रण घुल जाता है। अमेरिका आज पाकिस्तान के जरिए ईरान को 15 सूत्रीय प्रेम पत्र भेज रहा है, लेकिन तेहरान ने साफ कर दिया है कि वह किसी सेल्समैन से बात नहीं करेगा। ईरान की शर्तें साफ हैं होर्मुज पर उसका नियंत्रण होगा, अमेरिकी फौजें इलाका खाली करेंगी और नुकसान की भरपाई वॉशिंगटन को करनी होगी। ये शर्तें किसी हारे हुए राष्ट्र की नहीं, बल्कि उस खिलाड़ी की हैं जिसने सामने वाले की पूरी बिसात उलट दी है।</p>
<p>मिडिल ईस्ट में अमेरिका की विफलता केवल सैन्य नहीं, बल्कि रणनीतिक और नैतिक भी है। जिस रडार और एयर डिफेंस के भरोसे अमेरिका अपनी धौंस जमाता था, वे आज मलबे के ढेर में तब्दील हो चुके हैं। अरब देश, जो कभी अमेरिका की छत्रछाया में खुद को सुरक्षित महसूस करते थे, अब नए समीकरणों की तलाश में हैं। सऊदी अरब का यूक्रेन के साथ डिफेंस डील करना इस बात का सीधा प्रमाण है कि अब दुनिया को ट्रंप के कार्ड्स की असलियत समझ आ गई है। जब घर का मुखिया ही चोरों से अपनी रक्षा न कर पाए, तो परिवार के बाकी सदस्य नए रक्षक ढूंढने लगते हैं। आज वही स्थिति अमेरिका की है।</p>
<p>सबसे दिलचस्प भूमिका पाकिस्तान की है, जो अपनी फटीहाली को कूटनीतिक अवसर में बदलने की कोशिश कर रहा है। वह देश जिसने खुद अपनी नाक कटवाई थी, आज अमेरिका और ईरान के बीच बिचौलिए की भूमिका में डॉलर बटोरने के सपने देख रहा है। लेकिन ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस खेल का हिस्सा नहीं बनेगा। ईरान जानता है कि वक्त उसके साथ है। वह चुप है, शांत है और अपने लक्ष्यों के प्रति अडिग है। उसकी यह खामोशी वॉशिंगटन की बेचैनी को और बढ़ा रही है। जब आपके पास खोने के लिए कुछ न बचा हो, तो आप सबसे खतरनाक योद्धा बन जाते हैं। ईरान आज उसी स्थिति में है।</p>
<p>कार्ल मार्क्स ने सच ही कहा था कि इतिहास खुद को दोहराता है, पहले एक त्रासदी के रूप में और फिर एक मजाक के रूप में। ऑपरेशन सिंदूर पाकिस्तान के लिए त्रासदी थी, और आज फारस की खाड़ी में अमेरिका जो कर रहा है, वह एक वैश्विक मजाक बनकर रह गया है। ट्रंप अब एक सुरक्षित रास्ता ढूंढ रहे हैं जिससे वे अपनी साख बचा सकें, लेकिन ईरान उन्हें वह मौका देने के मूड में नहीं है। वह होर्मुज का पूरा टोल वसूलने के बाद ही चैन से बैठेगा। यह युद्ध मिसाइलों से नहीं, बल्कि सब्र और हौसले से जीता जा रहा है। और फिलहाल, जीत का सेहरा तेहरान के सिर बंधता दिख रहा है, जबकि वॉशिंगटन की चमकती वर्दी पर धूल और हार की कालिख साफ देखी जा सकती है। गड्ढे आज भी वहीं हैं, चाहे वो रावलपिंडी के एयरफील्ड पर हों या ट्रंप की विदेश नीति के सीने पर। सच तो यही है कि सुपरपावर का गुमान अब फारस की खाड़ी की लहरों में दफन हो चुका है।</p>
<p><img src="https://samridhjharkhand.com/media/2026-04/953a903e-0ab5-45ee-a8fd-2f2c5a7bb940.jpg" alt="Openion: होर्मुज की लहरों में डूबता सुपर पावर का गुमान और हार को जीत बताता ट्रंप का प्रलाप" width="152" height="152"></img></p>
<p><strong>अजय कुमार,                                </strong><br /><strong>वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ ( उ. प्र.)</strong><br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Apr 2026 16:18:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>“बस देख लेंगे”: भारतीय टालमटोल संस्कृति पर तीखा व्यंग्य</title>
                                    <description><![CDATA[“बस देख लेंगे” शीर्षक यह व्यंग्यात्मक लेख भारतीय समाज में प्रचलित उस मानसिकता पर रोशनी डालता है, जहाँ समस्याओं का समाधान करने की बजाय उन्हें टालने की प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है। घर के छोटे कामों से लेकर दफ्तर और राजनीति तक, यह तीन शब्दों का वाक्य अक्सर जिम्मेदारियों को आगे बढ़ाने का माध्यम बन जाता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/just-see-is-a-sharp-satire-on-the-indian-procrastination/article-18753"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/c59ea66b-03b3-4889-8244-cce50a2c64ea_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>“बस देख लेंगे।”</strong></p>
<p>यह तीन शब्दों का वाक्य भारतीय आश्वासन का सार्वभौमिक प्रतीक है। इसमें समाधान भी है, टालमटोल भी; साहस भी है और सुविधाजनक अनिर्णय भी।</p>
<p>यह वाक्य इतना लचीला है कि हर परिस्थिति में फिट हो जाता है—जैसे एक ही चाबी से सारे ताले खुल जाएँ, या कम-से-कम खुलने का भरोसा बना रहे।</p>
<p>घर में नल टपक रहा है।<br />पत्नी कहती हैं—“प्लंबर बुला लीजिए।”<br />उत्तर आता है—“हाँ, बस देख लेंगे।”<br />नल टपकता रहता है, पर वाक्य अपनी जगह अडिग रहता है।</p>
<p>यह वाक्य समस्या का समाधान नहीं करता, समस्या को स्थगित करता है—सम्मानपूर्वक।</p>
<p>कार्यालय में फाइल अटकी है।<br />कर्मचारी पूछता है—“सर, यह कब तक हो जाएगा?”<br />सर गंभीर मुद्रा में कहते हैं—“देख लेंगे।”</p>
<p>यह ‘देख लेंगे’ सुनते ही कर्मचारी समझ जाता है कि अब फाइल का भाग्य ईश्वर के हाथ में है।</p>
<p>राजनीति में तो यह वाक्य अमरत्व को प्राप्त हो चुका है।<br />जनता पूछती है—“सड़क कब बनेगी?”<br />उत्तर—“देख लेंगे।”</p>
<p>यानी सड़क का भविष्य उज्ज्वल है, बस समय अस्पष्ट है।</p>
<p>“बस देख लेंगे” दरअसल हमारे निर्णय-भय का सभ्य संस्करण है।<br />हम सीधे ‘न’ नहीं कहना चाहते और ‘हाँ’ कहकर बंधना भी नहीं चाहते।</p>
<p>इसलिए बीच का रास्ता चुन लेते हैं—देख लेंगे।</p>
<p>यह वाक्य वादा नहीं, संभावना है।<br />यह आश्वासन नहीं, आशा का मसौदा है।</p>
<p>परीक्षा से पहले छात्र से पूछा जाए—“तैयारी हो गई?”<br />वह मुस्कराकर कहेगा—“देख लेंगे।”</p>
<p>इसमें आत्मविश्वास भी छिपा है और किस्मत पर भरोसा भी।<br />मानो प्रश्नपत्र उससे पूछेगा—“तुमने पढ़ा है?”<br />और वह उत्तर देगा—“बस, देख लेंगे।”</p>
<p>रिश्तों में भी यह वाक्य खूब चलता है।<br />कोई कहे—“कभी मिलते क्यों नहीं?”<br />उत्तर—“अरे, देख लेंगे।”</p>
<p>मुलाकात भविष्य के कोहरे में विलीन हो जाती है, पर संबंध की औपचारिकता बची रहती है।</p>
<p>यह वाक्य हमारी सामाजिक शिष्टता का सुरक्षा-कवच है।<br />सीधे मना कर देंगे तो सामने वाला आहत होगा।<br />स्पष्ट प्रतिबद्धता दे देंगे तो खुद बँध जाएँगे।</p>
<p>इसलिए ‘देख लेंगे’ कहकर हम दोनों से बच निकलते हैं।</p>
<p>कभी-कभी यह वाक्य आत्म-संवेदना का भी माध्यम बन जाता है।<br />हम खुद से कहते हैं—</p>
<p>“व्यायाम शुरू करेंगे।”<br />“नई भाषा सीखेंगे।”<br />“पुरानी किताबें पढ़ेंगे।”</p>
<p>और फिर जोड़ देते हैं—“देख लेंगे।”</p>
<p>यह ‘देख लेंगे’ हमारे संकल्पों की शीत-निद्रा है।<br />संकल्प सो जाते हैं, वाक्य जागता रहता है।</p>
<p>रोचक यह है कि ‘देख लेंगे’ का अर्थ हर व्यक्ति अपने हिसाब से समझता है।<br />किसी के लिए इसका अर्थ है—“अभी नहीं।”<br />किसी के लिए—“शायद कभी।”<br />और किसी के लिए—“कभी नहीं।”</p>
<p>फिर भी यह वाक्य इतना लोकप्रिय है, क्योंकि यह आशा को जीवित रखता है।</p>
<p>यह दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं करता, बस आधा खुला छोड़ देता है।<br />और आधा खुला दरवाज़ा, पूरी तरह बंद दरवाज़े से अधिक सुकून देता है।</p>
<p>पर जीवन की कुछ स्थितियाँ ऐसी भी होती हैं, जहाँ ‘देख लेंगे’ पर्याप्त नहीं होता।<br />वहाँ निर्णय चाहिए, स्पष्टता चाहिए, साहस चाहिए।</p>
<p>हर बार स्थगन संभव नहीं।</p>
<p>कभी-कभी नल बंद करना पड़ता है, फाइल पर हस्ताक्षर करने पड़ते हैं, सड़क बनानी पड़ती है और संबंध निभाने पड़ते हैं।</p>
<p>शायद ‘बस देख लेंगे’ का असली सौंदर्य तभी है, जब वह अस्थायी हो—स्थायी नीति नहीं।</p>
<p>यह वाक्य विश्राम हो सकता है, मंज़िल नहीं।</p>
<p>फिर भी, मान लीजिए आप यह निबंध पढ़कर सोच रहे हों—<br />“अच्छा लिखा है… पर इस पर कुछ कहेंगे?”</p>
<p>तो आप भी मन ही मन कह रहे होंगे—<br />“देख लेंगे।”</p>
<p>और मैं भी मुस्कुराकर यही कहूँगा—<br />हाँ, कभी न कभी…<br />बस, देख लेंगे।</p>
<p>✍️ <strong>डॉ. आशुतोष प्रसाद</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 11 Mar 2026 18:01:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Opinion: नीतीश मतलब-सुशासन की शैली</title>
                                    <description><![CDATA[बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का लगभग दो दशकों का सक्रिय प्रशासनिक सफर अब राज्यसभा की ओर बढ़ रहा है। 2005 से शुरू हुए उनके कार्यकाल में बिहार ने अपराध और अराजकता के दौर से निकलकर विकास और सुशासन की नई परिभाषा देखी। 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले नीतीश कुमार ने महिला आरक्षण, साइकिल योजना और शराबबंदी जैसे फैसलों से राज्य की सामाजिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया। अब जब वे संसदीय राजनीति के नए सदन की ओर कदम बढ़ा रहे हैं, बिहार की राजनीति एक बड़े संक्रमण काल और नए युग की आहट महसूस कर रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-nitish-meaning-style-of-good-governance/article-18527"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/d115aeb1-37aa-45c5-96ed-aa7ddc4fafb9_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बिहार की राजनीति में कुछ नाम केवल पदों से नहीं, अपने तरीके से पहचाने जाते हैं। नीतीश कुमार ऐसा ही एक नाम हैं। लगभग दो दशकों तक सत्ता के केंद्र में रहने के बाद अब उनका राजनीतिक सफर अंत की ओर प्रस्थान करने जा रहा है। यह केवल एक सदन से दूसरे सदन की ओर बढ़ने की औपचारिकता भर नहीं है। यह उस लंबे प्रशासनिक कालखंड का विराम है, जिसने बिहार की राजनीति की दिशा, भाषा और प्राथमिकताओं को गहराई से प्रभावित किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">2005 से लेकर अभी तक दो दशक के इस दौर में उन्होंने दस बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। लोकतांत्रिक राजनीति में यह सिर्फ एक संख्या नहीं है, बल्कि राजनीतिक स्थायित्व और सामाजिक संतुलन की समझ का साक्ष्य है। इतनी लंबी अवधि तक सत्ता में बने रहना केवल चुनावी गणित का परिणाम नहीं होता है। इसके पीछे समाज की परतों को पढ़ने की क्षमता और प्रशासनिक निर्णयों की निरंतरता भी होती है। बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का दौर भी ऐसा ही रहा-संयम, संतुलन और प्रशासनिक अनुशासन का दौर।</p>
<p style="text-align:justify;">नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा छात्र जीवन से शुरू हुई। पटना विश्वविद्यालय के उस दौर में, जब कई युवा नेता राजनीति की दिशा तय कर रहे थे, उन्होंने भी सार्वजनिक जीवन की राह पकड़ी। उस समय उन्होंने लालू यादव के छात्रसंघ चुनाव में समर्थन किया था। इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों के बीच प्रचार किया, लेकिन राजनीति का स्वभाव ही परिवर्तन है। समय के साथ दोनों की राहें अलग हो गईं और बिहार की राजनीति दो अलग धाराओं में विकसित होने लगी। </p>
<p style="text-align:justify;">जिस धारा का नेतृत्व नीतीश करने लगे वह धीरे-धीरे लालू की तुलना में ज्यादा व्यापक होने लगा। सार्वजनिक दायरा बढ़ने लगा। राजनीतिक सहयोगियों एवं प्रतिद्वंद्वियों के साथ उनके रिश्ते बनते-बिगड़ते रहे, लेकिन नीतीश स्थिर रहे। सुशील मोदी, रविशंकर प्रसाद और शिवानंद तिवारी जैसे कई नेता अलग-अलग समय में उनके राजनीतिक संवाद का हिस्सा रहे। लेकिन निजी जीवन में उनका संसार सीमित ही रहा। कुछ पुराने मित्र। कुछ भरोसेमंद सहयोगी। सार्वजनिक जीवन में विस्तार और निजी जीवन में संयम, यह उनके व्यक्तित्व का स्थायी संतुलन रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">साल 2005 में जब उन्होंने पहली बार बिहार की सत्ता संभाली, तब राज्य की स्थिति बेहद निराशाजनक थी। अपराध, अव्यवस्था और प्रशासनिक शिथिलता की चर्चा आम थी। शाम ढलते ही सड़कों का खाली हो जाना उस दौर की सामाजिक मनःस्थिति का प्रतीक था। शासन पर भरोसा लगभग समाप्त हो चुका था।</p>
<p style="text-align:justify;">नीतीश कुमार ने अपनी शुरुआत इसी मोर्चे से की। कानून-व्यवस्था को शासन की प्राथमिकता बनाया। प्रशासनिक मशीनरी को सक्रिय किया। धीरे-धीरे लोगों में यह विश्वास लौटने लगा कि राज्य व्यवस्था फिर काम कर सकती है। यह बदलाव केवल पुलिस कार्रवाई का परिणाम नहीं था, बल्कि नीतीश के नेतृत्व में शासन की मानसिकता में आए परिवर्तन का प्रतीक था। विकास उनकी राजनीति की धुरी बन गया। सड़कों के निर्माण ने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच दूरी कम की। संपर्क मार्गों का विस्तार हुआ। बिजली आपूर्ति में सुधार हुआ। कई ऐसे गांव, जो लंबे समय तक बुनियादी सुविधाओं से दूर रहे थे, धीरे-धीरे राज्य की मुख्यधारा से जुड़ने लगे।</p>
<p style="text-align:justify;">सामाजिक परिवर्तन के क्षेत्र में भी अग्रदूत की तरह काम किया। साइकिल योजना ने ग्रामीण समाज में लड़कियों की शिक्षा को नई गति दी। पंचायतों में 50 प्रतिशत महिला आरक्षण का निर्णय स्थानीय लोकतंत्र में एक बड़ा सामाजिक बदलाव लेकर आया। हजारों महिलाएं पहली बार निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनीं। इससे सत्ता की संरचना का सामाजिक आधार भी विस्तृत हुआ। नीतीश कुमार की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक संतुलन की तलाश रहा। दलित और महादलित जैसे वर्गों को प्रशासनिक पहचान दी गई। इससे सामाजिक प्रतिनिधित्व की नई संरचना उभरी। यही संतुलन लंबे समय तक उनकी राजनीतिक शक्ति का आधार बना रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">निर्णय लेने के मामले में भी उनकी शैली विशिष्ट रही। आलोचनाओं के बावजूद उन्होंने अपने निर्णयों को स्थिर रखा। शराबबंदी प्रमुख उदाहरण है। इसे उन्होंने केवल प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार के रूप में प्रस्तुत किया। इसपर बहस हुई, कठिनाइयों की चर्चा हुई, राजस्व क्षति की दुहाई दी गई, लेकिन वह पीछे नहीं हटे। नीतीश की चुनौतियां कभी समाप्त नहीं हुईं। रोजगार, औद्योगिक निवेश और युवाओं के पलायन जैसे प्रश्न लगातार उठते रहे। लंबे शासनकाल के बावजूद ये मुद्दे पूरी तरह समाप्त नहीं हो सके। फिर भी प्रशासनिक स्थिरता और शासन की निरंतरता को उनकी प्रमुख उपलब्धियों में गिना गया।</p>
<p style="text-align:justify;">गठबंधन राजनीति के जटिल दौर में उन्होंने असाधारण लचीलापन दिखाया। कभी भाजपा के साथ, कभी उससे अलग, कभी नए राजनीतिक समीकरणों के साथ परिस्थितियां बदलती रहीं। लेकिन सत्ता का केंद्रीय चेहरा लंबे समय तक वही बना रहा। यह उनकी राजनीतिक दक्षता का प्रमाण माना गया। अब जब उनकी यात्रा राज्यसभा की ओर बढ़ रही है, तब यह स्पष्ट है कि बिहार की राजनीति महत्वपूर्ण संक्रमण के दौर में खड़ी है। दो दशकों तक सत्ता की धुरी रहे नेता का सक्रिय प्रशासनिक अध्याय समाप्ति की ओर बढ़ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 05 Mar 2026 23:18:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Opinion : मोदी–योगी की मौजूदगी में रैपिड रेल उद्घाटन बना राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन</title>
                                    <description><![CDATA[मेरठ में रैपिड रेल और मेट्रो परियोजना का उद्घाटन केवल विकास कार्यक्रम नहीं, बल्कि भाजपा की 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीति का संकेत बना। मोदी और योगी की मौजूदगी में विकास, कानून-व्यवस्था और डबल इंजन सरकार के संदेश के जरिए राजनीतिक समीकरण साधे गए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-rapid-rail-inauguration-in-the-presence-of-modi-yogi-became/article-18338"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/5d9c227b-f090-47b2-b681-8085f3f2790d_samridh_1200x720-(1).jpeg" alt=""></a><br /><p>पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ में रविवार को हुआ रैपिड रेल और मेट्रो परियोजना का उद्घाटन एक सामान्य सरकारी कार्यक्रम नहीं था। यह ऐसा मंच था जहां विकास के आंकड़े, राजनीतिक संदेश और भविष्य की चुनावी रणनीति एक साथ रखी गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी ने यह साफ कर दिया कि उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की बुनियाद अब खुले तौर पर रखी जा रही है।</p>
<p>दिल्ली–मेरठ नमो भारत रैपिड रेल कॉरिडोर देश की सबसे महत्वाकांक्षी क्षेत्रीय परिवहन परियोजनाओं में गिना जा रहा है। इसकी कुल लंबाई करीब 82 किलोमीटर है। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, इस परियोजना पर 12 हजार 900 करोड़ रुपये से ज्यादा की लागत आई है। अब दिल्ली से मेरठ का सफर 50 से 55 मिनट में पूरा किया जा सकेगा, जबकि पहले यही दूरी सड़क मार्ग से तय करने में औसतन ढाई से तीन घंटे लगते थे।</p>
<p>रैपिड रेल की अधिकतम डिजाइन स्पीड 180 किलोमीटर प्रति घंटा रखी गई है, जो इसे देश की सबसे तेज रफ्तार ट्रांजिट प्रणालियों में शामिल करती है। इसी कॉरिडोर के साथ मेरठ मेट्रो का संचालन भी शुरू किया गया है। इसका मकसद केवल दिल्ली से कनेक्टिविटी नहीं, बल्कि शहर के भीतर आवाजाही को भी आसान बनाना है।</p>
<p>सरकार का दावा है कि इससे रोजाना हजारों यात्रियों को सीधा लाभ मिलेगा और ट्रैफिक का दबाव कम होगा। अधिकारियों के अनुसार, पूर्ण संचालन के बाद इस कॉरिडोर से हर दिन करीब ढाई से तीन लाख यात्रियों के सफर करने की क्षमता विकसित की गई है। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में इन आंकड़ों को विकास की उपलब्धि के रूप में पेश किया, लेकिन संदेश सिर्फ इतना नहीं था।</p>
<p>मंच से यह बार-बार रेखांकित किया गया कि इतने बड़े प्रोजेक्ट तभी संभव हो पाए जब केंद्र और राज्य सरकारें एक साथ काम कर रही हों। योगी आदित्यनाथ की तारीफ करते हुए कानून-व्यवस्था, निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर को उत्तर प्रदेश की नई पहचान बताया गया। यह सीधा संकेत था कि भाजपा ‘डबल इंजन सरकार’ के नैरेटिव को 2027 तक और मजबूत करने जा रही है।</p>
<p>राजनीतिक दृष्टि से सबसे दिलचस्प पहलू विपक्ष पर किया गया हमला रहा। इस मंच से कांग्रेस पर तीखे शब्दों में निशाना साधा गया। पहली नजर में यह अटपटा लग सकता है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में भाजपा का मुख्य मुकाबला समाजवादी पार्टी से माना जाता है। लेकिन राजनीति में विमर्श तय करना भी रणनीति का हिस्सा होता है। कांग्रेस को केंद्र में रखकर हमला करने से विपक्षी खेमे के भीतर नेतृत्व और दिशा को लेकर असमंजस पैदा करने की कोशिश साफ दिखी।</p>
<p>इसका सीधा असर समाजवादी पार्टी और उसके प्रमुख अखिलेश यादव पर पड़ता है। यदि विपक्षी राजनीति का केंद्र कांग्रेस बनती है, तो सपा को न केवल अपने पारंपरिक वोट बैंक को संभालना होगा, बल्कि विपक्षी एकता में अपनी भूमिका को भी नए सिरे से परिभाषित करना पड़ेगा। यह दबाव केवल सीटों का नहीं, बल्कि नेतृत्व और वैचारिक दिशा का भी है।</p>
<p>मेरठ का मंच पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सामाजिक और राजनीतिक संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखकर चुना गया। यह इलाका किसान आंदोलन, जातीय समीकरण और शहरीकरण तीनों के लिहाज से अहम माना जाता है। रैपिड रेल जैसी परियोजना के जरिए भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि विकास का लाभ सीधे इसी क्षेत्र को मिल रहा है।</p>
<p>सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, इस कॉरिडोर से जुड़े क्षेत्रों में जमीन के दाम, औद्योगिक निवेश और निजी प्रोजेक्ट्स में पहले ही बढ़ोतरी देखी जा रही है।सरकार का दावा है कि परियोजना के निर्माण और संचालन के दौरान करीब 30 हजार से ज्यादा लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिला है।</p>
<p>इसके अलावा, दिल्ली–एनसीआर के औद्योगिक और कॉरपोरेट हब तक तेज पहुंच मिलने से मेरठ, मोदीनगर और आसपास के शहरों के युवाओं के लिए नौकरी के नए विकल्प खुलेंगे। यही वह आर्थिक तर्क है, जिसे भाजपा राजनीतिक भरोसे में बदलने की कोशिश कर रही है।</p>
<p>योगी आदित्यनाथ को मंच से जिस तरह विकास और सुशासन के चेहरे के रूप में पेश किया गया, वह भी 2027 की राजनीति से जुड़ा संकेत है। भाजपा यह दिखाना चाहती है कि राज्य में नेतृत्व स्थिर है और केंद्र का पूरा समर्थन उसे हासिल है। 2017 और 2022 के चुनावों में कानून-व्यवस्था और मजबूत नेतृत्व जिस तरह निर्णायक मुद्दा बना था, अब उसी के साथ बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को जोड़ा जा रहा है।</p>
<p>मेरठ में दिखी यह तस्वीर बताती है कि भाजपा आने वाले चुनाव को केवल भावनात्मक या वैचारिक मुद्दों पर नहीं, बल्कि ठोस आंकड़ों और विकास के दावों पर लड़ने की तैयारी में है। दूसरी ओर विपक्ष के सामने चुनौती है कि वह इन आंकड़ों का जवाब किस एजेंडे से देगा सामाजिक न्याय, बेरोजगारी, महंगाई या गठबंधन की राजनीति से।</p>
<p>कुल मिलाकर, मेरठ में रैपिड रेल का उद्घाटन उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा संकेत बनकर उभरा है। यह कार्यक्रम विकास का उत्सव भी था और आने वाले चुनाव का संकेतक भी। भाजपा ने यहां से यह साफ कर दिया है कि 2027 की लड़ाई विकास, स्थिर नेतृत्व और बिखरे विपक्ष के मुकाबले के रूप में पेश की जाएगी। मेरठ से उठी यह राजनीतिक गूंज आने वाले महीनों में पूरे प्रदेश की राजनीति को दिशा देती दिख सकती है।</p>
<p><strong>संजय सक्सेना, लखनऊ</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 23 Feb 2026 18:30:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Susmita Rani]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Opinion : विदेश दौरे के पहले दिन योगी आदित्यनाथ को बड़ी निवेश सफलता</title>
                                    <description><![CDATA[मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विदेश दौरे के दौरान सिंगापुर में 6650 करोड़ रुपये के तीन महत्वपूर्ण निवेश समझौते हुए। इन समझौतों से स्मार्ट सिटी, जल प्रबंधन, कौशल विकास और शहरी विकास परियोजनाओं को गति मिलेगी तथा उत्तर प्रदेश में रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-yogi-adityanath-gets-big-investment-success-on-first-day/article-18337"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/4e95ffa5-a7ac-4b3e-9b96-e0019320fd3c_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आजकल विदेश दौरे पर हैं। उनका यह दौरा आज 23 फरवरी से शुरू होकर 26 फरवरी तक चलेगा, जिसमें योगी को पहले दो दिन सिंगापुर और उसके बाद दो दिन जापान में गुजारना है। इसी क्रम में आज सिंगापुर पहुंचते ही सीएम योगी ने  निवेशकों के साथ गहन चर्चा की और जी-टू-बी बैठकों का आयोजन भी किया गया,जिसमें 33 वैश्विक कंपनियों के प्रतिनिधियों से मुलाकात हुई, जहां सीएम ने उत्तर प्रदेश की स्थिर नीतियों, मजबूत कानून व्यवस्था और बेहतर बुनियादी ढांचे की ताकत बताई।</p>
<p>पहले ही दिन तीन महत्वपूर्ण समझौते हुए, जिनकी राशि छह हजार छह सौ पचास करोड़ रुपये बताई जा रही है। इन समझौतों से शहरी विकास, स्मार्ट शहर परियोजनाएं, जल प्रबंधन और कौशल विकास के क्षेत्रों में प्रगति होगी। सिंगापुर के गृह मंत्री और विदेश मंत्री से उनकी भेंट ने राजनयिक स्तर पर भी मजबूती प्रदान की। उन्होंने भारतीय समुदाय को संबोधित कर प्रदेश के अवसरों से अवगत कराया और निवेश का भरोसा जगाया।</p>
<p>इस दौरे का मुख्य उद्देश्य उत्तर प्रदेश को निर्माण केंद्र और एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था वाला राज्य बनाना था। योगी ने निवेशकों को बताया कि प्रदेश में एकल खिड़की प्रणाली से अनुमोदन प्रक्रिया सरल हो गई है, बिजली-पानी की आपूर्ति निर्बाध है और एक्सप्रेसवे तथा औद्योगिक पार्कों का जाल बिछ चुका है। सिंगापुर जैसे विकसित देश ने हमेशा प्रौद्योगिकी और वित्तीय क्षेत्रों में नेतृत्व किया है, इसलिए वहां से प्राप्त सहयोग प्रदेश के औद्योगिक परिदृश्य को बदल देगा।</p>
<p>रोड शो के माध्यम से उन्होंने निवेशकों को आमंत्रित किया और प्रदेश की 36 लाख करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था को नई गति देने का वादा किया। पिछले वैश्विक निवेशक समिट में 35 लाख करोड़ के प्रस्ताव मिले थे, जिन पर कार्य शुरू हो चुका है, और यह दौरा उसी श्रृंखला का हिस्सा था। सिंगापुर से लौटते हुए योगी ने कहा कि यह यात्रा निवेश की नई लहर लाएगी, जो लाखों नौकरियां पैदा करेगी।</p>
<p>जापान प्रवास के दौरान योगी आदित्यनाथ ने यमनाशानी प्रांत के राज्यपाल से भेंट की और उच्च गति रेल परियोजनाओं पर चर्चा की। जापान की उन्नत रेल प्रौद्योगिकी उत्तर प्रदेश के लिए वरदान साबित हो सकती है, खासकर मगलेव ट्रेन जैसी परियोजनाओं के लिए। उन्होंने वहां भारतीय समुदाय के साथ सामुदायिक कार्यक्रम आयोजित किया और निवेश के अवसरों पर प्रकाश डाला। जापान के निवेशक निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटोमोबाइल क्षेत्रों में रुचि दिखा रहे हैं। योगी ने जापानी कंपनियों को प्रदेश के विशाल बाजार और कुशल श्रमिकों के बारे में बताया।</p>
<p>इस दौरे से प्राप्त प्रतिबद्धताएं ऊर्जा, परिवहन और तकनीकी क्षेत्रों को मजबूत करेंगी। जापान जैसे देश से निवेश आने से प्रदेश का निर्यात बढ़ेगा और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में उत्तर प्रदेश की स्थिति मजबूत होगी। कुल मिलाकर, चार दिनों में हुई बैठकों ने दर्जनों संभावनाएं खोली हैं, जो राज्य को आत्मनिर्भर बनाने में सहायक होंगी।</p>
<p>इस यात्रा से उत्तर प्रदेश को निवेश के अलावा अन्य लाभ भी मिले। सिंगापुर से प्राप्त समझौते जल प्रबंधन में नई तकनीक लाएंगे, जो गंगा सफाई और नदी जोड़ परियोजनाओं को गति देंगे। कौशल विकास के क्षेत्र में साझेदारी से युवाओं को आधुनिक प्रशिक्षण मिलेगा, जिससे बेरोजगारी कम होगी। जापान से उच्च गति परिवहन प्रौद्योगिकी हासिल होने से एक्सप्रेसवे और मेट्रो परियोजनाएं तेज होंगी।</p>
<p>योगी सरकार ने पहले ही निवेश नीतियों को सरल बनाया है, जिससे ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में सुधार हुआ। प्रदेश अब निवेशकों का भरोसेमंद गंतव्य बन चुका है, जहां भूमि बैंक, सस्ती बिजली और सुरक्षा का वातावरण उपलब्ध है। इस दौरे ने वैश्विक ब्रांडों का विश्वास बढ़ाया, जैसा कि वित्तीय वर्ष में सैकड़ों परियोजनाओं से स्पष्ट है। निवेश से ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योग लगेंगे, जिससे प्रवासन रुकेगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।</p>
<p>योगी आदित्यनाथ की यह यात्रा 2017 के म्यांमार दौरे के बाद पहली थी, जो दर्शाता है कि सरकार विदेशी निवेश पर कितना जोर दे रही है। सिंगापुर और जापान जैसे देशों से निवेश आने से प्रदेश का सकल   घरेलू उत्पाद बढ़ेगा और एक ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य साकार होगा। निवेशकों ने प्रदेश की कानून व्यवस्था की प्रशंसा की, जो योगी के शासन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। यात्रा से लौटकर योगी ने अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक की और प्राप्त प्रतिबद्धताओं को जमीन पर उतारने के निर्देश दिए। इन निवेशों से इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा और जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में प्रगति होगी। लाखों युवाओं को रोजगार मिलेगा, खासकर लखनऊ, नोएडा और वाराणसी जैसे शहरों में। ग्रामीण इलाकों में सौर ऊर्जा परियोजनाएं लगेंगी, जो किसानों की आय दोगुनी करेंगी। कुल 11 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के साथ गई यात्रा ने सभी क्षेत्रों को कवर किया।</p>
<p>इस दौरे की सफलता से उत्तर प्रदेश वैश्विक पटल पर चमकेगा। निवेश के अलावा सांस्कृतिक आदान-प्रदान बढ़ेगा और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। जापान के राज्यपाल के साथ चर्चा से सांस्कृतिक केंद्र स्थापित हो सकते हैं। सिंगापुर की स्मार्ट सिटी तकनीक से प्रदेश के शहर आधुनिक बनेंगे। योगी ने निवेशकों को आश्वासन दिया कि सभी प्रस्तावों पर त्वरित कार्यवाही होगी। यह यात्रा न केवल आर्थिक लाभ देगी, बल्कि राज्य की छवि को नया आयाम भी प्रदान करेगी। भविष्य में ऐसे और दौरे होंगे, जो प्रदेश को भारत का इंजन बनाएंगे।</p>
<p>निवेश से उद्योग धंधे लगेंगे, बाजार फूलेंगे और कल्याणकारी योजनाएं मजबूत होंगी। योगी आदित्यनाथ का विजन स्पष्ट है- विकसित उत्तर प्रदेश, जो विश्व गुरु भारत का आधार बने। इस दौरे ने सिद्ध कर दिया कि मेहनत और दूर दृष्टि से असंभव कुछ नहीं। प्रदेशवासी गर्व से कह सकते हैं कि उनका राज्य अब वैश्विक निवेश का केंद्र है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 23 Feb 2026 18:13:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[अजय कुमार, लखनऊ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>झारखण्ड का बजट: अंतिम पायदान पर खड़े समाज के विकास का सच्चा आईना बने</title>
                                    <description><![CDATA[झारखण्ड का बजट तभी ऐतिहासिक होगा जब वह अंतिम पायदान पर खड़े दलित, आदिवासी, मूलवासी और गरीब समाज के विकास का वास्तविक प्रतिबिंब बने। शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि अधिकार, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा पर केंद्रित बजट ही राज्य को सामाजिक न्याय का मॉडल बना सकता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/jharkhands-budget-should-become-a-national-model-of-social-justice/article-18249"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/c136e8c6-8a8c-45a8-9bf2-8712d983adce_samridh_1200x720-(1).jpeg" alt=""></a><br /><p>झारखण्ड की इस पावन धरती पर खनिजों की अनमोल चमक है — कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, यूरेनियम। लेकिन इसी माटी में सदियों से शोषण, विस्थापन और अधिकार-वंचना का खून बहता रहा है। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की लगभग 26.21% आबादी अनुसूचित जनजाति और लगभग 12% अनुसूचित जाति से है। यानी हर तीन में से एक झारखण्डवासी उस समुदाय से है, जिसे इतिहास ने विकास की दौड़ में सबसे पीछे धकेल दिया।</p>
<p>आज जब राज्य का वार्षिक बजट लाखों करोड़ की योजनाओं का खाका खींचता है, तो सबसे बड़ा सवाल यह है — क्या बजट की पहली पंक्ति में वे लोग हैं, जो सदियों से अंतिम पायदान पर खड़े हैं?</p>
<p>झारखण्ड देश के खनिज उत्पादन में अग्रणी है, लेकिन मानव विकास सूचकांक में देश के पिछड़े राज्यों में शुमार है। यह विडंबना तभी खत्म होगी, जब बजट की प्राथमिकता खनिज नहीं, मनुष्य होगी; लाभ नहीं, अधिकार होगा; और विकास का मतलब विस्थापन नहीं, बल्कि सशक्तिकरण होगा।</p>
<p>यदि शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि-अधिकार, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा पर केंद्रित, डेटा-आधारित, पारदर्शी और समुदाय-संचालित बजट बने, तो झारखण्ड न सिर्फ आर्थिक रूप से मजबूत बनेगा, बल्कि पूरे देश के लिए सामाजिक न्याय का जीवंत मॉडल भी बनेगा। ऐसा बजट ही दलित-आदिवासी-मूलवासी एवं अन्य कमजोर वर्गों के अंतिम पायदान पर बैठे नागरिकों तथा उच्च जाति के सबसे गरीब परिवारों के सर्वांगीन, चहुमुखी और समग्र विकास का वास्तविक मार्ग प्रशस्त करेगा।</p>
<p><strong>विकास बनाम वंचना: एक कठोर सच</strong></p>
<p>झारखण्ड देश के प्रमुख खनिज उत्पादक राज्यों में अग्रणी है, लेकिन जिन जिलों से ये खनिज निकलते हैं — पश्चिम सिंहभूम, गुमला, पाकुड़, लातेहार — वहीं गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा और पलायन की दर सबसे ऊँची है। विकास की गाड़ी तेज़ चली, लेकिन अंतिम डिब्बा छूट गया। यह विरोधाभास केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक संकट है। अब समय आ गया है कि बजट इस नैतिक संकट का समाधान बने।</p>
<p><strong>1. शिक्षा: अधिकार, दान नहीं</strong></p>
<p>आदिवासी-दलित बहुल क्षेत्रों में माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर 25-35% तक पहुँच चुकी है। बालिका शिक्षा की स्थिति और भी दर्दनाक है। यदि बजट में शिक्षा पर 30% से कम आवंटन होता है, तो यह सामाजिक न्याय की अधूरी प्रतिबद्धता होगी।</p>
<p>बजट में हर आदिवासी प्रखंड में आवासीय विद्यालय अनिवार्य हों। प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा — संथाली, मुंडारी, हो, कुरुख — में हो, ताकि बच्चे की सीखने की क्षमता बढ़े और सांस्कृतिक पहचान बरकरार रहे। उच्च शिक्षा में दलित-आदिवासी विद्यार्थियों के लिए 100% छात्रवृत्ति, कोचिंग सहायता और तकनीकी संस्थानों में आरक्षित सीटों का सख्त क्रियान्वयन हो।</p>
<p>“दलित-आदिवासी कौशल मिशन” के तहत ₹1000-2000 करोड़ का वार्षिक प्रावधान कर आईटीआई, पॉलिटेक्निक और स्किल सेंटरों को उद्योगों से जोड़ा जाए, ताकि प्रशिक्षण के साथ रोजगार भी सुनिश्चित हो। शिक्षा केवल साक्षरता नहीं — यह सामाजिक गतिशीलता का सबसे मजबूत पुल है। यही वह सीढ़ी है, जिस पर चढ़कर अंतिम पायदान का बच्चा भी शिखर छू सकता है।</p>
<p><strong>2. भूमि और वनाधिकार: सम्मान का प्रश्न</strong></p>
<p>सदियों से जंगल-जमीन से जुड़ा समाज आज भी अपने ही संसाधनों पर अधिकार के लिए संघर्ष कर रहा है। वनाधिकार कानून (FRA) के तहत हजारों दावे अभी भी लंबित हैं। जब तक सामुदायिक और व्यक्तिगत पट्टे नहीं बाँटे जाते, विकास अधूरा रहेगा।</p>
<p>बजट में “FRA मिशन फंड” के तहत कम से कम ₹500 करोड़ का विशेष प्रावधान हो। लघु वनोपज — तसर, महुआ, साल बीज, लाख — के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य और स्थानीय प्रोसेसिंग इकाइयाँ स्थापित हों। खनिज रॉयल्टी और DMF फंड का कम से कम 40% स्थानीय समुदायों के विकास पर खर्च हो।</p>
<p>सिंचाई, सौर पंप, सूक्ष्म जलाशयों में निवेश बढ़े। महिला स्वयं सहायता समूहों को बिना ब्याज ऋण और विपणन सहायता दी जाए। विकास का मॉडल विस्थापन का नहीं, स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय समुदाय के अधिकार का हो। तभी न्यायपूर्ण विकास संभव होगा।</p>
<p><strong>3. स्वास्थ्य: जीवन का अधिकार</strong></p>
<p>दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएँ आज भी नाममात्र की हैं। मातृ मृत्यु दर और कुपोषण गंभीर समस्या बने हुए हैं। स्वास्थ्य बजट में 25% वृद्धि हो। हर 20,000 आबादी पर एक पूर्ण सुसज्जित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) बने, जिसमें विशेषज्ञ डॉक्टर, दवाइयाँ और एम्बुलेंस अनिवार्य हों।</p>
<p>“पोषण सुरक्षा मिशन” के लिए ₹1000 करोड़ का वार्षिक प्रावधान हो। मोबाइल मेडिकल यूनिट, मातृ-शिशु स्वास्थ्य मिशन और मानसिक स्वास्थ्य व नशा मुक्ति केंद्र ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित हों। स्वास्थ्य कोई दया नहीं, संविधान द्वारा प्रदत्त जीवन का अधिकार है। बजट में यह भावना साफ झलकनी चाहिए।</p>
<p><strong>4. रोजगार और पलायन: मजबूरी नहीं, विकल्प</strong></p>
<p>झारखण्ड से लाखों युवा रोजगार की तलाश में बाहर जाते हैं। यह सिर्फ आर्थिक नहीं, सामाजिक विखंडन की त्रासदी है। “दलित-आदिवासी उद्यमिता कोष” के लिए ₹2000 करोड़ का प्रावधान हो। खनिज आधारित उद्योगों में 75% स्थानीय रोजगार अनिवार्य किया जाए।</p>
<p>मनरेगा को जल संरक्षण और उत्पादक परिसंपत्तियों से जोड़ा जाए। हस्तशिल्प, बांस, तसर और कृषि आधारित लघु उद्योगों के लिए विशेष स्टार्टअप कोष बने। रोजगार ऐसा हो, जो पलायन रोके, आत्मसम्मान बढ़ाए और युवाओं को अपनी मिट्टी से जोड़े।</p>
<p><strong>5. सामाजिक न्याय और सुरक्षा</strong></p>
<p>अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण कानून के बावजूद न्याय प्रक्रिया लंबी और जटिल है। कानूनी सहायता और फास्ट-ट्रैक अदालतों के लिए विशेष कोष हो। वृद्धावस्था, विधवा और दिव्यांग पेंशन में 50% वृद्धि हो। सभी छात्रवृत्ति और सामाजिक योजनाओं का 100% समयबद्ध DBT सुनिश्चित हो। न्याय कागज़ पर नहीं, ज़मीन पर दिखना चाहिए।</p>
<p><strong>आवास, सड़क और बुनियादी ढाँचा</strong></p>
<p>सुरक्षित पक्का घर, स्वच्छ पेयजल, बिजली, सड़क और डिजिटल कनेक्टिविटी — ये सुविधाएँ नहीं, गरिमापूर्ण जीवन के अनिवार्य तत्व हैं। आदिवासी-दलित बस्तियों में पक्के घरों का निर्माण, हर घर जल योजना का पूर्ण विस्तार, हर टोला को सड़क से जोड़ना और ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी बजट की प्राथमिकता बने।</p>
<p><strong>पारदर्शिता और जनभागीदारी</strong></p>
<p>बजट बनाना पर्याप्त नहीं, उसका सही उपयोग ज़रूरी है। इसलिए ग्राम सभा आधारित पार्टिसिपेटरी बजटिंग लागू हो। सभी योजनाओं की ऑनलाइन ट्रैकिंग, वार्षिक सामाजिक लेखा परीक्षा और जिला स्तर पर स्वतंत्र प्रभाव मूल्यांकन अनिवार्य हों।</p>
<p><strong>अंतिम शब्द: बजट एक नैतिक दस्तावेज़ है</strong></p>
<p>झारखण्ड का बजट मात्र आय-व्यय का ब्यौरा नहीं, यह तय करता है कि राज्य किसके साथ खड़ा है। यदि अंतिम पायदान पर खड़े दलित, आदिवासी, मूलवासी और गरीब समाज को केंद्र में रखकर बजट नहीं बना, तो विकास की चमक सिर्फ शहरों तक सिमट जाएगी।</p>
<p>आज ज़रूरत है ऐसे बजट की — जहाँ प्राथमिकता खनिज नहीं, मनुष्य हो; लाभ नहीं, अधिकार हो; विकास का अर्थ विस्थापन नहीं, सशक्तिकरण हो। तभी झारखण्ड की आत्मा पूरी होगी। तभी बजट ऐतिहासिक कहलाएगा।</p>
<p>दलित, आदिवासी और मूलवासी समाज के बिना झारखण्ड अधूरा है। बजट की हर पंक्ति में यह संदेश साफ दिखे — राज्य की प्राथमिकता खनिज नहीं, मनुष्य है; मुनाफा नहीं, गरिमा है; और विकास विस्थापन नहीं, सशक्तिकरण है। ऐसा बजट ही झारखण्ड को न सिर्फ आर्थिक रूप से समृद्ध, बल्कि सामाजिक न्याय का राष्ट्रीय मॉडल बनाएगा।</p>
<p><strong>लेखक: विजय शंकर नायक</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 19 Feb 2026 14:31:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Susmita Rani]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Opinion : ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट पर विकास बनाम पर्यावरण की जंग</title>
                                    <description><![CDATA[ग्रेट निकोबार द्वीप पर प्रस्तावित 90 हजार करोड़ रुपये की मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल से मंजूरी मिलने के बाद विकास और पर्यावरण संरक्षण को लेकर बहस तेज हो गई है। यह परियोजना भारत को समुद्री व्यापार और रणनीतिक शक्ति में नई ऊंचाई दे सकती है, लेकिन इससे जैव विविधता और आदिवासी समुदायों पर खतरे की आशंका भी जताई जा रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-battle-of-development-vs-environment-on-great-nicobar-mega/article-18230"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/2b1c13ed-b467-4f49-ac3f-dc485429b5cd_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:left;">अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का सबसे दक्षिणी द्वीप ग्रेट निकोबार आज भारत की रणनीतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय बहस का केंद्र बन चुका है। करीब 90 हजार करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल से मंजूरी मिलने के बाद यह सवाल और गहरा हो गया है कि क्या भारत विकास और संरक्षण के बीच संतुलन साध पाएगा।</p>
<p style="text-align:left;">ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में कहा है कि परियोजना को दी गई पर्यावरणीय स्वीकृति में पर्याप्त सुरक्षा उपाय शामिल हैं और इसे रोका नहीं जा सकता, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि हर शर्त का कड़ाई से पालन अनिवार्य होगा। ग्रेट निकोबार द्वीप भारत का सबसे दक्षिणी बड़ा द्वीप है और भौगोलिक दृष्टि से इसकी स्थिति असाधारण मानी जाती है। यह द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य से करीब 35 से 40 नॉटिकल मील की दूरी पर स्थित है।</p>
<p style="text-align:left;">अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठनों और शिपिंग डेटा के मुताबिक, दुनिया के कुल समुद्री व्यापार का लगभग 30 से 40 प्रतिशत हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। चीन के कुल ऊर्जा आयात का करीब 60 प्रतिशत और जापान तथा दक्षिण कोरिया के व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते पर निर्भर है। यही वजह है कि इसे हिंद महासागर क्षेत्र की सबसे अहम ‘चोक पॉइंट’ माना जाता है।</p>
<p style="text-align:left;">भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अभी तक देश के पास इस इलाके में कोई बड़ा ट्रांसशिपमेंट हब नहीं है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत का करीब 75 प्रतिशत कंटेनर ट्रांसशिपमेंट विदेशी बंदरगाहों जैसे सिंगापुर, कोलंबो और पोर्ट क्लांग के जरिए होता है। इससे न केवल समय बढ़ता है, बल्कि लॉजिस्टिक्स लागत भी 10 से 15 प्रतिशत तक ज्यादा हो जाती है।</p>
<p style="text-align:left;">रिजर्व बैंक और शिपिंग मंत्रालय से जुड़े अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि उच्च लॉजिस्टिक लागत के कारण भारत की मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है। इसी कमी को दूर करने के लिए ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट को गेमचेंजर बताया जा रहा है। यह परियोजना लगभग 166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली होगी। इसमें गैलेथिया बे पर अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांस शिपमेंट टर्मिनल, ड्यूल यूज सिविल-मिलिट्री एयरपोर्ट, 450 मेगावॉट का गैस और सौर ऊर्जा आधारित पावर प्लांट और एक नई इंटीग्रेटेड टाउनशिप शामिल है।</p>
<p style="text-align:left;">सरकारी दस्तावेज बताते हैं कि सिर्फ पोर्ट परियोजना पर करीब 40,040 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। पहले चरण में 18,000 करोड़ रुपये की लागत से 2028 तक इसे चालू करने का लक्ष्य है। शुरुआती क्षमता 4 मिलियन टीईयू से अधिक होगी, जबकि पूरी तरह विकसित होने पर यह क्षमता 16 मिलियन टीईयू तक पहुंच सकती है।</p>
<p style="text-align:left;">अगर इन आंकड़ों की तुलना की जाए तो भारत का कुल कंटेनर ट्रैफिक 2020 में करीब 17 मिलियन टीईयू था, जबकि चीन का आंकड़ा 245 मिलियन टीईयू से अधिक रहा। यह अंतर साफ दिखाता है कि भारत को अपने समुद्री इंफ्रास्ट्रक्चर में कितनी बड़ी छलांग की जरूरत है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बड़े कंटेनर जहाज सीधे ग्रेट निकोबार पर रुकने लगते हैं, तो छोटे फीडर जहाजों के जरिए देश के पूर्वी और पश्चिमी तट के बंदरगाहों तक माल पहुंचाना आसान होगा।</p>
<p style="text-align:left;">इससे ट्रांजिट टाइम में कई दिन की बचत हो सकती है और लागत में भी उल्लेखनीय कमी आएगी।रणनीतिक दृष्टि से यह परियोजना भारत की समुद्री सुरक्षा को नई मजबूती दे सकती है। रक्षा विश्लेषकों के अनुसार ग्रेट निकोबार का विकास हिंद महासागर क्षेत्र में निगरानी, खुफिया गतिविधियों और त्वरित सैन्य प्रतिक्रिया की क्षमता को बढ़ाएगा। आपदा प्रबंधन और मानवीय सहायता अभियानों के लिहाज से भी यह द्वीप एक अहम बेस बन सकता है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती सामरिक हलचलों के बीच भारत के लिए यह एक अतिरिक्त बढ़त के रूप में देखा जा रहा है।</p>
<p style="text-align:left;">लेकिन जितनी बड़ी इसकी रणनीतिक और आर्थिक अहमियत है, उतनी ही गहरी इसकी पर्यावरणीय चुनौतियां भी हैं। ग्रेट निकोबार एक बायोस्फीयर रिजर्व है, जहां घने वर्षावन, मैंग्रोव, कोरल रीफ और कई दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं। पर्यावरण आकलनों के मुताबिक परियोजना के लिए 8.5 लाख से लेकर 50 लाख से ज्यादा पेड़ों की कटाई की आशंका जताई गई है।</p>
<p style="text-align:left;">यह इलाका लेदरबैक समुद्री कछुओं के सबसे महत्वपूर्ण प्रजनन स्थलों में से एक है। इसके अलावा निकोबार मेगापोड पक्षी, खारे पानी के मगरमच्छ, निकोबार मकाक और रॉबर क्रैब जैसी प्रजातियों पर भी खतरे की बात कही जा रही है यही वजह है कि इस परियोजना को लेकर राजनीतिक और सामाजिक विरोध भी सामने आया। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी समेत कई पर्यावरणविदों ने आरोप लगाया कि परियोजना में पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के भविष्य को नजरअंदाज किया गया है।</p>
<p style="text-align:left;">उनका कहना रहा कि क्लाइमेट चेंज के दौर में समुद्र स्तर बढ़ रहा है और ऐसे में इतने बड़े तटीय इंफ्रास्ट्रक्चर का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। ग्रेट निकोबार सिर्फ जैव विविधता का केंद्र नहीं है, बल्कि शोंपेन और निकोबारी जैसी जनजातियों का भी घर है। खासतौर पर शोंपेन जनजाति की आबादी 200 से 300 के बीच बताई जाती है और उन्हें दुनिया की सबसे संवेदनशील आदिवासी जनजातियों में गिना जाता है।</p>
<p style="text-align:left;">विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े पैमाने पर बाहरी आबादी के आने से उनकी पारंपरिक जीवन शैली, संस्कृति और अस्तित्व पर गंभीर असर पड़ सकता है। सरकार का दावा है कि आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं और उनके क्षेत्रों में न्यूनतम हस्तक्षेप होगा, लेकिन इस पर लगातार निगरानी की मांग की जा रही है।एनजीटी ने अपने आदेश में पर्यावरण संरक्षण को लेकर कई सख्त निर्देश दिए हैं।</p>
<p style="text-align:left;">इनमें मैंग्रोव पुनर्स्थापन, कोरल ट्रांसलोकेशन, तटरेखा संरक्षण, वन्य जीवों के प्रजनन स्थलों की सुरक्षा और आदिवासी हितों की रक्षा शामिल है। ट्रिब्यूनल ने यह भी साफ किया है कि आईलैंड कोस्टल रेगुलेशन जोन नियमों का किसी भी स्तर पर उल्लंघन स्वीकार नहीं किया जाएगा और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई की जाएगी। कुल मिलाकर, ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट भारत के सामने एक बड़ी परीक्षा है। एक तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री शक्ति और आर्थिक विकास की जरूरत है, तो दूसरी तरफ पर्यावरण संतुलन और स्थानीय समुदायों की रक्षा की जिम्मेदारी।</p>
<p style="text-align:left;">आने वाले वर्षों में यह परियोजना किस दिशा में आगे बढ़ती है, यही तय करेगा कि ग्रेट निकोबार भारत के लिए अगला सिंगापुर बनता है या विकास और संरक्षण की टकराहट का सबसे बड़ा उदाहरण। फिलहाल इतना तय है कि यह द्वीप अब सिर्फ भारत का सबसे दक्षिणी भूभाग नहीं, बल्कि देश की समुद्री राजनीति और दीर्घकालिक रणनीति का केंद्र बन चुका है</p>
<p style="text-align:left;"><strong>अजय कुमार</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 18 Feb 2026 16:28:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[अजय कुमार, लखनऊ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Mahashivratri special 2026 : तांडव की लय और मांदर की थाप</title>
                                    <description><![CDATA[यह लेख मांदर की थाप और शिव तांडव के माध्यम से आदिवासी संस्कृति, प्रकृति और जीवन की लय के बीच के संबंध को दर्शाता है। इसमें बताया गया है कि नृत्य और संगीत केवल कला नहीं, बल्कि जीवन की गति और सामूहिक चेतना का उत्सव हैं। लेख मनुष्य और प्रकृति के बीच के प्राचीन संबंध को पुनः समझने का संदेश देता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/mahashivratri-special/article-18022"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/a3d643f5-79f5-4b68-86d7-c897f7d87053_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>रात जब गहराती है और जंगल की निस्तब्धता अपने भीतर किसी अनसुनी धड़कन को सँजोने लगती है, तब कहीं दूर से मांदर की थाप सुनाई देती है। वह थाप केवल एक वाद्य की ध्वनि नहीं होती; वह धरती की नाड़ी है, जो मनुष्य के कदमों से मिलकर जीवन की लय रचती है। इसी लय में शिव का तांडव भी कहीं न कहीं जीवित है—आदिम, अनगढ़ और अनंत।</p>
<p>भारतीय परंपरा में शिव का तांडव सृष्टि और संहार का नृत्य माना गया है। पर यदि हम इसे आदिवासी जीवन की दृष्टि से देखें, तो तांडव केवल विध्वंस का प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन की गति का उत्सव है। जिस प्रकार मांदर की थाप पर आदिवासी समुदाय सामूहिक नृत्य करता है, उसी प्रकार तांडव भी सृष्टि की सामूहिक धड़कन है। दोनों में एक अदृश्य साम्य है—लय का, ऊर्जा का और अस्तित्व के उत्सव <br />का।</p>
<p>मांदर की थाप सरल होती है, पर उसमें एक गहरी शक्ति छिपी होती है। वह थाप जैसे ही गूँजती है, लोग एक वृत्त में इकट्ठा हो जाते हैं। कदम ताल मिलाते हैं, हाथ एक-दूसरे से जुड़ते हैं, और नृत्य शुरू हो जाता है। यह नृत्य किसी मंच के लिए नहीं, जीवन के लिए होता है। इसमें कोई दर्शक नहीं, सब सहभागी होते हैं।<br />शिव का तांडव भी ऐसा ही है—जहाँ देवता और जगत के बीच कोई दूरी नहीं रहती। डमरू की ध्वनि और मांदर की थाप जैसे एक ही लय के दो रूप प्रतीत होते हैं।</p>
<p>आदिवासी समाज में नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना का उत्सव है। फसल कटने पर, पर्व आने पर, या शिवरात्रि जैसी रात्रि में मांदर की थाप पर लोग नाचते हैं। यह नृत्य धरती के प्रति कृतज्ञता का भी है और जीवन की निरंतरता का भी। जब मांदर की आवाज़ जंगल में गूँजती है, तो लगता है जैसे धरती स्वयं तांडव कर रही हो।</p>
<p>शिव का तांडव भी इसी धरती की गति है—पर्वतों का उठना-गिरना, नदियों का बहना, ऋतुओं का बदलना। यह नृत्य हमें याद दिलाता है कि जीवन स्थिर नहीं, निरंतर प्रवाहमान है।<br />तांडव की कल्पना में अग्नि है, ऊर्जा है, और परिवर्तन का साहस है। मांदर की थाप में भी वही ऊर्जा छिपी है। जब युवा और वृद्ध, स्त्री और पुरुष एक साथ नृत्य करते हैं, तो वहाँ कोई भेद नहीं रहता। सब एक लय में बँध जाते हैं। यह लय ही समाज को जोड़ती है, जैसे तांडव सृष्टि को जोड़ता है।</p>
<p>शिव के नटराज रूप में जो वृत्ताकार नृत्य है, वही वृत्त आदिवासी नृत्य में भी दिखाई देता है—जहाँ सब एक घेरे में घूमते हैं। यह घेरा केवल नृत्य का नहीं, एकता का प्रतीक है।</p>
<p>मांदर की थाप में एक आदिम स्मृति भी छिपी होती है। यह वही ध्वनि है, जो शायद मानव सभ्यता के प्रारंभ में पहली बार गूँजी होगी—जब मनुष्य ने लकड़ी या चमड़े पर प्रहार करके लय बनाई होगी। उसी लय से नृत्य जन्मा होगा, और उसी नृत्य से देवता की कल्पना। शिव का तांडव शायद उसी पहली लय का विस्तार है।<br />इसलिए जब मांदर बजता है, तो वह केवल वर्तमान का संगीत नहीं, बल्कि इतिहास की धड़कन भी होता है।</p>
<p>आज के आधुनिक जीवन में जब संगीत कृत्रिम हो गया है और नृत्य मंचों तक सीमित हो गया है, तब भी आदिवासी समाज मांदर की थाप को जीवित रखे हुए है। यह थाप हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है। वह याद दिलाती है कि मनुष्य और प्रकृति के बीच जो लय है, वही <br />जीवन का आधार है।</p>
<p>शिव का तांडव भी यही सिखाता है—कि सृष्टि का हर परिवर्तन एक नृत्य है, हर विनाश एक नई सृष्टि की भूमिका है।</p>
<p>तांडव की लय और मांदर की थाप हमें एक गहरे सत्य तक ले जाती है—कि जीवन का सार गति में है। जब तक लय है, तब तक जीवन है। जब मांदर की थाप रुकती है, तो नृत्य थम जाता है; जब तांडव रुकता है, तो सृष्टि भी ठहर जाती है।</p>
<p>इसलिए मांदर की हर थाप में शिव का तांडव छिपा है, और हर तांडव में जीवन की अनंत धड़कन।</p>
<p>शायद इसी कारण जंगल की रात में गूँजती मांदर की आवाज़ सुनकर लगता है कि कहीं दूर शिव नृत्य कर रहे हैं—अनंत, निर्भीक और मुक्त और उस नृत्य में मनुष्य भी शामिल है, धरती भी, आकाश भी। यही तांडव की लय है, यही मांदर की थाप—जीवन का शाश्वत उत्सव।</p>
<p><strong>डॉ आशुतोष प्रसाद</strong><br /><strong>साहित्यकार</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 10 Feb 2026 16:59:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारत–अमेरिका ट्रेड डील: ‘आत्मनिर्भर भारत’ नहीं, आर्थिक आत्मसमर्पण है : विजय शंकर नायक</title>
                                    <description><![CDATA[भारत–अमेरिका ट्रेड डील पर कांग्रेस नेता विजय शंकर नायक ने सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि यह समझौता किसानों, MSME उद्योगों और रोजगार के लिए नुकसानदायक हो सकता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/india-us-trade-deal-is-not-self-reliant-india-but-economic-surrender/article-17985"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/77ca887d-caa4-4f0c-b7f2-458dfcb780e2_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>भारत–अमेरिका ट्रेड डील को भाजपा सरकार एक “ऐतिहासिक उपलब्धि” के रूप में प्रचारित कर रही है। लेकिन सच्चाई यह है कि यह समझौता भारत के किसानों, छोटे उद्योगों, श्रमिकों और घरेलू बाजार के लिए एक आर्थिक खतरे की घंटी है। यह डील आत्मनिर्भर भारत का विस्तार नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था को विदेशी कॉर्पोरेट के सामने झुकाने की नीति प्रतीत होती है।</p>
<p>सवाल यह नहीं है कि अमेरिका को कितना फायदा होगा — सवाल यह है कि भारत को कितना नुकसान झेलना पड़ेगा।</p>
<p><strong>किसानों के लिए खतरा: अमेरिकी कृषि आयात का हमला</strong> — अमेरिका अपने किसानों को भारत की तुलना में 5–10 गुना अधिक सब्सिडी देता है। जहाँ अमेरिकी किसानों को प्रति वर्ष ₹3–5 लाख तक सरकारी सहायता मिलती है, वहीं भारतीय किसान को औसतन ₹14,000–₹18,000 प्रति वर्ष सहायता मिलती है।</p>
<p><strong>डेटा क्या कहता है?</strong><br />2025 में अमेरिका से भारत में कृषि आयात में 34% से अधिक वृद्धि, भारत के कृषि निर्यात में 13.6% की गिरावट। यदि सोयाबीन, डेयरी, मक्का, एथेनॉल और प्रोसेस्ड फूड पर आयात खुला, भारतीय किसान मूल्य प्रतिस्पर्धा में तबाह हो जाएगा। यह किसानों की आय, MSP और ग्रामीण रोज़गार पर सीधा हमला है।</p>
<p><strong>MSME और घरेलू उद्योग: रोज़गार पर सीधा वार</strong><br />भारत की लगभग 30% GDP और 11 करोड़ से अधिक नौकरियाँ MSME सेक्टर पर निर्भर हैं। लेकिन — अमेरिकी टैरिफ दबाव से वस्त्र निर्यात में 20–30% गिरावट, चमड़ा, खिलौना, फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में छोटे उद्योग बंद होने के कगार पर। यदि अमेरिकी उत्पाद सस्ते टैरिफ पर आए — लाखों MSME इकाइयाँ बंद होंगी, करोड़ों नौकरियाँ जाएँगी।</p>
<p>भाजपा सरकार कॉर्पोरेट मित्र व्यापार कर रही है — लेकिन छोटे उद्योगों और श्रमिकों के लिए कोई सुरक्षा नीति नहीं है।</p>
<p><strong>व्यापार असंतुलन: अमेरिका को लाभ, भारत को घाटा</strong><br />2024–25 में — अमेरिका का भारत को कृषि निर्यात ≈ $2 अरब, भारत का अमेरिका को कृषि निर्यात ≈ $5.5 अरब। लेकिन नई डील के बाद — अमेरिकी कंपनियों को अधिक टैरिफ राहत और बाज़ार पहुँच, भारतीय उत्पादों पर गैर-टैरिफ बाधाएँ बनी रहेंगी।</p>
<p>इसका अर्थ है — लाभ अमेरिका का, बाज़ार भारत का, नुकसान भारतीय उत्पादक का।</p>
<p><strong>खाद्य सुरक्षा, GM फसल और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खतरा</strong><br />इस ट्रेड डील के तहत — GM फसलें, केमिकल-इंटेंसिव कृषि उत्पाद, बड़े पैमाने पर प्रोसेस्ड फूड भारत के बाज़ार में आ सकते हैं।</p>
<p><strong>जोखिम:</strong><br />पारंपरिक खेती का विनाश, स्वास्थ्य संकट, जैव विविधता और पर्यावरण को नुकसान। यह केवल व्यापार नहीं — भारत की खाद्य संप्रभुता पर हमला है।</p>
<p><strong>रोजगार संकट: व्यापार युद्ध का सीधा असर</strong><br />वैश्विक शोध बताता है कि ट्रेड लिबरलाइजेशन और टैरिफ वॉर से विकासशील देशों में नौकरियाँ सबसे पहले खत्म होती हैं।</p>
<p>भारत पहले ही झेल रहा है — 45 वर्षों में सबसे अधिक बेरोज़गारी, युवाओं में रिकॉर्ड-स्तरीय जॉब क्राइसिस है, और अब भाजपा सरकार एक ऐसी डील कर रही है — जो रोज़गार संकट को और गहरा करेगी।</p>
<p><strong>पारदर्शिता का अभाव: भाजपा देश से सच क्यों छुपा रही है?</strong><br />ट्रेड डील का पूरा मसौदा सार्वजनिक नहीं, संसद में व्यापक चर्चा नहीं, किसानों, MSME और ट्रेड यूनियनों से कोई परामर्श नहीं। यह लोकतंत्र नहीं — यह कॉर्पोरेट दबाव में बनाई गई नीति है।</p>
<p>यदि यह डील भारत के हित में है — तो सरकार डर क्यों रही है इसे सार्वजनिक करने से?</p>
<p><strong>भाजपा की नीति बनाम कांग्रेस की सोच</strong></p>
<p><strong>भाजपा का मॉडल:</strong><br />विदेशी कॉर्पोरेट को प्राथमिकता, घरेलू उद्योगों की उपेक्षा, किसानों की अनदेखी, प्रचार आधारित राष्ट्रवाद।</p>
<p><strong>कांग्रेस का दृष्टिकोण:</strong><br />किसान-केंद्रित व्यापार नीति, MSME और घरेलू उद्योग की सुरक्षा, संतुलित वैश्विक व्यापार, रोजगार और सामाजिक न्याय पर प्राथमिकता।</p>
<p>कांग्रेस मानती है कि — व्यापार राष्ट्रीय हित के लिए होना चाहिए, विदेशी दबाव के लिए नहीं।</p>
<p>यह डील ‘विकसित भारत’ नहीं — आर्थिक उपनिवेशवाद है।</p>
<p>यदि — किसान घाटे में जाए, छोटे उद्योग बंद हों, रोज़गार घटे, विदेशी कंपनियाँ भारतीय बाज़ार पर कब्ज़ा करें — तो यह विकास नहीं, यह 21वीं सदी का आर्थिक उपनिवेशवाद होगा।</p>
<p><strong>अंतिम निष्कर्ष: भाजपा जवाब दे — देश चुप नहीं बैठेगा</strong></p>
<p>भारत–अमेरिका ट्रेड डील राष्ट्रीय गर्व का नहीं, राष्ट्रीय चिंता का विषय है।</p>
<p>देश को जानने का अधिकार है —<br />क्या किसान सुरक्षित हैं?<br />क्या MSME सुरक्षित हैं?<br />क्या रोज़गार सुरक्षित हैं?<br />और क्या यह समझौता भारत को मजबूत करेगा या निर्भर?</p>
<p>यदि भाजपा सरकार जवाब नहीं देगी — तो इतिहास इस डील को किसानों, युवाओं और घरेलू उद्योग के साथ सबसे बड़ा आर्थिक धोखा मानेगा।</p>
<p>कांग्रेस इस अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाती रहेगी — क्योंकि भारत बिकने के लिए नहीं, बनाने के लिए है।</p>
<p><strong><img src="https://samridhjharkhand.com/media/2026-02/92ef12b5-44dc-4c7f-9800-26f54d07d656.jpg" alt="92ef12b5-44dc-4c7f-9800-26f54d07d656" width="121" height="182"></img></strong></p>
<p><strong>लेखक: विजय शंकर नायक</strong><br /><strong>वरिष्ठ कांग्रेस नेता</strong></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Feb 2026 17:07:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Opinion : 20 साल बाद मायावती का दलित-ब्राह्मण-मुस्लिम फार्मूला फिर सक्रिय</title>
                                    <description><![CDATA[मायावती एक बार फिर 2007 के दलित-ब्राह्मण-मुस्लिम सोशल इंजीनियरिंग फार्मूले को 2027 विधानसभा चुनाव के लिए सक्रिय कर रही हैं। ब्राह्मण नेताओं की बसपा में एंट्री और मुस्लिम वोटों का झुकाव इस रणनीति का संकेत है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/mayawatis-dalit-brahmin-muslim-formula-active-again-after-20-years/article-17931"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/bef1f54e-2539-4d7a-942b-b057c5be74ce_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी करीब 15 सालों से सत्ता से बाहर है। 2007 से 2012 तक सत्ता में रही बसपा को पिछले तीन विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है। इस दौरान तीन लोकसभा चुनाव में भी बसपा का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। इसके बाद से बसपा सुप्रीमो मायावती के बारे में यह धारणा आम तौर पर बनने लगी कि बसपा सुप्रीमो मायावती का कालखंड खत्म हो चुका है।</p>
<p>ऐसा इस लिये भी कहा जा रहा था क्योंकि मायावती ने चुनाव प्रचार से भी काफी हद तक किनारा कर लिया था।बात अंतिम बार 2007 में विधानसभा चुनाव जीती बसपा की उस समय की चुनावी रणनीति की की जाये तो 2007 का चुनाव मायावती सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले से जीती थी। 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की अप्रत्याशित जीत ने राजनीतिक इतिहास रच दिया।</p>
<p>2007 में मायावती ने सामाजिक समीकरण साधकर 403 सीटों में से 206 सीटों पर कब्जा जमाया और कुल 30.43 प्रतिशत वोट हासिल किए। बसपा सुप्रीमो की यह जीत दलितों के परंपरागत वोट बैंक के अलावा ब्राह्मणों और कुछ गैर-यादव पिछड़ी जातियों तथा मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन से संभव हुई थी। यह और बात है कि इसके बाद मायावती का यह फार्मूला दोबारा परवान नहीं चढ़ पाया।</p>
<p>बहरहाल, अबकी करीब 20 सालों के बाद एक बार फिर 2027 के विधानसभा चुनाव के लिये बसपा के पक्ष में दलितों के साथ ब्राह्मणों एवं मुसलमानों के वोटों की गोलबंदी देखी जा रही है। ब्राह्मणों और मुसलमानों के एक बार फिर बसपा की तरफ रुख करने की वजह में जाया जाए तो ऐसा लगता है कि योगी राज में ब्राह्मणों को लग रहा है कि उनके साथ यह सरकार नाइंसाफी कर रही है।</p>
<p>नौकरशाही से लेकर सरकार तक में महत्वपूर्ण पदों से ब्राह्मणों को दूर रखा गया है। यही वजह है कि पिछले कुछ समय में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में ब्राह्मण नेताओं का प्रवेश अधिक देखा गया है।जनवरी 2026 में अंबेडकर नगर से भाजपा के दिग्गज नेता राधेश्याम पांडे 51-100 ब्राह्मण समर्थकों के साथ बसपा में शामिल हुए।</p>
<p>उन्होंने मायावती से मुलाकात कर पार्टी जॉइन की। दिसंबर 2025 में ब्राह्मण समाज के बड़े नेता जैसे जितेंद्र मिश्रा, दीपक द्विवेदी, नीरज पांडे, विशाल मिश्रा, वैभव दुबे, अनुराग शुक्ला, मोहित शर्मा भाजपा से बसपा में शामिल हुए। यह 2027 चुनाव से पहले भाजपा को झटका था। जनवरी 2026 में एक अन्य बड़े ब्राह्मण नेता ने मायावती से मुलाकात कर बसपा जॉइन की।</p>
<p>वहीं मुसलमान इसलिये बसपा की तरफ फिर से मुड़ता दिख रहा है क्योंकि उसे लगने लगा है कि समाजवादी पार्टी मुसलमानों से वोट तो लेती है, लेकिन उनका (मुसलमानों का) हक उन्हें नहीं दिया जाता है। इसी तरह से मुसीबत के समय भी अखिलेश मुसलमानों से दूरी बना लेते हैं। पार्टी के दिग्गज नेता आजम खान को अकेला छोड़ देना इसकी सबसे बड़ी मिसाल बताते हैं।</p>
<p>बाहुबली अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी की भी मौत के लिये मुस्लिम समाज कहीं न कहीं अखिलेश यादव को जिम्मेदार मानते हैं। उन्हें लगता है कि विधानसभा सत्र के दौरान अखिलेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अतीक और मुख्तार को लेकर उकसाया नहीं होता तो आज वह जिंदा होते।</p>
<p>दलित वोटरों ने बसपा को पूर्ण समर्थन दिया। जाटव समुदाय के 86 प्रतिशत मतदाताओं ने मायावती को चुना, जबकि वाल्मीकि जाति के 71 प्रतिशत ने पार्टी को तरजीह दी। पासी समुदाय से 53 प्रतिशत और अन्य अनुसूचित जातियों से 58 प्रतिशत वोट बसपा के खाते में आए।</p>
<p>इन दलित उपजातियों की मजबूत पकड़ ने पार्टी को आधार प्रदान किया, क्योंकि दलित उत्तर प्रदेश की आबादी में करीब 21 प्रतिशत हैं। ऊपरी जातियों में ब्राह्मणों का 16 प्रतिशत समर्थन मिला, जो निर्णायक साबित हुआ। बसपा ने 51 ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे, जिनमें से 20 जीते, लेकिन यह जीत मुख्यतः निचली जातियों के वोटों से आई। ठाकुरों और अन्य ऊपरी जातियों ने भी सीमित लेकिन महत्वपूर्ण योगदान दिया।</p>
<p>पिछड़ी जातियों ने भी बसपा की ओर रुख किया। गैर-यादव और गैर-कुर्मी अन्य पिछड़ा वर्ग के 30 प्रतिशत मतदाताओं ने पार्टी चुनी। कुल पिछड़ा वर्ग के कई खंडों से वोट उमड़े, जिसने सामाजिक समीकरण को मजबूत बनाया। बसपा ने 110 पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवार मैदान में उतारे।</p>
<p>यह समर्थन समाजवादी पार्टी और अन्य दलों से छिटके वोटरों का परिणाम था, जो विकास और सुशासन के वादों से प्रभावित हुए।मुस्लिम मतदाताओं का योगदान सबसे चमत्कारिक रहा। 2007 में बसपा को कुल वोटों में मुस्लिम वोट 10 प्रतिशत से अधिक थे। एक सर्वे के अनुसार 17 प्रतिशत मुस्लिमों ने पार्टी को समर्थन दिया।</p>
<p>पार्टी ने 61 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे, जिनमें से 29 विधायक बने। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी 19 प्रतिशत होने के बावजूद यह समर्थन बहुमत के लिए जरूरी साबित हुआ। समाजवादी पार्टी से नाराज मुस्लिमों ने बसपा को मौका दिया, क्योंकि मायावती ने अल्पसंख्यक कल्याण के वादे किए।</p>
<p>मायावती की रणनीति ने जातिगत बंधनों को तोड़ा। दलित-ब्राह्मण गठजोड़ की बात भले ही प्रचारित हुई, लेकिन वास्तव में जाटव, वाल्मीकि, पासी जैसे दलितों के साथ अन्य अनुसूचित जातियां, पिछड़े वर्ग के 30 प्रतिशत, ब्राह्मणों के 16 प्रतिशत और मुस्लिमों के 17 प्रतिशत वोटों ने चमत्कार रचा।</p>
<p>बसपा का वोट प्रतिशत 2002 के 23 से बढ़कर 30 हो गया। पार्टी ने प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलनों से ऊपरी जातियों को लुभाया, जबकि मुस्लिम बहुल सीटों पर मजबूत प्रदर्शन किया। यह जीत सामाजिक न्याय की मिसाल बनी।मायावती ने सत्ता में आकर अपराध पर अंकुश लगाया और विकास कार्य तेज किए।</p>
<p>लेकिन जातिगत समीकरण की बारीकी ने राजनीति को नया आयाम दिया। दलितों का कोर वोट 80-86 प्रतिशत तक रहा, ऊपरी जातियों से 16-20 उम्मीदवार जीते, पिछड़ों से 30 प्रतिशत समर्थन और मुस्लिमों के 17 प्रतिशत ने पूर्ण बहुमत सुनिश्चित किया।</p>
<p>बसपा सुप्रीमो मायावती किस तरह से पंडित कार्ड खेल रही हैं, इसका ताजा उदाहरण यह बताता है कि उनका ब्राह्मणों के प्रति झुकाव बढ़ता जा रहा है। मायावती ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नये नियमों को लेकर सवर्णों, विशेषकर ब्राह्मणों की नाराजगी के बाद से चल रही राजनीति पर और इसके बाद बॉलीवुड फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ के खिलाफ ब्राह्मणों के पक्ष में बयान देने में देरी नहीं की।</p>
<p>इससे पहले यूजीसी के नये नियम पर संयमित प्रतिक्रिया देते हुए मायावती ने कहा था कि इस नये कानून से किसी को बिना वजह प्रताड़ित नहीं किया जाये। देश भर में ‘घूसखोर पंडित’ फिल्म के विरोध के बीच बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर ब्राह्मण कार्ड खेल दिया है।</p>
<p>वहीं यूजीसी प्रकरण में असहज हुई भाजपा भी अब फिल्म के मुद्दे पर ब्राह्मणों को साधने की कोशिश में है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने फिल्म पर एफआईआर के निर्देश देकर इस वर्ग के साथ का संदेश दिया।</p>
<p>बसपा प्रमुख ने इस मामले में शुक्रवार 06 फरवरी को एक्स पर लिखा, ‘यह बड़े दुख व चिंता की बात है कि पिछले कुछ समय से अकेले यूपी में ही नहीं, बल्कि अब तो फिल्मों में भी ‘पंडित’ को घुसपैठिया बताकर पूरे देश में जो इनका अपमान व अनादर किया जा रहा है, जिससे समूचे ब्राह्मण समाज में इस समय जबरदस्त रोष व्याप्त है। इसकी हमारी पार्टी भी कड़े शब्दों में निंदा करती है।</p>
<p>इस जातिसूचक फिल्म पर केंद्र सरकार को तुरंत प्रतिबंध लगाना चाहिए, यह बसपा की मांग है।’वर्ष 2007 में बसपा ने ब्राह्मणों के साथ सोशल इंजीनियरिंग का दांव चला था और बहुमत की सरकार बनाई थी। इस बार भी बसपा उसी फार्मूले पर चुनावी तैयारी में जुटी है और पार्टी प्रमुख के एक्स पोस्ट को उसी रणनीति को आगे बढ़ाने का संकेत माना जा रहा है।</p>
<p><strong>अजय कुमार,                                </strong><br /><strong>वरिष्ठ पत्रकार</strong><br /><strong>लखनऊ ( उ. प्र.)</strong><br /><strong>मो-9335566111</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 07 Feb 2026 18:36:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Susmita Rani]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Opinion : भारतीय लोकतंत्र में मुस्लिम नेतृत्व: नीति, संगठन और सामाजिक न्याय में योगदान की गहन समीक्षा</title>
                                    <description><![CDATA[यह लेख भारतीय राजनीति में मुस्लिम नेताओं की विविध भूमिका और प्रभाव को उजागर करता है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर समकालीन राजनीति तक, ये नेता नीति, संगठन और सामाजिक न्याय में महत्वपूर्ण योगदान देते आए हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-an-in-depth-review-of-the-contribution-of-muslim-leadership/article-17905"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/3ccb2867-6d79-40a1-9ac1-40ce0a9a0be1_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>भारतीय लोकतंत्र की मूल शक्ति उसकी विविधता, विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों, विचारधाराओं और समूहों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की संरचना में निहित है, जहाँ विभिन्न पृष्ठभूमियों से आए नेता लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आकार देते हैं।</p>
<p>इस व्यापक राजनीतिक परिदृश्य में मुस्लिम समुदाय का योगदान केवल संख्यात्मक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि नीति-निर्माण, संगठनात्मक राजनीति, विदेश नीति, सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय संतुलन जैसे क्षेत्रों में भी उसकी निरंतर और प्रभावशाली भूमिका रही है।</p>
<p>स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर समकालीन राजनीति तक, मुस्लिम नेताओं ने अलग-अलग वैचारिक धाराओं और राजनीतिक दलों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। बेशक इन नेताओं की राजनीतिक यात्राएँ एक-दूसरे से भिन्न रही हैं, जहां कुछ ने प्रशासनिक और संवैधानिक भूमिकाओं में योगदान दिया, वहीं कुछ ने संगठनात्मक रणनीति के माध्यम से शक्ति अर्जित की, जबकि कुछ ने स्पष्ट और मुखर राजनीतिक विमर्श के जरिए अपना जनाधार बनाया।</p>
<p>यह विविधता भारतीय राजनीति की जटिलता और समावेशिता दोनों को रेखांकित करती है। इस लेख के माध्यम से मैं ऐसे ही कुछ मुस्लिम नेताओं के राजनीतिक योगदान और प्रभाव का जिक्र करने जा रहा हूँ, जिन्होंने अलग-अलग कालखंडों, दलों और भूमिकाओं में राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित किया।</p>
<p>सलमान खुर्शीद उन नेताओं में गिने जाते हैं जिनकी पहचान अकादमिक पृष्ठभूमि और संसदीय शालीनता से जुड़ी रही है। कानून, विदेश और अल्पसंख्यक मामलों जैसे मंत्रालयों में उनकी भूमिका नीतिगत निरंतरता और संस्थागत संतुलन का उदाहरण रही। विदेश मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल भारत की वैश्विक छवि के प्रबंधन के संदर्भ में उल्लेखनीय रहा।</p>
<p>वे उस राजनीतिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं जहाँ वैचारिक स्पष्टता और संवाद की संस्कृति को प्राथमिकता दी जाती है। सैयद शाहनवाज़ हुसैन भारतीय जनता पार्टी में उन शुरुआती मुस्लिम नेताओं में शामिल रहे हैं जिन्होंने पार्टी के सामाजिक और राजनीतिक विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।</p>
<p>अपेक्षाकृत कम उम्र में राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश करने वाले शाहनवाज़ हुसैन ने केंद्र सरकार में नागरिक उड्डयन और खाद्य प्रसंस्करण जैसे मंत्रालयों में राज्य मंत्री के रूप में कार्य किया। उनका राजनीतिक सफर संगठनात्मक निष्ठा, पार्टी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता और संवाद आधारित राजनीति का उदाहरण रहा है।</p>
<p>बिहार की राजनीति में भी उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही, जहाँ उन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय और व्यापक सामाजिक समूहों के बीच संतुलन साधने का महत्वपूर्ण प्रयास किया। वे उस दौर के प्रतिनिधि रहे हैं जब भाजपा मुस्लिम नेतृत्व को अपनी मुख्यधारा की राजनीति में स्थान देने की कोशिश कर रही थी।</p>
<p> मुख्तार अब्बास नक़वी भारतीय जनता पार्टी में मुस्लिम नेतृत्व का एक प्रमुख चेहरा रहे हैं। संसदीय कार्य, अल्पसंख्यक मामलों और कौशल विकास जैसे मंत्रालयों में उनके कार्यकाल के दौरान कई नीतिगत फैसले लिए गए, जिन पर व्यापक बहस भी हुई। वे उस राजनीतिक धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं जो वैचारिक प्रतिबद्धता और संगठनात्मक अनुशासन को प्राथमिकता देती है।</p>
<p>असदुद्दीन ओवैसी समकालीन राजनीति में सबसे मुखर मुस्लिम नेताओं में गिने जाते हैं। संसद में उनके हस्तक्षेप संवैधानिक अधिकारों, सामाजिक न्याय और अल्पसंख्यक मुद्दों पर केंद्रित रहे हैं। उनकी राजनीतिक शैली स्पष्ट, तर्कप्रधान और कई बार टकरावपूर्ण रही है। ओवैसी ने क्षेत्रीय आधार से राष्ट्रीय विमर्श तक अपनी उपस्थिति को विस्तार दिया है, जो बदलती चुनावी राजनीति की एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति को दर्शाता है।</p>
<p>तारिक अनवर कांग्रेस के उन नेताओं में शामिल हैं जिन्होंने संगठनात्मक राजनीति और संसदीय कार्य दोनों में लंबा अनुभव अर्जित किया है। उनका राजनीतिक योगदान मुख्यतः पार्टी संगठन को मजबूत करने और जमीनी स्तर पर संपर्क बनाए रखने से जुड़ा रहा है। वे एक सफल सांसद होने के साथ-साथ निरंतरता और संगठनात्मक स्थायित्व के प्रतिनिधि माने जाते हैं।</p>
<p>फ़ारूक़ अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक निर्णायक भूमिका निभाने वाले नेता रहे हैं। उनका राजनीतिक जीवन क्षेत्रीय आकांक्षाओं, संघीय ढांचे और राष्ट्रीय राजनीति के बीच संतुलन साधने का प्रयास रहा है। कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में उनकी भूमिका भारतीय राजनीति के जटिल आयामों को समझने में मदद करती है।</p>
<p>मोहसिना किदवई का योगदान मुख्यतः संसदीय राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित रहा है। अल्पसंख्यक अधिकारों और महिला प्रतिनिधित्व से जुड़े विषयों पर उनकी सक्रियता उन्हें कांग्रेस के भीतर एक सम्मानित स्थान दिलाती है। वे उस पीढ़ी की नेता हैं जिन्होंने अपेक्षाकृत शांत लेकिन निरंतर राजनीतिक भूमिका निभाई है।</p>
<p> अहमद पटेल भारतीय राजनीति के उन रणनीतिकारों में थे जिनकी भूमिका सार्वजनिक मंच से अधिक संगठन के भीतर प्रभावशाली रही। चुनावी रणनीति, गठबंधन प्रबंधन और संकट काल में निर्णय लेने की उनकी क्षमता ने कांग्रेस को कई बार राजनीतिक संतुलन बनाए रखने में मदद की।</p>
<p>उनका योगदान इस बात का उदाहरण है कि सत्ता और प्रभाव हमेशा सार्वजनिक पदों से ही नहीं आते। ग़ुलाम नबी आज़ाद का राजनीतिक अनुभव प्रशासनिक और संगठनात्मक दोनों स्तरों पर रहा है। मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल ने उन्हें एक अनुभवी प्रशासक की पहचान दी।</p>
<p>वे संवाद और सहमति आधारित राजनीति के समर्थक माने जाते हैं, जिन्हे पक्ष-विपक्ष, दोनों से ही बराबर सम्मान मिलता है। नजमा हेपतुल्ला भाजपा की उन महिला नेताओं में शामिल हैं जिन्होंने संसदीय संस्थाओं और मंत्रालयों में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं। अल्पसंख्यक मामलों और महिला सशक्तिकरण से जुड़े विषयों पर उनका कार्य भारतीय राजनीति में महिला नेतृत्व के विस्तार को दर्शाता है।</p>
<p>उन्होंने मणिपुर राज्य के राज्यपाल की भूमिका भी निभाई है। इन नेताओं का राजनीतिक सफर यह स्पष्ट करता है कि भारतीय राजनीति में मुस्लिम नेतृत्व किसी एक विचारधारा या रणनीति तक सीमित नहीं है। यह नेतृत्व कहीं संस्थागत और शांत, कहीं मुखर और वैचारिक, तो कहीं रणनीतिक और संगठनात्मक रूप में विविध रहा है।</p>
<p>इनकी भूमिका यह समझने में सहायक है कि लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व केवल पहचान का प्रश्न नहीं, बल्कि नीति, संवाद और राष्ट्रीय हित के साथ संतुलन साधने की प्रक्रिया है। भारतीय राजनीति की इस बहुमूल्य संरचना को मजबूत बनाए रखने में ऐसे नेताओं की उपस्थिति और योगदान आगे भी महत्वपूर्ण बना रहेगा क्योंकि लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती विविध आवाज़ों के सहअस्तित्व से ही सुनिश्चित होती है।</p>
<p><strong>डॉ. अतुल मलिकराम (राजनीतिक रणनीतिकार)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 07 Feb 2026 13:00:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Susmita Rani]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Opinion : संभल की सियासत में बर्क और नवाब की जंग से अखिलेश यादव की बढ़ी टेंशन</title>
                                    <description><![CDATA[संभल विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के भीतर बर्क और नवाब परिवार के बीच राजनीतिक टकराव खुलकर सामने आ गया है। मौलाना ममलूकुर्रहमान बर्क के चुनाव लड़ने के ऐलान से अखिलेश यादव की मुश्किलें बढ़ गई हैं। मुस्लिम वोट बैंक और पार्टी एकजुटता पर संकट गहराता दिख रहा है। इस टकराव का फायदा भाजपा और बसपा को मिल सकता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/akhilesh-yadavs-tension-increased-due-to-war-between-burke-and/article-17885"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/susmit_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अभी एक साल दूर हैं, लेकिन संभल की सियासत में हलचल अभी से तेज हो चुकी है। बीते कुछ महीनों में सांप्रदायिक हिंसा और प्रशासनिक सख्ती के बाद संभल जैसे संवेदनशील इलाके में राजनीति थोड़ी संभलती दिखी ही थी कि अब समाजवादी पार्टी के भीतर ही सत्ता और वर्चस्व की जंग खुलकर सामने आ गई है।</p>
<p>सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क के पिता मौलाना ममलूकुर्रहमान बर्क ने 2027 का विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। उनका सीधा निशाना मौजूदा विधायक नवाब इकबाल महमूद हैं, जो लगातार सात बार से संभल सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इस ऐलान ने न सिर्फ स्थानीय राजनीति को गर्माया है, बल्कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव की मुश्किलें भी बढ़ा दी हैं।</p>
<p>संभल विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश की उन गिनी-चुनी सीटों में है, जहां समाजवादी पार्टी की जड़ें बेहद गहरी रही हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, 2012 से लेकर 2022 तक हुए तीन विधानसभा चुनावों में यह सीट लगातार सपा के खाते में रही है। नवाब इकबाल महमूद ने 1993 से लेकर अब तक सात बार जीत दर्ज की है, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है।</p>
<p>2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने करीब 52 प्रतिशत वोट हासिल किए थे, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी भाजपा प्रत्याशी को लगभग 39 प्रतिशत वोट मिले थे। यह अंतर बताता है कि संभल में नवाब की राजनीतिक पकड़ कितनी मजबूत रही है। दूसरी ओर, लोकसभा स्तर पर बर्क परिवार का दबदबा रहा है। शफीकुर्रहमान बर्क कई बार सांसद रहे और उनके निधन के बाद जियाउर्रहमान बर्क ने 2024 के लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज कर यह विरासत आगे बढ़ाई।</p>
<p>अब ममलूकुर्रहमान बर्क के मैदान में उतरने के ऐलान ने दशकों पुरानी सियासी संतुलन की व्यवस्था को चुनौती दे दी है। अब तक सपा के भीतर एक अनकहा फॉर्मूला चलता रहा था विधानसभा नवाब परिवार के पास और लोकसभा बर्क परिवार के खाते में। लेकिन जियाउर्रहमान के सांसद बनने के बाद बर्क परिवार की महत्वाकांक्षा और बढ़ गई है। ममलूकुर्रहमान का दावा है कि संभल की जनता बदलाव चाहती है और मौजूदा विधायक से नाराज है।</p>
<p>उनका तर्क है कि सिर्फ पुरानी जीतों के आधार पर टिकट नहीं मिलना चाहिए, बल्कि जनता के बीच सक्रियता और मुद्दों पर संघर्ष को भी देखा जाना चाहिए।संभल की जनसांख्यिकी इस लड़ाई को और दिलचस्प बनाती है। 2011 की जनगणना और बाद के चुनावी अनुमानों के अनुसार, इस सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब 55 से 60 प्रतिशत के बीच मानी जाती है। इसके अलावा दलित और पिछड़े वर्ग के वोट भी निर्णायक भूमिका में रहते हैं।</p>
<p>समाजवादी पार्टी की रणनीति लंबे समय से एम-वाई, यानी मुस्लिम-यादव समीकरण पर टिकी रही है। ऐसे में संभल जैसी सीट सपा के लिए बेहद अहम है, जहां आपसी कलह का सीधा फायदा विपक्ष को मिल सकता है। 2022 के चुनाव में भले ही सपा जीती हो, लेकिन भाजपा ने अपना वोट शेयर पिछले चुनाव के मुकाबले लगभग 6 प्रतिशत तक बढ़ाया था, जो खतरे की घंटी मानी जाती है।</p>
<p>नवाब इकबाल महमूद अब अपने बेटे सुहेल इकबाल को सियासी उत्तराधिकारी के तौर पर आगे बढ़ाने की तैयारी में हैं। यह कदम भी पार्टी के भीतर असंतोष की वजह बन रहा है। ममलूकुर्रहमान बर्क ने बिना नाम लिए तंज कसते हुए कहा है कि टिकट किसी के बेटे होने के आधार पर नहीं, बल्कि जनता के भरोसे पर मिलना चाहिए। यह बयान सीधे तौर पर नवाब परिवार की वंशवादी राजनीति पर सवाल खड़ा करता है।</p>
<p>दूसरी ओर, नवाब खेमा यह संकेत दे रहा है कि पार्टी अनुशासन सर्वोपरि है और अंतिम फैसला अखिलेश यादव को ही करना है। उन्होंने यह भी पूछा है कि अगर पार्टी किसी और को टिकट देती है, तो क्या ममलूकुर्रहमान बर्क पूरी निष्ठा से चुनाव लड़ाएंगे। यह सियासी टकराव सिर्फ एक सीट तक सीमित नहीं है। संभल में बर्क और नवाब, दोनों परिवारों का प्रभाव आसपास की सीटों असमौली, गुन्नौर और चंदौसी तक फैला हुआ है।</p>
<p>स्थानीय राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, अगर यह विवाद खुली बगावत में बदलता है तो इसका असर कम से कम तीन से चार विधानसभा क्षेत्रों में सपा के वोट बैंक पर पड़ सकता है। 2017 के चुनाव में पार्टी को आंतरिक कलह का खामियाजा भुगतना पड़ा था, जब कई सीटों पर बागी उम्मीदवारों ने नुकसान पहुंचाया था। अखिलेश यादव इस अनुभव को दोहराना नहीं चाहेंगे।</p>
<p>संभल में हालिया हिंसा के बाद जियाउर्रहमान बर्क एक मुखर नेता के रूप में उभरे हैं। उन्होंने संसद से लेकर सड़क तक अल्पसंख्यक मुद्दों को उठाया, जिससे उन्हें युवाओं और खासकर मुस्लिम मतदाताओं के बीच नई पहचान मिली है। पार्टी के अंदर उन्हें सपा की मुस्लिम राजनीति के उभरते चेहरे के रूप में देखा जा रहा है। वहीं, नवाब इकबाल महमूद का कद एक अनुभवी नेता का है, जो मुलायम सिंह यादव की सरकार में मंत्री रह चुके हैं और संगठन में गहरी पकड़ रखते हैं।</p>
<p>यही वजह है कि अखिलेश यादव के लिए किसी एक पक्ष को नाराज करना आसान फैसला नहीं है। आंकड़े साफ इशारा करते हैं कि संभल में सपा की जीत का अंतर धीरे-धीरे घट रहा है। 2012 में जहां पार्टी ने लगभग 18 प्रतिशत के बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी, वहीं 2022 में यह अंतर सिमटकर करीब 13 प्रतिशत रह गया। अगर पार्टी के भीतर फूट पड़ती है तो यह अंतर और कम हो सकता है।</p>
<p>भाजपा और बसपा दोनों ही इस मौके की ताक में हैं। भाजपा पहले ही पश्चिमी यूपी में सामाजिक इंजीनियरिंग के जरिए गैर-यादव ओबीसी और दलित वोटरों को साधने की कोशिश कर रही है, जबकि बसपा को मुस्लिम वोटों में सेंध लगाने का मौका मिल सकता है। अब सवाल यही है कि अखिलेश यादव इस उलझन को कैसे सुलझाते हैं।</p>
<p>एक रास्ता यह हो सकता है कि वह दोनों परिवारों के बीच कोई समझौता कराएं, जैसे संगठन में एक को बड़ी जिम्मेदारी और टिकट दूसरे को। दूसरा विकल्प सर्वे के आधार पर टिकट देने का है, ताकि फैसला तथ्यों और आंकड़ों के सहारे लिया जा सके। लेकिन जिस तरह बयानबाजी तेज हो चुकी है, उससे मामला आसान नहीं दिखता।</p>
<p>संभल की सियासत एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ी है, जहां एक गलत कदम पूरी रणनीति पर भारी पड़ सकता है। 2027 का चुनाव भले ही दूर हो, लेकिन संभल ने अभी से अखिलेश यादव की सियासी परीक्षा लेना शुरू कर दिया है।</p>
<p><strong>संजय सक्सेना,लखनऊ</strong><br /><strong>वरिष्ठ पत्रकार</strong><br /><strong>skslko28@gmail.com</strong><br /><strong>9454105568, 8299050585</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 06 Feb 2026 17:24:23 +0530</pubDate>
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