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                <title>ओपिनियन - Samridh Jharkhand</title>
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                <title>Opinion: सनातन और हिन्दुओं की आस्था से खिलवाड़ का खतरनाक सिलसिला</title>
                                    <description><![CDATA[वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार के इस विचार लेख में राम मंदिर दानपात्र विवाद, संसद परिसर में हुए विरोध प्रदर्शन और सनातन पर हो रही राजनीतिक बहस का विश्लेषण किया गया है। लेखक का दावा है कि कुछ राजनीतिक घटनाक्रमों के जरिए हिंदू आस्था और संत परंपरा को निशाना बनाया जा रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-sanatan-dharma-ram-mandir-politics-parliament/article-24965"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-08/2252c034-fe05-4685-b793-7cef45c198bd_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>बात 28 मई 1996 की है। लोकसभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अपनी सरकार के लिए विश्वास मत हासिल करने के दौरान संसद में भाषण दे रहे थे। इसी भाषण में उन्होंने कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को राम मंदिर/अयोध्या मुद्दे पर चेताया था कि आपको बीजेपी से लड़ना है, राम से मत लड़िए। उसी दौरान पीछे बैठे किसी सांसद की तरफ से आवाज आई कि 'राम से लड़ोगे तो निपट जाओगे।' जैसी टिप्पणी का उल्लेख भी वायरल रूप में मिलता है, लेकिन यह शब्द कहने वाले का चेहरा सामने नहीं आया। परंतु हकीकत यही रही कि कांग्रेस प्रभु श्री राम से लड़ते-लड़ते अपने सबसे बुरे दौर में पहुंच गई है। कांग्रेस ने कभी राम के अस्तित्व को नकारा तो कभी राम सेतु के बारे में गलत बयानी की। यहां तक कि कांग्रेस के नेता और प्रधानमंत्री अयोध्या जाने तक से कतराते थे। अयोध्या जाते भी तो प्रभु श्री राम के दर्शन नहीं करते थे। यही क्रम आज भी चल रहा है। रामलला के मंदिर में चंदा चोरी की घटना के नाम पर आज भी कांग्रेस ऐसा ही कर रही है। चंदा चोरी के बहाने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने सनातन और हिन्दुओं की आस्था को तार-तार करने की सभी हदें पार कर ली हैं।अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित किए जाने वाले चढ़ावे और दानपात्र से हुई कथित गड़बड़ी का मुद्दा इस समय देश की राजनीति के केंद्र में है। जहां एक तरफ अयोध्या में ट्रस्ट और पुलिस प्रशासन इस पूरे मामले की गहन जांच में जुटा है और विशेष जांच टीम गठित कर संदिग्ध कर्मचारियों व सेवादारों की भूमिका खंगाल रही है, वहीं दूसरी ओर सनातन प्रेमी जनता और साधु-संतों में इस बात को लेकर भारी रोष है कि जांच के निष्कर्षों की प्रतीक्षा किए बिना संपूर्ण साधु समाज और सनातन परंपरा को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। अयोध्या के सम्मानित संतों का स्पष्ट कहना है कि किसी भी मंदिर परिसर में यदि कोई आपराधिक तत्व या कर्मचारी गलत कार्य में लिप्त पाया जाता है, तो उसे कठोरतम दंड मिलना चाहिए, लेकिन उस बहाने भारत की हजारों वर्ष पुरानी साधु-संत परंपरा और भगवा वस्त्रों का राजनीतिक तमाशा बनाना सर्वथा अनुचित है।</p>
<p>संसद के मानसून सत्र के दौरान जिस प्रकार का दृश्य देखने को मिला, उसने पूरे देश के सनातन प्रेमी समाज को स्तब्ध और आक्रोशित कर दिया है। संसद परिसर के मकर द्वार पर पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव को भगवा वस्त्र पहनाकर, माथे पर तिलक लगाकर और हाथ में दानपात्र थमाकर एक साधु की वेशभूषा में बैठाया गया। इसके बाद विपक्ष के नेताओं द्वारा एक पूर्वनियोजित नाटक (स्किट) मंचित किया गया, जिसमें तथाकथित साधु रूपी सांसद को दानपेटी में आए पैसों को अपनी जेब में डालते और फिर दानपात्र लेकर भागते हुए दिखाया गया। इस पूरे राजनीतिक नाटक में कांग्रेस नेता राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव, सपा के अयोध्या (फैजाबाद) से सांसद अवधेश प्रसाद समेत 'इंडिया' गठबंधन के कई प्रमुख नेताओं और कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। राहुल गांधी ने उस नाटक में बाकायदा दान देने का अभिनय किया, जिसके बाद अखिलेश यादव की पार्टी के नेताओं और अन्य विपक्षी सहयोगियों ने इस पूरे घटनाक्रम का आनंद लेते हुए नारेबाजी की।इस पूरे प्रकरण पर जब समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट कर इस प्रदर्शन का समर्थन किया, तो देश भर के अखाड़ों, विद्वानों और नागरिकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। जनमानस का मानना है कि लोकतंत्र में विरोध दर्ज कराने के अनेक संवैधानिक और मर्यादित तरीके मौजूद हैं। परंतु भारत के सर्वोच्च विधायी सदन, संसद भवन के परिसर का उपयोग इस प्रकार के निम्नस्तरीय नाटकों और भगवाधारी संतों की छवि को 'चोर' के रूप में चित्रित करने के लिए करना संसदीय मर्यादाओं का चीरहरण है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी सदन और उसके परिसर में इस प्रकार वेश बदलकर नौटंकी करने पर अपनी सख्त नाराजगी जताई और स्पष्ट शब्दों में कहा कि संसद भवन देश के नीतिगत मुद्दों और जनसमस्याओं पर चर्चा के लिए है, न कि इस तरह के तमाशों के लिए। कानूनी विशेषज्ञों और संतों का मानना है कि धार्मिक प्रतीकों, भगवा वस्त्रों और साधु वेश का सार्वजनिक अपमान कर करोड़ों सनातनियों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इस कृत्य पर सर्वोच्च अदालत को स्वयं संज्ञान लेते हुए कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी भी राजनीतिक लाभ के लिए देश की आस्था का ऐसा उपहास न उड़ाया जा सके।</p>
<p>सनातन धर्म और उसकी परंपराओं को कटघरे में खड़ा करने या उनके खिलाफ रणनीतिक बयानबाजी करने का विपक्ष का यह कोई पहला प्रयास नहीं है। इतिहास साक्षी है कि पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक लाभ साधने के लिए कई बार ऐसी बयानबाजियां की गईं, जिनसे बहुसंख्यक समाज की आस्था को ठेस पहुंची। 'भगवा आतंकवाद' जैसा भ्रामक शब्द गढ़ने से लेकर स्वामी प्रसाद मौर्य द्वारा श्रीरामचरितमानस की चौपाइयों पर विवादित टिप्पणियां करने और उसकी प्रतियों को जलाने तक का घटनाक्रम देश ने देखा है। तमिलनाडु में डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन द्वारा सनातन धर्म की तुलना 'मलेरिया, डेंगू और कोरोना' से करते हुए इसे मिटाने का आह्वान करना और उस पर कांग्रेस व अन्य विपक्षी सहयोगियों की चुप्पी या अप्रत्यक्ष समर्थन, सनातन के प्रति उनकी सोच को उजागर करता है। कभी प्रभु श्री राम के अस्तित्व को अदालत में 'काल्पनिक' बताने वाला हलफनामा देना, तो कभी अयोध्या में भव्य मंदिर निर्माण के समय उसे केवल राजनीतिक चुनावी मुद्दा बताकर उसका बहिष्कार करना; यह पूरी श्रृंखला दर्शाती है कि विपक्ष का एक वर्ग वैचारिक रूप से सनातन प्रतीकों के प्रति आक्रामक रहा है।संसद के इस हालिया प्रदर्शन में एक और पहलू ने देश की जागरूक जनता को गहराई से सोचने पर मजबूर किया है। वह है गैर-हिंदू और मुस्लिम नेताओं की इस तरह के धार्मिक प्रतीकों से जुड़े विरोध प्रदर्शनों में सक्रिय भागीदारी।</p>
<p>जब भी किसी अन्य धर्म या संप्रदाय के प्रतीकों, मान्यताओं या वेशभूषा की बात आती है, तो विपक्ष की ओर से सहिष्णुता, गंगा-जमुनी तहजीब और धार्मिक संवेदनशीलता के लंबे-चौड़े भाषण दिए जाते हैं। परंतु जब भगवा वस्त्र, साधु वेश और राम मंदिर जैसे विषय आते हैं, तो वही नेता अन्य धर्मों के सहयोगियों को साथ लेकर सार्वजनिक मंचों पर उनका उपहास उड़ाने में तनिक भी संकोच नहीं करते। किसी गैर-हिंदू नेता द्वारा सनातन धर्म के पूज्य प्रतीकों का मजाक उड़ाते हुए ताली बजाना या उस नाटक का हिस्सा बनना हिंदू समाज के भीतर एक गहरा अविश्वास पैदा करता है। यह दोहरा मापदंड न केवल समाज के सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा केवल एक विशेष धर्म की आस्थाओं का अपमान करने तक ही सीमित रह गई है?अयोध्या के मुख्य अर्चक, अखाड़ा परिषद और काशी-मथुरा के प्रमुख संतों ने इस घटना के बाद एक स्वर में कहा है कि यदि राम मंदिर के किसी दानपात्र या प्रबंधन में कोई वित्तीय अनियमितता हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच हो और दोषी, चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसे जेल भेजा जाए। संत समाज स्वयं पारदर्शिता का पक्षधर है। लेकिन इस घटना की आड़ लेकर पूरी संत परंपरा को भ्रष्ट, लुटेरा और चंदा चोर साबित करने की जो साजिश संसद के प्रांगण में रची गई, वह अक्षम्य है। जिस साधु वेश ने भारत को चरित्र, त्याग, ज्ञान और विश्व बंधुत्व का संदेश दिया, उस भगवा को संसद के मुख्य द्वार पर 'चोरी का प्रतीक' बनाकर पेश करना भारतीय संस्कृति पर सीधा प्रहार है। देश का सनातन प्रेमी समाज आज विपक्ष से यह सीधा प्रश्न पूछ रहा है कि आखिर राजनीतिक वैमनस्य में अंधे होकर देश की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आत्मा पर वार करने का यह सिलसिला कब थमेगा?</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 17:29:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[अजय कुमार, लखनऊ]]></dc:creator>
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                <title>पॉलीमर नोटों की ओर बढ़ता भारत, सुरक्षित और टिकाऊ मुद्रा की नई शुरुआत</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने मुद्रा प्रणाली को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल करते हुए 10 और 20 रुपये के पॉलीमर (प्लास्टिक आधारित) नोटों के बड़े पैमाने पर फील्ड ट्रायल की तैयारी शुरू की है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/new-initiative-for-safe-and-sustainable-currency/article-24812"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/0271da52-db63-4528-96e8-2c634473311c_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>महेन्द्र तिवारी</strong></p>
<p>भारत की अर्थव्यवस्था निरंतर विस्तार के नए चरण में प्रवेश कर रही है। डिजिटल भुगतान के बढ़ते प्रचलन के बावजूद नकद मुद्रा आज भी करोड़ों भारतीयों के दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है। देश के छोटे व्यापार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक परिवहन, कृषि बाजार और असंगठित क्षेत्र का बड़ा हिस्सा आज भी नकद लेनदेन पर निर्भर है। ऐसे में मुद्रा की गुणवत्ता, सुरक्षा और टिकाऊपन केवल तकनीकी विषय नहीं रह जाते, बल्कि आर्थिक व्यवस्था की विश्वसनीयता से सीधे जुड़े होते हैं। इसी संदर्भ में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा पॉलीमर अर्थात प्लास्टिक आधारित नोटों की दिशा में उठाया गया कदम अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। केंद्र सरकार ने आरबीआई के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए दस रुपये और बीस रुपये के पॉलीमर नोटों के बड़े पैमाने पर फील्ड ट्रायल की अनुमति दी है। पहले चरण में दोनों मूल्यवर्ग के एक एक अरब नोटों का परीक्षण किया जाएगा। यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो भविष्य में अन्य मूल्यवर्ग के नोटों में भी इस तकनीक का विस्तार किया जा सकता है। फिलहाल सरकार ने स्पष्ट किया है कि कागजी नोटों को तत्काल हटाने की कोई योजना नहीं है और यह केवल परीक्षण आधारित पहल है।</p>
<p>पॉलीमर नोट सामान्य कागज से नहीं बल्कि विशेष प्रकार के सिंथेटिक पॉलीमर पदार्थ से बनाए जाते हैं। यह सामग्री नमी, धूल, गंदगी और बार बार मोड़े जाने जैसी परिस्थितियों को बेहतर ढंग से सहन कर सकती है। यही कारण है कि इनकी आयु पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में कई गुना अधिक होती है। सामान्यतः कम मूल्यवर्ग के नोट सबसे अधिक हाथों से गुजरते हैं और कुछ ही महीनों में फटने या खराब होने लगते हैं। इसके कारण रिजर्व बैंक को हर वर्ष बड़ी संख्या में पुराने नोट वापस लेकर नए नोट छापने पड़ते हैं। यदि पॉलीमर नोट अपेक्षा के अनुसार लंबे समय तक चलते हैं तो नोटों की छपाई, परिवहन और नष्ट करने की लागत में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।</p>
<p>भारत में नकली नोटों की चुनौती लंबे समय से चिंता का विषय रही है। समय समय पर सुरक्षा एजेंसियों ने नकली भारतीय मुद्रा के नेटवर्क का खुलासा किया है। नकली नोट केवल आर्थिक नुकसान नहीं पहुंचाते बल्कि उनका उपयोग अवैध गतिविधियों और संगठित अपराध में भी किया जाता है। पॉलीमर नोटों में पारदर्शी विंडो, उन्नत होलोग्राम, रंग बदलने वाली स्याही, सूक्ष्म प्रिंटिंग और अन्य आधुनिक सुरक्षा विशेषताएं जोड़ी जा सकती हैं। इन विशेषताओं की नकल करना पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में कहीं अधिक कठिन माना जाता है। इसलिए पॉलीमर नोट नकली मुद्रा पर प्रभावी नियंत्रण का माध्यम बन सकते हैं।</p>
<p>इस पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू पर्यावरण से भी जुड़ा हुआ है। पहली नजर में प्लास्टिक शब्द सुनकर पर्यावरण संबंधी चिंताएं स्वाभाविक लग सकती हैं, लेकिन पॉलीमर नोट सामान्य प्लास्टिक नहीं होते। इनका निर्माण विशेष तकनीक से किया जाता है और उपयोग के बाद इन्हें पुनर्चक्रित भी किया जा सकता है। चूंकि इनकी आयु अधिक होती है इसलिए समान अवधि में कम संख्या में नोट छापने पड़ते हैं। इससे कागज की खपत, ऊर्जा की आवश्यकता और परिवहन संबंधी खर्च में भी कमी आती है। कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी माना है कि लंबे समय में पॉलीमर नोट पर्यावरणीय दृष्टि से लाभकारी सिद्ध हो सकते हैं।</p>
<p>दुनिया के अनेक देशों ने पहले ही पॉलीमर मुद्रा को अपनाकर इसके लाभ प्राप्त किए हैं। ऑस्ट्रेलिया इस तकनीक को अपनाने वाला पहला देश था। इसके बाद कनाडा, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, रोमानिया और अनेक अन्य देशों ने भी अपनी मुद्रा में पॉलीमर तकनीक का उपयोग किया। इन देशों के अनुभव बताते हैं कि पॉलीमर नोट अधिक समय तक सुरक्षित रहते हैं और नकली नोटों की घटनाओं में कमी लाने में सहायक होते हैं। भारत जैसे विशाल देश के लिए इन अनुभवों का अध्ययन अत्यंत उपयोगी हो सकता है।</p>
<p>भारत में पॉलीमर नोटों का विचार नया नहीं है। वर्ष 2013 और उसके बाद भी सीमित स्तर पर कुछ शहरों में इनका परीक्षण किया गया था। उस समय विभिन्न तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। अब बदलती आर्थिक आवश्यकताओं, बेहतर तकनीक और बढ़ती मुद्रा मांग को देखते हुए इसे नए रूप में पुनर्जीवित किया गया है। इस बार परीक्षण का दायरा पहले की तुलना में कहीं बड़ा रखा गया है ताकि अलग अलग जलवायु, भौगोलिक परिस्थितियों और उपयोग के स्तर पर नोटों के प्रदर्शन का व्यापक मूल्यांकन किया जा सके।</p>
<p>भारत जैसे देश में मौसम की विविधता एक बड़ी चुनौती है। कहीं अत्यधिक गर्मी पड़ती है तो कहीं लगातार वर्षा होती है। कई क्षेत्रों में धूल और नमी का स्तर भी अधिक रहता है। ऐसे वातावरण में कागजी नोट अपेक्षाकृत जल्दी खराब हो जाते हैं। फील्ड ट्रायल का उद्देश्य यही समझना है कि पॉलीमर नोट वास्तविक परिस्थितियों में कितने प्रभावी सिद्ध होते हैं। यदि वे इन परिस्थितियों में भी अपनी गुणवत्ता बनाए रखते हैं तो उनका व्यापक उपयोग आर्थिक दृष्टि से लाभदायक हो सकता है।</p>
<p>हालांकि इस योजना के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। पॉलीमर नोटों के निर्माण की प्रारंभिक लागत कागजी नोटों की तुलना में अधिक होती है। इसके अलावा एटीएम मशीनों, नकदी गिनने वाली मशीनों और बैंकिंग प्रणाली के कुछ उपकरणों में आवश्यक तकनीकी परिवर्तन भी करने पड़ सकते हैं। जनता को नए नोटों की विशेषताओं की जानकारी देना और उन्हें नकली नोटों से अलग पहचानने का प्रशिक्षण देना भी आवश्यक होगा। इसलिए यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं बल्कि प्रशासनिक और सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।</p>
<p>भारत में डिजिटल भुगतान प्रणाली तेजी से विकसित हुई है। यूपीआई ने लेनदेन की दुनिया बदल दी है, फिर भी नकदी की उपयोगिता समाप्त नहीं हुई है। छोटे दुकानदारों, ग्रामीण क्षेत्रों, सीमित इंटरनेट वाले इलाकों और अनेक सामाजिक परिस्थितियों में नकद भुगतान आज भी सबसे सुविधाजनक माध्यम है। इसलिए डिजिटल अर्थव्यवस्था और नकद मुद्रा दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। पॉलीमर नोटों की पहल इसी संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाती है, जिसमें आधुनिक तकनीक अपनाते हुए नकद मुद्रा को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाया जा रहा है।</p>
<p>आरबीआई का यह निर्णय केवल नए प्रकार के नोट जारी करने तक सीमित नहीं है बल्कि यह भविष्य की मुद्रा व्यवस्था की दिशा भी तय करता है। यदि परीक्षण सफल रहता है तो भारत उन देशों की श्रेणी में शामिल हो जाएगा जिन्होंने आधुनिक तकनीक के माध्यम से अपनी मुद्रा प्रणाली को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाया है। इससे जनता का विश्वास मजबूत होगा, नकली नोटों की चुनौती कम होगी और मुद्रा प्रबंधन की लागत में भी दीर्घकालिक बचत संभव होगी।</p>
<p>यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल कागजी नोटों को समाप्त करने का कोई निर्णय नहीं लिया गया है। परीक्षण पूरा होने के बाद उसके परिणामों का मूल्यांकन किया जाएगा। यदि अपेक्षित सफलता मिलती है तभी आगे की रणनीति तय होगी। यह सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि भारत की विशाल आबादी और विविध परिस्थितियों में किसी भी बड़े परिवर्तन को चरणबद्ध तरीके से लागू करना ही व्यावहारिक होता है।</p>
<p>आर्थिक सुधारों की सफलता केवल नई नीतियां बनाने से नहीं बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन से निर्धारित होती है। पॉलीमर नोटों का प्रयोग भी इसी कसौटी पर परखा जाएगा। यदि यह पहल सफल होती है तो भारत की मुद्रा व्यवस्था अधिक आधुनिक, सुरक्षित और टिकाऊ बन सकती है। इससे नकली नोटों पर नियंत्रण, सरकारी खर्च में कमी, जनता को बेहतर गुणवत्ता वाले नोट और बैंकिंग व्यवस्था को अधिक दक्ष बनाने जैसे अनेक लाभ प्राप्त हो सकते हैं। आने वाले वर्षों में यह पहल भारतीय मुद्रा इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तनों में से एक सिद्ध हो सकती है और यह दिखाएगी कि तकनीकी नवाचार किस प्रकार आम नागरिक के दैनिक जीवन को भी अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक बना सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 16:27:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
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                <title>हर दिल में बसने वाले नायक: जेआरडी टाटा की मानवीय विरासत आज भी प्रेरणास्रोत</title>
                                    <description><![CDATA[जेआरडी टाटा केवल एक सफल उद्योगपति नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों, नैतिक नेतृत्व और राष्ट्र निर्माण के प्रतीक थे। उन्होंने कर्मचारियों के सम्मान, नवाचार, सामाजिक उत्तरदायित्व और उत्कृष्ट कार्यसंस्कृति को हमेशा प्राथमिकता दी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/success-story/jrd-tata-human-values-leadership-tata-steel-legacy/article-24745"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/dbdd5b11-8db0-4111-9832-b37662cd1dc8_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>इतिहास जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा (जे.आर.डी. टाटा) को एक दूरदर्शी उद्योगपति, अग्रणी विमान चालक, राष्ट्र निर्माता और आधुनिक भारतीय उद्योग के शिल्पकार के रूप में याद करता है। लेकिन जिन लोगों ने उन्हें निकट से जाना, वे उन्हें उनकी उपलब्धियों से भी बढ़कर उनकी मानवीयता और विनम्रता के लिए याद करते हैं। </p>
<p>वे ऐसे विलक्षण नेता थे, जो बोलने से पहले सुनने में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि हर व्यक्ति, चाहे उसका पद कोई भी हो, सम्मान और गरिमा का समान अधिकारी है। उन्होंने कभी अधिकार का सहारा लेकर नेतृत्व नहीं किया; बल्कि अपने आदर्श आचरण से उत्कृष्टता की प्रेरणा दी।</p>
<p>जे.आर.डी. टाटा से जुड़ी अनगिनत कहानियाँ हैं। उनमें से कई कभी किताबों में दर्ज नहीं हो सकीं, लेकिन जिन लोगों के जीवन को उन्होंने स्पर्श किया, उनकी यादों में वे आज भी जीवंत हैं।</p>
<p>मुंबई के स्टील हाउस में रहने वाले लोग आज भी बताते हैं कि जे.आर.डी. टाटा कई बार स्वयं कार चलाकर किसी को उसके घर छोड़ने चले जाते थे। कई बार वे परिवार के साथ एक प्याली चाय पर आत्मीयता से बातचीत करते  कुछ पल भी बिताते थे और अक्सर शाम का समापन बच्चों के साथ नीचे खेलते हुए होता था। उस समय वे भारत के सबसे बड़े औद्योगिक समूहों में से एक के अध्यक्ष नहीं, बल्कि सबके प्रिय मित्र बन जाते थे।</p>
<p>बॉम्बे हाउस की एक और घटना जे.आर.डी. टाटा के व्यक्तित्व की गहराई को बखूबी दर्शाती है। एक दिन वे लिफ्ट के लिए धैर्यपूर्वक कतार में अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे, तब भी लिफ्ट ऑपरेटर ने उन्हें कतार तोड़कर आगे जाने की अनुमति नहीं दी। उसके लिए नियम सबके लिए समान थे, यहाँ तक कि चेयरमैन के लिए भी। बाद में जब उस कर्मचारी का तबादला कर दिया गया, तो जे.आर.डी. ने तुरंत हस्तक्षेप किया। उन्होंने कहा, “यह व्यक्ति सिद्धांतों और अनुशासन का पक्का है। इसे दंडित कैसे किया जा सकता है?” जे.आर.डी. टाटा के लिए सम्मान कभी पद से नहीं मिलता था, बल्कि वह व्यक्ति के चरित्र, सिद्धांतों और आचरण से अर्जित होता था।</p>
<p> उनकी विनम्रता उनके व्यक्तित्व की सबसे  विशेषताओं में से एक थी। अपने असाधारण जीवन की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने एक बार कहा था, “मुझे नहीं लगता कि मैं उस सम्मान का पूरी तरह हकदार हूँ, जो मुझे मिला है... मेरे साथ हमेशा एक उत्कृष्ट टीम रही।” यही उनके नेतृत्व का सार था। वे स्वयं श्रेय लेने के बजाय अपनी टीम को आगे बढ़ाते थे और हर व्यक्ति को बड़े सपने देखने, निर्भीक होकर नवाचार करने तथा सामूहिक रूप से उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करते थे।</p>
<p>1938 से 1984 तक टाटा स्टील के चेयरमैन के रूप में जे.आर.डी. टाटा ने तकनीकी आधुनिकीकरण को नई दिशा दी, लेकिन यह भी सुनिश्चित किया कि किसी भी प्रगति का वास्तविक केंद्र उसके लोग होते हैं। उन्होंने कर्मचारियों के कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी, प्रगतिशील मानव संसाधन नीतियों को बढ़ावा दिया, प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच संयुक्त परामर्श की संस्कृति को प्रोत्साहित किया तथा ऐसी अनेक पहलों की नींव रखी, जो आज भी टाटा स्टील की ‘पीपल-फर्स्ट’ संस्कृति को सशक्त बनाती हैं।</p>
<p>उनका विश्वास सरल, किन्तु अत्यंत गहरा था: कोई भी संस्थान तभी सफल होता है, जब उससे जुड़े लोग समृद्ध और प्रगतिशील हों।</p>
<p>जिम्मेदार व्यवसाय के वैश्विक प्राथमिकता बनने से बहुत पहले, जे.आर.डी. ने नैतिकता, कर्मचारियों के कल्याण और राष्ट्र-निर्माण को व्यवसाय की सफलता से अलग नहीं, बल्कि उसका अभिन्न हिस्सा माना। परिवार कल्याण, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक विकास के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने जमशेदपुर को एक आदर्श औद्योगिक नगर में बदल दिया, जबकि नैतिक नेतृत्व के प्रति उनकी हिमायत आज भी उनकी जयंती के आसपास मनाए जाने वाले टाटा स्टील के वार्षिक एथिक्स मंथ के लिए प्रेरणा बनी हुई है।</p>
<p>इनोवेशन भी जेआरडी की दूरदर्शी सोच का एक प्रमुख आधार था। चाहे टाटा स्टील का आधुनिकीकरण हो, भारत के विमानन उद्योग की नींव रखने की पहल हो या युवा नेतृत्व को परंपरागत सोच से आगे बढ़कर नए रास्ते अपनाने के लिए प्रेरित करना—जेआरडी ने हमेशा लोगों को वर्तमान से आगे सोचने और भविष्य के निर्माण के लिए कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया।</p>
<p>उनके निधन के तीन दशक से अधिक समय बाद भी उनकी विरासत टाटा स्टील की कार्यसंस्कृति और मूल्यों को सार्थक रूप से दिशा दे रही है। यह हमारी नैतिकता और सत्यनिष्ठा के प्रति अटूट प्रतिबद्धता में रची बसी है। यह कर्मचारियों के समग्र कल्याण—शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य—पर हमारे विशेष ध्यान में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। साथ ही, सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने, वर्ष 2045 तक नेट-ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य प्राप्त करने तथा नवाचार, स्वच्छ प्रौद्योगिकियों और उत्तरदायी व्यावसायिक कार्यप्रणालियों में निरंतर निवेश की हमारी प्रतिबद्धता में भी उनकी दूरदृष्टि साफ़ दिखाई देती है।</p>
<p>सबसे बढ़कर, उनकी विरासत हमारे इस विश्वास में जीवित है कि वास्तविक प्रगति वही है, जो लोगों के जीवन को बेहतर बनाए।</p>
<p>वन टाटा स्टील के रूप में हम जमशेदजी टाटा और जेआरडी टाटा के आदर्शों को आगे बढ़ाते हुए केवल एक संगठन ही नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, संवेदनशीलता और उद्देश्यपूर्ण सोच के साथ समाज, उद्योग और राष्ट्र को भी सशक्त बनाने के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं।</p>
<p>कुछ लीडर्स अपने बनाए हुए व्यवसायों के कारण इतिहास में अमर हो जाते हैं। जेआरडी टाटा उन अनगिनत जीवनों के कारण हमेशा याद किए जाएंगे, जिन्हें उन्होंने अपने नेतृत्व, मानवीय दृष्टिकोण और मूल्यों से समृद्ध किया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>स्टोरी </category>
                                            <category>सक्सेस स्टोरी</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 14:31:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हरमू नदी की दर्दभरी कहानी: कभी जीवनदायिनी, आज गंदे नाले में तब्दील</title>
                                    <description><![CDATA[रांची की ऐतिहासिक हरमू नदी पर आधारित इस विचारोत्तेजक लेख में लेखक अरविंद शर्मा ने नदी की बदहाल स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। कभी स्वच्छ जल, बाढ़ और सामाजिक जीवन का केंद्र रही हरमू आज गंदे नाले में बदल चुकी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/harmu-river-ranchi-painful-story-environment-article/article-24743"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/untitled-design-(11)_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>अरविंद शर्मा</strong></p>
<p>बड़े भाई प्रकाश सहाय ने रांची की हरमू नदी की दुर्दशा पर रोते हुए एक ऐसी तस्वीर सामने रखी है, जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को बेचैन कर दे। उनके बचपन में इस नदी में बाढ़ आती थी, कई मोहल्ले डूब जाते थे। बच्चे इसमें नहाते थे, तैरना सीखते थे और लोग इसे नदी की तरह सम्मान देते थे। आज हालत यह है कि नाक डुबोकर मरने के लिए भी इसमें चुल्लू भर साफ पानी नहीं है। जो बह रहा है, वह आसपास के घरों की नालियों से आने वाला गंदा पानी है। प्लास्टिक और कचरा है। यह केवल एक नदी की नहीं, बल्कि हमारी सोच, हमारी व्यवस्था और हमारी संवेदनहीनता की भी कहानी है।</p>
<p>अगर आप रांची के निवासी हैं या कभी किसी काम से वहां गए होंगे तो जरूर देखा होगा कि रांची में हरमू के नाम पर हरमू रोड है। हरमू कालोनी है और हरमू मुक्ति धाम भी है। लेकिन सच यह भी है कि सबसे अधिक मुक्ति की जरूरत स्वयं हरमू नदी को ही है। यह विडंबना किसी व्यंग्य से कम नहीं है कि जिस नदी के किनारे कभी जीवन बसता था, आज उसी के गंदे पानी के किनारे अंतिम संस्कार होते हैं। हरमू अब नदी नहीं रही। मर गई है। जब नदी नाला बन जाती है तो केवल पानी नहीं मरता, शहर का भविष्य भी मर जाता है। भू-जल शर्म से पाताल में धंस जाता है। गर्मी बढ़ जाती है और फिर पुनर्जीवन के नाम पर करोड़ों रुपये का बंदरबांट होने लगता है। </p>
<p>1994-95 की बात है। तब मैं रांची विश्वविद्यालय से जर्नलिज्म कर रहा था। अपने गृह जिला गया से निकलकर पहली बार रांची गया था। इसकी खूबसूरत पहाड़ियों और हरियाली को देखकर स्वर्ग जैसा अहसास होता था। इसमें हरमू नदी की भी बड़ी भूमिका होती थी, क्योंकि यह शहर की प्राकृतिक जल-निकासी व्यवस्था की रीढ़ थी। नगड़ी के पठारी क्षेत्र से निकलने वाली यह नदी लगभग 40 किलोमीटर बहकर चुटिया के पास स्वर्णरेखा नदी में मिलती है। तब इसका पानी स्वच्छ होता था। छठ जैसे पर्वों पर श्रद्धालु इसके तट पर अर्घ्य देने पहुंचते थे। गर्मियों में भी पानी रहता था। बरसात में पानी का बहाव लोगों के लिए रोमांच बन जाता था। आज हल्की बारिश में भी रांची की सड़कें डूब जाती हैं और गर्मियों में पानी के लिए हाहाकार मचता है, तब समझ में आता है कि नदी को मारने की कीमत आखिर कितनी महंगी पड़ रही है।</p>
<p>इतिहास भी हरमू का महत्व बताता है। वर्ष 1939 में इसी नदी के तट पर आदिवासी महासभा के सम्मेलन में अलग झारखंड राज्य की मांग को संगठित स्वर मिला था। मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा के नेतृत्व ने यहीं से आंदोलन को नई दिशा दी। जिस नदी ने झारखंड के राजनीतिक इतिहास को सहेजा, उसी नदी को आज हमने गंदे नाले में बदल दिया।</p>
<p>सवाल है कि हरमू की हत्या किसने की? जवाब भी सीधा है-सरकारों ने, प्रशासन ने और हम सबने मिलकर। शहर बढ़ता गया, कॉलोनियां बसती गईं, प्राकृतिक नाले पाट दिए गए, नदी के किनारों पर अतिक्रमण होता गया और घरों का सीवेज सीधे नदी में गिरने लगा। </p>
<p>प्रकाश सहाय को इस बात पर भी रोना आता है कि हरमू के पुनर्जीवन पर डेढ़ सौ करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा चुके हैं। तटबंध बने, पैदल पथ बने, रेलिंग लगी, रंग-रोगन हुआ और तस्वीरें खिंचीं। लेकिन नदी आज भी नाला ही बनी हुई है। क्योंकि नदी का जीवन सीमेंट, टाइल्स और सुंदर लाइटों से नहीं लौटता। उसे जीवित रखने के लिए साफ पानी चाहिए, अविरल प्रवाह चाहिए और अतिक्रमण से मुक्ति चाहिए। यदि सीवेज उसी तरह गिरता रहेगा तो सौंदर्यीकरण सिर्फ सरकारी फाइलों एवं उद्घाटन समारोहों तक ही सीमित रहेगा।</p>
<p>यदि हरमू को बचाना है तो सौंदर्यीकरण से आगे बढ़कर सीवेज को पूरी तरह रोकना होगा। अतिक्रमण हटाना होगा और प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्र को वापस देना होगा। उतनी ही जिम्मेदारी आम लोगों की भी है। जिस दिन लोग नदी को कूड़ेदान समझना बंद कर देंगे, उसी दिन उसके पुनर्जन्म की शुरुआत होगी। हरमू प्रश्न बनकर खड़ी है-क्या हम अपनी अगली पीढ़ी को एक जीवित नदी देंगे या केवल उसकी तस्वीर और इतिहास? जवाब सरकार को भी देना है और हम-आपको भी। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 14:20:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दुनिया वैसी ही बन जाती है, जैसी हम चाहते हैं</title>
                                    <description><![CDATA[दुनिया वैसी ही बन जाती है, जैसी हम चाहते हैं—राजीव थेपड़ा का यह विचारपरक लेख इंसानी इच्छाओं, लालच, अहंकार, हिंसा, शोषण और सामाजिक विसंगतियों के बीच आत्ममंथन का आह्वान करता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/duniya-waisi-hi-ban-jaati-hai-jaisi-hum-chahte-hain-rajiv-thepda/article-24727"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/6d34998e-81b8-41f5-ab56-01a2988cd08a_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>राजीव थेपड़ा</strong></p>
<p>फिर सुबह हो चुकी है और सूरज की चकाचौंध किरणें धरती के आधे हिस्से पर रोशनी बनकर फैल चुकी हैं! पंछीगण अपने-अपने डेरों से निकलकर अन्न की खोज में दूर-दूर निकल चुके हैं और तरह-तरह के पशु भी सड़कों, मैदानों और यहाँ-वहाँ फैल चुके हैं! सभी को महज भोजन चाहिए और बस इसी एक चीज भर के लिए वे जीते हैं! मगर मनुष्य नाम का एक प्राणी भी इसी धरती पर है, जो भोजन से इतर तरह-तरह की चीजों को चाहता है—तरह-तरह के साधन, तरह-तरह के मनोरंजन, तरह-तरह के व्यंजन, तरह-तरह का देह-सुख, असीम प्रेम, अनंत वासना और अथाह धन... बस ऐसी ही कुछ अभीप्साएँ हैं आदमी की, जिनके लिए वह जीता है और जिनके लिए औरों के जीने को हराम करता है!!</p>
<p>फिर सुबह हो चुकी है और उजाला हमारे चारों ओर दस्तक देकर सबके घरों के दरवाजे खुलवा चुका है और बस अभी थोड़ी ही देर में तरह-तरह के लोग तरह-तरह के अपने कार्यों में व्यस्त हो जाने वाले हैं! और तरह-तरह की खबरें मुझ तक—हम सब तक—तरह-तरह के साधनों के द्वारा पहुँचने लगी हैं, जिनमें अच्छी कम और ऊबाऊ और घृणास्पद ज्यादा हैं, जो न सिर्फ बीते हुए कल-परसों-नरसों-तरसों की हू-ब-हू हैं, बल्कि आने वाले कल-परसों-नरसों-तरसों की हू-ब-हू भी हैं!</p>
<p>जगह-जगह लूटपाट, जगह-जगह बलात्कार, जगह-जगह व्यापक बेईमानी, जगह-जगह शोषण और मानवाधिकार-हनन, जगह-जगह मारकाट और आतंकवाद, जगह-जगह घरेलू हिंसा और दहेज-हत्या, जगह-जगह बच्चों और अन्य निरीहों का यौन-शोषण, जगह-जगह कमजोर लोगों को आर्थिक, मानसिक और दैहिक यंत्रणा... और क्या-क्या लिखूँ, क्या-क्या बताऊँ!!</p>
<p>सुबह हो चुकी है। इस सुबह के साथ अरबों लोगों के कमाने-खाने और इसके लिए नौकरी-व्यवसाय और अन्य कार्यों में व्यस्त कर लेने का जैसे एक अंतहीन कार्यक्रम के दिन का प्रारंभ है। वहीं बहुत सारे लोगों के लिए एक खेल की शुरुआत भर है! कहीं धन, तो कहीं ताकत, तो कहीं सत्ता, तो कहीं वैभव, तो कहीं कुछ और की अधिकता का अहंकार/गुमान और यही नहीं, उस सबका वीभत्स/नग्न प्रदर्शन और उसके रास्ते में किसी रोड़े के आ जाने पर उसके खात्मे का दंभ...!! आदमी की यह यही नियति आदमी को पशुता के उच्च स्तर से राक्षसों के घटिया और गरिमाहीन/तुच्छ स्तर के भी शायद नीचे गिरा लाई है, मगर आदमी को इसका रंच मात्र भी भान नहीं है!!</p>
<p>आदमी का जर-जरा और जमीन का एक अंतहीन वासना भरा हुआ तुच्छ कार्यक्रम आदमी की सारी सुबहों को भयानक काली रात बनाए हुए है! उसकी हर वक्त की यौनिकता और यौन-संबंधों से लबालब दिन उसे आँखें भी खोलने देता है या नहीं, यह हमें नहीं पता!!... मगर उसकी इस वासना के शिकार, इस जर-जरा और जमीन की वासना के शिकार तथा उसके दर्पपूर्ण दंभ भरे अहंकार के शिकार चूँकि अन्य लाखों-करोड़ों लोग बनते हैं, इसलिए यह बात किसी की निजता की न रहकर सार्वजनिक हो जाती है, क्योंकि प्रश्न कुछ लोगों के सुबह के खेल से शुरू होने वाले आचरण से बहुत से अन्य लोगों के जीवन में हमेशा के लिए अँधेरी काली रात के फैल जाने का हो जाता है! ऐसी भयानक काली रात, जो न जीने देती है और न ही मरने!! और ऐसी काली रातों में विवश और कहर भरा जीवन जीते हुए लोगों के लिए ऐसे राक्षस लोग सदा भयानक अट्टहास करते हुए प्रतीत होते हैं!!</p>
<p>आज फिर सुबह आ गई है। सुबह रोज आती थी, सुबह कल भी आएगी और सुबह तो आती ही रहेगी! मगर सुबह के साथ सही में उजाला भी आ ही जाए, ये कतई जरूरी नहीं! नहीं है ना? सुबह का अखबार हर बीते हुए कल की सुबह-दोपहर-शाम और रात का आईना है! इस आईने में कल के समूचे दिन की कुछ घटनाएँ आदमी के अच्छेपन से ज्यादा उसके शैतानी दिमाग की सूरत ज्यादा दिखाई देती है, न सिर्फ कुछ लोगों की शैतानी हरकतों में, बल्कि हम जैसे खुद को शरीफ समझने वाले लोगों की हरकतों/कार्यों में भी...!! मगर इस बात के विस्तार में न जाकर मैं हम सबसे यही पूछ लेता हूँ ना कि क्यों जी, आप खुद के भीतर कभी झाँकते भी हो क्या कि सुबह से रात तलक किस तरह गुजारते हो आप अपना दिन...!! क्या वो दिन सचमुच पवित्रता से भरा होता है? क्या आप तरह-तरह से किसी को नहीं ठगते?</p>
<p>क्या आप किसी की भी लानत-मलामत नहीं करते? क्या आप सचमुच सब लोगों के साथ समभाव और सद्भाव से रहते हैं? क्या आप सचमुच नौकर-चाकर-दाई-मजदूर-कुली-ठेले-रिक्शे-ऑटो-खलासी-ड्राइवर आदि-आदि सबसे उचित और सम्माननीय व्यवहार करते हो? क्या आप सचमुच अपने परिवार-समाज का हित-पोषण करते हो?</p>
<p>इस सुबह आज का सवाल यही है कि क्या सचमुच हम खुद भी वैसे ही हैं, जैसी कि दुनिया हम अपने लिए चाहते हैं, चाहते रहे हैं!? बस अभी थोड़ी देर में यह सुबह क्रमशः दोपहर-शाम और रात में परिणत होकर खत्म हो जाने वाली है और जैसा कि हम जानते हैं कि काल अखंडित है, इस अखंडित काल की कल की सुबह और फिर परसों-नरसों-तरसों की सुबहें आने वाली हैं! तो फिर हमने क्या सोचा है अपने खुद के बारे में और थोड़ा बहुत ही सही, समाज के बारे में?? खुद को और समाज को ठीक वैसा ही छोड़ देना है या कुछ बदल भी डालना है, यानी कि अब खुद में सचमुच कोई उजाला भी भरना है या छोड़ देना है सारी आने वाली सुबहों को काली-स्याह के भयानक अँधेरे के भरोसे!!</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 16:56:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Opinion: यूपी में कांग्रेस क्यों दिखा रही है अखिलेश यादव को 'आंखें'? समझिए पूरी सियासी रणनीति</title>
                                    <description><![CDATA[उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच बढ़ती तल्खी आगामी विधानसभा चुनावों से पहले नए राजनीतिक समीकरणों की ओर संकेत कर रही है। इमरान मसूद के हालिया बयान के बाद कांग्रेस की रणनीति, सपा के साथ रिश्ते, मुस्लिम वोट बैंक, विपक्षी गठबंधन और 'एकला चलो' की संभावनाओं पर चर्चा तेज हो गई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-why-is-congress-showing-eyes-to-akhilesh-yadav-in/article-24228"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/image-(26)_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>उत्तर प्रदेश की राजनीति अपनी जटिलताओं और अप्रत्याशित करवटों के लिए जानी जाती है, और वर्तमान में राज्य में जो सियासी घटनाक्रम घटित हो रहा है, वह उसी परंपरा का एक नया अध्याय है। आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर कांग्रेस द्वारा अपने ही गठबंधन सहयोगी, समाजवादी पार्टी (सपा) के खिलाफ खोला गया मोर्चा राजनीतिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बन गया है। सतह पर यह एक सामान्य राजनीतिक बयानबाजी लग सकती है, लेकिन इसके पीछे के निहितार्थ काफी गहरे और दूरगामी हैं। कांग्रेस का यह कदम स्पष्ट रूप से दबाव की राजनीति (प्रेशर पॉलिटिक्स) का एक हिस्सा माना जा रहा है, जहाँ पार्टी अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए जोखिम लेने से भी पीछे नहीं हट रही है। लंबे समय से उत्तर प्रदेश में हाशिये पर रही कांग्रेस अब अपनी रणनीतियों में आमूलचूल परिवर्तन करने के संकेत दे रही है। यदि इस स्थिति का बारीकी से विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस अब 'हम तो डूबेंगे ही, तुमको भी ले डूबेंगे' की तर्ज पर आगे बढ़ रही है, जिसका सीधा असर उत्तर प्रदेश के विपक्षी गठबंधन इंडिया की एकजुटता पर पड़ना तय है।</p>
<p>कांग्रेस के कद्दावर नेता और सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद द्वारा समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव पर की गई तीखी टिप्पणी को इस घटनाक्रम का मुख्य बिंदु माना जा रहा है। मसूद के ये तेवर केवल एक व्यक्ति की व्यक्तिगत राय नहीं हो सकते, बल्कि जानकार इसे कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व, विशेषकर गांधी परिवार की मौन स्वीकृति या उनकी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा मानते हैं। इमरान मसूद की पृष्ठभूमि को देखें, तो वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक बड़े मुस्लिम चेहरे रहे हैं और उनका आक्रामक तेवर हमेशा से कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा रहा है। अखिलेश यादव पर उनका यह प्रहार सपा को असहज करने के लिए काफी है, लेकिन इसके पीछे का मास्टरमाइंड कौन है, यह सवाल राजनीतिक विश्लेषकों को कांग्रेस के उच्च स्तर तक ले जाता है। दरअसल, कांग्रेस आलाकमान संभवतः यह महसूस कर रहा है कि पिछले कुछ चुनावों में सपा के साथ गठबंधन के बावजूद कांग्रेस को न केवल अपनी सीटें गंवानी पड़ीं, बल्कि उसका वोट बैंक भी तेजी से सपा की ओर खिसका है। ऐसे में यह हमला उस रणनीतिक हताशा और पुनरुत्थान की छटपटाहट का मिश्रण है, जिसे गांधी परिवार द्वारा निर्देशित माना जा रहा है।</p>
<p>राजनीतिक पंडितों का यह मानना है कि उत्तर प्रदेश में 'एकला चलो' की नीति अपनाना कांग्रेस के लिए एक बड़ा और जोखिम भरा दांव हो सकता है। यद्यपि कांग्रेस का जनाधार इस समय न्यूनतम स्तर पर है, लेकिन उसके पास खोने के लिए बहुत कम और पाने के लिए बहुत कुछ है। यदि कांग्रेस अकेले लड़ने का निर्णय लेती है, तो वह राज्य में अपनी विचारधारा को पुनः स्थापित करने का प्रयास कर सकती है और भविष्य में एक मजबूत विकल्प के रूप में खुद को तैयार कर सकती है। हालांकि, यह राह इतनी सरल नहीं है। 'एकला चलो' की राजनीति करने का अर्थ है मुस्लिम और दलित वोटों के उस समीकरण को चुनौती देना, जिसे फिलहाल सपा और बसपा अपनी जागीर समझते हैं। यह प्रयोग सफल होगा या विफल, यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन यह निश्चित है कि इससे विपक्षी एकता का ढांचा बुरी तरह चरमरा जाएगा। कांग्रेस शायद यह मानकर चल रही है कि यदि वह गठबंधन में रहकर अपनी पहचान खो रही है, तो उससे बेहतर है कि अपनी स्वतंत्र पहचान के साथ इस लड़ाई को लड़ा जाए, भले ही इसका परिणाम तत्काल न मिले।</p>
<p>दबाव की राजनीति के चश्मे से देखें, तो कांग्रेस का यह रुख सपा को आईना दिखाने जैसा है। सपा ने लोकसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस को गठबंधन में तो शामिल किया, लेकिन सीटों के बंटवारे और चुनावी प्रबंधन में उसने कांग्रेस की भूमिका को काफी सीमित रखा। कांग्रेस को यह अहसास हो चुका है कि यदि उसने अभी अपना स्टैंड स्पष्ट नहीं किया और अपनी ताकत का अहसास सपा को नहीं कराया, तो आने वाले विधानसभा चुनावों में भी उसे जूनियर पार्टनर बनकर ही संतोष करना पड़ेगा। इमरान मसूद का हमला इसी असंतोष की अभिव्यक्ति है। यह एक संदेश है कि यदि कांग्रेस की राजनीतिक गरिमा और चुनावी महत्व को नजरअंदाज किया गया, तो गठबंधन के भीतर भी संघर्ष अनिवार्य है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अखिलेश यादव इस दबाव को झेलते हुए कांग्रेस के साथ सामंजस्य बिठा पाते हैं, या फिर यह दरार और बढ़ती जाती है।</p>
<p>गौरतलब हो, उत्तर प्रदेश की राजनीति में अल्पसंख्यकों का वोट बैंक हमेशा से निर्णायक रहा है। कांग्रेस और सपा दोनों ही इस वोट बैंक को अपना आधार मानती हैं। कांग्रेस का वर्तमान रुख इस वोट बैंक में अपने पुराने वर्चस्व को पुनः प्राप्त करने की कोशिश का एक हिस्सा प्रतीत होता है। यदि कांग्रेस मुस्लिम मतदाताओं को यह समझाने में सफल रहती है कि सपा केवल सत्ता के लिए उनका उपयोग कर रही है और कांग्रेस उनके दीर्घकालिक हितों के लिए बेहतर है, तो यह समीकरण पूरी तरह बदल सकता है। हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि उत्तर प्रदेश का मुस्लिम मतदाता फिलहाल सपा के साथ अधिक सहज है, क्योंकि उसे भाजपा को हराने की क्षमता सपा में ही दिखती है। ऐसे में कांग्रेस का 'एकला चलो' वाला दांव कहीं उल्टा न पड़ जाए, यह डर भी कांग्रेस के रणनीतिकारों को सता रहा होगा।</p>
<p>लब्बोलुआब यह है कि कांग्रेस की यह आक्रामक नीति न केवल उत्तर प्रदेश की राजनीति, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की एकता के लिए भी एक परीक्षा है। यदि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सपा से अलग होती है या उन पर हमलावर बनी रहती है, तो इंडिया गठबंधन की साख पर प्रश्नचिह्न लगना लाजिमी है। यह स्थिति भाजपा के लिए एक प्रकार से उपहार की तरह हो सकती है, क्योंकि विपक्ष का बंटवारा सीधे तौर पर सत्ताधारी दल को मजबूती प्रदान करता है। कांग्रेस का यह कदम एक जुआ है। एक ऐसा दांव, जिसमें जीत की संभावना कम, लेकिन स्वाभिमान की पुनर्स्थापना की ललक अधिक दिखती है। यह रणनीति बताती है कि कांग्रेस अब अपनी खोई हुई विरासत के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है, चाहे उसके लिए उसे अपने सहयोगी दलों के साथ रिश्तों को ही दांव पर क्यों न लगाना पड़े। आने वाले महीने इस बात के गवाह होंगे कि क्या यह रणनीति कांग्रेस को उत्तर प्रदेश की राजनीति में पुनः मुख्यधारा में लाती है, या फिर यह उसकी राजनीतिक आत्मघाती भूल साबित होती है।</p>
<p><strong>अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 15:42:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>शंभु नाथ चौधरी का विश्लेषण, राधाकृष्ण किशोर की बेचैनी के पीछे के राजनीतिक मायने</title>
                                    <description><![CDATA[वरिष्ठ पत्रकार शंभु नाथ चौधरी के इस विश्लेषण में झारखंड के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर की हालिया राजनीतिक बेचैनी, डीजीपी को लिखे पत्रों, दिल्ली कार्यक्रम में गैरहाजिरी और सोशल मीडिया पोस्ट्स के छिपे मायनों को रेखांकित किया गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/radhakrishna-kishore-political-unrest-jharkhand-2026/article-24100"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/75c034ca-510b-4e86-a9ac-32049be8650d_samridh_1200x720-(1).jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>शंभु नाथ चौधरी</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>राधाकृष्ण किशोर:</strong> झारखंड के वित्त, योजना एवं विकास, वाणिज्य-कर तथा संसदीय कार्य मंत्री। इन दिनों वे एक अजीब-सी कशमकश से गुजरते दिखाई देते हैं। भीतर जैसे कोई बेचैनी है, जो बार-बार सतह पर आना चाहती है, लेकिन हर बार वे उसे अनुभव और संयम की परतों से ढंक देते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">चेहरे पर सामान्य दिनों जैसी सहजता बनाए रखने की कोशिश दिखती है, मगर उनके शब्दों में उभर आई हल्की-सी खरोंच यह एहसास करा देती है कि कहीं कुछ चुभा जरूर है। राजनीति में जब चुभन भीतर तक उतर जाती है, तो राधाकृष्ण किशोर जैसे अनुभवी नेता बहुत शोर नहीं मचाते, संकेत छोड़ते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">कभी किसी चिट्ठी के जरिए, कभी किसी शेर के बहाने, कभी फेसबुक की कुछ पंक्तियों में और कभी किसी अहम सरकारी कार्यक्रम से गैरहाजिर रहकर।</p>
<p style="text-align:justify;">राधा बाबू का हाल का राजनीतिक व्यवहार इन्हीं संकेतों की एक लंबी शृंखला है। वे उन नेताओं में नहीं रहे, जिनकी राजनीति माइक पर पलती हो। उनकी आवाजें विधानसभा में ज्यादा गूंजी हैं, टीवी स्टूडियो में कम। पढ़ने वाले आदमी हैं। बोलते हैं तो वाक्य पूरे करते हैं। सुनते हैं तो सामने वाले की बात खत्म होने देते हैं। इस तेज़ और अधीर समय में यह भी एक अलग किस्म की राजनीति है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन आदमी सिर्फ अपने गुणों से नहीं बनता, अपने विरोधाभासों से भी बनता है। राधाकृष्ण किशोर का राजनीतिक जीवन सीधी सड़क नहीं रहा। कांग्रेस से निकले। दूसरे पड़ाव आए। फिर कांग्रेस लौटे। जैसे कोई नदी कई घाटों को छूकर फिर उसी मिट्टी में लौट आए, जहां से निकली थी। लेकिन लौटने वाली नदी भी वैसी नहीं रहती। उसमें रास्ते की धूल भी होती है और अनुभव की गहराई भी।</p>
<p style="text-align:justify;">शायद इसलिए राधा बाबू कभी पूरी तरह किसी खांचे में फिट नहीं हुए। दल में रहे, लेकिन दल के भीतर भी अपनी अलग आवाज बनाए रखी। सत्ता में रहे, मगर सत्ता से सवाल पूछने का अधिकार भी अपने पास रखा। यही उनकी ताकत भी रही और यही उनकी असुविधा भी।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले एकाध महीने के दौरान उनकी बेचैनी मानो शब्दों की तलाश करती दिख रही है। पहले उन्होंने सुरक्षा काफिले में एक अतिरिक्त वाहन की मांग को लेकर डीजीपी को पत्र लिखा। जवाब नहीं मिला, तो दूसरा पत्र भेजा। उसमें चुप्पी पर सवाल थे और व्यवस्था के रवैये पर भी। अब तीसरा पत्र लिखा है। इस बार स्वर और मुखर है। बात सिर्फ एक अतिरिक्त वाहन तक सीमित नहीं रही। राज्य की पुलिस व्यवस्था, पीसीआर और पेट्रोलिंग टीमों की सुरक्षा, रसूखदार लोगों को मिली सुरक्षा और सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल पर सवाल हैं। आखिर में डीजीपी को एक सीधी नसीहत भी- हठधर्मिता छोड़िए। यह वाक्य सिर्फ डीजीपी से कहा गया है या व्यवस्था से? </p>
<p style="text-align:justify;">पिछले दिनों दिल्ली का एक सरकारी जलसा था,  जहां झारखंड के भविष्य का एक नया नक्शा बनने का दावा किया जा रहा था। राधा बाबू भी उन्हीं दिनों दिल्ली में थे, लेकिन उस तस्वीर का हिस्सा नहीं थे। किसी ने उनकी गैरहाजिरी का सबब पूछा तो उन्होंने बस इतना कहा, ‘मुझे निमंत्रण नहीं मिला।’  </p>
<p style="text-align:justify;">इसके बाद सवालों ने अपने-अपने जवाब गढ़ने शुरू कर दिए। क्या यह सत्ता के गलियारों में बढ़ती दूरियों का एक मौन संकेत था? या फिर एक वरिष्ठ मंत्री की अपनी चुप नाराजगी? इसका उत्तर न सरकार ने दिया, न राधा बाबू ने। लेकिन राजनीति में कई बार अनुपस्थिति भी एक बयान होती है, और खामोशी... सबसे लंबा संवाद।</p>
<p style="text-align:justify;">यूं लगता है कि राधा बाबू के भीतर कोई ऐसा संवाद लगातार चल रहा है, जिसे वे सीधे शब्दों में कहने से बच रहे हैं। शायद यही वजह है कि इन दिनों वे अपनी अभिव्यक्ति के लिए रूपकों और प्रतीकों का सहारा ले रहे हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">कुछ दिन पहले उन्होंने लिखा था, ‘आसमान अनंत है। आसमान किसी सांसारिक या भौतिक पद पर टिका नहीं है। मानव शरीर नश्वर है, लेकिन उसके अच्छे कृत्य आसमान में चमकते रहते हैं। मैं सूरज पर मकान बनाकर छाया तलाशने वालों में से नहीं हूं।’  </p>
<p style="text-align:justify;">और अब बारिश के मौसम में उन्होंने अपने भाव फेसबुक पर इन शब्दों में उकेरे ‘इन बारिशों से इतनी दोस्ती अच्छी नहीं, कच्चा तेरा मकान है...’ ऐसे बिंब मन की उस खिड़की की तरह होते हैं, जहां से भीतर का कंपन बिना शोर किए बाहर आ जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसी पंक्तियों का पूरा-पूरा अर्थ तो राधा बाबू ही जानते होंगे। लेकिन राजनीति अर्थ से कम और अर्थ निकालने वालों से ज़्यादा चलती है। इसलिए उनके ऐसे हर सोशल मीडिया पोस्ट के बाद चर्चा शुरू हो जाती है। उनकी हर चिट्ठी के बाद अटकलें जन्म ले रही हैं और हर ख़ामोशी के बाद सवाल उठ रहे हैं।<br />राधाकृष्ण किशोर सरकार के सिस्टम से नाराज दिखते हैं, लेकिन नाराजगी का इजहार करते हुए सरकार के मुखिया यानी मुख्यमंत्री के प्रति जुबां से कोई तल्ख लफ्ज बाहर नहीं आने देते। </p>
<p style="text-align:justify;">वे बार-बार नौकरशाही की तरफ उंगली उठाते हैं। लेकिन लोकतंत्र में नौकरशाही और राजनीति की दीवारें इतनी अलग भी नहीं होतीं कि एक पर लगी चोट की आवाज दूसरी तरफ़ न पहुंचे। </p>
<p style="text-align:justify;">राधा बाबू की राजनीति की मौजूदा शैली दिलचस्प भी है और दुरूह भी। वे असहमति जताते हैं, लेकिन बगावत का झंडा नहीं उठाते। नाराज होते हैं, मगर रिश्तों के दरवाजे बंद नहीं करते। शेर लिखते हैं, लेकिन उनमें किसी का नाम नहीं होता। </p>
<p style="text-align:justify;">राधाकृष्ण किशोर ने कहा है कि 2029 के बाद सक्रिय चुनावी राजनीति से दूरी बना सकते हैं। झारखंड की सत्ता में मुख्यमंत्री के बाद प्रोटोकॉल के लिहाज़ से सबसे वरिष्ठ मंत्री की जुबान से निकला यह वैराग्य का स्वर यूं ही नहीं लगता। <br />राधा बाबू क्या कहना चाहते हैं, इसका मुकम्मल जवाब फिलहाल शायद उनके पास भी नहीं। इन दिनों वे सीधे वाक्यों से कम, संकेतों और रूपकों से ज़्यादा संवाद कर रहे हैं। सवाल यह भी है कि उनके शब्द जिस पते पर भेजे जाते हैं, क्या उनके मायने भी वहीं पहुंचते हैं, या रास्ते में सियासत उन्हें अपने-अपने अर्थ पहना देती है।</p>
<p style="text-align:justify;">बरसात का मौसम है। उन्होंने खुद लिखा है..’इन बारिशों से इतनी दोस्ती अच्छी नहीं, कच्चा तेरा मकान है...’ हो सकता है, यह किसी और के लिए लिखी गई पंक्ति हो। हो सकता है, यह खुद से किया गया संवाद भी हो। </p>
<p style="text-align:justify;">राजनीति में सबसे कठिन लड़ाइयां कभी-कभी बाहर नहीं, भीतर लड़ी जाती हैं। बाहर की बारिश से बचने के लिए छाता मिल जाता है, भीतर की बारिश से बचाने वाली कोई छत नहीं होती। शायद राधा बाबू इन दिनों उसी भीतरी मौसम से होकर गुजर रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 23:22:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राज्यसभा चुनाव में बड़ा खेल! क्रॉस वोटिंग से पलट सकता है पूरा समीकरण, नाथवानी की बढ़ी बढ़त?</title>
                                    <description><![CDATA[झारखंड राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। भाजपा समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी की संभावित जीत और क्रॉस वोटिंग की चर्चाओं ने चुनावी मुकाबले को रोचक बना दिया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/politics/big-game-in-rajya-sabha-elections-cross-voting-can-change/article-23226"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/image-(5)_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd"><strong>सुनील सिंह</strong></p>
<p class="isSelectedEnd"><strong>रांची:</strong> राज्यसभा चुनाव में भाजपा समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी की जीत की पटकथा पर्दे के पीछे लिखी जा चुकी है। अब सिर्फ परिणाम का इंतजार है। क्रॉस वोटिंग का प्लांट तैयार है।</p>
<p class="isSelectedEnd">चुनाव को लेकर रांची, दिल्ली और पटना तक हलचल तेज है। क्रॉस वोटिंग की संभावना ने कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा और कांग्रेस के बड़े नेताओं की नींद उड़ा दी है। क्रॉस वोटिंग इंडिया गठबंधन के अन्य घटक दलों के साथ-साथ कांग्रेस में भी होने की संभावना है। यानी कांग्रेस में ही सब कुछ ठीक नहीं है। जब अपना घर ही ठीक नहीं है, तब दूसरे का घर ठीक होगा, इसकी क्या गारंटी है?</p>
<p class="isSelectedEnd">हमारे पास जैसी सूचना है और चुनाव में यदि यह सच हुआ, तो नाथवानी को 30-31 से अधिक वोट मिलेंगे। वे झामुमो प्रत्याशी बैजनाथ राम से आगे निकल जाएंगे। जीत को लेकर नाथवानी आत्मविश्वास से भरे दिख रहे हैं, क्योंकि सब कुछ सेट हो चुका है। पटकथा लिखी जा चुकी है।</p>
<p class="isSelectedEnd">राजद के विधायक पिछले दिनों लालू यादव के जन्मदिन समारोह में शामिल होने के बहाने पटना गए थे। राज्यसभा चुनाव में क्या करना है, लालू और तेजस्वी ने अपने विधायकों को संदेश दे दिया है। इशारा है— बिहार का बदला झारखंड में। बाकी बातें पर्दे के पीछे हैं। नाथवानी की मुलाकात दिल्ली में इस पार्टी के बड़े नेताओं से पिछले दिनों हुई थी।</p>
<p class="isSelectedEnd">इधर, सरकार को समर्थन दे रहे दो-तीन विधायक नाथवानी के संपर्क में हैं। इन लोगों ने साथ देने का भरोसा दिया है। जयराम महतो भी नाथवानी के साथ ही जाएंगे, इसकी पूरी संभावना है।</p>
<p class="isSelectedEnd">इधर, इंडिया गठबंधन को एकजुट करने की कोशिश तो हो रही है, लेकिन इसमें कितनी सफलता मिलेगी, यह चुनाव परिणाम बताएगा। झामुमो और कांग्रेस के अंदरखाने भी सब कुछ ठीक नहीं है। इसका असर परिणाम पर पड़ सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">राजनीतिक हलकों में सवाल यह भी उठ रहा है कि अगर कांग्रेस प्रत्याशी की हार होती है, तो सरकार का भविष्य क्या होगा? कांग्रेस क्या करेगी?</p>
<p class="isSelectedEnd">संभावना है कि कांग्रेस सरकार से बाहर नहीं जाएगी, क्योंकि उसकी अपनी राजनीतिक मजबूरी है।</p>
<p class="isSelectedEnd">सरकार को लेकर फैसला हेमंत सोरेन को लेना है। हेमंत सोरेन जब तक चाहेंगे, कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार चलाएंगे। यदि वह कोई नया समीकरण बनाते हैं, तो इसका फैसला भी उन्हीं को लेना है। सब कुछ हेमंत सोरेन के हाथ में ही है।</p>
<p><strong>18 जून की तिथि झारखंड की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण होने वाली है।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 15 Jun 2026 18:59:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>इतिहास नहीं, जनता को जवाब चाहिए; भाजपा के 12 साल का हिसाब चाहिए: विजय शंकर नायक </title>
                                    <description><![CDATA[झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमिटी के प्रदेश प्रवक्ता विजय शंकर नायक ने अपने लेख में भाजपा सरकार के 12 वर्षों के कार्यकाल पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने रोजगार, महंगाई, किसानों की आय, नोटबंदी, जीएसटी, कोविड प्रबंधन और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिति जैसे मुद्दों को उठाते हुए सरकार से जवाब मांगा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/politics/vijay-shankar-nayak-article-bjp-12-years-accountability-employment-inflation/article-23106"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/9007269d-5be9-4b17-9c48-22d73ed2efad_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>सत्ता का मूल्यांकन नारों, विज्ञापनों और इवेंट मैनेजमेंट से नहीं, बल्कि जनता के जीवन में आए बदलावों से होता है। वर्ष 2014 में भाजपा ने देश की जनता से बड़े-बड़े वादे किए थे। भ्रष्टाचार मुक्त भारत, हर साल दो करोड़ रोजगार, किसानों की आय दोगुनी, महंगाई पर नियंत्रण, काला धन वापस लाकर हर खाते में 15 लाख रुपये, अच्छे दिन और विकास का नया मॉडल—इन वादों के सहारे भाजपा सत्ता में आई थी। आज 12 वर्ष बाद देश का नागरिक पूछ रहा है कि उन वादों का क्या हुआ?</p>
<p>भाजपा सरकार का सबसे बड़ा संकट यह है कि वह अपने 12 वर्षों का हिसाब देने के बजाय इतिहास बदलने और राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने में अधिक व्यस्त दिखाई देती है। नेहरू, इंदिरा गांधी और कांग्रेस की विरासत पर हमला भाजपा की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन चुका है, क्योंकि वर्तमान की विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए अतीत पर हमला करना सबसे आसान रास्ता है।</p>
<p>लेकिन इतिहास प्रचार से नहीं बदलता। पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे। उन्हीं के नेतृत्व में लोकतांत्रिक संस्थाओं, सार्वजनिक क्षेत्र, वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थानों, IIT, AIIMS, बड़े बांधों और आधुनिक भारत की बुनियाद रखी गई। सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. भीमराव आंबेडकर और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी तक नेहरू मंत्रिमंडल का हिस्सा रहे। आज भाजपा इन महापुरुषों की विरासत का राजनीतिक उपयोग करती है, लेकिन उनके संवैधानिक और लोकतांत्रिक आदर्शों को कमजोर करने का आरोप भी उसी पर लगता है।</p>
<h3><span><strong>वादों का पहाड़, नतीजों का अकाल</strong></span></h3>
<p>2014 में कहा गया था कि हर साल दो करोड़ नौकरियां पैदा होंगी। यदि यह वादा पूरा होता, तो 12 वर्षों में करोड़ों युवाओं को रोजगार मिल चुका होता। लेकिन आज देश का युवा नौकरी के लिए भटक रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, रिक्त पदों पर नियुक्तियों में देरी और रोजगार के अवसरों की कमी युवाओं के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा रही है।</p>
<p>किसानों से आय दोगुनी करने का वादा किया गया था। लेकिन किसानों को अपनी मांगों के लिए दिल्ली की सीमाओं पर महीनों आंदोलन करना पड़ा। तीन कृषि कानूनों को किसानों के हित में बताया गया, लेकिन जब लाखों किसान सड़कों पर उतर आए, तो सरकार को उन्हें वापस लेना पड़ा। यह भाजपा सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक पराजयों में से एक थी।</p>
<p>महंगाई पर नियंत्रण का दावा किया गया था। लेकिन रसोई गैस, पेट्रोल, डीजल, खाद्य पदार्थ, दाल, तेल और रोजमर्रा की वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने गरीब और मध्यम वर्ग की कमर तोड़ दी। आम आदमी की आय जितनी नहीं बढ़ी, उससे कहीं अधिक उसकी जिंदगी महंगी हो गई।</p>
<h3><span><strong>नोटबंदी : आर्थिक आपदा का अध्याय</strong></span></h3>
<p>नोटबंदी को काले धन, भ्रष्टाचार और आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कदम बताया गया था। लेकिन परिणाम क्या निकला?</p>
<p>लगभग पूरी नकदी बैंकिंग प्रणाली में वापस लौट आई। छोटे व्यापार चौपट हो गए। लाखों मजदूर बेरोजगार हुए। असंगठित क्षेत्र को भारी नुकसान हुआ। अर्थव्यवस्था की रफ्तार प्रभावित हुई। देश की जनता ने घंटों लाइन में खड़े होकर कष्ट झेला, लेकिन वादे के अनुरूप परिणाम कभी सामने नहीं आए।</p>
<p>इतिहास नोटबंदी को आर्थिक सुधार नहीं, बल्कि आर्थिक अव्यवस्था के रूप में याद रखेगा।</p>
<h3><span><strong>जीएसटी : एक राष्ट्र, अनेक परेशानियां</strong></span></h3>
<p>जीएसटी को ऐतिहासिक कर सुधार बताया गया था, लेकिन छोटे और मध्यम व्यापारियों के लिए यह जटिल अनुपालन और बढ़ती कागजी प्रक्रिया का प्रतीक बन गया। बड़े कॉरपोरेट समूहों के पास संसाधन थे, लेकिन छोटे दुकानदारों और लघु उद्योगों को इसका भारी बोझ उठाना पड़ा।</p>
<h3><span><strong>विकास या प्रचार?</strong></span></h3>
<p>भाजपा सरकार ने मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, आत्मनिर्भर भारत, स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेन जैसी परियोजनाओं का व्यापक प्रचार किया। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन योजनाओं ने उतने रोजगार पैदा किए, जितने वादे किए गए थे?</p>
<p>स्मार्ट सिटी परियोजनाएं अधूरी हैं। बुलेट ट्रेन अभी तक सपना बनी हुई है। मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई। चीन पर निर्भरता कम करने के दावे भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके।</p>
<p>भाजपा शासन का मॉडल विकास से अधिक विज्ञापन-आधारित शासन का मॉडल बन गया, जहां उपलब्धि से ज्यादा उसका प्रचार महत्वपूर्ण हो गया।</p>
<h3><span><strong>कोविड काल की त्रासदी</strong></span></h3>
<p>कोविड महामारी के दौरान देश ने भयावह दृश्य देखे। लाखों प्रवासी मजदूर पैदल घर लौटने को मजबूर हुए। ऑक्सीजन की कमी, अस्पतालों में अव्यवस्था और स्वास्थ्य ढांचे की कमजोरियां उजागर हुईं। महामारी ने दिखा दिया कि चमकदार प्रचार और वास्तविक प्रशासनिक तैयारी में कितना अंतर हो सकता है।</p>
<h3><span><strong>लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बढ़ते सवाल</strong></span></h3>
<p>भाजपा सरकार पर सबसे गंभीर आरोप लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता को कमजोर करने का है। विपक्ष का आरोप है कि केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ हथियार की तरह किया गया। संसद में बहस की परंपरा कमजोर हुई। मीडिया के एक बड़े हिस्से ने सत्ता से सवाल पूछने के बजाय उसका प्रचार करना अधिक उचित समझा।</p>
<p>लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है असहमति का सम्मान, संस्थाओं की स्वतंत्रता और सत्ता की जवाबदेही।</p>
<h3><span><strong>सामाजिक सौहार्द पर संकट</strong></span></h3>
<p>“सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” का नारा दिया गया था। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि पिछले वर्षों में समाज में ध्रुवीकरण बढ़ा है। बेरोजगारी, महंगाई और आर्थिक संकट जैसे मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए धार्मिक और सांप्रदायिक बहसों को लगातार राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया।</p>
<p>जब रोजगार का प्रश्न उठता है, तो धर्म की चर्चा शुरू हो जाती है। जब महंगाई पर सवाल उठता है, तो नया भावनात्मक मुद्दा सामने आ जाता है। यह लोकतांत्रिक विमर्श के लिए शुभ संकेत नहीं है।</p>
<h3><span><strong>अग्निपथ, पेपर लीक और युवाओं की निराशा</strong></span></h3>
<p>अग्निपथ योजना ने लाखों युवाओं के मन में भविष्य को लेकर असुरक्षा पैदा की। दूसरी ओर, विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाओं ने युवाओं का विश्वास तोड़ा। एक ऐसा देश, जिसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है, वहां युवाओं का निराश होना सबसे बड़ी राष्ट्रीय चिंता का विषय होना चाहिए।</p>
<h3><span><strong>निष्कर्ष : इतिहास नहीं, हिसाब चाहिए</strong></span></h3>
<p>भाजपा के 12 वर्षों का मूल्यांकन करते समय देश को विज्ञापनों, नारों और राजनीतिक अभियानों से ऊपर उठकर वास्तविकताओं को देखना होगा। बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की परेशानी, नोटबंदी की विफलता, जीएसटी की जटिलता, कोविड की त्रासदी, सामाजिक ध्रुवीकरण, संस्थाओं पर सवाल और अधूरे वादे—ये सभी ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर जवाब मांगा जाना चाहिए।</p>
<p>जनता इतिहास बदलने की कोशिशों से प्रभावित नहीं होगी। जनता अपने जीवन की वास्तविकताओं के आधार पर फैसला करेगी।</p>
<p>देश पूछ रहा है—दो करोड़ नौकरियां कहां हैं?</p>
<p>किसानों की दोगुनी आय कहां है? 15 लाख रुपये कहां हैं? महंगाई पर नियंत्रण कहां है? भ्रष्टाचार मुक्त शासन कहां है? 12 साल बाद भी यदि इन सवालों का जवाब नहीं है, तो फिर यह कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि प्रचार रही है और सबसे बड़ी विफलता जनता की उम्मीदों को पूरा न कर पाना।</p>
<p><strong>इतिहास पर कब्ज़ा नहीं, जनता को जवाब चाहिए।</strong></p>
<p><strong>भाजपा के 12 साल का हिसाब चाहिए।</strong></p>
<p>अब देश में ऐसी राजनीति होनी चाहिए, जिससे रोजगार पैदा किया जा सके, महंगाई को कम किया जा सके, किसानों, छात्रों, युवाओं, महिलाओं, गरीब-गुरबा लोगों और खासकर दलित, आदिवासी, पिछड़ा, अल्पसंख्यक तथा मजदूर वर्ग को राहत मिल सके तथा संविधान व लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत किया जा सके।</p>
<p>अंततः लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता का होता है। प्रचार, छवि निर्माण और राजनीतिक नैरेटिव कितने भी मजबूत हों, जनता का अनुभव और जीवन की वास्तविकता ही किसी सरकार की असली परीक्षा तय करती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 17:24:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राज्यसभा चुनाव: भाजपा ने क्यों और कैसे बदली रणनीति</title>
                                    <description><![CDATA[झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए चुनावी मुकाबला रोचक हो गया है। भाजपा ने अपना अधिकृत उम्मीदवार नहीं उतारते हुए निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी को समर्थन देकर नई रणनीति अपनाई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/why-and-how-did-bjp-change-its-rajya-sabha-election/article-22909"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/88ee0494-a891-4386-bbe8-759d0c868506_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd"><strong>सुनील सिंह</strong></p>
<p class="isSelectedEnd">झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों पर होने वाले चुनाव को लेकर नामांकन की प्रक्रिया सोमवार को पूरी हो गई। इसके साथ ही उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों की स्थिति को लेकर चल रही चर्चा पर विराम लग गया। अब चुनाव परिणाम पर सबकी नजर रहेगी, क्योंकि दो सीटों के लिए तीन उम्मीदवार मैदान में हैं। चुनाव में इंडिया गठबंधन एकजुट रहा तो दोनों सीटों पर उसकी जीत तय है। लेकिन यदि क्रॉस वोटिंग हुई तो कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा की हार भी निश्चित हो जाएगी और एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी एक बार फिर से राज्यसभा पहुंच जाएंगे। नाथवानी के आने के बाद चुनाव काफी रोचक और महत्वपूर्ण हो गया है। झामुमो उम्मीदवार बैजनाथ राम की जीत पक्की है। लड़ाई दूसरी सीट के लिए ही है।</p>
<p class="isSelectedEnd">राज्यसभा चुनाव में भाजपा ने अंतिम समय में अपनी रणनीति बदल ली। संख्या बल नहीं होने और दूसरे दलों के विधायकों से समर्थन नहीं मिलने का भरोसा होने के बाद उसने अपना उम्मीदवार नहीं दिया। पार्टी के कई नेताओं ने अपने स्तर से प्रयास किया। झारखंड से जो नेता टिकट के दावेदार थे, उनमें से दो-तीन नेताओं ने पार्टी नेतृत्व को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की कि यदि उन्हें टिकट मिलेगा तो वे चार-पांच वोट मैनेज कर लेंगे। लेकिन पार्टी ने उनके दावे पर भरोसा नहीं किया। इसलिए स्थानीय उम्मीदवार को मौका नहीं मिला।</p>
<p class="isSelectedEnd">प्रधानमंत्री मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य और प्रवक्ता गौरव वल्लभ को उम्मीदवार बनाए जाने की संभावना थी। इसलिए पार्टी के कहने पर वह झारखंड आए और उन्होंने नामांकन पत्र भी खरीद लिया था। पार्टी ने एक रणनीति के तहत अंत तक अधिकृत प्रत्याशी की घोषणा नहीं की।</p>
<p class="isSelectedEnd">इसी बीच रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़े परिमल नाथवानी की एंट्री हो गई। नाथवानी चुनाव जीतने में माहिर हैं। झारखंड से दो बार राज्यसभा के सांसद रह चुके हैं। उन्हें पता है कि वोट कैसे मैनेज होता है, कहां से समर्थन मिल सकता है और कमजोर कड़ी की पूरी जानकारी है। सभी दलों से उनके अच्छे रिश्ते हैं। नाथवानी ने जब भाजपा और एनडीए से समर्थन मांगा तो भाजपा तैयार हो गई। फिर गौरव वल्लभ को पीछे हटना पड़ा।</p>
<p class="isSelectedEnd">नाथवानी को समर्थन देकर भाजपा ने अच्छी रणनीति दिखाई है। यदि नाथवानी चुनाव जीत जाते हैं तो भाजपा को लाभ होगा। राज्यसभा में एक सांसद की बढ़ोतरी हो जाएगी और यदि नाथवानी हार गए तो भाजपा की इज्जत भी बच जाएगी। क्योंकि नाथवानी निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा ने उन्हें समर्थन दिया है। जीत गए तो सेहरा भाजपा के माथे और हार गए तो ठीकरा नाथवानी के माथे।</p>
<p class="isSelectedEnd">नाथवानी भी चुनाव लड़ने को लेकर दो नावों की सवारी करते रहे। पहले उन्होंने झामुमो से समर्थन की कोशिश की। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से कई दिनों से बात चल रही थी। आखिर में उनसे मुलाकात भी की, लेकिन जब बात नहीं बनी तो एनडीए खेमे में आ गए। भाजपा को एक जिताऊ उम्मीदवार चाहिए था, इसलिए भाजपा ने समर्थन दे दिया।</p>
<p class="isSelectedEnd">नाथवानी के आने से चुनाव रोचक हो गया है। क्रॉस वोटिंग की संभावना बढ़ गई है। सबसे अधिक खतरा इंडिया ब्लॉक पर ही है। कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की परेशानी बढ़ गई है। इंडिया ब्लॉक को एकजुट रखना मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के साथ-साथ कांग्रेसी नेताओं के लिए बड़ी चुनौती है।</p>
<p>चुनाव में द्वितीय वरीयता का महत्व बढ़ गया है। यदि क्रॉस वोटिंग हुई तो हार-जीत का फैसला द्वितीय वरीयता के आधार पर ही होगा। मतदान 18 जून को है। परिणाम भी इसी दिन देर शाम तक आ जाएगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 08 Jun 2026 17:52:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मोदी सरकार के 12 साल: विकसित झारखंड से विकसित भारत का संकल्प</title>
                                    <description><![CDATA[मोदी सरकार के 12 वर्ष पूरे होने के अवसर पर भाजपा झारखंड प्रदेश अध्यक्ष एवं सांसद आदित्य साहू ने झारखंड के विकास में केंद्र सरकार की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने झारखंड को अलग राज्य का दर्जा देकर नई पहचान दी, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकास, आधारभूत संरचना, जनकल्याण और जनजातीय सम्मान के क्षेत्र में नई दिशा प्रदान की।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/modi-government-12-years-viksit-jharkhand-aditya-sahu/article-22637"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/af115414-9580-4029-abb9-8f85d32d735e_samridh_1200x720-(1).jpeg" alt=""></a><br /><p>झारखंड केवल एक राज्य नहीं है। यह हमारी जनजातीय पहचान, हमारे संघर्ष, हमारी संस्कृति और हमारे स्वाभिमान की सोना माटी है। नदी, पहाड़ और घने जंगलों की इस धरती ने हमेशा अपने अधिकार और सम्मान के लिए आवाज उठाई है। दशकों की उपेक्षा के बाद 15 नवंबर 2000 का वह दिन आया, जब धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा जी की जयंती पर झारखंड को अलग राज्य का दर्जा मिला। यह श्रद्धेय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का वह वादा था जो उन्होंने इस माटी के करोड़ों लोगों से किया था और पूरा करके दिखाया।</p>
<p>श्रद्धेय अटल जी की सोच साफ थी। झारखंड जैसी खनिज संपन्न और जनजातीय बहुल धरती तभी आगे बढ़ सकती है, जब यहाँ की जनता के हिसाब से शासन चले और विकास हर गाँव तक पहुँचे। अलग राज्य बनने के बाद झारखंड की जनता के मन में एक उम्मीद जगी थी कि अब उनके सपने पूरे होंगे। लेकिन जो हुआ, वह उस उम्मीद के साथ न्याय नहीं कर सका।</p>
<p>वर्ष 2000 से 2014 तक झारखंड में सरकारें बदलती रहीं। इस दौरान नौ अलग-अलग सरकारें बनीं और तीन बार राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा। इसका सीधा असर विकास पर पड़ा। योजनाएँ बनती थीं, लेकिन जमीन तक पहुँचने में देर होती थी। कई परियोजनाएँ फाइलों में अटकी रहीं।</p>
<p>जो राज्य कोयले, लोहे और खनिज संपदा में देश के अग्रणी राज्यों में था, उसके गाँवों में सड़क नहीं थी। जहाँ की जमीन के नीचे अरबों का खजाना था, वहाँ के बच्चों के पास ढंग के स्कूल नहीं थे। किसान, मजदूर और आदिवासी परिवार योजनाओं की प्रतीक्षा करते रहे, लेकिन सरकार में अस्थिरता के चलते योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में कठिनाइयाँ आती रहीं।</p>
<p>*<strong>डबल इंजन सरकार का प्रभाव</strong>*</p>
<p>दिसंबर 2014 में झारखंड की तस्वीर बदली। केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का नेतृत्व और राज्य में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार ने मिलकर वह किया जो पहले कभी नहीं हुआ था। रघुवर दास जी झारखंड के पहले ऐसे मुख्यमंत्री बने जिन्होंने पूरे पाँच साल का कार्यकाल पूरा किया। चौदह साल में नौ सरकारें देखने वाली इस माटी के लिए यह कोई छोटी बात नहीं थी।</p>
<p>जब केंद्र और राज्य एक ही दिशा में चलते हैं तो नतीजे भी एक अलग ही स्तर पर दिखते हैं। 2014 से 2019 के बीच झारखंड के हर आम नागरिक की आय में लगभग 29 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। पूँजीगत व्यय लगभग दोगुना हुआ, खनन राजस्व में 73 प्रतिशत और निर्यात में 130 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई। लेकिन इन आँकड़ों से भी बड़ी बात यह थी कि अब योजनाएँ जमीन तक प्रभावी तरीके से पहुँच रही थीं।</p>
<p>*<strong>हर घर- हर गाँव तक पहुँचा विकास</strong>*</p>
<p>इस दौर में आम आदमी के जीवन में जो बदलाव आया, वह असली परिवर्तन था। अप्रैल 2019 तक 29 लाख से अधिक उज्ज्वला गैस कनेक्शन दिए गए। जो माताएँ और बहनें सालों से लकड़ी के धुएँ में खाना पकाती थीं, उनके चूल्हे बदल गए। करोड़ों जन-धन खाते खुले और गरीब परिवार पहली बार बैंकिंग व्यवस्था से जुड़े। लाखों परिवारों को पक्का घर मिला और शौचालय बनने से महिलाओं को सुरक्षा और सम्मान मिला।</p>
<p>आयुष्मान भारत योजना ने गरीब परिवारों को महँगे इलाज की चिंता से मुक्त किया। हजारीबाग, दुमका और पलामू में नए मेडिकल कॉलेज शुरू हुए और देवघर में राज्य के पहले एम्स की नींव पड़ी। स्वच्छ सर्वेक्षण 2018 में झारखंड को देश का सबसे स्वच्छ राज्य घोषित किया गया। सभी शहरी निकाय खुले में शौच से मुक्त हुए और रांची को स्मार्ट सिटी मिशन में शामिल किया गया।</p>
<p>*<strong>सड़क से हवाई सफर तक</strong>*</p>
<p>2014 से पहले झारखंड में रेलवे को मिलने वाला औसत सालाना बजट मात्र ₹457 करोड़ था। डबल इंजन सरकार के दौरान यह बढ़कर ₹2,200 करोड़ तक पहुँचा। जिस देवघर में श्रद्धालु घंटों बस का इंतज़ार करते थे, आज वहाँ हवाई अड्डा है। जो साहिबगंज कभी पिछड़ा कहलाता था, आज वह मल्टी-मॉडल टर्मिनल के जरिए राष्ट्रीय जलमार्ग नेटवर्क से जुड़ा है। धनबाद के इंडियन स्कूल ऑफ माइन्स को आईआईटी का दर्जा मिला और व्यापार सुगमता में झारखंड देश के अग्रणी राज्यों में शामिल हुआ।</p>
<p>2019 के बाद भी इस गति में कोई कमी नहीं आई। आज झारखंड का रेलवे बजट ₹7,306 करोड़ तक पहुँच चुका है, जो 2009-2014 के मुकाबले सोलह गुना अधिक है। राज्य के पूरे ब्रॉड गेज नेटवर्क का शत-प्रतिशत विद्युतीकरण पूरा हो चुका है। रांची-हावड़ा और रांची-वाराणसी जैसे प्रमुख मार्गों पर वंदे भारत ट्रेनें दौड़ रही हैं। 57 रेलवे स्टेशनों का कायाकल्प किया जा रहा है। उत्तर करनपुरा में 660 मेगावाट की बिजली इकाई चालू हो चुकी है। आईआईएम रांची का नया परिसर तैयार है और जहाँ कभी केवल 180 एमबीबीएस सीटें थीं, आज 1,000 से अधिक सीटें उपलब्ध हैं। हमारा झारखंड अब केवल खनिजों का राज्य नहीं, ज्ञान और अवसरों की धरती भी बन रहा है।</p>
<p>*<strong>2019 के बाद भी मोदी जी का अटल भरोसा</strong>*</p>
<p>2019 में राज्य में सरकार बदली और डबल इंजन का एक पहिया थम गया। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी जी ने खुद यह ज़िम्मेदारी उठाई कि झारखंड की जनता इस बदलाव की कीमत न चुकाए। केंद्र ने अपनी तरफ से पूरी ताकत लगाई ताकि एक इंजन की कमी आम जनता को न खले।</p>
<p>किसान सम्मान निधि के तहत राज्य के 18 लाख 23 हजार से अधिक किसानों के खातों में सीधे ₹8,928 करोड़ पहुँचे। जल जीवन मिशन ने 31 लाख से अधिक नए नल जल कनेक्शन दिए। 2019 में जहाँ केवल साढ़े पाँच प्रतिशत ग्रामीण घरों में नल का पानी था, आज यह आँकड़ा 55 प्रतिशत से अधिक है। इसका सबसे अधिक लाभ उन माताओं और बहनों को मिला जो वर्षों से दूर-दूर से पानी ढोती आई थीं।</p>
<p>प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण के तहत 16 लाख से अधिक गरीब परिवारों के पक्के घर बनकर तैयार हुए। आयुष्मान भारत योजना के जरिए 29 लाख 40 हजार से अधिक लोगों का मुफ्त इलाज हुआ। मुद्रा योजना ने 1 करोड़ 57 लाख से अधिक छोटे कारोबारियों और युवा उ‌द्यमियों को ₹81,247 करोड़ की आर्थिक मदद दी। लखपति दीदी अभियान के जरिए 4 लाख 81 हजार से अधिक महिलाएँ अब सालाना एक लाख रुपये से अधिक कमा रही हैं और अपने परिवार की आर्थिक रीढ़ बन रही हैं।</p>
<p>यह उस संकल्प का प्रमाण है जो मोदी जी ने लिया था कि राज्य में चाहे जो हो, झारखंड के गरीब, किसान और आदिवासी परिवार केंद्र की नज़र से कभी ओझल नहीं होंगे।</p>
<p>*<strong>जनजातीय गौरव और सम्मान</strong>*</p>
<p>भाजपा ने हमेशा झारखंड की जनजातीय पहचान को राजनीतिक नारे से नहीं, बल्कि नीति और नीयत से सम्मान दिया है। एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों के माध्यम से आदिवासी बच्चों को बेहतर शिक्षा मिल रही है। राज्य में 91 ऐसे वि‌द्यालय स्वीकृत हुए हैं जिनमें से 51 पूरी तरह कार्यशील हैं।</p>
<p>प्रधानमंत्री मोदी जी ने धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा जी के नाम पर प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान यानी पीएम जनमन की शुरुआत की। यह केवल एक योजना नहीं, उन जनजातीय समुदायों के लिए न्याय का संकल्प है जो आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी विकास की मुख्यधारा से दूर थे। इसी के तहत झारखंड में 35 वन धन विकास केंद्र चालू हैं जिनसे जंगल और वनोपज से जुड़े 2,876 से अधिक आदिवासी परिवारों की आजीविका मजबूत हुई है।</p>
<p>तेंदूपत्ते पर जीएसटी 18 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत करने से वनवासी समुदायों को सीधा लाभ मिला है। प्रधानमंत्री मोदी जी ने 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस घोषित किया। यह केवल एक तारीख का सम्मान नहीं था, करोड़ों आदिवासियों की संस्कृति, संघर्ष और स्वाभिमान को राष्ट्रीय मान्यता देना था।</p>
<p>*<strong>झारखंड को चाहिए डबल इंजन की ताकत</strong>*</p>
<p>झारखंड के भाइयो और बहनो, पिछले दो दशकों का अनुभव साफ बताता है कि जब केंद्र और राज्य में भाजपा की डबल इंजन सरकार रही, तब हमारे झारखंड ने अपने इतिहास में सबसे तेज विकास और सबसे स्थिर शासन देखा। और जब एक इंजन कमज़ोर पड़ा, तब भी मोदी जी ने केंद्र से इतना दिया कि विकास रुकने न पाए। सोचिए, जब दोनों इंजन पूरी ताकत से चलेंगे तो यह सोना माटी कहाँ पहुँचेगी।</p>
<p>झारखंड की जनता ऐसी सरकार चाहती है जो विकास को राजनीति से ऊपर रखे। ऐसी सरकार जो आदिवासी समाज, गरीब, किसान, महिला और युवा सबके भविष्य के लिए ईमानदारी से काम करे। भाजपा यह बात केवल कहती नहीं है, सरकार में रहकर इसे साबित भी कर चुकी है।</p>
<p>श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी ने हमारे झारखंड को अपनी पहचान दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने उसे विकास, सुविधाओं और सम्मान की नई दिशा दी। आज यह सोना माटी नए अवसरों के सामने खड़ी है। भाजपा इस धरती के हर बेटे-बेटी के साथ मिलकर झारखंड को विकास, सम्मान और समृ‌द्धि की नई ऊँचाई पर ले जाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।</p>
<p>*आदित्य साहू,सांसद*<br />*प्रदेश अध्यक्ष,भाजपा झारखंड।*</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
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                <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 18:33:22 +0530</pubDate>
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