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                <title>ओपिनियन - Samridh Jharkhand</title>
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                <description>ओपिनियन RSS Feed</description>
                
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                <title>Opinion: ढाका का बदलता मौसम, पूर्वोत्तर भारत की नई चुनौती: डॉ. अतुल मलिकराम </title>
                                    <description><![CDATA[भारत और बांग्लादेश के संबंध केवल दो पड़ोसी देशों की कूटनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनका सीधा असर भारत के पूर्वोत्तर की सुरक्षा, व्यापार, कनेक्टिविटी और विकास पर पड़ता है। डॉ. अतुल मलिकराम अपने लेख में शेख हसीना सरकार के दौर में दोनों देशों के बीच बढ़े सुरक्षा सहयोग, भूमि सीमा समझौते, कनेक्टिविटी परियोजनाओं और आर्थिक साझेदारी का उल्लेख करते हुए 2024 के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों का विश्लेषण करते हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/the-changing-weather-of-dhaka-is-the-new-challenge-of/article-26087"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-08/cc9a9468-e1ee-45ca-aad4-a5589066bf5d_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>भारत और बांग्लादेश के रिश्ते केवल दो पड़ोसी देशों के संबंध नहीं हैं। यह इतिहास, संस्कृति, सुरक्षा, व्यापार और भूगोल से जुड़ा ऐसा रिश्ता है जिसका सीधा असर भारत के पूर्वोत्तर पर पड़ता है। पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शेख हसीना के नेतृत्व में दोनों देशों के संबंधों ने कई महत्वपूर्ण पड़ाव पार किए। लेकिन अगस्त 2024 में हसीना सरकार के पतन के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों ने इस साझेदारी के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।</p>
<p>भारत-बांग्लादेश संबंधों की बुनियाद 1971 के मुक्ति संग्राम में पड़ी थी। हालांकि आजादी के बाद अवैध प्रवास, सीमा विवाद, तीस्ता जल बंटवारा, व्यापार असंतुलन और आतंकवाद जैसे मुद्दों ने दोनों देशों के रिश्तों को कई बार तनावपूर्ण बनाया। 2009 में शेख हसीना के दोबारा सत्ता में आने के बाद स्थिति बदली। बांग्लादेश ने अपनी जमीन पर भारत विरोधी उग्रवादी गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई की और सुरक्षा सहयोग का एक नया दौर शुरू हुआ। मोदी सरकार के आने के बाद इस रिश्ते को निर्णायक गति मिली। 2015 का भूमि सीमा समझौता इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इसके तहत भारत और बांग्लादेश ने क्रमशः 111 और 51 एन्क्लेव का आदान-प्रदान किया। दशकों से चली आ रही इस जटिल समस्या का समाधान केवल सीमा प्रबंधन की दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं था, बल्कि यह दोनों देशों के बीच राजनीतिक विश्वास का भी बड़ा प्रमाण बना।</p>
<p>इसके बाद कनेक्टिविटी रिश्तों का सबसे महत्वपूर्ण आधार बन गई। नवंबर 2023 में अखौरा-अगरतला क्रॉस-बॉर्डर रेल लिंक का उद्घाटन हुआ। लगभग 12.24 किलोमीटर लंबा यह रेल संपर्क भारत के पूर्वोत्तर को बांग्लादेश के जरिए क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस परियोजना से कोलकाता-अगरतला रेल यात्रा को लगभग 38 घंटे और 1500 किलोमीटर से घटाकर करीब 15 घंटे और 500 किलोमीटर तक लाने की परिकल्पना की गई थी। यही वह बिंदु है जहां बांग्लादेश का महत्व केवल विदेश नीति से निकलकर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक रणनीति से जुड़ जाता है। पूर्वोत्तर भारत लंबे समय से सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर निर्भर रहा है। बांग्लादेश के बंदरगाहों, रेल और जलमार्गों तक बेहतर पहुंच इस निर्भरता को कम कर सकती है और माल ढुलाई की लागत तथा समय दोनों घटा सकती है।</p>
<p>सुरक्षा के मोर्चे पर भी हसीना सरकार के साथ सहयोग का असर स्पष्ट रहा है। अतीत में पूर्वोत्तर के कई उग्रवादी संगठनों ने बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल किया। ढाका की कार्रवाई और भारत के साथ बढ़ते हुए सुरक्षा सहयोग ने इस चुनौती को काफी कमजोर किया। इसका अर्थ यह है कि भारत के लिए बांग्लादेश केवल एक पड़ोसी नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर की स्थिरता का महत्वपूर्ण सुरक्षा साझेदार भी है। आर्थिक रिश्ते भी इसी अवधि में तेजी से बढ़े। भारत ने बांग्लादेश में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए बड़े पैमाने पर रियायती ऋण उपलब्ध कराए हैं। विदेश मंत्रालय के अनुसार, अगस्त 2024 तक बांग्लादेश के लिए भारत की लाइन ऑफ क्रेडिट लगभग 7.86 अरब डॉलर थी। बिजली, रेल, सड़क, बंदरगाह और ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग ने दोनों अर्थव्यवस्थाओं को एक-दूसरे से और करीब किया है।</p>
<p>लेकिन 2024 के बाद तस्वीर बदल गई। शेख हसीना भारत आ गईं और बांग्लादेश में राजनीतिक संक्रमण शुरू हुआ। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार फरवरी 2026 में समाप्त हुई और चुनाव के बाद बीएनपी नेता तारिक रहमान प्रधानमंत्री बने। अब भारत के सामने चुनौती यह है कि वह नई सरकार के साथ रिश्तों को पुराने राजनीतिक समीकरणों से अलग रखते हुए अपने दीर्घकालिक हितों को कैसे सुरक्षित करता है। शेख हसीना का भारत में रहना आज भी रिश्तों का संवेदनशील मुद्दा है। बांग्लादेश ने उनके प्रत्यर्पण की मांग की है और भारत ने स्पष्ट किया है कि इस अनुरोध की समीक्षा कानूनी और न्यायिक प्रक्रियाओं के तहत की जा रही है। अगस्त 2026 में भी यह मुद्दा दोनों देशों के बीच चर्चा के केंद्र में बना हुआ है।</p>
<p>ऐसे समय में भारत के लिए सबसे समझदारी भरा रास्ता टकराव नहीं, बल्कि संतुलित कूटनीति है। मेरे अनुसार सुरक्षा सहयोग जारी रखना होगा, व्यापार और कनेक्टिविटी परियोजनाओं को राजनीतिक उतार-चढ़ाव से बचाना होगा और बांग्लादेश की नई सरकार के साथ संस्थागत संबंध मजबूत करने होंगे। साथ ही, चीन और अन्य बाहरी शक्तियों के बढ़ते प्रभाव को केवल राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि बेहतर आर्थिक और रणनीतिक विकल्प देकर चुनौती देनी होगी।<br />आखिरकार, बांग्लादेश की स्थिरता भारत के लिए केवल विदेश नीति का विषय नहीं है। यह पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा, व्यापार और विकास से सीधे जुड़ा प्रश्न है। इसलिए ढाका में बदलती सरकारों के बीच नई दिल्ली की सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वह व्यक्ति-केंद्रित रिश्तों से आगे बढ़कर भारत-बांग्लादेश संबंधों को संस्थागत, दीर्घकालिक और राष्ट्रीय हित आधारित साझेदारी में बदल सके। यही पूर्वोत्तर के लिए भी सबसे सुरक्षित और लाभकारी रास्ता होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 19 Aug 2026 16:52:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>Opinion: अपने समय से आंखें चुराना सबसे बड़ी मक्कारी है, यह ईमानदार साहित्यकारिता से भी गद्दारी है</title>
                                    <description><![CDATA[अपने समय की सामाजिक समस्याओं से आंखें चुराना क्या साहित्य और मानवीयता के प्रति ईमानदारी हो सकती है? राजीव थेपड़ा के इस विचार लेख में इसी मूल सवाल के माध्यम से समाज में बढ़ती वैचारिक कटुता, अहंकार, संवादहीनता और आपसी अविश्वास पर गंभीर विमर्श किया गया है। लेख में कहा गया है कि किसी भी समस्या का समाधान स्वस्थ संवाद, आत्ममंथन और सभी पक्षों के प्रति सदाशयता से ही संभव है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-to-hide-ones-eyes-from-ones-own-time-is/article-26078"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-08/your-paragraph-text-(25).jpg" alt=""></a><br /><p>गर्मी से जगह जगह धरती धधक रही है। जंगलों में आग लग रही हैं, जानवर भी जान बचाकर भाग रहे हैं। और अपने आप को ठंडे रखने के लिए लोग मौसम के परिवर्तन से लड़ रहे हैं और यह भी सच है कि सदा से ही लड़ते रहे हैं किंतु यहां पर बात कुछ गर्मी की नहीं हो रही। बल्कि एक गर्मी और भी है, जिससे लोग हर मौसम में तपते रहते हैं और वह है अपने अपने विचारों की गर्मी!! देखा जाए तो हर आदमी सोचने वाली प्रवृत्ति का होता है, अलबत्ता सोचने के विषय अलग-अलग होते हैं। बहुत सारे विषय अपने अपने कामकाज के अनुसार और बहुत सारे विषय अपने अन्य स्वार्थों के अनुसार हुआ करते हैं। </p>
<p>यूँ सोचा जाए, तो हर किसी का अपना-अपना कामकाज भी उसके लिए उसका स्वार्थ ही है, जिससे उसके जीवन की समस्त गतिविधियां पूर्ण होती हैं और उसके अलावा कुछ कामकाज ऐसे हैं, जो भौतिक स्तर पर किसी प्रकार के लेनदेन के रूप में दिखाई नहीं देते, बल्कि विचारों के आलोड़न और उनका अतिशय बहाव और उनकी बेहतरह गतिशीलता से कहीं समाज वैचारिक विमर्श के द्वारा अपनी नानाविध समस्याओं का निदान पाता है, तो कहीं उन्हीं विचारों की उलझनों से तरह तरह की समस्याएं भी पैदा हो जाती हैं। यहां पर एक बात कहना समीचीन जान पड़ती है कि वास्तव में अपने समाज की किन्हीं भी समस्याओं का समाधान यदि अपने स्वार्थों को परे रखकर, सभी के हितों की बात सोचते हुए, इमानदारी पूर्वक संवाद करते हुए ढूंढा जाए, तो उन समस्याओं के समाधान नहीं पाने की कोई वजह नहीं दिखती। </p>
<p>लेकिन यहीं पर मानव के साथ में एक बहुत बड़ी कठिनाई आ खड़ी होती है कि वह अपने विचारों को सर्वश्रेष्ठ समझता हुआ दूसरों को कमतर समझता है और यहीं पर मनुष्यों के बीच बावेला शुरू होता है, यहां पर जो बावेला पनपता है, वह किसी के श्रेष्ठ होने या किसी के कमजोर होने के कारण नहीं, बल्कि अपने को श्रेष्ठ समझने वाले लोगों के द्वारा दूसरों को हीन समझा जाना ही इस बावेले को जन्म देता है। क्योंकि जैसे ही हम स्वयं को किसी भी तर्क के परे समझते हुए सामने वाले के साथ इस तरह का व्यवहार करते हैं कि या तो वह किसी स्तर का नहीं या फिर उसके विचार बिल्कुल मिट्टी में रौंदे जाने लायक है। तब संवाद की उपस्थिति खत्म हो जाती है और एक प्रकार का शीत युद्ध प्रारंभ हो जाता है। यह शीत युद्ध सब के दिलों को एक गहरे मनोमालिन्य भर देता है और ऐसे में हम सब एक दूसरे के प्रति शक का शिकार बन जाते हैं। </p>
<p>तब यह प्रश्न खड़ा होता है कि हम क्या करें? हम कौन-सी राह अपनाएं ? और थोड़ा सामने वाला आगे बढ़े, तो थोड़ा हम आगे बढ़ें की तर्ज पर किन्हीं सार्थक संवादों की ओर बढ़ें। किंतु ऐसा करने के लिए हमें सबसे पूर्व अपने अहंकार को तिलांजलि देनी होती है, जिसे करने से हमारा दिमाग सदैव हमको मना करता है और हम दुनियादारी के मामलों में सदा दिमाग की मान लेते हैं। दुनियादारी के मामलों में दिल की नहीं मानने की वजह से ही सारा गड़बड़झाला शुरू हुआ है और यह कभी खत्म होने को नहीं आता, क्योंकि तरह-तरह के विषयों के बेहतर जानने वाले अपने आप को एकमात्र सही समझने वाले या सर्वश्रेष्ठ समझने वाले तमाम लोग संवादों के बजाय युद्ध को प्राथमिकता देते हैं! </p>
<p>तो यह सारा खेल सिर्फ और सिर्फ अहंकार का है, यह अहंकार किसी कला में स्वयं को श्रेष्ठ मानने का भी हो सकता है। यह अहंकार अपने पंथ को दुनिया में सबसे श्रेष्ठ मानने का भी हो सकता है। यह अहंकार अपने ईश्वर को भी सर्वश्रेष्ठ मानने का हो सकता है। किंतु समझना सिर्फ यही है कि इस धरती पर ईश्वर के अलावा सर्वश्रेष्ठ कुछ है भी ?? लेकिन जिस सर्वश्रेष्ठ ईश्वर के बारे में बातें करते हुए हम उसे भी तरह-तरह के पंथों में बिठाकर उसका जिस प्रकार का नगाड़ा बजाए हुए हैं, उस नगाड़े का शोर बहुत ही कटु है!! इस प्रकार इससे संबंधित समस्त विषयों से हमारे संवाद पूरी तरह से विषयों से परे, मानवीयता से विलग और कटुता से परिपूर्ण हैं। और यही कटुता बढ़ती-बढ़ती नफरत बनती जाती है और हम एक दूसरे के प्रति एक के बाद एक और और और ज्यादा शक से और नफरत से भरते चले जाते हैं। </p>
<p>तो अब इसके बाद का प्रश्न यह है कि इन विषयों पर विचार कौन करेगा? इन विषयों पर क्या कोई कलाकार, लेखक, डॉक्टर, इंजीनियर, नेता, कोई ठेलेवाला, कोई छोटा मोटा इंसान, कोई स्त्री, कोई थोड़ा बहुत सोचने वाला कोई भी व्यक्ति, क्या इनमे से कोई भी इन विषयों पर बातचीत करने का अधिकारी नहीं है?? और जिस साहित्यकारिता की बात करते हुए हम इन विषयों को राजनीतिक बताते हुए इन विषयों पर साहित्य के क्रम में संवाद करने से जिस प्रकार परहेज करते हैं, क्या हमारी इस बेबात की परहेजी जी वृत्ति से समाधान पैदा होते हैं?? या समस्याएं और उलझती हैं?? क्या हमें इन विषयों का तनिक भी भान है? हम संवाद की बात पर भी लोगों को चुनना शुरू कर देते हैं! इस बात पर यहां पर संवाद होगा! उस पर वहां पर संवाद होगा! इस विषय पर यहां पर कुछ नहीं होगा! उस विषय पर वहां पर कुछ नहीं होगा! </p>
<p>जबकि हम सभी उन सभी विषयों से आपस में लगातार   गुत्थम गुत्था हैं! लेकिन एक दूसरे की स्वस्थ आलोचना के बजाय एक गंदी और इर्ष्यामूलक निंदा करते हुए, एक दूसरे के प्रति विरक्ति ही पैदा करते हैं! क्या हमारी यह वृत्ति सही है? इस मंच में यह नहीं होगा! उस मंच में वह नहीं होगा! यह बेशक किन्हीं बातों पर, अथवा किन्हीं विषयों पर लागू हो सकता है, लेकिन समाज के बीच की वह बातें, जिनसे हम सब संबंधित हैं हममें से हर एक संबंधित है और जिन पर हम सबको विशेषतया पहल करके संवाद करना चाहिए, उसके बारे में हम यह कहते हुए पाए जाते हैं कि यह राजनीति है!? यह किस किस्म की हमारी सोच है? यह मेरी समझ से परे है! वे सामाजिक समस्याएं, जिसके कारण आपस में कटुता पनप रही है, हमारी गलती हम मानने को तैयार नहीं हैं! उनकी गलती वो मानने को तैयार नहीं है! </p>
<p> उल्टा मवाद की तरह बहती हुई उलजलूल समस्याओं  के विषय में भी यही कहते हैं कि यहां पर यह बातें नहीं होनी चाहिए! तो कहां पर यह बातें होनी चाहिए? यह हमें तय कर लेना चाहिए! या यूँ कहें कि यह बातें कहीं होनी ही नहीं चाहिए! बल्कि अपने मन ही मन में इन्हें और बड़ा और लाइलाज करते हुए अपने आप को एक ऐसा धधकता हुआ गोला बना लेना चाहिए, जिसके सामने उसका कोई भी विपक्षी या प्रतिद्वंद्वी आए तो एकदम से जलकर खाक हो जाए!!  यही चाहते हैं ना शायद हम ? क्या मजाक है यह कि हम अपना आत्ममंथन करना जानते नहीं! हम अपने भीतर उतरना जानते नहीं! और सिर्फ और सिर्फ दूसरों की ओर उंगली उठाते हुए हमें इस बात का तनिक भी भान नहीं होता कि एक अंगुली सामने की ओर है तो बाकी की चारों अंगुलियां स्वयं की ओर उठी हुई होती हैं!!</p>
<p>हम कब संवाद करना सीखेंगे? हम कब इतने ईमानदार बनेंगे कि एक दूसरे की सोच के बारे में सदाशयता रखते हुए आपस में सामंजस्य बहाल करने की चेष्टा करेंगे और वैसे पंथ, जो वास्तव में किसी भी प्रकार की अतिशयता का शिकार होते हुए भी अपने आपको बार-बार सर्वश्रेष्ठ मानने की गलती करते हुए, बार-बार मानवीयता को तार करते हैं, सबसे ज्यादा प्रश्न उन्हीं के ऊपर उठते हैं। जिन्हें कई बार हम उठाने से इसलिए भी डरते हैं कि उससे हमारे आपस के संबंध खराब ना हो जाएँ! लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि इन चीजों से डरने के बजाय सामने वाले को बहुत नम्रतापूर्वक और डटकर यह बताया जाए कि दुनिया पिछले 2000/5000 सालों से बहुत आगे बढ़ चुकी है और 2000/5000 साल पूर्व जो घटित हुआ और जिसके अनुसार जो कुछ भी लिख दिया गया है, उसे अमिट नहीं कहा जा सकता। उसे रद्दो-बदल करने लायक बताए जाने को गलत करार देना भी एक बहुत ही गलत बात है और इस गलत बात की स्वस्थ आलोचना करते हुए लगातार हम सभी को ऐसे विचारों को धार देनी चाहिए, जिससे कि यदि कोई वास्तव में अतिशयता का शिकार है, तो उसके भीतर उस विकार से समाधान पाने का विचार जागृत हो! </p>
<p> अलबत्ता इस आलेख में किसी को गलत या सही ठहराने की कोई चेष्टा नहीं की जा रही। बल्कि सिर्फ यह बताया जा रहा है कि कुछ है, जो अतिशयता पूर्ण है और अगर वह चंद मुट्ठी भर लोगों द्वारा किया जाता है, तो भी बाकी के लोगों द्वारा ऐसे करने वालों का बचाव किया जाना ही उस समूचे पंथ के लोगों को शक के दायरे में लाता है और यहीं पर वह बातें हो जाती हैं, जो नहीं होनी चाहिए। इस विषय पर हर पक्ष को सोचना होगा। इस विषय पर हर पक्ष को निरपेक्ष होना होगा और अंत में यही कि इस समाज में रहने वाला हर व्यक्ति हर प्रकार के संवाद का हकदार हैं, हर विषय पर बातचीत करने का अधिकारी है और जिन समस्याओं से हम सभी जूझ रहे हैं, उन्हें उपयुक्त मंच पर बातचीत के द्वारा, संवाद के द्वारा किसी सही मुकाम तक पहुंचाना भी हमारा एक महत्ती कर्तव्य है। इससे हम कभी च्यूत नहीं हो सकते। और हमारे द्वारा ऐसा किया जाना हमारी साहित्यकारिता के प्रति मक्कारी होगी और साथ ही मानवीयता के प्रति गद्दारी भी! हमें किसी भी भय के परे जाकर सदा ऐसा करना ही चाहिए, क्योंकि यही करना हमारी हमारे समय के प्रति ईमानदारी है और मानवीयता के प्रति सदाशयता भी। हमें सदा ऐसा करना चाहिए, बस इससे ज्यादा कुछ नहीं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 19 Aug 2026 16:13:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Opinion: निजता का प्रश्न और भ्रम में हम!</title>
                                    <description><![CDATA[निजता आज के दौर में एक महत्वपूर्ण सामाजिक और बौद्धिक प्रश्न बन चुकी है। राजीव थेपड़ा अपने विचार लेख में निजता, सामाजिक संबंधों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और तकनीक के बदलते प्रभाव को लेकर कई सवाल उठाते हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/privacy-question-and-confusion/article-26072"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-08/your-paragraph-text-(24).jpg" alt=""></a><br /><p><strong>राजीव थेपड़ा</strong></p>
<p>निजता! एक ऐसा शब्द, जो हमारी स्वयं की निजी स्वतंत्रता से जुड़ा और एक ऐसे अर्थ को समेटे हुए हमारे द्वारा अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने का एक ऐसा प्रयास है, जिसे करते हुए हमें लगता है कि हम अपने आप में एक संप्रभु एवं सार्वभौम व्यक्तित्व हों! किंतु क्या सचमुच ही ऐसा है? आइए आज हम इस बात की पड़ताल करते हैं! </p>
<p>जिस समाज, परिवेश और युग से हम आए हैं, वह समाज, वह परिवेश, वह परंपरा और वह युग सभी कुछ समाज के समस्त लोगों के साथ आपस में अन्योन्याश्रित रूप से गुँथा हुआ एक ऐसा परिवेश था, जिसमें इस तरह के प्रश्न कभी उठे ही नहीं, क्योंकि बड़े-बड़े संयुक्त परिवारों में रहते हुए हमें कभी ऐसे प्रश्नों का सामना करना ही नहीं पड़ा। क्योंकि हमारे सम्मुख अपने और पराए का भाव संभवतः न के बराबर हुआ करता था और एक घर में रहते हुए कोई भी रिश्तेदार किसी से भी कैसी भी बातचीत कर लेता था और हमारा अपना कोई भी सगा संबंधी या दोस्त हमारे बच्चे को अपने बच्चे की तरह डांट दिया करता था या इसका ठीक उलट, हम भी किसी के बच्चे को डांट दिया करते थे। </p>
<p>तो यह एक अपनत्व का भाव था। इसमें अपना और पराया कुछ भी नहीं हुआ करता था और हर घर की बात बड़े बूढ़ों द्वारा घर के चबूतरे पर की जाती थी। सब विभिन्न ऐसे विषयों , जिन्हें आज के समय में निजता का प्रश्न माना जाने लगा है, पर आपस में सलाह-मशवरा कर लिया करते थे और गांव में चौपाल भी इन्हीं सारी बातों का एक प्रमुख माध्यम हुआ करती थीं। ऐसे में गांव के गांव एक दूसरे के परिवारों को अच्छी तरह जानते समझते थे। एक दूसरे के बच्चों को पहचानते थे और कोई किसी राह पर भटकता था, तो उसे गांव का कोई भी सदस्य टोकने में किसी प्रकार की कोताही या संकोच या परहेज नहीं करता था। </p>
<p>उसी प्रकार शहरों में भी एक संयुक्त साहचर्य निभाया जाता था। हमारे बच्चों को न भी पता हो, तो हम तो कम से कम वह दिन याद कर सकते हैं। जब किसी जमाने में एक रेडियो हुआ करता था और पूरा परिवार उसका आनंद उठाया करता था। कुछ समय पश्चात पूरे परिवार के बीच में एक टीवी आया और तब उस घर के सारे के सारे सदस्य तो क्या, बल्कि अगल बगल के मोहल्ले वासी भी एक साथ बैठकर टीवी के सभी मनोरंजक सीरियलों का आनंद उठाया करते थे। तो कुल मिलाकर आप देखिए कि यहाँ निजता का कहीं कोई पहलू ही नहीं दिखाई देता। कम से कम हमारे समाज में तो बिल्कुल भी नहीं। </p>
<p>समय बीता, अन्य स्थानों के लोगों ने भारत में प्रवेश किया। भारत के लोगों पर राज किया और बहुत सारी बातें भारत के लोगों पर ऐसी भी लाद दी गईं, जो भारत के लोगों के स्वभाव के बिल्कुल भी अनुरूप नहीं थी। बहुत सारे दबावों में या बहुत सारे अन्य कारणों के चलते भारत के बहुत सारे लोगों ने उन बातों को अपना लिया और दो-तीन पीढ़ी, चार पीढ़ी में लगभग वे समस्त बातें आदतन सबके स्वभाव में शामिल होती चली गईं। लेकिन सच तो यह है कि भारत का मन, भारत के लोगों का स्वभाव और उनकी परिपाटी पूरी तरह से तो आज तक भी नहीं बदली है। ऐसे में निजता का प्रश्न समाज के थोड़े से लोगों को भले ही आंदोलित क्यों न करे। किंतु इस प्रश्न का समाज के एक बहुत बड़े हिस्से में कोई अस्तित्व ही नहीं है। क्योंकि वहां इस प्रश्न के अब भी रत्ती भर भी उठने का भाव नहीं दिखता। </p>
<p> निजता का प्रश्न सच पूछो तो बौद्धिक लोगों का प्रश्न है या यूं कहूं तो मुझे ऐसा भी लगता है कि यह खाली बैठे लोगों का प्रश्न है। एक ऐसे समाज में जहां हर कोई एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। एक दूसरे के बिना के किसी का कोई भी कार्य नहीं निभ सकता है। ऐसे में निजता जैसी बात एक उलजुलूल सोच से अधिक कुछ और नहीं लगती। अरे निजता तो राजाओं की भी नहीं रही। सच पूछा जाए तो जैसा कि परिभाषित है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह समाज के बगैर नहीं जी सकता। हम इसे और भी ज्यादा विस्तार दें, तो इस संसार का हरेक जीव भी सामाजिक प्राणी ही है और कोई भी अपने समूह/समाज के बिना नहीं जी सकता। तो हर जीव समूह में जीता है और एक समूह दूसरे समूह के साथ अपने अस्तित्व के लिए झगड़ा भी करता है। किंतु अन्य जीवों के लिए क्योंकि निजता जैसी बातों की कल्पना की भी नहीं जा सकती। </p>
<p> देखा जाए तो मनुष्य के लिए जिस निजता की बात की जाती है, उसमें कोई विशेष सार नहीं दिख पड़ता, क्योंकि संभवत: ऐसी कोई भी बात नहीं, जिसकी चर्चा हम किसी न किसी से नहीं करते। सेवक से, दासी से, दोस्त से, रिश्तेदारों से, भाई बंधुओं से, निकट सगे संबंधियों से, यहां तक कि बहुत सारी बातें तो हम अनजान लोगों से भी कर लेते हैं! यहां तक कि आप गौर कीजिएगा कि बिल्कुल अनजान लोगों से ही अचानक से भेंट होने पर कुछ देर में घुलते-मिलते ही हम उनसे अपने जीवन की ऐसी बहुत सारी बातें शेयर कर डालते हैं, जिनको बौद्धिक जुगाली  में निजता के प्रश्न कहा जाता है! तो सच पूछा जाए तो मां-बाप, भाई-बहन, चाचा-ताऊ, दोस्त, मोहल्लेवासियों, शहरवासियों, देशवासियों के बीच बराबर रहने के कारण हम हर वक्त किसी न किसी के संपर्क में रहते हैं। यहां तक कि सोते वक्त भी अपने किसी भाई-बंधु, अपने मां-बाप या जिस किसी के भी साथ हम हुआ करते हैं, उनसे बहुतों सारी बातें तो करते ही हैं। </p>
<p> और कुछ और नहीं तो तकनीक के इस युग में हमारे गैजेट्स ही हमारे साथ हुआ करते हैं। जिनके माध्यम से हम अपने किसी यार-रिश्तेदार से सोने से भी पहले बहुत सारी बातें करते हैं और यह भी सच है कि उनमें से अधिकांश बातें हमारे ही उन लोगों के द्वारा, जिनसे हमने वह बातें साझा की होती हैं, किसी न किसी रूप में अन्य लोगों तक भी पहुंच जाती हैं। यह बाबा आदम काल से होता आया है, हो रहा है, आगे भी होता रहेगा! हम केवल और केवल वही बात किसी दूसरे से साझा नहीं करते, जिसमें हमें हमारी प्रकट बदनामी का भय हो। किंतु कई बार इन बातों में भी हमारे और भी दूसरे भागीदार हुआ करते हैं, जिनसे यह बातें इधर-उधर जाती हैं। तो जब भी हम कोई बात किसी न किसी से साझा करते हैं और हमारे द्वारा साझा की गई वह बात किसी ना किसी मुख से कहीं ना कहीं और भी पहुंच जाती है। तो निजता जैसी किसी बात का अस्तित्व तो यहीं खत्म हो जाता है। </p>
<p> किंतु पश्चिमी जगत से आया यह विचार पिछले कुछ वर्षों से हमारे भीतर एक आंदोलन बनने के क्रम में एक अजीबोगरीब, किंतु लगभग बेतुका-सा प्रश्न पैदा कर रहा है! तो अब मजेदार बात यह है कि हमारा स्वभाव तो बिल्कुल अलग। लेकिन किसी और जगत से या किसी बौद्धिक जगत से आया हुआ यह अपरिचित प्रश्न! अलग क्या सचमुच इसका हल है? या दूसरे शब्दों में पूछें, तो क्या सचमुच एक क्षण भी हम स्वतंत्र हैं? क्या हमें प्रतिपल लोगों के साथ रहते हुए लोगों की भावनाओं को न दुखाने के अनुसार अपना आचरण नहीं करना पड़ता? या  उनके अनुकूल बोल नहीं बोलने पड़ते? मां-बाप से लेकर भाई-बहन, पति-पत्नी, अन्य सगे संबंधी, दोस्त, समाज, संगठन, समूह, मंदिर, मस्जिद अथवा किसी भी स्थल पर क्या कोई भी बात हम ऐसी कर सकते हैं, जहां लोगों का दिल टूट जाए? तो क्या समाज के बीच ही जीते हुए समाज के अनुसार अथवा समाज की इच्छाओं के अनुसार या अपनी आवश्यकताओं के अनुसार किया जा रहा हमारा आचरण या हमारी बोली क्या हमारी सीमा नहीं है? वस्तुत: क्या यहीं पर हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा तय नहीं हो जाती है? </p>
<p> जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए हम न जाने कितनी बौद्धिक जुगालियाँ करते हैं और मंच से अपने लिए लोगों से तालियां बजाते हैं! क्या सचमुच हम किसी भी वक्त इतने स्वतंत्र हैं कि कुछ भी बोल जाएं? कुछ भी कर जाएं? गहराई से विचार कीजिए, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है और ऐसा कभी हो भी नहीं पाएगा! तो अभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निजता का प्रश्न यहीं पर समाप्त हो जाते हैं। बाकी इस विषय में हम जो कुछ भी बात करते हैं, वे सभी वस्तुत: हमारी कल्पनाओं, हमारे अनुमानों पर आधारित एक कोरी गल्प भर होती है। जिसे हम माने या ना माने यह हमारी मर्जी है और यह भी हमारी निजता है!यह हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है कि हम कोई भी बात सच होने के बावजूद सिर्फ इसलिए ना माने, क्योंकि हम उसे मानना नहीं चाहते! </p>
<p> तो कुल मिलाकर यह प्रश्न अपने आप में बड़ा गड्डमगड्ड है कि कहां तक निजता? कहां तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता? कहां तक समाज से हमारा जुड़ाव हो? और कहां तक समाज के लोगों के अनुसार हमारा आचरण? और ऐसी कौन-सी बात है, जिसे हम समाज के किसी न किसी सदस्य से साझा नहीं करते! जिस दिन गहराई से हम इन बातों पर विचार कर डालेंगे, उस दिन अपने आप हमें यह आभास हो जाएगा कि हम अंधेरे को भगाने के लिए लाठियां भांज रहे हैं! लेकिन अंधेरा जस का तस है! और हमारे भीतर शुद्ध और सही विचारों की रोशनी जब हमारे भीतर उतरेगी, तो वह अंधेरा अपने आप दूर हो जाएगा। हमारे लाठियां भांजने से न कभी अंधेरा भागा है और ना कभी भागेगा! </p>
<p> किसी भी तरह की निजता की हम बात क्यों ना करें, तो सबसे पहले तो यही प्रश्न पैदा होता है कि क्या हम स्वयं अपनी निजता को अपने ही द्वारा तय किए गए प्रावधानों के अंतर्गत निभा पाते हैं? हमारे बहुत सारे कार्य, हमारे आचरण ऐसे होते हैं, जो भले ही हमारे अत्यंत निकट संबंधियों तक को ना पता हों, लेकिन हमारे सेवकों, दास-दासियों, ड्राइवरों, सुरक्षा गार्डों या किन्ही होटल या रिसॉर्ट के कर्मचारियों या ऐसे ही किसी अन्य स्थानों के लोगों को पता होती है! यहां तक कि हमारे द्वारा सोशल मीडिया पर साझा की जा रही जानकारियां भी इसी प्रकार लोगों के बीच तैरती रहती हैं। ऐसे में हमारी कौन-सी निजता कब तक और कहाँ तक लोगों से छिपी रह पाती है, यह भी अपने आप में एक बड़ा प्रश्न है!<br /> <br /> अक्सर हमने देखा होगा कि ऐसे कुछ लोग, जो कई जगह एक साथ काम करते हैं या वे दाईयाँ, जो दिन भर में आधा दर्जन घरों में काम करती हैं और उनमें से कई तो एक के बाद एक घर बदलते-बदलते सैकड़ों घरों में काम कर चुकी होतीं हैं। उन सब घरों की निजी और गोपनीय जानकारियां वे, जहां जहां काम वे काम करती हैं, उन लोगों से बातें करते वक्त नमक मिर्च लगाकर यानि छौंक लगाकर आपस में साझा कर ली जाती हैं! इस प्रकार ऐसी बहुत सारी गोपनीय जानकारियां, जिन्हें हम सिर्फ अपने तक ही सीमित समझते हैं, वे उन दाईयों या स्टॉप्स या ड्राइवरों, यह अन्य किन्ही कर्मचारियों आदि के द्वारा न जाने कितनी ही जगह जाकर बाकायदा नमक-मिर्च या पूरे मसालों का छौंक लगाकर पल्लवित-पुष्पित होती रहती हैं!!</p>
<p>तो जिसे हम निजता कहते हैं, उस निजता के बारे में भी हमें पूरी तरह से कुछ भी नहीं पता होता और च्युँकि हम किसी न किसी माध्यम के द्वारा एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं या उन्हीं जुड़ाव से हमारा प्रत्येक काम होता है। तो हमारे काम के अंतर्गत आने वाले समस्त माध्यम हमारी उन समस्त निजताओं को अपने अपने संपर्कों से साझा कर डालते हैं, जिसका हमें पता तक भी नहीं होता! अब पुनः प्रश्न यह है कि मैंने तो अपने लिए निजता का एक स्वर चुन लिया, एक सीमा चुन ली, लेकिन मैंने जिससे अपनी जानकारियां साझा कीं या अनजाने में मुझसे साझा हुईं, तो जिनसे यह जानकारियां साझा हुईं, उनको हम कहां तक रोक सकते हैं? असल में सबके अपने-अपने नियम कानून हैं या कोई नियम कानून ही नहीं है! ऐसे में ये सारे प्रश्न बिल्कुल उलझ जाते हैं, जिनका कोई सम्यक उत्तर हम शायद ही कभी दे पाएं!! </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/opinion/privacy-question-and-confusion/article-26072</link>
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                <pubDate>Wed, 19 Aug 2026 15:53:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आदिवासी समाज और उसकी सामाजिक, राजनीतिक चेतना </title>
                                    <description><![CDATA[यह आलेख झारखंड के परिप्रेक्ष्य में आदिवासी समाज की बढ़ती सामाजिक-राजनीतिक चेतना, उनके अधिकारों और सामूहिकता पर मंडराते खतरों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें विस्थापन, बाजारवादी शक्तियों के प्रभाव और राजनीतिक सौदेबाजी के खिलाफ आदिवासी पहचान, स्वशासन तथा जल-जंगल-जमीन के ऐतिहासिक संरक्षण संघर्ष को रेखांकित किया गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/tribal-society-and-its-socio-political-consciousness/article-25508"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-08/1ce9c6f0-53d0-433d-a36b-ae08457f23be_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>अशोक सिंह</strong></p>
<p style="text-align:justify;">पिछले कुछ दशकों में आदिवासी समाज की सामाजिक राजनीतिक चेतना में बड़ी तेजी से उभार आया है। यहां तक कि सोशल मीडिया के इस दौर में संघर्ष के कई मोर्चों पर बहुत हद तक प्रभावी भी दिख रहा है। जिसमें विभिन्न क्षेत्रों में आदिवासी मुद्दों पर काम करने वाले सामाजिक राजनीतिक संगठनों की बड़ी भूमिका रही है। लेकिन विडंबना यह है कि आदिवासी चेतना का यह जन उभार विभिन्न राजनीतिक संगठनों के भिन्न-भिन्न विचारधाराओं के प्रभाव में आकर जहां एक अपनी एकता और सामूहिकता को खो रहा है, वहीं दूसरी ओर अपने समय के सतही मुद्दों को लेकर आपस में ही उलझ रहा है। ऐसे में आदिवासी समुदाय के विकास की मूल अवधारणा और उससे जुड़े सवाल बहुत पीछे छूट जा रहे हैं। तब आदिवासी हित अधिकारों को लेकर अपने आस पास चल रहे आंदोलनों में यह फर्क समझना मुश्किल हो जाता है कि लोग गड्ढे से लड़ रहे हैं या फिर गड्ढा खोदने वालों से !  </p>
<p style="text-align:justify;">अभी अभी एक लम्बे सामूहिक संघर्ष के बाद यहाँ पेशा नियमावली बनी और लागू भी हो चुकी है बावजूद अपनी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था और उससे जुड़े अधिकारों को धरातल पर उतारने को लेकर आज भी यह समुदाय जद्दोजहद करता दिखाई पड़ रहा है। झारखण्ड की जनता विशेषकर आदिवासी समुदाय जन राजनीति के लिए हर बार यहाँ आवाज उठाता रहा है। खासकर विकास के सवाल को लेेकर उसने वर्तमान राजनीति के तौर तरीकों के खिलाफ अपना आक्रोश जाहिर किया है और स्वशासन के माध्यम से उसने बताया है कि जनतंत्र का वास्तविक अर्थ जनता की वह सत्ता है जो कि गरीब से गरीब को निर्णय करने का अधिकार देती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस अधिकार से ही जुड़ा है संसाधनों पर हक की मांग। झारखण्ड के लोग महसूस करते हैं कि उनका खराब वक्त तभी से आया जब से संसाधनों पर से हक छीन लिया गया। संसाधनों पर से हक का छीन जाना एक राजनीतिक कार्रवाई थी, जिसे शासकों ने यहाँ के लोगों की प्रतिरोध चेतना को कुंद करने के लिए किया। शासक मानते थे कि झारखण्ड को लड़कर नहीं जीता जा सकता लेकिन राहतों का भ्रम पैदा कर यहां हुकूमत किया जा सकता है। अंग्रेजों ने पूरी चालाकी के साथ अपना यह इरादा अपनाया और कामयाब हुए। </p>
<p style="text-align:justify;">आजादी के बाद के शासकों ने झारखंड स्वयत्तता की मांग को देखते हुए ऐसा ही खेल खेला और झारखण्ड की स्थापना के बाद भी यहां की जनता को न केवल कमजोर किया बल्कि उनकी एकता और सामूहिकता को भी तोड़ने का षड्यंत्र किया और सफलता भी पाई। देखा जा सकता है कि झारखण्ड में ऐसे कानून बनाए गए जो यहां की प्रकृति और सांस्कृतिक मान्यताओं से मेल नहीं खाते और विकास के नाम पर विस्थापन का आतंक पैदा कर दिया गया। झारखण्ड की जनता को बचाव के संघर्ष में उलझा दिया गया। ऐसे में झारखण्ड के वास्तविक इतिहास की रचना के बीच आत्मविश्वास कमजोर हुआ।<br />       <br />झारखण्ड की जनता के साथ यह खेल बिरसा उलगुलान और संताल विद्रोह के बाद से ही किया जाता रहा। लेकिन हर बार यह देखा गया है कि जनता अपने बीच से नए इतिहास प्रतीकों को खोज लेती है और संघर्ष को तेज कर देती है। आजादी के संघर्ष के समय ही जब आदिवासी पहचान का सवाल उठाया गया तो उनकी कम आलोचना नहीं हुई। यहां तक कहा गया कि इससे अंग्रेज ही मजबूत हो रहे हैं। वास्तव में पहचान के सवाल को पूरी गंभीरता के साथ देखने समझने का नजरिया ही विकसित नहीं हुआ था लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी यह आंदोलन कमजोर नहीं हुआ और झारखंड की जनता ने न केवल अपनी पहचान के सवाल को महत्वपूर्ण बना दिया बल्कि आजादी मिलने तक यह सवाल देश के ऐजेंडा का हिस्सा बन गया।</p>
<p style="text-align:justify;">संविधान सभा ने इस बात को स्वीकार किया कि आदिवायियों के सवाल कुछ अलग हैं और उनके विकास के लिए खास व्यवस्था की जरूरत है। यह भी कहा गया कि आदिवासी प्रशासन की परंपराओं को नकारा नहीं जा सकता। इन स्वीकृतियों के बाद भी आदिवासियों को उनका वास्तविक हक नहीं मिला। उनकी आकांक्षा के साथ इंसाफ नहीं किया जा सका और आदिवासी विकास को विनाशकारी परिणामों की बलिवेदी पर चढ़ा दिया गया। विकास की नीति परंपरागत जरूरतों के अनुरूप नहीं बनाए गए।</p>
<p style="text-align:justify;">आदिवासियों को उस बाजार के हवाले कर दिया गया जिसका आधार ही मोलतोल है जबकि यह तो सब जानते हैं कि आदिवासी परंपरा और उनके जीवन व्यवहार में मोलतोल का कोई स्थान नहीं है। जब से नई आर्थिक नीति आई है बाजार का हमलावर रूख आदिवासी समाज पर बढ़ गया है। आदिवासियों की विरासतों के साथ ज्यादा खेल किया जा रहा है और यह बताने की कोशिश की जा रही है कि आदिवासी समाज अपनी रक्षा स्वयं नहीं कर सकता। </p>
<p style="text-align:justify;">आदिवासी क्षेत्र के संसाधनों को लूटने की नीयत से इतिहास के मिथकों की रचना की जा रही है और आदिवासियों की सामाजिकता को व्यक्तिवाद में बदलने की साजिश की जा रही है। आदिवासी जिस तरह जंगल और जमीन के बिना खानाबदोश हो जाते हैं, उसी तरह वह अपने ऐतिहासिक प्रतीकों से कटकर सदा के लिए खत्म हो जाता है । दुनिया के कुछ कथित विकसित देशों में यह देखा जा सकता है। यही कारण है कि आज का आदिवासी समाज अपनी परंपरा को ज्यादा याद करता है और उन हमलों के खिलाफ उठ खड़ा होना चाहता है, जिसने उसकी सामूहिकता को ही नष्ट कर दिया है या करने का तरीका ईजाद कर दिया है। </p>
<p style="text-align:justify;">आदिवासी जन राजनीति की बुनियाद उस जनतंत्र की स्थापना है जिसमें व्यक्ति से ज्यादा समूह का स्थान होगा। इसे स्थापित करने के लिए आदिवासियों को अपनी उस इतिहास चेतना को फिर से स्थापित करना होगा जो कि उपनिवेशकालीन और बाद में आंतरिक उपनिवेशवादी संस्कृतिकरण के शिकार हो गए हैं।<br />    <br />आदिवासी राजनीति के सामने आज अनेक गंभीर सवाल हैं। झारखण्ड की विविधता को उसे बचाना है तो दूसरी और उसे यह भी साबित करना है कि आज की नैतिकता की तुलना में उनकी सामाजिक नैतिकता कहीं ज्यादा कारगर है, जिससे आज की चुनौती का सामना किया जा सकता है। झारखण्ड के सामने यह भी चुनौती है कि आज की बाजार अर्थव्यवस्था के फांस को वह तोड़ दे और एक ऐसी नीति का निर्माण करे जिससे जनता की ताकत और निर्णयकारी प्रवृति स्पष्ट दिखे। </p>
<p style="text-align:justify;">समानता की अपनी विरासत पर आदिवासी समाज गर्व कर सकता है लेकिन उसे आज के अनुकूल ऐसी समानता की भी स्थापना करनी है जिसमें स्त्रियाँ अपने अधिकारों के साथ समाज और सत्ता का संचालन कर सके। आदिवासी इतिहास के यही सबक हैं और इन्हें कारगर हथियार बनाकर ही झारखण्डी चेतना की बात को स्थापित किया जा सकता है। यह इसलिए भी जरूरी है कि हर किस्म के राजनीतिक दल बिना झारखंड की बात किए इस क्षेत्र में सफल नहीं हो सकते। उन लोगों ने इस राग को अलापना भी शुरू कर दिया है। लेकिन जनता ही बता सकती है कि झारखण्ड का सवाल केवल राजनीतिक सौदाबाजी नहीं बल्कि जीवनपद्धति है और इसे अपनाने के लिए दलों को अपना एजेंडा भी बदलना होेगा।<br />    <br />आज आदिवासी समाज की अवस्था को लेकर जो तरह-तरह की व्याख्याएँ दी जा रही हैं उसकी संस्कृति का जो विश्लेषण किया जा रहा है। उसमें वास्तविकता से परे जाकर बदलावों को दरकिनार कर दिया जाता है। जिससे समकालीन चुनौतियों को समझना आज कठिन हो गया है। ऐसी रणनीति अपनायी जाती है कि उसमें समानता तथा सामाजिक न्याय के पहलू बहस के केन्द्र में नहीं उभरे। <br />       <br />गौरतलब है कि किसी भी परंपरागत समाज के अन्तर्विरोधों और उसकी प्रक्रिया को समझने के लिए उस समाज के स्वरूप, उसकी सामाजिक संरचना और उसके सामाजिक यर्थाथ के बीच के अंतर को समझना होगा। सवाल चाहे नये समाज की रचना का हो या पुरातन प्रणाली के रचनात्मक व सकारात्मक संबंधों को विकसित करने का, इस राह से गुजरना ही होगा। परंपरा के बारे में भी साफ और स्पष्ट समझ विकसित करने के लिए यह जरूरी है।</p>
<p style="text-align:justify;">ताकि उन भ्रमों से मुक्त हुआ जा सके जो इतिहास के एक खास दौर में पैदा होकर परंपरा और अंधविश्वास में गहन घालमेल कर देते हैं। जिससे समाज अपने ही इतिहास के बारे में भ्रांति का शिकार हो जाता है और वैज्ञानिकता तथा गतिशीलता के बदले स्थिरता को ही परंपरा मान लेता है। वैसे भी आज परंपरा का सवाल वास्तव में बार-बार परीक्षण की माँग करता है। खासकर आदिवासी परंपरा को समझने के लिए इतिहास और समाजशास्त्र की दोहरी जानकारी जरूरी है। साथ ही एक देशज और एथनिक नजरिया भी चाहिए। आज का आदिवासी समाज परंपरा के ऐसे संतुलन के लिए बेचैन है, जिसमें एक और वह अपनी पहचान भी कायम रख सके और विकास की दौड़ में पीछे भी न छूटे। वह यह भी चाहता है कि उसकी परंपरा को केवल इतिहास अध्ययन का विषय नहीं रहने दिया जाय बल्कि उसका एक क्रांतिकारी विकल्प बने।<br />      <br />लोकतंत्र का वर्त्तमान ढांचा जनप्रतिनिधि पर जननियंत्रण का कोई भी तरीका विकसित नहीं कर पाया और इस कारण जनता के प्रति जो जिम्मेदारी राजनीतिक दलो में होनी चाहिए वह नहीं दिखती है। इसलिए झारखण्ड में भी बाहरी भितरी का जादू चल जाता है। जबकि हर कोई यह स्वभाव जीता है कि झारखण्ड का मतलब ही है मेलजोल और प्रकृति अराधना की इस धरती पर बाहरी भितरी और सांप्रदायिकता की राजनीति के लिए कोई स्थान नहीं है। </p>
<p style="text-align:justify;">यह सच्चाई है कि आजादी के बाद आकर बसे हुए लोगों ने सांप्रदायिकता की राजनीति को यहां स्थापित करने का प्रयास किया और इसमें स्थानीय जनों को भी शामिल कर लिया लेकिन स्थानीय लोगों की इस भागीदारी के पहले उनकी सांस्कृतिक विरासतों के बारे में गलत मिथक बनाए गए। उसके आधार पर सांस्कृतिक खासियत के सवाल को गौण कर दिया गया। यह काम करने वाले लोगों ने इतिहास की आदिवासी अवधारणा के साथ पूरा खिलवाड़ किया और आदिवासी पहचान के सवाल को भी गौण किया। ऐसा किए बिना ऐसा खिलवाड़ संभव ही नहीं था। लेकिन आदिवासी जनता ने इस भ्रम को जल्द ही पहचानने का काम किया। खासकर विस्थापन विरोधी आंदोलनों ने आदिवासी चेतना की परंपरा को कुंद होने से बचाने का काम किया और उन्हें अपने को बचाए रखने के लिए सामूहिक संघर्ष करने की प्रेरणा से भी भर दिया।<br />    <br />आदिवासी समाज को लेकर बाहर की दुनिया के भी भ्रम टूटे हैं और एक बड़ी बात यह हुई है कि ऐसे ही समूहों की ओर से बात की जाने लगी है कि वर्तमान समस्याओं से देश और समाज ही नहीं दुनिया को केवल आदिवासी परंपरा ही बचा सकती है। जब यह बात की जाती हैं तब आदिवासियों को सतर्क रहने की जरूरत है क्योंकि ज्यादातर मौखिक परंपरा और इतिहास चेतना के कारण यह खतरा बना ही रहता है कि आदिवासियों की वास्तविक चेतना को बाह्य तत्व अपने अनुकूल बना ले सकते हैं या ऐसी व्याख्या कर सकते हैं जिससे संस्कृति का मूल स्वरूप ही प्रभावित हो जाए। शोषण करने का यह भी एक तरीका है कि समाज अपने में ही दिग्भ्रम का शिकार हो जाए। आदिवासी समाज को जागना होगा ताकि उनके इतिहास के साथ कोई भी खिलवाड़ नहीं किया जा सके। </p>
<p style="text-align:justify;">आदिवासी परंपरा के बारे में भी कुछ थोपा नहीं जा सके। अंग्रेज इतिहासकारों ने तो आदिवासी इतिहास की बुनियाद को ही बदल दिया है और मानव शास्त्रियों के अध्ययन में भी देशज बोध का अभाव है। ऐसी हालत में केवल मौखिक परंपरा के आधार पर ही आदिवासी जनतंत्र की निरंतरता को समझा जा सकता है और इंसाफपसंद नई दुनिया में यात्रा की जा सकती है। </p>
<p style="text-align:justify;">बार-बार यह बात दुहराना होगा कि आदिवासियों के प्रतिरोध आंदोलन केवल क्षणिक विद्रोह नहीं थे बल्कि उसमें परंपरा के आधार पर अपनी स्वयत्तता को बहाल करने का इरादा था। यह इरादा इतना मजबूत था कि तमाम बौद्धिक हमलों के बाद भी आदिवासी स्वाभिमान को पूरी तरह कुचला नहीं जा सका। आदिवासी सामूहिकता खत्म नहीं की जा सकी और स्त्री-पुरूष बराबरी को भी खत्म नहीं किया जा सका। आदिवासी समाज ने पूरी ताकत के साथ सामंतवादी होने से अपने को बचाया और वह बराबरी वाले समाजतंत्र के लिए अब भी संघर्ष कर रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 09 Aug 2026 20:11:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Sinha]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>तकनीक और परंपरा के समन्वय से संभव है आदिवासी सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सपना</title>
                                    <description><![CDATA[आशुतोष प्रसाद द्वारा लिखित यह आलेख झारखंड की समृद्ध आदिवासी संस्कृति पर आधुनिकता और तकनीक के प्रभाव का व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह दर्शाता है कि कैसे नई पीढ़ी तकनीक और शिक्षा के सही प्रयोग तथा मातृभाषा के संरक्षण के माध्यम से अपनी परंपराओं को वैश्विक पहचान दिला सकती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/jharkhand-tribal-cultural-renaissance/article-25471"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-08/949f45da-949e-4a2b-8ace-e9cd03f7af17_samridh_1200x720-(1).jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">संध्या का समय है। झारखंड के एक गाँव में मांदर की थाप पर करमा नृत्य प्रारंभ होने वाला है। गाँव के बुजुर्ग उत्साह से युवाओं को पारंपरिक गीत सिखाने के लिए बुलाते हैं, किंतु कई युवा अपने मोबाइल फोन में व्यस्त हैं। कुछ ही देर बाद वही युवा अपने फोन से नृत्य का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर साझा करते हैं और देखते-ही-देखते लाखों लोग उस लोकनृत्य की प्रशंसा करने लगते हैं। यह दृश्य आज के झारखंड की एक नई सच्चाई को सामने लाता है। नई पीढ़ी परंपरा से दूर भी हो रही है और वही नई पीढ़ी आधुनिक तकनीक के माध्यम से उस परंपरा को विश्व मंच तक भी पहुँचा सकती है। यही संभावना आदिवासी सांस्कृतिक पुनर्जागरण की सबसे बड़ी आशा है।</p>
<p style="text-align:justify;">झारखंड की आदिवासी संस्कृति हजारों वर्षों की साधना, प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व और सामुदायिक जीवन के अनुभवों से निर्मित हुई है। सरहुल, करमा, सोहराय, मागे और बाहा जैसे पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन के प्रतीक हैं। लोकगीत, लोकनृत्य, हस्तशिल्प, जनजातीय भाषाएँ, पारंपरिक वाद्य और लोककथाएँ इस सांस्कृतिक विरासत की अमूल्य निधि हैं। किंतु बदलती जीवनशैली, शहरीकरण और वैश्वीकरण के प्रभाव से यह विरासत अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे समय में नई पीढ़ी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">हर युग में सांस्कृतिक परिवर्तन हुए हैं, परंतु वर्तमान परिवर्तन की गति अभूतपूर्व है। इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सोशल मीडिया और वैश्विक संचार ने युवाओं की सोच और जीवनशैली को बदल दिया है। यह परिवर्तन स्वाभाविक है, किंतु चिंता तब होती है जब युवा अपनी मातृभाषा बोलने में संकोच करने लगते हैं, पारंपरिक गीतों को पुराना मानने लगते हैं और लोकसंस्कृति को आधुनिकता के विपरीत समझने लगते हैं। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो आने वाले दशकों में अनेक सांस्कृतिक परंपराएँ केवल अभिलेखों तक सीमित रह सकती हैं।<br />फिर भी निराश होने का कोई कारण नहीं है। झारखंड के अनेक युवा आज अपनी संस्कृति को नए रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। कोई संथाली गीतों को आधुनिक संगीत के साथ जोड़ रहा है, कोई मांदर की थाप को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँचा रहा है, तो कोई जनजातीय चित्रकला, हस्तशिल्प और लोकनृत्य को डिजिटल माध्यम से लोकप्रिय बना रहा है। यह संकेत है कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण केवल अतीत की ओर लौटना नहीं, बल्कि परंपरा और आधुनिकता के बीच सृजनात्मक संवाद स्थापित करना है।</p>
<p style="text-align:justify;">नई पीढ़ी के लिए सबसे पहला दायित्व अपनी मातृभाषा को जीवित रखना है। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह इतिहास, लोकज्ञान और सामूहिक स्मृतियों की वाहक होती है। मुंडारी, कुड़ुख, संथाली, हो और खड़िया जैसी भाषाओं में हजारों लोकगीत, कहावतें और कथाएँ सुरक्षित हैं। यदि भाषा कमजोर होगी, तो उसके साथ जुड़ी सांस्कृतिक स्मृतियाँ भी धीरे-धीरे विलुप्त होती जाएँगी। इसलिए परिवारों और विद्यालयों को मिलकर मातृभाषा के संरक्षण का वातावरण बनाना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">शिक्षा भी सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सशक्त माध्यम बन सकती है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में जनजातीय इतिहास, लोकसाहित्य, लोकसंगीत, पारंपरिक पर्यावरण ज्ञान और महान जनजातीय विभूतियों के योगदान को उचित स्थान मिलना चाहिए। विद्यार्थियों को केवल परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान को समझने के लिए भी इन विषयों से परिचित कराया जाना चाहिए। जब शिक्षा अपनी मिट्टी से जुड़ेगी, तभी युवा अपनी जड़ों पर गर्व करना सीखेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">तकनीक इस पुनर्जागरण की सबसे प्रभावी सहयोगी बन सकती है। यदि युवा लोकगीतों का डिजिटल संग्रह तैयार करें, लोककथाओं का वीडियो दस्तावेजीकरण करें, जनजातीय भाषाओं के मोबाइल ऐप विकसित करें और लोककला को ऑनलाइन मंचों पर प्रस्तुत करें, तो यह विरासत सीमित भौगोलिक दायरे से निकलकर वैश्विक पहचान प्राप्त कर सकती है। आज दुनिया मौलिक सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की ओर आकर्षित हो रही है। झारखंड की आदिवासी संस्कृति में वह मौलिकता भरपूर है।</p>
<p style="text-align:justify;">सांस्कृतिक पुनर्जागरण केवल कलाकारों का कार्य नहीं है। इसमें परिवार, समाज, शिक्षण संस्थान, सरकार, मीडिया और सांस्कृतिक संगठनों की समान भागीदारी आवश्यक है। गाँवों में सांस्कृतिक कार्यशालाएँ, लोकगीत प्रतियोगिताएँ, जनजातीय भाषा महोत्सव, पारंपरिक खेलों का आयोजन और लोककला प्रशिक्षण शिविर नियमित रूप से आयोजित किए जाएँ। इससे युवाओं को अपनी संस्कृति के साथ आत्मीय संबंध स्थापित करने का अवसर मिलेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">आर्थिक दृष्टि से भी यह पुनर्जागरण महत्वपूर्ण है। यदि जनजातीय हस्तशिल्प, प्राकृतिक उत्पाद, लोकसंगीत, सांस्कृतिक पर्यटन और पारंपरिक कलाओं को बाज़ार से जोड़ा जाए, तो युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर उत्पन्न होंगे। तब संस्कृति केवल विरासत नहीं रहेगी, बल्कि सम्मानजनक आजीविका का आधार भी बनेगी। यही सतत विकास का वास्तविक मार्ग है।</p>
<p style="text-align:justify;">वास्तव में, सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अर्थ केवल पुरानी परंपराओं को दोहराना नहीं है। इसका अर्थ है—उन मूल्यों को नए युग के अनुरूप जीवंत बनाना, जो मानवता को बेहतर भविष्य दे सकते हैं। प्रकृति के प्रति सम्मान, सामुदायिक सहयोग, श्रम की गरिमा, स्त्री-पुरुष की सहभागिता और सामाजिक समरसता जैसे आदिवासी जीवन-मूल्य आज पूरे विश्व के लिए प्रेरणा बन सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आज आवश्यकता इस बात की है कि नई पीढ़ी अपनी पहचान को आधुनिकता के साथ जोड़कर देखे, उसके विपरीत नहीं। मोबाइल हाथ में हो सकता है, लेकिन मांदर की थाप भी हृदय में गूँजनी चाहिए। आधुनिक शिक्षा प्राप्त की जा सकती है, पर अपनी मातृभाषा का सम्मान भी बना रहना चाहिए। विश्व नागरिक बनने की आकांक्षा हो, पर अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव भी उतना ही गहरा हो।</p>
<p style="text-align:justify;">झारखंड की आदिवासी संस्कृति का भविष्य किसी सरकारी योजना से अधिक नई पीढ़ी की चेतना पर निर्भर है। यदि युवा अपनी विरासत को बोझ नहीं, बल्कि गौरव मानेंगे, तो सांस्कृतिक पुनर्जागरण केवल एक विचार नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सशक्त आंदोलन बन जाएगा। तब मांदर की थाप केवल गाँवों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि विश्व मंच पर झारखंड की सांस्कृतिक पहचान का स्वर बनकर गूँजेगी। यही नई पीढ़ी का सबसे बड़ा योगदान और आदिवासी सांस्कृतिक पुनर्जागरण का वास्तविक लक्ष्य होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>आशुतोष प्रसाद</strong><br /><strong>साहित्यकार एवं  समीक्षक</strong><br /><strong>9934302065</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/opinion/jharkhand-tribal-cultural-renaissance/article-25471</link>
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                <pubDate>Sat, 08 Aug 2026 19:16:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>2047 में कांग्रेस: विरासत बचेगी या बिखरेगी? डॉ. अतुल मलिकराम का राजनीतिक विश्लेषण</title>
                                    <description><![CDATA[भारत की आजादी की शताब्दी वर्ष 2047 तक कांग्रेस का राजनीतिक भविष्य कैसा होगा, यह बड़ा सवाल है। राजनीतिक रणनीतिकार डॉ. अतुल मलिकराम ने अपने लेख में कांग्रेस की ऐतिहासिक भूमिका, वर्तमान चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं का विश्लेषण किया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/congress-in-2047-future-challenges-political-strategist-atul-malikram-analysis/article-25288"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-08/9e6fc2c5-9fc3-4195-ba10-6c5114dc4c52_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>भारत जब 2047 में अपनी आजादी की शताब्दी मनाएगा, तब केवल देश ही नहीं, बल्कि उसकी राजनीति भी एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी होगी। उस समय सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि क्या भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, जिसने देश के स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया और दशकों तक भारतीय राजनीति की धुरी रही, खुद को नए भारत के अनुरूप ढाल पाएगी या फिर उसका प्रभाव इतिहास के पन्नों तक सीमित होकर रह जाएगा।</p>
<p>1885 में स्थापित कांग्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन को दिशा दी और 1947 के बाद लंबे समय तक देश की राजनीति का नेतृत्व किया। पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, पी.वी. नरसिम्हा राव और डॉ. मनमोहन सिंह तक कांग्रेस ने भारत की राजनीतिक और आर्थिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन पिछले एक दशक में पार्टी को लगातार चुनावी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। जहां 2014 में कांग्रेस लोकसभा में 44 सीटों पर सिमट गई, वहीं 2019 में उसे 52 सीटें मिलीं और 2024 में यह संख्या बढ़कर 99 तक पहुँची। कोई शक नहीं कि यह सुधार जरुरी था, लेकिन राष्ट्रीय सत्ता तक पहुँचने के लिए अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।</p>
<p>आज कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि अपने संगठन को फिर से मजबूत बनाना है। कई राज्यों में उसका जनाधार कमजोर हुआ है और बूथ स्तर पर संगठन पहले जैसा प्रभावी नहीं रहा है। भारतीय राजनीति अब केवल बड़े नेताओं के भाषणों से नहीं, बल्कि मजबूत जमीनी नेटवर्क, डेटा आधारित रणनीति और लगातार जनसंपर्क से संचालित होती है। यदि कांग्रेस को भविष्य में प्रभावी भूमिका निभानी है, तो उसे संगठनात्मक ढांचे को आधुनिक और सक्रिय बनाना होगा।<br />राहुल गांधी पिछले कुछ वर्षों में विपक्ष के प्रमुख चेहरे के रूप में उभरे हैं। उनकी राजनीति अब केवल चुनावी भाषणों तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय, संविधान, रोजगार, युवाओं और लोकतांत्रिक संस्थाओं जैसे मुद्दों पर केंद्रित दिखाई देती है। हालांकि किसी भी राजनीतिक दल का भविष्य केवल एक नेता पर निर्भर नहीं रह सकता। कांग्रेस को ऐसी दूसरी और तीसरी पंक्ति का नेतृत्व तैयार करना होगा, जो विभिन्न राज्यों में स्वतंत्र रूप से पार्टी को मजबूत कर सके। आने वाले वर्षों में कांग्रेस के लिए तीन क्षेत्र सबसे महत्वपूर्ण होंगे। पहला, संगठन का पुनर्निर्माण; दूसरा, स्पष्ट वैचारिक दिशा; और तीसरा, तकनीक का प्रभावी उपयोग। आज चुनाव केवल सभाओं और पोस्टरों से नहीं जीते जाते। डिजिटल कैम्पेन्स, सोशल मीडिया, डेटा एनालिटिक्स और एआई राजनीतिक रणनीति का अहम हिस्सा बन चुके हैं। हालाँकि कांग्रेस भी इस बदलाव का हिस्सा बन रही है और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सत्ता पक्ष को बराबरी की टक्कर भी दे रही है। </p>
<p>इसके साथ ही कांग्रेस को महिलाओं, युवाओं, किसानों, मध्यम वर्ग और शहरी मतदाताओं के लिए ऐसी नीतियां प्रस्तुत करनी होंगी, जो वर्तमान भारत की आकांक्षाओं से मेल खाती हों। केवल अतीत की उपलब्धियों के सहारे भविष्य की राजनीति नहीं जीती जा सकती। आज का मतदाता परिणाम, पारदर्शिता और प्रभावी नेतृत्व चाहता है। यूँ देखें तो 2047 तक कांग्रेस के सामने कई चुनौतियाँ रहेंगी। क्षेत्रीय दलों का बढ़ता प्रभाव, भाजपा का मजबूत संगठन, बदलता राजनीतिक विमर्श और डिजिटल माध्यमों में बढ़ती प्रतिस्पर्धा उसके लिए आसान परिस्थितियाँ नहीं छोड़ेंगे। इसके अलावा जनता के बीच भरोसा दोबारा स्थापित करना भी पार्टी के लिए सबसे बड़ी परीक्षा होगी।</p>
<p>फिर भी सत्ता पक्ष या राजनीतिक पंडितों द्वारा कांग्रेस को पूरी तरह खारिज करना जल्दबाजी होगी। भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि इस पार्टी ने कई बार कठिन परिस्थितियों से वापसी की है। उसके पास राष्ट्रीय स्तर का अनुभव, ऐतिहासिक विरासत और देशभर में मौजूद संगठनात्मक आधार आज भी एक बड़ी पूंजी है। यदि कांग्रेस समय के साथ अपने संगठन, नेतृत्व और राजनीतिक सोच में आवश्यक बदलाव करती है, तो 2047 तक वह फिर से राष्ट्रीय राजनीति की एक प्रभावशाली शक्ति बन सकती है।</p>
<p>कुल मिलाकर देखें तो 2047 कांग्रेस के लिए केवल एक वर्ष नहीं, बल्कि आत्ममंथन और पुनर्निर्माण की कसौटी है। इतिहास उसे पहचान देता है, लेकिन भविष्य वही तय करेगा जो बदलते भारत की जरूरतों को समझेगा। यदि कांग्रेस अपनी विरासत को आधुनिक सोच, मजबूत संगठन और विश्वसनीय नेतृत्व के साथ जोड़ने में सफल होती है, तो उसकी राजनीतिक यात्रा आगे भी जारी रह सकती है। अन्यथा, वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय बनकर रह जाएगी। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 18:15:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विश्व आदिवासी दिवस विशेष: बदलते झारखंड में आदिवासी समाज, संस्कृति से विकास की नई राह तक</title>
                                    <description><![CDATA[विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर प्रस्तुत यह विशेष लेख झारखंड के आदिवासी समाज में तेजी से हो रहे सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बदलावों का विश्लेषण करता है। लेख में शिक्षा, रोजगार, तकनीक, मातृभाषा, महिलाओं की भागीदारी, पलायन, पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/jharkhand-tribal-society-culture-development-world-indigenous-day/article-25270"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-08/1b1120d6-f013-45a3-b466-04afb14562a3_samridh_1200x720-(1).jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>आलोक वर्मा</strong></p>
<p>झारखंड के आदिवासी समाज की कहानी सिर्फ अतीत की कहानी नहीं है। यह वर्तमान और भविष्य की भी कहानी है। आज वही समाज, जो अपनी परंपराओं, भाषाओं और प्रकृति से जुड़े जीवन के लिए जाना जाता है, शिक्षा, रोजगार, तकनीक, राजनीति, प्रशासन, खेल, कला और व्यवसाय के नए अवसरों से भी जुड़ रहा है।</p>
<p>यह बदलाव तेज है। इसके साथ अवसर हैं और कुछ गंभीर प्रश्न भी। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आधुनिक विकास के साथ आदिवासी पहचान किस तरह जीवित रहेगी?</p>
<h4><strong>बदलाव हमेशा से समाज का हिस्सा रहा है</strong></h4>
<p>आदिवासी समाज को स्थिर या अपरिवर्तित समाज मानना ऐतिहासिक दृष्टि से सही नहीं है। कृषि पद्धतियां बदली हैं। बाजार बदला है। शिक्षा आई है। शहरों से संपर्क बढ़ा है। रोजगार के तरीके बदले हैं।</p>
<p>आज स्मार्टफोन और इंटरनेट ने सूचना की दुनिया को गांव तक पहुंचा दिया है। कई युवा सोशल मीडिया के जरिए अपनी भाषा, संगीत और संस्कृति को नई पहचान दे रहे हैं। लोकगीतों और पारंपरिक नृत्यों के वीडियो लाखों लोगों तक पहुंच सकते हैं। इससे संस्कृति के लिए नया मंच पैदा हुआ है।</p>
<h4><strong>लेकिन डिजिटल पहुंच के साथ नई चुनौतियां भी हैं</strong></h4>
<p>डिजिटल माध्यम संस्कृति को सुरक्षित कर सकता है, लेकिन गलत प्रस्तुति का खतरा भी पैदा करता है। जब किसी समुदाय की संस्कृति को बाहरी दर्शकों के लिए सिर्फ मनोरंजन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो उसके सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ कमजोर हो सकते हैं।</p>
<p>इसलिए आदिवासी संस्कृति पर डिजिटल सामग्री बनाते समय समुदाय की अपनी आवाज को महत्व देना जरूरी है। किसी समुदाय के बारे में सामग्री उसके लिए बनाई जाए, उसके बारे में ही नहीं।</p>
<h4><strong>भाषा का भविष्य</strong></h4>
<p>भाषा किसी भी समाज की स्मृति होती है। झारखंड में संताली, मुंडारी, कुड़ुख, हो, खड़िया और दूसरी भाषाएं लंबे समय से समुदायों के सामाजिक जीवन का हिस्सा रही हैं। जनगणना 2011 की आधिकारिक तालिकाएं इन भाषाओं और जनजातीय समुदायों के बीच संबंध का सांख्यिकीय रिकॉर्ड उपलब्ध कराती हैं।</p>
<p>भाषा संरक्षण का मतलब हिंदी या अंग्रेजी का विरोध नहीं है। एक बच्चा एक से अधिक भाषाएं सीख सकता है। जरूरत इस बात की है कि आधुनिक शिक्षा और रोजगार की भाषाओं के साथ मातृभाषा भी जीवित रहे।</p>
<p>यदि कोई भाषा घर में बोलना बंद कर देती है, तो उसका सबसे बड़ा नुकसान शब्दों का नहीं, ज्ञान का होता है। लोककथाएं, कृषि ज्ञान, वनस्पतियों के स्थानीय नाम, पारंपरिक गीत और सामाजिक स्मृतियां भी भाषा के साथ जुड़ी होती हैं।</p>
<h4><strong>आदिवासी महिलाएं परिवर्तन की महत्वपूर्ण शक्ति</strong></h4>
<p>आदिवासी समाज की चर्चा अक्सर पुरुष नेतृत्व और ऐतिहासिक नायकों तक सीमित रहती है। लेकिन गांव की अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। कृषि, वन उपज, घरेलू अर्थव्यवस्था, परिवार और सामुदायिक जीवन में उनकी भागीदारी रही है।</p>
<p>आधुनिक शिक्षा और स्वयं सहायता समूहों ने कई जगह महिलाओं के आर्थिक और सामाजिक अवसर बढ़ाए हैं। भविष्य के विकास मॉडल में महिलाओं की भागीदारी को सिर्फ कल्याणकारी कार्यक्रम के रूप में नहीं, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया के रूप में देखना जरूरी है।</p>
<h4><strong>युवा और पलायन</strong></h4>
<p>झारखंड के कई हिस्सों से रोजगार के लिए युवाओं का दूसरे शहरों में जाना सामाजिक बदलाव का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पलायन अपने आप में हमेशा नकारात्मक नहीं है। रोजगार, अनुभव और आर्थिक अवसर मिल सकते हैं। समस्या तब पैदा होती है, जब पलायन मजबूरी बन जाता है।</p>
<p>स्थानीय रोजगार, कौशल विकास और छोटे उद्यमों के अवसर बढ़ाना इसलिए महत्वपूर्ण है।</p>
<p>यदि गांव का युवा अपनी शिक्षा के बाद अपने ही राज्य में सम्मानजनक रोजगार पा सके, तो स्थानीय अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी और सामाजिक संबंध भी बने रहेंगे।</p>
<h4><strong>प्राकृतिक संसाधन और स्थानीय अर्थव्यवस्था</strong></h4>
<p>झारखंड की पहचान उसके खनिज संसाधनों से भी है। लेकिन राज्य की प्राकृतिक संपदा में जंगल, पानी, कृषि और जैव विविधता भी शामिल हैं।</p>
<p>झारखंड जैव विविधता बोर्ड की सामग्री में भी राज्य की जैव विविधता और संरक्षण से जुड़े कार्यक्रमों में बिरसा मुंडा, सिद्धो-कान्हू और तिलका मांझी जैसे जनजातीय नायकों के नाम से जुड़े सम्मान और पहल दिखाई देते हैं।</p>
<p>इससे एक महत्वपूर्ण विचार सामने आता है। जनजातीय इतिहास और पर्यावरण संरक्षण को अलग-अलग विषयों की तरह देखने की जरूरत नहीं है। कई आदिवासी समुदायों का पारंपरिक ज्ञान प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग और संरक्षण से जुड़ा रहा है।</p>
<h4><strong>जलवायु परिवर्तन की नई चुनौती</strong></h4>
<p>बारिश के पैटर्न में बदलाव, तापमान में वृद्धि और कृषि पर मौसम का असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। जिन समुदायों की आजीविका कृषि और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिक निर्भर है, उनके लिए यह चुनौती और महत्वपूर्ण हो जाती है।</p>
<p>इसलिए भविष्य की योजनाओं में स्थानीय पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक, दोनों को साथ रखना उपयोगी हो सकता है। स्थानीय बीज, जल संरक्षण, मिश्रित कृषि, वानिकी और मौसम आधारित कृषि सलाह जैसे विषय ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।</p>
<h4><strong>संस्कृति पर्यटन की वस्तु नहीं</strong></h4>
<p>झारखंड की आदिवासी संस्कृति पर्यटन के लिए आकर्षण का बड़ा स्रोत बन सकती है। लेकिन संस्कृति को सिर्फ पर्यटन उत्पाद में बदलना उचित नहीं होगा। किसी नृत्य को देखने वाला पर्यटक उसकी सामाजिक भूमिका नहीं जान सकता। किसी पारंपरिक चित्रकला को खरीदने वाला उसके पीछे की कथा नहीं जान सकता।</p>
<p>इसलिए सांस्कृतिक पर्यटन में स्थानीय समुदाय की भागीदारी और आर्थिक लाभ जरूरी है। यदि संस्कृति से आय पैदा होती है, तो उसका बड़ा हिस्सा उस समुदाय तक पहुंचना चाहिए, जिसकी संस्कृति का उपयोग हो रहा है।</p>
<h4><strong>शिक्षा का अगला चरण</strong></h4>
<p>शिक्षा की चुनौती अब सिर्फ स्कूल तक पहुंचने की नहीं है। अब सवाल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का है।</p>
<p>क्या बच्चे उच्च शिक्षा तक पहुंच पा रहे हैं? क्या उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के अवसर मिल रहे हैं? क्या ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल शिक्षा उपलब्ध है? क्या छात्र अपनी मातृभाषा और आधुनिक ज्ञान के बीच संबंध बना पा रहे हैं? इन सवालों का समाधान झारखंड के मानव संसाधन विकास से सीधे जुड़ा है।</p>
<h4><strong>स्वास्थ्य में स्थानीय जरूरतों को समझना</strong></h4>
<p>आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा को स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार विकसित करना जरूरी है। दूरदराज के गांव, परिवहन की समस्या, स्वास्थ्य केंद्र तक दूरी और प्रशिक्षित कर्मियों की उपलब्धता जैसी समस्याएं सेवा की पहुंच को प्रभावित कर सकती हैं।</p>
<p>टेलीमेडिसिन, मोबाइल मेडिकल यूनिट और स्थानीय स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की भूमिका बढ़ाई जा सकती है। साथ ही, पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक चिकित्सा के बीच वैज्ञानिक संवाद पर भी काम किया जा सकता है।</p>
<h4><strong>संस्कृति बचाने का सही तरीका क्या है?</strong></h4>
<p>किसी संस्कृति को बचाने का सबसे अच्छा तरीका उसे अतीत में बंद कर देना नहीं है। संस्कृति तब जीवित रहती है, जब नई पीढ़ी उसे अपने जीवन में इस्तेमाल करती है।</p>
<p>यदि युवा अपनी भाषा में गीत लिखता है, सोशल मीडिया पर अपनी संस्कृति के बारे में बताता है, पारंपरिक कला को नए बाजार तक ले जाता है या अपने गांव की कहानी डिजिटल माध्यम पर प्रस्तुत करता है, तो संस्कृति बदल भी रही है और जीवित भी। यही जीवंत संस्कृति है।</p>
<h4><strong>भविष्य का झारखंड कैसा हो?</strong></h4>
<p>झारखंड का भविष्य तीन बातों के संतुलन पर निर्भर करेगा। पहला, आर्थिक विकास। दूसरा, सामाजिक न्याय। तीसरा, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय संरक्षण। इनमें से किसी एक को बाकी दोनों से अलग करके देखने पर विकास अधूरा रह सकता है।</p>
<p>खनिज आधारित उद्योग रोजगार और राजस्व दे सकते हैं, लेकिन स्थानीय लोगों की भागीदारी, पर्यावरण और पुनर्वास के सवालों को भी महत्व देना होगा। शहरीकरण अवसर देता है, लेकिन गांवों की अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना की अनदेखी नहीं की जा सकती।</p>
<p>डिजिटल तकनीक नई दुनिया खोलती है, लेकिन मातृभाषा और स्थानीय ज्ञान की कीमत पर नहीं।</p>
<h4><strong>विश्व आदिवासी दिवस का नया अर्थ</strong></h4>
<p>संयुक्त राष्ट्र हर वर्ष <strong>9 अगस्त</strong> को <strong>'विश्व आदिवासी दिवस'</strong> के रूप में मनाता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दुनिया में अनुमानित <strong>476 मिलियन</strong> आदिवासी लोग <strong>90 देशों</strong> में रहते हैं और हजारों भाषाओं तथा संस्कृतियों के वाहक हैं। संयुक्त राष्ट्र यह भी रेखांकित करता है कि आदिवासी समुदायों की पहचान उनके पारंपरिक ज्ञान, संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े जीवन से गहराई से जुड़ी है।</p>
<p>झारखंड के संदर्भ में इस दिन का अर्थ इसलिए और बड़ा हो जाता है। यह दिन केवल अतीत को याद करने का दिन नहीं है। यह सवाल पूछने का दिन है कि आने वाली पीढ़ी को कैसा झारखंड मिलेगा।</p>
<p>क्या उसकी भाषाएं जीवित रहेंगी? क्या उसके जंगल सुरक्षित रहेंगे? क्या उसके गांवों में गुणवत्तापूर्ण स्कूल होंगे? क्या युवाओं को स्थानीय रोजगार मिलेगा? क्या महिलाओं की निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी बढ़ेगी? क्या विकास में स्थानीय समुदाय की आवाज सुनी जाएगी? और क्या झारखंड अपनी आदिवासी पहचान को आधुनिक विकास के साथ लेकर चल पाएगा?</p>
<p>इन सवालों का जवाब किसी एक सरकारी योजना या किसी एक कानून में नहीं है। इसका जवाब उस विकास मॉडल में है, जिसमें आदिवासी समाज को विकास का लाभ पाने वाला समुदाय भर नहीं, बल्कि विकास का साझेदार माना जाए।</p>
<p>झारखंड की आदिवासी विरासत को बचाने का अर्थ अतीत को सुरक्षित रखना भर नहीं है। इसका अर्थ भविष्य को ऐसी दिशा देना भी है, जिसमें आधुनिकता और परंपरा एक-दूसरे की विरोधी न बनें।</p>
<p><strong>यही समृद्ध झारखंड की अधिक व्यापक तस्वीर हो सकती है।</strong></p>
<p><strong>(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/opinion/jharkhand-tribal-society-culture-development-world-indigenous-day/article-25270</link>
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                <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 16:07:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Opinion: सनातन और हिन्दुओं की आस्था से खिलवाड़ का खतरनाक सिलसिला</title>
                                    <description><![CDATA[वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार के इस विचार लेख में राम मंदिर दानपात्र विवाद, संसद परिसर में हुए विरोध प्रदर्शन और सनातन पर हो रही राजनीतिक बहस का विश्लेषण किया गया है। लेखक का दावा है कि कुछ राजनीतिक घटनाक्रमों के जरिए हिंदू आस्था और संत परंपरा को निशाना बनाया जा रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-sanatan-dharma-ram-mandir-politics-parliament/article-24965"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-08/2252c034-fe05-4685-b793-7cef45c198bd_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>बात 28 मई 1996 की है। लोकसभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अपनी सरकार के लिए विश्वास मत हासिल करने के दौरान संसद में भाषण दे रहे थे। इसी भाषण में उन्होंने कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को राम मंदिर/अयोध्या मुद्दे पर चेताया था कि आपको बीजेपी से लड़ना है, राम से मत लड़िए। उसी दौरान पीछे बैठे किसी सांसद की तरफ से आवाज आई कि 'राम से लड़ोगे तो निपट जाओगे।' जैसी टिप्पणी का उल्लेख भी वायरल रूप में मिलता है, लेकिन यह शब्द कहने वाले का चेहरा सामने नहीं आया। परंतु हकीकत यही रही कि कांग्रेस प्रभु श्री राम से लड़ते-लड़ते अपने सबसे बुरे दौर में पहुंच गई है। कांग्रेस ने कभी राम के अस्तित्व को नकारा तो कभी राम सेतु के बारे में गलत बयानी की। यहां तक कि कांग्रेस के नेता और प्रधानमंत्री अयोध्या जाने तक से कतराते थे। अयोध्या जाते भी तो प्रभु श्री राम के दर्शन नहीं करते थे। यही क्रम आज भी चल रहा है। रामलला के मंदिर में चंदा चोरी की घटना के नाम पर आज भी कांग्रेस ऐसा ही कर रही है। चंदा चोरी के बहाने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने सनातन और हिन्दुओं की आस्था को तार-तार करने की सभी हदें पार कर ली हैं।अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित किए जाने वाले चढ़ावे और दानपात्र से हुई कथित गड़बड़ी का मुद्दा इस समय देश की राजनीति के केंद्र में है। जहां एक तरफ अयोध्या में ट्रस्ट और पुलिस प्रशासन इस पूरे मामले की गहन जांच में जुटा है और विशेष जांच टीम गठित कर संदिग्ध कर्मचारियों व सेवादारों की भूमिका खंगाल रही है, वहीं दूसरी ओर सनातन प्रेमी जनता और साधु-संतों में इस बात को लेकर भारी रोष है कि जांच के निष्कर्षों की प्रतीक्षा किए बिना संपूर्ण साधु समाज और सनातन परंपरा को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। अयोध्या के सम्मानित संतों का स्पष्ट कहना है कि किसी भी मंदिर परिसर में यदि कोई आपराधिक तत्व या कर्मचारी गलत कार्य में लिप्त पाया जाता है, तो उसे कठोरतम दंड मिलना चाहिए, लेकिन उस बहाने भारत की हजारों वर्ष पुरानी साधु-संत परंपरा और भगवा वस्त्रों का राजनीतिक तमाशा बनाना सर्वथा अनुचित है।</p>
<p>संसद के मानसून सत्र के दौरान जिस प्रकार का दृश्य देखने को मिला, उसने पूरे देश के सनातन प्रेमी समाज को स्तब्ध और आक्रोशित कर दिया है। संसद परिसर के मकर द्वार पर पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव को भगवा वस्त्र पहनाकर, माथे पर तिलक लगाकर और हाथ में दानपात्र थमाकर एक साधु की वेशभूषा में बैठाया गया। इसके बाद विपक्ष के नेताओं द्वारा एक पूर्वनियोजित नाटक (स्किट) मंचित किया गया, जिसमें तथाकथित साधु रूपी सांसद को दानपेटी में आए पैसों को अपनी जेब में डालते और फिर दानपात्र लेकर भागते हुए दिखाया गया। इस पूरे राजनीतिक नाटक में कांग्रेस नेता राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव, सपा के अयोध्या (फैजाबाद) से सांसद अवधेश प्रसाद समेत 'इंडिया' गठबंधन के कई प्रमुख नेताओं और कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। राहुल गांधी ने उस नाटक में बाकायदा दान देने का अभिनय किया, जिसके बाद अखिलेश यादव की पार्टी के नेताओं और अन्य विपक्षी सहयोगियों ने इस पूरे घटनाक्रम का आनंद लेते हुए नारेबाजी की।इस पूरे प्रकरण पर जब समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट कर इस प्रदर्शन का समर्थन किया, तो देश भर के अखाड़ों, विद्वानों और नागरिकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। जनमानस का मानना है कि लोकतंत्र में विरोध दर्ज कराने के अनेक संवैधानिक और मर्यादित तरीके मौजूद हैं। परंतु भारत के सर्वोच्च विधायी सदन, संसद भवन के परिसर का उपयोग इस प्रकार के निम्नस्तरीय नाटकों और भगवाधारी संतों की छवि को 'चोर' के रूप में चित्रित करने के लिए करना संसदीय मर्यादाओं का चीरहरण है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी सदन और उसके परिसर में इस प्रकार वेश बदलकर नौटंकी करने पर अपनी सख्त नाराजगी जताई और स्पष्ट शब्दों में कहा कि संसद भवन देश के नीतिगत मुद्दों और जनसमस्याओं पर चर्चा के लिए है, न कि इस तरह के तमाशों के लिए। कानूनी विशेषज्ञों और संतों का मानना है कि धार्मिक प्रतीकों, भगवा वस्त्रों और साधु वेश का सार्वजनिक अपमान कर करोड़ों सनातनियों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इस कृत्य पर सर्वोच्च अदालत को स्वयं संज्ञान लेते हुए कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी भी राजनीतिक लाभ के लिए देश की आस्था का ऐसा उपहास न उड़ाया जा सके।</p>
<p>सनातन धर्म और उसकी परंपराओं को कटघरे में खड़ा करने या उनके खिलाफ रणनीतिक बयानबाजी करने का विपक्ष का यह कोई पहला प्रयास नहीं है। इतिहास साक्षी है कि पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक लाभ साधने के लिए कई बार ऐसी बयानबाजियां की गईं, जिनसे बहुसंख्यक समाज की आस्था को ठेस पहुंची। 'भगवा आतंकवाद' जैसा भ्रामक शब्द गढ़ने से लेकर स्वामी प्रसाद मौर्य द्वारा श्रीरामचरितमानस की चौपाइयों पर विवादित टिप्पणियां करने और उसकी प्रतियों को जलाने तक का घटनाक्रम देश ने देखा है। तमिलनाडु में डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन द्वारा सनातन धर्म की तुलना 'मलेरिया, डेंगू और कोरोना' से करते हुए इसे मिटाने का आह्वान करना और उस पर कांग्रेस व अन्य विपक्षी सहयोगियों की चुप्पी या अप्रत्यक्ष समर्थन, सनातन के प्रति उनकी सोच को उजागर करता है। कभी प्रभु श्री राम के अस्तित्व को अदालत में 'काल्पनिक' बताने वाला हलफनामा देना, तो कभी अयोध्या में भव्य मंदिर निर्माण के समय उसे केवल राजनीतिक चुनावी मुद्दा बताकर उसका बहिष्कार करना; यह पूरी श्रृंखला दर्शाती है कि विपक्ष का एक वर्ग वैचारिक रूप से सनातन प्रतीकों के प्रति आक्रामक रहा है।संसद के इस हालिया प्रदर्शन में एक और पहलू ने देश की जागरूक जनता को गहराई से सोचने पर मजबूर किया है। वह है गैर-हिंदू और मुस्लिम नेताओं की इस तरह के धार्मिक प्रतीकों से जुड़े विरोध प्रदर्शनों में सक्रिय भागीदारी।</p>
<p>जब भी किसी अन्य धर्म या संप्रदाय के प्रतीकों, मान्यताओं या वेशभूषा की बात आती है, तो विपक्ष की ओर से सहिष्णुता, गंगा-जमुनी तहजीब और धार्मिक संवेदनशीलता के लंबे-चौड़े भाषण दिए जाते हैं। परंतु जब भगवा वस्त्र, साधु वेश और राम मंदिर जैसे विषय आते हैं, तो वही नेता अन्य धर्मों के सहयोगियों को साथ लेकर सार्वजनिक मंचों पर उनका उपहास उड़ाने में तनिक भी संकोच नहीं करते। किसी गैर-हिंदू नेता द्वारा सनातन धर्म के पूज्य प्रतीकों का मजाक उड़ाते हुए ताली बजाना या उस नाटक का हिस्सा बनना हिंदू समाज के भीतर एक गहरा अविश्वास पैदा करता है। यह दोहरा मापदंड न केवल समाज के सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा केवल एक विशेष धर्म की आस्थाओं का अपमान करने तक ही सीमित रह गई है?अयोध्या के मुख्य अर्चक, अखाड़ा परिषद और काशी-मथुरा के प्रमुख संतों ने इस घटना के बाद एक स्वर में कहा है कि यदि राम मंदिर के किसी दानपात्र या प्रबंधन में कोई वित्तीय अनियमितता हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच हो और दोषी, चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसे जेल भेजा जाए। संत समाज स्वयं पारदर्शिता का पक्षधर है। लेकिन इस घटना की आड़ लेकर पूरी संत परंपरा को भ्रष्ट, लुटेरा और चंदा चोर साबित करने की जो साजिश संसद के प्रांगण में रची गई, वह अक्षम्य है। जिस साधु वेश ने भारत को चरित्र, त्याग, ज्ञान और विश्व बंधुत्व का संदेश दिया, उस भगवा को संसद के मुख्य द्वार पर 'चोरी का प्रतीक' बनाकर पेश करना भारतीय संस्कृति पर सीधा प्रहार है। देश का सनातन प्रेमी समाज आज विपक्ष से यह सीधा प्रश्न पूछ रहा है कि आखिर राजनीतिक वैमनस्य में अंधे होकर देश की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आत्मा पर वार करने का यह सिलसिला कब थमेगा?</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 17:29:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[अजय कुमार, लखनऊ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पॉलीमर नोटों की ओर बढ़ता भारत, सुरक्षित और टिकाऊ मुद्रा की नई शुरुआत</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने मुद्रा प्रणाली को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल करते हुए 10 और 20 रुपये के पॉलीमर (प्लास्टिक आधारित) नोटों के बड़े पैमाने पर फील्ड ट्रायल की तैयारी शुरू की है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/new-initiative-for-safe-and-sustainable-currency/article-24812"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/0271da52-db63-4528-96e8-2c634473311c_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>महेन्द्र तिवारी</strong></p>
<p>भारत की अर्थव्यवस्था निरंतर विस्तार के नए चरण में प्रवेश कर रही है। डिजिटल भुगतान के बढ़ते प्रचलन के बावजूद नकद मुद्रा आज भी करोड़ों भारतीयों के दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है। देश के छोटे व्यापार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक परिवहन, कृषि बाजार और असंगठित क्षेत्र का बड़ा हिस्सा आज भी नकद लेनदेन पर निर्भर है। ऐसे में मुद्रा की गुणवत्ता, सुरक्षा और टिकाऊपन केवल तकनीकी विषय नहीं रह जाते, बल्कि आर्थिक व्यवस्था की विश्वसनीयता से सीधे जुड़े होते हैं। इसी संदर्भ में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा पॉलीमर अर्थात प्लास्टिक आधारित नोटों की दिशा में उठाया गया कदम अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। केंद्र सरकार ने आरबीआई के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए दस रुपये और बीस रुपये के पॉलीमर नोटों के बड़े पैमाने पर फील्ड ट्रायल की अनुमति दी है। पहले चरण में दोनों मूल्यवर्ग के एक एक अरब नोटों का परीक्षण किया जाएगा। यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो भविष्य में अन्य मूल्यवर्ग के नोटों में भी इस तकनीक का विस्तार किया जा सकता है। फिलहाल सरकार ने स्पष्ट किया है कि कागजी नोटों को तत्काल हटाने की कोई योजना नहीं है और यह केवल परीक्षण आधारित पहल है।</p>
<p>पॉलीमर नोट सामान्य कागज से नहीं बल्कि विशेष प्रकार के सिंथेटिक पॉलीमर पदार्थ से बनाए जाते हैं। यह सामग्री नमी, धूल, गंदगी और बार बार मोड़े जाने जैसी परिस्थितियों को बेहतर ढंग से सहन कर सकती है। यही कारण है कि इनकी आयु पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में कई गुना अधिक होती है। सामान्यतः कम मूल्यवर्ग के नोट सबसे अधिक हाथों से गुजरते हैं और कुछ ही महीनों में फटने या खराब होने लगते हैं। इसके कारण रिजर्व बैंक को हर वर्ष बड़ी संख्या में पुराने नोट वापस लेकर नए नोट छापने पड़ते हैं। यदि पॉलीमर नोट अपेक्षा के अनुसार लंबे समय तक चलते हैं तो नोटों की छपाई, परिवहन और नष्ट करने की लागत में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।</p>
<p>भारत में नकली नोटों की चुनौती लंबे समय से चिंता का विषय रही है। समय समय पर सुरक्षा एजेंसियों ने नकली भारतीय मुद्रा के नेटवर्क का खुलासा किया है। नकली नोट केवल आर्थिक नुकसान नहीं पहुंचाते बल्कि उनका उपयोग अवैध गतिविधियों और संगठित अपराध में भी किया जाता है। पॉलीमर नोटों में पारदर्शी विंडो, उन्नत होलोग्राम, रंग बदलने वाली स्याही, सूक्ष्म प्रिंटिंग और अन्य आधुनिक सुरक्षा विशेषताएं जोड़ी जा सकती हैं। इन विशेषताओं की नकल करना पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में कहीं अधिक कठिन माना जाता है। इसलिए पॉलीमर नोट नकली मुद्रा पर प्रभावी नियंत्रण का माध्यम बन सकते हैं।</p>
<p>इस पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू पर्यावरण से भी जुड़ा हुआ है। पहली नजर में प्लास्टिक शब्द सुनकर पर्यावरण संबंधी चिंताएं स्वाभाविक लग सकती हैं, लेकिन पॉलीमर नोट सामान्य प्लास्टिक नहीं होते। इनका निर्माण विशेष तकनीक से किया जाता है और उपयोग के बाद इन्हें पुनर्चक्रित भी किया जा सकता है। चूंकि इनकी आयु अधिक होती है इसलिए समान अवधि में कम संख्या में नोट छापने पड़ते हैं। इससे कागज की खपत, ऊर्जा की आवश्यकता और परिवहन संबंधी खर्च में भी कमी आती है। कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी माना है कि लंबे समय में पॉलीमर नोट पर्यावरणीय दृष्टि से लाभकारी सिद्ध हो सकते हैं।</p>
<p>दुनिया के अनेक देशों ने पहले ही पॉलीमर मुद्रा को अपनाकर इसके लाभ प्राप्त किए हैं। ऑस्ट्रेलिया इस तकनीक को अपनाने वाला पहला देश था। इसके बाद कनाडा, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, रोमानिया और अनेक अन्य देशों ने भी अपनी मुद्रा में पॉलीमर तकनीक का उपयोग किया। इन देशों के अनुभव बताते हैं कि पॉलीमर नोट अधिक समय तक सुरक्षित रहते हैं और नकली नोटों की घटनाओं में कमी लाने में सहायक होते हैं। भारत जैसे विशाल देश के लिए इन अनुभवों का अध्ययन अत्यंत उपयोगी हो सकता है।</p>
<p>भारत में पॉलीमर नोटों का विचार नया नहीं है। वर्ष 2013 और उसके बाद भी सीमित स्तर पर कुछ शहरों में इनका परीक्षण किया गया था। उस समय विभिन्न तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। अब बदलती आर्थिक आवश्यकताओं, बेहतर तकनीक और बढ़ती मुद्रा मांग को देखते हुए इसे नए रूप में पुनर्जीवित किया गया है। इस बार परीक्षण का दायरा पहले की तुलना में कहीं बड़ा रखा गया है ताकि अलग अलग जलवायु, भौगोलिक परिस्थितियों और उपयोग के स्तर पर नोटों के प्रदर्शन का व्यापक मूल्यांकन किया जा सके।</p>
<p>भारत जैसे देश में मौसम की विविधता एक बड़ी चुनौती है। कहीं अत्यधिक गर्मी पड़ती है तो कहीं लगातार वर्षा होती है। कई क्षेत्रों में धूल और नमी का स्तर भी अधिक रहता है। ऐसे वातावरण में कागजी नोट अपेक्षाकृत जल्दी खराब हो जाते हैं। फील्ड ट्रायल का उद्देश्य यही समझना है कि पॉलीमर नोट वास्तविक परिस्थितियों में कितने प्रभावी सिद्ध होते हैं। यदि वे इन परिस्थितियों में भी अपनी गुणवत्ता बनाए रखते हैं तो उनका व्यापक उपयोग आर्थिक दृष्टि से लाभदायक हो सकता है।</p>
<p>हालांकि इस योजना के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। पॉलीमर नोटों के निर्माण की प्रारंभिक लागत कागजी नोटों की तुलना में अधिक होती है। इसके अलावा एटीएम मशीनों, नकदी गिनने वाली मशीनों और बैंकिंग प्रणाली के कुछ उपकरणों में आवश्यक तकनीकी परिवर्तन भी करने पड़ सकते हैं। जनता को नए नोटों की विशेषताओं की जानकारी देना और उन्हें नकली नोटों से अलग पहचानने का प्रशिक्षण देना भी आवश्यक होगा। इसलिए यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं बल्कि प्रशासनिक और सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।</p>
<p>भारत में डिजिटल भुगतान प्रणाली तेजी से विकसित हुई है। यूपीआई ने लेनदेन की दुनिया बदल दी है, फिर भी नकदी की उपयोगिता समाप्त नहीं हुई है। छोटे दुकानदारों, ग्रामीण क्षेत्रों, सीमित इंटरनेट वाले इलाकों और अनेक सामाजिक परिस्थितियों में नकद भुगतान आज भी सबसे सुविधाजनक माध्यम है। इसलिए डिजिटल अर्थव्यवस्था और नकद मुद्रा दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। पॉलीमर नोटों की पहल इसी संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाती है, जिसमें आधुनिक तकनीक अपनाते हुए नकद मुद्रा को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाया जा रहा है।</p>
<p>आरबीआई का यह निर्णय केवल नए प्रकार के नोट जारी करने तक सीमित नहीं है बल्कि यह भविष्य की मुद्रा व्यवस्था की दिशा भी तय करता है। यदि परीक्षण सफल रहता है तो भारत उन देशों की श्रेणी में शामिल हो जाएगा जिन्होंने आधुनिक तकनीक के माध्यम से अपनी मुद्रा प्रणाली को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाया है। इससे जनता का विश्वास मजबूत होगा, नकली नोटों की चुनौती कम होगी और मुद्रा प्रबंधन की लागत में भी दीर्घकालिक बचत संभव होगी।</p>
<p>यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल कागजी नोटों को समाप्त करने का कोई निर्णय नहीं लिया गया है। परीक्षण पूरा होने के बाद उसके परिणामों का मूल्यांकन किया जाएगा। यदि अपेक्षित सफलता मिलती है तभी आगे की रणनीति तय होगी। यह सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि भारत की विशाल आबादी और विविध परिस्थितियों में किसी भी बड़े परिवर्तन को चरणबद्ध तरीके से लागू करना ही व्यावहारिक होता है।</p>
<p>आर्थिक सुधारों की सफलता केवल नई नीतियां बनाने से नहीं बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन से निर्धारित होती है। पॉलीमर नोटों का प्रयोग भी इसी कसौटी पर परखा जाएगा। यदि यह पहल सफल होती है तो भारत की मुद्रा व्यवस्था अधिक आधुनिक, सुरक्षित और टिकाऊ बन सकती है। इससे नकली नोटों पर नियंत्रण, सरकारी खर्च में कमी, जनता को बेहतर गुणवत्ता वाले नोट और बैंकिंग व्यवस्था को अधिक दक्ष बनाने जैसे अनेक लाभ प्राप्त हो सकते हैं। आने वाले वर्षों में यह पहल भारतीय मुद्रा इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तनों में से एक सिद्ध हो सकती है और यह दिखाएगी कि तकनीकी नवाचार किस प्रकार आम नागरिक के दैनिक जीवन को भी अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक बना सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 16:27:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>हर दिल में बसने वाले नायक: जेआरडी टाटा की मानवीय विरासत आज भी प्रेरणास्रोत</title>
                                    <description><![CDATA[जेआरडी टाटा केवल एक सफल उद्योगपति नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों, नैतिक नेतृत्व और राष्ट्र निर्माण के प्रतीक थे। उन्होंने कर्मचारियों के सम्मान, नवाचार, सामाजिक उत्तरदायित्व और उत्कृष्ट कार्यसंस्कृति को हमेशा प्राथमिकता दी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/success-story/jrd-tata-human-values-leadership-tata-steel-legacy/article-24745"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/dbdd5b11-8db0-4111-9832-b37662cd1dc8_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>इतिहास जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा (जे.आर.डी. टाटा) को एक दूरदर्शी उद्योगपति, अग्रणी विमान चालक, राष्ट्र निर्माता और आधुनिक भारतीय उद्योग के शिल्पकार के रूप में याद करता है। लेकिन जिन लोगों ने उन्हें निकट से जाना, वे उन्हें उनकी उपलब्धियों से भी बढ़कर उनकी मानवीयता और विनम्रता के लिए याद करते हैं। </p>
<p>वे ऐसे विलक्षण नेता थे, जो बोलने से पहले सुनने में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि हर व्यक्ति, चाहे उसका पद कोई भी हो, सम्मान और गरिमा का समान अधिकारी है। उन्होंने कभी अधिकार का सहारा लेकर नेतृत्व नहीं किया; बल्कि अपने आदर्श आचरण से उत्कृष्टता की प्रेरणा दी।</p>
<p>जे.आर.डी. टाटा से जुड़ी अनगिनत कहानियाँ हैं। उनमें से कई कभी किताबों में दर्ज नहीं हो सकीं, लेकिन जिन लोगों के जीवन को उन्होंने स्पर्श किया, उनकी यादों में वे आज भी जीवंत हैं।</p>
<p>मुंबई के स्टील हाउस में रहने वाले लोग आज भी बताते हैं कि जे.आर.डी. टाटा कई बार स्वयं कार चलाकर किसी को उसके घर छोड़ने चले जाते थे। कई बार वे परिवार के साथ एक प्याली चाय पर आत्मीयता से बातचीत करते  कुछ पल भी बिताते थे और अक्सर शाम का समापन बच्चों के साथ नीचे खेलते हुए होता था। उस समय वे भारत के सबसे बड़े औद्योगिक समूहों में से एक के अध्यक्ष नहीं, बल्कि सबके प्रिय मित्र बन जाते थे।</p>
<p>बॉम्बे हाउस की एक और घटना जे.आर.डी. टाटा के व्यक्तित्व की गहराई को बखूबी दर्शाती है। एक दिन वे लिफ्ट के लिए धैर्यपूर्वक कतार में अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे, तब भी लिफ्ट ऑपरेटर ने उन्हें कतार तोड़कर आगे जाने की अनुमति नहीं दी। उसके लिए नियम सबके लिए समान थे, यहाँ तक कि चेयरमैन के लिए भी। बाद में जब उस कर्मचारी का तबादला कर दिया गया, तो जे.आर.डी. ने तुरंत हस्तक्षेप किया। उन्होंने कहा, “यह व्यक्ति सिद्धांतों और अनुशासन का पक्का है। इसे दंडित कैसे किया जा सकता है?” जे.आर.डी. टाटा के लिए सम्मान कभी पद से नहीं मिलता था, बल्कि वह व्यक्ति के चरित्र, सिद्धांतों और आचरण से अर्जित होता था।</p>
<p> उनकी विनम्रता उनके व्यक्तित्व की सबसे  विशेषताओं में से एक थी। अपने असाधारण जीवन की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने एक बार कहा था, “मुझे नहीं लगता कि मैं उस सम्मान का पूरी तरह हकदार हूँ, जो मुझे मिला है... मेरे साथ हमेशा एक उत्कृष्ट टीम रही।” यही उनके नेतृत्व का सार था। वे स्वयं श्रेय लेने के बजाय अपनी टीम को आगे बढ़ाते थे और हर व्यक्ति को बड़े सपने देखने, निर्भीक होकर नवाचार करने तथा सामूहिक रूप से उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करते थे।</p>
<p>1938 से 1984 तक टाटा स्टील के चेयरमैन के रूप में जे.आर.डी. टाटा ने तकनीकी आधुनिकीकरण को नई दिशा दी, लेकिन यह भी सुनिश्चित किया कि किसी भी प्रगति का वास्तविक केंद्र उसके लोग होते हैं। उन्होंने कर्मचारियों के कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी, प्रगतिशील मानव संसाधन नीतियों को बढ़ावा दिया, प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच संयुक्त परामर्श की संस्कृति को प्रोत्साहित किया तथा ऐसी अनेक पहलों की नींव रखी, जो आज भी टाटा स्टील की ‘पीपल-फर्स्ट’ संस्कृति को सशक्त बनाती हैं।</p>
<p>उनका विश्वास सरल, किन्तु अत्यंत गहरा था: कोई भी संस्थान तभी सफल होता है, जब उससे जुड़े लोग समृद्ध और प्रगतिशील हों।</p>
<p>जिम्मेदार व्यवसाय के वैश्विक प्राथमिकता बनने से बहुत पहले, जे.आर.डी. ने नैतिकता, कर्मचारियों के कल्याण और राष्ट्र-निर्माण को व्यवसाय की सफलता से अलग नहीं, बल्कि उसका अभिन्न हिस्सा माना। परिवार कल्याण, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक विकास के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने जमशेदपुर को एक आदर्श औद्योगिक नगर में बदल दिया, जबकि नैतिक नेतृत्व के प्रति उनकी हिमायत आज भी उनकी जयंती के आसपास मनाए जाने वाले टाटा स्टील के वार्षिक एथिक्स मंथ के लिए प्रेरणा बनी हुई है।</p>
<p>इनोवेशन भी जेआरडी की दूरदर्शी सोच का एक प्रमुख आधार था। चाहे टाटा स्टील का आधुनिकीकरण हो, भारत के विमानन उद्योग की नींव रखने की पहल हो या युवा नेतृत्व को परंपरागत सोच से आगे बढ़कर नए रास्ते अपनाने के लिए प्रेरित करना—जेआरडी ने हमेशा लोगों को वर्तमान से आगे सोचने और भविष्य के निर्माण के लिए कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया।</p>
<p>उनके निधन के तीन दशक से अधिक समय बाद भी उनकी विरासत टाटा स्टील की कार्यसंस्कृति और मूल्यों को सार्थक रूप से दिशा दे रही है। यह हमारी नैतिकता और सत्यनिष्ठा के प्रति अटूट प्रतिबद्धता में रची बसी है। यह कर्मचारियों के समग्र कल्याण—शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य—पर हमारे विशेष ध्यान में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। साथ ही, सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने, वर्ष 2045 तक नेट-ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य प्राप्त करने तथा नवाचार, स्वच्छ प्रौद्योगिकियों और उत्तरदायी व्यावसायिक कार्यप्रणालियों में निरंतर निवेश की हमारी प्रतिबद्धता में भी उनकी दूरदृष्टि साफ़ दिखाई देती है।</p>
<p>सबसे बढ़कर, उनकी विरासत हमारे इस विश्वास में जीवित है कि वास्तविक प्रगति वही है, जो लोगों के जीवन को बेहतर बनाए।</p>
<p>वन टाटा स्टील के रूप में हम जमशेदजी टाटा और जेआरडी टाटा के आदर्शों को आगे बढ़ाते हुए केवल एक संगठन ही नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, संवेदनशीलता और उद्देश्यपूर्ण सोच के साथ समाज, उद्योग और राष्ट्र को भी सशक्त बनाने के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं।</p>
<p>कुछ लीडर्स अपने बनाए हुए व्यवसायों के कारण इतिहास में अमर हो जाते हैं। जेआरडी टाटा उन अनगिनत जीवनों के कारण हमेशा याद किए जाएंगे, जिन्हें उन्होंने अपने नेतृत्व, मानवीय दृष्टिकोण और मूल्यों से समृद्ध किया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>स्टोरी </category>
                                            <category>सक्सेस स्टोरी</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 14:31:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>हरमू नदी की दर्दभरी कहानी: कभी जीवनदायिनी, आज गंदे नाले में तब्दील</title>
                                    <description><![CDATA[रांची की ऐतिहासिक हरमू नदी पर आधारित इस विचारोत्तेजक लेख में लेखक अरविंद शर्मा ने नदी की बदहाल स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। कभी स्वच्छ जल, बाढ़ और सामाजिक जीवन का केंद्र रही हरमू आज गंदे नाले में बदल चुकी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/harmu-river-ranchi-painful-story-environment-article/article-24743"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/untitled-design-(11)_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>अरविंद शर्मा</strong></p>
<p>बड़े भाई प्रकाश सहाय ने रांची की हरमू नदी की दुर्दशा पर रोते हुए एक ऐसी तस्वीर सामने रखी है, जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को बेचैन कर दे। उनके बचपन में इस नदी में बाढ़ आती थी, कई मोहल्ले डूब जाते थे। बच्चे इसमें नहाते थे, तैरना सीखते थे और लोग इसे नदी की तरह सम्मान देते थे। आज हालत यह है कि नाक डुबोकर मरने के लिए भी इसमें चुल्लू भर साफ पानी नहीं है। जो बह रहा है, वह आसपास के घरों की नालियों से आने वाला गंदा पानी है। प्लास्टिक और कचरा है। यह केवल एक नदी की नहीं, बल्कि हमारी सोच, हमारी व्यवस्था और हमारी संवेदनहीनता की भी कहानी है।</p>
<p>अगर आप रांची के निवासी हैं या कभी किसी काम से वहां गए होंगे तो जरूर देखा होगा कि रांची में हरमू के नाम पर हरमू रोड है। हरमू कालोनी है और हरमू मुक्ति धाम भी है। लेकिन सच यह भी है कि सबसे अधिक मुक्ति की जरूरत स्वयं हरमू नदी को ही है। यह विडंबना किसी व्यंग्य से कम नहीं है कि जिस नदी के किनारे कभी जीवन बसता था, आज उसी के गंदे पानी के किनारे अंतिम संस्कार होते हैं। हरमू अब नदी नहीं रही। मर गई है। जब नदी नाला बन जाती है तो केवल पानी नहीं मरता, शहर का भविष्य भी मर जाता है। भू-जल शर्म से पाताल में धंस जाता है। गर्मी बढ़ जाती है और फिर पुनर्जीवन के नाम पर करोड़ों रुपये का बंदरबांट होने लगता है। </p>
<p>1994-95 की बात है। तब मैं रांची विश्वविद्यालय से जर्नलिज्म कर रहा था। अपने गृह जिला गया से निकलकर पहली बार रांची गया था। इसकी खूबसूरत पहाड़ियों और हरियाली को देखकर स्वर्ग जैसा अहसास होता था। इसमें हरमू नदी की भी बड़ी भूमिका होती थी, क्योंकि यह शहर की प्राकृतिक जल-निकासी व्यवस्था की रीढ़ थी। नगड़ी के पठारी क्षेत्र से निकलने वाली यह नदी लगभग 40 किलोमीटर बहकर चुटिया के पास स्वर्णरेखा नदी में मिलती है। तब इसका पानी स्वच्छ होता था। छठ जैसे पर्वों पर श्रद्धालु इसके तट पर अर्घ्य देने पहुंचते थे। गर्मियों में भी पानी रहता था। बरसात में पानी का बहाव लोगों के लिए रोमांच बन जाता था। आज हल्की बारिश में भी रांची की सड़कें डूब जाती हैं और गर्मियों में पानी के लिए हाहाकार मचता है, तब समझ में आता है कि नदी को मारने की कीमत आखिर कितनी महंगी पड़ रही है।</p>
<p>इतिहास भी हरमू का महत्व बताता है। वर्ष 1939 में इसी नदी के तट पर आदिवासी महासभा के सम्मेलन में अलग झारखंड राज्य की मांग को संगठित स्वर मिला था। मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा के नेतृत्व ने यहीं से आंदोलन को नई दिशा दी। जिस नदी ने झारखंड के राजनीतिक इतिहास को सहेजा, उसी नदी को आज हमने गंदे नाले में बदल दिया।</p>
<p>सवाल है कि हरमू की हत्या किसने की? जवाब भी सीधा है-सरकारों ने, प्रशासन ने और हम सबने मिलकर। शहर बढ़ता गया, कॉलोनियां बसती गईं, प्राकृतिक नाले पाट दिए गए, नदी के किनारों पर अतिक्रमण होता गया और घरों का सीवेज सीधे नदी में गिरने लगा। </p>
<p>प्रकाश सहाय को इस बात पर भी रोना आता है कि हरमू के पुनर्जीवन पर डेढ़ सौ करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा चुके हैं। तटबंध बने, पैदल पथ बने, रेलिंग लगी, रंग-रोगन हुआ और तस्वीरें खिंचीं। लेकिन नदी आज भी नाला ही बनी हुई है। क्योंकि नदी का जीवन सीमेंट, टाइल्स और सुंदर लाइटों से नहीं लौटता। उसे जीवित रखने के लिए साफ पानी चाहिए, अविरल प्रवाह चाहिए और अतिक्रमण से मुक्ति चाहिए। यदि सीवेज उसी तरह गिरता रहेगा तो सौंदर्यीकरण सिर्फ सरकारी फाइलों एवं उद्घाटन समारोहों तक ही सीमित रहेगा।</p>
<p>यदि हरमू को बचाना है तो सौंदर्यीकरण से आगे बढ़कर सीवेज को पूरी तरह रोकना होगा। अतिक्रमण हटाना होगा और प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्र को वापस देना होगा। उतनी ही जिम्मेदारी आम लोगों की भी है। जिस दिन लोग नदी को कूड़ेदान समझना बंद कर देंगे, उसी दिन उसके पुनर्जन्म की शुरुआत होगी। हरमू प्रश्न बनकर खड़ी है-क्या हम अपनी अगली पीढ़ी को एक जीवित नदी देंगे या केवल उसकी तस्वीर और इतिहास? जवाब सरकार को भी देना है और हम-आपको भी। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 14:20:09 +0530</pubDate>
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