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                <title>ओपिनियन - Samridh Jharkhand</title>
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                <title>राज्यसभा चुनाव में बड़ा खेल! क्रॉस वोटिंग से पलट सकता है पूरा समीकरण, नाथवानी की बढ़ी बढ़त?</title>
                                    <description><![CDATA[झारखंड राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। भाजपा समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी की संभावित जीत और क्रॉस वोटिंग की चर्चाओं ने चुनावी मुकाबले को रोचक बना दिया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/politics/big-game-in-rajya-sabha-elections-cross-voting-can-change/article-23226"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/image-(5)_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd"><strong>सुनील सिंह</strong></p>
<p class="isSelectedEnd"><strong>रांची:</strong> राज्यसभा चुनाव में भाजपा समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी की जीत की पटकथा पर्दे के पीछे लिखी जा चुकी है। अब सिर्फ परिणाम का इंतजार है। क्रॉस वोटिंग का प्लांट तैयार है।</p>
<p class="isSelectedEnd">चुनाव को लेकर रांची, दिल्ली और पटना तक हलचल तेज है। क्रॉस वोटिंग की संभावना ने कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा और कांग्रेस के बड़े नेताओं की नींद उड़ा दी है। क्रॉस वोटिंग इंडिया गठबंधन के अन्य घटक दलों के साथ-साथ कांग्रेस में भी होने की संभावना है। यानी कांग्रेस में ही सब कुछ ठीक नहीं है। जब अपना घर ही ठीक नहीं है, तब दूसरे का घर ठीक होगा, इसकी क्या गारंटी है?</p>
<p class="isSelectedEnd">हमारे पास जैसी सूचना है और चुनाव में यदि यह सच हुआ, तो नाथवानी को 30-31 से अधिक वोट मिलेंगे। वे झामुमो प्रत्याशी बैजनाथ राम से आगे निकल जाएंगे। जीत को लेकर नाथवानी आत्मविश्वास से भरे दिख रहे हैं, क्योंकि सब कुछ सेट हो चुका है। पटकथा लिखी जा चुकी है।</p>
<p class="isSelectedEnd">राजद के विधायक पिछले दिनों लालू यादव के जन्मदिन समारोह में शामिल होने के बहाने पटना गए थे। राज्यसभा चुनाव में क्या करना है, लालू और तेजस्वी ने अपने विधायकों को संदेश दे दिया है। इशारा है— बिहार का बदला झारखंड में। बाकी बातें पर्दे के पीछे हैं। नाथवानी की मुलाकात दिल्ली में इस पार्टी के बड़े नेताओं से पिछले दिनों हुई थी।</p>
<p class="isSelectedEnd">इधर, सरकार को समर्थन दे रहे दो-तीन विधायक नाथवानी के संपर्क में हैं। इन लोगों ने साथ देने का भरोसा दिया है। जयराम महतो भी नाथवानी के साथ ही जाएंगे, इसकी पूरी संभावना है।</p>
<p class="isSelectedEnd">इधर, इंडिया गठबंधन को एकजुट करने की कोशिश तो हो रही है, लेकिन इसमें कितनी सफलता मिलेगी, यह चुनाव परिणाम बताएगा। झामुमो और कांग्रेस के अंदरखाने भी सब कुछ ठीक नहीं है। इसका असर परिणाम पर पड़ सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">राजनीतिक हलकों में सवाल यह भी उठ रहा है कि अगर कांग्रेस प्रत्याशी की हार होती है, तो सरकार का भविष्य क्या होगा? कांग्रेस क्या करेगी?</p>
<p class="isSelectedEnd">संभावना है कि कांग्रेस सरकार से बाहर नहीं जाएगी, क्योंकि उसकी अपनी राजनीतिक मजबूरी है।</p>
<p class="isSelectedEnd">सरकार को लेकर फैसला हेमंत सोरेन को लेना है। हेमंत सोरेन जब तक चाहेंगे, कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार चलाएंगे। यदि वह कोई नया समीकरण बनाते हैं, तो इसका फैसला भी उन्हीं को लेना है। सब कुछ हेमंत सोरेन के हाथ में ही है।</p>
<p><strong>18 जून की तिथि झारखंड की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण होने वाली है।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 15 Jun 2026 18:59:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>इतिहास नहीं, जनता को जवाब चाहिए; भाजपा के 12 साल का हिसाब चाहिए: विजय शंकर नायक </title>
                                    <description><![CDATA[झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमिटी के प्रदेश प्रवक्ता विजय शंकर नायक ने अपने लेख में भाजपा सरकार के 12 वर्षों के कार्यकाल पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने रोजगार, महंगाई, किसानों की आय, नोटबंदी, जीएसटी, कोविड प्रबंधन और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिति जैसे मुद्दों को उठाते हुए सरकार से जवाब मांगा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/politics/vijay-shankar-nayak-article-bjp-12-years-accountability-employment-inflation/article-23106"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/9007269d-5be9-4b17-9c48-22d73ed2efad_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>सत्ता का मूल्यांकन नारों, विज्ञापनों और इवेंट मैनेजमेंट से नहीं, बल्कि जनता के जीवन में आए बदलावों से होता है। वर्ष 2014 में भाजपा ने देश की जनता से बड़े-बड़े वादे किए थे। भ्रष्टाचार मुक्त भारत, हर साल दो करोड़ रोजगार, किसानों की आय दोगुनी, महंगाई पर नियंत्रण, काला धन वापस लाकर हर खाते में 15 लाख रुपये, अच्छे दिन और विकास का नया मॉडल—इन वादों के सहारे भाजपा सत्ता में आई थी। आज 12 वर्ष बाद देश का नागरिक पूछ रहा है कि उन वादों का क्या हुआ?</p>
<p>भाजपा सरकार का सबसे बड़ा संकट यह है कि वह अपने 12 वर्षों का हिसाब देने के बजाय इतिहास बदलने और राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने में अधिक व्यस्त दिखाई देती है। नेहरू, इंदिरा गांधी और कांग्रेस की विरासत पर हमला भाजपा की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन चुका है, क्योंकि वर्तमान की विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए अतीत पर हमला करना सबसे आसान रास्ता है।</p>
<p>लेकिन इतिहास प्रचार से नहीं बदलता। पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे। उन्हीं के नेतृत्व में लोकतांत्रिक संस्थाओं, सार्वजनिक क्षेत्र, वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थानों, IIT, AIIMS, बड़े बांधों और आधुनिक भारत की बुनियाद रखी गई। सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. भीमराव आंबेडकर और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी तक नेहरू मंत्रिमंडल का हिस्सा रहे। आज भाजपा इन महापुरुषों की विरासत का राजनीतिक उपयोग करती है, लेकिन उनके संवैधानिक और लोकतांत्रिक आदर्शों को कमजोर करने का आरोप भी उसी पर लगता है।</p>
<h3><span><strong>वादों का पहाड़, नतीजों का अकाल</strong></span></h3>
<p>2014 में कहा गया था कि हर साल दो करोड़ नौकरियां पैदा होंगी। यदि यह वादा पूरा होता, तो 12 वर्षों में करोड़ों युवाओं को रोजगार मिल चुका होता। लेकिन आज देश का युवा नौकरी के लिए भटक रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, रिक्त पदों पर नियुक्तियों में देरी और रोजगार के अवसरों की कमी युवाओं के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा रही है।</p>
<p>किसानों से आय दोगुनी करने का वादा किया गया था। लेकिन किसानों को अपनी मांगों के लिए दिल्ली की सीमाओं पर महीनों आंदोलन करना पड़ा। तीन कृषि कानूनों को किसानों के हित में बताया गया, लेकिन जब लाखों किसान सड़कों पर उतर आए, तो सरकार को उन्हें वापस लेना पड़ा। यह भाजपा सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक पराजयों में से एक थी।</p>
<p>महंगाई पर नियंत्रण का दावा किया गया था। लेकिन रसोई गैस, पेट्रोल, डीजल, खाद्य पदार्थ, दाल, तेल और रोजमर्रा की वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने गरीब और मध्यम वर्ग की कमर तोड़ दी। आम आदमी की आय जितनी नहीं बढ़ी, उससे कहीं अधिक उसकी जिंदगी महंगी हो गई।</p>
<h3><span><strong>नोटबंदी : आर्थिक आपदा का अध्याय</strong></span></h3>
<p>नोटबंदी को काले धन, भ्रष्टाचार और आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कदम बताया गया था। लेकिन परिणाम क्या निकला?</p>
<p>लगभग पूरी नकदी बैंकिंग प्रणाली में वापस लौट आई। छोटे व्यापार चौपट हो गए। लाखों मजदूर बेरोजगार हुए। असंगठित क्षेत्र को भारी नुकसान हुआ। अर्थव्यवस्था की रफ्तार प्रभावित हुई। देश की जनता ने घंटों लाइन में खड़े होकर कष्ट झेला, लेकिन वादे के अनुरूप परिणाम कभी सामने नहीं आए।</p>
<p>इतिहास नोटबंदी को आर्थिक सुधार नहीं, बल्कि आर्थिक अव्यवस्था के रूप में याद रखेगा।</p>
<h3><span><strong>जीएसटी : एक राष्ट्र, अनेक परेशानियां</strong></span></h3>
<p>जीएसटी को ऐतिहासिक कर सुधार बताया गया था, लेकिन छोटे और मध्यम व्यापारियों के लिए यह जटिल अनुपालन और बढ़ती कागजी प्रक्रिया का प्रतीक बन गया। बड़े कॉरपोरेट समूहों के पास संसाधन थे, लेकिन छोटे दुकानदारों और लघु उद्योगों को इसका भारी बोझ उठाना पड़ा।</p>
<h3><span><strong>विकास या प्रचार?</strong></span></h3>
<p>भाजपा सरकार ने मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, आत्मनिर्भर भारत, स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेन जैसी परियोजनाओं का व्यापक प्रचार किया। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन योजनाओं ने उतने रोजगार पैदा किए, जितने वादे किए गए थे?</p>
<p>स्मार्ट सिटी परियोजनाएं अधूरी हैं। बुलेट ट्रेन अभी तक सपना बनी हुई है। मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई। चीन पर निर्भरता कम करने के दावे भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके।</p>
<p>भाजपा शासन का मॉडल विकास से अधिक विज्ञापन-आधारित शासन का मॉडल बन गया, जहां उपलब्धि से ज्यादा उसका प्रचार महत्वपूर्ण हो गया।</p>
<h3><span><strong>कोविड काल की त्रासदी</strong></span></h3>
<p>कोविड महामारी के दौरान देश ने भयावह दृश्य देखे। लाखों प्रवासी मजदूर पैदल घर लौटने को मजबूर हुए। ऑक्सीजन की कमी, अस्पतालों में अव्यवस्था और स्वास्थ्य ढांचे की कमजोरियां उजागर हुईं। महामारी ने दिखा दिया कि चमकदार प्रचार और वास्तविक प्रशासनिक तैयारी में कितना अंतर हो सकता है।</p>
<h3><span><strong>लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बढ़ते सवाल</strong></span></h3>
<p>भाजपा सरकार पर सबसे गंभीर आरोप लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता को कमजोर करने का है। विपक्ष का आरोप है कि केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ हथियार की तरह किया गया। संसद में बहस की परंपरा कमजोर हुई। मीडिया के एक बड़े हिस्से ने सत्ता से सवाल पूछने के बजाय उसका प्रचार करना अधिक उचित समझा।</p>
<p>लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है असहमति का सम्मान, संस्थाओं की स्वतंत्रता और सत्ता की जवाबदेही।</p>
<h3><span><strong>सामाजिक सौहार्द पर संकट</strong></span></h3>
<p>“सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” का नारा दिया गया था। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि पिछले वर्षों में समाज में ध्रुवीकरण बढ़ा है। बेरोजगारी, महंगाई और आर्थिक संकट जैसे मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए धार्मिक और सांप्रदायिक बहसों को लगातार राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया।</p>
<p>जब रोजगार का प्रश्न उठता है, तो धर्म की चर्चा शुरू हो जाती है। जब महंगाई पर सवाल उठता है, तो नया भावनात्मक मुद्दा सामने आ जाता है। यह लोकतांत्रिक विमर्श के लिए शुभ संकेत नहीं है।</p>
<h3><span><strong>अग्निपथ, पेपर लीक और युवाओं की निराशा</strong></span></h3>
<p>अग्निपथ योजना ने लाखों युवाओं के मन में भविष्य को लेकर असुरक्षा पैदा की। दूसरी ओर, विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाओं ने युवाओं का विश्वास तोड़ा। एक ऐसा देश, जिसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है, वहां युवाओं का निराश होना सबसे बड़ी राष्ट्रीय चिंता का विषय होना चाहिए।</p>
<h3><span><strong>निष्कर्ष : इतिहास नहीं, हिसाब चाहिए</strong></span></h3>
<p>भाजपा के 12 वर्षों का मूल्यांकन करते समय देश को विज्ञापनों, नारों और राजनीतिक अभियानों से ऊपर उठकर वास्तविकताओं को देखना होगा। बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की परेशानी, नोटबंदी की विफलता, जीएसटी की जटिलता, कोविड की त्रासदी, सामाजिक ध्रुवीकरण, संस्थाओं पर सवाल और अधूरे वादे—ये सभी ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर जवाब मांगा जाना चाहिए।</p>
<p>जनता इतिहास बदलने की कोशिशों से प्रभावित नहीं होगी। जनता अपने जीवन की वास्तविकताओं के आधार पर फैसला करेगी।</p>
<p>देश पूछ रहा है—दो करोड़ नौकरियां कहां हैं?</p>
<p>किसानों की दोगुनी आय कहां है? 15 लाख रुपये कहां हैं? महंगाई पर नियंत्रण कहां है? भ्रष्टाचार मुक्त शासन कहां है? 12 साल बाद भी यदि इन सवालों का जवाब नहीं है, तो फिर यह कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि प्रचार रही है और सबसे बड़ी विफलता जनता की उम्मीदों को पूरा न कर पाना।</p>
<p><strong>इतिहास पर कब्ज़ा नहीं, जनता को जवाब चाहिए।</strong></p>
<p><strong>भाजपा के 12 साल का हिसाब चाहिए।</strong></p>
<p>अब देश में ऐसी राजनीति होनी चाहिए, जिससे रोजगार पैदा किया जा सके, महंगाई को कम किया जा सके, किसानों, छात्रों, युवाओं, महिलाओं, गरीब-गुरबा लोगों और खासकर दलित, आदिवासी, पिछड़ा, अल्पसंख्यक तथा मजदूर वर्ग को राहत मिल सके तथा संविधान व लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत किया जा सके।</p>
<p>अंततः लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता का होता है। प्रचार, छवि निर्माण और राजनीतिक नैरेटिव कितने भी मजबूत हों, जनता का अनुभव और जीवन की वास्तविकता ही किसी सरकार की असली परीक्षा तय करती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 17:24:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राज्यसभा चुनाव: भाजपा ने क्यों और कैसे बदली रणनीति</title>
                                    <description><![CDATA[झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए चुनावी मुकाबला रोचक हो गया है। भाजपा ने अपना अधिकृत उम्मीदवार नहीं उतारते हुए निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी को समर्थन देकर नई रणनीति अपनाई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/why-and-how-did-bjp-change-its-rajya-sabha-election/article-22909"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/88ee0494-a891-4386-bbe8-759d0c868506_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd"><strong>सुनील सिंह</strong></p>
<p class="isSelectedEnd">झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों पर होने वाले चुनाव को लेकर नामांकन की प्रक्रिया सोमवार को पूरी हो गई। इसके साथ ही उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों की स्थिति को लेकर चल रही चर्चा पर विराम लग गया। अब चुनाव परिणाम पर सबकी नजर रहेगी, क्योंकि दो सीटों के लिए तीन उम्मीदवार मैदान में हैं। चुनाव में इंडिया गठबंधन एकजुट रहा तो दोनों सीटों पर उसकी जीत तय है। लेकिन यदि क्रॉस वोटिंग हुई तो कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा की हार भी निश्चित हो जाएगी और एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी एक बार फिर से राज्यसभा पहुंच जाएंगे। नाथवानी के आने के बाद चुनाव काफी रोचक और महत्वपूर्ण हो गया है। झामुमो उम्मीदवार बैजनाथ राम की जीत पक्की है। लड़ाई दूसरी सीट के लिए ही है।</p>
<p class="isSelectedEnd">राज्यसभा चुनाव में भाजपा ने अंतिम समय में अपनी रणनीति बदल ली। संख्या बल नहीं होने और दूसरे दलों के विधायकों से समर्थन नहीं मिलने का भरोसा होने के बाद उसने अपना उम्मीदवार नहीं दिया। पार्टी के कई नेताओं ने अपने स्तर से प्रयास किया। झारखंड से जो नेता टिकट के दावेदार थे, उनमें से दो-तीन नेताओं ने पार्टी नेतृत्व को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की कि यदि उन्हें टिकट मिलेगा तो वे चार-पांच वोट मैनेज कर लेंगे। लेकिन पार्टी ने उनके दावे पर भरोसा नहीं किया। इसलिए स्थानीय उम्मीदवार को मौका नहीं मिला।</p>
<p class="isSelectedEnd">प्रधानमंत्री मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य और प्रवक्ता गौरव वल्लभ को उम्मीदवार बनाए जाने की संभावना थी। इसलिए पार्टी के कहने पर वह झारखंड आए और उन्होंने नामांकन पत्र भी खरीद लिया था। पार्टी ने एक रणनीति के तहत अंत तक अधिकृत प्रत्याशी की घोषणा नहीं की।</p>
<p class="isSelectedEnd">इसी बीच रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़े परिमल नाथवानी की एंट्री हो गई। नाथवानी चुनाव जीतने में माहिर हैं। झारखंड से दो बार राज्यसभा के सांसद रह चुके हैं। उन्हें पता है कि वोट कैसे मैनेज होता है, कहां से समर्थन मिल सकता है और कमजोर कड़ी की पूरी जानकारी है। सभी दलों से उनके अच्छे रिश्ते हैं। नाथवानी ने जब भाजपा और एनडीए से समर्थन मांगा तो भाजपा तैयार हो गई। फिर गौरव वल्लभ को पीछे हटना पड़ा।</p>
<p class="isSelectedEnd">नाथवानी को समर्थन देकर भाजपा ने अच्छी रणनीति दिखाई है। यदि नाथवानी चुनाव जीत जाते हैं तो भाजपा को लाभ होगा। राज्यसभा में एक सांसद की बढ़ोतरी हो जाएगी और यदि नाथवानी हार गए तो भाजपा की इज्जत भी बच जाएगी। क्योंकि नाथवानी निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा ने उन्हें समर्थन दिया है। जीत गए तो सेहरा भाजपा के माथे और हार गए तो ठीकरा नाथवानी के माथे।</p>
<p class="isSelectedEnd">नाथवानी भी चुनाव लड़ने को लेकर दो नावों की सवारी करते रहे। पहले उन्होंने झामुमो से समर्थन की कोशिश की। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से कई दिनों से बात चल रही थी। आखिर में उनसे मुलाकात भी की, लेकिन जब बात नहीं बनी तो एनडीए खेमे में आ गए। भाजपा को एक जिताऊ उम्मीदवार चाहिए था, इसलिए भाजपा ने समर्थन दे दिया।</p>
<p class="isSelectedEnd">नाथवानी के आने से चुनाव रोचक हो गया है। क्रॉस वोटिंग की संभावना बढ़ गई है। सबसे अधिक खतरा इंडिया ब्लॉक पर ही है। कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की परेशानी बढ़ गई है। इंडिया ब्लॉक को एकजुट रखना मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के साथ-साथ कांग्रेसी नेताओं के लिए बड़ी चुनौती है।</p>
<p>चुनाव में द्वितीय वरीयता का महत्व बढ़ गया है। यदि क्रॉस वोटिंग हुई तो हार-जीत का फैसला द्वितीय वरीयता के आधार पर ही होगा। मतदान 18 जून को है। परिणाम भी इसी दिन देर शाम तक आ जाएगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 08 Jun 2026 17:52:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मोदी सरकार के 12 साल: विकसित झारखंड से विकसित भारत का संकल्प</title>
                                    <description><![CDATA[मोदी सरकार के 12 वर्ष पूरे होने के अवसर पर भाजपा झारखंड प्रदेश अध्यक्ष एवं सांसद आदित्य साहू ने झारखंड के विकास में केंद्र सरकार की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने झारखंड को अलग राज्य का दर्जा देकर नई पहचान दी, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकास, आधारभूत संरचना, जनकल्याण और जनजातीय सम्मान के क्षेत्र में नई दिशा प्रदान की।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/modi-government-12-years-viksit-jharkhand-aditya-sahu/article-22637"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/af115414-9580-4029-abb9-8f85d32d735e_samridh_1200x720-(1).jpeg" alt=""></a><br /><p>झारखंड केवल एक राज्य नहीं है। यह हमारी जनजातीय पहचान, हमारे संघर्ष, हमारी संस्कृति और हमारे स्वाभिमान की सोना माटी है। नदी, पहाड़ और घने जंगलों की इस धरती ने हमेशा अपने अधिकार और सम्मान के लिए आवाज उठाई है। दशकों की उपेक्षा के बाद 15 नवंबर 2000 का वह दिन आया, जब धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा जी की जयंती पर झारखंड को अलग राज्य का दर्जा मिला। यह श्रद्धेय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का वह वादा था जो उन्होंने इस माटी के करोड़ों लोगों से किया था और पूरा करके दिखाया।</p>
<p>श्रद्धेय अटल जी की सोच साफ थी। झारखंड जैसी खनिज संपन्न और जनजातीय बहुल धरती तभी आगे बढ़ सकती है, जब यहाँ की जनता के हिसाब से शासन चले और विकास हर गाँव तक पहुँचे। अलग राज्य बनने के बाद झारखंड की जनता के मन में एक उम्मीद जगी थी कि अब उनके सपने पूरे होंगे। लेकिन जो हुआ, वह उस उम्मीद के साथ न्याय नहीं कर सका।</p>
<p>वर्ष 2000 से 2014 तक झारखंड में सरकारें बदलती रहीं। इस दौरान नौ अलग-अलग सरकारें बनीं और तीन बार राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा। इसका सीधा असर विकास पर पड़ा। योजनाएँ बनती थीं, लेकिन जमीन तक पहुँचने में देर होती थी। कई परियोजनाएँ फाइलों में अटकी रहीं।</p>
<p>जो राज्य कोयले, लोहे और खनिज संपदा में देश के अग्रणी राज्यों में था, उसके गाँवों में सड़क नहीं थी। जहाँ की जमीन के नीचे अरबों का खजाना था, वहाँ के बच्चों के पास ढंग के स्कूल नहीं थे। किसान, मजदूर और आदिवासी परिवार योजनाओं की प्रतीक्षा करते रहे, लेकिन सरकार में अस्थिरता के चलते योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में कठिनाइयाँ आती रहीं।</p>
<p>*<strong>डबल इंजन सरकार का प्रभाव</strong>*</p>
<p>दिसंबर 2014 में झारखंड की तस्वीर बदली। केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का नेतृत्व और राज्य में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार ने मिलकर वह किया जो पहले कभी नहीं हुआ था। रघुवर दास जी झारखंड के पहले ऐसे मुख्यमंत्री बने जिन्होंने पूरे पाँच साल का कार्यकाल पूरा किया। चौदह साल में नौ सरकारें देखने वाली इस माटी के लिए यह कोई छोटी बात नहीं थी।</p>
<p>जब केंद्र और राज्य एक ही दिशा में चलते हैं तो नतीजे भी एक अलग ही स्तर पर दिखते हैं। 2014 से 2019 के बीच झारखंड के हर आम नागरिक की आय में लगभग 29 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। पूँजीगत व्यय लगभग दोगुना हुआ, खनन राजस्व में 73 प्रतिशत और निर्यात में 130 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई। लेकिन इन आँकड़ों से भी बड़ी बात यह थी कि अब योजनाएँ जमीन तक प्रभावी तरीके से पहुँच रही थीं।</p>
<p>*<strong>हर घर- हर गाँव तक पहुँचा विकास</strong>*</p>
<p>इस दौर में आम आदमी के जीवन में जो बदलाव आया, वह असली परिवर्तन था। अप्रैल 2019 तक 29 लाख से अधिक उज्ज्वला गैस कनेक्शन दिए गए। जो माताएँ और बहनें सालों से लकड़ी के धुएँ में खाना पकाती थीं, उनके चूल्हे बदल गए। करोड़ों जन-धन खाते खुले और गरीब परिवार पहली बार बैंकिंग व्यवस्था से जुड़े। लाखों परिवारों को पक्का घर मिला और शौचालय बनने से महिलाओं को सुरक्षा और सम्मान मिला।</p>
<p>आयुष्मान भारत योजना ने गरीब परिवारों को महँगे इलाज की चिंता से मुक्त किया। हजारीबाग, दुमका और पलामू में नए मेडिकल कॉलेज शुरू हुए और देवघर में राज्य के पहले एम्स की नींव पड़ी। स्वच्छ सर्वेक्षण 2018 में झारखंड को देश का सबसे स्वच्छ राज्य घोषित किया गया। सभी शहरी निकाय खुले में शौच से मुक्त हुए और रांची को स्मार्ट सिटी मिशन में शामिल किया गया।</p>
<p>*<strong>सड़क से हवाई सफर तक</strong>*</p>
<p>2014 से पहले झारखंड में रेलवे को मिलने वाला औसत सालाना बजट मात्र ₹457 करोड़ था। डबल इंजन सरकार के दौरान यह बढ़कर ₹2,200 करोड़ तक पहुँचा। जिस देवघर में श्रद्धालु घंटों बस का इंतज़ार करते थे, आज वहाँ हवाई अड्डा है। जो साहिबगंज कभी पिछड़ा कहलाता था, आज वह मल्टी-मॉडल टर्मिनल के जरिए राष्ट्रीय जलमार्ग नेटवर्क से जुड़ा है। धनबाद के इंडियन स्कूल ऑफ माइन्स को आईआईटी का दर्जा मिला और व्यापार सुगमता में झारखंड देश के अग्रणी राज्यों में शामिल हुआ।</p>
<p>2019 के बाद भी इस गति में कोई कमी नहीं आई। आज झारखंड का रेलवे बजट ₹7,306 करोड़ तक पहुँच चुका है, जो 2009-2014 के मुकाबले सोलह गुना अधिक है। राज्य के पूरे ब्रॉड गेज नेटवर्क का शत-प्रतिशत विद्युतीकरण पूरा हो चुका है। रांची-हावड़ा और रांची-वाराणसी जैसे प्रमुख मार्गों पर वंदे भारत ट्रेनें दौड़ रही हैं। 57 रेलवे स्टेशनों का कायाकल्प किया जा रहा है। उत्तर करनपुरा में 660 मेगावाट की बिजली इकाई चालू हो चुकी है। आईआईएम रांची का नया परिसर तैयार है और जहाँ कभी केवल 180 एमबीबीएस सीटें थीं, आज 1,000 से अधिक सीटें उपलब्ध हैं। हमारा झारखंड अब केवल खनिजों का राज्य नहीं, ज्ञान और अवसरों की धरती भी बन रहा है।</p>
<p>*<strong>2019 के बाद भी मोदी जी का अटल भरोसा</strong>*</p>
<p>2019 में राज्य में सरकार बदली और डबल इंजन का एक पहिया थम गया। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी जी ने खुद यह ज़िम्मेदारी उठाई कि झारखंड की जनता इस बदलाव की कीमत न चुकाए। केंद्र ने अपनी तरफ से पूरी ताकत लगाई ताकि एक इंजन की कमी आम जनता को न खले।</p>
<p>किसान सम्मान निधि के तहत राज्य के 18 लाख 23 हजार से अधिक किसानों के खातों में सीधे ₹8,928 करोड़ पहुँचे। जल जीवन मिशन ने 31 लाख से अधिक नए नल जल कनेक्शन दिए। 2019 में जहाँ केवल साढ़े पाँच प्रतिशत ग्रामीण घरों में नल का पानी था, आज यह आँकड़ा 55 प्रतिशत से अधिक है। इसका सबसे अधिक लाभ उन माताओं और बहनों को मिला जो वर्षों से दूर-दूर से पानी ढोती आई थीं।</p>
<p>प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण के तहत 16 लाख से अधिक गरीब परिवारों के पक्के घर बनकर तैयार हुए। आयुष्मान भारत योजना के जरिए 29 लाख 40 हजार से अधिक लोगों का मुफ्त इलाज हुआ। मुद्रा योजना ने 1 करोड़ 57 लाख से अधिक छोटे कारोबारियों और युवा उ‌द्यमियों को ₹81,247 करोड़ की आर्थिक मदद दी। लखपति दीदी अभियान के जरिए 4 लाख 81 हजार से अधिक महिलाएँ अब सालाना एक लाख रुपये से अधिक कमा रही हैं और अपने परिवार की आर्थिक रीढ़ बन रही हैं।</p>
<p>यह उस संकल्प का प्रमाण है जो मोदी जी ने लिया था कि राज्य में चाहे जो हो, झारखंड के गरीब, किसान और आदिवासी परिवार केंद्र की नज़र से कभी ओझल नहीं होंगे।</p>
<p>*<strong>जनजातीय गौरव और सम्मान</strong>*</p>
<p>भाजपा ने हमेशा झारखंड की जनजातीय पहचान को राजनीतिक नारे से नहीं, बल्कि नीति और नीयत से सम्मान दिया है। एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों के माध्यम से आदिवासी बच्चों को बेहतर शिक्षा मिल रही है। राज्य में 91 ऐसे वि‌द्यालय स्वीकृत हुए हैं जिनमें से 51 पूरी तरह कार्यशील हैं।</p>
<p>प्रधानमंत्री मोदी जी ने धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा जी के नाम पर प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान यानी पीएम जनमन की शुरुआत की। यह केवल एक योजना नहीं, उन जनजातीय समुदायों के लिए न्याय का संकल्प है जो आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी विकास की मुख्यधारा से दूर थे। इसी के तहत झारखंड में 35 वन धन विकास केंद्र चालू हैं जिनसे जंगल और वनोपज से जुड़े 2,876 से अधिक आदिवासी परिवारों की आजीविका मजबूत हुई है।</p>
<p>तेंदूपत्ते पर जीएसटी 18 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत करने से वनवासी समुदायों को सीधा लाभ मिला है। प्रधानमंत्री मोदी जी ने 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस घोषित किया। यह केवल एक तारीख का सम्मान नहीं था, करोड़ों आदिवासियों की संस्कृति, संघर्ष और स्वाभिमान को राष्ट्रीय मान्यता देना था।</p>
<p>*<strong>झारखंड को चाहिए डबल इंजन की ताकत</strong>*</p>
<p>झारखंड के भाइयो और बहनो, पिछले दो दशकों का अनुभव साफ बताता है कि जब केंद्र और राज्य में भाजपा की डबल इंजन सरकार रही, तब हमारे झारखंड ने अपने इतिहास में सबसे तेज विकास और सबसे स्थिर शासन देखा। और जब एक इंजन कमज़ोर पड़ा, तब भी मोदी जी ने केंद्र से इतना दिया कि विकास रुकने न पाए। सोचिए, जब दोनों इंजन पूरी ताकत से चलेंगे तो यह सोना माटी कहाँ पहुँचेगी।</p>
<p>झारखंड की जनता ऐसी सरकार चाहती है जो विकास को राजनीति से ऊपर रखे। ऐसी सरकार जो आदिवासी समाज, गरीब, किसान, महिला और युवा सबके भविष्य के लिए ईमानदारी से काम करे। भाजपा यह बात केवल कहती नहीं है, सरकार में रहकर इसे साबित भी कर चुकी है।</p>
<p>श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी ने हमारे झारखंड को अपनी पहचान दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने उसे विकास, सुविधाओं और सम्मान की नई दिशा दी। आज यह सोना माटी नए अवसरों के सामने खड़ी है। भाजपा इस धरती के हर बेटे-बेटी के साथ मिलकर झारखंड को विकास, सम्मान और समृ‌द्धि की नई ऊँचाई पर ले जाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।</p>
<p>*आदित्य साहू,सांसद*<br />*प्रदेश अध्यक्ष,भाजपा झारखंड।*</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 18:33:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Susmita Rani]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चुनाव लड़ने से क्यों पीछे हटे धीरज साहू, राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज</title>
                                    <description><![CDATA[झारखंड कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद धीरज साहू के राज्यसभा चुनाव नहीं लड़ने के फैसले ने राजनीतिक चर्चाओं को तेज कर दिया है। करीब तीन वर्ष पहले उनके ठिकानों से 400 करोड़ रुपये नकद बरामद होने के बाद उनके राजनीतिक भविष्य पर सवाल उठने लगे थे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/politics/why-did-dheeraj-sahu-withdraw-from-contesting-elections-discussion-intensifies/article-22617"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/bc639bf5-db91-49be-b67d-639ea16fd389_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd"><strong>सुनील सिंह</strong></p>
<p class="isSelectedEnd">करीब तीन साल पहले झारखंड कांग्रेस के कद्दावर नेता व तत्कालीन राज्यसभा सांसद धीरज साहू के विभिन्न ठिकानों पर छापेमारी के दौरान जब भारी मात्रा में नकदी बरामद हुई थी, तब मैंने 10 जनवरी 2024 को धीरज साहू के राजनीतिक भविष्य को लेकर एक रिपोर्ट लिखी थी। उसका शीर्षक था— <em>"धीरज साहू के राजनीतिक सफर पर लग सकता है ग्रहण"</em>।</p>
<p class="isSelectedEnd">तीन वर्ष बाद अब यह बात काफी हद तक सच साबित होती दिख रही है। पिछले दिनों धीरज साहू ने जब यह घोषणा की कि वह राज्यसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे, तब मुझे उस खबर की याद आई, जो 10 जनवरी 2024 को मैंने लिखी थी।</p>
<p class="isSelectedEnd">धीरज साहू के ठिकानों पर छापेमारी के दौरान आयकर विभाग ने करीब 400 करोड़ रुपये नकद बरामद किए थे। उस समय नकद बरामदगी का यह देश का सबसे बड़ा मामला था। इसकी चर्चा पूरे देश में हुई और यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया। भाजपा ने भी इसे कांग्रेस के खिलाफ एक प्रमुख हथियार के रूप में इस्तेमाल किया।</p>
<p class="isSelectedEnd">नोटों की बरामदगी के बाद ही यह साफ हो गया था कि धीरज साहू की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रह पाएगी। उनके राजनीतिक भविष्य पर ग्रहण लग गया था। हालांकि यह मामला आयकर विभाग से जुड़ा था और बरामद राशि पर जुर्माना सहित टैक्स जमा कर मामले का निपटारा कर दिया गया, लेकिन इसका राजनीतिक असर लंबे समय तक बना रहा।</p>
<p class="isSelectedEnd">राज्यसभा चुनाव की घोषणा होते ही धीरज साहू कांग्रेस से टिकट पाने के लिए सक्रिय हुए। उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे सहित कई वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात कर अपनी दावेदारी पेश की। लेकिन सकारात्मक संकेत नहीं मिलने के बाद उन्होंने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया।</p>
<p class="isSelectedEnd">जानकारी के अनुसार, धीरज साहू का परिवार भी नहीं चाहता था कि वह इस बार चुनाव लड़ें। नेतृत्व की ओर से टिकट को लेकर ठोस आश्वासन नहीं मिलने, पारिवारिक और व्यावसायिक कारणों के चलते उन्होंने चुनावी मैदान से दूरी बनाने का फैसला किया।</p>
<p class="isSelectedEnd">धीरज साहू के लिए वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियां भी अनुकूल नहीं हैं। साहू परिवार का शराब कारोबार ओडिशा में है और वहां भाजपा की सरकार है। चुनाव लड़ने की स्थिति में वह फिर से भाजपा के निशाने पर आ सकते थे। ऐसे में उन्होंने राजनीतिक सूझबूझ का परिचय देते हुए खुद को इस चुनाव से दूर रखा।</p>
<p>धीरज साहू उन चुनिंदा नेताओं में शामिल हैं, जो तीन बार राज्यसभा के लिए निर्वाचित हो चुके हैं। चुनावी रणनीति और जीत की कला में उन्हें हमेशा माहिर माना जाता रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 14:46:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मतदाता सूची पुनरीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी मुहर, चुनाव आयोग को मिली संवैधानिक ताकत</title>
                                    <description><![CDATA[सुप्रीम Court ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को संवैधानिक और लोकतंत्र के लिए आवश्यक बताते हुए चुनाव आयोग के अधिकारों को मान्यता दी है। अदालत ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए मतदाता सूची का शुद्ध और विश्वसनीय होना जरूरी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/supreme-court-special-intensive-revision-sir-election-commission-verdict/article-22396"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/image-(21)_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>महेन्द्र तिवारी</strong></p><p>भारतीय लोकतंत्र केवल मतदान की प्रक्रिया का नाम नहीं है, बल्कि यह उस विश्वास का आधार है जिसके अनुसार हर पात्र नागरिक को मतदान का अधिकार मिले और अपात्र व्यक्ति चुनावी व्यवस्था का हिस्सा न बने। इसी मूल भावना को केंद्र में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 26 मई 2026 को एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। यह फैसला मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर था। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि निर्वाचन आयोग को संविधान और कानून के अंतर्गत मतदाता सूची की गहन समीक्षा करने का पूरा अधिकार है और यह प्रक्रिया स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक आवश्यकता को मजबूत करती है। इस फैसले को केवल एक कानूनी निर्णय मानना पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि इसका प्रभाव देश की चुनावी राजनीति, लोकतांत्रिक ढांचे और भविष्य की चुनाव प्रक्रिया पर दूरगामी रूप से पड़ने वाला है।</p><p>इस मामले की सुनवाई प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने की। अदालत के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि क्या निर्वाचन आयोग द्वारा बिहार सहित विभिन्न राज्यों में चलाया जा रहा विशेष गहन पुनरीक्षण संविधान के अनुरूप है या नहीं। विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक संगठनों ने आरोप लगाया था कि इस प्रक्रिया के माध्यम से बड़ी संख्या में लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा सकते हैं और इससे लोकतांत्रिक अधिकार प्रभावित होंगे। अदालत ने इन सभी तर्कों पर विस्तार से विचार करने के बाद निर्वाचन आयोग के पक्ष में निर्णय दिया।</p><p>सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चुनाव केवल मतदान मशीनों और मतदान केंद्रों तक सीमित नहीं हैं। लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि मतदाता सूची कितनी शुद्ध, विश्वसनीय और त्रुटिरहित है। यदि मतदाता सूची में मृत व्यक्तियों, स्थायी रूप से स्थानांतरित लोगों, दोहरी प्रविष्टियों या अपात्र व्यक्तियों के नाम बने रहते हैं, तो चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। अदालत ने माना कि विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची की सटीकता और विश्वसनीयता को सुनिश्चित करना है और यह संविधान के अनुच्छेद 324 की भावना के अनुरूप है।</p><p>निर्णय में जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 21(3) का विशेष उल्लेख किया गया। अदालत ने कहा कि यह धारा निर्वाचन आयोग को किसी भी समय विशेष पुनरीक्षण कराने की शक्ति देती है। कानून आयोग को यह अधिकार भी देता है कि वह पुनरीक्षण की प्रक्रिया, समय और तरीके का निर्धारण स्वयं करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि SIR कोई अवैध या मनमानी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह कानून के भीतर रहकर की जाने वाली संवैधानिक कार्रवाई है।</p><p>इस पूरे विवाद की शुरुआत बिहार विधानसभा चुनाव से पहले हुई थी। निर्वाचन आयोग ने बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया शुरू की थी। आयोग का कहना था कि पिछले कई वर्षों से केवल सामान्य संशोधन हो रहे थे जबकि जनसंख्या परिवर्तन, पलायन, शहरीकरण और दोहरी प्रविष्टियों जैसी समस्याओं के कारण मतदाता सूची में व्यापक गड़बड़ियां पैदा हो चुकी थीं। आयोग ने तर्क दिया कि लगभग दो दशकों से व्यापक गहन पुनरीक्षण नहीं हुआ था और इसलिए मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखने के लिए यह कदम आवश्यक हो गया था।</p><p>विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया के माध्यम से बड़ी संख्या में गरीब, प्रवासी और दस्तावेजों से वंचित लोगों के नाम हटाए जा सकते हैं। कुछ याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि पहले से मतदाता सूची में शामिल व्यक्ति को नागरिक माना जाना चाहिए और उससे दोबारा प्रमाण मांगना अनुचित है। अदालत ने इन तर्कों को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची में नाम होना नागरिकता का एक अनुमान अवश्य पैदा करता है, लेकिन यह अंतिम और अटल प्रमाण नहीं माना जा सकता। निर्वाचन आयोग को सत्यापन करने का अधिकार है और यदि आवश्यक हो तो वह अतिरिक्त दस्तावेज मांग सकता है।</p><p>अदालत ने एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण भी दिया। उसने कहा कि यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटाया जाता है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त हो गई। निर्वाचन आयोग केवल चुनावी सूची की वैधता और पात्रता की जांच करता है। नागरिकता पर अंतिम निर्णय संबंधित सक्षम प्राधिकरण ही करेगा। यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा था कि SIR प्रक्रिया नागरिकता विवाद का रूप ले सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निर्वाचन आयोग की भूमिका केवल चुनावी सूची तक सीमित है।</p><p>निर्णय में अदालत ने यह भी माना कि किसी भी लोकतंत्र में केवल पात्र मतदाताओं का मतदान करना आवश्यक है। अदालत की टिप्पणी थी कि लोकतंत्र की कहानी केवल वोट डालने की नहीं बल्कि यह तय करने की भी है कि वोट देने का अधिकार किसे प्राप्त है। यह कथन पूरे फैसले का मूल संदेश माना जा रहा है। अदालत ने कहा कि यदि चुनावी सूची ही त्रुटिपूर्ण होगी तो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का उद्देश्य कमजोर पड़ जाएगा।</p><p>सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया को अनुपातिक और संतुलित भी बताया। अदालत ने कहा कि आयोग ने लोगों को सुधार, आपत्ति और पुनरीक्षण के पर्याप्त अवसर दिए हैं। न्यायालय ने माना कि प्रारंभ में कोई प्रक्रिया कठोर दिखाई दे सकती है, लेकिन यदि उसमें पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हों तो उसे संवैधानिक माना जा सकता है। अदालत के अनुसार SIR प्रक्रिया में नोटिस, सुनवाई और सुधार की पर्याप्त व्यवस्था उपलब्ध थी।</p><p>इस फैसले का राजनीतिक प्रभाव भी व्यापक रहा। भारतीय जनता पार्टी ने फैसले का स्वागत करते हुए इसे लोकतंत्र की जीत बताया। पार्टी नेताओं ने विपक्ष पर घुसपैठियों और फर्जी मतदाताओं को संरक्षण देने का आरोप लगाया। दूसरी ओर विपक्षी दलों ने कहा कि अदालत ने प्रक्रिया को वैध तो माना है, लेकिन इसके क्रियान्वयन पर अब भी गंभीर प्रश्न बने हुए हैं। कई विपक्षी नेताओं ने आशंका जताई कि दस्तावेज आधारित सत्यापन में गरीब और वंचित वर्गों को कठिनाई हो सकती है।</p><p>विशेष गहन पुनरीक्षण का प्रभाव केवल बिहार तक सीमित नहीं रहा। निर्वाचन आयोग ने घोषणा की कि वह 1 जून 2026 को पात्रता तिथि मानते हुए बिहार के अलावा सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में चरणबद्ध तरीके से SIR कराएगा। इसका अर्थ यह है कि आने वाले वर्षों में देशभर में मतदाता सूचियों का व्यापक पुनरीक्षण देखने को मिलेगा। आयोग का उद्देश्य मृत, स्थानांतरित, दोहरी और अपात्र प्रविष्टियों को हटाकर मतदाता सूची को अधिक विश्वसनीय बनाना है।</p><p>उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार बिहार में SIR के दौरान लगभग 47 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे। यह कुल मतदाताओं का लगभग 5.95 प्रतिशत था। इसके बाद दूसरे चरण में उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, राजस्थान और अन्य राज्यों में भी व्यापक पुनरीक्षण हुआ। कुछ राज्यों में मतदाता सूची में 10 प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज की गई। पश्चिम बंगाल में लगभग 83 लाख नाम और उत्तर प्रदेश में लगभग 2 करोड़ नाम हटाए जाने की चर्चा राजनीतिक बहस का बड़ा विषय बनी।</p><p>इस पूरी प्रक्रिया ने भारतीय लोकतंत्र के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा किया है। क्या मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना अधिक महत्वपूर्ण है या यह सुनिश्चित करना कि कोई पात्र नागरिक सूची से बाहर न रह जाए। लोकतंत्र की मजबूती इन दोनों उद्देश्यों के बीच संतुलन स्थापित करने में ही निहित है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इसी संतुलन पर जोर दिया है। अदालत ने निर्वाचन आयोग को अधिकार तो दिया, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि प्रक्रिया पारदर्शी, न्यायपूर्ण और मानवीय होनी चाहिए।</p><p>यह फैसला आने वाले समय में चुनाव सुधारों की दिशा तय करने वाला माना जा रहा है। अब निर्वाचन आयोग को अधिक संवैधानिक मजबूती मिली है और भविष्य में वह व्यापक पुनरीक्षण अभियानों को और आक्रामक रूप से आगे बढ़ा सकता है। साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया है कि चुनावी प्रक्रिया में न्यायपालिका आयोग की स्वतंत्रता और संवैधानिक भूमिका को महत्वपूर्ण मानती है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में जहां करोड़ों मतदाता और हजारों राजनीतिक विवाद मौजूद हैं, वहां मतदाता सूची की विश्वसनीयता लोकतंत्र की आधारशिला बन जाती है।</p><p>सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि लोकतंत्र केवल राजनीतिक नारेबाजी का विषय नहीं बल्कि संवैधानिक अनुशासन और संस्थागत विश्वसनीयता का भी प्रश्न है। चुनाव आयोग, न्यायपालिका और संविधान के बीच संतुलित समन्वय ही भारतीय लोकतंत्र को स्थिरता प्रदान करता है। विशेष गहन पुनरीक्षण पर आया यह फैसला आने वाले वर्षों में भारतीय चुनाव व्यवस्था की दिशा और स्वरूप दोनों को प्रभावित करेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 28 May 2026 14:18:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
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                <title>Opinion: वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के दौर में, भारत क्यों बना हुआ है मजबूत?</title>
                                    <description><![CDATA[दुनिया इस समय युद्ध, ऊर्जा संकट, महंगाई और व्यापारिक अस्थिरता जैसे गंभीर आर्थिक संकटों से जूझ रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण तेल और गैस की कीमतों में भारी वृद्धि हुई है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है। विश्व बैंक ने चेतावनी दी है कि संकट लंबा चला तो वैश्विक विकास दर प्रभावित हो सकती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/global-economic-crisis-india-strong-economy-analysis-mahendra-tiwari-2026/article-22369"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/image-(15)_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>महेन्द्र तिवारी</strong></p>
<p>दुनिया इस समय आर्थिक अनिश्चितता के ऐसे दौर से गुजर रही है जिसमें युद्ध, ऊर्जा संकट, महंगाई, व्यापारिक अस्थिरता और राजनीतिक तनाव एक साथ वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को चिंता में डाल दिया है। तेल और गैस की कीमतों में लगातार वृद्धि हो रही है। समुद्री व्यापार मार्गों पर संकट गहराता जा रहा है। उत्पादन लागत बढ़ रही है और इसका प्रभाव गरीब तथा विकासशील देशों पर सबसे अधिक दिखाई दे रहा है। ऐसे समय में विश्व बैंक ने चेतावनी दी है कि यदि यह संकट लंबा चला तो वैश्विक विकास दर में भारी गिरावट आ सकती है। इसके बावजूद भारत को दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल माना जा रहा है।</p>
<p>विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट के अनुसार 2026 में ऊर्जा कीमतों में लगभग 24 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। यह वृद्धि केवल सामान्य बाजार कारणों से नहीं बल्कि युद्ध और आपूर्ति संकट से जुड़ी हुई है। होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के समुद्री कच्चे तेल व्यापार का लगभग 35 प्रतिशत गुजरता है। इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने से तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से ऊपर गई हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि संघर्ष और लंबा खिंचता है तो ब्रेंट तेल की औसत कीमत 115 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है।</p>
<p>ऊर्जा संकट का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। इससे परिवहन महंगा होता है, उद्योगों की लागत बढ़ती है और खाद्य पदार्थों की कीमतें भी ऊपर चली जाती हैं। विश्व बैंक के अनुसार उर्वरकों की कीमतों में 31 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। यूरिया की कीमतों में लगभग 60 प्रतिशत उछाल का अनुमान व्यक्त किया गया है। इससे कृषि उत्पादन प्रभावित होगा और दुनिया में खाद्य संकट गहरा सकता है। विश्व खाद्य कार्यक्रम ने चेतावनी दी है कि यदि हालात नहीं सुधरे तो लगभग 45 मिलियन अतिरिक्त लोग खाद्य असुरक्षा की स्थिति में पहुंच सकते हैं।</p>
<p>यूरोप की स्थिति भी चिंता पैदा कर रही है। यूरोपीय आयोग ने अनुमान लगाया है कि 2026 में यूरो क्षेत्र की विकास दर घटकर लगभग 0.9 प्रतिशत रह सकती है। बढ़ती महंगाई के कारण ब्याज दरों में वृद्धि की संभावना है। इससे उद्योगों में निवेश कम होगा और उपभोक्ता खर्च भी प्रभावित होगा। यूरोप पहले ही ऊर्जा आयात पर काफी निर्भर रहा है और पश्चिम एशिया संकट ने उसकी कठिनाइयों को और बढ़ा दिया है।</p>
<p>अफ्रीका के कई देशों में भी हालात चुनौतीपूर्ण होते जा रहे हैं। अफ्रीकी विकास बैंक ने कहा है कि ईंधन और खाद्य कीमतों में वृद्धि के कारण 2026 में अफ्रीका की आर्थिक वृद्धि धीमी पड़ सकती है। कई गरीब देशों पर पहले से भारी कर्ज है और अब बढ़ती महंगाई ने उनकी वित्तीय स्थिति को और कमजोर कर दिया है।</p>
<p>इन वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत मानी जा रही है। विश्व बैंक ने भारत की विकास दर 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है। यह दर दुनिया की अधिकांश बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से कहीं अधिक है। भारत की मजबूती का सबसे बड़ा कारण उसकी घरेलू मांग है। देश की बड़ी आबादी, बढ़ता मध्यम वर्ग और सेवा क्षेत्र की तेजी भारतीय अर्थव्यवस्था को सहारा दे रहे हैं।</p>
<p>भारत में पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल भुगतान, आधारभूत संरचना और विनिर्माण क्षेत्र में तेज निवेश हुआ है। सरकार ने सड़क, रेल, बंदरगाह और हवाई अड्डों के विकास पर बड़े स्तर पर खर्च किया है। इससे रोजगार के अवसर बढ़े हैं और आर्थिक गतिविधियों को गति मिली है। दूसरी ओर सेवा क्षेत्र, विशेषकर सूचना प्रौद्योगिकी और वित्तीय सेवाएं, विदेशी मुद्रा कमाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।</p>
<p>हालांकि भारत पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। यदि तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहती हैं तो इसका सीधा असर भारत के आयात बिल पर पड़ेगा। इससे व्यापार घाटा बढ़ सकता है और रुपये पर दबाव आ सकता है। महंगाई बढ़ने पर आम जनता की क्रय शक्ति प्रभावित होगी। परिवहन महंगा होने से खाद्य पदार्थों और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ेंगी।</p>
<p>भारतीय रिजर्व बैंक के सामने भी कठिन चुनौती होगी। यदि महंगाई बढ़ती है तो ब्याज दरें ऊंची रखनी पड़ सकती हैं। इससे उद्योगों को महंगा कर्ज मिलेगा और निवेश की गति धीमी हो सकती है। दूसरी ओर यदि ब्याज दरें कम रखी जाती हैं तो महंगाई नियंत्रण से बाहर जा सकती है। इसलिए संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा।</p>
<p>विश्व बैंक ने यह भी कहा है कि दक्षिण एशिया की विकास दर 2026 में घटकर लगभग 6.3 प्रतिशत रह सकती है। इसका कारण यह है कि दक्षिण एशियाई देश ऊर्जा आयात पर बहुत अधिक निर्भर हैं। तेल की कीमतें बढ़ने से इन देशों की आर्थिक स्थिति प्रभावित होगी।</p>
<p>भारत ने इस चुनौती से निपटने के लिए ऊर्जा स्रोतों में विविधता बढ़ाने की दिशा में काम तेज किया है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन परियोजनाओं पर तेजी से निवेश हो रहा है। सरकार का लक्ष्य है कि आने वाले वर्षों में आयातित तेल पर निर्भरता कम की जाए। इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने की नीति भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।</p>
<p>वैश्विक व्यापार पर भी इस संकट का प्रभाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है। समुद्री मार्गों में व्यवधान के कारण माल ढुलाई महंगी हो गई है। बीमा लागत बढ़ गई है। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार की रफ्तार धीमी पड़ रही है। कई कंपनियां अब अपने उत्पादन केंद्रों को एक ही क्षेत्र में रखने के बजाय अलग अलग देशों में बांटने की रणनीति अपना रही हैं। भारत इस स्थिति का लाभ उठा सकता है क्योंकि अनेक विदेशी कंपनियां चीन के विकल्प के रूप में भारत की ओर देख रही हैं।</p>
<p>दुनिया के कई देशों में शेयर बाजारों में अस्थिरता बढ़ गई है। निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर बढ़ रहे हैं। सोने की कीमतों में वृद्धि इसका संकेत है। अनिश्चितता के दौर में पूंजी बाजारों में उतार चढ़ाव बढ़ना सामान्य माना जाता है। लेकिन लगातार अस्थिरता निवेश और रोजगार दोनों को प्रभावित करती है।</p>
<p>विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष दोनों ने चेतावनी दी है कि यदि पश्चिम एशिया संकट लंबा चला तो वैश्विक विकास दर में भारी गिरावट आ सकती है। इसका असर केवल तेल आयातक देशों पर ही नहीं बल्कि निर्यातक देशों पर भी पड़ेगा। उत्पादन कम होगा, उपभोग घटेगा और वैश्विक मांग कमजोर पड़ जाएगी।</p>
<p>इन परिस्थितियों में भारत के सामने अवसर और चुनौती दोनों मौजूद हैं। एक ओर दुनिया भारत को स्थिर और भरोसेमंद अर्थव्यवस्था के रूप में देख रही है, दूसरी ओर ऊर्जा आयात पर निर्भरता और महंगाई का दबाव चिंता का विषय है। यदि भारत घरेलू उत्पादन बढ़ाने, ऊर्जा आत्मनिर्भरता मजबूत करने और निर्यात क्षमता सुधारने में सफल होता है तो वह इस संकट के बीच भी मजबूत स्थिति बनाए रख सकता है।</p>
<p>यह समय केवल आर्थिक आंकड़ों का नहीं बल्कि नीतिगत दूरदर्शिता का भी है। दुनिया जिस अस्थिरता से गुजर रही है उसमें वे देश आगे निकलेंगे जो ऊर्जा, तकनीक, उत्पादन और मानव संसाधन के क्षेत्र में दीर्घकालिक रणनीति अपनाएंगे। भारत के पास जनसंख्या, बाजार और तकनीकी क्षमता जैसी बड़ी ताकतें हैं। यदि इनका सही उपयोग किया गया तो वैश्विक संकट के बीच भी भारत आर्थिक स्थिरता और विकास का नया उदाहरण बन सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Wed, 27 May 2026 16:28:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
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                <title>भारत की पहली सभ्यता आदिवासी थी, “वनवासी” राजनीति से सरना अस्मिता पर खतरा</title>
                                    <description><![CDATA[वरिष्ठ कांग्रेस नेता विजय शंकर नायक ने अपने लेख में दावा किया है कि भारत की सबसे पहली सभ्यता आदिवासी सभ्यता थी और बाद में वैदिक आर्य संस्कृति एवं हिंदू धर्म का विकास हुआ। उन्होंने सरना धर्म को प्रकृति आधारित सबसे प्राचीन जीवन दर्शन बताते हुए “वनवासी” शब्द के प्रयोग को आदिवासी अस्मिता कमजोर करने की राजनीतिक कोशिश बताया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/indias-first-civilization-was-tribal-forest-dweller-threat-to-identity/article-22324"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/07985743-e09b-4830-bb3d-93aae1af3980.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>लेखक : विजय शंकर नायक</strong></p>
<p>भारत का इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और साम्राज्यों का इतिहास नहीं है। यह उस धरती का इतिहास है, जहाँ सबसे पहले जंगलों की भाषा बोली गई, नदियों को माता माना गया, पहाड़ों को देवता समझा गया और प्रकृति को जीवन का केंद्र बनाया गया। जब न वेद थे, न पुराण, न मंदिर, न वर्ण व्यवस्था और न ही संगठित हिंदू धर्म का स्वरूप, तब इस भूमि पर आदिवासी सभ्यताएँ जीवित थीं।</p>
<p>भारत की सबसे पहली सांस्कृतिक धारा आदिवासी धारा थी। यही इस देश की मूल आत्मा है। आधुनिक इतिहास, पुरातत्व, मानवशास्त्र और आनुवंशिक (DNA) शोध लगातार यह प्रमाणित कर रहे हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे पहले बसने वाले समुदाय वे थे, जिन्हें आज हम आदिवासी, मूलवासी या Indigenous Peoples कहते हैं।</p>
<p>लेकिन आज विडंबना यह है कि जिन समुदायों ने हजारों वर्षों तक इस भूमि, जंगलों और जलस्रोतों की रक्षा की, उन्हीं की ऐतिहासिक पहचान को मिटाने की कोशिश की जा रही है। भाजपा और आरएसएस की राजनीति आदिवासी समाज को “आदिवासी” नहीं, बल्कि “वनवासी” कहकर उनकी मूल निवासी पहचान को कमजोर करना चाहती है। सरना धर्म को हिंदू धर्म में समाहित करने का प्रयास हो रहा है और आदिवासी समाज की स्वतंत्र सांस्कृतिक अस्मिता पर वैचारिक हमला तेज किया जा रहा है।</p>
<p>यह केवल शब्दों की लड़ाई नहीं है। यह भारत के इतिहास, पहचान और मूल सभ्यता पर कब्जे की लड़ाई है।</p>
<h3><strong>भारत के सबसे पुराने निवासी आदिवासी समुदाय</strong></h3>
<p>वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि आधुनिक मानव लगभग 65,000 वर्ष पहले दक्षिण एशिया पहुँचे। उस समय भारत में कोई वैदिक धर्म नहीं था, कोई वर्ण व्यवस्था नहीं थी और कोई संगठित धार्मिक ढाँचा मौजूद नहीं था। यहाँ छोटे-छोटे शिकारी, संग्रहकर्ता और प्रकृति-आधारित समुदाय रहते थे। यही समुदाय आगे चलकर आदिवासी सभ्यताओं में विकसित हुए।</p>
<p>संथाल, मुंडा, उरांव, गोंड, भील, हो, खड़िया, बैगा, कोरकू और अनेक अन्य आदिवासी समुदाय भारत की सबसे प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं के वाहक माने जाते हैं। इनकी जीवन शैली प्रकृति के साथ सामंजस्य पर आधारित थी। जंगल इनके लिए केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन थे। नदी केवल पानी नहीं, बल्कि माँ थी। पहाड़ केवल पत्थर नहीं, बल्कि देवत्व के प्रतीक थे।</p>
<p>सिंधु घाटी सभ्यता में वृक्ष पूजा, मातृदेवी पूजा, पशु प्रतीक और प्रकृति-आधारित संस्कृति के प्रमाण मिलते हैं। अनेक इतिहासकार मानते हैं कि इन तत्वों की जड़ें प्राचीन स्वदेशी और आदिवासी परंपराओं में थीं। इस दृष्टि से देखा जाए, तो भारत की पहली सभ्यता प्रकृति-आधारित आदिवासी सभ्यता थी, न कि बाद में विकसित वैदिक-ब्राह्मणवादी व्यवस्था।</p>
<h3><strong>सरना धर्म : प्रकृति और समानता का सबसे प्राचीन दर्शन</strong></h3>
<p>सरना केवल एक धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से जीवित एक प्रकृति-केंद्रित जीवन दर्शन है। “सरना” का अर्थ ही पवित्र उपवन या पवित्र जंगल होता है। गाँव का सरना स्थल वह स्थान होता है, जहाँ पूरा समुदाय सामूहिक पूजा करता है।</p>
<p>सरना धर्म किसी एक पुस्तक, पैगंबर या पुरोहित तंत्र पर आधारित नहीं है। इसमें ब्राह्मणवादी वर्चस्व, जाति व्यवस्था, ऊँच-नीच या छुआछूत की कोई जगह नहीं है। यहाँ हर व्यक्ति प्रकृति के सामने समान है।</p>
<p>सरना दर्शन के मूल तत्व हैं — प्रकृति पूजा, सामूहिकता, समानता, पूर्वजों का सम्मान, जल-जंगल-जमीन की रक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक जीवन।</p>
<p>सरहुल में साल वृक्ष की पूजा होती है। करमा प्रकृति और भाईचारे का उत्सव है। सोहराय कृषि और पशुधन से जुड़ा पर्व है। बहा और माघे प्रकृति चक्र के उत्सव हैं। यह पूरी परंपरा इस बात का प्रमाण है कि आदिवासी सभ्यता का आधार प्रकृति और समानता रही है, जबकि बाद में विकसित वर्ण व्यवस्था ने समाज को ऊँच-नीच में बाँट दिया।</p>
<p>इसीलिए सरना को “सनातन हिंदू धर्म का हिस्सा” बताना ऐतिहासिक रूप से भ्रामक और राजनीतिक रूप से खतरनाक है।</p>
<h3><strong>वैदिक आर्यों का आगमन और नई सामाजिक व्यवस्था</strong></h3>
<p>इतिहासकारों और भाषाविदों के अनुसार, इंडो-आर्यन समूह लगभग 1500 BCE के आसपास मध्य एशिया से भारतीय उपमहाद्वीप में आए। ऋग्वेद की रचना इसी काल में मानी जाती है। प्रारंभिक वैदिक संस्कृति घोड़े, रथ, अग्नि यज्ञ और इंद्र, अग्नि, वरुण जैसे देवताओं पर आधारित थी। यह संस्कृति उत्तर-पश्चिम भारत से धीरे-धीरे गंगा के मैदानों की ओर फैली।</p>
<p>लेकिन जब वैदिक आर्य यहाँ आए, तब भारत खाली नहीं था। यहाँ पहले से अनेक स्वदेशी और आदिवासी समुदाय बसे हुए थे। ऋग्वेद में “दास” और “दस्यु” जैसे शब्दों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें कई विद्वान स्थानीय समुदायों से जोड़ते हैं।</p>
<p>समय के साथ संघर्ष और सांस्कृतिक मिश्रण दोनों हुए। कई लोक देवी-देवताओं, वृक्ष पूजा और प्रकृति परंपराओं को बाद में हिंदू धर्म में समाहित किया गया। लेकिन आदिवासी समाज ने अपनी स्वतंत्र सांस्कृतिक पहचान को पूरी तरह समाप्त नहीं होने दिया। आज भी सरना परंपरा बिना वेद, बिना ब्राह्मण और बिना वर्ण व्यवस्था के जीवित है। यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।</p>
<h3><strong>“आदिवासी” बनाम “वनवासी” : शब्द नहीं, राजनीति है</strong></h3>
<p>“आदिवासी” शब्द का अर्थ है — इस भूमि के मूल निवासी। यही शब्द भाजपा और आरएसएस की राजनीति को असहज करता है। क्योंकि यदि आदिवासी इस भूमि के मूल निवासी हैं, तो फिर यह प्रश्न खड़ा होता है कि बाद में कौन आया?</p>
<p>इसी कारण आरएसएस ने “आदिवासी” शब्द की जगह “वनवासी” शब्द को बढ़ावा दिया। 1952 में स्थापित “वनवासी कल्याण आश्रम” इसी सोच का परिणाम था।</p>
<p>“वनवासी” शब्द आदिवासियों को केवल जंगल में रहने वाला समुदाय दर्शाता है, जबकि “आदिवासी” शब्द ऐतिहासिक अधिकार, मूल निवासी होने और सांस्कृतिक स्वायत्तता का दावा प्रस्तुत करता है। यह केवल शब्द बदलने का प्रयास नहीं है। यह इतिहास बदलने और मूल पहचान मिटाने की राजनीति है।</p>
<h3><strong>सरना धर्म कोड क्यों जरूरी है?</strong></h3>
<p>11 नवंबर 2020 को झारखंड विधानसभा ने सर्वसम्मति से सरना धर्म कोड का प्रस्ताव पारित किया। लेकिन केंद्र सरकार ने आज तक इसे लागू नहीं किया। 2011 की जनगणना में लाखों लोगों ने “अन्य धर्म” के अंतर्गत सरना लिखा, फिर भी सरना को अलग धार्मिक पहचान नहीं दी गई।</p>
<p>यदि जैन, बौद्ध और सिख समुदायों<br />को अलग धार्मिक पहचान मिल सकती है, तो सरना धर्म को क्यों नहीं?</p>
<p>सरना कोड केवल धार्मिक पहचान का प्रश्न नहीं है। यह जनगणना, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, Fifth Schedule क्षेत्रों, आरक्षण और विकास योजनाओं से जुड़ा सवाल है। अलग कोड न मिलने से आदिवासी आबादी कम दिखाई जाती है और उनके अधिकार कमजोर होते हैं।</p>
<h3><strong>डीलिस्टिंग की राजनीति : आदिवासी समाज को बाँटने का प्रयास</strong></h3>
<p>आज भाजपा और आरएसएस से जुड़े संगठन धर्मांतरित आदिवासियों को ST सूची से हटाने की माँग कर रहे हैं। लेकिन भारतीय संविधान का अनुच्छेद 342 स्पष्ट करता है कि अनुसूचित जनजाति (ST) की पहचान धर्म आधारित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कई मामलों में कहा है कि केवल धर्म परिवर्तन से ST दर्जा समाप्त नहीं होता।</p>
<p>फिर भी डीलिस्टिंग की राजनीति इसलिए की जा रही है, ताकि आदिवासी समाज को हिंदू बनाम ईसाई में बाँटा जा सके। जब समाज विभाजित होगा, तब जल-जंगल-जमीन और खनिज संपदा पर कब्जा करना आसान हो जाएगा।</p>
<h3><strong>विकास के नाम पर आदिवासी क्षेत्रों की लूट</strong></h3>
<p>भाजपा सरकार “विकास” की बात करती है, लेकिन सबसे अधिक विस्थापन आदिवासी क्षेत्रों में हुआ है। खनन परियोजनाएँ, कॉरपोरेट कंपनियों को जमीन हस्तांतरण, जंगलों की कटाई और बड़े उद्योगों के नाम पर लाखों आदिवासी अपने गाँवों से उजाड़े गए।</p>
<p>झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों में देश की सबसे अधिक खनिज संपदा मौजूद है, लेकिन वहीं सबसे अधिक गरीबी, बेरोजगारी और विस्थापन देखने को मिलता है। यह मॉडल विकास नहीं, बल्कि संसाधनों की लूट का मॉडल है।</p>
<h3><strong>आदिवासी प्रतिरोध : भारत के सबसे बड़े जनआंदोलन</strong></h3>
<p>आदिवासी समाज ने हमेशा अन्याय के खिलाफ संघर्ष किया। तिलका मांझी ने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी। सिदो-कान्हू ने संथाल हूल का नेतृत्व किया। बिरसा मुंडा ने “अबुआ दिशुम, अबुआ राज” का नारा दिया। टाना भगत आंदोलन ने शोषण के खिलाफ आवाज उठाई।</p>
<p>ये केवल विद्रोह नहीं थे। ये जल-जंगल-जमीन, संस्कृति और स्वाभिमान की लड़ाइयाँ थीं।</p>
<h3><strong>भारत की आत्मा आदिवासी सभ्यता है</strong></h3>
<p>भारत की सबसे पुरानी सांस्कृतिक धारा आदिवासी धारा है। पहले आदिवासी सभ्यता थी, बाद में वैदिक आर्य संस्कृति और फिर हिंदू धर्म का क्रमिक विकास हुआ। लेकिन आज भाजपा और आरएसएस इतिहास को पलटकर आदिवासी समाज को “वनवासी” बताने, सरना को सनातन में मिलाने और डीलिस्टिंग के जरिए समाज को बाँटने की कोशिश कर रहे हैं।</p>
<p>यह केवल सांस्कृतिक विवाद नहीं है। यह इतिहास, पहचान और अधिकारों की लड़ाई है। आदिवासी समाज को अपनी जड़ों पर गर्व करना होगा। “आदिवासी” शब्द को सम्मान के साथ दोहराना होगा। सरना धर्म कोड की लड़ाई को मजबूत करना होगा।</p>
<p>क्योंकि —<br />हम इस भूमि के पहले रक्षक थे।<br />हमारी संस्कृति सबसे पुरानी है।<br />और हमारी अस्मिता किसी राजनीतिक विचारधारा की गुलाम नहीं हो सकती।</p>
<p>जल-जंगल-जमीन हमारा अधिकार है।<br />सरना हमारा गौरव है।<br />और आदिवासी अस्मिता भारत की आत्मा है।</p>
<img src="https://samridhjharkhand.com/media/2026-05/07985743-e09b-4830-bb3d-93aae1af3980.jpg" alt="भारत की पहली सभ्यता आदिवासी थी, “वनवासी” राजनीति से सरना अस्मिता पर खतरा" width="80" height="105"></img>
 विजय शंकर<br />नायक
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                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 26 May 2026 16:59:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>जब ओस्लो में एक सवाल गूंजा : प्रेस स्वतंत्रता, सत्ता और लोकतंत्र की नई बहस</title>
                                    <description><![CDATA[ओस्लो में भारत और नॉर्वे के प्रधानमंत्रियों की संयुक्त प्रेस वार्ता के दौरान पूछे गए एक सवाल ने प्रेस स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर नई वैश्विक बहस छेड़ दी है। नॉर्वे की पत्रकार हेल्ले ल्यांग स्वेन्डसेन द्वारा पूछे गए सवाल के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/when-a-question-echoed-in-oslo-the-new-debate-on/article-22312"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/image-(12)_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>लेखक : राजकुमार अग्रवाल</strong></p>
<p>ओस्लो में भारत और नॉर्वे के प्रधानमंत्रियों की संयुक्त प्रेस वार्ता के बाद नॉर्वे की पत्रकार हेल्ले ल्यांग स्वेन्डसेन द्वारा पूछा गया एक सवाल अचानक अंतरराष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया।</p>
<p>प्रेस वार्ता समाप्त होने के ठीक बाद उन्होंने पूछा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रों में से एक में “कठिन और असुविधाजनक सवालों का सामना क्यों कम होता है?” यह वीडियो कुछ ही घंटों में सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और देखते ही देखते यह घटना केवल एक सवाल नहीं रही, बल्कि प्रेस स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर वैश्विक चर्चा का विषय बन गई।</p>
<h2>सवाल से बड़ा बनता संदर्भ</h2>
<p>यह घटना अपने आप में साधारण लग सकती थी, लेकिन इसका संदर्भ इसे असाधारण बना देता है।</p>
<p>भारत आज वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। ऐसे में भारतीय नेतृत्व और उसकी मीडिया संवाद शैली पर होने वाली हर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया व्यापक विमर्श को जन्म देती है।</p>
<p>इसी कारण ओस्लो का यह छोटा-सा क्षण केवल एक पत्रकार का सवाल नहीं रहा, बल्कि एक बड़े लोकतांत्रिक प्रश्न का प्रतीक बन गया — क्या सत्ता को लगातार असुविधाजनक सवालों का सामना करना चाहिए?</p>
<h2>पत्रकारिता बनाम सत्ता का पुराना द्वंद्व</h2>
<p>पत्रकारिता के इतिहास में सत्ता और सवालों का टकराव कोई नई बात नहीं है। लोकतंत्र में पत्रकार का काम केवल सूचना देना नहीं, बल्कि सत्ता से जवाबदेही मांगना भी माना जाता है।</p>
<p>नॉर्वे की पत्रकार हेल्ले ल्यांग स्वेन्डसेन जिस पत्रकारिता परंपरा से आती हैं, वहाँ सवाल पूछना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा है। स्कैंडिनेवियाई countries में प्रेस स्वतंत्रता को लोकतंत्र की बुनियाद माना जाता है।</p>
<p>इसी संदर्भ में उनका सवाल एक सामान्य पेशेवर कर्तव्य जैसा प्रतीत होता है, लेकिन वैश्विक राजनीति में यह एक बड़े विमर्श में बदल गया।</p>
<h2>डिजिटल युग ने बदल दिया घटनाओं का स्वरूप</h2>
<p>आज के समय में कोई भी घटना केवल घटना नहीं रहती। कुछ सेकंड का वीडियो मिनटों में वैश्विक बहस का रूप ले लेता है।</p>
<p>ओस्लो की इस घटना के साथ भी यही हुआ। सोशल मीडिया पर इस पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ सामने आईं — कहीं इसे साहसी पत्रकारिता कहा गया, तो कहीं इसे राजनीतिक पूर्वाग्रह के रूप में देखा गया।</p>
<p>यह स्पष्ट है कि डिजिटल युग में पत्रकारिता और राजनीति दोनों ही अब पहले से अधिक तेज, संवेदनशील और विभाजित हो गए हैं।</p>
<h2>प्रेस स्वतंत्रता की बहस</h2>
<p>“प्रेस की स्वतंत्रता” लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है, लेकिन इसका वास्तविक अर्थ केवल समाचार प्रकाशित करने की स्वतंत्रता नहीं है।</p>
<p>इसका अर्थ है :</p>
<ul>
<li>क्या पत्रकार बिना भय के सवाल पूछ सकते हैं?</li>
<li>क्या सत्ता आलोचना को स्वीकार कर सकती है?</li>
<li>क्या मीडिया राजनीतिक और आर्थिक दबावों से स्वतंत्र है?</li>
</ul>
<p>भारत में यह बहस लंबे समय से जारी है। एक पक्ष भारतीय मीडिया को अत्यंत सक्रिय और विविध मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसके सामने मौजूद दबावों को लेकर चिंता जताता है।</p>
<p>सच्चाई शायद इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच कहीं स्थित है।</p>
<h2>सोशल मीडिया और ध्रुवीकरण की नई चुनौती</h2>
<p>इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं। यह भी आधुनिक समय की एक बड़ी सच्चाई है कि अब पत्रकारिता केवल न्यूज़रूम तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह सीधे जनता की प्रतिक्रियाओं के बीच आ चुकी है।</p>
<p>आज पत्रकार केवल सवाल नहीं पूछता, बल्कि उन सवालों की सार्वजनिक व्याख्या और आलोचना का भी सामना करता है।</p>
<p>यह स्थिति पत्रकारिता की स्वतंत्रता और सुरक्षा दोनों पर नए प्रश्न खड़े करती है।</p>
<h2>लोकतंत्र की असली परीक्षा</h2>
<p>लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित व्यवस्था नहीं है। इसकी असली ताकत इस बात में है कि सत्ता कितनी सहजता से आलोचना और सवालों को स्वीकार कर सकती है।</p>
<p>यदि पत्रकार सवाल पूछने से डरने लगें, तो लोकतंत्र की बुनियादी संरचना कमजोर होने लगती है।</p>
<p>ओस्लो की यह घटना इसी व्यापक सवाल को सामने लाती है कि क्या आधुनिक लोकतंत्रों में संवाद और जवाबदेही उतनी मजबूत है, जितनी होनी चाहिए।</p>
<h2>निष्कर्ष</h2>
<p>ओस्लो की यह घटना केवल एक पत्रकार और एक राजनीतिक मंच के बीच हुई बातचीत नहीं थी। यह उस वैश्विक बहस का हिस्सा है, जिसमें लोकतंत्र, मीडिया और सत्ता के बीच संतुलन को लगातार परखा जा रहा है।</p>
<p>हेल्ले ल्यांग का सवाल भले ही एक क्षणिक घटना रहा हो, लेकिन उसने एक स्थायी बहस को फिर से जीवित कर दिया है — क्या लोकतंत्र की ताकत सत्ता में है या उन सवालों में, जो सत्ता से पूछे जाते हैं?</p>
<p>शायद लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति इसी में है कि सवाल पूछे जाते रहें और समाज उन्हें सुनने की क्षमता बनाए रखे।</p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" style="font-size:10.5pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">राजकुमार अग्रवाल एक वरिष्ठ पत्रकार</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" style="font-size:10.5pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">राजनीतिक विश्लेषक और अटल हिन्द के संपादक हैं।</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us"><br /></span><span lang="hi" style="font-size:10.5pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">यह लेख लेखक के निजी विचारों को प्रस्तुत करता है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 26 May 2026 15:14:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
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                <title>क्या गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ घोषित करना सही होगा? जानिए पक्ष और विपक्ष</title>
                                    <description><![CDATA[भारत में गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग समय-समय पर उठती रही है। हिंदू धर्म और भारतीय ग्रामीण जीवन में गाय का विशेष महत्व माना जाता है, लेकिन इस मुद्दे से सामाजिक, संवैधानिक, आर्थिक और प्रशासनिक जटिलताएं भी जुड़ी हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/cow-national-animal-debate-india/article-22267"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/image-(6)_samridh_1200x7201.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>महेंद्र तिवारी</strong> </p>
<p>भारत में गाय केवल एक पशु नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक चेतना और ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा मानी जाती है। भारतीय समाज में सदियों से गाय को माता का दर्जा दिया जाता रहा है। अनेक धार्मिक ग्रंथों, लोक परंपराओं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गाय का विशेष महत्व रहा है। यही कारण है कि समय समय पर गाय को भारत का राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग उठती रही है। कई धार्मिक संगठनों, सामाजिक समूहों और कुछ राजनीतिक दलों ने यह मांग सार्वजनिक रूप से रखी है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी एक मामले की सुनवाई के दौरान गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की आवश्यकता पर टिप्पणी की थी। इसके बावजूद भारत सरकार ने अब तक ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया है। इसके पीछे केवल राजनीतिक कारण नहीं बल्कि सामाजिक, संवैधानिक, आर्थिक और प्रशासनिक जटिलताएँ भी हैं।</p>
<p>भारत का वर्तमान राष्ट्रीय पशु बंगाल टाइगर है। इसे 1973 में शुरू किए गए प्रोजेक्ट टाइगर के अंतर्गत संरक्षण का प्रतीक बनाया गया था। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के अनुसार देश में बाघ संरक्षण के लिए विशेष कानूनी और पर्यावरणीय ढांचा तैयार किया गया। आज भारत विश्व के लगभग 70 प्रतिशत बाघों का घर माना जाता है और देश में 50 से अधिक टाइगर रिजर्व स्थापित किए जा चुके हैं। राष्ट्रीय पशु के रूप में बाघ केवल शक्ति और साहस का प्रतीक नहीं है बल्कि वह भारत की जैव विविधता और वन्यजीव संरक्षण नीति का केंद्र भी है। ऐसे में गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने का प्रश्न केवल भावनात्मक नहीं बल्कि नीतिगत बहस का विषय बन जाता है।</p>
<p>भारत एक बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश है। यहाँ हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और अनेक आदिवासी समुदाय रहते हैं। हिंदू धर्म में गाय को पवित्र माना जाता है, लेकिन सभी समुदायों की मान्यताएँ समान नहीं हैं। पूर्वोत्तर भारत के कई राज्यों, केरल और गोवा जैसे क्षेत्रों में गोमांस भोजन का हिस्सा रहा है। भारतीय संविधान सभी नागरिकों को अपनी संस्कृति और भोजन की स्वतंत्रता देता है। ऐसे में यदि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाता है तो कई लोग इसे एक धर्म विशेष की मान्यताओं को सरकारी पहचान देने के रूप में देख सकते हैं। आलोचकों का तर्क है कि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में किसी धार्मिक प्रतीक को राष्ट्रीय पहचान बनाना संवैधानिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है।</p>
<p>हालांकि दूसरी ओर यह भी सच है कि भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 48 के अंतर्गत राज्यों को गोवंश संरक्षण और नस्ल सुधार के लिए प्रयास करने का निर्देश दिया गया है। देश के अधिकांश राज्यों में गोहत्या पर किसी न किसी रूप में प्रतिबंध पहले से मौजूद है। केंद्र सरकार का पशुपालन और डेयरी विभाग भी गोवंश संरक्षण और पशुधन विकास के लिए कई योजनाएँ चला रहा है। राष्ट्रीय गोकुल मिशन जैसी योजनाओं का उद्देश्य देशी नस्लों का संरक्षण और दुग्ध उत्पादन बढ़ाना है। इससे स्पष्ट होता है कि गाय को पहले से ही विशेष सरकारी संरक्षण प्राप्त है। इसलिए समर्थकों का कहना है कि राष्ट्रीय पशु का दर्जा केवल उस सम्मान को औपचारिक रूप देने जैसा होगा जो भारतीय समाज में गाय को पहले से प्राप्त है।</p>
<p>लेकिन वास्तविक समस्या केवल सम्मान तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में देश के अनेक राज्यों में आवारा पशुओं की समस्या गंभीर रूप ले चुकी है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में किसान खुले घूमते पशुओं से परेशान हैं। जब गाय दूध देना बंद कर देती है या बूढ़ी हो जाती है तो गरीब किसान उसका पालन जारी नहीं रख पाते। परिणामस्वरूप उन्हें सड़कों या खेतों में छोड़ दिया जाता है। ये पशु किसानों की फसलों को नुकसान पहुँचाते हैं और सड़क दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं। अनेक ग्रामीण इलाकों में रात भर खेतों की रखवाली करना किसानों की मजबूरी बन गया है। यदि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाता है और कानून और कठोर हो जाते हैं तो यह संकट और बढ़ सकता है, क्योंकि पशुओं के पुनर्वास के लिए पर्याप्त गौशालाएँ और संसाधन अभी उपलब्ध नहीं हैं।</p>
<p>भारत की कृषि व्यवस्था अभी भी छोटे और सीमांत किसानों पर आधारित है। अधिकांश किसान सीमित आय और बढ़ती लागत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। एक बूढ़ी या अनुत्पादक गाय का पालन करना उनके लिए भारी आर्थिक बोझ बन जाता है। चारा, दवा और देखभाल पर लगातार खर्च होता है जबकि उससे कोई आय नहीं होती। यदि सरकार गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करती है तो संभव है कि पशुधन प्रबंधन से जुड़े नियम और कड़े हो जाएँ। इससे किसानों की आर्थिक कठिनाइयाँ और बढ़ सकती हैं। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी बड़े निर्णय से पहले पशु आश्रय, चारे की व्यवस्था और किसानों के लिए आर्थिक सहायता की मजबूत नीति आवश्यक है।</p>
<p>गाय से जुड़ा एक बड़ा आर्थिक पक्ष चमड़ा और मांस उद्योग भी है। भारत दुनिया के प्रमुख चमड़ा उत्पादक देशों में शामिल रहा है। इस उद्योग से लाखों लोगों का रोजगार जुड़ा है। इनमें बड़ी संख्या में आर्थिक रूप से कमजोर और हाशिए पर रहने वाले समुदाय शामिल हैं। भारत में मांस निर्यात का बड़ा हिस्सा भैंस के मांस से जुड़ा होता है, लेकिन कठोर सामाजिक माहौल का प्रभाव पूरे उद्योग पर पड़ता है। यदि राष्ट्रीय पशु का दर्जा मिलने के बाद कानून और सामाजिक दबाव बढ़ते हैं तो रोजगार और व्यापार दोनों प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए आर्थिक विशेषज्ञ इस विषय को केवल धार्मिक दृष्टि से देखने के बजाय रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के संदर्भ में भी देखते हैं।</p>
<p>पिछले कुछ वर्षों में गाय के नाम पर हिंसा और भीड़ द्वारा हमले की घटनाएँ भी सामने आई हैं। कई मामलों में गौ रक्षा के नाम पर लोगों को पीटा गया, अपमानित किया गया या उनकी हत्या तक कर दी गई। ऐसे मामलों ने देश की कानून व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द पर गंभीर प्रश्न खड़े किए। समाजशास्त्रियों का मानना है कि यदि गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा दिया जाता है तो कुछ कट्टर समूह इसे अपने सामाजिक अधिकार के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे प्रशासन और पुलिस के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी हो सकती हैं। कानून का शासन किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी आवश्यकता है और किसी भी प्रतीकात्मक निर्णय का मूल्यांकन इसी आधार पर किया जाना चाहिए।</p>
<p>वन्यजीव संरक्षण के दृष्टिकोण से भी यह बहस महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय पशु का दर्जा सामान्यतः उन जीवों को दिया जाता है जिनके संरक्षण की विशेष आवश्यकता होती है। बंगाल टाइगर संकटग्रस्त वन्यजीवों में शामिल रहा है और उसके संरक्षण के लिए विशेष अभियान चलाए गए। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण का गठन वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अंतर्गत किया गया था। इसके विपरीत गाय एक पालतू पशु है जिसकी संख्या करोड़ों में है। इसलिए कुछ पर्यावरणविद मानते हैं कि राष्ट्रीय पशु का दर्जा वन्यजीव संरक्षण की भावना से जुड़ा होना चाहिए, न कि पालतू पशुओं से।</p>
<p>गाय भारतीय समाज में श्रद्धा, सेवा और ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण प्रतीक है। यह भी सच है कि भारतीय कृषि और डेयरी व्यवस्था में उसका योगदान ऐतिहासिक रहा है। लेकिन किसी पशु को राष्ट्रीय प्रतीक बनाना केवल भावनात्मक निर्णय नहीं होता। उसके पीछे संवैधानिक संतुलन, सामाजिक विविधता, आर्थिक प्रभाव, प्रशासनिक क्षमता और पर्यावरणीय दृष्टिकोण जैसे अनेक पहलुओं पर विचार करना पड़ता है। भारत जैसे विशाल और विविध देश में किसी भी राष्ट्रीय निर्णय का प्रभाव करोड़ों लोगों के जीवन पर पड़ता है। इसलिए गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने की बहस केवल आस्था की बहस नहीं बल्कि भारत की लोकतांत्रिक और सामाजिक संरचना की परीक्षा भी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 25 May 2026 19:00:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Susmita Rani]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>स्क्रीन पर प्रतिरोध: जब मीम बन जाए लोकतंत्र का आईना</title>
                                    <description><![CDATA[“स्क्रीन पर प्रतिरोध: जब मीम बन जाए लोकतंत्र का आईना” आलेख में लेखक संजय कुमार धीरज ने डिजिटल दौर में उभर रहे राजनीतिक व्यंग्य, मीम संस्कृति और युवाओं के असंतोष का विश्लेषण किया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/screen-par-pratirodh-meme-democracy-digital-politics-article/article-22244"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/image-(10)_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>आलेख: संजय कुमार धीरज</strong></p>
<p>भारत का लोकतंत्र सिर्फ चुनाव से नहीं, जनता की संवेदना, असंतोष और प्रतिरोध से भी चलता है। जब दबा हुआ गुस्सा प्रतीकों और डिजिटल अभियानों में बदल जाए, तो वह सत्ता से जनता के विमुख होने का संकेत होता है। “कॉकरोच जनता पार्टी” पहली नजर में व्यंग्य लगती है, पर यह बेरोज़गारी, महंगाई, संस्थागत अविश्वास और युवाओं की निराशा की डिजिटल अभिव्यक्ति है। जब नागरिकों के लिए अपमानजनक भाषा इस्तेमाल होती है, तो प्रतिक्रिया राजनीतिक बन जाती है। नई पीढ़ी का प्रतिरोध सड़क से ज्यादा स्क्रीन पर है, पर असर कम नहीं।</p>
<p>व्यंग्य आज सत्ता के खिलाफ बड़ा हथियार है। जब जनता मज़ाक उड़ाने लगे, तब भय टूटता है। यह मनोरंजन नहीं, प्रतीकों से राजनीतिक चेतना जताना है। 2011 का अन्ना आंदोलन सत्ता परिवर्तन तक गया। उसके पास नैतिक आग्रह और वैकल्पिक दिशा थी। आज का असंतोष नाराज़ तो है, पर दिशा अस्पष्ट है। शोर है, संगठित आंदोलन नहीं। सवाल बड़ा है कि यह बदलाव लाएगा या सिर्फ डिजिटल विस्फोट बनकर रह जाएगा?</p>
<p>रील, ट्रेंड और एआई मीम आज जनमत बनाते हैं। पर सवाल है- क्या सोशल मीडिया जनता की आवाज़ है या एल्गोरिद्म का बाज़ार? हर असहमति को “टूलकिट” या “राष्ट्रविरोध” कहना लोकतंत्र को भय से चलाएगा, संवाद से नहीं। लंबे समय तक सत्ता में रहने पर समर्थन स्थायी नहीं होता। बेरोज़गारी, परीक्षा घोटाले, महंगाई असली मुद्दे हैं। युवा भाषण नहीं, अवसर और भविष्य चाहता है। जब भविष्य धुंधला हो, तो व्यंग्य ही विरोध बनता है।   </p>
<p>आज “वायरल दृश्यता” वैचारिक निरंतरता से बड़ी हो गई है। विपक्ष के गंभीर मुद्दे मीम के नीचे दब जाते हैं। राजनीति विचार से ज्यादा दृश्य-उत्पादन बन रही है। इससे असली मुद्दे स्थायी दबाव नहीं बना पाते। संविधान नागरिक को सवाल पूछने का अधिकार देता है। किसी भी डिजिटल मुहिम को दल के लाभ-हानि से नहीं, इस कसौटी पर तौलें- क्या वह जनता के असली मुद्दे उठा रही है? क्या सत्ता को जवाबदेह बना रही है? अगर हाँ, तो उसे खारिज करना लोकतंत्र को कमजोर करेगा। </p>
<p>“कॉकरोच जनता पार्टी” जैसी घटनाएँ याद दिलाती हैं कि लोकतंत्र सिर्फ सत्ता की स्थिरता नहीं, जनता की बेचैनी सुनने की क्षमता भी है। सत्ता समझे कि हर आलोचना षड्यंत्र नहीं। विपक्ष समझे कि वायरल होना आंदोलन नहीं। जनता समझे कि लोकतंत्र गुस्से से नहीं, विवेक से बचता है। राष्ट्र का भविष्य मीम्स से नहीं, नागरिक चेतना से तय होगा।</p>
<p>(लेखक समृद्ध झारखंड के ब्यूरो एवं युवा पत्रकार संगठन के सदस्य हैं।)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 25 May 2026 17:04:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>आखिर क्यों बदले गए तीन जिलों के उपायुक्त?</title>
                                    <description><![CDATA[झारखंड में हाल के दिनों में बड़े पैमाने पर हो रही ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर सवाल उठने लगे हैं। गढ़वा, देवघर और खूंटी के डीसी को एक महीने के भीतर बदले जाने से प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हैं। लेख में दावा किया गया है कि बिना स्पष्ट कारण अधिकारियों को हटाने से उनके मनोबल पर असर पड़ता है और विकास कार्य प्रभावित होते हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/why-were-the-deputy-commissioners-of-three-districts-changed/article-22224"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/images_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>सुनील सिंह</strong></p>
<p>झारखंड में पिछले कुछ दिनों से बड़े पैमाने पर अधिकारियों की ट्रांसफर-पोस्टिंग हो रही है। ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर कुछ कायदे-कानून हैं, लेकिन उनका पालन नहीं हो रहा है। सरकार अपने हिसाब से ट्रांसफर-पोस्टिंग कर रही है। जब नियमों का पालन नहीं होगा, तो सवाल उठेंगे — सरकार की कार्यशैली, मनमानी और अधिकारियों की कार्यक्षमता पर भी।</p>
<p>बेवजह और लगातार ट्रांसफर-पोस्टिंग से सवाल उठ रहे हैं और चर्चाओं का बाजार भी गर्म है। एक महीने के अंदर तीन जिलों के डीसी बदल दिए गए। जिन जिलों के डीसी बदले गए, वहां के लोग और जनप्रतिनिधि भी यह सोच रहे हैं कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि गढ़वा, देवघर और खूंटी के डीसी बदल दिए गए।</p>
<p>गढ़वा के डीसी अन्नय मित्तल एक महीने के अंदर ही बेहतर काम करते दिख रहे थे। वे दूर-दराज के इलाकों का दौरा कर विकास की जमीनी हकीकत, शिक्षा व्यवस्था और स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति की जानकारी ले रहे थे। लोगों से मिलने-जुलने और संवाद का तरीका भी वहां के लोगों को पसंद आ रहा था। जब तक वे जिले को पूरी तरह समझ पाते, उससे पहले ही उनका ट्रांसफर हो गया। गढ़वा के इतिहास में पहली बार कोई डीसी एक महीने के अंदर हटा दिया गया।</p>
<p>गढ़वा जिले के लोग यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि डीसी बदल दिए गए। जनप्रतिनिधियों से भी जानकारी ली जा रही है कि कहीं किसी विधायक ने तो ट्रांसफर नहीं कराया। लेकिन ऐसी कोई बात सामने नहीं आई है। किसी विधायक को भी ट्रांसफर के बारे में सही जानकारी नहीं है। न ही किसी ने मुख्यमंत्री से मित्तल की शिकायत की थी। मित्तल तो अभी पूरी तरह लोगों को जान-समझ भी नहीं पाए थे, लेकिन उन्हें हटा दिया गया। अब उनके हटाए जाने पर तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं। गढ़वा से लेकर रांची तक वजह की तलाश हो रही है। पत्रकारों से भी कारण पूछा जा रहा है। देवघर और खूंटी जिले के लोग भी हैरान हैं।</p>
<p>झारखंड में ट्रांसफर-पोस्टिंग को एक उद्योग और कमाई का जरिया माना जाने लगा है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि ट्रांसफर-पोस्टिंग कैसे होती है। हर सरकार में एक नेटवर्क तैयार हो जाता है। लक्ष्मी की कृपा ही सब कुछ तय करती है। ऐसे लोग जिलों में जाते हैं तो उनका उद्देश्य अपने कार्यों से अधिक धन कमाने में रहता है।</p>
<p>अभी दो-तीन दिन पहले एक बड़े ठेकेदार से बात हो रही थी। उस ठेकेदार को सड़क निर्माण का काम मिला है। वह बता रहे थे कि एक जिले के कुछ बड़े अधिकारियों की इतनी बड़ी डिमांड है कि उसे पूरा करना संभव नहीं है। इसलिए काम रुका हुआ है।</p>
<p>लगातार और बिना वजह ट्रांसफर-पोस्टिंग से अधिकारियों का मनोबल गिरता है। जिन जिलों के डीसी एक महीने के अंदर हटा दिए गए, उनकी मनोदशा क्या होगी, यह समझा जा सकता है। क्या वे अक्षम हैं? यदि अक्षम हैं, तो सरकार ने उनकी पोस्टिंग क्यों की? क्या सरकार को इन अधिकारियों के संबंध में जानकारी नहीं थी? बिना जाने ही जिलों की कमान दे दी गई?</p>
<p>झारखंड को अगर विकास के रास्ते पर आगे बढ़ना है, तो अधिकारियों की ट्रांसफर-पोस्टिंग में पारदर्शिता बरतनी होगी। अच्छे अधिकारियों को आगे लाना होगा। तभी विकास होगा, नहीं तो सब कुछ वैसा ही चलता रहेगा जैसा अभी चल रहा है। सरकार को इस विषय पर गंभीरता से सोचना चाहिए। झारखंड में काम करने वाले अधिकारियों का मनोबल गिरा हुआ है और धन कमाने वालों का मनोबल ऊंचा है। ऐसे में भ्रष्टाचार मुक्त शासन की कल्पना कैसे की जा सकती है? यह एक बड़ा सवाल है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 25 May 2026 14:21:48 +0530</pubDate>
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