<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://samridhjharkhand.com/literature/category-4887" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Samridh Jharkhand RSS Feed Generator</generator>
                <title>साहित्य - Samridh Jharkhand</title>
                <link>https://samridhjharkhand.com/category/4887/rss</link>
                <description>साहित्य RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>पुरुषोत्तम मास में क्यों बढ़ जाता है दान-पुण्य का महत्व? पढ़ें यह सुंदर काव्य रचना</title>
                                    <description><![CDATA[कवयित्री सुनीता अग्रवाल ‘पिंकी’ की यह कविता अधिक मास अथवा पुरुषोत्तम मास के धार्मिक महत्व, दान-पुण्य, संयम और आध्यात्मिक साधना की महत्ता को सरल शब्दों में प्रस्तुत करती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/literature/adhik-maas-purushottam-maas-poem-by-sunita-agrawal-pinky/article-23215"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/1ffb5924-a9a1-4e94-a869-4294b352062b_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;"><strong>अधिक मास</strong></h3>
<p style="text-align:center;">अधिक मास भी कहते जिसे,<br />और कहते पुरुषोत्तम मास।<br />दान-पुण्य करते खूब ही,<br />मास कहलाता यह खास॥</p>
<p style="text-align:center;">तीस दिवस का मास यह,<br />पूजा-पाठ करो, नित ध्याय।<br />कारज सकल सब सिद्ध होते,<br />सुख, शांति, समृद्धि भी आए॥</p>
<p style="text-align:center;">तैंतीस चीजों का दान नित,<br />इस माह जो नित्य करते।<br />कहते, मन-इच्छा पूरी होती,<br />शुभ विचार हृदय में बसते॥</p>
<p style="text-align:center;">पवित्र-पावन मन हो जाए,<br />स्नान, ध्यान, दान मन लाए।<br />पाठ, पूजन, हवन करे जो,<br />घर आनंद-उमंग भर जाए॥</p>
<p style="text-align:center;">वाणी में मिठास भरें हम,<br />संयम भी हम करें धारण।<br />तजें क्रोध को सदा के लिए,<br />हर कष्टों का हो निवारण॥</p>
<p style="text-align:right;"><strong>– सुनीता अग्रवाल 'पिंकी'</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/literature/adhik-maas-purushottam-maas-poem-by-sunita-agrawal-pinky/article-23215</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/literature/adhik-maas-purushottam-maas-poem-by-sunita-agrawal-pinky/article-23215</guid>
                <pubDate>Mon, 15 Jun 2026 15:43:27 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-06/1ffb5924-a9a1-4e94-a869-4294b352062b_samridh_1200x720.jpeg"                         length="52772"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आपसी मनमुटाव ठीक नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[‘आपसी मनमुटाव ठीक नहीं’ कविता रिश्तों में बढ़ती दूरियों, खामोशी और संवादहीनता की पीड़ा को व्यक्त करती है। कवि चुन्नू साहा ने जीवन की नश्वरता और अपनों के महत्व को रेखांकित करते हुए संदेश दिया है कि मनमुटाव को लंबे समय तक नहीं पालना चाहिए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/literature/aapsi-manmutav-theek-nahi-hindi-poem-by-chunnu-saha-pakur-jharkhand/article-23132"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/7ef70f69-79ca-4288-9641-67117f0807b2_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>अब बातें नहीं होती हैं,<br />पहले खूब बातें होती थीं।<br />फिर अचानक बातें बंद हो गईं,<br />न जाने क्यों, समझ न पाए।</p>
<p>खैर, कोई बात नहीं।<br />नहीं होती हैं बातें तो<br />नहीं होने दो, क्या होगा?<br />थोड़ी तकलीफ होगी मन में।</p>
<p>और क्या कर सकते हैं?<br />अब झुकना भी तो अच्छा नहीं लगता है।<br />झुके भी हैं कई बार उसके पास,<br />आखिर हुआ क्या है, गलती मुझसे?</p>
<p>लेकिन कोई सटीक उत्तर नहीं मिला।<br />बस, बातें नहीं होती हैं तो नहीं।<br />कुछ दिनों तक खराब लगा खूब,<br />लेकिन अब तो आदत हो गई।</p>
<p>आमने-सामने हो जाने पर भी तो<br />खामोशी से कुछ लोकाचार की बातें,<br />फिर वो अपने और मैं अपने,<br />पता ही नहीं चलता कि कोई है भी।</p>
<p>लेकिन एक बात चुन्नू कवि का कहना है,<br />ऐसी परिस्थिति होना ठीक नहीं।<br />इस नश्वर तन का कोई भरोसा नहीं,<br />अतः आपस में बातें होनी चाहिए।</p>
<p>आपसी मनमुटाव ठीक नहीं,<br />जरूरत अपनों की ही होती है।<br />न जाने कब, कहाँ, किसके साथ<br />जरूरत आ पड़े एक-दूसरे की।</p>
<p><strong>— चुन्नू साहा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/literature/aapsi-manmutav-theek-nahi-hindi-poem-by-chunnu-saha-pakur-jharkhand/article-23132</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/literature/aapsi-manmutav-theek-nahi-hindi-poem-by-chunnu-saha-pakur-jharkhand/article-23132</guid>
                <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 15:47:40 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-06/7ef70f69-79ca-4288-9641-67117f0807b2_samridh_1200x720.jpeg"                         length="53083"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>लोकार्पण: जब साहित्य औपचारिकता के 'समोसे' में खो गया....</title>
                                    <description><![CDATA[यह व्यंग्यात्मक आलेख आज के साहित्यिक लोकार्पण समारोहों की बदलती तस्वीर को सामने लाता है। लेखक ने दिखाया है कि कैसे किताबों का विमोचन अब साहित्यिक विमर्श से अधिक दिखावे, औपचारिकता, सोशल मीडिया प्रचार और चाय-समोसे के आयोजनों तक सीमित होता जा रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/literature/lokarpan-jab-sahitya-aupcharikta-ke-samose-mein-kho-gaya/article-23006"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/8202dab0-c2f4-4775-9aeb-359109e0d39a_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>​आज के डिजिटल और दिखावे के दौर में किसी नई किताब का आना अब केवल एक बौद्धिक या साहित्यिक घटना नहीं रह गया है, बल्कि यह एक भव्य 'इवेंट' बन चुका है। मंच सजते हैं, कुर्सियां लगती हैं, और गंभीर चेहरों का एक ऐसा हुजूम उमड़ता है, जिसे देखकर लगता है कि ज्ञान का कोई नया सूरज उगने वाला है। लेकिन इस पूरे तमाशे की ज़मीनी हकीकत वही है जिसे एक कवि ने बेहद खूबसूरती से उकेरा है: "साहित्य के ठेकेदार सब लाइन में खड़े हैं, जो कभी नहीं पढ़ते, वो सबसे आगे अड़े हैं।"</p>
<p>​समारोह का सबसे दिलचस्प हिस्सा होते हैं—मुख्य अतिथि। मुख्य अतिथि महोदय के पास समय की भारी कमी होती है, पर ज्ञान की कोई कमी नहीं होती। वे चमचमाती किताब पर बंधा लाल फीता काटते हैं और किताब को हाथ में लेते ही, बिना एक भी पन्ना पलटे, उसकी गहराइयों पर आधा घंटा बोल जाते हैं।</p>
<p>​"अहा! क्या उपमा है, क्या अद्भुत विन्यास है!" वाले जुमले हवा में तैरने लगते हैं, भले ही मुख्य अतिथि को यह भी न पता हो कि अंदर कविताएं छपी हैं, कहानियां हैं या इतिहास के पन्ने! यह आज के दौर का सबसे बड़ा विरोधाभास है, जहाँ किताब की समीक्षा उसके कवर और लेखक के रसूख को देखकर तय होती है, शब्दों को पढ़कर नहीं।</p>
<p>​लेखक महोदय का गर्व से फूलना स्वाभाविक है, लेकिन उनकी नज़रें पाठकों से ज़्यादा कैमरों और फ्लैशलाइट्स पर टिकी होती हैं। फोटोग्राफर के निर्देश आते हैं—"सर, ज़रा किताब को चेहरे के पास लाइए... हां, ज़रा सोशल मीडिया वाली मुस्कान दिखाइए!"</p>
<p>​जैसे ही फ्लैश चमकता है और तालियां बजती हैं, लोकार्पण की रस्म तो पूरी हो जाती है, लेकिन ठीक उसी पल लेखक और पाठक के बीच की दूरी और गहरी हो जाती है। मंच से बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं कि यह कृति 'युगपरिवर्तित' है, समाज को बदल देगी, लेकिन भीतर से सब जानते हैं कि यह सिर्फ एक रस्म की आवृत्ति मात्र है।</p>
<p>​समारोह का असली अंत तब होता है जब गंभीर विमर्श खत्म होता है और 'चाय-समोसे' का दौर शुरू होता है। असल में, कई महानुभावों के लिए आयोजन का असली मज़ा इसी सत्र में छिपा होता है। इसके बाद शुरू होता है किताबों के बंटने का सिलसिला। कुछ मुफ्त में बांटी जाती हैं, कुछ ससम्मान भेंट की जाती हैं और एक काउंटर लगाकर किताब खरीदने के लिए आग्रह भी किया जाता है। कुछ लोग लज्जा बस खरीदते भी है और कुछ लोग धीरे-धीरे नैपकिन से हाथ पहुंचते रहते हैं</p>
<p>लेकिन इस भव्यता का असली क्लाइमेक्स विदाई के वक्त दिखता है जब कोई उस 'युगपरिवर्तित' कृति को गाड़ी की डिक्की में डाल रहा होता है।<br />तो कोई समोसे खाते हुए उसके कीमती कवर पर तेल के निशान छोड़ रहा होता है।</p>
<p>​लेखक जी के फेसबुक या इंस्टाग्राम पर सौ-दो सौ लाइक्स आ जाते हैं, वे बिना पढ़े ही साहित्य जगत पर 'छा' जाते हैं, और वह बेचारी किताब अलमारी के किसी अंधेरे कोने में जाकर सो जाती है।</p>
<p>​साहित्य की एक और 'क्रांति' औपचारिकता की भेंट चढ़कर दम तोड़ देती है। आज के साहित्यिक आयोजनों को देखकर मन में बस एक ही सवाल कौंधता है, जिसे शब्दों में कुछ इस तरह पिरोया जा सकता है:</p>
<p>             ​लोकार्पण के मंच पर, हुई बहुत तारीफ,<br />           मंच पर बैठे थे जितने, सब दिख रहे शरीफ।<br />           तस्वीरें तो खिंच गईं, पर एक सवाल बाकी है,<br />क्या किताब भी पढ़ेगा कोई, या बस चाय-समोसा ही काफी है?</p>
<p>​जब तक हम किताबों को सेल्फी और समोसों से आज़ाद करके 'पढ़ने' की संस्कृति की तरफ वापस नहीं लौटेंगे, तब तक लोकार्पण सिर्फ एक तमाशा बनकर रह जाएंगे और शब्द अलमारियों में सिसकते रहेंगे।</p>
<p> </p>
<p><strong>गुड्डू अनिल </strong><br /><strong>रांची (झारखंड) </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/literature/lokarpan-jab-sahitya-aupcharikta-ke-samose-mein-kho-gaya/article-23006</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/literature/lokarpan-jab-sahitya-aupcharikta-ke-samose-mein-kho-gaya/article-23006</guid>
                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 14:36:11 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-06/8202dab0-c2f4-4775-9aeb-359109e0d39a_samridh_1200x720.jpeg"                         length="54689"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कभी सोचे ना थे, महादेव: अन्याय और आस्था पर भावुक कविता</title>
                                    <description><![CDATA[“कभी सोचे ना थे, महादेव” एक भावनात्मक कविता है, जिसमें अन्याय, पीड़ा और आस्था का गहरा चित्रण किया गया है। कवि ने महादेव से संवाद के माध्यम से जीवन में आए कठिन समय, एकतरफा सजा और न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/literature/mahadev-never-thought-emotional-poem-on-injustice-and-faith/article-20134"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-04/f8d2e33f-ba93-4c2a-a3c7-c81ea9da29bb_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>कभी सोचे ना थे, महादेव,<br />कि ऐसा दिन दिखेगा।<br />रहते तो हर पल ही हैं,<br />फिर भी खामोश रहना होगा।</p>
<p>न गुनाह पता, न जख्म, महादेव,<br />फिर भी सजा तय हो गया।<br />सोचते रहे कि आखिर हुआ है क्या,<br />और सजा सुना दिया गया।</p>
<p>ऐसा कैसे हो गया, महादेव,<br />समझ से मेरे तो ये परे है।<br />तू ही कुछ बता दो,<br />ये मैं कैसे अंधेरे में हूँ?</p>
<p>सुना तो मैं भी हूँ, महादेव,<br />कि एक हाथ से ताली नहीं बजती है।<br />यदि गुनाह, जख्म मेरा है,<br />तो उसकी भी भागीदारी है।</p>
<p>फिर ये सजा एकतरफा, महादेव,<br />ऐसा क्यों, कैसे हो गया?<br />कि वो न्यायकर्ता गलत था,<br />या उसका वो अपना निकला?</p>
<p>ये धरा अजीब हो गया है, महादेव,<br />अब यहाँ न्याय नियम से नहीं,<br />बल्कि भार देखकर होता है,<br />चाहे मुजरिम गलत रहे या सही।</p>
<p>खैर, कोई बात नहीं, महादेव,<br />मुझे तो आप पर भरोसा है।<br />चाहे जितना भी गलत करार दे कोई,<br />मुझे आप पर पूर्ण आशा है।</p>
<p><strong><img src="https://samridhjharkhand.com/media/2026-04/5099cc10-a429-4997-9919-0b4582e1193d.jpg" alt="5099cc10-a429-4997-9919-0b4582e1193d" width="162" height="185"></img></strong></p>
<p><strong>✍️ <em>चुन्नू साहा, पाकुड़, झारखंड</em></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/literature/mahadev-never-thought-emotional-poem-on-injustice-and-faith/article-20134</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/literature/mahadev-never-thought-emotional-poem-on-injustice-and-faith/article-20134</guid>
                <pubDate>Sun, 05 Apr 2026 16:18:38 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-04/f8d2e33f-ba93-4c2a-a3c7-c81ea9da29bb_samridh_1200x720.jpeg"                         length="53456"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>“उस दौर से इस दौर तक”: बाबा साहेब के संघर्ष की प्रेरक गाथा</title>
                                    <description><![CDATA[“उस दौर से इस दौर तक” कविता समाज के संघर्ष, पीड़ा और बदलाव की कहानी को प्रस्तुत करती है। यह रचना बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के योगदान और दलित समाज के उत्थान को भावनात्मक रूप से दर्शाती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/literature/us-daur-se-is-daur-tak-babasaheb-ambedkar-poem/article-20004"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-04/03851081-6d53-43f6-92bc-d41a24c9bd8f.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>राकेश कुमार पंवार</strong></p>
<p>पत्थर की मूर्त से निकल कर, इंसान की दुनिया दिखाई थी।<br />उस दौर की यारों कथा सुनो, जिसने ये ठोकर खाई थी।।</p>
<p>मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर से, धर्म की आड़ में लंका जलाई थी।<br />उस दौर में झाँक के देखो यारों, जिसने ये अलख जगाई थी।।</p>
<p>किस्मत की लकीरें फीकी थीं, जब कंगुरा सूना था।<br />जीने को जिंदगी तो मिली थी, पर आशियाना सूना था।।</p>
<p>ना राम था, ना रहीम था, हर पल का रोना था।<br />भूख-प्यास मिटाने को, दूसरों के भरोसे जीना था।।</p>
<p>भीम जैसा सूरज अगर निकला ना होता,<br />दलितों के जीवन में ये उजाला ना होता।।</p>
<p>मर गए होते यूँ ही जुल्म सहकर,<br />अगर भीम जैसा रखवाला मिला ना होता।।</p>
<p>दलित समाज सुधारक को बाबा साहेब कहते हैं।<br />जलते दीपक बनकर सदा हमारे दिल में रहते हैं।।</p>
<p>अमीरों का दिया हर अत्याचार सहा था उसने,<br />फिर भी दो वक्त की रोटी भी कमा ना पाया था।।</p>
<p>अपनी गरीबी के आगे, वो बेबस नजर आया था।<br />फिर भी दो वक्त की रोटी भी कमा ना पाया था।।</p>
<p>फिर हुआ एक रोज चमत्कार इस धरती पर,<br />बनकर मसीहा, खुदा धरती पर उतर आया था।।</p>
<p>देश के लिये जिन्होंने विलास को ठुकराया था।<br />गिरे हुए को जिन्होंने स्वाभिमान सिखाया था।।</p>
<p>जिसने हम सबको तूफानों से टकराना सिखाया था।<br />देश का वो था अनमोल दीपक, जो बाबा साहब कहलाया था।।</p>
<img src="https://samridhjharkhand.com/media/2026-04/03851081-6d53-43f6-92bc-d41a24c9bd8f.jpg" alt="“उस दौर से इस दौर तक”: बाबा साहेब के संघर्ष की प्रेरक गाथा" width="168" height="211"></img>
राकेश कुमार पंवार <br />(फाइल फोटो)

<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/literature/us-daur-se-is-daur-tak-babasaheb-ambedkar-poem/article-20004</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/literature/us-daur-se-is-daur-tak-babasaheb-ambedkar-poem/article-20004</guid>
                <pubDate>Sat, 04 Apr 2026 14:57:47 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-04/03851081-6d53-43f6-92bc-d41a24c9bd8f.jpg"                         length="79306"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>“मायके की यादें”: मां के बिना सूना घर और भावनाओं का सैलाब</title>
                                    <description><![CDATA[“मायके की यादें” एक भावनात्मक लघुकथा है, जो मां के जाने के बाद मायके लौटने वाली बेटी की संवेदनाओं को दर्शाती है। सूने आंगन, बंद कमरों और बचपन की यादों के बीच वह मां के स्नेह और दुलार को महसूस करती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/literature/memories-of-motherland-a-desolate-home-without-mother-and-a/article-19218"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/capture_samridh_1200x7204.jpeg" alt=""></a><br /><p>माँ के जाने के बाद दो वर्ष बीत गए थे मायके का घर देखे हुए, उस दलहीज पर पैर रखते ही मुस्कुराते हुए। आज गृहस्थी से फुरसत निकालकर उस बंद घर को उसके हर कमरे को खोलती जाती हूँ और यादों के समुन्दर में डूबती जाती हूँ। मायके के सूने आंगन को देखकर यादों के पुलिंदे तह दर तह  खोलती जाती हूँ। </p>
<p>वहीं हँसी ठहाके खेलते भागते बच्चे शोर मचाते माँ के गले में बाहें डाल झूलते बच्चे, आंखों के आगे नाचने लगे। माँ की याद उनकी दुआएं। हमारे भविष्य का सपना अपनी आँखों में संजोया करती थीं। हमारे जीवन में खुशियों का रंग भरती थी। बच्चों को परियों की कहानी सुनाती माँ याद आने लगी। आंगन में तुलसी का चबूतरा कुछ पत्ते अभी भी हरे थे।</p>
<p>आँचल में तमाम लम्हों को समेटकर अंतिम दरवाजा बंद करती हूँ। गालों पर ढलके आंसुओं को पोंछकर मुड़कर घर के चौखट को देखती हूँ। चौखट पर एक परछाई सी दिखती है, एक उम्मीद सी जगती है, शायद माँ मुझे पुकार लेगी, मेरे बहते हुए आंसुओं को पोंछते हुए कहेगी बेटी फिर आना, मायके को भूल न जाना।<br />      <br /><strong>लेखिका: रश्मि सिन्हा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/literature/memories-of-motherland-a-desolate-home-without-mother-and-a/article-19218</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/literature/memories-of-motherland-a-desolate-home-without-mother-and-a/article-19218</guid>
                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 22:44:21 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-03/capture_samridh_1200x7204.jpeg"                         length="52595"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>“तपस्या”: मां के संघर्ष से IPS बनी बेटी की प्रेरक कहानी</title>
                                    <description><![CDATA[“तपस्या” एक मार्मिक लघुकथा है, जो एक मां के संघर्ष, त्याग और दृढ़ संकल्प को दर्शाती है। समाज की रूढ़िवादी सोच के खिलाफ लड़ते हुए मीना अपनी बेटी को पढ़ाने के लिए घर छोड़ देती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/literature/tapasya--inspirational-story-of-a-daughter-who-became-an/article-19214"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/1f9b34c1-fcca-48f4-bb17-a96d31c9ef6e_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>आज मीना बहुत खुश थी, उसकी वर्षों की तपस्या सफल हो गयी थी।उसकी बेटी कविता आइ पी एस की ट्रेनिंग ख़त्म करके घर लौट रही थी।सुबह से मीना रसोई में कविता के पसन्द के व्यंजन बनाने में व्यस्त थी। बीच-बीच में अतीत के साये मीना के मानस पटल पर तैर रहे थे,जिसे झटकने की वह नाकाम कोशिश करती रही। फिर भी आज जिन ज़ंजीरों से आज़ाद हुई थी वे ज़ंजीर खींच कर उसे अतीत की ओर ले गयी।</p>
<p>मीना की शादी एक रूढ़िवादी परिवार में हुआ था।तीन साल ख़ुशी- ख़ुशी बीत गए।परन्तु जीवन में अभी भी एक कमी थी,मीना माँ नहीं बन पाई थी।सबकी निगाहें आते-जाते मीना को ही घूरती रहती जैसे प्रश्न पूछ रही हो कि घर में किलकारी कब गूंजेगी।</p>
<p>शादी के पाँच साल बाद मीना का मातृत्व पूरा हुआ।परन्तु बिटिया के आगमन की ख़बर सुनते ही पूरे घर में सन्नाटा छा गया….सब बेटे की आस लगाए बैठे थे। अस्पताल से घर आने के बाद मीना और उसकी छोटी बच्ची पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। दिन गुजरते गये कविता पाँच साल की हो गयी( मीना ने ही बेटी का नाम कविता रखा था)मीना बेटी का दाख़िला स्कूल में करवाना चाह रही थी, परन्तु पति सास ससुर ने विरोध किया कि लड़की पढ़कर क्या करेगी। परन्तु मीना अपनी बेटी को पढ़ा-लिखा कर अपने पैरों पर खड़ी करना चाह रही थी, ताकि उसकी ज़िंदगी को भी ज़ंजीरों में न जकड़ा जाये।</p>
<p>आख़िर मीना घर से निकल गयी बेटी के उज्ज्वल भविष्य के लिए।एक सहेली ने आश्रय दिया और एक महीना होते-होते मीना ने एक सिलाई मशीन लेकर ज़िंदगी की गाड़ी खींचने लगी। बेटी की अच्छी परवरिश के लिए रात-दिन मेहनत करती हुई आज बेटी को आइ पी एस बना दिया।</p>
<p>तभी दरवाज़े पर घंटी बजी और मीना वर्तमान में लौट आयी….सामने आइ पी एस बेटी को देखकर ख़ुशी से आँखें भर आयी। माँ-बेटी गले लगकर, तपस्या पूरी होने पर मुस्कुरा दी….</p>
<p><strong>लेखिका: रश्मि सिन्हा </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/literature/tapasya--inspirational-story-of-a-daughter-who-became-an/article-19214</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/literature/tapasya--inspirational-story-of-a-daughter-who-became-an/article-19214</guid>
                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 22:37:21 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-03/1f9b34c1-fcca-48f4-bb17-a96d31c9ef6e_samridh_1200x720.jpeg"                         length="49025"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>“बिजली रानी” कविता में बिजली संकट पर व्यंग्यात्मक प्रहार</title>
                                    <description><![CDATA[कवि अनिल गुड्डू की कविता “बिजली रानी” बिजली कटौती और उससे होने वाली आम लोगों की परेशानियों को व्यंग्यात्मक और भावपूर्ण शैली में प्रस्तुत करती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/literature/satirical-attack-on-electricity-crisis-in-the-poem-bijli-rani/article-18743"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/d829aca7-0b08-405d-9268-fabe7d5b8038.jpg" alt=""></a><br /><p>चंचल, शर्मीली, कोमल, हठीली,<br />लाजवंती की है तू सहेली।<br />तुझे देखे बिना इस जग को,<br />मिलता नहीं पीने को पानी,<br />झलक दिखाकर कहाँ,<br />चली जाती हो बिजली रानी?</p>
<p>अंधकार से डर लगता है,<br />भूतों का यह घर लगता है।<br />दिन तो जैसे-तैसे कट जाता है,<br />रात में मच्छर शोर मचाता है।<br />बचपन तो डर-डर के बीत गया,<br />अब मुसीबत में है जवानी,<br />झलक दिखाकर कहाँ,<br />चली जाती हो बिजली रानी?</p>
<p>तुमसे ही घर में सुख-शांति,<br />तुमसे ही घर में हो क्रांति।<br />हवन करें या जाप करें हम,<br />तुम किसी की बात न मानती।<br />कहाँ खोजें, किससे करें बातें,<br />तू है छुई-मुई सी दीवानी,<br />झलक दिखाकर कहाँ,<br />चली जाती हो बिजली रानी?</p>
<p>मेहमान अब कोई आता नहीं,<br />पड़ोसी भी हमें बुलाता नहीं।<br />सब महफिल में अकेले हो गए,<br />अपने ही दुखों में खो गए।<br />भगवान ही बचाए अब देश को,<br />गजब है तेरी यह कहानी,<br />झलक दिखाकर कहाँ,<br />चली जाती हो बिजली रानी!</p>
<img src="https://samridhjharkhand.com/media/2026-03/d829aca7-0b08-405d-9268-fabe7d5b8038.jpg" alt="“बिजली रानी” कविता में बिजली संकट पर व्यंग्यात्मक प्रहार" width="158" height="183"></img>
अनिल गुड्डू (फाइल फोटो)

<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/literature/satirical-attack-on-electricity-crisis-in-the-poem-bijli-rani/article-18743</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/literature/satirical-attack-on-electricity-crisis-in-the-poem-bijli-rani/article-18743</guid>
                <pubDate>Wed, 11 Mar 2026 15:49:25 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-03/d829aca7-0b08-405d-9268-fabe7d5b8038.jpg"                         length="61809"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर एमपी अध्याय द्वारा अंतर्राष्ट्रीय ऑनलाइन कवि सम्मेलन संपन्न</title>
                                    <description><![CDATA[अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मकस कहानिका हिंदी पत्रिका के एमपी अध्याय द्वारा 10 मार्च 2026 को गूगल मीट के माध्यम से एक भव्य अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन कवि सम्मेलन आयोजित किया गया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/madhya-pradesh/international-online-poets-conference-concluded-by-mp-chapter-on-international/article-18738"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/image-(9)_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>भोपाल :</strong> अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मकस कहानिका हिंदी पत्रिका के एमपी अध्याय द्वारा मंगलवार को सायं 6 बजे से एक भव्य अंतर्राष्ट्रीय ऑनलाइन कवि सम्मेलन का आयोजन गूगल मीट के माध्यम से किया गया। इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ विदेश से भी साहित्यकारों ने भाग लेकर नारी शक्ति, नारी सम्मान और महिला सशक्तिकरण पर आधारित अपनी रचनाओं का प्रभावशाली काव्य पाठ किया।</p>
<p>कार्यक्रम की मुख्य अतिथि आदरणीया श्रीमती आशा पांडेय जी तथा विशिष्ट अतिथि आदरणीया कीर्ति चौरसिया जी  और सोनी वर्मा रांची रहीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता एवं संयोजन कहानिका हिंदी पत्रिका के प्रधान संपादक श्याम कुंवर भारती ने किया, जबकि मंच संचालन स्नेह लता पांडेय (केंद्रीय सोशल मीडिया प्रभारी, दिल्ली) और मधुमिता साहा उप संपादक झारखंड अध्याय द्वारा किया गया।</p>
<p>कार्यक्रम का शुभारंभ कवि मॉंगी लाल मरमिट (श्योपुर, मध्यप्रदेश) द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से हुआ। इसके बाद मधुमिता साहा (रांची) ने गणेश वंदना प्रस्तुत की। देवी गीत श्याम कुंवर भारती द्वारा प्रस्तुत किया गया तथा स्वागत गीत डॉ. उर्मिला कुमारी "साईप्रीत" ने प्रस्तुत किया।</p>
<p>कवि सम्मेलन में देश-विदेश के अनेक प्रतिष्ठित कवियों ने भाग लेकर अपनी प्रभावशाली रचनाओं का पाठ किया। इनमें डॉ. दिवाकर पाठक (हजारीबाग, झारखंड), गीता कुमारी गुस्ताख (बोकारो), सोनी वर्मा (रांची), शिव प्रसाद (बालूमाथ, लातेहार), कल्पना झा (बेरमो, बोकारो), कवि मॉंगी लाल मरमिट (श्योपुर, मध्यप्रदेश), राज किशोर वाजपेयी “अभय” (ग्वालियर), रूपा कुमारी “अनंत”, मीना अग्रवाल (इंदौर), डॉ. प्रतिभा प्रकाश (देहरादून, उत्तराखंड), डॉ. उर्मिला कुमारी “साईप्रीत” (कटनी, मध्यप्रदेश), मधुमिता साहा (रांची), सीमा मुकुंद अग्रवाल, जय कृष्ण मिश्रा (दुबई), सत्येंद्र नाथ गुप्ता (आबुधाबी), ललिता मिश्रा (आबुधाबी), भारत प्रजापति (मध्यप्रदेश), शिखा गोस्वामी “निहारिका” (मुंगेली, छत्तीसगढ़), कविता राय (जबलपुर), कृति तिवारी (बुरहानपुर), विभा तिवारी (जौनपुर, उत्तरप्रदेश), सुधीर कुमार श्रीवास्तव (बस्ती, उत्तरप्रदेश), अंशिका श्रीवास्तव (जौनपुर) सहित अन्य कवियों ने अपनी रचनाओं से कार्यक्रम को साहित्यिक ऊंचाई प्रदान की।</p>
<p>सभी कवियों ने नारी के विविध रूपों, उसके संघर्ष, त्याग, शक्ति और समाज में उसके महत्व को अपनी कविताओं के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया, जिसकी श्रोताओं ने सराहना की।</p>
<p>कार्यक्रम के अंत में एमपी अध्याय द्वारा सभी प्रतिभागियों को सम्मान पत्र प्रदान करने की घोषणा की गई। राज्य प्रभारी रजनी कटारे ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों, कवियों और श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>साहित्य</category>
                                            <category>मध्य-प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/state/madhya-pradesh/international-online-poets-conference-concluded-by-mp-chapter-on-international/article-18738</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/state/madhya-pradesh/international-online-poets-conference-concluded-by-mp-chapter-on-international/article-18738</guid>
                <pubDate>Tue, 10 Mar 2026 23:04:38 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-03/image-%289%29_samridh_1200x720.jpeg"                         length="47138"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आग उगलते देखा है! — देशभक्ति से ओतप्रोत कविता</title>
                                    <description><![CDATA[“आग उगलते देखा है” एक सशक्त कविता है जो समाज, देश और बदलते इतिहास की पीड़ा व चेतना को उजागर करती है। कवि ने मिट्टी, संघर्ष और जनमानस की ताकत को प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। कविता बताती है कि समय आने पर शांत दिखने वाली शक्तियां भी परिवर्तन की ज्वाला बन सकती हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/literature/have-seen-the-fire-spewing-fire-%E2%80%93-a-poem-full/article-18198"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/1b2655a2-cf3e-4d40-a8ae-d8e2d0daf2e5_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>तुमने क्या इस जीवन में <br />इतिहास बदलते देखा है<br />मैंने तो हिमखंडों को भी <br />आग उगलते देखा है! </p>
<p>इतनी पावन मेरी मिट्टी <br />कहते हो कि दाग लगा है<br />इस मिट्टी से हर मिट्टी के <br />दाग को धुलते देखा है! </p>
<p>मैंने तो हिमखंडों को भी <br />आग उगलते देखा है! </p>
<p>दीवारों से जाकर पूछो <br />उनको सब कुछ याद यहां<br />उनके सीने में भी मैंने <br />आग सुलगते देखा है! </p>
<p>मैंने तो हिमखंडों को भी <br />आग उगलते देखा है! </p>
<p>जिस पर देना ध्यान जिसे <br />ध्यान कहां दे पाता है<br />माली के रहते भी मैंने <br />बाग उजड़ते देखा है! </p>
<p>मैंने तो हिमखंडों को भी <br />आग उगलते देखा है! </p>
<p>नींव नहीं कमजोर <br />हिला कर कोई रख दे<br />यहां के इक-इक बच्चे को <br />नाग कुचलते देखा है! </p>
<p>मैंने तो हिमखंडों को भी <br />आग उगलते देखा है!</p>
<img src="https://samridhjharkhand.com/media/2026-02/84a77827-bdd3-40ac-9286-602d72e6972c.jpg" alt="आग उगलते देखा है! — देशभक्ति से ओतप्रोत कविता" width="105" height="118"></img>
राजेश पाठक

<p>कवि : राजेश पाठक</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/literature/have-seen-the-fire-spewing-fire-%E2%80%93-a-poem-full/article-18198</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/literature/have-seen-the-fire-spewing-fire-%E2%80%93-a-poem-full/article-18198</guid>
                <pubDate>Tue, 17 Feb 2026 16:15:40 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-02/1b2655a2-cf3e-4d40-a8ae-d8e2d0daf2e5_samridh_1200x720.jpeg"                         length="52315"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>‘नियति’ शोषण और स्वार्थ की सच्चाई बयान करती कविता</title>
                                    <description><![CDATA[कविता “नियति” मानव जीवन के उस कटु सत्य को उजागर करती है जिसमें स्वार्थ और शोषण का चक्र निरंतर चलता रहता है। चिता पर जलती लाश के साथ जूँ के जलने का उदाहरण देकर कवि ने यह दिखाया है कि शोषण करने वाला अंततः स्वयं भी उसी नियति का शिकार बनता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/literature/poem-telling-the-truth-of-destiny-exploitation-and-selfishness/article-18179"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/c6e18ade-a840-4fb2-b874-65ae54af61f6_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>जलने लगेगी कुछ ही पलों में<br />चिता पर रखी लाश,<br />साथ ही<br />जलना होगा उस जूँ को भी,<br />जो रहती आई है उसके सिर के बालों में।</p>
<p>क्यों होगा यह क्रूर मज़ाक उसके साथ?<br />क्या ज़िंदा रहकर उसने कोई अपराध किया है?<br />आदमी मरा है, जूँ तो नहीं,<br />क्यों जलेगी वो?</p>
<p>शायद बंधी है जूँ शोषण के माया जाल में,<br />इसीलिए वह भाग नहीं पाती।<br />किसी ने रोका नहीं है उसे।</p>
<p>जब तक ज़िंदा था वह आदमी,<br />जूँ ने खूब शोषण किया था उसका,<br />दिन-रात,<br />और आज भी शोषणरत है,<br />जब वह मर चुका है।</p>
<p>स्वार्थ में डूबा हर व्यक्ति<br />इसी अंजाम को प्राप्त करता है कि<br />वह किसी को खाता है, तो कोई<br />उसको खा जाता है।</p>
<p>हर शोषणकर्ता की यही नियति है।</p>
<p><strong>गुड्डू अनिल </strong></p>
<p><img src="https://samridhjharkhand.com/media/2026-02/62cd2990-a385-46c9-8945-9ae4bba89aac.jpg" alt="62cd2990-a385-46c9-8945-9ae4bba89aac" width="99" height="115"></img></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/literature/poem-telling-the-truth-of-destiny-exploitation-and-selfishness/article-18179</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/literature/poem-telling-the-truth-of-destiny-exploitation-and-selfishness/article-18179</guid>
                <pubDate>Mon, 16 Feb 2026 15:06:42 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-02/c6e18ade-a840-4fb2-b874-65ae54af61f6_samridh_1200x720.jpeg"                         length="54824"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>'जादूगर’ कविता में सत्ता और व्यवस्था पर तीखा सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[कवि राजेश पाठक की कविता “जादूगर” वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर तीखा व्यंग्य प्रस्तुत करती है। कविता में प्रशासनिक भ्रष्टाचार, कानून की कमजोर स्थिति, किसानों और आम जनता की परेशानियों तथा व्यवस्था की निष्क्रियता को प्रभावशाली ढंग से उजागर किया गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/literature/sharp-question-on-power-and-system-in-the-poem-magician/article-18163"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/27b78b0e-21a1-4630-889f-d2aae3999c57_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>ओ सत्ता के शीर्ष बिराजे! <br />बोलो कब तक जागोगे<br />लेकर अपनी लकुटि कंवरिया<br />डर है कि तुम भागोगे</p>
<p>हुआ प्रशासन भ्रष्ट यहाँ<br />सब कष्ट झेलते आए हैं<br />एक खिलाड़ी ही सारे<br />तो खेल खेलते आए हैं</p>
<p>नियमों की धज्जी उड़तीं<br />कानून यहाँ पर बौना है<br />जिसके हाथों कलम चाहिए<br />हाथों आज खिलौना है</p>
<p>खेतों की तो पूछो ही मत<br />सड़कें वहाँ बनी हैं<br />रोजीरोटी गायब है<br />पर भौं भी नहीं तनी है</p>
<p>जादूगर बस एक सुना था<br />कौन दूसरा आया<br />कटती थी सुख चैन जिंदगी<br />गायब कर दी छाया,,, </p>
<p><strong>कवि : राजेश पाठक</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/literature/sharp-question-on-power-and-system-in-the-poem-magician/article-18163</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/literature/sharp-question-on-power-and-system-in-the-poem-magician/article-18163</guid>
                <pubDate>Sun, 15 Feb 2026 15:22:19 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-02/27b78b0e-21a1-4630-889f-d2aae3999c57_samridh_1200x720.jpeg"                         length="53899"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        