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                <title>महिला - Samridh Jharkhand</title>
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                <description>महिला RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>कारगिल विजय दिवस: जब एक लड़की ने देखा बारूद का अंधेरा, और जलाई उम्मीद की रौशनी</title>
                                    <description><![CDATA[कारगिल विजय दिवस पर जब पूरा देश सैनिकों की बहादुरी को सलाम करता है, तब गाज़ियाबाद की लेखिका डॉ. प्राची गर्ग एक अनसुनी दास्तां लेकर आईं — एक ऐसी लड़की की नज़रों से देखी गई जंग, जहां गोलियों से नहीं, हौसलों से लड़ी गई लड़ाई।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/woman/kargil-victory-day-when-a-girl-saw-the-darkness-of/article-14958"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-07/tyhfg.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>समृद्ध डेस्क:</strong> 1999, कारगिल एक ऐसा समय जब भारत की सरहदें गर्म थीं और दिलों में देशभक्ति उफान पर। पर ये कहानी सीमा पर तैनात सैनिकों की नहीं है, ये कहानी है उन दीवारों की जो गोलियों से छलनी हो गईं लेकिन उस घर की औरतें फिर भी उजाले का दीया बुझने नहीं देती थीं।</p>
<p style="text-align:justify;">डॉ. प्राची गर्ग ने कारगिल युद्ध की वो दास्तान साझा की जो उन्होंने एक बच्ची की आंखों से देखी। वो बच्ची थी कारगिल के करीब रहने वाली, जिसकी आंखों ने अपने ही घर की छत को बम से उड़ते देखा, अपने पिता को सीमा पर जाते देखा और अपनी मां को आंखों में आंसू लेकर हिम्मत बांधते देखा।</p>
<p style="text-align:justify;">एक दिन ऐसा भी आया जब उनके घर के सामने की इमारत पर दुश्मन की गोली आकर लगी — खिड़कियां टूट गईं, लेकिन घर के अंदर खड़े सैनिकों ने कहा: “ये गोली नहीं डराएगी, हम यहां हैं।”</p>
<p style="text-align:justify;">उस युद्ध में सिर्फ सैनिक नहीं, गांव वाले, महिलाएं, शिक्षक, डॉक्टर — हर कोई एक साइलेंट वॉरियर था।<br />जैसे-जैसे गोलियां चलती रहीं, वैसे-वैसे देशभक्ति का रंग और गहरा होता गया।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>1997 में कैप्टन बनकर सेना में भर्ती हुईं प्राची</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">प्राची गर्ग उस समय भारतीय सेना में मेडिकल अफसर थीं. जून 1997 में कैप्टन बनकर सेना में भर्ती हुईं. युद्ध के समय वे 8वीं माउंटेन आर्टिलरी ब्रिगेड के साथ द्रास सेक्टर में तैनात थीं और सबसे खास बात, उस ब्रिगेड में वे अकेली महिला अफसर थीं. मई 1999 की बात है. अचानक आदेश मिला कि द्रास सेक्टर के लिए रवाना होना है. उन्हें नहीं पता था कि अब जंग के मैदान में उतरना है, लेकिन प्राची डरी नहीं. उन्हें जो जिम्मेदारी सौंपी गई थी उसे निभाने के लिए वो पूरी ताक़त से तैयार थीं.</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                            <category>महिला</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 26 Jul 2025 14:36:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Media Desk]]></dc:creator>
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                <title>IVF– इच्छुक माता-पिता के लिए एक उम्मीद की किरण: डॉ. अनिशा चौधरी</title>
                                    <description><![CDATA[बांझपन आज वैश्विक स्तर पर हर छह में से एक दंपति को प्रभावित करता है. भारत में लगभग 2.75 करोड़ दंपतियां इस चुनौती का सामना कर रही हैं, और यह संख्या लगातार बढ़ रही है.]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/public-health/ivf-a-ray-of-hope-for-interested-parents-dr-anisha-chaudhary/article-14935"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-07/resized-image-(10).jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हर साल 25 जुलाई को वर्ल्ड आईवीएफ डे के रूप में मनाया जाता है, जो 1978 में दुनिया के पहले आईवीएफ शिशु के जन्म की ऐतिहासिक उपलब्धि को समर्पित है. यह वैज्ञानिक सफलता न केवल चिकित्सा जगत की एक क्रांति थी, बल्कि उन असंख्य दंपतियों के लिए एक नई आशा बनकर उभरी जो संतान प्राप्ति के संघर्ष से जूझ रहे थे. </p>
<p style="text-align:justify;">बांझपन आज वैश्विक स्तर पर हर छह में से एक दंपति को प्रभावित करता है. भारत में लगभग 2.75 करोड़ दंपतियां इस चुनौती का सामना कर रही हैं, और यह संख्या लगातार बढ़ रही है. इसके पीछे बदलती जीवनशैली, देर से मातृत्व की योजना, मोटापा, अत्यधिक तनाव, प्रदूषण, और पीसीओएस व एंडोमेट्रियोसिस जैसी जटिल प्रजनन संबंधी स्वास्थ्य समस्याएं प्रमुख कारण हैं. इसके बावजूद, कई दंपति मदद लेने में देर कर देते हैं — अक्सर सामाजिक कलंक, जानकारी की कमी या असफलता के डर की वजह से. </p>
<p style="text-align:justify;">बांझपन की राह भावनात्मक और शारीरिक रूप से बेहद निराशाजनक हो सकती है. ऐसे में इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (IVF) एक महत्वपूर्ण सहारा बनकर उभरता है — एक ऐसी आधुनिक तकनीक जिसमें अंडाणु और शुक्राणु को शरीर के बाहर निषेचित किया जाता है, और फिर एक स्वस्थ भ्रूण को गर्भाशय में स्थानांतरित किया जाता है.आईवीएफ कोई अंतिम विकल्प नहीं, बल्कि एक सशक्त और समयबद्ध समाधान है, खासकर तब जब अन्य उपचारों से सफलता नहीं मिलती. </p>
<h3 style="text-align:justify;">बांझपन पर चुप्पी तोड़ना </h3>
<p style="text-align:justify;">बांझपन कोई असामान्य बात नहीं है, और यह केवल महिलाओं से जुड़ी समस्या भी नहीं है — वास्तव में करीब 40–50% मामलों में कारण पुरुषों से जुड़े होते हैं. लेकिन दुर्भाग्यवश, अधिकांश मामलों में भावनात्मक बोझ महिलाओं को ही उठाना पड़ता है. हमें एक समाज के रूप में इस सोच को बदलने की जरूरत है. दोषारोपण की जगह सहयोग और समझ का वातावरण बनाना ज़रूरी है, ताकि दंपतियों को खुलकर अपनी समस्याओं के बारे में बात करने और समय पर उपचार लेने में संकोच न हो. </p>
<h3>समय पर मदद — उम्मीद की पहली सीढ़ी</h3>
<p style="text-align:justify;">अगर आप एक साल से गर्भधारण की कोशिश कर रहे हैं (या आपकी उम्र 35 वर्ष से अधिक है और छह महीने में भी सफलता नहीं मिली है), तो यह संकेत है कि आपको प्रजनन विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए. बहुत से मामलों में बिना आईवीएफ के भी उपचार संभव होता है, लेकिन समय पर जांच और सही दिशा में कदम उठाना सबसे ज़रूरी है. प्रजनन से जुड़ी हर स्थिति अलग होती है, और सफलता उम्र, जीवनशैली, स्वास्थ्य व अन्य कारकों पर निर्भर करती है. हम चिकित्सकों की भूमिका केवल इलाज करना नहीं, बल्कि इस संवेदनशील यात्रा में आपका मार्गदर्शन करना है — ईमानदारी, सहानुभूति और भरोसे के साथ. </p>
<h3>आईवीएफ है सुरक्षित — मिथकों को तोड़े </h3>
<p style="text-align:justify;">आईवीएफ को लेकर फैली भ्रांतियां इसकी राह में सबसे बड़ी रुकावट हैं. लोग इसे असुरक्षित या अप्राकृतिक मानते हैं, जबकि यह वैज्ञानिक अनुसंधान और सख्त सुरक्षा मानकों पर आधारित प्रक्रिया है, जिसे दुनिया भर में चार दशक से अधिक समय से सफलतापूर्वक अपनाया जा रहा है. आईवीएफ से जन्मे बच्चों में जन्म दोष की संभावना प्राकृतिक गर्भधारण जितनी ही होती है. साथ ही, यह भी एक मिथक है कि आईवीएफ से अंडाशय “खाली” हो जाते हैं या इससे कैंसर का खतरा बढ़ता है — इन दोनों बातों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है.</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ल्ड आईवीएफ डे उन अग्रदूतों को सम्मान देने का दिन है जिन्होंने प्रजनन चिकित्सा में क्रांतिकारी बदलाव लाए. यह उन सफलताओं का जश्न है जिन्होंने अनगिनत जीवन को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया, और उन संभावनाओं की याद दिलाता है जो कभी असंभव लगती थीं. टाटा मेन हॉस्पिटल में हमारा लक्ष्य है — प्रजनन उपचार को न केवल सुलभ और सुरक्षित बनाना, बल्कि उसे गरिमा, करुणा और विश्वास से जोड़ना. हमारा मानना है कि हर दंपति को अपना परिवार बसाने का पूरा अधिकार है — और हम इस सफर में उनके साथ हैं, हर कदम.</p>
<p style="text-align:justify;">इस वर्ल्ड आईवीएफ डे पर आइए जागरूकता और समझदारी की रोशनी फैलाएं.<br />बांझपन कोई ठहराव नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत की ओर पहला कदम है — जो सही सलाह, वैज्ञानिक सहयोग और आत्मविश्वास के साथ एक नई जिंदगी का रास्ता बन सकता है.</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>डॉ. अनिशा चौधरी, विशेषज्ञ, मेडिकल इनडोर सर्विसेज, टाटा मेन हॉस्पिटल</strong>.</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>महिला</category>
                                            <category>जन स्वास्थ्य</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 25 Jul 2025 18:58:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sujit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कोडरमा: आम से लेकर ख़ास के दिलों में राज करती हैं नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ संगीता!</title>
                                    <description><![CDATA[संगीता प्रसाद विगत लगभग 20 वर्षों से कोडरमा जिले के विख्यात शहर झुमरी तिलैया के पानी टंकी रोड स्थित रोटरी क्लब द्वारा संचालित रोटरी आई हॉस्पीटल में 20 वर्षों से जुडी हैं और अपनी सेवा दे रही हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/woman/ophthalmologist-dr-sangeeta-rules-the-hearts-of-koderma-from-mango/article-10837"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2024-07/कोडरमा-आम-से-लेकर-ख़ास-के-दिलों-में-राज-करती-हैं-नेत्र-रोग-विशेषज्ञ-डॉ-संगीता!.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>कोडरमा: </strong>मानव सेवा की धरा पर निस्वार्थ त्याग और अपने दायित्व के प्रति पूरी इमानदारी, समर्पण और अनुशासन की प्रतिमूर्ति की शख्सियत <a href="https://www.medindia.net/directories/doctors/dr-sangita-prasad-ophthalmologist-koderma-jharkhand-343639.htm#google_vignette">डॉक्टर संगीता प्रसाद</a> हर खास व आम सभी मरीजों के प्रति समान भाव रखती हैं। वर्षों से रोटरी द्वारा संचालित आई हॉस्पीटल की सफलता इनके बेहतर कार्यों को लेकर ही लगातार आगे बढ़ रहा है। आसपास के इलाकों में इनकी बेहतर कार्यशैली से मरीजों में इनके प्रति सम्मान का भाव देखा जाता है। कहते हैं इससे बड़ी सेवा क्या हो सकती है? यही तो है सच्ची मानव सेवा।</p>
<p><br />गौरतलब है की डॉक्टर संगीता प्रसाद विगत लगभग 20 वर्षों से कोडरमा जिले के विख्यात शहर झुमरी तिलैया के पानी टंकी रोड स्थित रोटरी क्लब द्वारा संचालित रोटरी आई हॉस्पीटल में 20 वर्षों से जुडी हैं और अपनी सेवा दे रही हैं। आपको बता दें की पूर्व में डॉ संगीता अरविंद आई हॉस्पीटल मदुरई में सीनियर सर्जन के रुप में कार्यरत थी। कॉर्निया सर्जरी में ये काफी कुशल मानी जाती हैं। </p>
<blockquote class="format2">
<blockquote class="format1">रोटरी क्लब के अध्यक्ष अमित कुमार बताते हैं की डॉ संगीता प्रसाद के द्वारा प्रतिदिन अस्पताल में सैकड़ो मरीजों को आधुनिक मशीनों से इलाज कर स्वास्थ्य लाभ पहुंचाया जाता है, मरीज के प्रति तन- मन से समर्पित भावना से अपने कार्य को करती हैं। </blockquote>
</blockquote>
<p>डॉ संगीता कोडरमा की बेटी हैं और मन में सेवा भाव होने की खास वजह से इन्होने रोटरी कोडरमा आई हॉस्पीटल को सेवा देना अपनी प्राथमिकता बनाया। इनकी खासियत और बेहतर इलाज के कारण ही बिहार के क्रमशः रजौली, नवादा, गया के सीमावर्ती इलाके और झारखण्ड के कई जिलों क्रमशः गिरिडीह, हजारीबाग के बरही, कोडरमा के सभी इलाकों समेत दूरस्थ ग्रामीण इलाकों के काफी मरीज यहां इलाज के लिए पहुंचते हैं। इनकी महारथ के सभी कायल हैं। आपको बता दें की डॉक्टर डे के उपलक्ष्य में रोटरी क्लब के सदस्यों ने डॉ संगीता प्रसाद को बुके और प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया है।  </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>कोडरमा</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                            <category>महिला</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 04 Jul 2024 11:36:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Kumar Ramesham]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>इस साइकलिंग स्कूल में मिलता है महिलाओं को स्वास्थ्य और स्&amp;#x200d;वावलंबन</title>
                                    <description><![CDATA[<p>महिलाओं के लिए साइकिल चलाना सीखना महज़ एक शौक नहीं। बल्कि यह एक ऐसा जीवन कौशल है जो महिलाओं की स्वतंत्रता को बढ़ावा दे सकता है। भारत में महिलाओं के लिए, साइकिल चलाना न सिर्फ परिवहन का एक सस्ता और विश्वसनीय साधन प्रदान करता है बल्कि इससे उनकी गतिशीलता और स्वतंत्रता में वृद्धि भी हो सकती है। साथ ही, साइकलिंग से उनके स्वास्थ्य और फिटनेस में भी सुधार होगा। और इस सब के साथ जो सबसे महत्वपूर्ण बात है वो है उनके आत्मविश्वास में आने वाली बढ़त, जिसकी मदद से महिलाएं को उन अवसरों तक पहुँच मिल सकती है जो</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/woman/women-get-health-and-independence-in-this-cycling-school/article-10499"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2023-02/cycle.jpg" alt=""></a><br /><p>महिलाओं के लिए साइकिल चलाना सीखना महज़ एक शौक नहीं। बल्कि यह एक ऐसा जीवन कौशल है जो महिलाओं की स्वतंत्रता को बढ़ावा दे सकता है। भारत में महिलाओं के लिए, साइकिल चलाना न सिर्फ परिवहन का एक सस्ता और विश्वसनीय साधन प्रदान करता है बल्कि इससे उनकी गतिशीलता और स्वतंत्रता में वृद्धि भी हो सकती है। साथ ही, साइकलिंग से उनके स्वास्थ्य और फिटनेस में भी सुधार होगा। और इस सब के साथ जो सबसे महत्वपूर्ण बात है वो है उनके आत्मविश्वास में आने वाली बढ़त, जिसकी मदद से महिलाएं को उन अवसरों तक पहुँच मिल सकती है जो उन्हें सशक्त बनने में मदद दें और जिन तक उनकी पहुँच अब तक संभव नहीं थी। और साइकलिंग से होने वाले पर्यावरणीय फायदे तो जग ज़ाहिर हैं।<br />
इन्हीं सब बातों के चलते, जहां पिछले हफ्ते कनॉट प्लेस, दिल्ली ने महिलाओं के लिए साइकिल स्कूल का शुभारंभ देखा, वहीं अब, पड़ोसी राज्य हरयाणा के गुरुग्राम में ऐसा ही साइकिल स्कूल महिलाओं के लिए शुरू किया गया।</p>
<p>यह साइकिल स्कूल सस्टेनेबल मोबिलिटी नेटवर्क और हेल्प दिल्ली ब्रीथ कलेक्टिव के साझा प्रयासों का नतीजा है। इस पहल का उद्देश्य महिलाओं के लिए साइकिल चलाने के कौशल को सीखने और विकसित करने के लिए एक सुरक्षित और सहायक वातावरण बनाना है।</p>
<p>सस्टेनेबल मोबिलिटी नेटवर्क में 30+ संगठन शामिल हैं, जो ‘ज़ीरो एमिशन, ज़ीरो एक्सक्लूज़न, और ज़ीरो रोड डेथ्स’ के व्यापक त्रिकोणीय दृष्टिकोण रखते हैं और रखने पर ज़ोर देते हैं। यह नेटवर्क 2020 से सक्रिय है और स्वच्छ, न्यायसंगत, जेंडर सेंसिटिव और सुलभ परिवहन की दिशा में बदलाव के लिए अधिक सक्षम वातावरण बनाने की दिशा में काम कर रहा है। वहीं हेल्प दिल्ली ब्रीथ 2015 से सक्रिय है और लोगों और संगठनों का एक ऐसा समूह है जो दिल्ली एनसीआर के वायु प्रदूषण संकट के मुद्दों पर काम कर रहा है।</p>
<p>साइकिल स्कूल के प्रतिभागियों को तकनीकी प्रशिक्षण सहायता प्रदान करने के लिए नोएडा स्थित साइकिल कंपनी साइक्लोफिट के साथ भी भागीदारी की।</p>
<p>दिल्ली और गुरुग्राम से पहले यह नेटवर्क पिछले 2 वर्षों में बैंगलोर में ‘बेंगलुरु मूविंग’ आंदोलन के तहत साइकिल स्कूलों को चला रहा है। वहाँ भी इन स्कूलों का उद्देश्य महिलाओं के लिए समान पहुंच, सुरक्षा और सामुदायिक जुड़ाव प्रदान करना है। दिल्ली में 200+ प्रतिभागियों को सिखाने के बाद यह स्कूल अब गुरुग्राम में आया है जहां रविवार को हुए सत्र में 40 से अधिक महिलाओं ने पेडलिंग की, प्रशिक्षकों और स्वयंसेवकों की मदद से संतुलन बनाना सीखा और अपने साइकिल चलाने के कौशल में आत्मविश्वास हासिल किया।</p>
<p>अपनी प्रतिक्रिया देते हुए एक युवा प्रतिभागी ने कहा, “बचपन में मुझे कभी भी साइकिल चलाने का मौका नहीं मिला लेकिन हमेशा सीखने की इच्छा थी।” उन्होने आगे कहा, “यह मेरे लिए एक उपयोगी जीवन कौशल हासिल करने का एक बेहतरीन अवसर था।”</p>
<p>आगे, हेल्प दिल्ली ब्रीद की सीनियर कैम्पेनर मल्लिका आर्य ने कहा, “हम जानते हैं कि साइकिल चलाना डराने वाला हो सकता है, खासकर उन महिलाओं के लिए जो महसूस कर सकती हैं कि साइकिल चलाने वाले समुदाय में उनका प्रतिनिधित्व या स्वागत नहीं किया जाता है। हम महिलाओं को साइकिल चालकों के रूप में सीखने और बढ़ने के लिए एक सुरक्षित और सहायक स्थान प्रदान करके इस सोच को बदलना चाहते हैं और उम्मीद करते हैं कि अब लोग निजी वाहनों का उपयोग करने के बजाय छोटी दूरी के लिए साइकिल चुनना शुरू करेंगे।”</p>
<p>वहीं बीवाईसीएस की मातृशी शेट्टी कहती हैं, “इस नेटवर्क के हिस्से के रूप में हम न सिर्फ इसका समर्थन करने हैं, बल्कि हम काफी उत्साहित भी हैं इसे ले कर। हमारा मानना है कि साइकिल चलाना एक परिवर्तनकारी गतिविधि है जो लोगों के स्वास्थ्य, खुशी और समुदाय की भावना में सुधार कर सकती है। हमें दिल्ली एनसीआर में महिलाओं के लिए उस अनुभव को और अधिक सुलभ बनाने में मदद करने पर गर्व है।” वो आगे कहती हैं कि उनका लक्ष्य इन साइकिल स्कूलों में से उन महिलाओं को एक साथ लाना है जो सवारी करना सीखना चाहती हैं और साइकिल के अनुकूल शहर की मांग के लिए अपनी आवाज़ जोड़ना चाहती हैं।</p>
<p>यह पहल सभी उम्र और कौशल स्तरों की महिलाओं के लिए खुली है।</p>
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                                                            <category>बड़ी खबर</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>महिला</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 26 Feb 2023 17:34:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Jharkhand]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>फातिमा शेख : हिंदुस्तान में सावित्रीबाई फुले के साथ नारी शिक्षा की ज्योत जलाने वाली शख्स</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>डॉ. मोहम्मद ज़ाकिर</strong></p>
<p><strong>असिटेंट प्रोफेसर, अर्थशास्त्र, रांची विश्वविद्यालय</strong></p>
<p>192 साल पहले आज ही के दिन 19 जनवरी 1831 को पुणे के एक मुस्लिम परिवार में फातिमा शेख का जन्म हुआ था. आगे चलकर वह देश की पहली मुस्लिम शिक्षिका बनीं. बहुजन समाज जब भी समाज सुधारक ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले को याद करता है, फातिमा शेख का नाम स्वतः आता है. सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख सखी थीं. दोनों में सावित्रीबाई फुले मात्र 6 दिन बड़ी थीं.</p>
<p>  </p>
<p>अछूत और पर्दा प्रथा के कारण दलित और मुस्लिम लड़कियों को स्कूल में पढ़ने की इजाजत नहीं थी. उसके बावजूद फातिमा शेख</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/woman/fatima-shaikh-the-person-who-lit-the-flame-of-womens-education-in-india-along-with-savitribai-phule/article-10430"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2023-01/fatima-sekha.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>डॉ. मोहम्मद ज़ाकिर</strong></p>
<p><strong>असिटेंट प्रोफेसर, अर्थशास्त्र, रांची विश्वविद्यालय</strong></p>
<p>192 साल पहले आज ही के दिन 19 जनवरी 1831 को पुणे के एक मुस्लिम परिवार में फातिमा शेख का जन्म हुआ था. आगे चलकर वह देश की पहली मुस्लिम शिक्षिका बनीं. बहुजन समाज जब भी समाज सुधारक ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले को याद करता है, फातिमा शेख का नाम स्वतः आता है. सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख सखी थीं. दोनों में सावित्रीबाई फुले मात्र 6 दिन बड़ी थीं.</p>
<p> </p>
<p>अछूत और पर्दा प्रथा के कारण दलित और मुस्लिम लड़कियों को स्कूल में पढ़ने की इजाजत नहीं थी. उसके बावजूद फातिमा शेख के भाई उस्मान शेख ने अपनी बहन को पढ़ने भेजा. फातिमा शेख अपने इलाके की एकलौती लड़की थी, जिसने स्कूल जाना शुरू किया था.</p>
<p> </p>
<p>उधर समाज सुधारक ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले लड़कियों को शिक्षित करने का प्रयास कर रहे थे. उन्हें कट्टरपंथियों के विरोध का सामना करना पड़ रहा था. समाज में हो रहे विरोध के कारण ज्योतिबा फुले के पिता गोविंदराव ने दोनों को घर से निकल दिया. उस्मान शेख और ज्योतिबा फुले दोस्त थे. उस समय उस्मान शेख ने ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले दोनों को अपने घर में रहने दिया. 1848 में उस्मान शेख के घर में ही स्कूल की स्थापना हुई, जिसका नाम स्वदेशी पुस्तकालय रखा गया. किसी हिन्दुस्तानी द्वारा खोला गया पहला गर्ल्स स्कूल था.</p>
<p> </p>
<p>उस ज़माने में लड़कियों के लिए स्कूल स्थापित करना बड़े साहस का काम था. फातिमा शेख फुले दंपती की सहयोगी बनी. समाज सुधारक और भारत की पहली मुस्लिम शिक्षिका ने सावित्रीबाई फुले के साथ लड़कियों को शिक्षित करने में हर कठिनाईयों का सामना किया. 1856 में सावित्रीबाई फुले बीमार पड़ गई. अपने पिता के घर चली गई. वहां से ज्योतिबा फुले को ख़त लिखा करती थीं. उन खतों के अनुसार फातिमा शेख ने स्कूल के प्रबंधन की जिम्मेदारी उठाई और स्कूल की प्रधानाचार्य भी बनी.</p>
<p> </p>
<p>उन दिनों दलित और मुस्लिम लड़कियों को घर-घर जा कर स्कूल भेजने के लिए रूढिवादी समाज को समझाना कितना मुश्किल काम रहा होगा. भारत में आज भी मुस्लिम महिलाओं की साक्षरता दर दूसरे समुदायों की तुलना में काफी कम है. 2011 की जनगणना के अनुसार सिर्फ 50.1% मुस्लिम महिलाएं साक्षर हैं. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (NFHS-5) के आंकड़ों के मुताबिक मात्र 11.4% मुस्लिम महिलाएं 12 वर्ष की शिक्षा पूरी करती हैं. इससे स्पष्ट है कि मुस्लिम समाज लड़कियों की शिक्षा को लेकर कितना जागरूक है.</p>
<p> </p>
<p>आज लोग सावित्रीबाई फुले की जयंती हर साल 3 जनवरी को मानते हैं लेकिन उनकी सहयोगी रही फातिमा शेख की यौमे पैदाइश, 9 जनवरी, को कम लोग याद करते हैं. जबकि फातिमा शेख ने दलित और मुस्लिम लड़कियों को शिक्षित करने हेतु समाज के रीति-रिवाजों के बंधन को तोड़ा, संघर्ष की, लम्बी लड़ाई लड़ीं और अपना पूरा जीवन लड़कियों शिक्षा की प्राचर-प्रसार में लगा दी. उनकी इस मिशन से प्रेरणा लेनी चाहिए. खासकर मुस्लिम समाज जहाँ आधी लड़कियां शिक्षा से वंचित हैं. हिजाब-पर्दा विवादों में उलझने के बजाये मुस्लिम लड़कियों को शिक्षित करने के लिए मुस्लिम समाज को आगे आना चाहिए. तभी मुस्लिम समाज देश के मुख्य धारा जुड़ सकेगा.</p>
<p> </p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बड़ी खबर</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
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                <pubDate>Thu, 19 Jan 2023 19:13:33 +0530</pubDate>
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                <title>दिल्ली : पिछले 5 साल के यौन उत्पीड़न के मामलों पर रिपोर्ट पेश करने के निर्देश</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली :</strong> दिल्ली के पुलिस आयुक्त संजय अरोड़ा ने सभी उपायुक्तों को पिछले पांच वर्षों में आंतरिक शिकायत समिति को रिपोर्ट किए गए सभी यौन उत्पीड़न के मामलों पर एक विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। कथित तौर पर शीर्ष पुलिस द्वारा 30 सितंबर को सभी जिला डीसीपी को आदेश जारी किया गया था। डीसीपी को सितंबर तक आंतरिक शिकायत समिति को रिपोर्ट किए गए यौन उत्पीड़न के मामलों का डेटा रखने के लिए कहा गया था। मामले में शामिल आरोपियों के खिलाफ की गई कार्रवाई के बारे में डीसीपी को रिपोर्ट दाखिल करनी होगी। उन्हें यह</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/woman/delhi-instructions-to-submit-report-on-sexual-harassment-cases-of-last-5-years/article-10142"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2022-10/shameful-incident.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>नई दिल्ली :</strong> दिल्ली के पुलिस आयुक्त संजय अरोड़ा ने सभी उपायुक्तों को पिछले पांच वर्षों में आंतरिक शिकायत समिति को रिपोर्ट किए गए सभी यौन उत्पीड़न के मामलों पर एक विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। कथित तौर पर शीर्ष पुलिस द्वारा 30 सितंबर को सभी जिला डीसीपी को आदेश जारी किया गया था। डीसीपी को सितंबर तक आंतरिक शिकायत समिति को रिपोर्ट किए गए यौन उत्पीड़न के मामलों का डेटा रखने के लिए कहा गया था। मामले में शामिल आरोपियों के खिलाफ की गई कार्रवाई के बारे में डीसीपी को रिपोर्ट दाखिल करनी होगी। उन्हें यह भी बताना होगा कि कितनी शिकायतों का निस्तारण किया गया।</p>
<p>हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली पुलिस आयुक्त, दिल्ली सरकार और दक्षिण जिले के पुलिस उपायुक्त को इस संबंध में नोटिस जारी किया था। एक महिला ने आंतरिक शिकायत समिति के समक्ष एक सब इंस्पेक्टर (एसआई) के खिलाफ दर्ज अपनी शिकायत के निवारण के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी।</p>
<p>याचिका में कहा गया है कि शीर्ष अदालत के दिशा-निर्देश के अनुसार आंतरिक शिकायत समिति का गठन किया जाना चाहिए। उसने याचिका में उल्लेख किया कि उसके मामले में ऐसी कोई समिति नहीं थी।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बड़ी खबर</category>
                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                            <category>महिला</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 02 Oct 2022 08:28:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Jharkhand]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सुरक्षित और कानूनी गर्भपात की हकदार सभी महिलाएं : सुप्रीम कोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली :</strong> सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि अविवाहित महिलाएं भी आपसी सहमति से 20-24 सप्ताह की अवधि में गर्भपात कराने की हकदार हैं। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि सभी महिलाएं सुरक्षित और कानूनी गर्भपात की हकदार हैं। विवाहित, अविवाहित महिलाओं के बीच का अंतर असंवैधानिक है। न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप से गर्भधारण करने वाली अविवाहित महिलाओं को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी रूल्स से बाहर करना असंवैधानिक है। शीर्ष अदालत ने कहा, सभी महिलाएं सुरक्षित और कानूनी गर्भपात की हकदार हैं।</p>
<blockquote class="twitter-tweet">
<p dir="ltr" lang="en" xml:lang="en">SC holds that all women are entitled to safe&amp;legal abortion</p></blockquote>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/woman/all-women-entitled-to-safe-and-legal-abortion-supreme-court/article-10127"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2022-09/supremecourt.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>नई दिल्ली :</strong> सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि अविवाहित महिलाएं भी आपसी सहमति से 20-24 सप्ताह की अवधि में गर्भपात कराने की हकदार हैं। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि सभी महिलाएं सुरक्षित और कानूनी गर्भपात की हकदार हैं। विवाहित, अविवाहित महिलाओं के बीच का अंतर असंवैधानिक है। न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप से गर्भधारण करने वाली अविवाहित महिलाओं को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी रूल्स से बाहर करना असंवैधानिक है। शीर्ष अदालत ने कहा, सभी महिलाएं सुरक्षित और कानूनी गर्भपात की हकदार हैं।</p>
<blockquote class="twitter-tweet">
<p dir="ltr" lang="en" xml:lang="en">SC holds that all women are entitled to safe&amp;legal abortion</p>
<p>SC says,marital status of a woman can’t be ground to deprive her right to abort unwanted pregnancy. Single&amp;unmarried women have right to abort under Medical Termination of Pregnancy Act &amp;rules till 24 weeks of pregnancy <a href="https://t.co/jrQcQWTTbT">pic.twitter.com/jrQcQWTTbT</a></p>
<p>— ANI (@ANI) <a href="https://twitter.com/ANI/status/1575358978933956608?ref_src=twsrc%5Etfw">September 29, 2022</a></p></blockquote>
<p></p>
<p>कोर्ट ने कहा कि प्रजनन स्वायत्तता के अधिकार अविवाहित महिला को विवाहित महिला के समान अधिकार देते हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट में 2021 का संशोधन विवाहित और अविवाहित महिलाओं के बीच अंतर नहीं करता है।</p>
<p>शीर्ष अदालत ने कहा कि विवाहित और अविवाहित महिलाओं के बीच अंतर को कायम नहीं रखा जा सकता। पीठ ने कहा, महिलाओं को स्वतंत्र रूप से अधिकारों का प्रयोग करने की स्वायत्तता होनी चाहिए।</p>
<p>23 अगस्त को, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम और 24 सप्ताह की गर्भावस्था तक गर्भपात की अनुमति देने के लिए विवाहित और अविवाहित महिलाओं के बीच भेदभाव को खत्म करने के नियमों की व्याख्या करेगा।</p>
<p>शीर्ष अदालत ने 21 जुलाई को 25 वर्षीय लड़की को 24 सप्ताह के गर्भ को गिराने की मंजूरी दी थी।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                            <category>महिला</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/article/woman/all-women-entitled-to-safe-and-legal-abortion-supreme-court/article-10127</link>
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                <pubDate>Thu, 29 Sep 2022 14:39:45 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>जलवायु परिवर्तन अनुकूलन परियोजनाओं में लैंगिक संवेदनशीलता को नहीं मिलती प्राथमिकता   </title>
                                    <description><![CDATA[<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><span lang="en-in" xml:lang="en-in">दुनिया के हर कोने में न सिर्फ़ जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को महसूस किया जा रहा है, बल्कि उससे जुड़े जोखिम और मौजूदा कमजोरियों को कम करने के लिए अनुकूलन परियोजनाओं को लागू भी किया जा रहा है। मगर क्या इन अनुकूलन परियोजनाओं में जेंडर की कोई भूमिका रहती है? इसी सवाल का जवाब तलाशते हुए एक हाल ही में प्रतिष्ठित पत्रिका – नेचर – ह्यूमैनिटीज एंड सोशल साइंस कम्युनिकेशंस में प्रकाशित एक वैश्विक<span style="color:#000000;font-family:Arial;">  </span><a title="शोध अध्ययन" href="https://www.nature.com/articles/s41599-022-01266-6">शोध अध्ययन</a><span style="color:#000000;font-family:Arial;">  </span></span></span>में लेखकों ने दो प्रमुख प्रश्न पूछे – पहला – क्या विभिन्न संदर्भों में विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से लागू किए गए जलवायु परिवर्तन</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/gender-sensitivity-and-climate-change/article-9969"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2022-09/water-crisis-dumka.jpg" alt=""></a><br /><p><span lang="hi" xml:lang="hi"><span lang="en-in" xml:lang="en-in">दुनिया के हर कोने में न सिर्फ़ जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को महसूस किया जा रहा है, बल्कि उससे जुड़े जोखिम और मौजूदा कमजोरियों को कम करने के लिए अनुकूलन परियोजनाओं को लागू भी किया जा रहा है। मगर क्या इन अनुकूलन परियोजनाओं में जेंडर की कोई भूमिका रहती है? इसी सवाल का जवाब तलाशते हुए एक हाल ही में प्रतिष्ठित पत्रिका – नेचर – ह्यूमैनिटीज एंड सोशल साइंस कम्युनिकेशंस में प्रकाशित एक वैश्विक<span style="color:#000000;font-family:Arial;"> </span><a title="शोध अध्ययन" href="https://www.nature.com/articles/s41599-022-01266-6">शोध अध्ययन</a><span style="color:#000000;font-family:Arial;"> </span></span></span>में लेखकों ने दो प्रमुख प्रश्न पूछे – पहला – क्या विभिन्न संदर्भों में विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से लागू किए गए जलवायु परिवर्तन अनुकूलन विकल्प जब आगे बढ़ते हैं तो, एसडीजी 5 के सापेक्ष,  क्या वो लैंगिक समानता में बाधा डालते हैं? और दूसरा, कि क्या अनुकूलन कार्यों की लैंगिक प्रतिक्रिया को ट्रैक करने के लिए एसडीजी 5 के तहत लक्ष्य पर्याप्त हैं?</p>
<p>शोध पत्र उन नौ प्रमुख क्षेत्रों पर केंद्रित है जहां जलवायु परिवर्तन अनुकूलन कार्रवाई की जाती है। इसमें 17000+ वैश्विक अध्ययनों की समीक्षा की और 319 चयनित अध्ययनों का विश्लेषण किया जहां पीयर रिव्यूड शोध पत्रों के माध्यम से लैंगिक समानता और अनुकूलन कार्यक्रमों का दस्तावेजीकरण किया गया है। इसमें जो सबूत मिले वो सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही थे और साथ ही कुछ गंभीर बातें भी सामने आयी हैं।</p>
<p><b>महिलाओं के लिए प्रशिक्षण और स्वच्छता सुविधाओं के सकारात्मक प्रभाव</b>: भारत के तटीय मछली पकड़ने वाले समुदायों में, महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को प्रदान की जाने वाली जलीय कृषि, मिट्टी के केकड़े की खेती, समुद्री बास मछ्ली नर्सरी पालन, और मछली फ़ीड विकास पर प्रशिक्षण सुविधाओं ने उन्हें वैकल्पिक विकल्प प्रदान करने में मदद की। आजीविका, आय और अपने कल्याण तक उनकी पहुंच में वृद्धि हुई और 2004 की सुनामी के बाद आपदा के बाद की वसूली में भी उनकी मदद की। कोथापल्ली , आंध्र प्रदेश में, उत्पादकता में सुधार और विविधीकरण के लिए मिट्टी और जल संसाधनों के संरक्षण के लिए एक एकीकृत वाटरशेड विकास दृष्टिकोण ने योगदान दिया और महिलाओं की आजीविका में सुधार किया। इनमें इक्विटी के मुद्दों को भी संबोधित किया गया है। भारत के बाढ़-प्रवण क्षेत्रों में, पारिस्थितिक शौचालयों की स्थापना ने महिलाओं और लड़कियों का समय, लागत और तमाम स्वास्थ्य जोखिमों से भी उन्हें बचाया।</p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><b>स्थानांतरगमन </b></span><b>के कारण नकारात्मक प्रभाव</b>: चिल्का लैगून में मछुआरे महिलाओं ने एक्वा संस्कृतिवादियों के स्थानांतरगमन द्वारा लैगून भूमि के अतिक्रमण और निजीकरण का अनुभव किया। इसके परिणामस्वरूप मछुआरों की आजीविका का नुकसान हुआ, जिससे उन्हें मजदूरी के लिए बाहर निकलने के लिए मजबूर होना पड़ा। जाति, वर्ग और सांस्कृतिक बाधाओं के कारण मजदूरी सभी महिलाओं के लिए समावेशी नहीं है – इस तरह के प्रवासन के परिणामस्वरूप परंपराओं, कौशल, समुदाय, रीति-रिवाजों और पहचान का नुकसान होता है। भारत में अध्ययन स्पष्ट हैं कि पुनर्वास क्षेत्रों में वितरण टैंकरों से पानी लाते समय महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा को खतरा था।</p>
<p><b><span lang="hi" xml:lang="hi">चिंता की बात </span> </b></p>
<p><strong>1] मौजूदा सामाजिक गतिशीलता महिलाओं को शक्तिहीन करती है:</strong> भारत के साक्ष्य से पता चलता है कि अनुकूलन विकल्पों को लागू करते समय, लिंग की भूमिका जाति, उम्र और धन के साथ प्रतिच्छेद करती है, जो महिलाओं को कमजोर करता है।</p>
<p><strong>2]  महिलाओं के लिए सुरक्षित तापमान सीमा के लिए कोई दिशानिर्देश नहीं:</strong> कृषि मजदूरों, निर्माण श्रमिकों, विक्रेताओं, ईंट भट्ठा श्रमिकों और दिहाड़ी मजदूरों जैसे व्यवसायों के लिए, महिलाओं के लिए स्वास्थ्य और सुरक्षित तापमान सीमा के लिए कोई दिशानिर्देश नहीं है। चिकित्सा अध्ययनों से पता चलता है कि गर्मी के कारण महिलाएं और पुरुष अलग-अलग तरह से प्रभावित होते हैं। भारत एक उष्ण कटिबंधीय देश है और यहाँ श्रम शक्ति में महिलाओं को लक्षित कल्याणकारी उपायों को विनियमित करने वाले कानून पर फिर से विचार किया जा सकता है, उदाहरण के लिए, बहुत महत्वपूर्ण काम करने की स्थिति और मजदूरी संरचना।</p>
<p><b>लैंगिक समानता बढ़ाने के लिए भारत के लिए प्रमुख कार्य प्राथमिकताएं:</b></p>
<p><b><br />
</b>सभी क्षेत्रीय अनुकूलन कार्यों में सफलता की कहानियों को बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय संस्थानों (अंतर्राष्ट्रीय सहयोग द्वारा समर्थित) के साथ मजबूत ऊर्ध्वाधर लिंक वाले स्थानीय निकायों और समुदायों की भागीदारी की आवश्यकता होती है।</p>
<p>पारंपरिक ज्ञान को अनुकूली क्रियाओं के समर्थन, शिक्षण और अनुकूलन में महिलाओं की भूमिका आवश्यक है। उत्तराखंड के साक्ष्यों से पता चला है कि महिलाओं ने स्थानीय ज्ञान को औपचारिक मौसम पूर्वानुमान संचार की तुलना में अधिक प्रभावी पाया। यह इंगित करता है कि मौजूदा औपचारिक वैज्ञानिक और संस्थागत व्यवस्था में स्थानीय, स्वदेशी और अंतर-पीढ़ी के ज्ञान और संस्थानों को एकीकृत करने के प्रयासों की आवश्यकता है ।</p>
<p>एसडीजी 5 लक्ष्यों के वर्तमान सेट को कैसे बढ़ाया जाए, इस बारे में बातचीत अभी शुरू होनी चाहिए, जो कि कई लिंगों और अंतर्संबंधों को व्यापक रूप से नहीं पकड़ सकता है। अध्ययन ने 11 अन्य एसडीजी (जिसे हम एसडीजी 5+ कहते हैं) में फैले अतिरिक्त 29 लिंग-संबंधी लक्ष्यों की पहचान की, जो लिंग-संबंधित लक्ष्यों पर एसडीजी ढांचे का विस्तार करने के लिए एक प्रारंभिक बिंदु हो सकता है।</p>
<p>आइये अब जानें क्या कहना है इस रिपोर्ट के लेखकों का इस रिपोर्ट पर। आईपीसीसी लेखक और जादवपुर विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग की प्रो. जोयश्री रॉय  का कहना है, “विभिन्न शमन और अनुकूलन विकल्पों के लिंग और जलवायु न्याय के निहितार्थ प्राथमिक महत्व के हैं क्योंकि हम इस सदी में प्रगति करते हैं। यह स्पष्ट है कि वर्तमान में चल रही अनुकूलन परियोजनाएं जलवायु परिवर्तन के जोखिम को कम करने की कोशिश तो कर रही हैं, लेकिन स्वतः ही लैंगिक समानता की गारंटी नहीं दे रही हैं। बल्कि ये तो कई मामलों में असमानता के ऐतिहासिक बोझ को और भी खराब कर सकता है। अनुकूलन परियोजना निर्माण, डिजाइन, कार्यान्वयन और निगरानी चरणों में लैंगिक समानता पर स्पष्ट ध्यान देने की तत्काल आवश्यकता है। सबसे जरूरी है वित्त और बीमा तक समान पहुंच, संपत्ति का समावेशी स्वामित्व।”</p>
<p>आगे, एक और आईपीसीसी लेखक और भारती इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक पॉलिसी, इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस  के अनुसंधान निदेशक और सहायक एसोसिएट प्रोफेसर, डॉ अंजल प्रकाश, कहते हैं, “यह अध्ययन दुनिया के सभी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले 25 शोधकर्ताओं की मेहनत का परिणाम है, जिन्होंने दुनिया भर में विभिन्न अनुकूलन पहलों की दो साल जांच की।  हमने पाया कि 9 में से 4 क्षेत्रों में अनुकूलन कार्य लैंगिक समानता में बाधा डालते हैं। महासागर और तटीय पारिस्थितिक तंत्र जैसे क्षेत्र ; पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र; गरीबी, आजीविका और सतत विकास; और औद्योगिक प्रणाली के बदलावों ने अपनी अनुकूलन परियोजनाओं में नकारात्मक लिंग संबंधों को दिखाया। इस अध्ययन में कई भारतीय मामले भी शामिल थे, और इसलिए, यह भारत जैसे देश के लिए महत्वपूर्ण है, जहां चार क्षेत्रों में से प्रत्येक पारिस्थितिकी तंत्र पर हावी है। इसमें प्रमुख सीख है जिसे नीति निर्माताओं द्वारा नोट करने की आवश्यकता है।</p>
<p>इस विषय पर विशेषज्ञ कुछ खास बातें बताते हैं। आईपीसीसी कार्य समूह II, की सह-अध्यक्ष, डॉ डेबरा रॉबर्ट्स, कहती हैं, “आईपीसीसी के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में यह शोध महत्वपूर्ण है क्योंकि यह लैंगिक मुद्दों और जलवायु परिवर्तन के बीच की कड़ी को स्पष्ट करता है। विभिन्न दस्तावेज़ों की एक श्रृंखला के आधार पर, शोध का निष्कर्ष है कि अनुकूलन परियोजनाओं के डिजाइन में सफल होने के लिए लिंग और समानता संवेदनशीलता शामिल होनी चाहिए और एक अधिक टिकाऊ और न्यायपूर्ण दुनिया में योगदान करना चाहिए। अध्ययन किए गए 9 क्षेत्रों में से चार ने लिंग संबंधी विचारों के संदर्भ में नकारात्मक परिणाम दिखाए। इन चार क्षेत्रों में शामिल हैं: तटीय और पर्वतीय वातावरण, गरीबी, आजीविका और सतत विकास और औद्योगिक संक्रमण, और दुनिया भर के कई देशों की विकास आकांक्षाओं को प्रभावित करते हैं। मुझे उम्मीद है कि यह शोध सभी स्तरों पर निर्णय लेने वालों को सूचित करेगा और आगे चलकर नीतिगत विकास को प्रभावित करेगा।</p>
<p>प्रो नित्या राव, जेंडर एंड डेवलपमेंट के प्रोफेसर, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल डेवलपमेंट, यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया, यूके, का कहना है,”यह अध्ययन, हाल के दस्तावेज़ों की समीक्षा के माध्यम से, इस बात की पड़ताल करता है कि विभिन्न जलवायु परिवर्तन अनुकूलन क्रियाएं लैंगिक समानता पर सतत विकास लक्ष्य 5 में परिभाषित लैंगिक समानता और उसके लक्ष्यों को किस हद तक आगे बढ़ाती हैं या बाधा डालती हैं, इस ढांचे की पर्याप्तता पर भी टिप्पणी करती हैं। आईपीसीसी वर्किंग ग्रुप 2 द्वारा 9 क्षेत्रों के वर्गीकरण के बाद, समीक्षा में नौ क्षेत्रों में से चार में नकारात्मक परिणाम पाए गए – तटीय पारिस्थितिकी तंत्र, पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र, गरीबी और आजीविका, और औद्योगिक प्रणाली संक्रमण, औपचारिक रूप से लिंग-केंद्रित दृष्टिकोण की कमी को दर्शाता है। इन क्षेत्रों में अनुकूलन गतिविधियाँ। तटीय वातावरण पर मेरा शोध इस परिणाम की पुष्टि करता है। अधिकांश अनुकूलन उपाय, चाहे वह मौसम की जानकारी हो, मछली पकड़ने की प्रौद्योगिकियों में बदलाव, या एक्वाकल्चर और अंतर्देशीय मत्स्य पालन सहित व्यावसायीकरण, लिंग-अंधा हैं और महिला मछुआरों, कटाई के बाद के प्रोसेसर और विक्रेताओं की जरूरतों और प्राथमिकताओं को पूरा करने में विफल हैं, जो इससे अधिक का गठन करते हैं। 50% छोटे पैमाने के मछुआरे, और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से समान रूप से प्रभावित हैं। समीक्षा में पर्वतीय क्षेत्रों में समान रुझान पाए गए, जहां पुरुष प्रवास अधिक है, और घरेलू अर्थव्यवस्था के प्रबंधन का बोझ लगभग पूरी तरह से महिलाओं के कंधों पर पड़ता है। समीक्षा विशेष रूप से संरचनात्मक असमानताओं पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अनुकूलन उपायों की आवश्यकता की पुष्टि करती है जो एसडीजी 5 लक्ष्य को पूरा करने के लिए लिंग संबंधी कमजोरियों और असमानताओं को बढ़ा सकती हैं। लैंगिक समानता स्वतः प्राप्त नहीं होगी। इसके अलावा, महिला और पुरुष समरूप श्रेणियां नहीं हैं, और इसलिए, ऐसे सूक्ष्म विश्लेषण की आवश्यकता है जो लिंग, वर्ग, जाति, जातीयता, आयु आदि की कई, प्रतिच्छेदन असमानताओं को पहचानता और संबोधित करता है। यह अध्ययन उन प्रमुख क्षेत्रों पर प्रकाश डालता है जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। अनुकूलन नीतियों के डिजाइन, निर्माण और कार्यान्वयन, विशेष रूप से भारत में इसकी लंबी तटरेखा और ऊंचे पहाड़ों के साथ।</p>
<p>प्रो . पूर्णमिता दासगुप्ता, चेयर प्रोफेसर इन एनवायर्नमेंटल इकोनॉमिक्स, इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ, नई दिल्ली। वह उस भारतीय प्रतिनिधिमंडल का सह-नेतृत्व कर रही थीं जिसने आईपीसीसी की छठी आकलन रिपोर्ट के लिए के पूर्ण अधिवेशनों में भारत का बचाव किया था। वो कहती हैं, “दुनिया भरमें जलवायु अनुकूलनकार्यों का लिंगलक्ष्यों को कैसेप्रभावित करता है, इसकी वैश्विक समीक्षाअत्यंत प्रासंगिक औरसामयिक है। अनुकूलनपरियोजनाओं सहित विश्वस्तर पर सततविकास लक्ष्यों कोप्राप्त करने मेंपर्याप्त प्रगति कीजा रही है।जेंडर लक्ष्यों कोप्राप्त करने केलिए अनुकूलन कार्रवाईके निहितार्थों काअपेक्षाकृत कम अध्ययनऔर चर्चा कीजाती है। इसविषय पर सार्वजनिकबहस ज्यादातर गायबहैं। यह अध्ययनस्पष्ट रूप सेइस बात परप्रकाश डालता हैकि अनुकूलन क्रियाके कारण लिंगपर सकारात्मक औरनकारात्मक प्रभाव पड़सकते हैं। विश्वस्तर पर, चारप्रमुख क्षेत्रों में, जहां महत्वपूर्ण जलवायुकार्रवाई की गुंजाइशहै, अनुकूलन परियोजनाओंके लिंग परनकारात्मक परिणाम हुएहैं। इनमें पहाड़ों, महासागरों और तटीयपारिस्थितिक तंत्र, गरीबीऔर सतत विकास, और औद्योगिक प्रणालियोंके लिए परियोजनाएंशामिल हैं। हालांकि, अनुकूलन और लिंगलक्ष्यों के बीचतालमेल संभव हैऔर कई अन्यक्षेत्रों में उभराहै। यह निर्णय लेने वालों केलिए यह सुनिश्चित करने के लिएएक शक्तिशाली नीति संदेश है किभारत में अनुकूलन परियोजनाओं को अनुकूलन लक्ष्यों के साथ तालमेल को अधिकतम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।”</p>
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                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>महिला</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 03 Sep 2022 08:20:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Jharkhand]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>एआई से बदलेगी आधी आबादी के काम की सूरत</title>
                                    <description><![CDATA[<p><span style="color:#ff6600;"><strong>आयुषी खरे</strong></span></p>
<p><strong>समृद्ध डेस्क:</strong> डिजिटलीकरण ने सरकारी, गैर सरकारी कामकाज से लेकर घर गृहस्थी तक पैर पसार लिए हैं और डिजिटल कार्यप्रणाली ने अपनी उपयोगिता कोविड महामारी के दौर में प्रखर होकर साबित की जब शासकीय व अशासकीय कार्य वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, वेबिनार, फेसबुक लाइव यहां तक कि ई-कैबिनेट डिजिटल माध्यम से किये जाने लगे।</p>
<p>सार्थक उदाहरणों के साथ कामकाज का ई (डिजिटल) स्वरूप कार्यशैली व जीवनशैली में शामिल हो गया है और समय के साथ अब डिजिटल (Digital) रूप को एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सहारा मिलने की संभावना प्रबल होती जा रही है। संस्थाओं में कार्य निष्पादन में एआई</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/woman/ai-will-change-the-working-conditions-of-half-the-population/article-9671"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2022-03/received_420341019847241.jpeg" alt=""></a><br /><p><span style="color:#ff6600;"><strong>आयुषी खरे</strong></span></p>
<p><strong>समृद्ध डेस्क:</strong> डिजिटलीकरण ने सरकारी, गैर सरकारी कामकाज से लेकर घर गृहस्थी तक पैर पसार लिए हैं और डिजिटल कार्यप्रणाली ने अपनी उपयोगिता कोविड महामारी के दौर में प्रखर होकर साबित की जब शासकीय व अशासकीय कार्य वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, वेबिनार, फेसबुक लाइव यहां तक कि ई-कैबिनेट डिजिटल माध्यम से किये जाने लगे।</p>
<p>सार्थक उदाहरणों के साथ कामकाज का ई (डिजिटल) स्वरूप कार्यशैली व जीवनशैली में शामिल हो गया है और समय के साथ अब डिजिटल (Digital) रूप को एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सहारा मिलने की संभावना प्रबल होती जा रही है। संस्थाओं में कार्य निष्पादन में एआई जहां काम की सरलता को बढ़ाने में सहायक होगा वहीं निकट भविष्य में आधी आबादी के काम की सूरत भी बदल देगा।</p>
<p><strong>घर गृहस्थी के कामों में साथी बनेगा एआई</strong></p>
<p>घरेलू कामकाज में मशीनों के महती दखल के बाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस घर गृहस्थी के कामों के सुचारू क्रियान्वयन में सहायक साबित हो सकता है। नज़दीकी भविष्य में घर की साफ सफाई करने वाले रोबोटिक वैक्यूम क्लीनर, डिजिटल वॉइस असिस्टेंट, मेडिकेशन मैनेजमेंट एवं स्पेशल डाइट फ़ूड तैयार करने वाले रोबोट्स घर के रखरखाव में महिलाओं की सहायता करते पाए जा सकेंगे जिनके उपयोग से आधी आबादी घर के काम सहूलियत से कर सकेगी।</p>
<p><strong>चिकित्सकीय दृश्यों में महिलाओं का सहायक बनेगा एआई</strong></p>
<p>घर में मौजूद सीनियर सिटीजन को होम हेल्थ केअर देने में भी एआई सहायक साबित होगा। सामान्यतः घर में मौजूद प्रौढ़ सदस्य की मानसिक एवं शारीरिक देखभाल की ज़िम्मेदारी घर की महिलाओं पर ही होती है। ऐसे में सीनियर होम हेल्थ केयर में महिलाएं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सहारा ले सकती हैं। एआई पावर्ड चैटबॉट्स एवं कन्वर्सेशन डिवाइसेस बातचीत द्वारा मनोरंजन एवं बेहतर लाइफ क़्वालिटी के लिए उपयोगी होंगे तो वहीं स्टाफिंग क्राइसिस के मद्देनजर असिस्टिव रोबोटिक वाउंड केयर, वर्चुअल नर्स असिस्टेंट एवं रिमोट पेशेंट मोनिटरिंग से घर के बुज़ुर्गों में गंभीर बीमारियों का पता लगाया जा सकेगा।</p>
<p><strong>डिजिटल चाइल्डकेअर और एआई पावर्ड पेरेंटिंग से होगी बच्चों के लालन पालन में माँ को मदद</strong></p>
<p>आने वाले समय में बच्चों का पालनपोषण भी डिजिटलीकरण से अछूता नहीं रह सकेगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से प्रभावित एवं संचालित कई एप्पलीकेशन जैसे म्यूज़, बॉस्को जहां बच्चों की देखभाल के नमूने तैयार कर सकेंगे और उन्हें डिजिटल खतरों से आगाह कर सकेंगे तो वहीं खिलौने जैसे दिखने वाले नन्हे रोबोट जैसे बीन-क्यू बच्चों को मनोरंजन एवं इंटरैक्टिव इंगेजमेंट दे सकेंगे जब अभिभावक बाहर हों अथवा व्यस्त हों।</p>
<p><strong>समानता की ओर बढ़ेगी कामकाजी महिलाओं की वर्कलाइफ</strong></p>
<p>एआई के समायोजन से कॉरपोरेट सेक्टर में स्त्री-पुरुष कार्यविभाजन में समानता बढ़ने के कयास लगाए जा रहे हैं। ह्यूमन और टेक्नोलॉजी के कोलैबोरेशन से डेटा मैनेजमेंट व टेक टूल्स के इस्तेमाल से दक्षता, री-स्किलिंग व अप-स्किलिंग से कॉरपोरेट सेक्टर में महिलाओं को कार्य के बेहतर विकल्प और अवसर प्राप्त हो सकेंगे।</p>
<p><strong>(लेखिका आयुषी खरे की 4 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं एवं वे स्वतंत्र लेखन करती हैं, यह लेखक के निजी विचार हैं)</strong></p>
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                                                            <category>महिला</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 08 Mar 2022 17:16:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Jharkhand]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>झारखंड : नौ जिलों में बाल कल्याण समिति अध्यक्ष नियुक्त, उपेंद्रनाथ दुबे को लातेहार का जिम्मेवारी</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>रांची :</strong> झारखंड सरकार के महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग ने राज्य के नौ जिलों में बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष की नियुक्ति की अधिसूचना जारी कर दी है। राज्य सरकार ने बोकारो, चतरा, देवघर, गुमला, हजारीबाग, लातेहार, लोहरदगा, पाकुड़ व पलामू की बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति की है।</p>
<p>जारी अधिसूचना के अनुसार, लातेहार जिला की बाल कल्याण समिति का अध्यक्ष उपेंद्रनाथ दुबे को नियुक्त किया गया है। उपेंद्रनाथ दुबे इससे पहले गढवा जिला बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष थे। बोकारो जिले की बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष शंकर रवानी बनाए गए हैं।</p>
<p>चतरा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/child-welfare-committee-president-appointed-in-nine-districts-of-jharkhand-responsibility-of-latehar-to-upendranath-dubey/article-9581"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2022-01/upendra-nath-dubey-e1641827059802.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>रांची :</strong> झारखंड सरकार के महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग ने राज्य के नौ जिलों में बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष की नियुक्ति की अधिसूचना जारी कर दी है। राज्य सरकार ने बोकारो, चतरा, देवघर, गुमला, हजारीबाग, लातेहार, लोहरदगा, पाकुड़ व पलामू की बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति की है।</p>
<p>जारी अधिसूचना के अनुसार, लातेहार जिला की बाल कल्याण समिति का अध्यक्ष उपेंद्रनाथ दुबे को नियुक्त किया गया है। उपेंद्रनाथ दुबे इससे पहले गढवा जिला बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष थे। बोकारो जिले की बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष शंकर रवानी बनाए गए हैं।</p>
<p>चतरा जिला बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष धनंजय तिवारी बनाए गए हैं, वहीं देवघर की बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष कौशल कुमार नियुक्त किए गए हैं। गुमला जिला बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष कृपा जेस, हजारीबाग जिला बाल कल्याण समिति की अध्यक्ष तनुश्री सरकार, लोहरदगा जिला बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष लक्ष्मीकांत प्रसाद, पाकुड़ के डॉ शंभु कुमार यादव एवं पलामू की बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष प्रणव कुमार बनाए गए हैं।</p>
<p>बाल कल्याण समिति के इन नव नियुक्त अध्यक्षों का कार्यकाल तीन साल का होगा। बाल कल्याण समिति की जिम्मेवारी वैसे बालक-बालिकाओं के प्रति होती है, जिन्हें देख-रेख और संरक्षण की जरूरत होती है। झारखंड जैसे राज्य जहां मानव व बाल तस्करी के अत्यधिक मामले दर्ज होते हैं, वहां इनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है।</p>
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                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>लातेहार</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                            <category>महिला</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 10 Jan 2022 20:34:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Jharkhand]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>मध्यप्रदेश की आदिवासी लड़की निर्मला जो अपनी दमदार बातों से चर्चित हो गयी, जानें कौन हैं वो, Video</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>भोपाल :</strong> इसी सप्ताह सोमवार को मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले में कलेक्टर कार्यालय के समक्ष प्रदर्शन के दौरान अपनी दमदार आवाज व अपील की वजह से एक आदिवासी लड़की चर्चित हो गयी। 18 वर्षीया छात्रा निर्मला आलीराजपुर जिले के खंडाला खुशाल गांव की रहने वाली हैं और जब वे कलेक्टर के कार्यालय के समक्ष प्रदर्शन करने पहुंचंीं तो अन्य प्रदर्शनकारियों के बीच उनकी आवाज की गूंज सबसे अधिक और अपील सबसे ठोस थी।</p>
<p>निर्मला ने इस दौरान कहा…नहीं तो हमको कलेक्टर बना दो सर, हम बनने के लिए तैयार हैं, सबकी मांगें पूरी कर देंगे सर, आप कर नहीं पाते</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/woman/madhya-pradeshs-tribal-girl-nirmala-who-became-famous-with-her-strong-words-know-who-she-is/article-9544"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2021-12/tribal-girl-nirmala.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>भोपाल :</strong> इसी सप्ताह सोमवार को मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले में कलेक्टर कार्यालय के समक्ष प्रदर्शन के दौरान अपनी दमदार आवाज व अपील की वजह से एक आदिवासी लड़की चर्चित हो गयी। 18 वर्षीया छात्रा निर्मला आलीराजपुर जिले के खंडाला खुशाल गांव की रहने वाली हैं और जब वे कलेक्टर के कार्यालय के समक्ष प्रदर्शन करने पहुंचंीं तो अन्य प्रदर्शनकारियों के बीच उनकी आवाज की गूंज सबसे अधिक और अपील सबसे ठोस थी।</p>
<p>निर्मला ने इस दौरान कहा…नहीं तो हमको कलेक्टर बना दो सर, हम बनने के लिए तैयार हैं, सबकी मांगें पूरी कर देंगे सर, आप कर नहीं पाते तो किसके लिए बनी है सरकार। जैसे कि हम भीख मांगने के लिए यहां आए हैं। हमारे गरीब के लिए कुछ व्यवस्था करो सरकार, हम इतनी दूर से आते हैं, आदिवासी लोग। पैसे कितना किराया देकर आते हैं।</p>
<blockquote class="twitter-tweet">
<p dir="ltr" lang="hi" xml:lang="hi">क्या माननीय <a href="https://twitter.com/ChouhanShivraj?ref_src=twsrc%5Etfw">@ChouhanShivraj</a> झाबुआ की इस आदिवासी छात्रा को 2 दिन के लिए <a href="https://twitter.com/collectorjhabua?ref_src=twsrc%5Etfw">@collectorjhabua</a> बनाएंगे ताकि जो मुद्दे उसने उठाये थे उनसे सम्बंधित आदेश जारी हो सके <a href="https://twitter.com/hashtag/%E0%A4%9B%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%93%E0%A4%82?src=hash&amp;ref_src=twsrc%5Etfw">#छात्राओं</a> को मुफ्त परिवहन <a href="https://twitter.com/hashtag/%E0%A4%9B%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF?src=hash&amp;ref_src=twsrc%5Etfw">#छात्रवृत्ति</a> <a href="https://twitter.com/hashtag/%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%B2?src=hash&amp;ref_src=twsrc%5Etfw">#होस्टल</a> में अच्छा खाना <a href="https://twitter.com/hashtag/l%E0%A4%B2%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A4%95%E0%A5%80%E0%A4%B9%E0%A5%82%E0%A4%81%E0%A4%B2%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A4%B8%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%B9%E0%A5%82%E0%A4%82?src=hash&amp;ref_src=twsrc%5Etfw">#lलड़कीहूँलड़सकतीहूं</a> <a href="https://twitter.com/CMMadhyaPradesh?ref_src=twsrc%5Etfw">@CMMadhyaPradesh</a> <a href="https://twitter.com/priyankagandhi?ref_src=twsrc%5Etfw">@priyankagandhi</a> <a href="https://t.co/uJme8Vzk08">pic.twitter.com/uJme8Vzk08</a></p>
<p>— Office Of Dr Anand Rai (@anandrai177) <a href="https://twitter.com/anandrai177/status/1473534150040719362?ref_src=twsrc%5Etfw">December 22, 2021</a></p></blockquote>
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<p>निर्मला कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआइ के प्रदर्शन के दौरान वहां उपस्थित हुई थीं। एनएसयूआइ के सदस्य आवास गृह राशि, छात्रवृत्ति और बसों में छात्र-छात्राओं के लिए किराया कम करने सहित कई दूसरी मांगों को लेकर ज्ञापन देने कलेक्टर कार्यालय पहुंचे थे।</p>
<p>निर्मला के इस वीडियो को मध्यप्रदेश सहित कई दूसरे प्रदेशों के कांग्रेस नेता व अन्य लोगों ने सोशल मीडिया पर शेयर किया जिससे वह चर्चित हो गयीं। निर्मला की प्रभावशाली अपील ने सबका ध्यान खींच लिया।</p>
<p>निर्मला एक गरीब किसान पिता की बेटी हैं, यहां तक की उनके पास एक साधारण मोबाइल भी नहीं है। इस साल बीए फर्स्ट इयर में झाबुआ के गर्ल्स कॉलेज में उनका नामांकन हुआ है।</p>
<blockquote class="twitter-tweet">
<p dir="ltr" lang="hi" xml:lang="hi">गलत का विरोध खुलकर करे, चाहे राजनीति हो या समाज, इतिहास आवाज उठानें वालों का लिखा जाता हैं, तलवें चाटनें वालो का नहीं..<br />
🙏क्रांतिकारी जोहार <a href="https://twitter.com/Nirmalachouhan_?ref_src=twsrc%5Etfw">@Nirmalachouhan_</a> <a href="https://t.co/VFXmoWsTX9">pic.twitter.com/VFXmoWsTX9</a></p>
<p>— Nirmala Chouhan – विद्रोही निर्मला चौहान 🏹 (@Nirmalachouhan_) <a href="https://twitter.com/Nirmalachouhan_/status/1474246213633331200?ref_src=twsrc%5Etfw">December 24, 2021</a></p></blockquote>
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<p>निर्मला ने कहा है कि वो हमेशा गरीबों-वंचितों का आवाज उठाना चाहती हैं। उनके दिमाग में व्यवस्था को लेकर गुस्सा है जो अब और बढ गया है। उन्होंने कहा कि कलेक्टर के रवैया से उन्हें गुस्सा आ गया। न आवास राशि मिल रही है और न छात्रवृत्ति सहित दूसरी सुविधाएं। वे अपने कॉलेज में एनएसयूआइ की महासचिव हैं।</p>
<p>उन्होंने कहा कि जब तक वे जीवित रहेंगी आवाज उठाती रहेंगी। उन्होंने राजनीति में जाने की इच्छा प्रकट की है। उनके अनुसार, उनके रूम से कॉलेज तीन किलोमीटर की दूरी पर है और वे वहां रोज पैदल ही जाती हैं। उन्होंने कहा है कि उन्हें पैदल चलने में दिक्कत नहीं है, लेकिन उन्होंने दूसरों के लिए आवाज उठायी।</p>
<p>निर्मला का अनुसार, उनकी बात कोई सुन नहीं रहा था, इसलिए गुस्से में उन्होंने वह बात बोली। उन्होंने कहा कि वे धूप में दो-तीन घंटे से बाहर खड़ी थीं और बड़े अधिकारी होकर भी उनकी बात नहीं सुन रहे थे। उन्होंने कहा कि अगर उन्हें कलेक्टर बना देंगे तो गरीबों व छात्रों के लिए काम करेंगी।</p>
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                <pubDate>Fri, 24 Dec 2021 13:37:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Jharkhand]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>लड़कियों की शादी की उम्र 21 साल करने वाला विधेयक लोकसभा में पेश, ओवैसी को आपत्ति</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>नयी दिल्ली :</strong> महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने मंगलवार को लोकसभा में लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 21 साल करने संबंधी विधेयक पेश किया। इस विधेयक को बाल विवाह निषेध संशोधन विधेयक, 2021 नाम दिया गया है। इस विधेयक में महिलाओं की शादी की उम्र 18 साल से बढा कर 21 साल करने का प्रावधान है।</p>
<blockquote class="twitter-tweet">
<p dir="ltr" lang="hi" xml:lang="hi">केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने लोकसभा में बाल विवाह निषेध (संशोधन) विधेयक, 2021 पेश किया। इस विधेयक में महिलाओं की शादी की उम्र 18 साल से बढ़ाकर 21 साल करने का प्रावधान है। <a href="https://t.co/aOcmHm7KW3">pic.twitter.com/aOcmHm7KW3</a></p>
<p>— ANI_HindiNews</p></blockquote>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/woman/union-cabinet-minister-smriti-irani-introduces-the-prohibition-of-child-marriage-amendment-bill-in-loksabha/article-9534"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2021-12/smriti-irani.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>नयी दिल्ली :</strong> महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने मंगलवार को लोकसभा में लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 21 साल करने संबंधी विधेयक पेश किया। इस विधेयक को बाल विवाह निषेध संशोधन विधेयक, 2021 नाम दिया गया है। इस विधेयक में महिलाओं की शादी की उम्र 18 साल से बढा कर 21 साल करने का प्रावधान है।</p>
<blockquote class="twitter-tweet">
<p dir="ltr" lang="hi" xml:lang="hi">केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने लोकसभा में बाल विवाह निषेध (संशोधन) विधेयक, 2021 पेश किया। इस विधेयक में महिलाओं की शादी की उम्र 18 साल से बढ़ाकर 21 साल करने का प्रावधान है। <a href="https://t.co/aOcmHm7KW3">pic.twitter.com/aOcmHm7KW3</a></p>
<p>— ANI_HindiNews (@AHindinews) <a href="https://twitter.com/AHindinews/status/1473215195283558400?ref_src=twsrc%5Etfw">December 21, 2021</a></p></blockquote>
<p><br />
एमआइएम सांसद असदु्दीन ओवैसी ने इस विधेयक पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि जब 18 साल की उम्र में लड़कियां पीएम और सीएम चुन सकती हैं तो भला वे अपना जीवनसाथी क्यों नहीं चुन सकती हैं।</p>
<blockquote class="twitter-tweet">
<p dir="ltr" lang="hi" xml:lang="hi">सरकार 18 साल की लड़कियों के स्वतंत्रता के अधिकार को घटा रही है। अगर 18 साल की लड़की देश का PM और CM चुन सकती है तो अपना जीवनसाथी क्यों नहीं ? आप लड़कियों को लिव इन रिलेशनशिप की इजाज़त तो दे रहे हैं: शादी की कानूनी उम्र 18 से बढ़ाकर 21 साल करने के विधेयक पर असदुद्दीन ओवैसी, AIMIM <a href="https://t.co/82pzmev78R">pic.twitter.com/82pzmev78R</a></p>
<p>— ANI_HindiNews (@AHindinews) <a href="https://twitter.com/AHindinews/status/1473256621383946240?ref_src=twsrc%5Etfw">December 21, 2021</a></p></blockquote>
<p></p>
<p>जबकि मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इस प्रस्ताव को व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करार दिया है। बोर्ड ने सरकार से शादी की उम्र तय करने से परहेज करने को कहा है। बोर्ड के महासचिव मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी ने कहा है कि इस्लाम सहित विभिन्न धर्माें की शादी की उम्र तय नहीं की गयी है, यह अभिभावकों के विवेक पर निर्भर करता है। अगर किसी लड़की के माता-पिता यह समझते हैं कि लड़की शादी की जिम्मेवारी निभा सकती है तो उसे कानून से रोकना क्रूरता है।</p>
<p>वहीं, उत्तरप्रदेश के प्रयागराज के दौरे पर गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज कहा कि कुछ दिन पहले ही हमारी सरकार द्वारा बेटियों की शादी की उम्र 21 साल करने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन इससे किसे तकलीफ हो रही है, यह सब देख रहे हैं।</p>
<blockquote class="twitter-tweet">
<p dir="ltr" lang="hi" xml:lang="hi">बेटियों के लिए शादी की उम्र को 21 साल करने का प्रयास किया जा रहा है। देश ये फैसला बेटियों के लिए कर रहा है लेकिन किसको इससे तकलीफ हो रही है ये सब देख रहे हैं: प्रयागराज में प्रधानमंत्री <a href="https://t.co/jRIHCXB2KZ">pic.twitter.com/jRIHCXB2KZ</a></p>
<p>— ANI_HindiNews (@AHindinews) <a href="https://twitter.com/AHindinews/status/1473219603518029829?ref_src=twsrc%5Etfw">December 21, 2021</a></p></blockquote>
<p></p>
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                <pubDate>Tue, 21 Dec 2021 18:56:52 +0530</pubDate>
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