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                <title>आर्टिकल - Samridh Jharkhand</title>
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                <description>आर्टिकल RSS Feed</description>
                
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                <title>इतिहास नहीं, जनता को जवाब चाहिए; भाजपा के 12 साल का हिसाब चाहिए: विजय शंकर नायक </title>
                                    <description><![CDATA[झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमिटी के प्रदेश प्रवक्ता विजय शंकर नायक ने अपने लेख में भाजपा सरकार के 12 वर्षों के कार्यकाल पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने रोजगार, महंगाई, किसानों की आय, नोटबंदी, जीएसटी, कोविड प्रबंधन और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिति जैसे मुद्दों को उठाते हुए सरकार से जवाब मांगा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/politics/vijay-shankar-nayak-article-bjp-12-years-accountability-employment-inflation/article-23106"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/9007269d-5be9-4b17-9c48-22d73ed2efad_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>सत्ता का मूल्यांकन नारों, विज्ञापनों और इवेंट मैनेजमेंट से नहीं, बल्कि जनता के जीवन में आए बदलावों से होता है। वर्ष 2014 में भाजपा ने देश की जनता से बड़े-बड़े वादे किए थे। भ्रष्टाचार मुक्त भारत, हर साल दो करोड़ रोजगार, किसानों की आय दोगुनी, महंगाई पर नियंत्रण, काला धन वापस लाकर हर खाते में 15 लाख रुपये, अच्छे दिन और विकास का नया मॉडल—इन वादों के सहारे भाजपा सत्ता में आई थी। आज 12 वर्ष बाद देश का नागरिक पूछ रहा है कि उन वादों का क्या हुआ?</p>
<p>भाजपा सरकार का सबसे बड़ा संकट यह है कि वह अपने 12 वर्षों का हिसाब देने के बजाय इतिहास बदलने और राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने में अधिक व्यस्त दिखाई देती है। नेहरू, इंदिरा गांधी और कांग्रेस की विरासत पर हमला भाजपा की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन चुका है, क्योंकि वर्तमान की विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए अतीत पर हमला करना सबसे आसान रास्ता है।</p>
<p>लेकिन इतिहास प्रचार से नहीं बदलता। पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे। उन्हीं के नेतृत्व में लोकतांत्रिक संस्थाओं, सार्वजनिक क्षेत्र, वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थानों, IIT, AIIMS, बड़े बांधों और आधुनिक भारत की बुनियाद रखी गई। सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. भीमराव आंबेडकर और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी तक नेहरू मंत्रिमंडल का हिस्सा रहे। आज भाजपा इन महापुरुषों की विरासत का राजनीतिक उपयोग करती है, लेकिन उनके संवैधानिक और लोकतांत्रिक आदर्शों को कमजोर करने का आरोप भी उसी पर लगता है।</p>
<h3><span><strong>वादों का पहाड़, नतीजों का अकाल</strong></span></h3>
<p>2014 में कहा गया था कि हर साल दो करोड़ नौकरियां पैदा होंगी। यदि यह वादा पूरा होता, तो 12 वर्षों में करोड़ों युवाओं को रोजगार मिल चुका होता। लेकिन आज देश का युवा नौकरी के लिए भटक रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, रिक्त पदों पर नियुक्तियों में देरी और रोजगार के अवसरों की कमी युवाओं के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा रही है।</p>
<p>किसानों से आय दोगुनी करने का वादा किया गया था। लेकिन किसानों को अपनी मांगों के लिए दिल्ली की सीमाओं पर महीनों आंदोलन करना पड़ा। तीन कृषि कानूनों को किसानों के हित में बताया गया, लेकिन जब लाखों किसान सड़कों पर उतर आए, तो सरकार को उन्हें वापस लेना पड़ा। यह भाजपा सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक पराजयों में से एक थी।</p>
<p>महंगाई पर नियंत्रण का दावा किया गया था। लेकिन रसोई गैस, पेट्रोल, डीजल, खाद्य पदार्थ, दाल, तेल और रोजमर्रा की वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने गरीब और मध्यम वर्ग की कमर तोड़ दी। आम आदमी की आय जितनी नहीं बढ़ी, उससे कहीं अधिक उसकी जिंदगी महंगी हो गई।</p>
<h3><span><strong>नोटबंदी : आर्थिक आपदा का अध्याय</strong></span></h3>
<p>नोटबंदी को काले धन, भ्रष्टाचार और आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कदम बताया गया था। लेकिन परिणाम क्या निकला?</p>
<p>लगभग पूरी नकदी बैंकिंग प्रणाली में वापस लौट आई। छोटे व्यापार चौपट हो गए। लाखों मजदूर बेरोजगार हुए। असंगठित क्षेत्र को भारी नुकसान हुआ। अर्थव्यवस्था की रफ्तार प्रभावित हुई। देश की जनता ने घंटों लाइन में खड़े होकर कष्ट झेला, लेकिन वादे के अनुरूप परिणाम कभी सामने नहीं आए।</p>
<p>इतिहास नोटबंदी को आर्थिक सुधार नहीं, बल्कि आर्थिक अव्यवस्था के रूप में याद रखेगा।</p>
<h3><span><strong>जीएसटी : एक राष्ट्र, अनेक परेशानियां</strong></span></h3>
<p>जीएसटी को ऐतिहासिक कर सुधार बताया गया था, लेकिन छोटे और मध्यम व्यापारियों के लिए यह जटिल अनुपालन और बढ़ती कागजी प्रक्रिया का प्रतीक बन गया। बड़े कॉरपोरेट समूहों के पास संसाधन थे, लेकिन छोटे दुकानदारों और लघु उद्योगों को इसका भारी बोझ उठाना पड़ा।</p>
<h3><span><strong>विकास या प्रचार?</strong></span></h3>
<p>भाजपा सरकार ने मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, आत्मनिर्भर भारत, स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेन जैसी परियोजनाओं का व्यापक प्रचार किया। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन योजनाओं ने उतने रोजगार पैदा किए, जितने वादे किए गए थे?</p>
<p>स्मार्ट सिटी परियोजनाएं अधूरी हैं। बुलेट ट्रेन अभी तक सपना बनी हुई है। मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई। चीन पर निर्भरता कम करने के दावे भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके।</p>
<p>भाजपा शासन का मॉडल विकास से अधिक विज्ञापन-आधारित शासन का मॉडल बन गया, जहां उपलब्धि से ज्यादा उसका प्रचार महत्वपूर्ण हो गया।</p>
<h3><span><strong>कोविड काल की त्रासदी</strong></span></h3>
<p>कोविड महामारी के दौरान देश ने भयावह दृश्य देखे। लाखों प्रवासी मजदूर पैदल घर लौटने को मजबूर हुए। ऑक्सीजन की कमी, अस्पतालों में अव्यवस्था और स्वास्थ्य ढांचे की कमजोरियां उजागर हुईं। महामारी ने दिखा दिया कि चमकदार प्रचार और वास्तविक प्रशासनिक तैयारी में कितना अंतर हो सकता है।</p>
<h3><span><strong>लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बढ़ते सवाल</strong></span></h3>
<p>भाजपा सरकार पर सबसे गंभीर आरोप लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता को कमजोर करने का है। विपक्ष का आरोप है कि केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ हथियार की तरह किया गया। संसद में बहस की परंपरा कमजोर हुई। मीडिया के एक बड़े हिस्से ने सत्ता से सवाल पूछने के बजाय उसका प्रचार करना अधिक उचित समझा।</p>
<p>लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है असहमति का सम्मान, संस्थाओं की स्वतंत्रता और सत्ता की जवाबदेही।</p>
<h3><span><strong>सामाजिक सौहार्द पर संकट</strong></span></h3>
<p>“सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” का नारा दिया गया था। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि पिछले वर्षों में समाज में ध्रुवीकरण बढ़ा है। बेरोजगारी, महंगाई और आर्थिक संकट जैसे मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए धार्मिक और सांप्रदायिक बहसों को लगातार राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया।</p>
<p>जब रोजगार का प्रश्न उठता है, तो धर्म की चर्चा शुरू हो जाती है। जब महंगाई पर सवाल उठता है, तो नया भावनात्मक मुद्दा सामने आ जाता है। यह लोकतांत्रिक विमर्श के लिए शुभ संकेत नहीं है।</p>
<h3><span><strong>अग्निपथ, पेपर लीक और युवाओं की निराशा</strong></span></h3>
<p>अग्निपथ योजना ने लाखों युवाओं के मन में भविष्य को लेकर असुरक्षा पैदा की। दूसरी ओर, विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाओं ने युवाओं का विश्वास तोड़ा। एक ऐसा देश, जिसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है, वहां युवाओं का निराश होना सबसे बड़ी राष्ट्रीय चिंता का विषय होना चाहिए।</p>
<h3><span><strong>निष्कर्ष : इतिहास नहीं, हिसाब चाहिए</strong></span></h3>
<p>भाजपा के 12 वर्षों का मूल्यांकन करते समय देश को विज्ञापनों, नारों और राजनीतिक अभियानों से ऊपर उठकर वास्तविकताओं को देखना होगा। बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की परेशानी, नोटबंदी की विफलता, जीएसटी की जटिलता, कोविड की त्रासदी, सामाजिक ध्रुवीकरण, संस्थाओं पर सवाल और अधूरे वादे—ये सभी ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर जवाब मांगा जाना चाहिए।</p>
<p>जनता इतिहास बदलने की कोशिशों से प्रभावित नहीं होगी। जनता अपने जीवन की वास्तविकताओं के आधार पर फैसला करेगी।</p>
<p>देश पूछ रहा है—दो करोड़ नौकरियां कहां हैं?</p>
<p>किसानों की दोगुनी आय कहां है? 15 लाख रुपये कहां हैं? महंगाई पर नियंत्रण कहां है? भ्रष्टाचार मुक्त शासन कहां है? 12 साल बाद भी यदि इन सवालों का जवाब नहीं है, तो फिर यह कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि प्रचार रही है और सबसे बड़ी विफलता जनता की उम्मीदों को पूरा न कर पाना।</p>
<p><strong>इतिहास पर कब्ज़ा नहीं, जनता को जवाब चाहिए।</strong></p>
<p><strong>भाजपा के 12 साल का हिसाब चाहिए।</strong></p>
<p>अब देश में ऐसी राजनीति होनी चाहिए, जिससे रोजगार पैदा किया जा सके, महंगाई को कम किया जा सके, किसानों, छात्रों, युवाओं, महिलाओं, गरीब-गुरबा लोगों और खासकर दलित, आदिवासी, पिछड़ा, अल्पसंख्यक तथा मजदूर वर्ग को राहत मिल सके तथा संविधान व लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत किया जा सके।</p>
<p>अंततः लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता का होता है। प्रचार, छवि निर्माण और राजनीतिक नैरेटिव कितने भी मजबूत हों, जनता का अनुभव और जीवन की वास्तविकता ही किसी सरकार की असली परीक्षा तय करती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 17:24:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सोशल मीडिया और भारतीय युवा: अवसरों के साथ बढ़ती चुनौतियाँ</title>
                                    <description><![CDATA[भारत का युवा वर्ग तेजी से डिजिटल दुनिया से जुड़ रहा है। स्मार्टफोन और इंटरनेट की बढ़ती पहुंच ने सोशल मीडिया को युवाओं के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया है। इससे शिक्षा, रोजगार, कौशल विकास और उद्यमिता के नए अवसर मिले हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/social-media-and-indian-youth-opportunities-and-growing-challenges/article-23058"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/811f309c-b5e8-4fe6-b012-7dbb3f56a036_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में से एक है। डिजिटल क्रांति ने युवाओं के जीवन, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक संबंधों को गहराई से प्रभावित किया है। स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट की उपलब्धता ने सोशल मीडिया को युवाओं की दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बना दिया है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, व्हाट्सएप और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म आज संचार और मनोरंजन के प्रमुख माध्यम बन चुके हैं।</p>
<p>भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा वर्ष 2025 में जारी "कॉम्प्रिहेन्सिव मॉड्यूलर सर्वे : टेलीकॉम" के अनुसार 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 97 प्रतिशत युवाओं ने पिछले तीन महीनों में मोबाइल फोन का उपयोग किया, जबकि लगभग 94 प्रतिशत युवाओं ने इंटरनेट का उपयोग किया। सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि इस आयु वर्ग के मोबाइल धारकों में 95 प्रतिशत से अधिक के पास स्मार्टफोन उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त देश के 85.5 प्रतिशत परिवारों के पास कम से कम एक स्मार्टफोन तथा 86.3 प्रतिशत परिवारों के पास इंटरनेट सुविधा उपलब्ध है।</p>
<p>इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि भारत का युवा वर्ग तेजी से डिजिटल दुनिया से जुड़ रहा है। सोशल मीडिया ने शिक्षा, सूचना, कौशल विकास और उद्यमिता के नए अवसर प्रदान किए हैं। अनेक युवा ऑनलाइन माध्यमों से रोजगार, व्यवसाय और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।<br />हालाँकि इसके कुछ नकारात्मक प्रभाव भी सामने आ रहे हैं। अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग के कारण युवाओं में तनाव, चिंता, अवसाद, आत्म-सम्मान में कमी और सामाजिक तुलना जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। कई युवा वास्तविक जीवन की अपेक्षा आभासी दुनिया में अधिक समय बिताने लगे हैं। लाइक्स, कमेंट्स और फॉलोअर्स की होड़ उन्हें मानसिक दबाव की ओर धकेल सकती है।</p>
<p>शिक्षा के क्षेत्र में भी इसका प्रभाव देखा जा रहा है। पढ़ाई के दौरान बार-बार मोबाइल देखना, रील्स और शॉर्ट वीडियो में समय व्यतीत करना तथा एकाग्रता में कमी विद्यार्थियों के शैक्षणिक प्रदर्शन को प्रभावित कर रही है। वहीं साइबर बुलिंग, फेक न्यूज़ और ऑनलाइन धोखाधड़ी जैसी समस्याएँ भी युवाओं के सामने गंभीर चुनौती बनकर उभरी हैं।</p>
<p>सामाजिक दृष्टि से भी स्थिति चिंताजनक है। ऑनलाइन मित्रों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन परिवार और समाज के साथ प्रत्यक्ष संवाद कम होता जा रहा है। इससे अकेलेपन और सामाजिक अलगाव की भावना विकसित हो सकती है। इसके अतिरिक्त देर रात तक मोबाइल उपयोग करने से नींद की गुणवत्ता प्रभावित होती है, जिससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।<br />सोशल मीडिया को समस्या नहीं, बल्कि एक साधन के रूप में देखना चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि युवा इसका उपयोग संतुलित और जिम्मेदारीपूर्ण ढंग से करें। अभिभावकों, शिक्षकों और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों को युवाओं में डिजिटल साक्षरता, समय प्रबंधन और स्वस्थ ऑनलाइन व्यवहार को बढ़ावा देना चाहिए।</p>
<p>भारत का भविष्य उसके युवाओं पर निर्भर करता है। यदि सोशल मीडिया का उपयोग ज्ञान, कौशल और सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन के लिए किया जाए तो यह राष्ट्र निर्माण का सशक्त माध्यम बन सकता है। लेकिन यदि इसका उपयोग अनियंत्रित रूप से किया गया, तो इसके दुष्परिणाम व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर गंभीर हो सकते हैं। इसलिए डिजिटल युग में संतुलन, जागरूकता और आत्म-अनुशासन ही सफलता की कुंजी हैं।</p>
<p><strong>राममूरत उपाध्याय</strong><br /><strong>शोधार्थी समाज कार्य विभाग </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 15:25:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>झारखंड के साथ बिहार की राजनीति में भी भूचाल, उपेंद्र कुशवाहा के बेटे मंत्री दीपक प्रकाश हुए बेटिकट, देना होगा इस्तीफा </title>
                                    <description><![CDATA[बिहार विधान परिषद चुनाव में एनडीए द्वारा टिकट न दिए जाने के बाद उपेंद्र कुशवाहा के बेटे व मंत्री दीपक प्रकाश का पद से हटना तय हो गया है। वहीं दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक के दौरान टीएमसी के 20 सांसदों के अलग गुट बनाने से सियासी हलचल तेज हो गई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/politics/bihar-mlc-election-2026-upendra-kushwaha-son-minister-deepak-prakash-denied-ticket-nda/article-22930"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/whatsapp-image-2026-06-08-at-20.37.46_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>सुनील सिंह</strong></p>
<p style="text-align:justify;">सोमवार का दिन राजनीतिक उठापटक और हलचल से भरा रहा। दिल्ली, रांची और पटना में बड़ी राजनीतिक घटना हुई। राजनीतिक घटनाक्रम का असर आने वाले दिनों में दिखेगा। झारखंड की राजधानी रांची में राज्यसभा चुनाव में एनडीए समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी उद्योगपति परिमल नाथवानी ने नामांकन पर्चा दाखिल कर इंडिया गठबंधन की मुश्किलें बढ़ा दी। वहीं बिहार में विधान परिषद की 10 सीटों के लिए होने वाले चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा के बेटे व मंत्री दीपक प्रकाश बेटिकट हो गए। एनडीए गठबंधन ने दीपक प्रकाश को उम्मीदवार नहीं बनाया। इसलिए वह नामांकन नहीं कर सके। अब उनका मंत्री पद से हटना तय हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक हुई। बैठक के दौरान ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी में बड़ी टूट हो गई। 20 सांसदों ने अलग गुट बना लिया। हम बात करेंगे बिहार में हुई राजनीतिक घटना की। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोमो एनडीए का घटक दल है। इसके चार विधायक हैं। इनमें से एक उपेंद्र कुशवाहा की पत्नी खुद हैं। बिहार में जब एनडीए की सरकार बनी तो उपेंद्र कुशवाहा ने अपने बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बनवा दिया। दीपक प्रकाश पहली बार पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार में मंत्री बनें। उस वक्त वह किसी सदन के सदस्य नहीं थे। बाद में जब सम्राट चौधरी बिहार के मुख्यमंत्री बने तो इनके मंत्रिमंडल में भी दीपक प्रकाश को शामिल किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">चर्चा यही थी कि बिहार विधान परिषद के लिए जब चुनाव होगा तो दीपक प्रकाश को एमएलसी बनाया जाएगा। एमएलसी बनने के बाद मंत्री पद बरकरार रहेगा। लेकिन एनडीए की ओर से दीपक प्रकाश को उम्मीदवार नहीं बनाया गया। 10 सीटों के लिए हो रहे चुनाव में भाजपा और जदयू ने चार-चार सीट आपस बांट ली और एक सीट लोजपा को मिल गई। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी को कोई सीट नहीं दी गई। चार विधायक होने की वजह से इनका दावा भी नहीं बन रहा था। एक  सीट पर राजद ने राबड़ी देवी के मुंहबोले भाई सुनील सिंह को फिर से टिकट दिया है. 10 सीटों पर 10 उम्मीदवार हैं। इसलिए यहां सबका निर्विरोध चुना जाना तय है।</p>
<p style="text-align:justify;">दीपक प्रकाश को 6 महीने के अंदर अब इस्तीफा देना पड़ेगा। जानकारी के अनुसार भाजपा उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी का भाजपा में विलय चाहती थी। लेकिन इसके लिए कुशवाहा तैयार नहीं हुए। कुशवाहा समाज से अब सम्राट चौधरी खुद मुख्यमंत्री हैं, इसलिए उपेंद्र कुशवाहा को अब बहुत तरजीह नहीं मिल रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">बिहार की राजनीति में अब यह सवाल गूंज रहा है कि उपेंद्र कुशवाहा क्या करेंगे। कुशवाहा के सामने दो विकल्प हैं। बेटे के इस्तीफा देने के बाद अपनी पत्नी या फिर किसी दूसरे विधायक का नाम मंत्री के लिए दे सकते हैं या फिर केंद्र में जब मंत्रिमंडल का विस्तार हो तो उपेंद्र कुशवाहा को मंत्री बनाया जाए और बिहार का कोटा उनसे ले लिया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">रालोमो के तीन अन्य विधायक उपेंद्र कुशवाहा की परिवारवाद की राजनीति से नाराज हैं। भाजपा को नाराजगी की खबर है। विधायक दल बदलने को तैयार हैं। इसलिए भी उपेंद्र कुशवाहा की स्थिति एनडीए में कमजोर हो गई है। कमजोर स्थिति को देखते हुए ही उनके बेटे को एमएलसी का टिकट नहीं मिला। हालांकि कुशवाहा कह चुके हैं कि वह एनडीए के साथ है और रहेंगे। अब आगे देखना होगा कि राजनीतिक किस ओर बढ़ती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 08 Jun 2026 21:09:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Sinha]]></dc:creator>
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                <title>पत्रकार बनना आसान है, पत्रकारिता करना मुश्किल</title>
                                    <description><![CDATA[वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार धीरज का यह विचारोत्तेजक आलेख पत्रकारिता के बदलते स्वरूप और उसके सामने खड़ी चुनौतियों पर केंद्रित है। लेखक ने व्यंग्यात्मक शैली में बताया है कि आज पत्रकार बनना भले आसान हो गया हो, लेकिन वास्तविक पत्रकारिता करना पहले से कहीं अधिक कठिन है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/patrakar-banna-aasan-hai-patrakarita-karna-mushkil-sanjay-kumar-dhiraj/article-22905"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/fbb59f6f-5e87-4ca8-8977-6f2f34d2b6e5_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>आलेख: संजय कुमार धीरज</strong></p>
<p>आजकल पत्रकारिता में प्रवेश लेना वैसा ही हो गया है जैसे किसी शादी में बिना बुलावे के घुस जाना। न कोई योग्यता पूछता है, न कोई उद्देश्य। बस एक मोबाइल, दो-चार सोशल मीडिया अकाउंट और प्रोफाइल फोटो पर "वरिष्ठ पत्रकार" लिखवा लीजिए, पत्रकारिता का द्वार आपके लिए खुला है। पुराने समय में पत्रकारिता को मिशन कहा जाता था। आजकल मिशन का स्थान कमीशन ने ले लिया है। पहले पत्रकार खबर खोजता था, अब खबर पत्रकार को खोजती है और पूछती है, "भाई साहब, मुझे चलाने का रेट क्या है?"</p>
<p>इसीलिए जब कोई युवा मुझसे पूछता है कि पत्रकारिता कैसे करें, तो मन करता है कि उसे किसी विश्वविद्यालय का पता न बताकर सीधे किसी यज्ञशाला का पता बता दूँ। क्योंकि पत्रकारिता यदि सचमुच करनी है तो पहले स्वयं को स्वाहा करना पड़ता है। यह कोई साधारण नौकरी नहीं है कि सुबह हाजिरी लगाई, शाम को तनख्वाह ली और घर आ गए। पत्रकारिता तो ऐसा प्रेम है जिसमें प्रेमिका भी पत्रकारिता है, पत्नी भी पत्रकारिता है और कभी-कभी सास भी पत्रकारिता ही बन जाती है। चौबीस घंटे आपकी परीक्षा लेती रहती है। रात के दो बजे फोन बजे तो पत्रकार उठता है, जबकि आम आदमी तकिया पलटकर फिर सो जाता है।</p>
<p>लेकिन अब समय बदल गया है। अब पत्रकारिता त्याग नहीं, टैग मांगती दिखाई देती है। जितने ज्यादा फेसबुक टैग, उतना बड़ा पत्रकार। किसी कार्यक्रम में दस नेताओं के साथ फोटो खिंचवा ली तो पत्रकारिता में पीएचडी मानी जाती है। खबर लिखना आवश्यक नहीं है, महत्वपूर्ण यह है कि खबर लिखते हुए सेल्फी जरूर आनी चाहिए। आज पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट यह है कि हर कोई पत्रकार बनना चाहता है, लेकिन पत्रकारिता कोई नहीं करना चाहता। सबको प्रेस कार्ड चाहिए, प्रेस की जिम्मेदारी नहीं। सबको पहचान चाहिए, पर पहरेदारी नहीं। सबको मंच चाहिए, पर जनता के प्रश्न नहीं।</p>
<p>एक समय था जब पत्रकार सत्ता से सवाल पूछता था। आज कई जगह सत्ता पत्रकार से पूछती है, "भाई, इस महीने सब ठीक चल रहा है ना?" और पत्रकार मुस्कुराकर कहता है, "जी, आपका आशीर्वाद बना रहे।" त्याग की बात करें तो पत्रकारिता आज भी त्याग मांगती है, लेकिन त्याग करने वालों की संख्या कम होती जा रही है। आज त्याग का अर्थ बदल गया है। कुछ लोग सत्य का त्याग कर देते हैं, कुछ निष्पक्षता का और कुछ तो व्याकरण का भी। बचता क्या है? केवल "ब्रेकिंग न्यूज" का लाल पट्टा। पत्रकारिता का हाल उस रिश्तेदार जैसा हो गया है जिसे हर कोई अपना बताता है लेकिन कोई उसकी जिम्मेदारी नहीं उठाता। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने वाले बहुत मिल जाएंगे, लेकिन उस स्तंभ की मरम्मत कौन करेगा, यह कोई नहीं बताता।</p>
<p>सबसे मनोरंजक दृश्य तब होता है जब पाँच लोगों का व्हाट्सएप ग्रुप बनता है और अगले दिन उसका नाम रख दिया जाता है "राष्ट्रीय पत्रकार संघ अंतरराष्ट्रीय प्रकोष्ठ"। फिर अध्यक्ष, महासचिव, संरक्षक और मुख्य संरक्षक के पद बाँट दिए जाते हैं। संगठन में सदस्य पाँच होते हैं और पद सात। पत्रकारिता के नाम पर पुरस्कारों की भी अद्भुत खेती चल रही है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि देश में पत्रकार कम और पुरस्कार प्राप्त पत्रकार अधिक हैं। कुछ लोगों के ड्रॉइंग रूम में इतनी ट्रॉफियाँ होती हैं कि यदि उन्हें बेच दिया जाए तो एक छोटा-मोटा न्यूज़ चैनल शुरू हो सकता है।</p>
<p> फिर भी इस सारी विडंबना के बीच कुछ लोग ऐसे हैं जो सचमुच पत्रकारिता को यज्ञ मानते हैं। वे आज भी बिना संसाधनों के खबर खोजते हैं, बिना दबाव के सच लिखते हैं और बिना किसी पुरस्कार की अपेक्षा के जनता के सवाल उठाते हैं। वही लोग इस पेशे की असली पूँजी हैं।</p>
<p>इसीलिए यदि पत्रकारिता में आना है तो पहले यह तय कर लीजिए कि आपको पत्रकार बनना है या केवल प्रेस लिखी गाड़ी में घूमना है। यदि आपको सम्मान चाहिए तो बहुत रास्ते हैं, लेकिन यदि आपको सच का साथ चाहिए तो रास्ता कठिन है।</p>
<p>पत्रकारिता में बने रहना आसान नहीं है। यहाँ कभी विज्ञापन नाराज़ होता है, कभी नेता, कभी अधिकारी और कभी अपना ही पाठक। फिर भी यदि आप हर परिस्थिति में सत्य के साथ खड़े रह सकते हैं, तो आपका स्वागत है।</p>
<p>क्योंकि पत्रकारिता आज भी वही कहती है: "यदि स्वयं को स्वाहा कर सको तो पत्रकारिता करना।" बाकी तो आजकल मोबाइल का कैमरा भी पत्रकार है, रिंग लाइट भी पत्रकार है और कुछ मामलों में तो ट्राइपॉड भी वरिष्ठ पत्रकार घोषित होने की प्रतीक्षा में खड़ा है।</p>
<p><strong>(लेखक समृद्ध झारखंड के ब्यूरो और युवा पत्रकार संगठन के सदस्य हैं।)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 08 Jun 2026 16:26:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बढ़ते कॉकरोच को कैसे खत्म करें? </title>
                                    <description><![CDATA[ओम प्रकाश प्रीत "सोनू" का यह व्यंग्य लेख कॉकरोचों को खत्म करने की साधारण घरेलू समस्या से शुरू होकर भारतीय राजनीति के जटिल समीकरणों तक पहुंचता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/how-to-eliminate-growing-cockroaches/article-22898"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/e4bae30f-1d86-405a-9b10-4c99ce50242b_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>ओम प्रकाश प्रीत "सोनू "</strong></p>
<p>पत्नी की शिकायत थी कि घर में कॉकरोच बढ़ते जा रहे हैं। पति होने के नाते मेरी जिम्मेदारी थी कि इस राष्ट्रीय संकट का समाधान खोजूँ। मैंने तुरंत गूगल का दरवाज़ा खटखटाया और पूछा—"बढ़ते कॉकरोच को कैसे खत्म करें?"</p>
<p>जवाब आया—बोरिक एसिड और चीनी का मिश्रण सबसे असरदार है। इसके अलावा बेकिंग सोडा और चीनी का प्रयोग, नीम का तेल, तेजपत्ता आदि का इस्तेमाल करके आप इन्हें आसानी से और सुरक्षित तरीके से घर से बाहर निकाल सकते हैं।</p>
<p>मैंने ध्यान से पढ़ा। मैंने पूछा था "खत्म कैसे करें?" और जवाब मिल रहा था "घर से बाहर कैसे निकालें?"<br />फिर मैंने यूट्यूब देखा, एआई से पूछा, लेख पढ़े। लगभग हर जगह वही बात, बस शब्दों की पैकिंग अलग-अलग थी। मुझे लगा कि मामला कुछ संदिग्ध है। अगर ये उपाय इतने ही कारगर होते तो कॉकरोच अब तक इतिहास की किताबों में मिलते, रसोई में नहीं।</p>
<p>फिर मैंने सोचा कि शायद ये सामान्य कॉकरोच नहीं हैं। ये उस प्रजाति के हैं जो हर परिस्थिति में खुद को ढाल लेती है। आप हमला करते हैं, वे रणनीति बदल लेते हैं। आप एक दरार बंद करते हैं, वे दूसरी खोज लेते हैं। आप सोचते हैं कि मामला खत्म हो गया, और कुछ दिन बाद वे पहले से अधिक आत्मविश्वास के साथ वापसी कर लेते हैं।</p>
<p>यहीं से मेरा दिमाग राजनीति की तरफ मुड़ गया। कॉकरोच और राजनीति में एक अद्भुत समानता है। दोनों को खत्म करने के लिए लोग तरह-तरह के उपाय बताते हैं, लेकिन कुछ समय बाद वे किसी नए कोने, नए चेहरे, नए नारे या नए गठबंधन के साथ फिर सामने आ जाते हैं।</p>
<p>कॉकरोच बिना चुनाव लड़े हर घर में सत्ता में बने रहते हैं और राजनीति में भी कुछ ऐसी शक्तियाँ हैं जो चुनाव हारकर भी चर्चा में बनी रहती हैं। फिर मेरा ध्यान BJP और उसके विरोधियों की तरफ चला गया। मैं सोचने लगा कि BJP का विरोध करने वाली पार्टियों के नामों में आखिर "C" का प्रभाव इतना अधिक क्यों दिखाई देता है?</p>
<p>कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी राजनीतिक ज्योतिषी ने वर्षों पहले कोई गुप्त सलाह दी हो, "सत्ता चाहिए तो कमल चुनिए, और विपक्ष में रहना है तो नाम में C रखिए।" हालाँकि यह भी हो सकता है कि यह मेरे दिमाग की ही उड़ान हो। आखिर पत्नी ने मुझे कॉकरोच मारने भेजा था और मैं राजनीतिक विश्लेषण करने बैठ गया। मेरे दिमाग की भी एक समस्या है। उसे एक विषय पर टिककर रहने की आदत नहीं। वह बोरिक एसिड से शुरू होकर लोकतंत्र पर समाप्त होता है।</p>
<p>अब देखिए न, इसे लगने लगा कि C for Cockroach भी कहीं न कहीं राजनीतिक विज्ञान का ही हिस्सा है।समानताएँ भी कम नहीं हैं। दोनों की उपस्थिति से लोग परेशान रहते हैं। दोनों को हटाने के लिए समय-समय पर अभियान चलते हैं। दोनों के बारे में बार-बार घोषणा होती है कि "इस बार इनका अंत निश्चित है।"</p>
<p>लेकिन कुछ समय बाद पता चलता है कि वे किसी नई दरार, नए मंच, नए गठबंधन या नए रूप में फिर उपस्थित हैं। वैसे कॉकरोचों की एक और विशेषता है। वे कभी अकेले नहीं आते। पहले एक दिखता है, फिर दूसरा, फिर तीसरा। और जब तक आप स्थिति समझते हैं, तब तक वे घर का नक्शा आपसे बेहतर जान चुके होते हैं।</p>
<p>राजनीति में भी अक्सर कुछ ऐसा ही होता है। पहले एक बयान आता है, फिर प्रतिक्रिया, फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस, फिर गठबंधन, फिर महागठबंधन, और देखते ही देखते पूरा देश बहस में बदल जाता है। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि इस देश में दो ही चीजें सचमुच अमर हैं।</p>
<p>पहला—कॉकरोच।<br />दूसरा—विपक्ष के पुनर्गठन की बैठकें।</p>
<p>कॉकरोच समय-समय पर अपना ठिकाना बदलते हैं और विपक्ष समय-समय पर अपना समीकरण। कॉकरोच रसोई में मिल जाते हैं, पुनर्गठन की बैठकें राजधानी में। दोनों की गतिविधियाँ अक्सर रात में तेज़ हो जाती हैं और दोनों के बारे में सुबह उठकर नई खबर मिलती है।</p>
<p>फर्क बस इतना है कि कॉकरोचों के पास प्रवक्ता नहीं होते। अगर होते, तो शायद वे भी प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बताते कि उनका विस्तार दरअसल "जनसमर्थन" का परिणाम है और रसोई में उनकी बढ़ती उपस्थिति जनता के विश्वास का प्रमाण है।</p>
<p>खैर, मैं अभी भी कॉकरोच खत्म करने का उपाय खोज रहा हूँ। लेकिन जितना पढ़ रहा हूँ, उतना ही विश्वास मजबूत हो रहा है कि कुछ चीजें वास्तव में खत्म नहीं होतीं। वे केवल अपना नाम, पता, रूप और रणनीति बदलती हैं।</p>
<p>और शायद यही कारण है कि कॉकरोच विज्ञान और राजनीति विज्ञान, दोनों का अंतिम निष्कर्ष एक ही है—<br />"सावधान रहिए, अगली पीढ़ी पहले से ज्यादा संगठित होकर लौट सकती है।"</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 08 Jun 2026 14:49:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>झामुमो-कांग्रेस में समझौता, एक ही सीट पर उम्मीदवार देगा झामुमो; गठबंधन में टूट का खतरा टला, हेमंत ने दिखाया राजनीतिक संतुलन</title>
                                    <description><![CDATA[झारखंड में राज्यसभा चुनाव को लेकर झामुमो और कांग्रेस के बीच चल रही राजनीतिक खींचतान का अंत हो गया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने केवल एक सीट पर उम्मीदवार उतारने का फैसला लेते हुए बैजनाथ राम को झामुमो प्रत्याशी बनाया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/politics/jmm-congress-agreement-baijnath-ram-rajya-sabha-candidate-hemant-soren-strategy/article-22824"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/d48d5d06-4142-42aa-8364-148a07d0ecee_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>सुनील सिंह</strong></p>
<p><strong>रांची :</strong> झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और कांग्रेस के बीच राज्यसभा चुनाव को लेकर आखिरकार समझौता हो गया है। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को मनाने में सफलता हासिल की है और उनकी नाराजगी दूर कर ली है। तमाम राजनीतिक परिस्थितियों और संभावनाओं का आकलन करने के बाद हेमंत सोरेन ने राज्यसभा चुनाव में केवल एक सीट पर उम्मीदवार उतारने का फैसला लिया है। पार्टी ने बैजनाथ राम को उम्मीदवार बनाया है। अब झामुमो एक ही सीट पर चुनाव लड़ेगा, जबकि दूसरी सीट पर कांग्रेस के घोषित प्रत्याशी प्रणव झा मैदान में होंगे।</p>
<p>झामुमो की ओर से एक सीट पर प्रत्याशी दिए जाने की घोषणा के बाद इंडिया गठबंधन पर मंडरा रहा टूट का खतरा भी फिलहाल टल गया है। हेमंत सोरेन ने बैजनाथ राम को प्रत्याशी बनाकर राजनीतिक गलियारों में सबको चौंका दिया है, क्योंकि उनके नाम की चर्चा कहीं नहीं थी। जिन नेताओं के नाम टिकट की दौड़ में प्रमुखता से लिए जा रहे थे, वे पीछे रह गए।</p>
<p class="tag_h1 node_title"><span style="color:rgb(224,62,45);background-color:rgb(194,224,244);"><strong>यह भी पढ़े: <a href="https://samridhjharkhand.com/news/politics/rajya-sabha-elections-tension-increases-between-jmm-and-congress-threat/article-22799">राज्यसभा चुनाव: झामुमो-कांग्रेस में तनातनी बढ़ी, गठबंधन पर टूट का खतरा; उम्मीदवार की घोषणा से नाराजगी</a></strong></span></p>
<p>कई लोग कल्पना सोरेन को उम्मीदवार बनाए जाने की संभावना जता रहे थे, लेकिन <strong><a href="https://samridhjharkhand.com/news/politics/rajya-sabha-elections-tension-increases-between-jmm-and-congress-threat/article-22799">मैंने पहले ही लिखा था कि उनकी उम्मीदवारी की संभावना नहीं </a></strong>है। अभी ऐसी स्थिति नहीं है कि वे झारखंड छोड़कर दिल्ली की राजनीति करें।</p>
<p>लातेहार के पूर्व विधायक रहे बैजनाथ राम को प्रत्याशी बनाकर मुख्यमंत्री ने एक साथ कई राजनीतिक संदेश देने का प्रयास किया है। स्वर्गीय शिबू सोरेन की सीट पर परिवार के भीतर भी कई दावेदार थे। बहन अंजनी सोरेन का नाम भी प्रमुखता से चर्चा में था और इसको लेकर दबाव की बातें भी सामने आ रही थीं। हालांकि मुख्यमंत्री ने परिवारवाद के आरोपों से बचते हुए उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाया। गुरुजी के करीबी सहयोगी रहे विनोद पांडे की संभावित दावेदारी को भी उन्होंने खारिज कर दिया।</p>
<p>बैजनाथ राम को टिकट देकर मुख्यमंत्री ने राज्य में दलित समीकरण को साधने की भी कोशिश की है। एक दलित चेहरे को राज्यसभा भेजने का निर्णय राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनके नाम की घोषणा होते ही राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई।</p>
<p>राज्यसभा चुनाव को लेकर झामुमो और कांग्रेस के बीच जो तल्खी देखने को मिल रही थी, उस पर अब लगभग विराम लग गया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन यह भी जानते थे कि दूसरी सीट के लिए उनके पास पर्याप्त आंकड़ा नहीं है। ऐसे में केवल उम्मीदवार उतारना पर्याप्त नहीं होता, जीत के लिए आवश्यक समर्थन भी चाहिए। यदि उम्मीदवार हार जाता, तो राजनीतिक रूप से असहज स्थिति बन सकती थी। इसी कारण कांग्रेस नेतृत्व से बातचीत के बाद उन्होंने अपने रुख में बदलाव किया और एक सीट पर ही उम्मीदवार देने का फैसला लिया।</p>
<p>मुख्यमंत्री के इस निर्णय से सरकार पर गहराता राजनीतिक संकट भी टल गया है। फिलहाल झारखंड की राजनीति में किसी नए समीकरण की संभावना नजर नहीं आ रही है और इंडिया गठबंधन ने राहत की सांस ली है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 15:31:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>विश्व पर्यावरण दिवस 2026: युद्ध और प्रदूषण की आग में झुलसती पृथ्वी</title>
                                    <description><![CDATA[विश्व पर्यावरण दिवस पर आधारित यह विशेष लेख जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ युद्धों से पैदा हो रहे पर्यावरणीय संकट की पड़ताल करता है। लेखक मनोज कुमार ने खाड़ी क्षेत्र में जारी संघर्ष, तेल रिसाव, बढ़ते कार्बन उत्सर्जन, समुद्री जैव विविधता पर खतरे और वैश्विक प्रदूषण के प्रभावों को रेखांकित किया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/yudh-aur-pradushan-ki-aag-me-jhulsati-prithvi-world-environment-day-special--most-ctr-headline/article-22788"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/59eb6ce8-495d-43a6-87d5-d118e5412299_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>5 जून को हर वर्ष हम विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं, लेकिन इस बार जश्न का स्वर धीमा है। क्योंकि 2026 का पर्यावरणीय परिदृश्य सिर्फ जलवायु परिवर्तन की चुनौती नहीं, बल्कि मानव निर्मित युद्धों की तबाही भी उजागर कर रहा है।</p>
<p>यूनाइटेड नेशन्स एनवायरनमेंटल प्रोग्राम की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया ने 2025 में रिकॉर्ड स्तर पर गर्मी, बाढ़ और सूखा झेला। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, समुद्र का स्तर बढ़ रहा है। इसी बीच खाड़ी देशों में छिड़े युद्ध ने पर्यावरण संकट और गहरा दिया है। जब हम कार्बन घटाने की बात करते हैं, तो युद्ध के मैदान में टैंक और बमवर्षक विमान कार्बन का पहाड़ उगल रहे हैं। ईरान-इज़राइल-अमेरिका युद्ध ने पर्शियन गल्फ को पर्यावरणीय युद्धक्षेत्र बना दिया है।</p>
<p>तेल टैंकरों पर हमले से करोड़ों बैरल कच्चा तेल समुद्र में उतरेगा। यह 1991 के गल्फ वॉर के 11 मिलियन बैरल रिसाव से भी बड़ा “इकोसाइड” हो सकता है। बहरीन के मैंग्रोव, ओमान के कोरल रीफ और यूएई के हॉक्सबिल कछुए—सभी तेल की परत और पानी के नीचे होने वाले विस्फोटों की जद में हैं। मैंग्रोव नष्ट होंगे, तो “ब्लू कार्बन” का भंडार भी खत्म होगा।</p>
<p>लगभग 9 करोड़ लोगों को पानी देने वाले 300 डिसेलिनेशन प्लांट निशाना बने हैं। हाई-साल्ट ब्राइन से तट पर “डेड ज़ोन” बन रहे हैं। सैन्य विमान, नौसैनिक बेड़े और जलते तेल डिपो आसमान को काला कर रहे हैं। शिपिंग रूट बंद होने से जहाज़ 3,942 नॉटिकल मील का लंबा चक्कर काटकर 70 प्रतिशत अधिक ग्रीनहाउस गैस छोड़ रहे हैं, जिससे वातावरण तेजी से गर्म हो रहा है। प्रदूषण अब सिर्फ स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक खतरा बन गया है।</p>
<p>युद्ध ने दिखा दिया है कि प्रदूषण सरहदों की सीमाएं नहीं मानता। खाड़ी में जलते तेल डिपो का धुआं हजारों किलोमीटर दूर की हवा को प्रभावित कर रहा है। समुद्री तेल रिसाव प्रवाह के साथ हिंद महासागर तक पहुंच सकता है। साथ ही, तेल की कीमत बढ़ने से दक्षिण कोरिया जैसे देश कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को फिर शुरू कर रहे हैं। यह जीरो कार्बन एमिशन और जलवायु संरक्षण लक्ष्यों पर सीधी चोट है। अब यक्ष प्रश्न यह है कि इसका रास्ता क्या है?</p>
<p>इस पर्यावरण दिवस पर हमें समझना होगा कि “आवर पावर, आवर प्लैनेट” का नारा तब तक अधूरा है, जब तक युद्ध को भी प्रदूषण का एक बड़ा स्रोत नहीं माना जाता। पर्यावरण समझौतों में युद्धकालीन उत्सर्जन को छूट नहीं मिलनी चाहिए। समुद्री इको-सिस्टम को रेड क्रॉस की तर्ज पर युद्ध क्षेत्र में भी सुरक्षित घोषित करना होगा। और सबसे जरूरी यह कि ऊर्जा सुरक्षा का मापदंड सिर्फ तेल का भंडार नहीं, बल्कि वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत जैसे सौर, पवन और जल ऊर्जा भी हों, जिन्हें दुश्मन देश की मिसाइलें आसानी से नष्ट न कर सकें।</p>
<p>आज का दिन हमें याद दिलाता है कि पृथ्वी एक है और इसे बचाने की जिम्मेदारी पूरे विश्व समुदाय की है। अगर आज हम युद्ध की आग नहीं बुझाएंगे, तो कल रहने के लिए हमारी पृथ्वी ही नहीं बचेगी।</p>
<p><img width="127" height="158" alt="9k="></img></p>
<p><strong>लेखक : मनोज कुमार</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 15:05:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>डिजिटल ठगी का नया चेहरा: जब बैंकिंग व्यवस्था बन जाती है हथियार</title>
                                    <description><![CDATA[रांची में पकड़े गए कथित साइबर गिरोह ने एक बार फिर डिजिटल बैंकिंग सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गोंडा थाना क्षेत्र के एक फ्लैट से बरामद दर्जनों पासबुक, डेबिट कार्ड, चेकबुक और फर्जी पहचान पत्र इस बात का संकेत हैं कि साइबर अपराध अब केवल फोन कॉल या ओटीपी ठगी तक सीमित नहीं रहा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/digital-fraud-new-face-fake-kyc-cyber-crime-ranchi-network/article-22717"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/986bca7e-0404-43f8-b08b-007456062cf7_samridh_1200x720-(1).jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>आलोक वर्मा</strong></p>
<p>साइबर अपराध का जिक्र होते ही ज़ेहन में अक्सर एक ही तस्वीर उभरती है — कोई अनजान नंबर से फोन आता है, 'बैंक अधिकारी' बनकर OTP मांगी जाती है और खाता खाली हो जाता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस अपराध ने एक ऐसा रूप धारण कर लिया है, जो न केवल ज़्यादा परिष्कृत है, बल्कि उसकी जड़ें बैंकिंग व्यवस्था की बुनियाद तक पहुंच चुकी हैं।</p>
<p>झारखंड की राजधानी रांची से हाल ही में सामने आए एक मामले ने इस खतरे को एक बार फिर उजागर किया है। पुलिस ने गोंडा थाना क्षेत्र के एक साधारण से अपार्टमेंट पर छापा मारा और पांच संदिग्धों को गिरफ्तार किया। बाहर से यह एक सामान्य किराये का फ्लैट लग रहा था, लेकिन भीतर एक सुव्यवस्थित साइबर अपराध नेटवर्क का अड्डा चल रहा था। मौके से बरामद सामग्री ने जांचकर्ताओं को भी चौंका दिया: दर्जनों पासबुक, डेबिट कार्ड, चेकबुक, मोबाइल फोन और अलग-अलग नामों के पहचान दस्तावेज़।</p>
<p>यह सब क्या था? यह था एक सोची-समझी रणनीति का परिणाम, जिसमें फर्जी दस्तावेज़ों के सहारे अलग-अलग नामों से बैंक खाते खुलवाए गए और फिर उन्हें साइबर ठगी से प्राप्त धनराशि के लेनदेन का माध्यम बनाया गया।</p>
<h3><strong>केवाईसी: रक्षा कवच या कमज़ोर कड़ी?</strong></h3>
<p>'नो योर कस्टमर' यानी केवाईसी — बैंकिंग की वह प्रक्रिया, जिसे किसी भी खाताधारक की पहचान सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। नीयत थी जालसाज़ी रोकना, लेकिन विडंबना यह है कि आज यही प्रक्रिया अपराधियों के निशाने पर है।</p>
<p>जब कोई व्यक्ति नकली आधार कार्ड, जाली पैन कार्ड या किसी दूसरे की चुराई हुई जानकारी से बैंक खाता खुलवाता है, तो उसे 'KYC फ्रॉड' कहा जाता है। और यही खाते फिर साइबर अपराध की रीढ़ बन जाते हैं। उनमें ठगी का पैसा जमा होता है, एक से दूसरे में ट्रांसफर होता है और अंततः असली अपराधी तक पहुंचते-पहुंचते लेन-देन की परतें इतनी उलझ जाती हैं कि जांच एजेंसियां भी भटक जाती हैं।</p>
<p>"ये खाते डिजिटल मनी लॉन्ड्रिंग के 'मनी म्यूल' हैं, जिनके ज़रिए अपराध की कमाई को वैध रूप देने की कोशिश होती है। जितने ज़्यादा खाते, उतनी ज़्यादा परतें और उतनी ही मुश्किल जांच।"</p>
<h4><strong>वीडियो केवाईसी की चुनौती: आंखें देखती हैं, कैमरा धोखा खाता है</strong></h4>
<p>डिजिटल बैंकिंग के युग में पहचान सत्यापन के लिए वीडियो-आधारित केवाईसी का चलन बढ़ा है। बैंक और वित्तीय संस्थान अब ग्राहक को पलक झपकाने, सिर घुमाने या मुस्कुराने जैसी 'लाइवनेस जांच' के जरिये यह सुनिश्चित करने की कोशिश करते हैं कि सामने असली इंसान है, कोई रिकॉर्डेड वीडियो नहीं। लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यह प्रणाली पर्याप्त परिष्कृत न हो, तो उसे भी चकमा दिया जा सकता है।</p>
<p>यही कारण है कि अब 'एडवांस्ड लाइवनेस चेक' तकनीकों का विकास तेज़ी से हो रहा है, जो केवल हावभाव नहीं, बल्कि गहरे बायोमेट्रिक संकेतों को परखती हैं। रांची प्रकरण जैसे मामले इस तकनीकी दौड़ में और तेज़ी की मांग करते हैं।</p>
<h4><strong>संगठित नेटवर्क, बिखरे हुए सुराग</strong></h4>
<p>30 से ज़्यादा वर्षों की पत्रकारिता में मैंने विभिन्न आपराधिक घटनाओं को कवर करते हुए यह समझा है कि संगठित अपराध हमेशा व्यवस्था की सबसे कमज़ोर कड़ी को निशाना बनाता है। रांची का यह गिरोह भी वैसा ही था — एक किराये के मकान में बैठकर देशभर में फैले पीड़ितों के बैंक खातों पर हाथ साफ करना।</p>
<p>जांच एजेंसियां अब वित्तीय लेन-देन की श्रृंखला का विश्लेषण कर यह पता लगाने में जुटी हैं कि नेटवर्क में और कितने लोग शामिल थे, धनराशि किन-किन खातों से होकर गुज़री और अंतिम लाभार्थी तक वह किस रास्ते पहुंची। यह एक जटिल डिजिटल जासूसी है, जिसमें हर लेन-देन एक सुराग है।</p>
<h4><strong>नागरिक सावधान: आपकी जागरूकता ही आपकी सुरक्षा है</strong></h4>
<p>तकनीकी और कानूनी उपायों के साथ-साथ आम नागरिक की सतर्कता केवाईसी फ्रॉड के खिलाफ सबसे कारगर हथियार है। कुछ बातें हमेशा याद रखें:</p>
<p>आधार, पैन या बैंक स्टेटमेंट जैसे दस्तावेज़ कभी भी किसी अनजान व्यक्ति या अनधिकृत प्लेटफॉर्म पर साझा न करें। सोशल मीडिया और व्हाट्सएप पर इनकी तस्वीर भेजना भी जोखिम भरा हो सकता है। केवाईसी अपडेट के लिए हमेशा बैंक की आधिकारिक वेबसाइट, ऐप या शाखा का ही उपयोग करें — किसी कॉल या लिंक के आधार पर नहीं। अपने खाते की हर गतिविधि पर नज़र रखें। बैंकिंग अलर्ट चालू रखें और कोई भी अज्ञात लेन-देन दिखे, तो तुरंत बैंक और साइबर हेल्पलाइन (1930) को सूचित करें।</p>
<h4><strong>व्यवस्था की ज़िम्मेदारी</strong></h4>
<p>रांची प्रकरण यह भी याद दिलाता है कि बैंकों और वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही कम नहीं होनी चाहिए। फर्जी दस्तावेज़ों पर खाते खुलना यह दर्शाता है कि केवाईसी प्रक्रिया में कहीं न कहीं चूक हुई है। नियामक संस्थाओं को चाहिए कि वे डिजिटल सत्यापन के मानक कड़े करें, बैंक कर्मचारियों को संदिग्ध दस्तावेज़ों की पहचान के लिए बेहतर प्रशिक्षण दें और 'मनी म्यूल' खातों की पहचान के लिए AI-आधारित लेन-देन निगरानी तंत्र को मज़बूत करें।</p>
<p>डिजिटल भारत का सपना तभी साकार होगा, जब डिजिटल सुरक्षा उतनी ही मज़बूत हो। रांची में पकड़ा गया कथित गिरोह उस बड़े सच की छोटी-सी झलक है कि साइबर अपराध अब कमरे में बंद नहीं है, वह </p>
<p>बैंकिंग व्यवस्था की नसों में दौड़ रहा है। इसे रोकने के लिए तकनीक, कानून और नागरिक जागरूकता — तीनों का एक साथ होना जरूरी </p>
<p>है।</p>
<p><img class="xhtitgo xh8yej3 x5yr21d _ao3e" src="https://media-ccu2-2.cdn.whatsapp.net/v/t61.24694-24/696498940_1495975811912113_3080514701079527125_n.jpg?ccb=11-4&amp;oh=01_Q5Aa4gHuCqCDLT2NJTG6y4sUP-0u7SpMtD5k4klAD3nJl9ycdw&amp;oe=6A2E50D6&amp;_nc_sid=5e03e0&amp;_nc_cat=108" alt="" width="107" height="107"></img><strong>लेखक- आलोक वर्मा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 04 Jun 2026 14:46:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बशीर बद्र: वो शायर जो हमारे टूटे दिल की बोली बोल गया</title>
                                    <description><![CDATA[उर्दू शायरी के मशहूर शायर बशीर बद्र ने अपनी सरल, संवेदनशील और दिल को छू लेने वाली ग़ज़लों से करोड़ों लोगों के दिलों में जगह बनाई। उनकी शायरी मोहब्बत, रिश्तों, यादों और इंसानियत की गहरी समझ को बयां करती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/bashir-badr-urdu-shayar-ghazal-mohabbat-dard-article/article-22521"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/1cc0dbaa-25cf-4190-8192-35dfde11c57b_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>आलेख: संजय कुमार धीरज</strong></p>
<p>उर्दू शायरी में कुछ लोग शायर नहीं होते, मरहम होते हैं। बशीर बद्र भी वैसे ही थे। उनकी ग़ज़लें पढ़ो, तो लगता है कोई अपना सामने बैठा है और धीरे से कह रहा है— <em>"मैं समझता हूं, मेरे साथ भी यही हुआ था।"</em></p>
<p>वे बड़े-बड़े लफ़्ज़ों के पीछे नहीं भागे। उन्होंने वही लिखा, जो हम सब रोज़ जीते हैं— मोहब्बत में मिला धोखा, दोस्ती में आई दूरी, घर का जलना और शहर का बदलना। दर्द को भी उन्होंने इतनी तहज़ीब से कहा कि सुनने वाला रोए नहीं, बस एक लंबी सांस लेकर रह जाए।</p>
<p>15 फरवरी 1935 को अयोध्या में जन्मे बशीर बद्र का असली नाम सैयद मोहम्मद बशीर था। उन्होंने अलीगढ़ से शिक्षा प्राप्त की और अध्यापन कार्य भी किया। लेकिन उनकी असली पहचान उनकी ग़ज़लों से बनी।</p>
<p>उस दौर में शायरी आम लोगों से दूर होती जा रही थी। बड़े-बड़े शायर ऐसी बातें लिखते थे, जो आम आदमी के सिर के ऊपर से निकल जाती थीं। बशीर बद्र ने शायरी को आम आदमी तक पहुंचाया। उन्होंने आसान लफ़्ज़ों में बड़ी बातें कही।</p>
<blockquote>
<p><strong>"कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,</strong><br /><strong>ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो।"</strong></p>
</blockquote>
<p>यह सिर्फ एक शेर नहीं, बल्कि आधुनिक शहरी जीवन का आईना है। फ्लैट पास-पास हैं, लेकिन दिलों में दूरियां बढ़ती जा रही हैं।</p>
<p>बशीर बद्र की मोहब्बत फिल्मों वाली नहीं थी। उनकी मोहब्बत में इंतज़ार था, बिछड़ना था, यादें थीं; लेकिन नफ़रत नहीं थी।</p>
<blockquote>
<p><strong>"उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,</strong><br /><strong>न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।"</strong></p>
</blockquote>
<p>आदमी के पास आखिर में बचता क्या है? बस यादें। शायद इसी एहसास ने उन्हें यह अमर शेर लिखने पर मजबूर किया—</p>
<blockquote>
<p><strong>"कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी, यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता।"</strong></p>
</blockquote>
<p>उन्होंने कभी किसी को कठघरे में खड़ा नहीं किया, बल्कि समझने की कोशिश की। यही उन्हें सबसे अलग बनाता है।</p>
<p>साल 1984 में भोपाल दंगों के दौरान उनका घर जला दिया गया। उनकी किताबें, पांडुलिपियां और वर्षों की मेहनत राख हो गई। इसके बाद उनकी शायरी का दर्द और गहरा हो गया।</p>
<blockquote>
<p><strong>"लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,</strong><br /><strong>तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।"</strong></p>
</blockquote>
<p>यह शेर आज भी हर दंगे और हिंसा पर करारा सवाल खड़ा करता है।</p>
<p>बशीर बद्र ने कभी कठिन शब्दों से पाठकों को प्रभावित करने की कोशिश नहीं की। वे दोस्त की तरह दिल की बात कहते थे।</p>
<blockquote>
<p><strong>"मैं चुप रहा कि ज़हर ये अंदर ही मर जाए,</strong><br /><strong>लेकिन ज़हर था कि मुझी में उतर गया।"</strong></p>
</blockquote>
<p>आज सबके पास 5G है, लेकिन बात करने के लिए कोई नहीं। सोशल मीडिया पर हजारों स्टेटस हैं, मगर भीतर गहरा अकेलापन है। ऐसे दौर में बशीर बद्र की शायरी इंसान को इंसान से जोड़ती है।</p>
<p>वे सिखाते हैं कि टूटना गुनाह नहीं है, रोना कमजोरी नहीं है। और जब समाज में नफ़रत सामान्य होती जा रही हो, तब उनका यह शेर और भी प्रासंगिक हो जाता है—</p>
<blockquote>
<p><strong>"दुश्मनी जम कर करो, लेकिन ये गुंजाइश रहे,</strong><br /><strong>जब कभी हम दोस्त हो जाएँ, तो शर्मिंदा न हों।"</strong></p>
</blockquote>
<p>यह सिर्फ शायरी नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है।</p>
<p>उनकी शायरी पढ़कर लगता नहीं कि हम कोई किताब पढ़ रहे हैं, बल्कि ऐसा लगता है कि किसी ने हमें गले लगा लिया हो। जब दुनिया शोर मचाती है, तब बशीर बद्र की ग़ज़लें धीरे से कहती हैं— <em>"मैं हूं ना।"</em></p>
<p>इसीलिए वे सिर्फ उर्दू के शायर नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के जज़्बात हैं।</p>
<blockquote>
<p><strong>"मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला,</strong><br /><strong>अगर गले नहीं मिलता, तो हाथ भी न मिला।"</strong></p>
</blockquote>
<p>बशीर बद्र हमें यह सिखाकर गए कि शब्दों से भी घावों पर मरहम लगाया जा सकता है। जब सब रास्ते बंद लगें, तो उनकी कोई ग़ज़ल खोल लेना। टूटे हुए दिल का सबसे मुलायम मरहम वहीं मिलेगा।</p>
<p>वे चले गए, लेकिन अपनी ग़ज़लें हमारे लिए छोड़ गए, ताकि जब भी ज़िंदगी की शाम आए, हम खुद को अकेला महसूस न करें।</p>
<p><strong>(लेखक समृद्ध झारखंड के ब्यूरो और युवा पत्रकार संगठन के सदस्य हैं।)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>स्टोरी </category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 31 May 2026 16:23:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं, सुरक्षा भी चाहिए: झारखंड के साहित्यकारों और कलाकारों के लिए कल्याण कोष की मांग</title>
                                    <description><![CDATA[झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत बनाने वाले साहित्यकारों और लोक कलाकारों की सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। खोरठा साहित्यकार स्व. सुरेश कुमार विश्वकर्मा ‘सुकुमार’ और पद्मश्री डॉ. गिरिधारी राम गौंझू जैसे सांस्कृतिक व्यक्तित्वों के संघर्ष ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या समाज और व्यवस्था केवल सम्मान तक सीमित है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/jharkhand-sahityakar-kalakaar-kalyan-kosh-ki-anivaryata/article-22489"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/f77ca8e4-0b3f-40b3-96a3-378db75bc4ad_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>झारखंड की पहचान केवल उसकी खनिज संपदा, प्राकृतिक सौंदर्य या औद्योगिक विकास से नहीं है। इस राज्य की आत्मा उसकी लोकभाषाओं, लोकगीतों, लोककथाओं, आदिवासी एवं सदानी सांस्कृतिक परंपराओं और उन्हें जीवित रखने वाले साहित्यकारों एवं कलाकारों में बसती है। यही लोग झारखंड की अस्मिता के वास्तविक प्रहरी हैं। विडंबना यह है कि जिन लोगों ने अपना संपूर्ण जीवन समाज और संस्कृति के संरक्षण में लगा दिया, उन्हें अक्सर जीवन के अंतिम पड़ाव में उपेक्षा, आर्थिक संकट और असुरक्षा का सामना करना पड़ता है।</p>
<p>हाल ही में खोरठा भाषा के सुप्रसिद्ध साहित्यकार, लोक कलाकार और स्वर कोकिल स्वर्गीय सुरेश कुमार विश्वकर्मा ‘सुकुमार’ के जीवन से जुड़ी पीड़ादायक परिस्थितियों ने पूरे समाज को झकझोर दिया। जिनकी आवाज़ में झारखंड की मिट्टी की सोंधी महक थी, जिनके गीतों ने गांव-देहात की संवेदनाओं को राष्ट्रीय मंच तक पहुँचाया, जिनकी रचनाएँ विश्वविद्यालयों में अध्ययन का विषय बनीं, वही साहित्यकार गंभीर बीमारी के समय आर्थिक तंगी के कारण समुचित इलाज के लिए संघर्ष करते रहे।</p>
<p>“मांदर बाजे रे”, “मांय गो मांय” जैसे अनेक लोकप्रिय गीतों के रचयिता सुकुमार ने केवल गीत नहीं लिखे, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक चेतना को स्वर दिया। उन्होंने खोरठा भाषा को घर-घर पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी रचनाओं ने नई पीढ़ी को अपनी भाषा और संस्कृति से जोड़ने का कार्य किया। लेकिन आज यह प्रश्न पूरे समाज के सामने खड़ा है कि क्या हम अपनी सांस्कृतिक धरोहरों के प्रति केवल भावनात्मक सम्मान तक सीमित हैं? क्या उनके जीवन और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी भी हमारी नहीं है?</p>
<p>यह घटना कोई अपवाद नहीं है। इससे पूर्व झारखंडी भाषाओं और संस्कृति के महान विद्वान, शोधकर्ता एवं पद्मश्री सम्मान से अलंकृत डॉ. गिरिधारी राम गौंझू भी कोविड-19 महामारी के दौरान स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए संघर्ष करते दिखाई दिए थे। जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन नागपुरी भाषा, लोक साहित्य और झारखंडी सांस्कृतिक इतिहास के संरक्षण में समर्पित कर दिया, उन्हें भी कठिन समय में अपेक्षित व्यवस्था और सहयोग प्राप्त नहीं हो सका। यह केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं थी, बल्कि हमारी सांस्कृतिक नीतियों और सामाजिक संवेदनशीलता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न था।</p>
<p>सवाल यह है कि हम अपने कलाकारों और साहित्यकारों को किस दृष्टि से देखते हैं? जब वे मंच पर होते हैं, हम उनका सम्मान करते हैं। जब उन्हें पुरस्कार मिलता है, हम गर्व महसूस करते हैं। जब उनकी रचनाएँ लोकप्रिय होती हैं, हम तालियाँ बजाते हैं। लेकिन जब वही लोग बीमारी, आर्थिक संकट या वृद्धावस्था की चुनौतियों से जूझते हैं, तब समाज और व्यवस्था का सहयोग अक्सर अपर्याप्त दिखाई देता है।</p>
<p>दुनिया के विकसित समाज अपने साहित्यकारों, कलाकारों और सांस्कृतिक कर्मियों को राष्ट्रीय धरोहर मानते हैं। उनके लिए स्वास्थ्य सुरक्षा, पेंशन, आकस्मिक सहायता और विशेष कल्याण योजनाएँ संचालित की जाती हैं। क्योंकि वे समझते हैं कि संस्कृति केवल भवनों, स्मारकों या दस्तावेजों में नहीं बसती, बल्कि उन जीवित व्यक्तित्वों में बसती है, जो उसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाते हैं।</p>
<p>झारखंड जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य में यह और भी अधिक आवश्यक हो जाता है। यहाँ दर्जनों लोकभाषाएँ, सैकड़ों लोककलाएँ और हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक परंपराएँ जीवित हैं। यदि इन परंपराओं के वाहक ही असुरक्षित रहेंगे, तो हमारी सांस्कृतिक विरासत भी धीरे-धीरे कमजोर होती जाएगी।</p>
<p>आज आवश्यकता इस बात की है कि राज्य सरकार, विश्वविद्यालय, सांस्कृतिक संस्थाएँ, उद्योग जगत और समाज मिलकर एक व्यापक <strong>“झारखंड साहित्यकार एवं कलाकार कल्याण कोष”</strong> की स्थापना करें। इसके अंतर्गत वरिष्ठ साहित्यकारों और कलाकारों के लिए स्वास्थ्य बीमा, आपातकालीन चिकित्सा सहायता, मासिक सम्मान राशि, पेंशन तथा पारिवारिक सुरक्षा की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। साथ ही, ऐसे सांस्कृतिक व्यक्तित्वों का एक समग्र डेटाबेस तैयार किया जाना चाहिए, ताकि आवश्यकता पड़ने पर तत्काल सहायता उपलब्ध कराई जा सके।</p>
<p>यह केवल सरकारी दायित्व नहीं है। समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सम्मानित करने के साथ-साथ हमें उन लोगों के जीवन की वास्तविक आवश्यकताओं के प्रति भी संवेदनशील होना होगा। सम्मान तभी सार्थक है, जब वह व्यक्ति के जीवन में सुरक्षा और गरिमा भी सुनिश्चित करे।</p>
<p>सुकुमार जी की पीड़ा और डॉ. गिरिधारी राम गौंझू जी के संघर्ष हमें आत्ममंथन का अवसर देते हैं। ये घटनाएँ हमें यह सोचने पर विवश करती हैं कि कहीं हम अपने सांस्कृतिक नायकों को केवल स्मृतियों और श्रद्धांजलियों तक सीमित तो नहीं कर रहे हैं? क्या हम उनके जीवित रहते हुए उनके योगदान का वास्तविक सम्मान कर पा रहे हैं?</p>
<p>झारखंड की सांस्कृतिक अस्मिता को बचाने के लिए केवल गीतों, पुस्तकों और स्मारकों का संरक्षण पर्याप्त नहीं है। उन लोगों का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है, जिन्होंने अपने जीवन की तपस्या से इन सांस्कृतिक धरोहरों को जीवित रखा है।</p>
<p>यदि हम अपने साहित्यकारों, लोक कलाकारों और सांस्कृतिक कर्मियों की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाए, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे अवश्य पूछेंगी कि जिन लोगों ने हमारी पहचान को बचाया, हम उन्हें क्यों नहीं बचा सके?</p>
<p>सुकुमार जी और झारखंड की सांस्कृतिक चेतना को समर्पित सभी महान विभूतियों के प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम ऐसी व्यवस्था का निर्माण करें, जहाँ किसी साहित्यकार या कलाकार को इलाज, सम्मान और जीवन-निर्वाह के लिए संघर्ष न करना पड़े।</p>
<p><img width="79" height="79" alt="Y1iihuBQCAQCAQCgUAgEAgEAg4CP8pa3GIAQbqtAAAAAElFTkSuQmCC"></img></p>
<p><strong>(डॉ. रणधीर कुमार)</strong></p>
<p>लेखकप्रसिद्द शिक्षाविद , साहित्यकार एवं मानवाधिकार विशेषज्ञ हैं ।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 18:41:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Climate कहानी: El Niño की आहट से डरा मानसून 2026, भारत के सामने सूखा, गर्मी और पानी संकट का खतरा</title>
                                    <description><![CDATA[भारत में मानसून 2026 को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। मौसम वैज्ञानिकों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुसार एल नीनो की स्थिति तेजी से विकसित हो रही है, जिससे देश में सामान्य से कम बारिश, भीषण गर्मी, जल संकट और कृषि उत्पादन पर असर पड़ सकता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/el-nino-2026-india-monsoon-drought-heatwave-water-crisis/article-22481"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/publicdomainpictures-beach-84598-1024x1536_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">2026 की गर्मियों में भारत सिर्फ गर्मी से नहीं जूझ रहा। इस बार आसमान भी बेचैन है, समुद्र भी। मौसम की दुनिया में चल रही हलचल का असर खेतों से लेकर बिजली, पानी, खाद्य सुरक्षा और लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी तक पहुंच सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">साल की शुरुआत कमजोर ला नीना से हुई थी। अभी दुनिया ENSO न्यूट्रल स्थिति में है, लेकिन प्रशांत महासागर के भीतर तेजी से बदलाव हो रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि दुनिया एक मजबूत एल नीनो की ओर बढ़ रही है। यदि यही रफ्तार बनी रही, तो 2026-27 में दुनिया "Very Strong El Niño" देख सकती है।</p>
<p><span style="background-color:rgb(236,240,241);"><a style="background-color:rgb(236,240,241);" href="https://samridhjharkhand.com/news/national/is-saal-monsoon-kamzor-rahne-ke-asar-kai-raajyon-mein-badhegi-garmi-chalegi-loo/article-22442"><strong>यह भी पढ़ें: इस साल कमजोर रहेगा मानसून! IMD की चेतावनी- कई राज्यों में पड़ेगी भीषण गर्मी</strong></a></span></p>
<p class="isSelectedEnd">भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कम रह सकता है। अनुमान है कि बारिश Long Period Average (870 मिमी) का करीब 90 प्रतिशत रह सकती है, जिसमें ±4 प्रतिशत की त्रुटि सीमा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">IMD के प्रॉबेबिलिटी फोरकास्ट में 60 प्रतिशत संभावना "Deficient Rainfall" की है, जबकि 24 प्रतिशत संभावना "Below Normal Rainfall" की बताई गई है। इसका सीधा अर्थ है कि भारत सामान्य और कमजोर मानसून की सीमा रेखा पर खड़ा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">असल चिंता उस अस्थिरता की है, जो एक विकसित होते एल नीनो के साथ आती है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार एल नीनो कोई साधारण समुद्री घटना नहीं, बल्कि पूरी पृथ्वी के मौसम तंत्र को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया है। इसका असर भारतीय मानसून पर भी पड़ता है, जिससे बारिश कमजोर हो सकती है और लंबे "ब्रेक मानसून" की स्थिति बन सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd">NOAA के अनुसार मई से जुलाई 2026 के बीच एल नीनो बनने की संभावना 82 प्रतिशत है, जबकि दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 तक इसके बने रहने की संभावना 96 प्रतिशत तक पहुंचती है। वैज्ञानिक इसे गंभीर संकेत मान रहे हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">इतिहास भी चिंता बढ़ाता है। 1950 के बाद दुनिया ने केवल चार "Super El Niño" देखे हैं—1982-83, 1991-92, 1997-98 और 2015-16। इन वर्षों में सूखा, भीषण गर्मी, जंगल की आग और चरम मौसमी घटनाएं देखने को मिली थीं।</p>
<p class="isSelectedEnd">विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 2026 में एल नीनो मजबूत होता है, तो भारत में वर्षा वितरण असंतुलित हो सकता है। कहीं अत्यधिक बारिश तो कहीं सूखे जैसी स्थिति बन सकती है। उत्तर-पश्चिम भारत में उमस भरी हीटवेव का खतरा भी बढ़ सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">भारत की लगभग 52 प्रतिशत खेती आज भी वर्षा पर निर्भर है। देश के करीब 40 प्रतिशत खाद्य उत्पादन का संबंध सीधे मानसून से है। कमजोर मानसून का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भूजल स्तर, जलाशयों, जलविद्युत उत्पादन और शहरी जल आपूर्ति पर भी पड़ेगा।</p>
<p class="isSelectedEnd">विशेषज्ञों ने रेन वाटर हार्वेस्टिंग, एक्वीफर रिचार्ज, ड्रिप सिंचाई, फसल विविधीकरण और जल संरक्षण उपायों को प्राथमिकता देने की सलाह दी है। किसानों को धान जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसलों के बजाय दलहन, तिलहन और मोटे अनाजों की ओर बढ़ने की जरूरत बताई गई है।</p>
<p class="isSelectedEnd">हालांकि उम्मीद की एक किरण हिंद महासागर में भी दिखाई दे रही है। Indian Ocean Dipole (IOD) का पॉजिटिव फेज कई बार एल नीनो के प्रभाव को कम कर देता है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एल नीनो बहुत मजबूत हुआ, तो IOD अकेले उसकी भरपाई नहीं कर पाएगा।</p>
<p class="isSelectedEnd">भारत में मानसून केवल मौसम नहीं है। यह कृषि, अर्थव्यवस्था, जल सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़ा हुआ है। इसलिए "Very Strong El Niño" की चेतावनी सिर्फ वैज्ञानिक शब्द नहीं, बल्कि आने वाले समय की गंभीर चुनौती का संकेत है।</p>
<p>आने वाले महीनों में भारत को हर बूंद पानी, हर फसल, हर हीटवेव और हर मौसम चेतावनी को पहले से अधिक गंभीरता से लेना पड़ सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 16:21:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>धर्मस्थल विवाद: आरोप, आस्था, जांच और न्याय के बीच खड़े कठिन सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[कर्नाटक के प्रसिद्ध धर्मस्थल से जुड़े गंभीर आरोपों और उसके बाद हुई जांच ने पूरे देश में बहस छेड़ दी। महिलाओं और नाबालिग लड़कियों के कथित शोषण, हत्या और गुमशुदगी से जुड़े आरोपों के बाद विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया। बाद में आरोप लगाने वाले व्यक्ति की गिरफ्तारी ने मामले को नया मोड़ दे दिया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/national/dharmasthala-controversy-faith-accountability-investigation-analysis/article-22478"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/44218a2d-5f37-4cf4-b311-27b3887effda_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>राजकुमार अग्रवाल</strong></p>
<h4><strong>जब आस्था के केंद्र पर सवाल उठते हैं</strong></h4>
<p>भारत में मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं होते। वे आस्था, संस्कृति, दान, सामाजिक सेवा और करोड़ों लोगों की भावनाओं के केंद्र होते हैं। जब किसी प्रसिद्ध धार्मिक स्थल का नाम हत्या, बलात्कार, लापता लोगों या सामूहिक कब्रों जैसे आरोपों के साथ जुड़ता है, तो मामला केवल एक आपराधिक जांच नहीं रह जाता, बल्कि पूरे समाज के सामने एक नैतिक प्रश्न बन जाता है।</p>
<p>कर्नाटक के प्रसिद्ध धर्मस्थल मंदिर से जुड़े आरोपों ने 2025 में पूरे देश को झकझोर दिया। आरोप इतने गंभीर थे कि उनमें वर्षों तक महिलाओं और लड़कियों के यौन शोषण, हत्या और शवों को गुप्त रूप से दफनाने जैसी बातें शामिल थीं। इन आरोपों के बाद राज्य सरकार ने विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया।</p>
<p>लेकिन कुछ ही सप्ताह बाद कहानी ने नया मोड़ ले लिया। आरोप लगाने वाले व्यक्ति सी.एन. चिन्नैया को ही शपथ पर झूठ बोलने और कथित रूप से भ्रामक साक्ष्य प्रस्तुत करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।</p>
<p>यहीं से सवाल और भी जटिल हो गए।</p>
<h4><strong>धर्मस्थल क्या है और उसकी सामाजिक पहुंच कितनी बड़ी है?</strong></h4>
<p>धर्मस्थल दक्षिण भारत के सबसे प्रसिद्ध धार्मिक केंद्रों में से एक माना जाता है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। यह केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, दान और सामाजिक गतिविधियों से भी जुड़ा रहा है।</p>
<p>इसी कारण, जब इस स्थान से जुड़े आरोप सामने आए, तो उनका प्रभाव पूरे देश में महसूस किया गया। सोशल मीडिया, टीवी चैनलों और राजनीतिक मंचों पर बहस शुरू हो गई।</p>
<h4><strong>आरोपों की शुरुआत कैसे हुई?</strong></h4>
<p>जुलाई 2025 में एक पूर्व सफाई कर्मचारी ने दावा किया कि उसने लगभग दो दशकों तक ऐसे शवों को दफनाने में मजबूरी में भाग लिया, जिनमें कई महिलाएं और नाबालिग लड़कियां शामिल थीं। उसने आरोप लगाया कि इन शवों पर हिंसा और यौन उत्पीड़न के निशान दिखाई देते थे।</p>
<p>उसके अनुसार:</p>
<p>• कई शव महिलाओं के थे।<br />• कुछ शव कथित रूप से नाबालिग लड़कियों के थे।<br />• शवों को अलग-अलग स्थानों पर दफनाया गया।<br />• उसे धमकाकर यह काम कराया जाता था।</p>
<p>इन दावों ने राष्ट्रीय स्तर पर सनसनी पैदा कर दी।</p>
<h4><strong>क्या वास्तव में सैकड़ों शव मिले थे?</strong></h4>
<p>यही वह बिंदु है, जहां तथ्य और अफवाहें अलग-अलग हो जाती हैं।</p>
<p>सोशल मीडिया पर "सैकड़ों लड़कियों के शव बरामद" होने के दावे तेजी से फैल गए। लेकिन जांच एजेंसियों की ओर से ऐसा कोई आधिकारिक निष्कर्ष सामने नहीं आया कि सैकड़ों शव मिले हों या सैकड़ों हत्याएं सिद्ध हो गई हों।</p>
<p>SIT ने कई स्थानों पर खुदाई की और कुछ मानव अवशेष मिलने की जानकारी सामने आई, लेकिन जांच अधिकारियों ने यह नहीं कहा कि आरोपों में बताए गए सैकड़ों बलात्कार और हत्याएं साबित हो गई हैं।</p>
<p>इसलिए "सैकड़ों शव बरामद" को स्थापित तथ्य की तरह प्रस्तुत करना गलत होगा।</p>
<h4><strong>फिर जांच में क्या हुआ?</strong></h4>
<p>कर्नाटक सरकार ने विशेष जांच दल का गठन किया। SIT ने:</p>
<p>• विभिन्न स्थानों पर खुदाई करवाई।<br />• कथित गवाहों से पूछताछ की।<br />• पुराने गुमशुदगी मामलों की समीक्षा शुरू की।<br />• मानव अवशेषों को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा।</p>
<p>शुरुआत में ऐसा लगा कि जांच बहुत बड़े खुलासे की ओर बढ़ रही है।</p>
<p>लेकिन अगस्त 2025 में स्थिति अचानक बदल गई।</p>
<h4><strong>चिन्नैया की गिरफ्तारी</strong></h4>
<p>SIT ने आरोप लगाने वाले चिन्नैया से लंबी पूछताछ की।</p>
<p>जांच अधिकारियों के अनुसार:</p>
<p>• उसके बयानों में कई विरोधाभास मिले।<br />• कुछ दस्तावेज संदिग्ध पाए गए।<br />• अदालत में प्रस्तुत एक खोपड़ी को लेकर भी सवाल उठे।<br />• उस पर झूठी गवाही और जालसाजी से जुड़े आरोप लगाए गए।</p>
<p>इसके बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया।</p>
<p>यह घटना पूरे मामले का सबसे बड़ा मोड़ बन गई।</p>
<h4><strong>क्या गिरफ्तारी से पूरा मामला खत्म हो गया?</strong></h4>
<p>नहीं।</p>
<p>यही सबसे महत्वपूर्ण बात है।</p>
<p>SIT ने स्वयं कहा कि जांच जारी रहेगी। जांच एजेंसियों ने यह नहीं कहा कि सारे आरोप स्वतः झूठे सिद्ध हो गए हैं। बल्कि जांच को आगे बढ़ाने और विभिन्न गुमशुदगी मामलों की समीक्षा जारी रखने की बात कही गई।</p>
<p>इसलिए दो अतिवादी निष्कर्षों से बचना जरूरी है:</p>
<ol start="1">
<li>
<p>यह मान लेना कि सभी आरोप पूरी तरह सिद्ध हो चुके थे।</p>
</li>
<li>
<p>यह मान लेना कि शिकायतकर्ता की गिरफ्तारी से पूरा मामला स्वतः झूठा हो गया।</p>
</li>
</ol>
<p>कानून दोनों स्थितियों में साक्ष्य मांगता है।</p>
<h4><strong>समाज के सामने सबसे बड़ा सवाल</strong></h4>
<p>इस पूरे प्रकरण ने एक असहज प्रश्न खड़ा किया है।</p>
<p>यदि किसी धार्मिक संस्था पर गंभीर आरोप लगते हैं, तो क्या समाज उतनी ही गंभीरता से प्रतिक्रिया देता है, जितनी किसी राजनीतिक या कॉर्पोरेट संस्था के मामले में देता है?</p>
<p>भारत में धार्मिक प्रतिष्ठानों का सामाजिक प्रभाव बहुत बड़ा है।</p>
<p>ऐसे में कई बार:</p>
<p>• भक्त सवाल पूछने से डरते हैं।<br />• विरोध करने वालों पर पक्षपात के आरोप लगते हैं।<br />• राजनीतिक दल धार्मिक भावनाओं के कारण सावधानी बरतते हैं।<br />• मीडिया भी संतुलन साधने की कोशिश करता है।</p>
<p>परंतु किसी भी लोकतंत्र में जांच और सवाल पूछना आस्था का विरोध नहीं होता।</p>
<h4><strong>पुजारी, सत्ता और प्रभाव का जाल</strong></h4>
<p>भारत के इतिहास में अनेक धार्मिक संस्थानों ने समाज सेवा की है।</p>
<p>लेकिन यह भी सच है कि कुछ मामलों में धार्मिक पदों पर बैठे लोगों पर गंभीर अपराधों के आरोप लगे हैं।</p>
<p>देश में अलग-अलग समय पर कई स्वयंभू धर्मगुरु और धार्मिक व्यक्तित्व:</p>
<p>• बलात्कार मामलों में दोषी ठहराए गए,<br />• हत्या के मामलों में सजा पाए,<br />• वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों का सामना करते रहे।</p>
<p>इन मामलों ने यह दिखाया कि धार्मिक पहचान किसी को कानून से ऊपर नहीं बना सकती।</p>
<p>किसी भी पुजारी, साधु, संत या धर्मगुरु का मूल्यांकन उसके पद से नहीं, बल्कि उसके कार्यों से होना चाहिए।</p>
<h4><strong>अदालतें और न्याय व्यवस्था पर उठते सवाल</strong></h4>
<p>जब कोई बड़ा मामला वर्षों तक अनसुलझा रहता है, तो आम नागरिक के मन में कई प्रश्न पैदा होते हैं।</p>
<p>लोग पूछते हैं:</p>
<p>• यदि अपराध हुए, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?<br />• यदि अपराध नहीं हुए, तो अफवाहें क्यों फैलती रहीं?<br />• गुमशुदगी मामलों का क्या हुआ?<br />• जांच इतनी लंबी क्यों चली?</p>
<p>लेकिन अदालतें भावनाओं से नहीं, साक्ष्यों से निर्णय देती हैं।</p>
<p>यदि पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं, तो अदालत दोषसिद्धि नहीं कर सकती। यदि साक्ष्य हैं, तो देर-सवेर न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ती है।</p>
<p>न्यायपालिका की आलोचना संभव है, लेकिन किसी भी जज या अदालत को बिना प्रमाण "अंधा" कहना समस्या का समाधान नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायिक समीक्षा, अपील और जांच की प्रक्रियाएं इसी उद्देश्य से बनाई गई हैं।</p>
<h4><strong>राजनीतिक संबंधों का प्रश्न</strong></h4>
<p>धर्मस्थल प्रकरण के दौरान सोशल मीडिया पर अनेक दावे किए गए कि प्रभावशाली नेताओं और धार्मिक संस्थाओं के बीच करीबी संबंध हैं।</p>
<p>भारत में लगभग सभी बड़े धार्मिक स्थलों पर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता जाते रहे हैं। यह लोकतांत्रिक राजनीति का सामान्य हिस्सा है।</p>
<p>लेकिन किसी नेता का किसी धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होना अपने आप में किसी अपराध की साझेदारी का प्रमाण नहीं बनता।</p>
<p>यदि किसी मामले में राजनीतिक संरक्षण का आरोप है, तो उसे भी साक्ष्यों के आधार पर ही सिद्ध करना होगा।</p>
<h4><strong>लापता महिलाएं और अनुत्तरित प्रश्न</strong></h4>
<p>इस मामले का सबसे संवेदनशील पक्ष महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा से जुड़ा है।</p>
<p>यदि किसी क्षेत्र में:</p>
<p>• बड़ी संख्या में गुमशुदगी के मामले हैं,<br />• संदिग्ध मौतें हुई हैं,<br />• यौन अपराधों की शिकायतें हैं,</p>
<p>तो उनकी निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है।</p>
<p>क्योंकि हर गुमशुदा व्यक्ति के पीछे एक परिवार होता है, जो वर्षों तक उत्तर तलाशता रहता है।</p>
<h4><strong>मीडिया की भूमिका</strong></h4>
<p>धर्मस्थल विवाद ने मीडिया की जिम्मेदारी पर भी सवाल उठाए।</p>
<p>कुछ मंचों ने आरोपों को अंतिम सत्य की तरह प्रस्तुत किया। कुछ ने पूरे मामले को शुरू से ही झूठ करार दिया।</p>
<p>दोनों दृष्टिकोण खतरनाक हैं।</p>
<p>पत्रकारिता का उद्देश्य है:</p>
<p>• प्रश्न पूछना,<br />• साक्ष्य जुटाना,<br />• तथ्यों की जांच करना,<br />• और निष्कर्ष अदालत पर छोड़ना।</p>
<h4><strong>क्या भारत खामोश था?</strong></h4>
<p>पूरी तरह नहीं।</p>
<p>2025 में इस मामले पर राष्ट्रीय मीडिया, महिला संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक नेताओं ने चर्चा की। राज्य महिला आयोग ने भी संज्ञान लिया था। सरकार ने SIT बनाई और जांच शुरू हुई।</p>
<p>हालांकि, यह भी सच है कि आम जनता का ध्यान लंबे समय तक किसी एक मामले पर नहीं टिकता। कुछ सप्ताह बाद नए मुद्दे सामने आ जाते हैं और पुराने प्रश्न अधूरे रह जाते हैं।</p>
<h4><strong>आस्था बनाम जवाबदेही</strong></h4>
<p>यह मामला एक बड़ी सीख देता है।</p>
<p>आस्था और जवाबदेही एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।</p>
<p>यदि कोई संस्था पवित्र है, तो उसे जांच से डरने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।</p>
<p>यदि आरोप झूठे हैं, तो निष्पक्ष जांच से सत्य सामने आएगा।</p>
<p>यदि आरोप सही हैं, तो दोषियों को सजा मिलनी चाहिए।</p>
<p>दोनों स्थितियों में जांच ही समाधान है।</p>
<h4><strong>निष्कर्ष : सत्य की तलाश अभी बाकी है</strong></h4>
<p>धर्मस्थल प्रकरण भारत के हालिया इतिहास के सबसे विवादास्पद मामलों में से एक बन चुका है।</p>
<p>एक ओर ऐसे आरोप थे, जिन्होंने पूरे देश को झकझोर दिया। दूसरी ओर, उन्हीं आरोपों को सामने लाने वाले व्यक्ति की गिरफ्तारी ने पूरे मामले को संदेह के घेरे में ला दिया।</p>
<p>आज भी कई प्रश्न अनुत्तरित हैं:</p>
<p>• कथित मानव अवशेषों की अंतिम फॉरेंसिक रिपोर्ट क्या कहती है?<br />• पुराने गुमशुदगी मामलों का सच क्या है?<br />• क्या कोई संगठित अपराध हुआ था?<br />• या फिर यह पूरा मामला झूठे दावों और अफवाहों का जाल था?</p>
<p>इन प्रश्नों का उत्तर न सोशल मीडिया दे सकता है, न राजनीतिक भाषण।</p>
<p>उत्तर केवल निष्पक्ष जांच, वैज्ञानिक साक्ष्य और न्यायिक प्रक्रिया से ही आएगा।</p>
<p>लोकतंत्र में आस्था का सम्मान जरूरी है, लेकिन सत्य का सम्मान उससे भी अधिक जरूरी है। जब तक अंतिम तथ्य सामने नहीं आते, तब तक जिम्मेदार समाज का कर्तव्य है कि वह न तो बिना प्रमाण किसी को अपराधी घोषित करे और न ही गंभीर आरोपों को केवल इसलिए खारिज करे क्योंकि वे किसी शक्तिशाली संस्था से जुड़े हैं।</p>
<p><strong>सत्य, न्याय और जवाबदेही—तीनों की परीक्षा अभी बाकी है।</strong></p>
<p> </p>
<p><strong>महत्वपूर्ण नोट: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिपोर्टों, जांच से जुड़ी घटनाओं और सामाजिक विमर्श के आधार पर तैयार किया गया विश्लेषणात्मक लेख है। किसी भी व्यक्ति, संस्था या मंदिर प्रबंधन को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता जब तक अदालत में आरोप सिद्ध न हो जाएं।</strong></p>
<p><strong> धर्मस्थल प्रकरण की जांच </strong><strong>अभी भी कानूनी और तथ्यात्मक बहस का विषय है।</strong></p>
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राजकुमार अग्रवाल
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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 15:42:47 +0530</pubDate>
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