<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://samridhjharkhand.com/article/category-14825" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Samridh Jharkhand RSS Feed Generator</generator>
                <title>आर्टिकल - Samridh Jharkhand</title>
                <link>https://samridhjharkhand.com/category/14825/rss</link>
                <description>आर्टिकल RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>सारकोमा का इलाज अब पहले से अधिक प्रभावी, जागरूकता और समय पर उपचार से बढ़ी उम्मीद</title>
                                    <description><![CDATA[जुलाई माह विश्वभर में सारकोमा जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है। सारकोमा एक दुर्लभ लेकिन गंभीर कैंसर है, जो शरीर के कनेक्टिव टिश्यू और हड्डियों में विकसित होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती गांठ, लगातार सूजन या हड्डियों में बिना कारण दर्द जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/health/sarcoma-awareness-month-rare-cancer-symptoms-treatment-hindi/article-24896"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/d0620b23-eb6c-4564-a458-59ab21ec4e79_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>डॉ. आयुष चौधरी</strong><br /><strong>एसोसिएट स्पेशलिस्ट</strong><br /><strong>मेडिकल इंडोर सर्विसेज</strong><br /><strong>टाटा मेन हॉस्पिटल </strong></p>
<p>जुलाई माह विश्वभर में सारकोमा जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य इस दुर्लभ लेकिन गंभीर प्रकार के कैंसर के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाना है, जिसके बारे में आमतौर पर बहुत कम जानकारी होती है। स्तन, फेफड़े या सर्वाइकल कैंसर की तुलना में सारकोमा के बारे में कम जानकारी होने के कारण इसकी समय पर पहचान और निदान में अक्सर देरी हो जाती है। जबकि जागरूकता बढ़ाकर इस स्थिति में महत्वपूर्ण सुधार लाया जा सकता है। समय रहते पहचान और विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा शीघ्र उपचार से रोगियों के बेहतर स्वास्थ्य परिणाम सुनिश्चित किए जा सकते हैं।</p>
<p>कल्पना कीजिए कि आपकी बांह या जांघ पर एक छोटी-सी, बिना दर्द वाली गांठ दिखाई देती है। अधिकांश लोग इसे सामान्य चर्बी की गांठ या किसी हल्की चोट का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। ज्यादातर मामलों में ऐसा होना सही भी होता है। लेकिन यदि यह गांठ लगातार बढ़ने लगे, तो इसकी चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है, क्योंकि कुछ मामलों में यह सारकोमा का संकेत भी हो सकती है।</p>
<p>सारकोमा कैंसर का एक ऐसा समूह है, जो शरीर के कनेक्टिव टिश्यू जैसे मांसपेशियों, वसा, नसों, रक्त वाहिकाओं, रेशेदार ऊतकों और हड्डियों में विकसित होता है। मुख्य रूप से इसे दो प्रकारों में बाँटा जाता है—सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा और बोन सारकोमा। सारकोमा के 70 से अधिक प्रकार पहचाने जा चुके हैं। यह एक दुर्लभ और कई प्रकारों वाला कैंसर है, इसलिए इसकी पहचान करना आसान नहीं होता। यही कारण है कि इसके प्रति जागरूकता और विशेषज्ञ डॉक्टरों से समय पर उपचार बेहद महत्वपूर्ण है।</p>
<p>हालाँकि, वयस्कों में होने वाले सभी कैंसर मामलों में सारकोमा की हिस्सेदारी 1% से भी कम है, लेकिन इसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक है। बच्चों और किशोरों में होने वाले लगभग 10–15% कैंसर सारकोमा के होते हैं और यह युवाओं में भी अपेक्षाकृत अधिक पाया जाने वाला कैंसर है। भारत में सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा के हर वर्ष लगभग 1–2 मामले प्रति एक लाख आबादी पर सामने आते हैं। लेकिन देश की बड़ी आबादी के कारण हर साल ऐसे हजारों नए मरीज सामने आते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है, क्योंकि कई मामलों की रिपोर्ट नहीं हो पाती, कुछ क्षेत्रों में कैंसर रजिस्ट्री की सीमित पहुंच है और बीमारी की पहचान में भी अक्सर देरी हो जाती है। सारकोमा के प्रति जागरूकता की कमी, इसका दुर्लभ होना और सामान्य गांठ जैसी दिखने वाली स्थितियों से मिलते-जुलते लक्षण होने के कारण कई मरीज तब तक डॉक्टर के पास नहीं पहुँचते, जब तक बीमारी काफी बढ़ नहीं जाती। इसलिए लोगों में इसके प्रति जागरूकता बढ़ाना, संदिग्ध लक्षणों की समय पर पहचान करना और मरीजों को शीघ्र विशेषज्ञ चिकित्सा केंद्रों तक पहुँचाना बेहद आवश्यक है।</p>
<p>सारकोमा जागरूकता माह का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि हर गांठ सामान्य नहीं होती। हालांकि अधिकांश गांठें कैंसर नहीं होतीं, लेकिन कुछ संकेतों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि कोई गांठ लगातार आकार में बढ़ रही हो, उसका आकार पाँच सेंटीमीटर से अधिक हो, वह त्वचा के नीचे गहराई में हो, पहले हटाए जाने के बाद दोबारा उभर आए या उसके साथ दर्द भी हो, तो तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। इसी तरह, हड्डियों में लगातार दर्द रहना, किसी हड्डी के आसपास सूजन होना या मामूली चोट लगने पर भी हड्डी टूट जाना जैसे लक्षण दिखाई दें, तो बिना देर किए चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।</p>
<p>यह समझना भी उतना ही जरूरी है कि इन लक्षणों का होना हमेशा सारकोमा होने का संकेत नहीं होता। अधिकांश गांठें और सूजन कैंसर नहीं होतीं। लेकिन यदि ऐसे लक्षण दिखाई दें, तो समय पर डॉक्टर से जांच कराना आवश्यक है। बीमारी की जल्द पहचान होने पर उपचार अधिक प्रभावी होता है और मरीज के पूरी तरह स्वस्थ होने की संभावना भी बढ़ जाती है।</p>
<p>सारकोमा की सही पहचान के लिए सुनियोजित जांच प्रक्रिया आवश्यक होती है। ट्यूमर का आकार और उसके फैलाव का पता लगाने के लिए एमआरआई या सी टी स्कैन  जैसी जांच की जाती है, जबकि बायोप्सी से बीमारी की पुष्टि होती है। चूंकि सारकोमा एक दुर्लभ कैंसर है और इसके कई प्रकार होते हैं, इसलिए इसकी जांच अनुभवी पैथोलॉजिस्ट द्वारा किया जाना बेहद जरूरी है। कई मामलों में मॉलिक्यूलर टेस्ट भी किए जाते हैं, जिससे बीमारी के प्रकार की सटीक पहचान हो सके और उचित उपचार तय किया जा सके। यह भी महत्वपूर्ण है कि बायोप्सी और उपचार की पूरी योजना सारकोमा विशेषज्ञों की मल्टीडिसिप्लिनरी टीम की देखरेख में बनाई जाए। बिना उचित योजना के की गई सर्जरी आगे के इलाज को अधिक जटिल बना सकती है।</p>
<p>पिछले दो दशकों में सारकोमा के उपचार में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, जिससे मरीजों के लिए बेहतर उम्मीदें जगी हैं। अब इसका इलाज केवल ट्यूमर निकालने तक सीमित नहीं है। इसके बजाय, विशेषज्ञों की एक मल्टीडिसिप्लिनरी टीम मिलकर प्रत्येक मरीज के लिए उसकी स्थिति के अनुसार उपचार की योजना तैयार करती है। इस टीम में सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट, ऑर्थोपेडिक ऑन्कोलॉजिस्ट, मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट, रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट, पैथोलॉजिस्ट, रिकंस्ट्रक्टिव सर्जन, फिजियोथेरेपिस्ट और रिहैबिलिटेशन विशेषज्ञ शामिल होते हैं। सभी विशेषज्ञ मिलकर मरीज को सर्वोत्तम उपचार उपलब्ध कराने का प्रयास करते हैं।</p>
<p>सारकोमा के उपचार में सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है लिंब-सेल्वेज सर्जरी का व्यापक उपयोग। पहले हाथ या पैर में होने वाले कई बोन और सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा के मामलों में एम्प्यूटेशन ही एकमात्र विकल्प माना जाता था। लेकिन आज बेहतर इमेजिंग तकनीक, उन्नत सर्जरी, एंडोप्रोस्थेटिक और माइक्रोसर्जिकल रिकंस्ट्रक्शन तथा आधुनिक सहायक उपचारों की बदौलत कई मरीजों में ट्यूमर को सफलतापूर्वक हटाते हुए प्रभावित अंग को सुरक्षित रखा जा सकता है। इससे मरीज पहले की तरह सामान्य जीवन जीने और अपने अंग का बेहतर उपयोग करने में सक्षम हो पाते हैं। हालाँकि, कुछ विशेष परिस्थितियों में कैंसर पर पूरी तरह नियंत्रण पाने के लिए अंग काटना अब भी आवश्यक हो सकता है, लेकिन अब यह हर मरीज के लिए अनिवार्य विकल्प नहीं रह गया है।</p>
<p>सारकोमा का उपचार अब पहले की तुलना में अधिक व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार किया जाता है। स्थानीय स्तर तक सीमित सारकोमा के अधिकांश मामलों में सर्जरी मुख्य उपचार है। कई बार दोबारा कैंसर होने की आशंका कम करने के लिए सर्जरी के साथ रेडियोथेरेपी भी दी जाती है। कुछ प्रकार के बोन सारकोमा में सर्जरी से पहले और बाद में कीमोथेरेपी देने से बेहतर परिणाम मिलते हैं। हाल के वर्षों में मॉलिक्यूलर पैथोलॉजी में हुई प्रगति के कारण सारकोमा के कुछ प्रकारों में विशेष जेनेटिक और मॉलिक्यूलर बदलावों की पहचान संभव हुई है। इससे ऐसे मरीजों के लिए टार्गेटेड थेरेपी का रास्ता खुला है, जिनमें इससे बेहतर लाभ मिलने की संभावना होती है। इसके अलावा, इम्यूनोथेरेपी और अन्य नई उपचार पद्धतियों पर लगातार शोध जारी है, जिससे भविष्य में सारकोमा के इलाज के और अधिक प्रभावी विकल्प उपलब्ध होने की उम्मीद है।</p>
<p>सारकोमा के उपचार में हुई इन प्रगतियों से यह स्पष्ट होता है कि अब सारकोमा का निदान निराशा का पर्याय नहीं रहा। यदि बीमारी का समय पर पता चल जाए, तो कई मरीजों का सफलतापूर्वक इलाज संभव है। वहीं, जिन मरीजों में बीमारी बढ़ चुकी होती है, उन्हें भी नई दवाओं, बेहतर सहायक उपचार और विशेषज्ञों की बहु-विषयक टीम की देखरेख से लाभ मिल सकता है। आज सारकोमा के उपचार का उद्देश्य केवल मरीज की जीवन-रक्षा करना ही नहीं, बल्कि उसके प्रभावित अंग की कार्यक्षमता बनाए रखना, जीवन की गुणवत्ता बेहतर करना और उपचार से लेकर पूरी तरह स्वस्थ होने तक हर चरण में उसका सहयोग करना भी है।</p>
<p>चूंकि सारकोमा एक दुर्लभ और कई प्रकार का कैंसर है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देश भी यही सलाह देते हैं कि इसका उपचार ऐसे केंद्रों में कराया जाए, जहां सारकोमा के इलाज का विशेष अनुभव और विशेषज्ञता उपलब्ध हो। ऐसे केंद्रों में सटीक जांच, विशेषज्ञों की बहु-विषयक टीम, उन्नत सर्जरी, आधुनिक रेडियोथेरेपी, दवा आधारित उपचार, रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी, रिहैबिलिटेशन और लंबे समय तक फॉलो-अप जैसी सभी सुविधाएं एक ही स्थान पर उपलब्ध होती हैं। इस समन्वित उपचार पद्धति से प्रत्येक मरीज को उसके सारकोमा के प्रकार और बीमारी की अवस्था के अनुसार सबसे उपयुक्त उपचार मिल पाता है।<br /> <br />सारकोमा जागरूकता माह के अवसर पर संदेश स्पष्ट और महत्वपूर्ण है—सारकोमा भले ही एक दुर्लभ कैंसर हो, लेकिन इसे कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि शरीर में कोई गांठ लगातार बढ़ रही हो, लंबे समय तक सूजन बनी रहे या हड्डियों में बिना किसी स्पष्ट कारण के लगातार दर्द हो, तो तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। समय पर बीमारी की पहचान ही सफल उपचार की सबसे बड़ी कुंजी है। आज सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी और विशेषज्ञों की बहु-विषयक टीम द्वारा किए जा रहे उपचार की बदौलत सारकोमा के कई मरीजों के बेहतर स्वास्थ्य परिणाम संभव हो रहे हैं।</p>
<p>जागरूकता से बीमारी की समय पर पहचान संभव होती है। समय पर पहचान से बेहतर इलाज मिल सकता है, और बेहतर इलाज हर मरीज के लिए नई उम्मीद लेकर आता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>जन स्वास्थ्य</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/news/health/sarcoma-awareness-month-rare-cancer-symptoms-treatment-hindi/article-24896</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/news/health/sarcoma-awareness-month-rare-cancer-symptoms-treatment-hindi/article-24896</guid>
                <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 15:27:15 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-07/d0620b23-eb6c-4564-a458-59ab21ec4e79_samridh_1200x720.jpeg"                         length="46963"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पॉलीमर नोटों की ओर बढ़ता भारत, सुरक्षित और टिकाऊ मुद्रा की नई शुरुआत</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने मुद्रा प्रणाली को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल करते हुए 10 और 20 रुपये के पॉलीमर (प्लास्टिक आधारित) नोटों के बड़े पैमाने पर फील्ड ट्रायल की तैयारी शुरू की है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/new-initiative-for-safe-and-sustainable-currency/article-24812"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/0271da52-db63-4528-96e8-2c634473311c_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>महेन्द्र तिवारी</strong></p>
<p>भारत की अर्थव्यवस्था निरंतर विस्तार के नए चरण में प्रवेश कर रही है। डिजिटल भुगतान के बढ़ते प्रचलन के बावजूद नकद मुद्रा आज भी करोड़ों भारतीयों के दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है। देश के छोटे व्यापार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक परिवहन, कृषि बाजार और असंगठित क्षेत्र का बड़ा हिस्सा आज भी नकद लेनदेन पर निर्भर है। ऐसे में मुद्रा की गुणवत्ता, सुरक्षा और टिकाऊपन केवल तकनीकी विषय नहीं रह जाते, बल्कि आर्थिक व्यवस्था की विश्वसनीयता से सीधे जुड़े होते हैं। इसी संदर्भ में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा पॉलीमर अर्थात प्लास्टिक आधारित नोटों की दिशा में उठाया गया कदम अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। केंद्र सरकार ने आरबीआई के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए दस रुपये और बीस रुपये के पॉलीमर नोटों के बड़े पैमाने पर फील्ड ट्रायल की अनुमति दी है। पहले चरण में दोनों मूल्यवर्ग के एक एक अरब नोटों का परीक्षण किया जाएगा। यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो भविष्य में अन्य मूल्यवर्ग के नोटों में भी इस तकनीक का विस्तार किया जा सकता है। फिलहाल सरकार ने स्पष्ट किया है कि कागजी नोटों को तत्काल हटाने की कोई योजना नहीं है और यह केवल परीक्षण आधारित पहल है।</p>
<p>पॉलीमर नोट सामान्य कागज से नहीं बल्कि विशेष प्रकार के सिंथेटिक पॉलीमर पदार्थ से बनाए जाते हैं। यह सामग्री नमी, धूल, गंदगी और बार बार मोड़े जाने जैसी परिस्थितियों को बेहतर ढंग से सहन कर सकती है। यही कारण है कि इनकी आयु पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में कई गुना अधिक होती है। सामान्यतः कम मूल्यवर्ग के नोट सबसे अधिक हाथों से गुजरते हैं और कुछ ही महीनों में फटने या खराब होने लगते हैं। इसके कारण रिजर्व बैंक को हर वर्ष बड़ी संख्या में पुराने नोट वापस लेकर नए नोट छापने पड़ते हैं। यदि पॉलीमर नोट अपेक्षा के अनुसार लंबे समय तक चलते हैं तो नोटों की छपाई, परिवहन और नष्ट करने की लागत में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।</p>
<p>भारत में नकली नोटों की चुनौती लंबे समय से चिंता का विषय रही है। समय समय पर सुरक्षा एजेंसियों ने नकली भारतीय मुद्रा के नेटवर्क का खुलासा किया है। नकली नोट केवल आर्थिक नुकसान नहीं पहुंचाते बल्कि उनका उपयोग अवैध गतिविधियों और संगठित अपराध में भी किया जाता है। पॉलीमर नोटों में पारदर्शी विंडो, उन्नत होलोग्राम, रंग बदलने वाली स्याही, सूक्ष्म प्रिंटिंग और अन्य आधुनिक सुरक्षा विशेषताएं जोड़ी जा सकती हैं। इन विशेषताओं की नकल करना पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में कहीं अधिक कठिन माना जाता है। इसलिए पॉलीमर नोट नकली मुद्रा पर प्रभावी नियंत्रण का माध्यम बन सकते हैं।</p>
<p>इस पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू पर्यावरण से भी जुड़ा हुआ है। पहली नजर में प्लास्टिक शब्द सुनकर पर्यावरण संबंधी चिंताएं स्वाभाविक लग सकती हैं, लेकिन पॉलीमर नोट सामान्य प्लास्टिक नहीं होते। इनका निर्माण विशेष तकनीक से किया जाता है और उपयोग के बाद इन्हें पुनर्चक्रित भी किया जा सकता है। चूंकि इनकी आयु अधिक होती है इसलिए समान अवधि में कम संख्या में नोट छापने पड़ते हैं। इससे कागज की खपत, ऊर्जा की आवश्यकता और परिवहन संबंधी खर्च में भी कमी आती है। कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी माना है कि लंबे समय में पॉलीमर नोट पर्यावरणीय दृष्टि से लाभकारी सिद्ध हो सकते हैं।</p>
<p>दुनिया के अनेक देशों ने पहले ही पॉलीमर मुद्रा को अपनाकर इसके लाभ प्राप्त किए हैं। ऑस्ट्रेलिया इस तकनीक को अपनाने वाला पहला देश था। इसके बाद कनाडा, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, रोमानिया और अनेक अन्य देशों ने भी अपनी मुद्रा में पॉलीमर तकनीक का उपयोग किया। इन देशों के अनुभव बताते हैं कि पॉलीमर नोट अधिक समय तक सुरक्षित रहते हैं और नकली नोटों की घटनाओं में कमी लाने में सहायक होते हैं। भारत जैसे विशाल देश के लिए इन अनुभवों का अध्ययन अत्यंत उपयोगी हो सकता है।</p>
<p>भारत में पॉलीमर नोटों का विचार नया नहीं है। वर्ष 2013 और उसके बाद भी सीमित स्तर पर कुछ शहरों में इनका परीक्षण किया गया था। उस समय विभिन्न तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। अब बदलती आर्थिक आवश्यकताओं, बेहतर तकनीक और बढ़ती मुद्रा मांग को देखते हुए इसे नए रूप में पुनर्जीवित किया गया है। इस बार परीक्षण का दायरा पहले की तुलना में कहीं बड़ा रखा गया है ताकि अलग अलग जलवायु, भौगोलिक परिस्थितियों और उपयोग के स्तर पर नोटों के प्रदर्शन का व्यापक मूल्यांकन किया जा सके।</p>
<p>भारत जैसे देश में मौसम की विविधता एक बड़ी चुनौती है। कहीं अत्यधिक गर्मी पड़ती है तो कहीं लगातार वर्षा होती है। कई क्षेत्रों में धूल और नमी का स्तर भी अधिक रहता है। ऐसे वातावरण में कागजी नोट अपेक्षाकृत जल्दी खराब हो जाते हैं। फील्ड ट्रायल का उद्देश्य यही समझना है कि पॉलीमर नोट वास्तविक परिस्थितियों में कितने प्रभावी सिद्ध होते हैं। यदि वे इन परिस्थितियों में भी अपनी गुणवत्ता बनाए रखते हैं तो उनका व्यापक उपयोग आर्थिक दृष्टि से लाभदायक हो सकता है।</p>
<p>हालांकि इस योजना के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। पॉलीमर नोटों के निर्माण की प्रारंभिक लागत कागजी नोटों की तुलना में अधिक होती है। इसके अलावा एटीएम मशीनों, नकदी गिनने वाली मशीनों और बैंकिंग प्रणाली के कुछ उपकरणों में आवश्यक तकनीकी परिवर्तन भी करने पड़ सकते हैं। जनता को नए नोटों की विशेषताओं की जानकारी देना और उन्हें नकली नोटों से अलग पहचानने का प्रशिक्षण देना भी आवश्यक होगा। इसलिए यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं बल्कि प्रशासनिक और सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।</p>
<p>भारत में डिजिटल भुगतान प्रणाली तेजी से विकसित हुई है। यूपीआई ने लेनदेन की दुनिया बदल दी है, फिर भी नकदी की उपयोगिता समाप्त नहीं हुई है। छोटे दुकानदारों, ग्रामीण क्षेत्रों, सीमित इंटरनेट वाले इलाकों और अनेक सामाजिक परिस्थितियों में नकद भुगतान आज भी सबसे सुविधाजनक माध्यम है। इसलिए डिजिटल अर्थव्यवस्था और नकद मुद्रा दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। पॉलीमर नोटों की पहल इसी संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाती है, जिसमें आधुनिक तकनीक अपनाते हुए नकद मुद्रा को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाया जा रहा है।</p>
<p>आरबीआई का यह निर्णय केवल नए प्रकार के नोट जारी करने तक सीमित नहीं है बल्कि यह भविष्य की मुद्रा व्यवस्था की दिशा भी तय करता है। यदि परीक्षण सफल रहता है तो भारत उन देशों की श्रेणी में शामिल हो जाएगा जिन्होंने आधुनिक तकनीक के माध्यम से अपनी मुद्रा प्रणाली को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाया है। इससे जनता का विश्वास मजबूत होगा, नकली नोटों की चुनौती कम होगी और मुद्रा प्रबंधन की लागत में भी दीर्घकालिक बचत संभव होगी।</p>
<p>यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल कागजी नोटों को समाप्त करने का कोई निर्णय नहीं लिया गया है। परीक्षण पूरा होने के बाद उसके परिणामों का मूल्यांकन किया जाएगा। यदि अपेक्षित सफलता मिलती है तभी आगे की रणनीति तय होगी। यह सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि भारत की विशाल आबादी और विविध परिस्थितियों में किसी भी बड़े परिवर्तन को चरणबद्ध तरीके से लागू करना ही व्यावहारिक होता है।</p>
<p>आर्थिक सुधारों की सफलता केवल नई नीतियां बनाने से नहीं बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन से निर्धारित होती है। पॉलीमर नोटों का प्रयोग भी इसी कसौटी पर परखा जाएगा। यदि यह पहल सफल होती है तो भारत की मुद्रा व्यवस्था अधिक आधुनिक, सुरक्षित और टिकाऊ बन सकती है। इससे नकली नोटों पर नियंत्रण, सरकारी खर्च में कमी, जनता को बेहतर गुणवत्ता वाले नोट और बैंकिंग व्यवस्था को अधिक दक्ष बनाने जैसे अनेक लाभ प्राप्त हो सकते हैं। आने वाले वर्षों में यह पहल भारतीय मुद्रा इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तनों में से एक सिद्ध हो सकती है और यह दिखाएगी कि तकनीकी नवाचार किस प्रकार आम नागरिक के दैनिक जीवन को भी अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक बना सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/opinion/new-initiative-for-safe-and-sustainable-currency/article-24812</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/opinion/new-initiative-for-safe-and-sustainable-currency/article-24812</guid>
                <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 16:27:49 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-07/0271da52-db63-4528-96e8-2c634473311c_samridh_1200x720.jpeg"                         length="46808"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हर दिल में बसने वाले नायक: जेआरडी टाटा की मानवीय विरासत आज भी प्रेरणास्रोत</title>
                                    <description><![CDATA[जेआरडी टाटा केवल एक सफल उद्योगपति नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों, नैतिक नेतृत्व और राष्ट्र निर्माण के प्रतीक थे। उन्होंने कर्मचारियों के सम्मान, नवाचार, सामाजिक उत्तरदायित्व और उत्कृष्ट कार्यसंस्कृति को हमेशा प्राथमिकता दी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/success-story/jrd-tata-human-values-leadership-tata-steel-legacy/article-24745"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/dbdd5b11-8db0-4111-9832-b37662cd1dc8_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>इतिहास जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा (जे.आर.डी. टाटा) को एक दूरदर्शी उद्योगपति, अग्रणी विमान चालक, राष्ट्र निर्माता और आधुनिक भारतीय उद्योग के शिल्पकार के रूप में याद करता है। लेकिन जिन लोगों ने उन्हें निकट से जाना, वे उन्हें उनकी उपलब्धियों से भी बढ़कर उनकी मानवीयता और विनम्रता के लिए याद करते हैं। </p>
<p>वे ऐसे विलक्षण नेता थे, जो बोलने से पहले सुनने में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि हर व्यक्ति, चाहे उसका पद कोई भी हो, सम्मान और गरिमा का समान अधिकारी है। उन्होंने कभी अधिकार का सहारा लेकर नेतृत्व नहीं किया; बल्कि अपने आदर्श आचरण से उत्कृष्टता की प्रेरणा दी।</p>
<p>जे.आर.डी. टाटा से जुड़ी अनगिनत कहानियाँ हैं। उनमें से कई कभी किताबों में दर्ज नहीं हो सकीं, लेकिन जिन लोगों के जीवन को उन्होंने स्पर्श किया, उनकी यादों में वे आज भी जीवंत हैं।</p>
<p>मुंबई के स्टील हाउस में रहने वाले लोग आज भी बताते हैं कि जे.आर.डी. टाटा कई बार स्वयं कार चलाकर किसी को उसके घर छोड़ने चले जाते थे। कई बार वे परिवार के साथ एक प्याली चाय पर आत्मीयता से बातचीत करते  कुछ पल भी बिताते थे और अक्सर शाम का समापन बच्चों के साथ नीचे खेलते हुए होता था। उस समय वे भारत के सबसे बड़े औद्योगिक समूहों में से एक के अध्यक्ष नहीं, बल्कि सबके प्रिय मित्र बन जाते थे।</p>
<p>बॉम्बे हाउस की एक और घटना जे.आर.डी. टाटा के व्यक्तित्व की गहराई को बखूबी दर्शाती है। एक दिन वे लिफ्ट के लिए धैर्यपूर्वक कतार में अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे, तब भी लिफ्ट ऑपरेटर ने उन्हें कतार तोड़कर आगे जाने की अनुमति नहीं दी। उसके लिए नियम सबके लिए समान थे, यहाँ तक कि चेयरमैन के लिए भी। बाद में जब उस कर्मचारी का तबादला कर दिया गया, तो जे.आर.डी. ने तुरंत हस्तक्षेप किया। उन्होंने कहा, “यह व्यक्ति सिद्धांतों और अनुशासन का पक्का है। इसे दंडित कैसे किया जा सकता है?” जे.आर.डी. टाटा के लिए सम्मान कभी पद से नहीं मिलता था, बल्कि वह व्यक्ति के चरित्र, सिद्धांतों और आचरण से अर्जित होता था।</p>
<p> उनकी विनम्रता उनके व्यक्तित्व की सबसे  विशेषताओं में से एक थी। अपने असाधारण जीवन की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने एक बार कहा था, “मुझे नहीं लगता कि मैं उस सम्मान का पूरी तरह हकदार हूँ, जो मुझे मिला है... मेरे साथ हमेशा एक उत्कृष्ट टीम रही।” यही उनके नेतृत्व का सार था। वे स्वयं श्रेय लेने के बजाय अपनी टीम को आगे बढ़ाते थे और हर व्यक्ति को बड़े सपने देखने, निर्भीक होकर नवाचार करने तथा सामूहिक रूप से उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करते थे।</p>
<p>1938 से 1984 तक टाटा स्टील के चेयरमैन के रूप में जे.आर.डी. टाटा ने तकनीकी आधुनिकीकरण को नई दिशा दी, लेकिन यह भी सुनिश्चित किया कि किसी भी प्रगति का वास्तविक केंद्र उसके लोग होते हैं। उन्होंने कर्मचारियों के कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी, प्रगतिशील मानव संसाधन नीतियों को बढ़ावा दिया, प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच संयुक्त परामर्श की संस्कृति को प्रोत्साहित किया तथा ऐसी अनेक पहलों की नींव रखी, जो आज भी टाटा स्टील की ‘पीपल-फर्स्ट’ संस्कृति को सशक्त बनाती हैं।</p>
<p>उनका विश्वास सरल, किन्तु अत्यंत गहरा था: कोई भी संस्थान तभी सफल होता है, जब उससे जुड़े लोग समृद्ध और प्रगतिशील हों।</p>
<p>जिम्मेदार व्यवसाय के वैश्विक प्राथमिकता बनने से बहुत पहले, जे.आर.डी. ने नैतिकता, कर्मचारियों के कल्याण और राष्ट्र-निर्माण को व्यवसाय की सफलता से अलग नहीं, बल्कि उसका अभिन्न हिस्सा माना। परिवार कल्याण, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक विकास के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने जमशेदपुर को एक आदर्श औद्योगिक नगर में बदल दिया, जबकि नैतिक नेतृत्व के प्रति उनकी हिमायत आज भी उनकी जयंती के आसपास मनाए जाने वाले टाटा स्टील के वार्षिक एथिक्स मंथ के लिए प्रेरणा बनी हुई है।</p>
<p>इनोवेशन भी जेआरडी की दूरदर्शी सोच का एक प्रमुख आधार था। चाहे टाटा स्टील का आधुनिकीकरण हो, भारत के विमानन उद्योग की नींव रखने की पहल हो या युवा नेतृत्व को परंपरागत सोच से आगे बढ़कर नए रास्ते अपनाने के लिए प्रेरित करना—जेआरडी ने हमेशा लोगों को वर्तमान से आगे सोचने और भविष्य के निर्माण के लिए कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया।</p>
<p>उनके निधन के तीन दशक से अधिक समय बाद भी उनकी विरासत टाटा स्टील की कार्यसंस्कृति और मूल्यों को सार्थक रूप से दिशा दे रही है। यह हमारी नैतिकता और सत्यनिष्ठा के प्रति अटूट प्रतिबद्धता में रची बसी है। यह कर्मचारियों के समग्र कल्याण—शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य—पर हमारे विशेष ध्यान में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। साथ ही, सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने, वर्ष 2045 तक नेट-ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य प्राप्त करने तथा नवाचार, स्वच्छ प्रौद्योगिकियों और उत्तरदायी व्यावसायिक कार्यप्रणालियों में निरंतर निवेश की हमारी प्रतिबद्धता में भी उनकी दूरदृष्टि साफ़ दिखाई देती है।</p>
<p>सबसे बढ़कर, उनकी विरासत हमारे इस विश्वास में जीवित है कि वास्तविक प्रगति वही है, जो लोगों के जीवन को बेहतर बनाए।</p>
<p>वन टाटा स्टील के रूप में हम जमशेदजी टाटा और जेआरडी टाटा के आदर्शों को आगे बढ़ाते हुए केवल एक संगठन ही नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, संवेदनशीलता और उद्देश्यपूर्ण सोच के साथ समाज, उद्योग और राष्ट्र को भी सशक्त बनाने के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं।</p>
<p>कुछ लीडर्स अपने बनाए हुए व्यवसायों के कारण इतिहास में अमर हो जाते हैं। जेआरडी टाटा उन अनगिनत जीवनों के कारण हमेशा याद किए जाएंगे, जिन्हें उन्होंने अपने नेतृत्व, मानवीय दृष्टिकोण और मूल्यों से समृद्ध किया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>स्टोरी </category>
                                            <category>सक्सेस स्टोरी</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/article/success-story/jrd-tata-human-values-leadership-tata-steel-legacy/article-24745</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/article/success-story/jrd-tata-human-values-leadership-tata-steel-legacy/article-24745</guid>
                <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 14:31:50 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-07/dbdd5b11-8db0-4111-9832-b37662cd1dc8_samridh_1200x720.jpeg"                         length="46818"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हरमू नदी की दर्दभरी कहानी: कभी जीवनदायिनी, आज गंदे नाले में तब्दील</title>
                                    <description><![CDATA[रांची की ऐतिहासिक हरमू नदी पर आधारित इस विचारोत्तेजक लेख में लेखक अरविंद शर्मा ने नदी की बदहाल स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। कभी स्वच्छ जल, बाढ़ और सामाजिक जीवन का केंद्र रही हरमू आज गंदे नाले में बदल चुकी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/harmu-river-ranchi-painful-story-environment-article/article-24743"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/untitled-design-(11)_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>अरविंद शर्मा</strong></p>
<p>बड़े भाई प्रकाश सहाय ने रांची की हरमू नदी की दुर्दशा पर रोते हुए एक ऐसी तस्वीर सामने रखी है, जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को बेचैन कर दे। उनके बचपन में इस नदी में बाढ़ आती थी, कई मोहल्ले डूब जाते थे। बच्चे इसमें नहाते थे, तैरना सीखते थे और लोग इसे नदी की तरह सम्मान देते थे। आज हालत यह है कि नाक डुबोकर मरने के लिए भी इसमें चुल्लू भर साफ पानी नहीं है। जो बह रहा है, वह आसपास के घरों की नालियों से आने वाला गंदा पानी है। प्लास्टिक और कचरा है। यह केवल एक नदी की नहीं, बल्कि हमारी सोच, हमारी व्यवस्था और हमारी संवेदनहीनता की भी कहानी है।</p>
<p>अगर आप रांची के निवासी हैं या कभी किसी काम से वहां गए होंगे तो जरूर देखा होगा कि रांची में हरमू के नाम पर हरमू रोड है। हरमू कालोनी है और हरमू मुक्ति धाम भी है। लेकिन सच यह भी है कि सबसे अधिक मुक्ति की जरूरत स्वयं हरमू नदी को ही है। यह विडंबना किसी व्यंग्य से कम नहीं है कि जिस नदी के किनारे कभी जीवन बसता था, आज उसी के गंदे पानी के किनारे अंतिम संस्कार होते हैं। हरमू अब नदी नहीं रही। मर गई है। जब नदी नाला बन जाती है तो केवल पानी नहीं मरता, शहर का भविष्य भी मर जाता है। भू-जल शर्म से पाताल में धंस जाता है। गर्मी बढ़ जाती है और फिर पुनर्जीवन के नाम पर करोड़ों रुपये का बंदरबांट होने लगता है। </p>
<p>1994-95 की बात है। तब मैं रांची विश्वविद्यालय से जर्नलिज्म कर रहा था। अपने गृह जिला गया से निकलकर पहली बार रांची गया था। इसकी खूबसूरत पहाड़ियों और हरियाली को देखकर स्वर्ग जैसा अहसास होता था। इसमें हरमू नदी की भी बड़ी भूमिका होती थी, क्योंकि यह शहर की प्राकृतिक जल-निकासी व्यवस्था की रीढ़ थी। नगड़ी के पठारी क्षेत्र से निकलने वाली यह नदी लगभग 40 किलोमीटर बहकर चुटिया के पास स्वर्णरेखा नदी में मिलती है। तब इसका पानी स्वच्छ होता था। छठ जैसे पर्वों पर श्रद्धालु इसके तट पर अर्घ्य देने पहुंचते थे। गर्मियों में भी पानी रहता था। बरसात में पानी का बहाव लोगों के लिए रोमांच बन जाता था। आज हल्की बारिश में भी रांची की सड़कें डूब जाती हैं और गर्मियों में पानी के लिए हाहाकार मचता है, तब समझ में आता है कि नदी को मारने की कीमत आखिर कितनी महंगी पड़ रही है।</p>
<p>इतिहास भी हरमू का महत्व बताता है। वर्ष 1939 में इसी नदी के तट पर आदिवासी महासभा के सम्मेलन में अलग झारखंड राज्य की मांग को संगठित स्वर मिला था। मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा के नेतृत्व ने यहीं से आंदोलन को नई दिशा दी। जिस नदी ने झारखंड के राजनीतिक इतिहास को सहेजा, उसी नदी को आज हमने गंदे नाले में बदल दिया।</p>
<p>सवाल है कि हरमू की हत्या किसने की? जवाब भी सीधा है-सरकारों ने, प्रशासन ने और हम सबने मिलकर। शहर बढ़ता गया, कॉलोनियां बसती गईं, प्राकृतिक नाले पाट दिए गए, नदी के किनारों पर अतिक्रमण होता गया और घरों का सीवेज सीधे नदी में गिरने लगा। </p>
<p>प्रकाश सहाय को इस बात पर भी रोना आता है कि हरमू के पुनर्जीवन पर डेढ़ सौ करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा चुके हैं। तटबंध बने, पैदल पथ बने, रेलिंग लगी, रंग-रोगन हुआ और तस्वीरें खिंचीं। लेकिन नदी आज भी नाला ही बनी हुई है। क्योंकि नदी का जीवन सीमेंट, टाइल्स और सुंदर लाइटों से नहीं लौटता। उसे जीवित रखने के लिए साफ पानी चाहिए, अविरल प्रवाह चाहिए और अतिक्रमण से मुक्ति चाहिए। यदि सीवेज उसी तरह गिरता रहेगा तो सौंदर्यीकरण सिर्फ सरकारी फाइलों एवं उद्घाटन समारोहों तक ही सीमित रहेगा।</p>
<p>यदि हरमू को बचाना है तो सौंदर्यीकरण से आगे बढ़कर सीवेज को पूरी तरह रोकना होगा। अतिक्रमण हटाना होगा और प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्र को वापस देना होगा। उतनी ही जिम्मेदारी आम लोगों की भी है। जिस दिन लोग नदी को कूड़ेदान समझना बंद कर देंगे, उसी दिन उसके पुनर्जन्म की शुरुआत होगी। हरमू प्रश्न बनकर खड़ी है-क्या हम अपनी अगली पीढ़ी को एक जीवित नदी देंगे या केवल उसकी तस्वीर और इतिहास? जवाब सरकार को भी देना है और हम-आपको भी। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/article/environment/harmu-river-ranchi-painful-story-environment-article/article-24743</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/article/environment/harmu-river-ranchi-painful-story-environment-article/article-24743</guid>
                <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 14:20:09 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-07/untitled-design-%2811%29_samridh_1200x720.jpeg"                         length="52978"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दुनिया वैसी ही बन जाती है, जैसी हम चाहते हैं</title>
                                    <description><![CDATA[दुनिया वैसी ही बन जाती है, जैसी हम चाहते हैं—राजीव थेपड़ा का यह विचारपरक लेख इंसानी इच्छाओं, लालच, अहंकार, हिंसा, शोषण और सामाजिक विसंगतियों के बीच आत्ममंथन का आह्वान करता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/duniya-waisi-hi-ban-jaati-hai-jaisi-hum-chahte-hain-rajiv-thepda/article-24727"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/6d34998e-81b8-41f5-ab56-01a2988cd08a_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>राजीव थेपड़ा</strong></p>
<p>फिर सुबह हो चुकी है और सूरज की चकाचौंध किरणें धरती के आधे हिस्से पर रोशनी बनकर फैल चुकी हैं! पंछीगण अपने-अपने डेरों से निकलकर अन्न की खोज में दूर-दूर निकल चुके हैं और तरह-तरह के पशु भी सड़कों, मैदानों और यहाँ-वहाँ फैल चुके हैं! सभी को महज भोजन चाहिए और बस इसी एक चीज भर के लिए वे जीते हैं! मगर मनुष्य नाम का एक प्राणी भी इसी धरती पर है, जो भोजन से इतर तरह-तरह की चीजों को चाहता है—तरह-तरह के साधन, तरह-तरह के मनोरंजन, तरह-तरह के व्यंजन, तरह-तरह का देह-सुख, असीम प्रेम, अनंत वासना और अथाह धन... बस ऐसी ही कुछ अभीप्साएँ हैं आदमी की, जिनके लिए वह जीता है और जिनके लिए औरों के जीने को हराम करता है!!</p>
<p>फिर सुबह हो चुकी है और उजाला हमारे चारों ओर दस्तक देकर सबके घरों के दरवाजे खुलवा चुका है और बस अभी थोड़ी ही देर में तरह-तरह के लोग तरह-तरह के अपने कार्यों में व्यस्त हो जाने वाले हैं! और तरह-तरह की खबरें मुझ तक—हम सब तक—तरह-तरह के साधनों के द्वारा पहुँचने लगी हैं, जिनमें अच्छी कम और ऊबाऊ और घृणास्पद ज्यादा हैं, जो न सिर्फ बीते हुए कल-परसों-नरसों-तरसों की हू-ब-हू हैं, बल्कि आने वाले कल-परसों-नरसों-तरसों की हू-ब-हू भी हैं!</p>
<p>जगह-जगह लूटपाट, जगह-जगह बलात्कार, जगह-जगह व्यापक बेईमानी, जगह-जगह शोषण और मानवाधिकार-हनन, जगह-जगह मारकाट और आतंकवाद, जगह-जगह घरेलू हिंसा और दहेज-हत्या, जगह-जगह बच्चों और अन्य निरीहों का यौन-शोषण, जगह-जगह कमजोर लोगों को आर्थिक, मानसिक और दैहिक यंत्रणा... और क्या-क्या लिखूँ, क्या-क्या बताऊँ!!</p>
<p>सुबह हो चुकी है। इस सुबह के साथ अरबों लोगों के कमाने-खाने और इसके लिए नौकरी-व्यवसाय और अन्य कार्यों में व्यस्त कर लेने का जैसे एक अंतहीन कार्यक्रम के दिन का प्रारंभ है। वहीं बहुत सारे लोगों के लिए एक खेल की शुरुआत भर है! कहीं धन, तो कहीं ताकत, तो कहीं सत्ता, तो कहीं वैभव, तो कहीं कुछ और की अधिकता का अहंकार/गुमान और यही नहीं, उस सबका वीभत्स/नग्न प्रदर्शन और उसके रास्ते में किसी रोड़े के आ जाने पर उसके खात्मे का दंभ...!! आदमी की यह यही नियति आदमी को पशुता के उच्च स्तर से राक्षसों के घटिया और गरिमाहीन/तुच्छ स्तर के भी शायद नीचे गिरा लाई है, मगर आदमी को इसका रंच मात्र भी भान नहीं है!!</p>
<p>आदमी का जर-जरा और जमीन का एक अंतहीन वासना भरा हुआ तुच्छ कार्यक्रम आदमी की सारी सुबहों को भयानक काली रात बनाए हुए है! उसकी हर वक्त की यौनिकता और यौन-संबंधों से लबालब दिन उसे आँखें भी खोलने देता है या नहीं, यह हमें नहीं पता!!... मगर उसकी इस वासना के शिकार, इस जर-जरा और जमीन की वासना के शिकार तथा उसके दर्पपूर्ण दंभ भरे अहंकार के शिकार चूँकि अन्य लाखों-करोड़ों लोग बनते हैं, इसलिए यह बात किसी की निजता की न रहकर सार्वजनिक हो जाती है, क्योंकि प्रश्न कुछ लोगों के सुबह के खेल से शुरू होने वाले आचरण से बहुत से अन्य लोगों के जीवन में हमेशा के लिए अँधेरी काली रात के फैल जाने का हो जाता है! ऐसी भयानक काली रात, जो न जीने देती है और न ही मरने!! और ऐसी काली रातों में विवश और कहर भरा जीवन जीते हुए लोगों के लिए ऐसे राक्षस लोग सदा भयानक अट्टहास करते हुए प्रतीत होते हैं!!</p>
<p>आज फिर सुबह आ गई है। सुबह रोज आती थी, सुबह कल भी आएगी और सुबह तो आती ही रहेगी! मगर सुबह के साथ सही में उजाला भी आ ही जाए, ये कतई जरूरी नहीं! नहीं है ना? सुबह का अखबार हर बीते हुए कल की सुबह-दोपहर-शाम और रात का आईना है! इस आईने में कल के समूचे दिन की कुछ घटनाएँ आदमी के अच्छेपन से ज्यादा उसके शैतानी दिमाग की सूरत ज्यादा दिखाई देती है, न सिर्फ कुछ लोगों की शैतानी हरकतों में, बल्कि हम जैसे खुद को शरीफ समझने वाले लोगों की हरकतों/कार्यों में भी...!! मगर इस बात के विस्तार में न जाकर मैं हम सबसे यही पूछ लेता हूँ ना कि क्यों जी, आप खुद के भीतर कभी झाँकते भी हो क्या कि सुबह से रात तलक किस तरह गुजारते हो आप अपना दिन...!! क्या वो दिन सचमुच पवित्रता से भरा होता है? क्या आप तरह-तरह से किसी को नहीं ठगते?</p>
<p>क्या आप किसी की भी लानत-मलामत नहीं करते? क्या आप सचमुच सब लोगों के साथ समभाव और सद्भाव से रहते हैं? क्या आप सचमुच नौकर-चाकर-दाई-मजदूर-कुली-ठेले-रिक्शे-ऑटो-खलासी-ड्राइवर आदि-आदि सबसे उचित और सम्माननीय व्यवहार करते हो? क्या आप सचमुच अपने परिवार-समाज का हित-पोषण करते हो?</p>
<p>इस सुबह आज का सवाल यही है कि क्या सचमुच हम खुद भी वैसे ही हैं, जैसी कि दुनिया हम अपने लिए चाहते हैं, चाहते रहे हैं!? बस अभी थोड़ी देर में यह सुबह क्रमशः दोपहर-शाम और रात में परिणत होकर खत्म हो जाने वाली है और जैसा कि हम जानते हैं कि काल अखंडित है, इस अखंडित काल की कल की सुबह और फिर परसों-नरसों-तरसों की सुबहें आने वाली हैं! तो फिर हमने क्या सोचा है अपने खुद के बारे में और थोड़ा बहुत ही सही, समाज के बारे में?? खुद को और समाज को ठीक वैसा ही छोड़ देना है या कुछ बदल भी डालना है, यानी कि अब खुद में सचमुच कोई उजाला भी भरना है या छोड़ देना है सारी आने वाली सुबहों को काली-स्याह के भयानक अँधेरे के भरोसे!!</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/article/society/duniya-waisi-hi-ban-jaati-hai-jaisi-hum-chahte-hain-rajiv-thepda/article-24727</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/article/society/duniya-waisi-hi-ban-jaati-hai-jaisi-hum-chahte-hain-rajiv-thepda/article-24727</guid>
                <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 16:56:53 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-07/6d34998e-81b8-41f5-ab56-01a2988cd08a_samridh_1200x720.jpeg"                         length="53146"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>डॉ. पी. के. अयंगर: वैज्ञानिक जिन्होंने भारत को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बनाने में निभाई ऐतिहासिक भूमिका</title>
                                    <description><![CDATA[भारत को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले महान वैज्ञानिक डॉ. पी. के. अयंगर की जयंती पर देश उन्हें श्रद्धापूर्वक याद कर रहा है। वर्ष 1974 के पोखरण परमाणु परीक्षण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/dr-pk-iyengar-scientist-who-played-a-historic-role-in/article-23783"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/762bee55-4a1b-4a3c-93e0-63a605771863_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>किसी भी राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी सैन्य क्षमता, आर्थिक संसाधनों या भौगोलिक विस्तार से नहीं मापी जाती, बल्कि उसके वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता और तकनीकी उपलब्धियों से भी निर्धारित होती है। भारत को विश्व के परमाणु शक्ति संपन्न देशों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा करने वाले जिन वैज्ञानिकों ने अपना जीवन समर्पित किया, उनमें डॉ. पी. के. अयंगर का नाम अत्यंत सम्मान और गौरव के साथ लिया जाता है। आज उनकी जयंती के अवसर पर देश उस महान वैज्ञानिक को स्मरण कर रहा है, जिसने न केवल भारत के परमाणु कार्यक्रम को नई दिशा दी, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और वैज्ञानिक स्वावलंबन की मजबूत नींव भी रखी।</p>
<p>29 जून 1931 को जन्मे डॉ. पद्मनाभ कृष्णगोपाल अयंगर भारतीय परमाणु विज्ञान के उन चुनिंदा वैज्ञानिकों में शामिल थे, जिन्होंने स्वतंत्र भारत के वैज्ञानिक विकास की कहानी को आकार दिया। वे महान वैज्ञानिक डॉ. होमी जहांगीर भाभा की उस दूरदर्शी टीम का हिस्सा रहे, जिसने भारत को परमाणु अनुसंधान के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प लिया था। अपने प्रारंभिक वैज्ञानिक जीवन से ही उन्होंने नाभिकीय भौतिकी, रिएक्टर प्रौद्योगिकी और परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया।</p>
<p>डॉ. अयंगर का नाम विशेष रूप से वर्ष 1974 में राजस्थान के पोखरण में किए गए भारत के प्रथम परमाणु परीक्षण से जुड़ा हुआ है। यह परीक्षण, जिसे दुनिया "स्माइलिंग बुद्धा" के नाम से जानती है, भारत के वैज्ञानिक इतिहास का एक निर्णायक अध्याय था। उस समय अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण थीं और विकसित देशों द्वारा परमाणु तकनीक पर कड़ा नियंत्रण रखा जाता था। ऐसे माहौल में भारतीय वैज्ञानिकों ने अपनी प्रतिभा और आत्मविश्वास के बल पर वह उपलब्धि हासिल की, जिसने पूरी दुनिया को भारत की वैज्ञानिक क्षमता का परिचय कराया।</p>
<p>यद्यपि इस परियोजना का नेतृत्व डॉ. राजा रमन्ना कर रहे थे, लेकिन परीक्षण में प्रयुक्त परमाणु उपकरण के विकास और तकनीकी संरचना तैयार करने में डॉ. अयंगर की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। उन्होंने इस पूरे मिशन को गोपनीय बनाए रखते हुए सफलता तक पहुंचाने में अग्रणी योगदान दिया। पोखरण परीक्षण के बाद भारत को एक ऐसी पहचान मिली, जिसने उसके सामरिक और वैज्ञानिक आत्मविश्वास को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।</p>
<p>डॉ. अयंगर केवल एक उत्कृष्ट वैज्ञानिक ही नहीं, बल्कि एक कुशल प्रशासक और दूरदर्शी नीति-निर्माता भी थे। वे भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) के निदेशक बने और बाद में भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष पद तक पहुंचे। उनके नेतृत्व में परमाणु ऊर्जा उत्पादन, अनुसंधान सुविधाओं के विस्तार और स्वदेशी तकनीकों के विकास को विशेष बल मिला। उन्होंने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि भारत को अपनी वैज्ञानिक आवश्यकताओं के लिए विदेशी तकनीकों पर निर्भर रहने के बजाय स्वदेशी अनुसंधान को प्राथमिकता देनी चाहिए।</p>
<p>उनकी सोच केवल परमाणु ऊर्जा तक सीमित नहीं थी। वे विज्ञान को राष्ट्र निर्माण का आधार मानते थे। उनका विश्वास था कि वैज्ञानिक प्रगति तभी सार्थक है जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। उन्होंने वैज्ञानिक समुदाय को हमेशा नवाचार, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय हितों के प्रति प्रतिबद्ध रहने की प्रेरणा दी।</p>
<p>डॉ. अयंगर अपने स्पष्ट और स्वतंत्र विचारों के लिए भी जाने जाते थे। उन्होंने भारत-अमेरिका असैनिक परमाणु समझौते पर खुलकर अपनी राय व्यक्त की थी। उनका मानना था कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते का मूल्यांकन राष्ट्रीय हितों के आधार पर किया जाना चाहिए। वैज्ञानिक होने के साथ-साथ वे एक जागरूक नागरिक भी थे, जो राष्ट्रीय नीतियों पर अपनी निष्पक्ष और तथ्यपरक राय रखने से कभी पीछे नहीं हटे।</p>
<p>जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने शांति, परमाणु निरस्त्रीकरण और दक्षिण एशिया में स्थायी स्थिरता के पक्ष में आवाज उठाई। भारत और पाकिस्तान के बीच संवाद तथा विश्वास निर्माण को वे क्षेत्रीय शांति के लिए आवश्यक मानते थे। यह उनके व्यक्तित्व का वह पक्ष था जो बताता है कि परमाणु शक्ति के समर्थक होने के बावजूद वे मानवता और शांति के मूल्यों को सर्वोपरि मानते थे।</p>
<p>21 दिसंबर 2011 को डॉ. पी. के. अयंगर इस दुनिया से विदा हो गए, लेकिन उनकी वैज्ञानिक विरासत आज भी जीवित है। भारत का सशक्त परमाणु कार्यक्रम, आत्मनिर्भर अनुसंधान संस्थान और वैश्विक मंच पर वैज्ञानिक प्रतिष्ठा उनके योगदान की साक्षी हैं। वर्तमान समय में जब भारत विज्ञान, अंतरिक्ष, रक्षा और ऊर्जा के क्षेत्रों में नई उपलब्धियां हासिल कर रहा है, तब डॉ. अयंगर जैसे वैज्ञानिकों का योगदान और भी अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है।</p>
<p>उनकी जयंती केवल एक महान वैज्ञानिक को श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं है, बल्कि यह याद दिलाने का भी समय है कि राष्ट्र की प्रगति का वास्तविक आधार ज्ञान, अनुसंधान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण होता है। डॉ. पी. के. अयंगर का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है और उनकी उपलब्धियां भारतीय विज्ञान के इतिहास में सदैव स्वर्णिम अक्षरों में अंकित रहेंगी।</p>
<img src="https://samridhjharkhand.com/media/2026-06/de71a463-47a4-406f-b7cb-795238d78b34.jpg" alt="डॉ. पी. के. अयंगर: वैज्ञानिक जिन्होंने भारत को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बनाने में निभाई ऐतिहासिक भूमिका" width="151" height="150"></img>
<strong>लेखक- रंजन साव</strong>

<p><strong> </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/article/dr-pk-iyengar-scientist-who-played-a-historic-role-in/article-23783</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/article/dr-pk-iyengar-scientist-who-played-a-historic-role-in/article-23783</guid>
                <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 20:13:03 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-06/762bee55-4a1b-4a3c-93e0-63a605771863_samridh_1200x720.jpeg"                         length="51036"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>उधवा झील: जहां हर सर्दी हजारों किलोमीटर उड़कर पहुंचते हैं परिंदों के मेहमान</title>
                                    <description><![CDATA[साहिबगंज स्थित उधवा झील झारखंड की एकमात्र पक्षी अभयारण्य और राज्य की इकलौती रामसर साइट है। हर वर्ष सर्दियों में साइबेरिया, मंगोलिया और यूरोप से हजारों प्रवासी पक्षी यहां पहुंचते हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/sahibganj/udhwa-lake-jharkhand-ramsar-site-migratory-birds-sahibganj-feature/article-23674"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/8c83dce6-dd18-45e3-a98e-1c95df1fc535_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>संजय कुमार धीरज</strong></p>
<p><strong>साहिबगंज:</strong> झारखंड की एकमात्र पक्षी अभयारण्य उधवा झील एक बार फिर हजारों प्रवासी परिंदों के कलरव से जीवंत हो उठी है। मानसून के दस्तक के साथ ही साइबेरिया, मंगोलिया, मध्य एशिया और यूरोप के बर्फीले इलाकों से उड़ान भरकर ये मेहमान परिंदे गंगा के कछार में बसी इस झील को अपना अस्थायी घर बनाने पहुंच रहे हैं। रामसर साइट का दर्जा प्राप्त उधवा झील अब सिर्फ साहिबगंज की पहचान नहीं, बल्कि वैश्विक जैव विविधता और संरक्षण के नक्शे पर एक अहम बिंदु बन चुकी है।</p>
<h4><strong>दो झीलों का संगम है उधवा  </strong></h4>
<p>उधवा पक्षी अभयारण्य दरअसल दो बड़ी झीलों, पतौरा और बेरहाले, से मिलकर बना है। करीब 5.65 वर्ग किमी में फैला यह वेटलैंड गंगा नदी के बाढ़ क्षेत्र से जुड़ा है। बरसात में गंगा का पानी यहां भर जाता है, जिससे झील में सालभर नमी बनी रहती है। यही वजह है कि यहां जलकुंभी, कमल, सिंघाड़ा और मछलियों की भरपूर उपलब्धता रहती है, जो प्रवासी पक्षियों के लिए आदर्श भोजन है।</p>
<h4><strong>धैर्य से कैद हुई प्रकृति की कविता  </strong></h4>
<p>वन्यजीव फोटोग्राफरों के लिए उधवा झील किसी जन्नत से कम नहीं। सुबह की धुंध, पानी पर तैरती नाव और हजारों परिंदों का एक साथ उड़ान भरना, ये नजारे कैमरे में कैद करने के लिए घंटों धैर्य चाहिए। हाल ही में कुछ फोटोग्राफरों ने यहां के दुर्लभ पलों को कैमरे में उतारा है। ये तस्वीरें सिर्फ फ्रेम नहीं, बल्कि प्रवास, संघर्ष और प्रकृति की कालातीत लय की जीवंत कहानियां हैं। हर पंख की फड़फड़ाहट में महाद्वीपों के पार की दास्तान छिपी है।</p>
<h4><strong>कौन-कौन से मेहमान पहुंचे इस बार  </strong></h4>
<p>नवंबर से मार्च तक उधवा झील में नॉर्दर्न पिनटेल, कॉमन टील, गडवाल, यूरेशियन विजन, बार-हेडेड गूज, ग्रे-लेग गूज, कॉमन पोचार्ड और रेड-क्रेस्टेड पोचार्ड जैसी दर्जनों प्रजातियां डेरा डालती हैं। इसके अलावा स्थानीय प्रजातियों में पर्पल स्वैम्पहेन, फेजेंट-टेल्ड जैकाना, ब्रॉन्ज-विंग्ड जैकाना, लेसर व्हिसलिंग डक सालभर दिखते हैं। पक्षी विशेषज्ञों के मुताबिक यहां 100 से ज्यादा प्रजातियों के पक्षी रिकॉर्ड किए गए हैं, जिनमें कई IUCN की रेड लिस्ट में संकटग्रस्त श्रेणी में हैं।</p>
<h4><strong>रामसर साइट: क्यों है खास?  </strong></h4>
<p>उधवा झील को 2021 में रामसर साइट घोषित किया गया था। रामसर कन्वेंशन अंतरराष्ट्रीय महत्व के वेटलैंड को बचाने की संधि है। यह दर्जा मिलने से उधवा झील अब वैश्विक संरक्षण प्रयासों का हिस्सा बन गई है। यह झारखंड का इकलौता रामसर साइट और इकलौता पक्षी अभयारण्य दोनों है।</p>
<h4><strong>खतरे भी कम नहीं: संरक्षण की दरकार </strong></h4>
<p>पर्यावरणविद सह मॉडल कॉलेज के प्राचार्य डॉक्टर रणजीत कुमार सिंह बताते हैं कि उधवा झील की सेहत लगातार बिगड़ रही है। जलकुंभी तेजी से फैल रही है जिससे खुला पानी कम हो रहा है। आस-पास के इलाकों में अवैध मछली पकड़ना, शिकार और खेती के लिए कीटनाशकों का इस्तेमाल परिंदों के लिए खतरा है। पर्यटन के नाम पर होने वाला शोर भी पक्षियों को परेशान करता है। डॉक्टर रणजीत सिंह कहते हैं कि वन विभाग ने गश्त बढ़ाई है, लेकिन स्थानीय लोगों की भागीदारी के बिना संरक्षण अधूरा है। उधवा झील सिर्फ तस्वीरें खींचने की जगह नहीं, यह हमारे पारिस्थितिकी तंत्र का फेफड़ा है।</p>
<h4><strong>पर्यटन की अपार संभावनाएं  </strong></h4>
<p>साहिबगंज जिला प्रशासन उधवा झील को ईको-टूरिज्म हब के रूप में विकसित करने की योजना बना रहा है। वॉच टावर, बोटिंग और नेचर गाइड की सुविधा से यहां पर्यटकों की संख्या बढ़ी है। सर्दियों में बर्ड वॉचिंग के लिए देश-विदेश से लोग आते हैं। इससे स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के मौके भी बन रहे हैं। उधवा झील हर साल सर्दियों में आसमान पर परिंदों से नई इबारत लिखती है। जरूरत है तो बस इन परिंदों की भाषा समझने की, इनकी उड़ान को महफूज रखने की। क्योंकि जब तक उधवा में परिंदे लौटते रहेंगे, तब तक प्रकृति की यह कविता अधूरी नहीं होगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>साहिबगंज</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/sahibganj/udhwa-lake-jharkhand-ramsar-site-migratory-birds-sahibganj-feature/article-23674</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/sahibganj/udhwa-lake-jharkhand-ramsar-site-migratory-birds-sahibganj-feature/article-23674</guid>
                <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 15:46:55 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-06/8c83dce6-dd18-45e3-a98e-1c95df1fc535_samridh_1200x720.jpeg"                         length="52271"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आपातकाल: भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय, इंदिरा गांधी की वह क्रूरता जिसे देश कभी नहीं भूल सकता</title>
                                    <description><![CDATA[25 जून 1975 को लागू आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय बताते हुए इस लेख में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के फैसले, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी, प्रेस सेंसरशिप, मौलिक अधिकारों के निलंबन और 42वें संविधान संशोधन जैसे घटनाक्रमों का उल्लेख किया गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/emergency-1975-bharatiya-loktantra-ka-sabse-kala-adhyay-babulal-marandi/article-23575"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/3f38e84c-548b-4f2f-b43d-5a969e43ac96_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>अंग्रेजों से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र बना, किंतु स्वतंत्रता के ठीक 28 वर्ष बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा थोपा गया आपातकाल भारतीय लोकतंत्र पर सबसे बड़ा आघात सिद्ध हुआ। 25 जून 1975 की मध्यरात्रि को लागू किया गया आपातकाल लोकतांत्रिक संस्थाओं, नागरिक स्वतंत्रताओं और संविधान की मूल भावना को कुचलने का प्रयास था।</p>
<p>26 जून 1975 की सुबह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आकाशवाणी के माध्यम से राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा, "राष्ट्रपति ने आपातकाल की घोषणा की है। घबराने की कोई बात नहीं है।" किंतु यह घोषणा भारतीय लोकतंत्र के लिए एक भयावह दौर की शुरुआत थी। सत्ता बचाने की लालसा में इंदिरा गांधी ने तानाशाही का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसकी स्मृतियाँ आज भी उस पीढ़ी को विचलित कर देती हैं।</p>
<p>भारत इससे पूर्व अनुच्छेद-352 के अंतर्गत दो बार आपातकाल देख चुका था—1962 में चीन के आक्रमण तथा 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान। किंतु 1975 का आपातकाल पहली बार "आंतरिक अशांति" के आधार पर घोषित किया गया था।</p>
<p>आपातकाल की घोषणा के साथ ही जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस सहित सैकड़ों विपक्षी नेताओं को रातोंरात गिरफ्तार कर लिया गया। सत्ता पक्ष में होते हुए भी चंद्रशेखर को जेल भेज दिया गया क्योंकि वे इंदिरा गांधी की नीतियों के आलोचक बन चुके थे।</p>
<p>प्रेस पर कठोर सेंसरशिप लागू कर दी गई। समाचार-पत्रों को प्रकाशन से पहले सरकारी स्वीकृति लेना अनिवार्य कर दिया गया। मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए और नागरिक स्वतंत्रताओं का दमन किया गया। परिणामस्वरूप कार्यपालिका निरंकुश हो गई तथा लोकतंत्र का स्वरूप लगभग समाप्त-सा हो गया।</p>
<p>इंदिरा गांधी केवल आपातकाल लागू कर संतुष्ट नहीं हुईं। उन्होंने इसी अवधि में 42वाँ संविधान संशोधन भी कराया, जिसे संविधान के इतिहास के सबसे व्यापक और विवादास्पद संशोधनों में गिना जाता है। आलोचकों ने इसे "मिनी संविधान" तक कहा।</p>
<p>पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे.सी. शाह की अध्यक्षता में गठित शाह आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 25 जून 1975 को राष्ट्रपति को आपातकाल की सलाह देने से पहले मंत्रिपरिषद से समुचित परामर्श नहीं किया गया था। आयोग ने यह भी माना कि आपातकाल किसी वास्तविक राष्ट्रीय संकट का परिणाम नहीं था, बल्कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा इंदिरा गांधी के निर्वाचन को अवैध घोषित किए जाने के बाद उत्पन्न राजनीतिक संकट से उबरने का एक पूर्वनियोजित प्रयास था।</p>
<h4><strong>इमरजेंसी की पृष्ठभूमि</strong></h4>
<p>1971 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली से जीत हासिल करने के बाद इंदिरा गांधी के प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने उनके निर्वाचन को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उन पर सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग और चुनावी भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए।</p>
<p>उधर देश गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा था। महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार चरम पर थे। गुजरात और बिहार में छात्र आंदोलनों ने व्यापक जनसमर्थन प्राप्त कर लिया था। 1974 में जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में हुई देशव्यापी रेल हड़ताल ने केंद्र सरकार की मुश्किलें और बढ़ा दी थीं।</p>
<p>12 जून 1975 को न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी के निर्वाचन को अवैध घोषित करते हुए उन्हें छह वर्षों तक चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहरा दिया। इसके बाद उनकी राजनीतिक स्थिति संकट में आ गई। इसी पृष्ठभूमि में 25 जून 1975 की रात राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की मंजूरी से देश में आपातकाल लागू कर दिया गया।</p>
<h4><strong>इस्तीफे के बजाय आपातकाल</strong></h4>
<p>संसदीय लोकतंत्र में ऐसी परिस्थिति आने पर नैतिक आधार पर त्यागपत्र देना एक स्वाभाविक विकल्प माना जाता है। इंदिरा गांधी चाहतीं तो किसी अन्य वरिष्ठ नेता को प्रधानमंत्री पद सौंप सकती थीं, किंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसके विपरीत उन्होंने आपातकाल का रास्ता चुना और सत्ता अपने हाथों में केंद्रित कर ली।</p>
<h4>19 महीने का काला दौर</h4>
<p>आपातकाल कुल 19 महीनों तक चला। इस दौरान संसद की अवधि बढ़ा दी गई और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ सीमित कर दी गईं। मार्च 1977 में जब आम चुनाव हुए तो जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। स्वयं इंदिरा गांधी रायबरेली से चुनाव हार गईं।</p>
<h4>मीसा और डीआईआर का कहर</h4>
<p>आपातकाल के दौरान मीसा (MISA) और डीआईआर (DIR) के तहत एक लाख से अधिक लोगों को जेलों में बंद किया गया। जयप्रकाश नारायण सहित अनेक नेताओं को लंबी अवधि तक कारावास झेलना पड़ा।</p>
<p>इसी काल में संजय गांधी के प्रभाव में व्यापक स्तर पर नसबंदी अभियान चलाया गया। लाखों लोगों की जबरन नसबंदी कराई गई। अनेक स्थानों पर प्रशासनिक दबाव और पुलिस कार्रवाई के माध्यम से लोगों को इस अभियान का शिकार बनाया गया।</p>
<h4>नरेंद्र मोदी की दृष्टि</h4>
<p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पुस्तक "The Emergency Diaries" में आपातकाल के दौरान के अनुभवों का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है कि उस समय वे एक युवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रचारक थे और लोकतंत्र की रक्षा के लिए चल रहे आंदोलन से जुड़े थे। उनके अनुसार, आपातकाल का दौर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के महत्व को समझने का एक बड़ा अनुभव था।</p>
<h4>आज का भारत 1975 वाला भारत नहीं, लेकिन आपातकाल की टीस अमिट</h4>
<p>आज का भारत 1975 वाला भारत नहीं है। लोकतांत्रिक संस्थाएँ कहीं अधिक मजबूत हैं और नागरिक अपने अधिकारों के प्रति अधिक सजग हैं। किंतु आपातकाल की स्मृति हमें यह चेतावनी देती है कि लोकतंत्र केवल संविधान की धाराओं से नहीं, बल्कि सत्ता की जवाबदेही, नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण से जीवित रहता है।</p>
<p>25 जून 1975 का आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का वह अध्याय है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। यह सत्ता के केंद्रीकरण और संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग के खतरों का स्थायी स्मरण कराता है।</p>
<p><strong>लेखक</strong><br /><strong>बाबूलाल मरांडी</strong><br /><strong>नेता प्रतिपक्ष, झारखंड विधानसभा</strong><br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/article/emergency-1975-bharatiya-loktantra-ka-sabse-kala-adhyay-babulal-marandi/article-23575</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/article/emergency-1975-bharatiya-loktantra-ka-sabse-kala-adhyay-babulal-marandi/article-23575</guid>
                <pubDate>Wed, 24 Jun 2026 14:49:59 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-06/3f38e84c-548b-4f2f-b43d-5a969e43ac96_samridh_1200x720.jpeg"                         length="51853"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नाथवानी की जीत से झारखंड भाजपा को मिला बूस्टर डोज, रणनीति रही सफल, आदित्य साहू भी हुए मजबूत</title>
                                    <description><![CDATA[राज्यसभा चुनाव में भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी की जीत को झारखंड भाजपा के लिए बड़ी राजनीतिक सफलता माना जा रहा है। इस जीत से पार्टी कार्यकर्ताओं में नया उत्साह आया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू की स्थिति भी मजबूत हुई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/parimal-nathwani-victory-boosts-bjp-jharkhand-aditya-sahu-strengthens-position/article-23474"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/7a291882-cdae-4c11-954f-7701a9161385_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>सुनील सिंह</strong></p>
<p><strong>रांची:</strong> राज्यसभा चुनाव में भाजपा समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी की जीत से भाजपा खेमे में उत्साह है। पार्टी में नई ऊर्जा का संचार हुआ है, क्योंकि झारखंड में लंबे समय के बाद पार्टी को बूस्टर डोज मिला है।</p>
<p>पिछले दो विधानसभा चुनावों में मिली करारी शिकस्त के बाद पार्टी का हौसला पस्त हो चुका था। संगठन के स्तर पर भी खामियां दिख रही थीं और पार्टी में गुटबाजी हावी थी।</p>
<p>लंबे समय के बाद राज्यसभा चुनाव में भाजपा की रणनीति सफल रही। भाजपा ने बहुत सोच-समझकर निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी को समर्थन दिया। नाथवानी ने जब भाजपा से समर्थन मांगा तो पार्टी तुरंत तैयार हो गई। यह इसलिए कि उसे पता था कि नाथवानी चुनाव जीतने के माहिर खिलाड़ी हैं। निर्दलीय होकर भी चुनाव कैसे जीता जा सकता है, यह नाथवानी को अच्छी तरह पता है। झारखंड में सभी राजनीतिक दलों से उनके अच्छे रिश्ते हैं। वह सब कुछ आसानी से मैनेज कर लेते हैं।</p>
<p>भाजपा और एनडीए के पास अपना पर्याप्त संख्या बल नहीं था। इसलिए पार्टी के रणनीतिकारों ने अपने सभी नेताओं, यहां तक कि राष्ट्रीय नेतृत्व की ओर से झारखंड भेजे गए गौरव वल्लभ की दावेदारी को भी खारिज कर दिया। नाथवानी को समर्थन दिया और परिणाम सामने है।</p>
<p>नाथवानी ने भले अपने बूते वोट मैनेज कर जीत हासिल की हो, लेकिन इसके पीछे भाजपा की रणनीति भी थी। भाजपा ने हर कदम पर नाथवानी का साथ दिया। दोनों ने मिलकर जीत की रणनीति बनाई। भाजपा और एनडीए के विधायकों में किसी तरह की फूट न पड़े, इसे लेकर भाजपा का प्रदेश नेतृत्व सजग रहा। मतदान के दो दिन पहले सभी विधायकों को एक होटल में शिफ्ट कर दिया गया।</p>
<p>प्रदेश और केंद्रीय नेतृत्व के बीच लगातार संवाद होता रहा। छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा भी रणनीतिकारों में शामिल थे। चुनाव को लेकर राष्ट्रीय नेतृत्व ने विजय शर्मा को झारखंड की जिम्मेदारी दी थी।</p>
<p>राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया के दौरान ही नितिन नवीन झारखंड आए थे। दो दिनों तक झारखंड में रहकर उन्होंने नेताओं और कार्यकर्ताओं को सफलता के टिप्स दिए और टास्क भी देकर गए। उन्होंने कहा कि झारखंड में अगली सरकार भाजपा बनाएगी। इस दिशा में अभी से प्रयास शुरू हो चुका है। नाथवानी जैसा एक मजबूत राज्यसभा सांसद भी भाजपा को मिल गया है, जिसका लाभ पार्टी को मिलता रहेगा।</p>
<p>प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू भी लगातार पार्टी को मजबूत करने में जुटे हैं। इसमें उन्हें सफलता भी मिल रही है। वह काफी मेहनत कर रहे हैं। आदित्य साहू के अध्यक्ष बनने के बाद राज्यसभा का चुनाव भाजपा के लिए नाक का सवाल था। यह आदित्य साहू और पार्टी दोनों के लिए अग्निपरीक्षा भी थी। इस परीक्षा में पार्टी ने शानदार सफलता हासिल की। भले ही नाथवानी उम्मीदवार के तौर पर दूल्हा थे, लेकिन धूमधाम से बारात निकलने का श्रेय भाजपा और एनडीए को ही जाता है। चुनावी जीत से आदित्य साहू भी मजबूत हुए हैं। कार्यकर्ताओं में जो उत्साह दिख रहा है, उसका असर आगे भी देखने को मिल सकता है।</p>
<p>नाथवानी की जीत से इंडिया गठबंधन में दरार पड़ गई है। क्रॉस वोटिंग से कांग्रेस प्रत्याशी की हार के बाद गठबंधन में तनाव और घमासान की स्थिति है। कांग्रेस, राजद और माले एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं। इंडिया गठबंधन का कमजोर होना भी भाजपा के लिए फायदेमंद माना जा रहा है।</p>
<p>सरकार की सेहत भी अच्छी नहीं बताई जा रही है। अंदरखाने नए सत्ता समीकरण बनने की चर्चाएं तेज हैं। कांग्रेस सरकार से बाहर हो सकती है और राज्य में गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा सरकार बनने की संभावनाओं पर भी चर्चा हो रही है। सरकार बनाने को लेकर पर्याप्त संख्या बल होने की बातें राजनीतिक गलियारों में कही जा रही हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/parimal-nathwani-victory-boosts-bjp-jharkhand-aditya-sahu-strengthens-position/article-23474</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/parimal-nathwani-victory-boosts-bjp-jharkhand-aditya-sahu-strengthens-position/article-23474</guid>
                <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 16:15:28 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-06/7a291882-cdae-4c11-954f-7701a9161385_samridh_1200x720.jpeg"                         length="52085"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>इतिहास नहीं, जनता को जवाब चाहिए; भाजपा के 12 साल का हिसाब चाहिए: विजय शंकर नायक </title>
                                    <description><![CDATA[झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमिटी के प्रदेश प्रवक्ता विजय शंकर नायक ने अपने लेख में भाजपा सरकार के 12 वर्षों के कार्यकाल पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने रोजगार, महंगाई, किसानों की आय, नोटबंदी, जीएसटी, कोविड प्रबंधन और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिति जैसे मुद्दों को उठाते हुए सरकार से जवाब मांगा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/politics/vijay-shankar-nayak-article-bjp-12-years-accountability-employment-inflation/article-23106"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/9007269d-5be9-4b17-9c48-22d73ed2efad_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>सत्ता का मूल्यांकन नारों, विज्ञापनों और इवेंट मैनेजमेंट से नहीं, बल्कि जनता के जीवन में आए बदलावों से होता है। वर्ष 2014 में भाजपा ने देश की जनता से बड़े-बड़े वादे किए थे। भ्रष्टाचार मुक्त भारत, हर साल दो करोड़ रोजगार, किसानों की आय दोगुनी, महंगाई पर नियंत्रण, काला धन वापस लाकर हर खाते में 15 लाख रुपये, अच्छे दिन और विकास का नया मॉडल—इन वादों के सहारे भाजपा सत्ता में आई थी। आज 12 वर्ष बाद देश का नागरिक पूछ रहा है कि उन वादों का क्या हुआ?</p>
<p>भाजपा सरकार का सबसे बड़ा संकट यह है कि वह अपने 12 वर्षों का हिसाब देने के बजाय इतिहास बदलने और राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने में अधिक व्यस्त दिखाई देती है। नेहरू, इंदिरा गांधी और कांग्रेस की विरासत पर हमला भाजपा की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन चुका है, क्योंकि वर्तमान की विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए अतीत पर हमला करना सबसे आसान रास्ता है।</p>
<p>लेकिन इतिहास प्रचार से नहीं बदलता। पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे। उन्हीं के नेतृत्व में लोकतांत्रिक संस्थाओं, सार्वजनिक क्षेत्र, वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थानों, IIT, AIIMS, बड़े बांधों और आधुनिक भारत की बुनियाद रखी गई। सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. भीमराव आंबेडकर और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी तक नेहरू मंत्रिमंडल का हिस्सा रहे। आज भाजपा इन महापुरुषों की विरासत का राजनीतिक उपयोग करती है, लेकिन उनके संवैधानिक और लोकतांत्रिक आदर्शों को कमजोर करने का आरोप भी उसी पर लगता है।</p>
<h3><span><strong>वादों का पहाड़, नतीजों का अकाल</strong></span></h3>
<p>2014 में कहा गया था कि हर साल दो करोड़ नौकरियां पैदा होंगी। यदि यह वादा पूरा होता, तो 12 वर्षों में करोड़ों युवाओं को रोजगार मिल चुका होता। लेकिन आज देश का युवा नौकरी के लिए भटक रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, रिक्त पदों पर नियुक्तियों में देरी और रोजगार के अवसरों की कमी युवाओं के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा रही है।</p>
<p>किसानों से आय दोगुनी करने का वादा किया गया था। लेकिन किसानों को अपनी मांगों के लिए दिल्ली की सीमाओं पर महीनों आंदोलन करना पड़ा। तीन कृषि कानूनों को किसानों के हित में बताया गया, लेकिन जब लाखों किसान सड़कों पर उतर आए, तो सरकार को उन्हें वापस लेना पड़ा। यह भाजपा सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक पराजयों में से एक थी।</p>
<p>महंगाई पर नियंत्रण का दावा किया गया था। लेकिन रसोई गैस, पेट्रोल, डीजल, खाद्य पदार्थ, दाल, तेल और रोजमर्रा की वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने गरीब और मध्यम वर्ग की कमर तोड़ दी। आम आदमी की आय जितनी नहीं बढ़ी, उससे कहीं अधिक उसकी जिंदगी महंगी हो गई।</p>
<h3><span><strong>नोटबंदी : आर्थिक आपदा का अध्याय</strong></span></h3>
<p>नोटबंदी को काले धन, भ्रष्टाचार और आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कदम बताया गया था। लेकिन परिणाम क्या निकला?</p>
<p>लगभग पूरी नकदी बैंकिंग प्रणाली में वापस लौट आई। छोटे व्यापार चौपट हो गए। लाखों मजदूर बेरोजगार हुए। असंगठित क्षेत्र को भारी नुकसान हुआ। अर्थव्यवस्था की रफ्तार प्रभावित हुई। देश की जनता ने घंटों लाइन में खड़े होकर कष्ट झेला, लेकिन वादे के अनुरूप परिणाम कभी सामने नहीं आए।</p>
<p>इतिहास नोटबंदी को आर्थिक सुधार नहीं, बल्कि आर्थिक अव्यवस्था के रूप में याद रखेगा।</p>
<h3><span><strong>जीएसटी : एक राष्ट्र, अनेक परेशानियां</strong></span></h3>
<p>जीएसटी को ऐतिहासिक कर सुधार बताया गया था, लेकिन छोटे और मध्यम व्यापारियों के लिए यह जटिल अनुपालन और बढ़ती कागजी प्रक्रिया का प्रतीक बन गया। बड़े कॉरपोरेट समूहों के पास संसाधन थे, लेकिन छोटे दुकानदारों और लघु उद्योगों को इसका भारी बोझ उठाना पड़ा।</p>
<h3><span><strong>विकास या प्रचार?</strong></span></h3>
<p>भाजपा सरकार ने मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, आत्मनिर्भर भारत, स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेन जैसी परियोजनाओं का व्यापक प्रचार किया। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन योजनाओं ने उतने रोजगार पैदा किए, जितने वादे किए गए थे?</p>
<p>स्मार्ट सिटी परियोजनाएं अधूरी हैं। बुलेट ट्रेन अभी तक सपना बनी हुई है। मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई। चीन पर निर्भरता कम करने के दावे भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके।</p>
<p>भाजपा शासन का मॉडल विकास से अधिक विज्ञापन-आधारित शासन का मॉडल बन गया, जहां उपलब्धि से ज्यादा उसका प्रचार महत्वपूर्ण हो गया।</p>
<h3><span><strong>कोविड काल की त्रासदी</strong></span></h3>
<p>कोविड महामारी के दौरान देश ने भयावह दृश्य देखे। लाखों प्रवासी मजदूर पैदल घर लौटने को मजबूर हुए। ऑक्सीजन की कमी, अस्पतालों में अव्यवस्था और स्वास्थ्य ढांचे की कमजोरियां उजागर हुईं। महामारी ने दिखा दिया कि चमकदार प्रचार और वास्तविक प्रशासनिक तैयारी में कितना अंतर हो सकता है।</p>
<h3><span><strong>लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बढ़ते सवाल</strong></span></h3>
<p>भाजपा सरकार पर सबसे गंभीर आरोप लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता को कमजोर करने का है। विपक्ष का आरोप है कि केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ हथियार की तरह किया गया। संसद में बहस की परंपरा कमजोर हुई। मीडिया के एक बड़े हिस्से ने सत्ता से सवाल पूछने के बजाय उसका प्रचार करना अधिक उचित समझा।</p>
<p>लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है असहमति का सम्मान, संस्थाओं की स्वतंत्रता और सत्ता की जवाबदेही।</p>
<h3><span><strong>सामाजिक सौहार्द पर संकट</strong></span></h3>
<p>“सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” का नारा दिया गया था। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि पिछले वर्षों में समाज में ध्रुवीकरण बढ़ा है। बेरोजगारी, महंगाई और आर्थिक संकट जैसे मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए धार्मिक और सांप्रदायिक बहसों को लगातार राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया।</p>
<p>जब रोजगार का प्रश्न उठता है, तो धर्म की चर्चा शुरू हो जाती है। जब महंगाई पर सवाल उठता है, तो नया भावनात्मक मुद्दा सामने आ जाता है। यह लोकतांत्रिक विमर्श के लिए शुभ संकेत नहीं है।</p>
<h3><span><strong>अग्निपथ, पेपर लीक और युवाओं की निराशा</strong></span></h3>
<p>अग्निपथ योजना ने लाखों युवाओं के मन में भविष्य को लेकर असुरक्षा पैदा की। दूसरी ओर, विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाओं ने युवाओं का विश्वास तोड़ा। एक ऐसा देश, जिसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है, वहां युवाओं का निराश होना सबसे बड़ी राष्ट्रीय चिंता का विषय होना चाहिए।</p>
<h3><span><strong>निष्कर्ष : इतिहास नहीं, हिसाब चाहिए</strong></span></h3>
<p>भाजपा के 12 वर्षों का मूल्यांकन करते समय देश को विज्ञापनों, नारों और राजनीतिक अभियानों से ऊपर उठकर वास्तविकताओं को देखना होगा। बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की परेशानी, नोटबंदी की विफलता, जीएसटी की जटिलता, कोविड की त्रासदी, सामाजिक ध्रुवीकरण, संस्थाओं पर सवाल और अधूरे वादे—ये सभी ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर जवाब मांगा जाना चाहिए।</p>
<p>जनता इतिहास बदलने की कोशिशों से प्रभावित नहीं होगी। जनता अपने जीवन की वास्तविकताओं के आधार पर फैसला करेगी।</p>
<p>देश पूछ रहा है—दो करोड़ नौकरियां कहां हैं?</p>
<p>किसानों की दोगुनी आय कहां है? 15 लाख रुपये कहां हैं? महंगाई पर नियंत्रण कहां है? भ्रष्टाचार मुक्त शासन कहां है? 12 साल बाद भी यदि इन सवालों का जवाब नहीं है, तो फिर यह कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि प्रचार रही है और सबसे बड़ी विफलता जनता की उम्मीदों को पूरा न कर पाना।</p>
<p><strong>इतिहास पर कब्ज़ा नहीं, जनता को जवाब चाहिए।</strong></p>
<p><strong>भाजपा के 12 साल का हिसाब चाहिए।</strong></p>
<p>अब देश में ऐसी राजनीति होनी चाहिए, जिससे रोजगार पैदा किया जा सके, महंगाई को कम किया जा सके, किसानों, छात्रों, युवाओं, महिलाओं, गरीब-गुरबा लोगों और खासकर दलित, आदिवासी, पिछड़ा, अल्पसंख्यक तथा मजदूर वर्ग को राहत मिल सके तथा संविधान व लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत किया जा सके।</p>
<p>अंततः लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता का होता है। प्रचार, छवि निर्माण और राजनीतिक नैरेटिव कितने भी मजबूत हों, जनता का अनुभव और जीवन की वास्तविकता ही किसी सरकार की असली परीक्षा तय करती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/news/politics/vijay-shankar-nayak-article-bjp-12-years-accountability-employment-inflation/article-23106</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/news/politics/vijay-shankar-nayak-article-bjp-12-years-accountability-employment-inflation/article-23106</guid>
                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 17:24:51 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-06/9007269d-5be9-4b17-9c48-22d73ed2efad_samridh_1200x720.jpeg"                         length="49986"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सोशल मीडिया और भारतीय युवा: अवसरों के साथ बढ़ती चुनौतियाँ</title>
                                    <description><![CDATA[भारत का युवा वर्ग तेजी से डिजिटल दुनिया से जुड़ रहा है। स्मार्टफोन और इंटरनेट की बढ़ती पहुंच ने सोशल मीडिया को युवाओं के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया है। इससे शिक्षा, रोजगार, कौशल विकास और उद्यमिता के नए अवसर मिले हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/social-media-and-indian-youth-opportunities-and-growing-challenges/article-23058"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/811f309c-b5e8-4fe6-b012-7dbb3f56a036_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में से एक है। डिजिटल क्रांति ने युवाओं के जीवन, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक संबंधों को गहराई से प्रभावित किया है। स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट की उपलब्धता ने सोशल मीडिया को युवाओं की दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बना दिया है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, व्हाट्सएप और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म आज संचार और मनोरंजन के प्रमुख माध्यम बन चुके हैं।</p>
<p>भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा वर्ष 2025 में जारी "कॉम्प्रिहेन्सिव मॉड्यूलर सर्वे : टेलीकॉम" के अनुसार 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 97 प्रतिशत युवाओं ने पिछले तीन महीनों में मोबाइल फोन का उपयोग किया, जबकि लगभग 94 प्रतिशत युवाओं ने इंटरनेट का उपयोग किया। सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि इस आयु वर्ग के मोबाइल धारकों में 95 प्रतिशत से अधिक के पास स्मार्टफोन उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त देश के 85.5 प्रतिशत परिवारों के पास कम से कम एक स्मार्टफोन तथा 86.3 प्रतिशत परिवारों के पास इंटरनेट सुविधा उपलब्ध है।</p>
<p>इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि भारत का युवा वर्ग तेजी से डिजिटल दुनिया से जुड़ रहा है। सोशल मीडिया ने शिक्षा, सूचना, कौशल विकास और उद्यमिता के नए अवसर प्रदान किए हैं। अनेक युवा ऑनलाइन माध्यमों से रोजगार, व्यवसाय और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।<br />हालाँकि इसके कुछ नकारात्मक प्रभाव भी सामने आ रहे हैं। अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग के कारण युवाओं में तनाव, चिंता, अवसाद, आत्म-सम्मान में कमी और सामाजिक तुलना जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। कई युवा वास्तविक जीवन की अपेक्षा आभासी दुनिया में अधिक समय बिताने लगे हैं। लाइक्स, कमेंट्स और फॉलोअर्स की होड़ उन्हें मानसिक दबाव की ओर धकेल सकती है।</p>
<p>शिक्षा के क्षेत्र में भी इसका प्रभाव देखा जा रहा है। पढ़ाई के दौरान बार-बार मोबाइल देखना, रील्स और शॉर्ट वीडियो में समय व्यतीत करना तथा एकाग्रता में कमी विद्यार्थियों के शैक्षणिक प्रदर्शन को प्रभावित कर रही है। वहीं साइबर बुलिंग, फेक न्यूज़ और ऑनलाइन धोखाधड़ी जैसी समस्याएँ भी युवाओं के सामने गंभीर चुनौती बनकर उभरी हैं।</p>
<p>सामाजिक दृष्टि से भी स्थिति चिंताजनक है। ऑनलाइन मित्रों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन परिवार और समाज के साथ प्रत्यक्ष संवाद कम होता जा रहा है। इससे अकेलेपन और सामाजिक अलगाव की भावना विकसित हो सकती है। इसके अतिरिक्त देर रात तक मोबाइल उपयोग करने से नींद की गुणवत्ता प्रभावित होती है, जिससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।<br />सोशल मीडिया को समस्या नहीं, बल्कि एक साधन के रूप में देखना चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि युवा इसका उपयोग संतुलित और जिम्मेदारीपूर्ण ढंग से करें। अभिभावकों, शिक्षकों और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों को युवाओं में डिजिटल साक्षरता, समय प्रबंधन और स्वस्थ ऑनलाइन व्यवहार को बढ़ावा देना चाहिए।</p>
<p>भारत का भविष्य उसके युवाओं पर निर्भर करता है। यदि सोशल मीडिया का उपयोग ज्ञान, कौशल और सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन के लिए किया जाए तो यह राष्ट्र निर्माण का सशक्त माध्यम बन सकता है। लेकिन यदि इसका उपयोग अनियंत्रित रूप से किया गया, तो इसके दुष्परिणाम व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर गंभीर हो सकते हैं। इसलिए डिजिटल युग में संतुलन, जागरूकता और आत्म-अनुशासन ही सफलता की कुंजी हैं।</p>
<p><strong>राममूरत उपाध्याय</strong><br /><strong>शोधार्थी समाज कार्य विभाग </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/article/society/social-media-and-indian-youth-opportunities-and-growing-challenges/article-23058</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/article/society/social-media-and-indian-youth-opportunities-and-growing-challenges/article-23058</guid>
                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 15:25:42 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-06/811f309c-b5e8-4fe6-b012-7dbb3f56a036_samridh_1200x720.jpeg"                         length="49517"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        