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                <title>आर्टिकल - Samridh Jharkhand</title>
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                <title>Success Story: दूरदराज के गांवों से 20,000 फीट ऊंची हिमालयी चोटी तक, दृष्टिबाधित पर्वतारोहियों ने रचा इतिहास</title>
                                    <description><![CDATA[पश्चिमी सिंहभूम के दूरदराज गांवों से निकले दृष्टिबाधित पर्वतारोही शेखर गोप और धीरोज कुमार ने लद्दाख में अपने साहस और दृढ़ संकल्प की मिसाल पेश की। टाटा स्टील फाउंडेशन की ‘सबल’ पहल से ब्रेल, मोबिलिटी और डिजिटल कौशल सीखने वाले शेखर ने समुद्र तल से 20,000 फीट से अधिक ऊंची जो-जोंगो चोटी पर सफलतापूर्वक पहुंचकर तिरंगा लहराया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/success-story/blind-mountaineer-shekhar-gop-dhiroje-kumar-zo-jongo-peak-ladakh/article-26584"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-09/untitled-design-(6).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd"><strong>जमशेदपुर।</strong> हिमालय की किसी चोटी तक पहुंचने का सफर आमतौर पर प्रशिक्षण, पर्वतारोहण के लिए जरूरी सामान और शिखर तक पहुंचने के सपने से शुरू होता है। लेकिन शेखर गोप और धीरोज कुमार के लिए लद्दाख में समुद्र तल से 20,000 फीट से अधिक ऊंची जो-जोंगो चोटी तक पहुंचने का सफर इससे बहुत पहले और अपने घर के आसपास ही शुरू हो गया था।</p>
<p class="isSelectedEnd">यह सफर पश्चिमी सिंहभूम जिले के दो दूरदराज गांवों से शुरू हुआ, जहां सुविधाएं सीमित थीं और रोजमर्रा की जिंदगी जीना भी अपने आप में एक चुनौती थी। आज 24 वर्षीय तोड़ानहातु निवासी शेखर और 23 वर्षीय कड़ाजामदा निवासी धीरोज अपनी उपलब्धियों के लिए जाने जाते हैं। दोनों ने दृष्टिबाधित पर्वतारोहियों के रूप में जो-जोंगो चोटी की कठिन चढ़ाई का सामना किया। शेखर सफलतापूर्वक चोटी तक पहुंचे, जबकि धीरोज अभियान के 16,732 फीट की ऊंचाई पर स्थित बेस कैंप तक पहुंचे। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के कारण उन्हें आगे की चढ़ाई रोकनी पड़ी। उनकी यह उपलब्धि इस बात का उदाहरण है कि अवसर, समावेशन और दृढ़ संकल्प साथ मिलकर क्या कुछ संभव बना सकते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">जन्म से ही 100 प्रतिशत दृष्टिबाधित दोनों युवाओं ने अपने शुरुआती वर्ष ऐसी दुनिया में बिताए, जहां आत्मनिर्भर बनने के लिए सुविधाएं और अवसर बहुत कम थे। सफेद छड़ी जैसी बुनियादी चीज भी आसानी से उपलब्ध नहीं थी। रोजमर्रा के कई ऐसे काम, जिन्हें लोग सामान्य रूप से बिना किसी मदद के कर लेते हैं, उनके लिए दूसरों के सहयोग की जरूरत होती थी।</p>
<p class="isSelectedEnd">इसमें बदलाव वर्ष 2022 में शुरू हुआ, जब वे टाटा स्टील फाउंडेशन की दिव्यांगजनों के समावेशन की पहल ‘सबल’ का हिस्सा बने।</p>
<h3>हर कदम के साथ आत्मनिर्भरता की ओर</h3>
<p class="isSelectedEnd">सबल समुदाय के साथ मिलकर दिव्यांगजनों के लिए काम करने वाली एक पहल है। यह दिव्यांगजनों की गरिमा, आत्मनिर्भरता और अपने फैसले खुद लेने के अधिकार पर ध्यान देती है। अधिकारों से जुड़ी सुविधाएं दिलाने, जरूरत के अनुसार कौशल प्रशिक्षण, आर्थिक सशक्तीकरण और समावेशी बुनियादी ढांचे के माध्यम से यह पहल ग्रामीण भारत में दिव्यांगजनों के लिए आत्मनिर्भर बनने और समाज की मुख्यधारा से जुड़ने के स्थायी अवसर तैयार करने का प्रयास करती है।</p>
<p class="isSelectedEnd">शेखर और धीरोज के लिए शुरुआती प्रशिक्षण ने उनके जीवन में बड़ा बदलाव लाया। उन्होंने ब्रेल, रोजमर्रा के काम खुद करने, स्वतंत्र रूप से आने-जाने और डिजिटल कौशल सीखे। अपने दम पर आने-जाने, स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने और जानकारी हासिल करने की सीख ने उनके लिए ऐसे नए रास्ते खोले, जो पहले उनकी पहुंच से बाहर लगते थे।</p>
<p class="isSelectedEnd">जो सफर कौशल सीखने से शुरू हुआ था, वह धीरे-धीरे आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और नेतृत्व क्षमता में बदल गया। आज दोनों युवा मोबिलिटी ट्रेनर के रूप में काम कर रहे हैं। वे अन्य दृष्टिबाधित लोगों को आत्मविश्वास बढ़ाने और जरूरी कौशल सीखने में मदद करते हैं, ताकि वे अपने जीवन में स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ सकें।</p>
<h3>प्रशिक्षण से आगे, नेतृत्व की ओर</h3>
<p class="isSelectedEnd">उनके सफर में एक और बड़ा बदलाव तब आया, जब उन्होंने तुमुंग में आयोजित आउटडोर प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य उनमें मुश्किल परिस्थितियों का सामना करने, टीम के साथ काम करने और खुद पर विश्वास बढ़ाने की क्षमता विकसित करना था।</p>
<p class="isSelectedEnd">इन गतिविधियों में एक-दूसरे पर भरोसा, संवाद और दृढ़ संकल्प की जरूरत थी। दोनों युवाओं के लिए यह अपने परिचित दायरे से बाहर निकलने और अपनी नई क्षमताओं को पहचानने का अवसर था। इस अनुभव ने उनमें खेल और नेतृत्व के प्रति एक नया उत्साह पैदा किया।</p>
<p class="isSelectedEnd">शेखर आगे चलकर झारखंड ब्लाइंड फुटबॉल टीम के कप्तान बने, जबकि धीरोज ने राष्ट्रीय स्तर के ब्लाइंड फुटबॉल खिलाड़ी के रूप में राज्य का प्रतिनिधित्व किया। फुटबॉल के मैदान पर उन्होंने उसी साहस और दृढ़ संकल्प का परिचय दिया, जो आगे चलकर उनके पर्वतारोहण के सफर की पहचान बना।</p>
<h3>हिमालय की पुकार</h3>
<p class="isSelectedEnd">इसके बाद एक ऐसी चुनौती सामने आई, जिसने वर्षों में सीखे उनके हर कौशल की परीक्षा ली। जो-जोंगो चोटी पर एक ऊंचाई वाले पर्वतारोहण अभियान के लिए चुने जाने के बाद, दोनों दृष्टिबाधित पर्वतारोहियों ने इसकी तैयारी शुरू की। दलमा हिल्स में आयोजित प्री-एक्सपीडिशन प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान उन्होंने अपनी शारीरिक क्षमता, सहनशक्ति और मानसिक मजबूती को बेहतर किया।</p>
<p class="isSelectedEnd">पहाड़ों पर चढ़ाई के लिए अनुशासन जरूरी था। हर चढ़ाई, हर ट्रेक और हर मुश्किल आगे आने वाली चुनौती के लिए उनकी तैयारी का हिस्सा बन गई।</p>
<p class="isSelectedEnd">जब वे आखिरकार लद्दाख पहुंचे, तो उन्हें अपने जीवन की सबसे कठिन चुनौतियों में से एक का सामना करना पड़ा। कम ऑक्सीजन वाली हवा, जमा देने वाली ठंड और ऊबड़-खाबड़ रास्तों ने हर कदम पर उनकी सहनशक्ति की परीक्षा ली। लेकिन न तो ऊंचाई और न ही मुश्किलें उनके हौसले को रोक सकीं।</p>
<p class="isSelectedEnd">वर्षों की मेहनत और हर पड़ाव पर मिले आत्मविश्वास से ताकत लेते हुए, उन्होंने कठिन रास्तों और ऊंचाई वाले चुनौतीपूर्ण हालात में भी आगे बढ़ना जारी रखा।</p>
<p class="isSelectedEnd">अभियान आगे बढ़ने के साथ धीरोज की तबीयत बिगड़ने लगी, जिसके कारण उन्हें 16,732 फीट की ऊंचाई पर स्थित बेस कैंप में रुकना पड़ा। वहीं, शेखर ने पूरे दृढ़ संकल्प के साथ अपनी चढ़ाई जारी रखी और जो-जोंगो चोटी के शिखर तक सफलतापूर्वक पहुंच गए।</p>
<p class="isSelectedEnd">चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में हासिल की गई उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियां उनके अद्भुत साहस, हौसले और दृढ़ संकल्प को दर्शाती हैं।</p>
<h3>पर्वतारोहण से परे एक बड़ी उपलब्धि</h3>
<p class="isSelectedEnd">चोटी तक पहुंचना निश्चित रूप से एक बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन उनकी कहानी की असली अहमियत पर्वतारोहण से कहीं आगे है। उनकी असली उपलब्धि उन बाधाओं को पार करने में है, जिन्हें उन्होंने पहाड़ पर कदम रखने से बहुत पहले ही पीछे छोड़ दिया था।</p>
<p class="isSelectedEnd">उनके सफर में ब्रेल सीखना, अपने दम पर आना-जाना सीखना, तकनीक का इस्तेमाल करना, ट्रेनर बनना, खेलों में बेहतर प्रदर्शन करना और दूसरों का नेतृत्व करने का आत्मविश्वास हासिल करना शामिल रहा।</p>
<p class="isSelectedEnd">कई मायनों में, पहाड़ तक पहुंचना उनकी उस लंबी कहानी का सिर्फ आखिरी पड़ाव था, जो इससे बहुत पहले शुरू हो चुकी थी।</p>
<p class="isSelectedEnd">यह सबल की उस सोच को भी दर्शाता है, जिसका उद्देश्य दिव्यांगजनों के समावेशन को अलग-अलग प्रयासों तक सीमित रखने के बजाय ऐसा सामुदायिक तंत्र तैयार करना है, जहां दिव्यांगजन अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकें, अवसरों तक पहुंच बना सकें और सम्मान व आत्मनिर्भरता के साथ समाज में पूरी तरह भागीदारी कर सकें।</p>
<p class="isSelectedEnd">सबल, दिव्यांगजनों के अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत मान्यता प्राप्त 21 प्रकार की दिव्यांगताओं के लिए काम करता है। इसके तहत देशभर में विभिन्न साझेदारियों का एक बढ़ता नेटवर्क तैयार किया गया है। प्रशिक्षण, जागरूकता, सरकारी सुविधाओं और अधिकारों तक पहुंच तथा क्षमता विकास के माध्यम से यह नेटवर्क दिव्यांगजनों के समावेशन को मजबूत करने का काम करता है।</p>
<h3>संभावनाओं की नई परिभाषा</h3>
<p class="isSelectedEnd">पश्चिमी सिंहभूम के एक दूरदराज गांव से हिमालय की चोटी तक का सफर केवल किलोमीटर और ऊंचाई का सफर नहीं है। यह उस आत्मविश्वास की कहानी है, जो कदम-दर-कदम बढ़ा; उन अवसरों की कहानी है, जिन्होंने नई राहें खोलीं; उन डर की कहानी है, जिन्हें पीछे छोड़ा गया; और उन अनगिनत संभावनाओं की कहानी है, जिन्हें हौसले और सही अवसर ने हकीकत में बदल दिया।</p>
<p class="isSelectedEnd">शेखर और धीरोज के लिए दृष्टिबाधित पर्वतारोही बनना कभी सिर्फ पहाड़ की चोटी तक पहुंचने की बात नहीं थी। यह साबित करने का सफर था कि परिस्थितियां, भौगोलिक सीमाएं या लोगों की सोच किसी व्यक्ति की क्षमता तय नहीं कर सकती।</p>
<p class="isSelectedEnd">उनकी उपलब्धि पूरे भारत के समुदायों के लिए एक मजबूत संदेश है—जब समावेशन के साथ अवसर और दृढ़ संकल्प जुड़ते हैं, तो असाधारण उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">जहां बुनियादी सुविधाओं और आने-जाने में मदद करने वाले साधनों तक पहुंच भी एक चुनौती थी, वहीं से लद्दाख की ऊंची पहाड़ियों तक उनका सफर पहुंचा। शेखर ने समुद्र तल से 20,000 फीट से अधिक ऊंची चोटी पर तिरंगा लहराया, जबकि स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के बावजूद धीरोज 16,732 फीट की ऊंचाई तक स्थित बेस कैंप तक पहुंचे। उन्होंने साबित कर दिया कि बड़ी से बड़ी यात्रा भी आत्मनिर्भरता की दिशा में उठाए गए एक छोटे से कदम से शुरू होती है।</p>
<p>उन्होंने 25 अगस्त को अपना सफर शुरू किया और 31 अगस्त 2026 को इसे पूरा किया। इस सफर में इन दोनों दृष्टिबाधित पर्वतारोहियों ने न केवल परिस्थितियों और लोगों की सोच से बनी सीमाओं को चुनौती दी, बल्कि यह भी दिखाया कि इंसान की क्षमता की कोई तय सीमा नहीं होती।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>स्टोरी </category>
                                            <category>जमशेदपुर</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                            <category>सक्सेस स्टोरी</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 06 Sep 2026 16:45:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Sumitra Reincarnation Case: जब सुमित्रा की मौत हुई और वह शिवा बनकर लौटी</title>
                                    <description><![CDATA[यह मामला "Scientific Evidence for Reincarnation, NDEs and Karma with Personal Stories" नाम की मुफ़्त किताब से लिया गया है। इस किताब में पुनर्जन्म और NDE (मृत्यु के निकट अनुभव) से जुड़े कई मामले शामिल हैं। आप "Scientific Evidence for Reincarnation, NDEs and Karma with Personal Stories" किताब को सीधे इंटरनेट या इस वेबसाइट: https://evidence-for-reincarnation.weebly.com से मुफ़्त में डाउनलोड कर सकते हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/sumitra-reincarnation-case-identity-changed-after-death-then-how-were/article-26213"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-08/img.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://samridhjharkhand.com/media/2026-08/shiva.jpg" alt="shiva" width="548" height="629"></img>
Shiva (SOURCE: psi-encyclopedia.spr.ac.uk/)

<img src="https://samridhjharkhand.com/media/2026-08/1_wnt93x19gh5xe7tf8h4e1q.webp" alt="1_Wnt93x19GH5Xe7tf8H4E1Q" width="254" height="392"></img>
professor ian stevenson (Source: medium.com/)

<hr />
<h4><strong>रिसर्च और जांच</strong></h4>
<p>इस मामले की मुख्य जांच डॉ. इयान स्टीवेन्सन, डॉ. सतवंत पसरीचा और निकोलस मैक्लीन-राइस ने की थी। बाद में, परमेश्वर दयाल, डॉ. एंटोनिया मिल्स और कुलदीप धीमान ने और जांच और फ़ॉलो-अप रिसर्च की। 1989 की मूल स्टडी में इसे पुनर्जन्म का पक्का वैज्ञानिक सबूत मानने के बजाय, कथित अलौकिक ज्ञान के सबूतों वाला 'किसी के शरीर पर कब्ज़े' (possession) जैसा मामला बताया गया था।</p>
<hr />
<p><img src="https://samridhjharkhand.com/media/2026-08/1_rh1vuj-vhhrptl-zvqcvea.webp" alt="1_Rh1VUJ-vHhRPTl-ZVqcvEA" width="720" height="421"></img></p>
<img src="https://samridhjharkhand.com/media/2026-08/1_3uper6smpjyqg624znnvha.webp" alt="1_3upeR6SmpjYqG624zNNVHA" width="720" height="422"></img>
(इस मामले के बारे में अख़बार का लेख)

<hr />
<p><strong>समृद्ध डेस्क: </strong>सुमित्रा का पुनर्जन्म का मामला, पुनर्जन्म के उन अनोखे मामलों में से एक है जिसने रिसर्च करने वालों और जांचकर्ताओं का ध्यान खींचा है। यह कहानी शिव से नहीं, बल्कि सुमित्रा सिंह नाम की एक युवा महिला से शुरू होती है, जिसकी ज़िंदगी 1985 तक बिल्कुल आम थी। सुमित्रा लगभग सत्रह साल की थी और उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद ज़िले के शरीफ़पुरा गाँव में अपने पति और छोटे बच्चे के साथ रहती थी। उसने कभी औपचारिक रूप से स्कूल की पढ़ाई नहीं की थी। वह थोड़ा-बहुत पढ़ना-लिखना जानती थी, जो उसने अपनी एक बड़ी चचेरी बहन से सीखा था, लेकिन उसकी शिक्षा बहुत सीमित थी। उसकी शुरुआती ज़िंदगी में ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे लगे कि एक दिन उसका नाम भारत में सामने आए 'पज़ेशन' (किसी और आत्मा का शरीर पर कब्ज़ा) के सबसे अनोखे मामलों में से एक की जांच का हिस्सा बनेगा। फिर, 1985 की शुरुआत में, कुछ बदलाव होने लगे। सुमित्रा को बार-बार बेहोशी के दौरे पड़ने लगे। उसकी आँखें ऊपर की ओर मुड़ जाती थीं, दाँत भिंच जाते थे, और ये दौरे कुछ मिनटों से लेकर पूरे दिन तक चल सकते थे। कभी-कभी वह ऐसी बेहोशी या 'ट्रांस' जैसी हालत में बातें भी करती थी। कुछ मौकों पर, ऐसा लगता था कि वह दूसरी पहचान अपना रही है, जिसमें एक ऐसी महिला शामिल थी जिसके बारे में कहा जाता था कि उसने डूबकर आत्महत्या कर ली थी, और एक ऐसा आदमी जो भारत के किसी दूसरे हिस्से से आने का दावा करता था। उन शुरुआती पहचानों की कभी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की गई, लेकिन उनसे पहला संकेत मिला कि कुछ असामान्य हो रहा था।</p>
<img src="https://samridhjharkhand.com/media/2026-08/screenshot-2026-08-21-045233.png" alt="Screenshot 2026-08-21 045233" width="698" height="552"></img>
Image Source: medium.com/)

<p><br />सुमित्रा के साथ होने वाली ये घटनाएं इतनी परेशान करने वाली थीं कि उसके परिवार को स्थानीय इलाज करने वालों की मदद लेनी पड़ी। उसे शांत करने की कोशिश करने वालों में से एक विश्वनाथ भी थे, जो दूर के रिश्तेदार और किसान थे और जिन्हें इस तरह के मामलों का कोई पेशेवर अनुभव नहीं था। उनकी मौजूदगी का कुछ समय के लिए तो असर दिखा, लेकिन ये घटनाएं जारी रहीं। फिर, जुलाई 1985 में, सुमित्रा ने एक ऐसी बात कही जिसे बाद में नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन हो गया। उसने भविष्यवाणी की कि तीन दिन बाद उसकी मौत हो जाएगी। 19 जुलाई को, यानी उसी दिन, वह फिर से बेहोश हो गई। लेकिन इस बार, उसके आस-पास मौजूद लोगों को लगा कि कुछ बहुत गंभीर हुआ है। उसकी सांसें और नब्ज़ रुकती हुई दिखीं। उसका चेहरा पीला पड़ गया और आस-पास जमा लोगों को लगा कि उसकी मौत हो गई है। कुछ लोग मातम मनाने लगे, जबकि उसके अंतिम संस्कार की तैयारियां शुरू हो गईं। परिवार का बाद में यह अनुमान था कि वह कुछ मिनटों तक बिना किसी हलचल के रही। लेकिन एक अहम कमी थी: गांव में या उसके आस-पास कोई डॉक्टर नहीं था, इसलिए कोई भी चिकित्सकीय रूप से यह साबित नहीं कर सका कि सुमित्रा ने असल में 'क्लिनिकल डेथ' का अनुभव किया था। यहां तक ​​कि जिन शोधकर्ताओं ने बाद में इस मामले का अध्ययन किया, उन्होंने भी सावधानी बरतते हुए हुई घटना को "मौत जैसा दिखना" (apparent death) बताया। और फिर, अचानक, वह होश में आ गई।</p>
<img src="https://samridhjharkhand.com/media/2026-08/sumitra2.jpg" alt="sumitra2" width="584" height="618"></img>
sumitra2 (SOURCE: psi-encyclopedia.spr.ac.uk/)

<p><br />सुमित्रा के होश में आने से परिवार की मुश्किलों का दौर खत्म हो जाना चाहिए था, लेकिन इसके बजाय कुछ बहुत अजीब चीज़ शुरू हो गई। होश में आने के कुछ समय बाद तक सुमित्रा उलझन में दिखी और बहुत कम बोली। फिर उसकी उलझन ने एक अलग रूप ले लिया। वह अपने आस-पास के लोगों को नहीं पहचान पा रही थी, यहाँ तक कि अपने पति के परिवार वालों को भी नहीं। उसने सुमित्रा के तौर पर अपनी पहचान पूरी तरह से नकार दी। केस रिपोर्ट के अनुसार, वह कहने लगी कि उसका नाम शिवा है। उसने दावा किया कि वह दिबियापुर नाम की जगह पर रहती थी, वहीं उसकी शादी हुई थी और उसके दो बच्चे थे। उसने अपने पति और बेटे को अपना परिवार मानने से इनकार कर दिया और इसके बजाय यह पूछने लगी कि वे दो बच्चे कहाँ हैं जिन्हें वह अपना बताती थी। जो लोग सुमित्रा को जानते थे, उनके लिए यह दावा बहुत ही अजीब और डरावना था। क्या वह किसी गंभीर मानसिक परेशानी से गुज़र रही थी? क्या उन घटनाओं के बाद उसके दिमाग में कुछ टूट-फूट हुई थी? या फिर वह किसी और की ज़िंदगी के बारे में बता रही थी? उसके परिवार को समझ नहीं आ रहा था कि क्या सच मानें। पहले तो उन्हें लगा कि शायद वह पागल हो गई है। बाद में, उन्होंने इस संभावना पर भी सोचा कि शायद किसी आत्मा ने उस पर कब्ज़ा कर लिया है। लेकिन वह जिस नाम को बार-बार दोहरा रही थी—शिवा—वह एक असली महिला का नाम था।</p>
<img src="https://samridhjharkhand.com/media/2026-08/shivas-father.jpg" alt="shivas-father" width="452" height="496"></img>
शिवा के पिता (स्रोत: psi-encyclopedia.spr.ac.uk/)

<p><br />शिव त्रिपाठी की मौत बस दो महीने पहले ही हुई थी। वह इटावा इलाके में रहती थीं, जो सुमित्रा के घर से काफी दूर था, और उनकी ज़िंदगी सुमित्रा की ज़िंदगी से बहुत अलग थी। शिव एक ब्राह्मण परिवार से थीं और उन्होंने काफी अच्छी पढ़ाई-लिखाई की थी। उनके पिता, राम सिया त्रिपाठी, एक कॉलेज लेक्चरर थे और शिव ने खुद B.A. की डिग्री पूरी की थी। उनकी शादी दिबियापुर के छेदी लाल से हुई थी और उनके दो छोटे बच्चे थे, जिन्हें परिवार में टिंकू और रिंकू के नाम से जाना जाता था। हालाँकि, बताया जाता है कि उनकी शादीशुदा ज़िंदगी में परेशानियाँ बढ़ती जा रही थीं। शिव और उनके ससुराल वालों के बीच झगड़े होते रहते थे, और मौत से कुछ समय पहले, परिवार में एक शादी को लेकर उनका ज़बरदस्त झगड़ा हुआ था। 18 मई 1985 की शाम को, उनके फूफा बृजेश पाठक उनसे मिलने आए और उन्हें परेशान पाया। बताया जाता है कि शिव ने उन्हें बताया कि उनकी सास और ननद में से एक ने उन्हें मारा-पीटा था। अगली सुबह, शिव फफूंद स्टेशन के पास रेलवे ट्रैक पर मृत पाई गईं। उनके ससुराल वालों का कहना था कि उन्होंने आत्महत्या की थी। लेकिन शुरू से ही, शिव के करीबी लोगों को शक था कि क्या सच में ऐसा ही हुआ था।</p>
<img src="https://samridhjharkhand.com/media/2026-08/sumitra-singh-as-shiva.jpg" alt="sumitra-singh-as-shiva" width="676" height="611"></img>
सुमित्रा सिंह शिवा के रूप में (सोर्स: psi-encyclopedia.spr.ac.uk/)

<p><br />बाद में, शिवा की मौत से जुड़े हालात ने सुमित्रा के साथ उसके कनेक्शन को और भी परेशान करने वाला बना दिया। जिन लोगों ने शिवा की लाश देखी थी, उनमें से कई ने कहा कि शरीर सही-सलामत था और उस पर से ट्रेन नहीं गुज़री थी। उसके चाचा ने परिवार से कहा था कि वे लाश का अंतिम संस्कार करने से पहले शिवा के पिता का इंतज़ार करें, लेकिन उनकी बात नहीं मानी गई। मंज़ूरी मिलने के बाद जल्दबाज़ी में अंतिम संस्कार कर दिया गया, और जब तक राम सिया त्रिपाठी पहुँचे, तब तक उनकी बेटी का शरीर राख में बदल चुका था। जो बातें उन्हें पता चलीं, उनसे परेशान होकर उन्होंने पुलिस से शिकायत की और बाद में शिवा के ससुराल वालों पर हत्या का आरोप लगाया। उसके पति और ससुर को गिरफ़्तार किया गया, लेकिन सबूत न होने के कारण बाद में छोड़ दिया गया, जबकि परिवार के दूसरे सदस्यों पर भी आरोप लगाए गए। फिर भी, जब इयान स्टीवेन्सन और उनके साथियों ने बाद में इस मामले की जाँच की, तो उन्होंने शक को पक्की सच्चाई में बदलने से इनकार कर दिया। उन्होंने नतीजा निकाला कि ससुराल वालों के साथ गंभीर झगड़े के बाद शिवा की हिंसक मौत हुई थी, लेकिन वे यह पक्का नहीं कर पाए कि उसकी हत्या करके लाश को रेलवे ट्रैक पर रखा गया था या उसने खुद अपनी जान दी थी। इसलिए, शिवा की मौत कैसे हुई, यह सवाल अनसुलझा ही रह गया।</p>
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सुमित्रा सिंह का पारिवारिक घर (सोर्स: psi-encyclopedia.spr.ac.uk/)

<p><br />लेकिन एक बात पक्की थी कि शिव की मौत हो चुकी थी। इसके बाद जो हुआ, उसे समझाना बहुत मुश्किल था। कुछ समय तक शिव के परिवार को सुमित्रा के बारे में कुछ पता नहीं चला। सुमित्रा के परिवार ने भी उसकी अजीब बातों की सच्चाई जानने की तुरंत कोशिश नहीं की। दोनों परिवार अलग-अलग समुदायों के थे और जांच के मुताबिक, वे पहले से एक-दूसरे को नहीं जानते थे। धीरे-धीरे यह खबर एक गांव से दूसरे गांव तक अफवाह की तरह फैलने लगी। पास के गांव 'मुरा' के लोगों ने सुमित्रा के दावों के बारे में सुना और यह जानकारी धीरे-धीरे 'डिबियापुर' तक पहुंची। जब शिव के पिता राम सिया त्रिपाठी को पता चला कि दूर के किसी गांव में एक लड़की उनकी मरी हुई बेटी होने का दावा कर रही है, तो उन्होंने तुरंत इस बात पर यकीन नहीं किया। असल में, वह कभी शरीफ़पुरा गए ही नहीं थे और उन्हें यह भी नहीं पता था कि वह गांव कहां है। उन्होंने दूसरे लोगों से पूछताछ की, और मॉनसून की वजह से इसमें और देरी हुई। जानकारी की अप्रत्यक्ष रूप से पुष्टि होने के बाद ही उन्होंने खुद वहां जाने का फैसला किया। 20 अक्टूबर 1985 को, सुमित्रा की कथित मौत और फिर से जीवित होने के ठीक तीन महीने बाद, राम सिया त्रिपाठी शरीफ़पुरा पहुंचे। वह एक ऐसी युवती से मिलने वाले थे जो उनकी मरी हुई बेटी होने का दावा कर रही थी।</p>
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सतवंत पसरीचा (स्रोत: psi-encyclopedia.spr.ac.uk/)

<p><br />उस मुलाक़ात ने सब कुछ बदल दिया। जब राम सिया ने सुमित्रा को देखा, तो कहा जाता है कि उन्होंने उसे शिव के पिता के तौर पर पहचान लिया। उन्होंने उसे "पापा" कहकर बुलाया, ठीक वैसे ही जैसे शिव उन्हें बुलाते थे। उन्होंने शिव के परिवार से जुड़े कुछ नाम भी लिए, जिनमें उनका निजी नाम "शिव शंकर" भी शामिल था। जिन नामों का उन्होंने ज़िक्र किया था, उनमें से एक नाम शिव की मौत के बारे में छपी अख़बार की रिपोर्ट में भी था, लेकिन "शिव शंकर" नाम उसमें नहीं था। राम सिया के लिए, यह मुलाक़ात अब सिर्फ़ उस अजीब कहानी तक सीमित नहीं थी जो उन्होंने सफ़र के दौरान सुनी थी। उनके सामने मौजूद महिला को उनकी बेटी के बारे में कुछ-कुछ पता था। अब सवाल यह नहीं था कि सुमित्रा को लगता है कि वह शिव है। असली सवाल यह था कि उसे एक मर चुकी महिला और उसके परिवार से जुड़ी इतनी सारी बातें कैसे पता हो सकती थीं।</p>
<p>यही सवाल जांच का मुख्य मुद्दा बन गया। रिसर्च करने वालों को पता था कि शिवा के बारे में कुछ जानकारी अखबारों में छपी थी। इलाके में उसकी मौत और उसके पिता की शिकायत की खबरें फैल चुकी थीं। इसका मतलब था कि सुमित्रा ने जो नाम और बातें बताई थीं, उनमें से कुछ को अपने-आप ही असाधारण नहीं माना जा सकता था। इसलिए जांच करने वालों ने उसके बयानों को अलग-अलग कैटेगरी में बांटा। कुछ बयानों में ऐसी जानकारी थी जो अखबारों में छपी थी और हो सकता है कि उसे आम बातचीत से पता चली हो। आखिरी झगड़े के बारे में कुछ बयान बिना जांचे-परखे थे और उन्हें सच नहीं माना जा सकता था। लेकिन एक तीसरा ग्रुप भी था, और यहीं पर मामला बहुत मुश्किल हो गया। रिसर्च करने वालों ने ऐसे 19 बयानों की पहचान की जिनमें निजी बातें थीं; उनके हिसाब से, ये बातें उन अखबारों की खबरों में नहीं थीं जिनकी उन्होंने जांच की थी। इनमें एक निजी निकनेम, शिवा के पढ़े-लिखे संस्थानों के नाम, उसके दो बच्चों के निकनेम, रिश्तेदारों के नाम और निजी सामान से जुड़ी जानकारी शामिल थी, जैसे कि एक खास पीली साड़ी और त्रिपाठी के घर में एक डिब्बे में रखी घड़ी।</p>
<p>लेकिन लिस्ट में नाम जानना एक बात है। असली लोगों को पहचानना दूसरी बात।</p>
<p>जैसे-जैसे दोनों परिवारों के बीच संपर्क बढ़ा, सुमित्रा ऐसे लोगों से मिलने लगीं जो शिवा को जानते थे। रिसर्च करने वालों को पता था कि मामले के इस हिस्से में आसानी से गड़बड़ी हो सकती है। पहचान के लिए टेस्ट किए जा रहे व्यक्ति को अनजाने में ही किसी नज़र, सवाल, इशारे या किसी के देखने की दिशा से भी संकेत मिल सकते हैं। इसलिए जांचकर्ताओं ने उन पहचानों पर खास ध्यान दिया जो उन्हें स्वाभाविक लगीं या बिना किसी साफ़ संकेत के हुईं। आखिर में उन्होंने शिवा के परिवार और दोस्तों के दायरे से ऐसे बारह लोगों की पहचान की जिन्हें वे इस मामले में अहम मानते थे, हालांकि उन्होंने यह भी माना कि हर पहचान उतनी मज़बूत नहीं थी। यह फ़र्क मायने रखता था। रिसर्च करने वाले सिर्फ़ हर सफल अंदाज़े को इकट्ठा करके उसे सबूत नहीं मान रहे थे। वे यह पता लगाने की कोशिश कर रहे थे कि क्या कोई पहचान ऐसी स्थितियों में हुई थी जिनकी सामान्य व्याख्या करना मुश्किल हो।</p>
<p>एक घटना शिव की माँ, राम रानी से जुड़ी थी। जब सुमित्रा पहली बार त्रिपाठी के घर गईं, तो कहा जाता है कि राम सिया ने उन्हें गुमराह करने की कोशिश की और कहा कि शिव की माँ बाहर महिलाओं के एक समूह के बीच खड़ी हैं। असल में, राम रानी घर के अंदर थीं। कहा जाता है कि सुमित्रा ने ज़ोर देकर कहा कि उनकी माँ उन महिलाओं में नहीं थीं और फिर उन्हें ढूँढ़ने के लिए घर के अंदर चली गईं। उन्हें राम रानी मिल गईं और उन्होंने रोते हुए उन्हें गले लगा लिया। यह एक बहुत ही भावुक दृश्य था, लेकिन शोधकर्ता इसे पक्का सबूत मानने में सावधानी बरत रहे थे। राम सिया ने सुमित्रा को पहले ही राम रानी की एक तस्वीर दिखाई थी, जिसका मतलब था कि उन्होंने उनका चेहरा पहले देखा हुआ था। इसलिए, पहचानना दिलचस्प तो था, लेकिन यह पूरी तरह से पहले की जानकारी से अलग नहीं था। यह सावधानी जाँच के दौरान बार-बार देखने को मिली।</p>
<p>कुछ और पहचानों को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल था। शिव के मामाओं में से एक, राम नरेश, सुमित्रा के सामने आए और पूछा कि वे कौन हैं। सुमित्रा ने उन्हें अपनी माँ के भाई के तौर पर पहचाना। जब उन्होंने पूछा कि कौन से भाई, तो सुमित्रा ने कहा, "कानपुर के राम नरेश," यानी उस जगह का ज़िक्र किया जहाँ वे पहले रहते थे। एक और मुलाक़ात में, शिव के एक और मामा राम प्रकाश दीक्षित दाढ़ी बढ़ाकर सुमित्रा से मिलने आए। शिव ने उन्हें कभी दाढ़ी के साथ नहीं देखा था। सुमित्रा ने उन्हें शिव के मामा के तौर पर तो पहचान लिया, हालाँकि शुरू में वह उनका नाम नहीं बता पाईं। जब उन्होंने बात की, तो सुमित्रा ने उनकी आवाज़ पहचानी और फिर नाम से उनकी पहचान की। ये घटनाएँ इसलिए खास थीं क्योंकि उनके सामने खड़े लोग ठीक वैसे नहीं दिख रहे थे जैसे वे तब दिखते थे जब शिव ज़िंदा थे।</p>
<p>इसके बाद एक और मुलाकात हुई, इस बार शिवा की जवानी के दिनों की दोस्त कृष्णा देवी दुबे से। शिवा की मौत से आठ साल से भी ज़्यादा समय पहले, ये दोनों महिलाएँ एक-दूसरे को जानती थीं। बाद में कृष्णा देवी ने शादी कर ली और सिकंदरपुर चली गईं; उन्होंने कई सालों से शिवा को नहीं देखा था। जब सुमित्रा उनसे मिलीं, तो कहा जाता है कि उन्होंने उन्हें "जीजी" कहकर बुलाया—यह वही नाम था जिससे शिवा, कृष्णा देवी को बुलाती थीं। उन्हें वहाँ देखकर सुमित्रा को हैरानी भी हुई; कहा जाता है कि उन्होंने बताया कि उनकी मौत हो चुकी थी, फिर वे एक ठाकुर परिवार में पैदा हुईं और अब बेबस थीं। इस मुलाकात ने एक और मुश्किल सवाल खड़ा कर दिया। अगर सुमित्रा को किसी तरह अखबार से जानकारी मिली भी थी, तो अखबार की खबर में उस खास संबोधन और उस निजी रिश्ते का ज़िक्र कैसे हो सकता था जो सालों पहले शिवा का था? फिर भी, यहाँ भी रिसर्च करने वाले सावधान रहे। उन्होंने यह दावा नहीं किया कि इस मुलाकात की हर बात किसी अलौकिक घटना को साबित करती है। उन्होंने इसे एक बड़े पैटर्न के हिस्से के तौर पर दर्ज किया, जिसे समझने की ज़रूरत थी।</p>
<p>तस्वीरों ने कहानी में एक और पहलू जोड़ा। जब राम सिया पहली बार सुमित्रा से मिले, तो वे अपने परिवार की तस्वीरों वाला एक एल्बम साथ लाए थे। एक तस्वीर 1967 में ली गई थी, जो लगभग अठारह साल पहले की बात है। कहा जाता है कि सुमित्रा ने उसमें मौजूद सभी छह लोगों को पहचान लिया: राम सिया, उनकी पत्नी, उनकी माँ, उनकी बेटी उमा, उनके बेटे रमन और शिवा। जब वह शिवा की तस्वीर पर पहुँचीं, तो उन्होंने कहा, "यह मैं हूँ।" एक दूसरी तस्वीर में, उन्होंने त्रिपाठी परिवार के बच्चों को पहचाना और उनके नाम बताए। एक और तस्वीर में, उन्होंने शिवा की माँ, अपने भाई रमन और अपनी मौसी को पहचाना। जब उन्होंने शिवा के छोटे बेटे टिंकू की तस्वीर देखी, तो वे रोने लगीं और पूछा कि टिंकू और रिंकू कहाँ हैं। जब उन्हें शिवा की भाभी रमा कांति की तस्वीर दिखाई गई, तो उन्होंने उन्हें पहचान लिया और उस घटना से जोड़ा जिसमें उन्हें ईंट मारी गई थी।</p>
<p>इसके बाद रिसर्चर्स ने यह पता लगाने की कोशिश की कि वे पहचानें असल में कितनी प्रभावशाली थीं। एक ही व्यक्ति के बार-बार दिखने के मामलों को छोड़कर, सुमित्रा से तस्वीरों में सत्रह लोगों को पहचानने के लिए कहा गया। उसने बिना किसी हिचकिचाहट के बारह लोगों को पहचाना, थोड़ी हिचकिचाहट के बाद तीन और लोगों को पहचाना, और दो लोगों को नहीं पहचान पाई। लेकिन एक पेचीदगी थी। राम सिया ने उसे बाद की कुछ मुलाकातों से पहले तस्वीरें दिखाई थीं, और बाद में उसे बताया था कि उसने लोगों को सही पहचाना है। जांचकर्ताओं का मानना ​​था कि हो सकता है कि उसने बिना बोले ही अपनी सहमति ज़ाहिर की हो। इसका मतलब था कि जब सुमित्रा बाद में उनमें से कुछ लोगों से आमने-सामने मिली, तो उसे एक फ़ायदा मिला। फिर भी, रिसर्चर्स ने एक और बात नोट की जिसे उन्होंने ज़्यादा अहम माना: उसने शिव के परिवार या जान-पहचान वालों में से आठ ऐसे सदस्यों को पहचाना जिनकी तस्वीरें उसने पहले नहीं देखी थीं। कुल मिलाकर, जांच में उसे शिव के तेईस रिश्तेदारों और जान-पहचान वालों को पहचानने का श्रेय दिया गया, चाहे आमने-सामने या तस्वीरों के ज़रिए।</p>
<p>फिर सुमित्रा में भी बदलाव आया।</p>
<p>जुलाई 1985 की घटना से पहले, उन्हें एक ऐसी युवा ग्रामीण महिला के तौर पर जाना जाता था जिनकी औपचारिक शिक्षा बहुत कम थी। उसके बाद, रिश्तेदारों और जांच करने वालों ने उनके पहनावे, व्यवहार, लोगों से बातचीत के तरीके और भाषा के इस्तेमाल में बदलाव देखा। कहा जाता है कि उनके तौर-तरीके ज़्यादा औपचारिक हो गए और वे ऐसे व्यवहार करने लगीं जिसे उनके आस-पास के लोग किसी पढ़ी-लिखी, ऊंची जाति की महिला से जोड़कर देखते थे। उनके पढ़ने और लिखने की क्षमता में भी काफ़ी सुधार हुआ। शोधकर्ताओं ने देखा कि वे हिंदी इतनी अच्छी तरह पढ़ और लिख रही थीं, जितना उनके परिवार को पहले पता था। कभी-कभी लिखने के बजाय, उन्होंने त्रिपाठी परिवार को पत्र और पोस्टकार्ड लिखना शुरू कर दिया। इसलिए, उनमें आया बदलाव सिर्फ़ शिव के बारे में उनकी बातों तक ही सीमित नहीं था। उनके आस-पास के लोगों का मानना ​​था कि शिव के व्यक्तित्व और आदतों की झलक उनके रोज़मर्रा के जीवन में दिखाई देने लगी थी।</p>
<p>साक्षरता में आया यह बदलाव इसलिए भी दिलचस्प था क्योंकि इसमें ऐसी चीज़ें शामिल थीं जिन्हें सिर्फ़ बताया नहीं, बल्कि देखा भी जा सकता था। रिसर्च करने वालों ने सिर्फ़ परिवार के सदस्यों की इस बात पर भरोसा नहीं किया कि सुमित्रा में सुधार हुआ है। उन्होंने खुद उसे पढ़ते और लिखते हुए देखा। साथ ही, उन्होंने इस बात का भी ध्यान रखा कि असल में क्या बदलाव आया है। पढ़ने-लिखने की उसकी बुनियादी क्षमता पहले से ही थी, भले ही वह बहुत सीमित स्तर पर थी। रिपोर्ट के अनुसार, जो बदलाव आया, वह था उसकी पढ़ने-लिखने की रफ़्तार (फ़्लुएंसी), लिखने में उसकी दिलचस्पी और इन क्षमताओं का इस्तेमाल करने की बारंबारता। यह फ़र्क इसलिए अहम था क्योंकि इसने इस जांच को एक धीरे-धीरे होने वाले सुधार को अचानक किसी दूसरे व्यक्ति जैसी पूरी शैक्षिक क्षमता हासिल कर लेने का दावा बनने से रोक दिया।</p>
<p>जांच करने वाले जैसे-जैसे गहराई में गए, कहानी उतनी ही उलझती गई। क्या यह धोखाधड़ी हो सकती थी? क्या सुमित्रा को सिखाया-पढ़ाया गया था? क्या शिव के परिवार के किसी व्यक्ति ने चुपके से उसे जानकारी दी थी? क्या उसने अखबारों, यात्रियों, व्यापारियों या समुदायों के बीच आने-जाने वाले लोगों से ये बातें सीखी थीं? क्या हो सकता है कि उसने पहले कोई जानकारी सुनी हो और बाद में उसका स्रोत भूल गई हो, और फिर किसी दूसरी पहचान के साथ उसे दोहराया हो? शोधकर्ताओं ने इन संभावनाओं पर विचार किया क्योंकि असाधारण दावों की जांच तभी की जा सकती है जब पहले यह पूछा जाए कि क्या सामान्य स्पष्टीकरण काफी हैं।</p>
<p>उन्होंने उस संभावना की भी जांच की जिसे मनोवैज्ञानिक 'सेकेंडरी पर्सनैलिटी' (दूसरी पहचान) कह सकते हैं। हो सकता है कि सुमित्रा की पहचान में कोई बहुत बड़ा बदलाव आया हो। हो सकता है कि इस नई पहचान ने किसी तरह ऐसी जानकारी इकट्ठा कर ली हो जो सामान्य सुमित्रा को होश में रहते हुए याद नहीं थी। लेकिन इस संभावना से एक और समस्या खड़ी हो गई। भले ही सेकेंडरी पर्सनैलिटी व्यवहार में अचानक आए बदलाव की व्याख्या कर सकती थी, लेकिन यह अकेले यह नहीं बता सकती थी कि शिव के बारे में खास निजी जानकारी कहाँ से आई। शोधकर्ताओं ने पाया कि ज़्यादातर सेकेंडरी पर्सनैलिटी इस तरह का दावा किया गया अलौकिक ज्ञान नहीं दिखाती हैं, हालाँकि कुछ ऐतिहासिक मामले सामने आए थे।</p>
<p>एक और संभावना 'क्रिप्टोम्नेशिया' या 'सोर्स एमनेशिया' (स्रोत भूलने की बीमारी) की थी। इस थ्योरी के अनुसार, कोई व्यक्ति किसी जानकारी के संपर्क में आ सकता है, यह भूल सकता है कि वह जानकारी कहाँ से मिली थी, और बाद में उस जानकारी को याद करते हुए यह मान सकता है कि वह उसकी अपनी है या उसने उसे सीधे अनुभव किया है। सैद्धांतिक रूप से, इससे यह समझाया जा सकता है कि कोई व्यक्ति बिना यह याद किए कि उसने जानकारी कहाँ से सीखी थी, सही जानकारी कैसे दे सकता है। लेकिन जांचकर्ताओं का मानना ​​था कि यह थ्योरी उन निजी जानकारियों, लोगों को पहचानने और व्यवहार में आए बदलावों की पूरी जानकारी को समझाने में नाकाम रही, जिन्हें उन्होंने रिकॉर्ड किया था।</p>
<p>धोखाधड़ी की संभावना भी थी। फिर भी, शोधकर्ताओं का तर्क था कि जानबूझकर किए गए धोखे के मामले में एक और मुश्किल सवाल का जवाब देना पड़ता: इसे किसने अंजाम दिया होगा, और ज़रूरी जानकारी कैसे जुटाई गई और सुमित्रा तक कैसे पहुँचाई गई? उन्होंने इस बात पर भी विचार किया कि क्या कोई और व्यक्ति, जिसमें स्थानीय वैद्य विश्वनाथ भी शामिल हैं, शिव के बारे में जानकारी हासिल कर सकता था और उसे सिखा-पढ़ा सकता था। लेकिन उनका मानना ​​था कि ऐसी थ्योरी भी सुमित्रा द्वारा बताई गई जानकारी के दायरे और जिन लोगों को उसने पहचाना था, उनकी संख्या को समझाने में नाकाम रही। उनका निष्कर्ष यह नहीं था कि धोखाधड़ी असंभव थी, बल्कि यह था कि उन्हें यह थ्योरी उन सभी बातों को समझाने के लिए पर्याप्त नहीं लगी जो उन्होंने देखी थीं।</p>
<p>इस स्टेज तक, मामला गांव की शुरुआती कहानी से कहीं आगे बढ़ चुका था। यह याददाश्त, पहचान, पर्सनैलिटी, बातचीत और ऐसी जानकारी की संभावना की जांच बन गया था, जिसका कोई आम ज़रिया नहीं दिखता था। रिसर्च करने वालों ने यह जांचना जारी रखा कि क्या शिव के बारे में जानकारी दोनों समुदायों के बीच स्वाभाविक रूप से पहुँच सकती थी। उन्होंने माना कि उस बड़े इलाके में अखबार आते-जाते थे और कस्बों व गांवों के बीच व्यापारी और दूसरे संपर्क भी थे। इसलिए, उन्होंने यह मान लेना सबसे सुरक्षित समझा कि कुछ जानकारी आम ज़रियाओं से सुमित्रा के पक्ष तक पहुँच सकती थी। अहम सवाल यह था कि क्या वे ज़रिया न सिर्फ़ शिव की मौत की सार्वजनिक बातों को, बल्कि उसके बाद की निजी जानकारियों और पहचानों को भी समझा सकते थे। उनका जवाब था कि, उनके आकलन के अनुसार, वे पूरे पैटर्न को संतोषजनक ढंग से नहीं समझा सके।</p>
<p>और फिर भी, जांच करने वालों ने यह घोषित करने से परहेज किया कि उन्होंने पुनर्जन्म साबित कर दिया है।</p>
<p>उन्होंने यह दावा भी नहीं किया कि उन्होंने यह साबित कर दिया है कि सुमित्रा के शरीर में सचमुच कोई आत्मा आ गई थी।</p>
<p>इसके बजाय, उन्होंने कई अलग-अलग व्याख्याओं का ज़िक्र किया और हर एक की सीमाओं को भी माना। आखिरी चर्चा में धोखाधड़ी, सेकेंडरी पर्सनैलिटी के साथ क्रिप्टम्नेशिया (पुरानी भूली-बिसरी यादों का अचानक याद आना), असाधारण जानकारी वाली सेकेंडरी पर्सनैलिटी और किसी आत्मा या शक्ति का शरीर पर कब्ज़ा (possession) जैसी संभावनाओं पर विचार किया गया। रिसर्च करने वालों ने लिखा कि अगर दूसरी व्याख्याएं तथ्यों को ठीक से नहीं समझा पाती हैं, तो सुमित्रा की पर्सनैलिटी में आया ज़बरदस्त बदलाव 'पज़ेशन' (शरीर पर कब्ज़ा) वाली व्याख्या पर विचार करने लायक बनाता है। उन्होंने एक ज़रूरी बात भी जोड़ी: वे यह पक्का दावा नहीं कर रहे थे कि यही सही व्याख्या है। फिर भी, उनका मानना ​​था कि ज़्यादातर सबूतों को देखते हुए 'पज़ेशन', या उससे मिलती-जुलती व्याख्या जैसे कि पुनर्जन्म, उनके पास मौजूद सबसे सही लगने वाली व्याख्या थी।</p>
<p>इसलिए, यह मामला किसी सुलझे हुए रहस्य के साथ नहीं, बल्कि एक ऐसे सवाल के साथ खत्म होता है जिसका कोई जवाब नहीं मिल पाया। रिसर्च करने वाले यह पता लगा पाए कि सुमित्रा के व्यवहार में बहुत बड़ा बदलाव आया था। वे उसके कहे शब्दों को रिकॉर्ड कर पाए। वे उन बातों की तुलना शिव के बारे में ज्ञात तथ्यों से कर पाए। वे यह पहचान पाए कि कौन सी जानकारी अखबारों में छपी थी और कौन सी नहीं। वे उन हालात की जांच कर पाए जिनमें सुमित्रा ने रिश्तेदारों और दोस्तों को पहचाना। वे उसके पढ़ने-लिखने के तरीके में आए बदलावों और शिव से जुड़ी पर्सनैलिटी के पहलुओं को अपनाने के तरीके को रिकॉर्ड कर पाए। लेकिन वे पक्के तौर पर यह पता नहीं लगा पाए कि उसे यह जानकारी असल में कहाँ से मिली।</p>
<p>यहीं पर कहानी परेशान करने वाली हो जाती है।</p>
<p>एक गाँव की युवा महिला को बार-बार चेतना में बदलाव का अनुभव हुआ। उसने अपनी मौत की भविष्यवाणी की। ऐसा लगा कि वह मर गई है और फिर जीवित हो गई। इसके बाद, उसने अपना नाम, पति, बच्चे और परिवार को मानने से इनकार कर दिया और एक ऐसी महिला की पहचान अपना ली जो सिर्फ़ दो महीने पहले ही मरी थी। फिर उसने उस महिला की ज़िंदगी के बारे में बताना शुरू किया, उन लोगों को पहचाना जो उसे जानते थे, और उसकी निजी ज़िंदगी के कुछ हिस्सों के बारे में जानकारी दी। उनमें से कुछ दावों को आम बातचीत के ज़रिए समझाया जा सकता था। कुछ दावों की पुष्टि नहीं हो पाई। लेकिन जाँच करने वालों का मानना ​​था कि काफ़ी हद तक उन बातों का संतोषजनक जवाब उस जानकारी से नहीं मिल सकता था जो उसके लिए सार्वजनिक रूप से उपलब्ध थी।</p>
<p>और इस तरह यह केस अपने पीछे एक आखिरी, अनसुलझा तनाव छोड़ जाता है।</p>
<p>क्या सुमित्रा एक ऐसी ज़िंदगी याद कर रही थी जो उसने कभी जी ही नहीं थी?</p>
<p>क्या बहुत ज़्यादा साइकोलॉजिकल स्ट्रेस में चल रहे दिमाग से एक नई पर्सनैलिटी उभर रही थी?</p>
<p>क्या उसके पास ऐसी जानकारी पहुँची थी जिसे इन्वेस्टिगेटर आसानी से रिकंस्ट्रक्ट नहीं कर सकते थे?</p>
<p>या क्या वह, किसी ऐसे तरीके से जिसे साबित करना नामुमकिन है, शिव की ज़िंदगी के बारे में बता रही थी क्योंकि उसे लगता था कि वह शिव बन गई है?</p>
<p>इन्वेस्टिगेटर ने कभी यह दावा नहीं किया कि उन्होंने उस मिस्ट्री को पूरी तरह से सॉल्व कर लिया है।</p>
<p>उन्होंने इसे डॉक्यूमेंट किया।</p>
<p>उन्होंने इसके आम एक्सप्लेनेशन को टेस्ट किया।</p>
<p>उन्होंने अपने ही अंदाज़ों को चैलेंज किया।</p>
<p>और सालों की इन्वेस्टिगेशन के बाद, उनके पास एक ऐसा केस बचा जिसमें सबसे ज़रूरी सवाल वही रहा जो सुमित्रा के आँखें खोलते ही सामने आया था:</p>
<p>अगर कमरे में मौजूद औरत अब सुमित्रा नहीं थी, तो वह असल में कौन थी?</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/article/sumitra-reincarnation-case-identity-changed-after-death-then-how-were/article-26213</link>
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                <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 17:24:31 +0530</pubDate>
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                <title>15 अगस्त सिर्फ उत्सव नहीं, राष्ट्रनिर्माण और जिम्मेदारी का संकल्प दिवस भी है</title>
                                    <description><![CDATA[स्वतंत्रता दिवस केवल तिरंगा फहराने और देशभक्ति के गीत गाने का पर्व नहीं, बल्कि उन वीर शहीदों के बलिदान को याद करने और राष्ट्रनिर्माण का संकल्प लेने का अवसर है। 15 अगस्त 1947 को मिली आजादी अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और संघर्ष का परिणाम थी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/15-august-swatantrata-diwas-azadi-shaheedon-ke-balidan-rashtra-nirman-article-sanjay-kumar-dheeraj/article-25851"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-08/संजय-कुमार-धीरज_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>आलेख:</strong> <strong>संजय कुमार धीरज</strong></p>
<p>15 अगस्त का दिन हर भारतीय के दिल में देशभक्ति की एक अलग ही लहर जगा देता है। इसी दिन 1947 में भारत ने सदियों की गुलामी के बाद आजादी की सांस ली थी। अंग्रेजों के 200 साल के अत्याचार, लाठियां, जेल और फांसी के फंदे के बाद हमें यह आजादी मिली। भगत सिंह, महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, रानी लक्ष्मीबाई, चंद्रशेखर आजाद, सरदार वल्लभभाई पटेल, मंगल पांडे, विपिन चंद्र पॉल, लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक जैसे अनगिनत वीरों के बलिदान और लाखों अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग के कारण ही आज हम खुले आसमान में सांस ले पा रहे हैं। इसीलिए 15 अगस्त सिर्फ एक तारीख नहीं, यह हमारे गौरव, स्वाभिमान और एकता का प्रतीक है।</p>
<p>दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले से प्रधानमंत्री द्वारा किया जाने वाला ध्वजारोहण और राष्ट्र के नाम संदेश इस दिन की सबसे बड़ी पहचान है। सुबह होते ही पूरे देश में तिरंगा लहराता है। सरकारी इमारतों, स्कूलों, कॉलेजों और घरों की छतों पर केसरिया, सफेद और हरा झंडा गर्व से फहराता है। देश भर में प्रभात फेरियां निकलती हैं। बच्चे हाथों में तिरंगा लेकर "वंदे मातरम", "भारत माता की जय" और "जय हिंद" के नारे लगाते हैं। स्कूलों में देशभक्ति गीत, नाटक और भाषण होते हैं। पुलिस, सेना, एनसीसी और स्कूली बच्चों की मार्च पास्ट अनुशासन और एकता का अद्भुत नजारा पेश करती है। हर गली-मोहल्ले में मिठाइयां बंटती हैं और पूरा देश एक साथ जश्न मनाता है।</p>
<p> स्वतंत्रता का मतलब सिर्फ अंग्रेजों से मुक्ति नहीं था। इसका मतलब था भूख, भय, अन्याय और शोषण से मुक्ति। हमारे पूर्वजों ने एक ऐसे भारत का सपना देखा था जहां हर इंसान को बराबरी, सम्मान और अवसर मिले। आजादी के 79 साल बाद हम कई क्षेत्रों में आगे बढ़े हैं। हम चंद्रमा और मंगल तक पहुंच गए हैं। डिजिटल इंडिया ने दुनिया को चौंका दिया है। गांव-गांव में सड़क, बिजली, शौचालय और इंटरनेट पहुंचा है। बेटियां हर क्षेत्र में नाम कमा रही हैं। मेक इन इंडिया से लेकर स्टार्टअप तक, भारत अब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। लेकिन असली आजादी तब होगी जब हर किसान समृद्ध होगा, हर बच्चा स्कूल जाएगा, हर महिला सुरक्षित होगी, हर युवा को रोजगार मिलेगा और समाज से भेदभाव मिट जाएगा। अभी भी बहुत काम बाकी है।</p>
<p>शहीदों ने हमें आजाद भारत दिया है, अब उसे बेहतर और मजबूत बनाना हमारी जिम्मेदारी है। जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र से ऊपर उठकर "राष्ट्र सर्वोपरि" की भावना रखना जरूरी है। नफरत नहीं, संवाद से समस्याओं का समाधान निकालने की पहल होनी चाहिए। जल, जंगल, जमीन बचाना हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। पेड़ लगाना, नदियों को साफ रखना और प्रदूषण कम करना भी हमारी जिम्मेदारियों में शामिल होने चाहिए। क्योंकि प्रकृति से जुड़कर ही हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा।</p>
<p>अपना काम पूरी निष्ठा से करना ही सबसे बड़ी देश सेवा है। चाहे आप किसान हों, शिक्षक, डॉक्टर, सैनिक या छात्र - हर कोई अपने स्तर पर देश बना रहा है। संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों के साथ-साथ मौलिक कर्तव्यों को भी निभाना अत्यन्त आवश्यक है। पिछले कुछ सालों से "हर घर तिरंगा" अभियान ने इस पर्व को जन-जन का त्योहार बना दिया है। छतों पर तिरंगा लहराकर हम उन शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं जिन्होंने अपना आज हमारे कल के लिए कुर्बान कर दिया। यह अभियान हमें याद दिलाता है कि तिरंगा केवल कपड़े का टुकड़ा नहीं, यह 140 करोड़ भारतीयों के सपनों और बलिदान का प्रतीक है।</p>
<p>15 अगस्त हमें दो बातें सिखाता है। पहली - आजादी आसानी से नहीं मिलती। दूसरी - आजादी को संभालकर रखना और उसे आगे बढ़ाना उससे भी कठिन है। आइए इस 79वें स्वतंत्रता दिवस पर हम सब संकल्प लें कि हम भ्रष्टाचार, गरीबी, अशिक्षा और नफरत से मुक्त एक सशक्त, समृद्ध, आत्मनिर्भर और एकजुट भारत बनाएंगे। वही हमारे वीर शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 15:48:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Suman Kumari ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तिरंगा केवल आकाश में नहीं, हमारे आचरण में भी लहराए</title>
                                    <description><![CDATA[स्वतंत्रता दिवस केवल तिरंगा फहराने, राष्ट्रगान गाने और देशभक्ति के गीतों तक सीमित नहीं है। राष्ट्रीय ध्वज भारत के संघर्ष, बलिदान, लोकतांत्रिक मूल्यों और बेहतर भविष्य के सपनों का प्रतीक है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/it-is-easy-to-salute-the-tricolor-and-difficult-to/article-25835"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-08/e776450a-e316-40a8-8fda-62c6b1682936.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd"><strong>15 अगस्त</strong> आते ही देश का आकाश तिरंगों से भर उठता है। सरकारी भवनों से लेकर विद्यालयों, घरों और सार्वजनिक स्थलों तक राष्ट्रीय ध्वज लहराता दिखाई देता है। देशभक्ति के गीतों और नारों से वातावरण गूंज उठता है और हर भारतीय के भीतर राष्ट्र के प्रति गर्व की भावना जागती है। लेकिन इस उत्सव के बीच एक सवाल हमें स्वयं से जरूर पूछना चाहिए—<strong>क्या तिरंगा केवल हमारे हाथों और इमारतों पर लहराए या हमारे आचरण में भी दिखाई दे?</strong></p>
<p class="isSelectedEnd">तिरंगा हमारे लिए केवल एक राष्ट्रीय ध्वज नहीं, बल्कि भारत के संघर्ष, बलिदान, सपनों और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतीक है। इसे देखते ही उन स्वतंत्रता सेनानियों की याद आती है जिन्होंने देश के भविष्य के लिए अपना वर्तमान न्योछावर कर दिया। उनके लिए आजादी केवल सत्ता परिवर्तन नहीं थी, बल्कि ऐसा भारत बनाना था जहां हर व्यक्ति भय और अन्याय से मुक्त होकर सम्मान के साथ जीवन जी सके।</p>
<p class="isSelectedEnd">इसीलिए <strong>तिरंगे को सलाम करना आसान है, लेकिन उसके संदेश को अपने जीवन में उतारना कठिन।</strong></p>
<h3>ईमानदारी भी राष्ट्रभक्ति है</h3>
<p class="isSelectedEnd">हम स्वतंत्रता दिवस पर देशभक्ति के गीत गाते हैं, लेकिन देशभक्ति का वास्तविक अर्थ तब सामने आता है जब कोई व्यक्ति बिना दबाव के अपना कर्तव्य ईमानदारी से निभाता है। कार्यालय में रिश्वत न लेना, किसी जरूरतमंद का अधिकार न छीनना, यातायात नियमों का पालन करना, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान न पहुंचाना और निजी स्वार्थ के लिए व्यवस्था को धोखा देने से इनकार करना भी राष्ट्रभक्ति के ही रूप हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">सीमा पर खड़ा सैनिक जिस तरह अपने कर्तव्य का निर्वहन करता है, उसी तरह खेत में ईमानदारी से मेहनत करने वाला किसान, निष्ठा से पढ़ाने वाला शिक्षक, मरीज की सेवा करने वाला चिकित्सक और जिम्मेदारी से अपना काम करने वाला हर नागरिक राष्ट्र निर्माण में योगदान देता है।</p>
<p class="isSelectedEnd"><strong>राष्ट्र केवल सरकार का नाम नहीं है। राष्ट्र हम सबके व्यवहार से बनता है।</strong></p>
<h3>तिरंगे के रंगों में छिपा जीवन का संदेश</h3>
<p class="isSelectedEnd">यदि तिरंगे के तीन रंगों को हम अपने जीवन की कसौटी मान लें, तो स्वतंत्रता दिवस का अर्थ और गहरा हो सकता है। केसरिया हमें साहस की प्रेरणा देता है—सही बात के पक्ष में खड़े होने का साहस। सफेद सत्य, शांति और दूसरों के प्रति सम्मान का संदेश देता है। हरा जीवन, समृद्धि और प्रकृति के साथ हमारे रिश्ते की याद दिलाता है। वहीं बीच में मौजूद अशोक चक्र हमें निरंतर कर्म और प्रगति की प्रेरणा देता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">हम एकता की बात करते हैं, लेकिन कई बार जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और विचारधारा के नाम पर अपने बीच दीवारें खड़ी कर लेते हैं। संविधान समानता का अधिकार देता है, फिर भी व्यवहार में किसी व्यक्ति को उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर कमतर समझा जाता है। महिलाओं के सम्मान की बात होती है, लेकिन उनकी स्वतंत्रता पर अनावश्यक प्रतिबंध भी लगाए जाते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">ऐसे में तिरंगा हमारे हाथ में तो रहता है, लेकिन उसकी आत्मा हमारे व्यवहार से दूर हो जाती है।</p>
<h3>सच्चा देशप्रेम सम्मान सिखाता है</h3>
<p class="isSelectedEnd">देशभक्ति का अर्थ अपने देश से प्रेम करना है, लेकिन सच्चा देशप्रेम किसी दूसरे देश या व्यक्ति से घृणा करना नहीं सिखाता। भारत की पहचान विविधता में सह-अस्तित्व की रही है। इसलिए देश से प्रेम का सबसे सुंदर रूप यही है कि हम अपने से अलग विचार, भाषा, धर्म या जीवनशैली रखने वाले व्यक्ति की गरिमा का सम्मान करें।</p>
<p class="isSelectedEnd">किसी की भाषा अलग हो सकती है, पूजा-पद्धति अलग हो सकती है, खान-पान अलग हो सकता है या राजनीतिक विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन उसकी नागरिक गरिमा हमसे अलग नहीं हो सकती।</p>
<h3>अधिकारों के साथ कर्तव्यों का भी संकल्प</h3>
<p class="isSelectedEnd">स्वतंत्रता दिवस पर हमें यह संकल्प भी लेना चाहिए कि देश को केवल अपने अधिकारों से नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों से भी मजबूत करेंगे।</p>
<p class="isSelectedEnd">हम अक्सर पूछते हैं कि देश ने हमें क्या दिया। इस बार यह भी पूछें कि <strong>हमने देश को क्या दिया?</strong></p>
<p class="isSelectedEnd">करों का ईमानदारी से भुगतान करना, कानून का सम्मान करना, मतदान करना, सार्वजनिक स्थानों को स्वच्छ रखना, पानी और बिजली की बर्बादी रोकना, पेड़ लगाना, जरूरतमंदों की सहायता करना और अपने आसपास के वातावरण को बेहतर बनाना—ये राष्ट्र निर्माण के छोटे लेकिन महत्वपूर्ण कदम हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">देश को बदलने के लिए हमेशा किसी बड़े पद की आवश्यकता नहीं होती। एक शिक्षक का संवेदनशील शब्द किसी बच्चे का भविष्य बदल सकता है। किसी अधिकारी का निष्पक्ष निर्णय किसी गरीब परिवार की जिंदगी बदल सकता है। सड़क पर घायल व्यक्ति की मदद के लिए रुक जाना भी उस मानवीय भारत को मजबूत करता है जिसकी कल्पना स्वतंत्रता सेनानियों ने की थी।</p>
<h3>डिजिटल दुनिया में भी जरूरी है जिम्मेदार नागरिकता</h3>
<p class="isSelectedEnd">आज राष्ट्र निर्माण की एक नई कसौटी डिजिटल आचरण भी है। सोशल मीडिया पर बिना जांचे झूठी खबर साझा करना, किसी व्यक्ति के बारे में अपमानजनक सामग्री फैलाना, असहमति रखने वाले व्यक्ति को गाली देना या भीड़ की उत्तेजना में विवेक खो देना जिम्मेदार नागरिकता के विपरीत है।</p>
<p class="isSelectedEnd">हाथ में मोबाइल है तो जिम्मेदारी भी हमारी है। डिजिटल दुनिया में भी तिरंगे की गरिमा हमारे व्यवहार से ही तय होगी।</p>
<h3>प्रकृति की रक्षा भी देशभक्ति</h3>
<p class="isSelectedEnd">तिरंगा हमें यह भी याद दिलाता है कि देश केवल वर्तमान पीढ़ी का नहीं है। आने वाली पीढ़ियों का भी इस धरती पर अधिकार है। नदियों को प्रदूषण से बचाना, जंगलों की रक्षा करना, मिट्टी और पानी का सम्मान करना तथा विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना भी देशभक्ति है।</p>
<p class="isSelectedEnd">हम आने वाली पीढ़ियों को कैसा भारत सौंपते हैं, यही हमारे राष्ट्रप्रेम की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।</p>
<h3>तिरंगा हमारे चरित्र में भी दिखाई दे</h3>
<p class="isSelectedEnd">इस स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा जरूर फहराएं, राष्ट्रगान जरूर गाएं और स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि जरूर दें। लेकिन इसके साथ कुछ क्षण अपने भीतर भी झांकें।</p>
<p class="isSelectedEnd"><strong>यदि हम ईमानदार हैं, तो तिरंगा हमारे चरित्र में है।<br />यदि हम न्यायप्रिय हैं, तो तिरंगा हमारे निर्णय में है।<br />यदि हम संवेदनशील हैं, तो तिरंगा हमारे हृदय में है।<br />यदि हम प्रकृति की रक्षा करते हैं, तो तिरंगा हमारी जिम्मेदारी में है।<br />और यदि हम अपने से भिन्न व्यक्ति की गरिमा का सम्मान करते हैं, तो तिरंगा हमारी नागरिकता में है।</strong></p>
<p class="isSelectedEnd">तिरंगा आकाश में लहराना स्वतंत्रता का उत्सव है, लेकिन <strong>उसे अपने आचरण में लहराना स्वतंत्रता का सम्मान है। </strong>इस स्वतंत्रता दिवस तिरंगे को केवल ऊंचाई न दें—<strong>अपने चरित्र को भी उसकी ऊंचाई तक उठाएं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 13:24:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Suman Kumari ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>उल्टी चाल चलती दुनिया! क्या हम पर्यावरण की बात करने के अधिकारी भी हैं?</title>
                                    <description><![CDATA[धरती पर बढ़ता पर्यावरणीय संकट केवल सरकारों, उद्योगों या बड़ी कंपनियों की जिम्मेदारी नहीं है। हमारी अपनी जीवनशैली और लगातार बढ़ता उपभोग भी इस संकट को गहरा कर रहा है। अधिक उत्पादन के लिए अधिक ऊर्जा, अधिक परिवहन और अधिक प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल होता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/ulti-chaal--chalti-duniya-environment-crisis-simple-lifestyle/article-25448"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-08/8bb70bc4-8959-44f3-826f-f5b34cf87e4d_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>धरती पर एक मनुष्य नाम के एक जीव ने अपने आगमन के पश्चात से जितना उत्पात मचाया हुआ है और उसके चलते धरती दिनों-दिन इतनी बदरंग और नरक होती चली जा रही है कि जिसका कि कोई अंत ही नहीं दिखाई देता!! किंतु हास्यास्पद तो यह है कि मनुष्य नाम के यह जीव लगातार बड़ी अच्छी-अच्छी और प्यारी-प्यारी बातें भी करता है!!</p>
<p>किन्तु अपनी अंतहीन व व्यर्थ की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मनुष्य ने पृथ्वी का इतना अंधाधुंध दोहन कर डाला है कि धरती इस कोने से लेकर उस कोने तक न केवल बुरी तरह से घायल हो चुकी है, अपितु मनुष्य की मूर्खताओं के कारण बराबर कलपती दिखाई देती है! परिवर्तित मौसम-चक्र, फसल चक्र, सूखा, बाढ़, अतिवृष्टि-अनावृष्टि, पहाड़ों का धँसना,  भूस्खलन, हमारे चारों ओर वातावरण में घुलता कारखानों एवं वाहनों एवं अनेकानेक भांति-भांति के उपकरणों का का जहरीला धुआं!! </p>
<p>  यह समस्त कारक मनुष्य के अस्तित्व के संकट के कारण तो हैं ही, साथ ही मनुष्य की ऐसी नादानियों के चलते अन्य समस्त जीवों के अस्तित्व पर भयँकर संकट आसन्न है। किंतु सबसे बड़ी बात तो यह है कि मनुष्य को अभी तक इतनी भी समझ नहीं है कि धरती के समक्ष यह तमाम पर्यावरणीय संकट मानवीय करतूतों व व उसके अनावश्यक उपभोग के सापेक्ष है! यानी जितना ज्यादा उपभोग, उतना ज्यादा उत्पादन और उतनी ही ज्यादा ऊर्जा की खपत ! क्योंकि वस्तुतः मनुष्य ने अपने जीवन को इस हद तक बदल डाला है कि उसकी सम्पूर्ण आवश्यकताएँ केवल व केवल ऊर्जा आधारित हो गई है और साथ ही अंतहीन भी !!</p>
<p>  वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में बात करें तो हमारे सम्मुख पर्यावरणीय संकट के अंतहीन उदाहरण हैं। जैसे पर्यावरण का क्षरण (Environmental Degradation) वायु, जल और मृदा की गुणवत्ता में गिरावट तथा पारिस्थितिक तंत्र के विनाश की गंभीर समस्या है। दुनिया भर में भूमि क्षरण से 3.2 अरब लोग प्रभावित हैं, वायु प्रदूषण से प्रतिवर्ष 42 लाख अकाल मौतें होती हैं, और हर साल लाखों टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है। सच पूछा जाए तो मनुष्य के सुगमतापूर्वक जीवन संपन्न करने के लिए जिस प्रकार की भी मानवीय गतिविधियां इस पृथ्वी पर संचालित की जाती हैं, उन सभी गतिविधियों में कहीं ना कहीं पर्यावरण का क्षरण निर्धारित होता है। हर एक उपभोग में पर्यावरण का विनाश निहित होता है। हमारी अंतहीन आवश्यकताओं की निरंतर आपूर्ति के लिए सर्वप्रथम तो अंतहीन कारखाने और फिर उनको चलाने के लिएअनवरत ऊर्जा का उत्पादन, और अंत में उन समस्त उत्पादित वस्तुओं को हर एक बाजार तक पहुंचाने के लिए ट्रांसपोर्टेशन के साधन, ये सभी मिलाकर अपने आप में पृथ्वी के लिए एक बहुत बड़े संकट का कारण हैं।</p>
<p> और यह समस्त संकट हमारी सुविधा-भोगी मनोवृति के कारण पैदा हुए हैं और आगे और भी अधिक होते जा रहे हैं! तो फिर हममें से जब भी कोई पर्यावरण के संकट का रोना रोता है, उस समय अपने भोलेपन अथवा मासूमियत अथवा अपनी जीवन-शैली के कुल परिणामों का उसे संभवत: तनिक भी ध्यान नहीं होता कि वह स्वयं भी उस पर्यावरणीय संकट का बराबर का हिस्सेदार है! उसकी अगुणवत्ता-पूर्ण जीवन-शैली, उसके द्वारा किए जाने वाले उपभोग की मात्रा, उसके द्वारा उपयोग की जाने वाली ऊर्जा यह सब कुछ मिलाकर धरती का संकट बढ़ाते जा रहे हैं और उसके शिकार वे लोग भी बनते जा रहे हैं, जो वस्तुतः ऊर्जा का नहीं के बराबर उपयोग करते हैं। जिनके पास ऐसे साधन नहीं है और जो बेहद सादा जीवन व्यतीत करते हैं, वे भी इस कोप के शिकार बन रहे हैं। लेकिन ऐसे लोग पर्यावरण के बारे में कुछ कह नहीं पाते! </p>
<p>  मजेदार तथ्य तो यह है कि  पर्यावरण के बारे में वही लोग सबसे ज्यादा बात करते हुए पाए जाते हैं, जो सबसे ज्यादा इस संकट के जिम्मेवार हैं! निश्चित तौर पर बड़े-बड़े मंचों पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले या दुनिया के पर्यावरणीय संकट पर विचार-विमर्श करने वाले तमाम बड़े-बड़े दिग्गज लोग ही होते हैं! और इनकी स्वयं की जीवन शैली को यदि देखा जाए, तो उनके द्वारा किए जाने वाले तमाम विचार-विमर्श का नैतिक खोखलापन दिखाई देता है! इन समस्त लोगों में राजनीतिक लोग, बड़ी टेक कंपनियों के मालिक, बड़े बड़े बिजनेसमैन एवं विभिन्न सामाजिक संगठनों के लोग शामिल हैं! पर्यावरण के समस्त संकटों के लिए केवल दूसरों को जिम्मेदार ठहराते हुए, एक-दूसरे पर दोषारोपण करना, किसी भी प्रकार के नियमन को थोपना और दंड का प्रावधान करना, यह भी अपने आप में सबसे बड़ा पाखंड है और शहरीकरण की जद में आए हुए हम वे समस्त लोग भी, जो अपनी जीवन-शैली में तरह-तरह के उपकरणों का उपयोग करते हुए उनके अत्यधिक उत्पादन को बढ़ावा देते हैं और साथ ही ऊर्जा को भी नष्ट करते हैं! </p>
<p> और तो और, इसमें हमारी देर रात तक जगने और देर सुबह जागने की प्रवृतियां भी शामिल है! किंतु इस दिशा में आशा की कोई किरण इसलिए भी नहीं दिखाई देती, क्योंकि धरती के समस्त संकटों के प्रति जागरूक लोगों की जीवनशैली भी उसी भांति की है, जिसने धरती को संकट में डाला है!! इसलिए इस विराट संकट का आने वाले दिनों में कोई समाधान दिखाई नहीं देता! इस नेगेटिव बात के गहरे अर्थ को समझते हुए हम सबको, जो वास्तव में निदान चाहते हैं, अपनी जीवन शैली में बिल्कुल उलट परिवर्तन लाने होंगे, तब जाकर हम इस विषय पर किसी भी तरह की बातचीत के अधिकारी हो सकते हैं और साथ ही समाधान के वाहक भी ! </p>
<p> किंतु वर्तमान समय में सच्चाई इसके ठीक विपरीत है। भांति-भांति के विज्ञापनों के सहारे विभिन्न कंपनियों द्वारा आम समाज के द्वारा करवाया जा रहा उपभोग, विकास की बातें और उस उपभोग को सुनिश्चित करने के लिए दिया जा रहा कर्ज, कुल मिलाकर इस संभावना को बिल्कुल नष्ट करता है कि भविष्य में पर्यावरण को शुद्ध करने के लिए सोचे जा रहे विचार और कार्यान्वित किये जा रहे कार्य किसी भी प्रकार से मंगलकारी सिद्ध होंगे ! क्योंकि जो चीज हमारे खुद के कार्यों द्वारा बर्बाद की जाती हो उन्हें उन्हीं कार्यों को ठीक उलट कर ही उस स्थिति वापस ठीक किया जा सकता है। </p>
<p> किंतु पहले पिछड़ेपन से विकास की ओर बढ़ना, फिर विकासशील होना, फिर विकसित होना और अंत में अति विकसित होना इस प्रकार की सोच के साथ तथा वर्तमान जीवन शैली के साथ ही जीते हुए, आधुनिक जीवन की ये समस्त सोच विचार-शैलियां अंततः हमारा कुछ भी भला नहीं कर सकती! पृथ्वी पर जीवन को सुसंगत बनाने के लिए अंततः हममें से प्रत्येक इकाई को निश्चित तौर पर अभी की अभी उस जीवन शैली की ओर प्रवृत्त होना होगा, जहां उपभोग की मात्रा अत्यल्प हो। जहां भव्यता और चकाचौंध की चाहत ना हो। जहां अपने अहंकार की पूर्ति के लिए अनेकानेक और ऊंचे मकानों की आवश्यकता ना हो! कुल मिलाकर एक सादा जीवन और उच्च विचार ही हमारे पर्यावरण और हमारी पृथ्वी को नष्ट होने से बचा सकता है।</p>
<p><strong>राजीव थेपड़ा </strong><br /><strong>रांची, झारखंड </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 08 Aug 2026 16:42:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Sahibganj News: श्रावणी मेला 2026: शिवगादी धाम के विकास को मिलेगी नई रफ्तार, रोपवे-हेलीपैड की तैयारी</title>
                                    <description><![CDATA[साहिबगंज के बरहेट स्थित प्रसिद्ध शिवगादी बाबा गजेश्वरनाथ धाम में श्रावणी मेले 2026 का शुभारंभ विधिवत पूजा-अर्चना के साथ हुआ। उद्घाटन समारोह में जिला प्रशासन, जनप्रतिनिधि और बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। उपायुक्त दीपक कुमार दुबे ने श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुविधाओं को प्राथमिकता बताते हुए स्वास्थ्य, पुलिस और मोबाइल मेडिकल यूनिट की व्यवस्था की जानकारी दी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/sahibganj/sahibganj-news-shravani-mela-2026-development-of-shivgadi-dham-will/article-24919"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/57daf0a2-3797-4a1e-93c8-8e8fe82ab2fe_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>साहिबगंज : </strong>श्रावण माह के प्रथम दिन बरहेट प्रखंड अंतर्गत प्रसिद्ध शिवगादी स्थित बाबा गजेश्वरनाथ धाम में वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच विधिवत पूजा-अर्चना के पश्चात नारियल फोड़कर एवं फीता काटकर श्रावणी मेले का शुभारंभ किया गया। उद्घाटन समारोह में उपायुक्त दीपक कुमार दुबे, पुलिस अधीक्षक अमित कुमार सिंह, सदर अनुमंडल पदाधिकारी अमर जॉन आइंद, झामुमो पार्टी के केंद्रीय सचिव सह प्रवक्ता पंकज मिश्रा, सांसद प्रतिनिधि संजीव सामू हेंब्रम सहित कई प्रशासनिक अधिकारी, जनप्रतिनिधि एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे।</p>
<p>उद्घाटन के बाद उपायुक्त दीपक कुमार दुबे ने जिलेवासियों एवं श्रद्धालुओं को श्रावण माह की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि प्रत्येक सोमवार और नागपंचमी के अवसर पर बड़ी संख्या में स्थानीय तथा अन्य राज्यों से श्रद्धालु शिवगादी धाम पहुंचते हैं। ऐसे में जिला प्रशासन की प्राथमिकता श्रद्धालुओं को सुरक्षित सुगम और बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना है, ताकि सभी श्रद्धालु शांतिपूर्ण ढंग से जलार्पण और पूजा-अर्चना कर सकें। उन्होंने बताया कि शिवगादी धाम एवं मोती झरना स्थित मोतीनाथ धाम में सुरक्षा स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सुविधाओं की विशेष व्यवस्था की गई है।    </p>
<p>उन्होंने कहा कि कांवरिया पथ पर स्वास्थ्य मोबाइल यूनिट तैनात की गई है तथा स्वास्थ्य विभाग द्वारा विशेष चिकित्सा शिविर भी लगाया जाएगा। बरहेट बाजार से शिवगादी तथा बरहरवा से शिवगादी तक अलग मोबाइल स्वास्थ्य इकाइयों की व्यवस्था की गई है। प्रत्येक रविवार और सोमवार को अतिरिक्त पुलिस बल एवं दंडाधिकारियों की तैनाती रहेगी। उपायुक्त ने सभी प्रतिनियुक्त अधिकारियों एवं कर्मियों को पूरे श्रावण माह गंभीरता से दायित्व निभाने का निर्देश देते हुए कहा कि लापरवाही बरतने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।</p>
<p>वहीं, पुलिस अधीक्षक अमित कुमार सिंह ने कहा कि इस वर्ष मेले की सुरक्षा व्यवस्था पहले से अधिक मजबूत की गई है। महिला एवं पुरुष पुलिस बल की पर्याप्त तैनाती की गई है। श्रद्धालुओं से कतारबद्ध होकर दर्शन एवं पूजा करने की अपील करते हुए उन्होंने बताया कि 15 चारपहिया वाहन और 100 मोटरसाइकिलों के माध्यम से लगातार पुलिस पेट्रोलिंग की जाएगी। मेला क्षेत्र तथा मोती झरना स्थित मोतीनाथ धाम में सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चाक चौबंद रहेगी।    </p>
<p> झामुमो के केंद्रीय सचिव सह प्रवक्ता पंकज मिश्रा ने श्रावण माह और श्रावणी मेले की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि शिवगादी धाम का धार्मिक महत्व अत्यंत विशेष है। उन्होंने कहा कि बाबा गजेश्वरनाथ पर पहाड़ से वर्षभर प्राकृतिक रूप से जलधारा गिरती रहती है, जो इस धाम की विशेष पहचान है। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में शिवगादी धाम के विकास के लिए लगातार कार्य हो रहे हैं।</p>
<p> उन्होंने बताया कि मंदिर परिसर से बरहेट चौक तक सोलर लाइटें लगाई गई हैं और इसी वर्ष रोपवे परियोजना की अनुशंसा किए जाने की संभावना है। साथ ही यहां हेलीपैड निर्माण की भी योजना है जिससे भविष्य में देश विदेश से श्रद्धालु हेलीकॉप्टर के माध्यम से सीधे शिवगादी धाम पहुंचकर बाबा के दर्शन कर सकेंगे। उन्होंने कहा कि सावन के बाद ग्रामीणों एवं अधिकारियों के साथ बैठक कर हेलीपैड निर्माण की दिशा में पहल की जाएगी।</p>
<p> इसके अलावा श्रद्धालुओं के ठहरने चलंत शौचालय मेडिकल सुविधा और स्थायी स्वास्थ्य शिविर की व्यवस्था को और मजबूत किया जाएगा। उन्होंने प्रत्येक सोमवार को प्रखंड विकास पदाधिकारी एवं थाना प्रभारी को मंदिर परिसर में पूरे दिन मौजूद रहकर व्यवस्थाओं की निगरानी करने का सुझाव भी दिया। साथ ही हरिणचरा मोड़ से शिवगादी तक सड़क निर्माण जल्द पूरा कराने की बात कही।   </p>
<p>कार्यक्रम के अंत में उपायुक्त दीपक कुमार दुबे एवं पुलिस अधीक्षक अमित कुमार सिंह ने बाबा गजेश्वरनाथ का पूजन व अभिषेक कर जिले, राज्य एवं देश की सुख, समृद्धि, शांति और विकास की कामना की। इस अवसर पर पुरोहित सुनील कुमार झा, तिब्लू झा, कैलाश ठाकुर, सनोज झा, सौरव मिश्रा, पवन कुमार झा, शिवगादी समिति के अध्यक्ष रूपक साह, सचिव उत्पल दत्ता, उपाध्यक्ष संजय गुप्ता, विपिन साह, संजय गोस्वामी, राजमहल अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी विमलेश त्रिपाठी, बरहरवा अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी नितिन खंडेलवाल, डीईओ नयन कुमार, इंस्पेक्टर नुनुदेव राय, थाना प्रभारी चंदन कुमार, प्रखंड विकास पदाधिकारी अंशु कुमार पाण्डे सहित बड़ी संख्या में शिवभक्त एवं गणमान्य लोग उपस्थित थे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>साहिबगंज</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 18:51:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Susmita Rani]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सारकोमा का इलाज अब पहले से अधिक प्रभावी, जागरूकता और समय पर उपचार से बढ़ी उम्मीद</title>
                                    <description><![CDATA[जुलाई माह विश्वभर में सारकोमा जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है। सारकोमा एक दुर्लभ लेकिन गंभीर कैंसर है, जो शरीर के कनेक्टिव टिश्यू और हड्डियों में विकसित होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती गांठ, लगातार सूजन या हड्डियों में बिना कारण दर्द जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/health/sarcoma-awareness-month-rare-cancer-symptoms-treatment-hindi/article-24896"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/d0620b23-eb6c-4564-a458-59ab21ec4e79_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>डॉ. आयुष चौधरी</strong><br /><strong>एसोसिएट स्पेशलिस्ट</strong><br /><strong>मेडिकल इंडोर सर्विसेज</strong><br /><strong>टाटा मेन हॉस्पिटल </strong></p>
<p>जुलाई माह विश्वभर में सारकोमा जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य इस दुर्लभ लेकिन गंभीर प्रकार के कैंसर के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाना है, जिसके बारे में आमतौर पर बहुत कम जानकारी होती है। स्तन, फेफड़े या सर्वाइकल कैंसर की तुलना में सारकोमा के बारे में कम जानकारी होने के कारण इसकी समय पर पहचान और निदान में अक्सर देरी हो जाती है। जबकि जागरूकता बढ़ाकर इस स्थिति में महत्वपूर्ण सुधार लाया जा सकता है। समय रहते पहचान और विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा शीघ्र उपचार से रोगियों के बेहतर स्वास्थ्य परिणाम सुनिश्चित किए जा सकते हैं।</p>
<p>कल्पना कीजिए कि आपकी बांह या जांघ पर एक छोटी-सी, बिना दर्द वाली गांठ दिखाई देती है। अधिकांश लोग इसे सामान्य चर्बी की गांठ या किसी हल्की चोट का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। ज्यादातर मामलों में ऐसा होना सही भी होता है। लेकिन यदि यह गांठ लगातार बढ़ने लगे, तो इसकी चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है, क्योंकि कुछ मामलों में यह सारकोमा का संकेत भी हो सकती है।</p>
<p>सारकोमा कैंसर का एक ऐसा समूह है, जो शरीर के कनेक्टिव टिश्यू जैसे मांसपेशियों, वसा, नसों, रक्त वाहिकाओं, रेशेदार ऊतकों और हड्डियों में विकसित होता है। मुख्य रूप से इसे दो प्रकारों में बाँटा जाता है—सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा और बोन सारकोमा। सारकोमा के 70 से अधिक प्रकार पहचाने जा चुके हैं। यह एक दुर्लभ और कई प्रकारों वाला कैंसर है, इसलिए इसकी पहचान करना आसान नहीं होता। यही कारण है कि इसके प्रति जागरूकता और विशेषज्ञ डॉक्टरों से समय पर उपचार बेहद महत्वपूर्ण है।</p>
<p>हालाँकि, वयस्कों में होने वाले सभी कैंसर मामलों में सारकोमा की हिस्सेदारी 1% से भी कम है, लेकिन इसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक है। बच्चों और किशोरों में होने वाले लगभग 10–15% कैंसर सारकोमा के होते हैं और यह युवाओं में भी अपेक्षाकृत अधिक पाया जाने वाला कैंसर है। भारत में सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा के हर वर्ष लगभग 1–2 मामले प्रति एक लाख आबादी पर सामने आते हैं। लेकिन देश की बड़ी आबादी के कारण हर साल ऐसे हजारों नए मरीज सामने आते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है, क्योंकि कई मामलों की रिपोर्ट नहीं हो पाती, कुछ क्षेत्रों में कैंसर रजिस्ट्री की सीमित पहुंच है और बीमारी की पहचान में भी अक्सर देरी हो जाती है। सारकोमा के प्रति जागरूकता की कमी, इसका दुर्लभ होना और सामान्य गांठ जैसी दिखने वाली स्थितियों से मिलते-जुलते लक्षण होने के कारण कई मरीज तब तक डॉक्टर के पास नहीं पहुँचते, जब तक बीमारी काफी बढ़ नहीं जाती। इसलिए लोगों में इसके प्रति जागरूकता बढ़ाना, संदिग्ध लक्षणों की समय पर पहचान करना और मरीजों को शीघ्र विशेषज्ञ चिकित्सा केंद्रों तक पहुँचाना बेहद आवश्यक है।</p>
<p>सारकोमा जागरूकता माह का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि हर गांठ सामान्य नहीं होती। हालांकि अधिकांश गांठें कैंसर नहीं होतीं, लेकिन कुछ संकेतों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि कोई गांठ लगातार आकार में बढ़ रही हो, उसका आकार पाँच सेंटीमीटर से अधिक हो, वह त्वचा के नीचे गहराई में हो, पहले हटाए जाने के बाद दोबारा उभर आए या उसके साथ दर्द भी हो, तो तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। इसी तरह, हड्डियों में लगातार दर्द रहना, किसी हड्डी के आसपास सूजन होना या मामूली चोट लगने पर भी हड्डी टूट जाना जैसे लक्षण दिखाई दें, तो बिना देर किए चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।</p>
<p>यह समझना भी उतना ही जरूरी है कि इन लक्षणों का होना हमेशा सारकोमा होने का संकेत नहीं होता। अधिकांश गांठें और सूजन कैंसर नहीं होतीं। लेकिन यदि ऐसे लक्षण दिखाई दें, तो समय पर डॉक्टर से जांच कराना आवश्यक है। बीमारी की जल्द पहचान होने पर उपचार अधिक प्रभावी होता है और मरीज के पूरी तरह स्वस्थ होने की संभावना भी बढ़ जाती है।</p>
<p>सारकोमा की सही पहचान के लिए सुनियोजित जांच प्रक्रिया आवश्यक होती है। ट्यूमर का आकार और उसके फैलाव का पता लगाने के लिए एमआरआई या सी टी स्कैन  जैसी जांच की जाती है, जबकि बायोप्सी से बीमारी की पुष्टि होती है। चूंकि सारकोमा एक दुर्लभ कैंसर है और इसके कई प्रकार होते हैं, इसलिए इसकी जांच अनुभवी पैथोलॉजिस्ट द्वारा किया जाना बेहद जरूरी है। कई मामलों में मॉलिक्यूलर टेस्ट भी किए जाते हैं, जिससे बीमारी के प्रकार की सटीक पहचान हो सके और उचित उपचार तय किया जा सके। यह भी महत्वपूर्ण है कि बायोप्सी और उपचार की पूरी योजना सारकोमा विशेषज्ञों की मल्टीडिसिप्लिनरी टीम की देखरेख में बनाई जाए। बिना उचित योजना के की गई सर्जरी आगे के इलाज को अधिक जटिल बना सकती है।</p>
<p>पिछले दो दशकों में सारकोमा के उपचार में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, जिससे मरीजों के लिए बेहतर उम्मीदें जगी हैं। अब इसका इलाज केवल ट्यूमर निकालने तक सीमित नहीं है। इसके बजाय, विशेषज्ञों की एक मल्टीडिसिप्लिनरी टीम मिलकर प्रत्येक मरीज के लिए उसकी स्थिति के अनुसार उपचार की योजना तैयार करती है। इस टीम में सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट, ऑर्थोपेडिक ऑन्कोलॉजिस्ट, मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट, रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट, पैथोलॉजिस्ट, रिकंस्ट्रक्टिव सर्जन, फिजियोथेरेपिस्ट और रिहैबिलिटेशन विशेषज्ञ शामिल होते हैं। सभी विशेषज्ञ मिलकर मरीज को सर्वोत्तम उपचार उपलब्ध कराने का प्रयास करते हैं।</p>
<p>सारकोमा के उपचार में सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है लिंब-सेल्वेज सर्जरी का व्यापक उपयोग। पहले हाथ या पैर में होने वाले कई बोन और सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा के मामलों में एम्प्यूटेशन ही एकमात्र विकल्प माना जाता था। लेकिन आज बेहतर इमेजिंग तकनीक, उन्नत सर्जरी, एंडोप्रोस्थेटिक और माइक्रोसर्जिकल रिकंस्ट्रक्शन तथा आधुनिक सहायक उपचारों की बदौलत कई मरीजों में ट्यूमर को सफलतापूर्वक हटाते हुए प्रभावित अंग को सुरक्षित रखा जा सकता है। इससे मरीज पहले की तरह सामान्य जीवन जीने और अपने अंग का बेहतर उपयोग करने में सक्षम हो पाते हैं। हालाँकि, कुछ विशेष परिस्थितियों में कैंसर पर पूरी तरह नियंत्रण पाने के लिए अंग काटना अब भी आवश्यक हो सकता है, लेकिन अब यह हर मरीज के लिए अनिवार्य विकल्प नहीं रह गया है।</p>
<p>सारकोमा का उपचार अब पहले की तुलना में अधिक व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार किया जाता है। स्थानीय स्तर तक सीमित सारकोमा के अधिकांश मामलों में सर्जरी मुख्य उपचार है। कई बार दोबारा कैंसर होने की आशंका कम करने के लिए सर्जरी के साथ रेडियोथेरेपी भी दी जाती है। कुछ प्रकार के बोन सारकोमा में सर्जरी से पहले और बाद में कीमोथेरेपी देने से बेहतर परिणाम मिलते हैं। हाल के वर्षों में मॉलिक्यूलर पैथोलॉजी में हुई प्रगति के कारण सारकोमा के कुछ प्रकारों में विशेष जेनेटिक और मॉलिक्यूलर बदलावों की पहचान संभव हुई है। इससे ऐसे मरीजों के लिए टार्गेटेड थेरेपी का रास्ता खुला है, जिनमें इससे बेहतर लाभ मिलने की संभावना होती है। इसके अलावा, इम्यूनोथेरेपी और अन्य नई उपचार पद्धतियों पर लगातार शोध जारी है, जिससे भविष्य में सारकोमा के इलाज के और अधिक प्रभावी विकल्प उपलब्ध होने की उम्मीद है।</p>
<p>सारकोमा के उपचार में हुई इन प्रगतियों से यह स्पष्ट होता है कि अब सारकोमा का निदान निराशा का पर्याय नहीं रहा। यदि बीमारी का समय पर पता चल जाए, तो कई मरीजों का सफलतापूर्वक इलाज संभव है। वहीं, जिन मरीजों में बीमारी बढ़ चुकी होती है, उन्हें भी नई दवाओं, बेहतर सहायक उपचार और विशेषज्ञों की बहु-विषयक टीम की देखरेख से लाभ मिल सकता है। आज सारकोमा के उपचार का उद्देश्य केवल मरीज की जीवन-रक्षा करना ही नहीं, बल्कि उसके प्रभावित अंग की कार्यक्षमता बनाए रखना, जीवन की गुणवत्ता बेहतर करना और उपचार से लेकर पूरी तरह स्वस्थ होने तक हर चरण में उसका सहयोग करना भी है।</p>
<p>चूंकि सारकोमा एक दुर्लभ और कई प्रकार का कैंसर है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देश भी यही सलाह देते हैं कि इसका उपचार ऐसे केंद्रों में कराया जाए, जहां सारकोमा के इलाज का विशेष अनुभव और विशेषज्ञता उपलब्ध हो। ऐसे केंद्रों में सटीक जांच, विशेषज्ञों की बहु-विषयक टीम, उन्नत सर्जरी, आधुनिक रेडियोथेरेपी, दवा आधारित उपचार, रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी, रिहैबिलिटेशन और लंबे समय तक फॉलो-अप जैसी सभी सुविधाएं एक ही स्थान पर उपलब्ध होती हैं। इस समन्वित उपचार पद्धति से प्रत्येक मरीज को उसके सारकोमा के प्रकार और बीमारी की अवस्था के अनुसार सबसे उपयुक्त उपचार मिल पाता है।<br /> <br />सारकोमा जागरूकता माह के अवसर पर संदेश स्पष्ट और महत्वपूर्ण है—सारकोमा भले ही एक दुर्लभ कैंसर हो, लेकिन इसे कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि शरीर में कोई गांठ लगातार बढ़ रही हो, लंबे समय तक सूजन बनी रहे या हड्डियों में बिना किसी स्पष्ट कारण के लगातार दर्द हो, तो तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। समय पर बीमारी की पहचान ही सफल उपचार की सबसे बड़ी कुंजी है। आज सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी और विशेषज्ञों की बहु-विषयक टीम द्वारा किए जा रहे उपचार की बदौलत सारकोमा के कई मरीजों के बेहतर स्वास्थ्य परिणाम संभव हो रहे हैं।</p>
<p>जागरूकता से बीमारी की समय पर पहचान संभव होती है। समय पर पहचान से बेहतर इलाज मिल सकता है, और बेहतर इलाज हर मरीज के लिए नई उम्मीद लेकर आता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>जन स्वास्थ्य</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 15:27:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पॉलीमर नोटों की ओर बढ़ता भारत, सुरक्षित और टिकाऊ मुद्रा की नई शुरुआत</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने मुद्रा प्रणाली को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल करते हुए 10 और 20 रुपये के पॉलीमर (प्लास्टिक आधारित) नोटों के बड़े पैमाने पर फील्ड ट्रायल की तैयारी शुरू की है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/new-initiative-for-safe-and-sustainable-currency/article-24812"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/0271da52-db63-4528-96e8-2c634473311c_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>महेन्द्र तिवारी</strong></p>
<p>भारत की अर्थव्यवस्था निरंतर विस्तार के नए चरण में प्रवेश कर रही है। डिजिटल भुगतान के बढ़ते प्रचलन के बावजूद नकद मुद्रा आज भी करोड़ों भारतीयों के दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है। देश के छोटे व्यापार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक परिवहन, कृषि बाजार और असंगठित क्षेत्र का बड़ा हिस्सा आज भी नकद लेनदेन पर निर्भर है। ऐसे में मुद्रा की गुणवत्ता, सुरक्षा और टिकाऊपन केवल तकनीकी विषय नहीं रह जाते, बल्कि आर्थिक व्यवस्था की विश्वसनीयता से सीधे जुड़े होते हैं। इसी संदर्भ में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा पॉलीमर अर्थात प्लास्टिक आधारित नोटों की दिशा में उठाया गया कदम अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। केंद्र सरकार ने आरबीआई के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए दस रुपये और बीस रुपये के पॉलीमर नोटों के बड़े पैमाने पर फील्ड ट्रायल की अनुमति दी है। पहले चरण में दोनों मूल्यवर्ग के एक एक अरब नोटों का परीक्षण किया जाएगा। यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो भविष्य में अन्य मूल्यवर्ग के नोटों में भी इस तकनीक का विस्तार किया जा सकता है। फिलहाल सरकार ने स्पष्ट किया है कि कागजी नोटों को तत्काल हटाने की कोई योजना नहीं है और यह केवल परीक्षण आधारित पहल है।</p>
<p>पॉलीमर नोट सामान्य कागज से नहीं बल्कि विशेष प्रकार के सिंथेटिक पॉलीमर पदार्थ से बनाए जाते हैं। यह सामग्री नमी, धूल, गंदगी और बार बार मोड़े जाने जैसी परिस्थितियों को बेहतर ढंग से सहन कर सकती है। यही कारण है कि इनकी आयु पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में कई गुना अधिक होती है। सामान्यतः कम मूल्यवर्ग के नोट सबसे अधिक हाथों से गुजरते हैं और कुछ ही महीनों में फटने या खराब होने लगते हैं। इसके कारण रिजर्व बैंक को हर वर्ष बड़ी संख्या में पुराने नोट वापस लेकर नए नोट छापने पड़ते हैं। यदि पॉलीमर नोट अपेक्षा के अनुसार लंबे समय तक चलते हैं तो नोटों की छपाई, परिवहन और नष्ट करने की लागत में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।</p>
<p>भारत में नकली नोटों की चुनौती लंबे समय से चिंता का विषय रही है। समय समय पर सुरक्षा एजेंसियों ने नकली भारतीय मुद्रा के नेटवर्क का खुलासा किया है। नकली नोट केवल आर्थिक नुकसान नहीं पहुंचाते बल्कि उनका उपयोग अवैध गतिविधियों और संगठित अपराध में भी किया जाता है। पॉलीमर नोटों में पारदर्शी विंडो, उन्नत होलोग्राम, रंग बदलने वाली स्याही, सूक्ष्म प्रिंटिंग और अन्य आधुनिक सुरक्षा विशेषताएं जोड़ी जा सकती हैं। इन विशेषताओं की नकल करना पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में कहीं अधिक कठिन माना जाता है। इसलिए पॉलीमर नोट नकली मुद्रा पर प्रभावी नियंत्रण का माध्यम बन सकते हैं।</p>
<p>इस पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू पर्यावरण से भी जुड़ा हुआ है। पहली नजर में प्लास्टिक शब्द सुनकर पर्यावरण संबंधी चिंताएं स्वाभाविक लग सकती हैं, लेकिन पॉलीमर नोट सामान्य प्लास्टिक नहीं होते। इनका निर्माण विशेष तकनीक से किया जाता है और उपयोग के बाद इन्हें पुनर्चक्रित भी किया जा सकता है। चूंकि इनकी आयु अधिक होती है इसलिए समान अवधि में कम संख्या में नोट छापने पड़ते हैं। इससे कागज की खपत, ऊर्जा की आवश्यकता और परिवहन संबंधी खर्च में भी कमी आती है। कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी माना है कि लंबे समय में पॉलीमर नोट पर्यावरणीय दृष्टि से लाभकारी सिद्ध हो सकते हैं।</p>
<p>दुनिया के अनेक देशों ने पहले ही पॉलीमर मुद्रा को अपनाकर इसके लाभ प्राप्त किए हैं। ऑस्ट्रेलिया इस तकनीक को अपनाने वाला पहला देश था। इसके बाद कनाडा, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, रोमानिया और अनेक अन्य देशों ने भी अपनी मुद्रा में पॉलीमर तकनीक का उपयोग किया। इन देशों के अनुभव बताते हैं कि पॉलीमर नोट अधिक समय तक सुरक्षित रहते हैं और नकली नोटों की घटनाओं में कमी लाने में सहायक होते हैं। भारत जैसे विशाल देश के लिए इन अनुभवों का अध्ययन अत्यंत उपयोगी हो सकता है।</p>
<p>भारत में पॉलीमर नोटों का विचार नया नहीं है। वर्ष 2013 और उसके बाद भी सीमित स्तर पर कुछ शहरों में इनका परीक्षण किया गया था। उस समय विभिन्न तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। अब बदलती आर्थिक आवश्यकताओं, बेहतर तकनीक और बढ़ती मुद्रा मांग को देखते हुए इसे नए रूप में पुनर्जीवित किया गया है। इस बार परीक्षण का दायरा पहले की तुलना में कहीं बड़ा रखा गया है ताकि अलग अलग जलवायु, भौगोलिक परिस्थितियों और उपयोग के स्तर पर नोटों के प्रदर्शन का व्यापक मूल्यांकन किया जा सके।</p>
<p>भारत जैसे देश में मौसम की विविधता एक बड़ी चुनौती है। कहीं अत्यधिक गर्मी पड़ती है तो कहीं लगातार वर्षा होती है। कई क्षेत्रों में धूल और नमी का स्तर भी अधिक रहता है। ऐसे वातावरण में कागजी नोट अपेक्षाकृत जल्दी खराब हो जाते हैं। फील्ड ट्रायल का उद्देश्य यही समझना है कि पॉलीमर नोट वास्तविक परिस्थितियों में कितने प्रभावी सिद्ध होते हैं। यदि वे इन परिस्थितियों में भी अपनी गुणवत्ता बनाए रखते हैं तो उनका व्यापक उपयोग आर्थिक दृष्टि से लाभदायक हो सकता है।</p>
<p>हालांकि इस योजना के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। पॉलीमर नोटों के निर्माण की प्रारंभिक लागत कागजी नोटों की तुलना में अधिक होती है। इसके अलावा एटीएम मशीनों, नकदी गिनने वाली मशीनों और बैंकिंग प्रणाली के कुछ उपकरणों में आवश्यक तकनीकी परिवर्तन भी करने पड़ सकते हैं। जनता को नए नोटों की विशेषताओं की जानकारी देना और उन्हें नकली नोटों से अलग पहचानने का प्रशिक्षण देना भी आवश्यक होगा। इसलिए यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं बल्कि प्रशासनिक और सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।</p>
<p>भारत में डिजिटल भुगतान प्रणाली तेजी से विकसित हुई है। यूपीआई ने लेनदेन की दुनिया बदल दी है, फिर भी नकदी की उपयोगिता समाप्त नहीं हुई है। छोटे दुकानदारों, ग्रामीण क्षेत्रों, सीमित इंटरनेट वाले इलाकों और अनेक सामाजिक परिस्थितियों में नकद भुगतान आज भी सबसे सुविधाजनक माध्यम है। इसलिए डिजिटल अर्थव्यवस्था और नकद मुद्रा दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। पॉलीमर नोटों की पहल इसी संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाती है, जिसमें आधुनिक तकनीक अपनाते हुए नकद मुद्रा को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाया जा रहा है।</p>
<p>आरबीआई का यह निर्णय केवल नए प्रकार के नोट जारी करने तक सीमित नहीं है बल्कि यह भविष्य की मुद्रा व्यवस्था की दिशा भी तय करता है। यदि परीक्षण सफल रहता है तो भारत उन देशों की श्रेणी में शामिल हो जाएगा जिन्होंने आधुनिक तकनीक के माध्यम से अपनी मुद्रा प्रणाली को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाया है। इससे जनता का विश्वास मजबूत होगा, नकली नोटों की चुनौती कम होगी और मुद्रा प्रबंधन की लागत में भी दीर्घकालिक बचत संभव होगी।</p>
<p>यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल कागजी नोटों को समाप्त करने का कोई निर्णय नहीं लिया गया है। परीक्षण पूरा होने के बाद उसके परिणामों का मूल्यांकन किया जाएगा। यदि अपेक्षित सफलता मिलती है तभी आगे की रणनीति तय होगी। यह सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि भारत की विशाल आबादी और विविध परिस्थितियों में किसी भी बड़े परिवर्तन को चरणबद्ध तरीके से लागू करना ही व्यावहारिक होता है।</p>
<p>आर्थिक सुधारों की सफलता केवल नई नीतियां बनाने से नहीं बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन से निर्धारित होती है। पॉलीमर नोटों का प्रयोग भी इसी कसौटी पर परखा जाएगा। यदि यह पहल सफल होती है तो भारत की मुद्रा व्यवस्था अधिक आधुनिक, सुरक्षित और टिकाऊ बन सकती है। इससे नकली नोटों पर नियंत्रण, सरकारी खर्च में कमी, जनता को बेहतर गुणवत्ता वाले नोट और बैंकिंग व्यवस्था को अधिक दक्ष बनाने जैसे अनेक लाभ प्राप्त हो सकते हैं। आने वाले वर्षों में यह पहल भारतीय मुद्रा इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तनों में से एक सिद्ध हो सकती है और यह दिखाएगी कि तकनीकी नवाचार किस प्रकार आम नागरिक के दैनिक जीवन को भी अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक बना सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 16:27:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हर दिल में बसने वाले नायक: जेआरडी टाटा की मानवीय विरासत आज भी प्रेरणास्रोत</title>
                                    <description><![CDATA[जेआरडी टाटा केवल एक सफल उद्योगपति नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों, नैतिक नेतृत्व और राष्ट्र निर्माण के प्रतीक थे। उन्होंने कर्मचारियों के सम्मान, नवाचार, सामाजिक उत्तरदायित्व और उत्कृष्ट कार्यसंस्कृति को हमेशा प्राथमिकता दी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/success-story/jrd-tata-human-values-leadership-tata-steel-legacy/article-24745"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/dbdd5b11-8db0-4111-9832-b37662cd1dc8_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>इतिहास जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा (जे.आर.डी. टाटा) को एक दूरदर्शी उद्योगपति, अग्रणी विमान चालक, राष्ट्र निर्माता और आधुनिक भारतीय उद्योग के शिल्पकार के रूप में याद करता है। लेकिन जिन लोगों ने उन्हें निकट से जाना, वे उन्हें उनकी उपलब्धियों से भी बढ़कर उनकी मानवीयता और विनम्रता के लिए याद करते हैं। </p>
<p>वे ऐसे विलक्षण नेता थे, जो बोलने से पहले सुनने में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि हर व्यक्ति, चाहे उसका पद कोई भी हो, सम्मान और गरिमा का समान अधिकारी है। उन्होंने कभी अधिकार का सहारा लेकर नेतृत्व नहीं किया; बल्कि अपने आदर्श आचरण से उत्कृष्टता की प्रेरणा दी।</p>
<p>जे.आर.डी. टाटा से जुड़ी अनगिनत कहानियाँ हैं। उनमें से कई कभी किताबों में दर्ज नहीं हो सकीं, लेकिन जिन लोगों के जीवन को उन्होंने स्पर्श किया, उनकी यादों में वे आज भी जीवंत हैं।</p>
<p>मुंबई के स्टील हाउस में रहने वाले लोग आज भी बताते हैं कि जे.आर.डी. टाटा कई बार स्वयं कार चलाकर किसी को उसके घर छोड़ने चले जाते थे। कई बार वे परिवार के साथ एक प्याली चाय पर आत्मीयता से बातचीत करते  कुछ पल भी बिताते थे और अक्सर शाम का समापन बच्चों के साथ नीचे खेलते हुए होता था। उस समय वे भारत के सबसे बड़े औद्योगिक समूहों में से एक के अध्यक्ष नहीं, बल्कि सबके प्रिय मित्र बन जाते थे।</p>
<p>बॉम्बे हाउस की एक और घटना जे.आर.डी. टाटा के व्यक्तित्व की गहराई को बखूबी दर्शाती है। एक दिन वे लिफ्ट के लिए धैर्यपूर्वक कतार में अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे, तब भी लिफ्ट ऑपरेटर ने उन्हें कतार तोड़कर आगे जाने की अनुमति नहीं दी। उसके लिए नियम सबके लिए समान थे, यहाँ तक कि चेयरमैन के लिए भी। बाद में जब उस कर्मचारी का तबादला कर दिया गया, तो जे.आर.डी. ने तुरंत हस्तक्षेप किया। उन्होंने कहा, “यह व्यक्ति सिद्धांतों और अनुशासन का पक्का है। इसे दंडित कैसे किया जा सकता है?” जे.आर.डी. टाटा के लिए सम्मान कभी पद से नहीं मिलता था, बल्कि वह व्यक्ति के चरित्र, सिद्धांतों और आचरण से अर्जित होता था।</p>
<p> उनकी विनम्रता उनके व्यक्तित्व की सबसे  विशेषताओं में से एक थी। अपने असाधारण जीवन की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने एक बार कहा था, “मुझे नहीं लगता कि मैं उस सम्मान का पूरी तरह हकदार हूँ, जो मुझे मिला है... मेरे साथ हमेशा एक उत्कृष्ट टीम रही।” यही उनके नेतृत्व का सार था। वे स्वयं श्रेय लेने के बजाय अपनी टीम को आगे बढ़ाते थे और हर व्यक्ति को बड़े सपने देखने, निर्भीक होकर नवाचार करने तथा सामूहिक रूप से उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करते थे।</p>
<p>1938 से 1984 तक टाटा स्टील के चेयरमैन के रूप में जे.आर.डी. टाटा ने तकनीकी आधुनिकीकरण को नई दिशा दी, लेकिन यह भी सुनिश्चित किया कि किसी भी प्रगति का वास्तविक केंद्र उसके लोग होते हैं। उन्होंने कर्मचारियों के कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी, प्रगतिशील मानव संसाधन नीतियों को बढ़ावा दिया, प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच संयुक्त परामर्श की संस्कृति को प्रोत्साहित किया तथा ऐसी अनेक पहलों की नींव रखी, जो आज भी टाटा स्टील की ‘पीपल-फर्स्ट’ संस्कृति को सशक्त बनाती हैं।</p>
<p>उनका विश्वास सरल, किन्तु अत्यंत गहरा था: कोई भी संस्थान तभी सफल होता है, जब उससे जुड़े लोग समृद्ध और प्रगतिशील हों।</p>
<p>जिम्मेदार व्यवसाय के वैश्विक प्राथमिकता बनने से बहुत पहले, जे.आर.डी. ने नैतिकता, कर्मचारियों के कल्याण और राष्ट्र-निर्माण को व्यवसाय की सफलता से अलग नहीं, बल्कि उसका अभिन्न हिस्सा माना। परिवार कल्याण, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक विकास के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने जमशेदपुर को एक आदर्श औद्योगिक नगर में बदल दिया, जबकि नैतिक नेतृत्व के प्रति उनकी हिमायत आज भी उनकी जयंती के आसपास मनाए जाने वाले टाटा स्टील के वार्षिक एथिक्स मंथ के लिए प्रेरणा बनी हुई है।</p>
<p>इनोवेशन भी जेआरडी की दूरदर्शी सोच का एक प्रमुख आधार था। चाहे टाटा स्टील का आधुनिकीकरण हो, भारत के विमानन उद्योग की नींव रखने की पहल हो या युवा नेतृत्व को परंपरागत सोच से आगे बढ़कर नए रास्ते अपनाने के लिए प्रेरित करना—जेआरडी ने हमेशा लोगों को वर्तमान से आगे सोचने और भविष्य के निर्माण के लिए कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया।</p>
<p>उनके निधन के तीन दशक से अधिक समय बाद भी उनकी विरासत टाटा स्टील की कार्यसंस्कृति और मूल्यों को सार्थक रूप से दिशा दे रही है। यह हमारी नैतिकता और सत्यनिष्ठा के प्रति अटूट प्रतिबद्धता में रची बसी है। यह कर्मचारियों के समग्र कल्याण—शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य—पर हमारे विशेष ध्यान में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। साथ ही, सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने, वर्ष 2045 तक नेट-ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य प्राप्त करने तथा नवाचार, स्वच्छ प्रौद्योगिकियों और उत्तरदायी व्यावसायिक कार्यप्रणालियों में निरंतर निवेश की हमारी प्रतिबद्धता में भी उनकी दूरदृष्टि साफ़ दिखाई देती है।</p>
<p>सबसे बढ़कर, उनकी विरासत हमारे इस विश्वास में जीवित है कि वास्तविक प्रगति वही है, जो लोगों के जीवन को बेहतर बनाए।</p>
<p>वन टाटा स्टील के रूप में हम जमशेदजी टाटा और जेआरडी टाटा के आदर्शों को आगे बढ़ाते हुए केवल एक संगठन ही नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, संवेदनशीलता और उद्देश्यपूर्ण सोच के साथ समाज, उद्योग और राष्ट्र को भी सशक्त बनाने के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं।</p>
<p>कुछ लीडर्स अपने बनाए हुए व्यवसायों के कारण इतिहास में अमर हो जाते हैं। जेआरडी टाटा उन अनगिनत जीवनों के कारण हमेशा याद किए जाएंगे, जिन्हें उन्होंने अपने नेतृत्व, मानवीय दृष्टिकोण और मूल्यों से समृद्ध किया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>स्टोरी </category>
                                            <category>सक्सेस स्टोरी</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 14:31:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हरमू नदी की दर्दभरी कहानी: कभी जीवनदायिनी, आज गंदे नाले में तब्दील</title>
                                    <description><![CDATA[रांची की ऐतिहासिक हरमू नदी पर आधारित इस विचारोत्तेजक लेख में लेखक अरविंद शर्मा ने नदी की बदहाल स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। कभी स्वच्छ जल, बाढ़ और सामाजिक जीवन का केंद्र रही हरमू आज गंदे नाले में बदल चुकी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/harmu-river-ranchi-painful-story-environment-article/article-24743"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/untitled-design-(11)_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>अरविंद शर्मा</strong></p>
<p>बड़े भाई प्रकाश सहाय ने रांची की हरमू नदी की दुर्दशा पर रोते हुए एक ऐसी तस्वीर सामने रखी है, जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को बेचैन कर दे। उनके बचपन में इस नदी में बाढ़ आती थी, कई मोहल्ले डूब जाते थे। बच्चे इसमें नहाते थे, तैरना सीखते थे और लोग इसे नदी की तरह सम्मान देते थे। आज हालत यह है कि नाक डुबोकर मरने के लिए भी इसमें चुल्लू भर साफ पानी नहीं है। जो बह रहा है, वह आसपास के घरों की नालियों से आने वाला गंदा पानी है। प्लास्टिक और कचरा है। यह केवल एक नदी की नहीं, बल्कि हमारी सोच, हमारी व्यवस्था और हमारी संवेदनहीनता की भी कहानी है।</p>
<p>अगर आप रांची के निवासी हैं या कभी किसी काम से वहां गए होंगे तो जरूर देखा होगा कि रांची में हरमू के नाम पर हरमू रोड है। हरमू कालोनी है और हरमू मुक्ति धाम भी है। लेकिन सच यह भी है कि सबसे अधिक मुक्ति की जरूरत स्वयं हरमू नदी को ही है। यह विडंबना किसी व्यंग्य से कम नहीं है कि जिस नदी के किनारे कभी जीवन बसता था, आज उसी के गंदे पानी के किनारे अंतिम संस्कार होते हैं। हरमू अब नदी नहीं रही। मर गई है। जब नदी नाला बन जाती है तो केवल पानी नहीं मरता, शहर का भविष्य भी मर जाता है। भू-जल शर्म से पाताल में धंस जाता है। गर्मी बढ़ जाती है और फिर पुनर्जीवन के नाम पर करोड़ों रुपये का बंदरबांट होने लगता है। </p>
<p>1994-95 की बात है। तब मैं रांची विश्वविद्यालय से जर्नलिज्म कर रहा था। अपने गृह जिला गया से निकलकर पहली बार रांची गया था। इसकी खूबसूरत पहाड़ियों और हरियाली को देखकर स्वर्ग जैसा अहसास होता था। इसमें हरमू नदी की भी बड़ी भूमिका होती थी, क्योंकि यह शहर की प्राकृतिक जल-निकासी व्यवस्था की रीढ़ थी। नगड़ी के पठारी क्षेत्र से निकलने वाली यह नदी लगभग 40 किलोमीटर बहकर चुटिया के पास स्वर्णरेखा नदी में मिलती है। तब इसका पानी स्वच्छ होता था। छठ जैसे पर्वों पर श्रद्धालु इसके तट पर अर्घ्य देने पहुंचते थे। गर्मियों में भी पानी रहता था। बरसात में पानी का बहाव लोगों के लिए रोमांच बन जाता था। आज हल्की बारिश में भी रांची की सड़कें डूब जाती हैं और गर्मियों में पानी के लिए हाहाकार मचता है, तब समझ में आता है कि नदी को मारने की कीमत आखिर कितनी महंगी पड़ रही है।</p>
<p>इतिहास भी हरमू का महत्व बताता है। वर्ष 1939 में इसी नदी के तट पर आदिवासी महासभा के सम्मेलन में अलग झारखंड राज्य की मांग को संगठित स्वर मिला था। मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा के नेतृत्व ने यहीं से आंदोलन को नई दिशा दी। जिस नदी ने झारखंड के राजनीतिक इतिहास को सहेजा, उसी नदी को आज हमने गंदे नाले में बदल दिया।</p>
<p>सवाल है कि हरमू की हत्या किसने की? जवाब भी सीधा है-सरकारों ने, प्रशासन ने और हम सबने मिलकर। शहर बढ़ता गया, कॉलोनियां बसती गईं, प्राकृतिक नाले पाट दिए गए, नदी के किनारों पर अतिक्रमण होता गया और घरों का सीवेज सीधे नदी में गिरने लगा। </p>
<p>प्रकाश सहाय को इस बात पर भी रोना आता है कि हरमू के पुनर्जीवन पर डेढ़ सौ करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा चुके हैं। तटबंध बने, पैदल पथ बने, रेलिंग लगी, रंग-रोगन हुआ और तस्वीरें खिंचीं। लेकिन नदी आज भी नाला ही बनी हुई है। क्योंकि नदी का जीवन सीमेंट, टाइल्स और सुंदर लाइटों से नहीं लौटता। उसे जीवित रखने के लिए साफ पानी चाहिए, अविरल प्रवाह चाहिए और अतिक्रमण से मुक्ति चाहिए। यदि सीवेज उसी तरह गिरता रहेगा तो सौंदर्यीकरण सिर्फ सरकारी फाइलों एवं उद्घाटन समारोहों तक ही सीमित रहेगा।</p>
<p>यदि हरमू को बचाना है तो सौंदर्यीकरण से आगे बढ़कर सीवेज को पूरी तरह रोकना होगा। अतिक्रमण हटाना होगा और प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्र को वापस देना होगा। उतनी ही जिम्मेदारी आम लोगों की भी है। जिस दिन लोग नदी को कूड़ेदान समझना बंद कर देंगे, उसी दिन उसके पुनर्जन्म की शुरुआत होगी। हरमू प्रश्न बनकर खड़ी है-क्या हम अपनी अगली पीढ़ी को एक जीवित नदी देंगे या केवल उसकी तस्वीर और इतिहास? जवाब सरकार को भी देना है और हम-आपको भी। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 14:20:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
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                <title>दुनिया वैसी ही बन जाती है, जैसी हम चाहते हैं</title>
                                    <description><![CDATA[दुनिया वैसी ही बन जाती है, जैसी हम चाहते हैं—राजीव थेपड़ा का यह विचारपरक लेख इंसानी इच्छाओं, लालच, अहंकार, हिंसा, शोषण और सामाजिक विसंगतियों के बीच आत्ममंथन का आह्वान करता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/society/duniya-waisi-hi-ban-jaati-hai-jaisi-hum-chahte-hain-rajiv-thepda/article-24727"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-07/6d34998e-81b8-41f5-ab56-01a2988cd08a_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>राजीव थेपड़ा</strong></p>
<p>फिर सुबह हो चुकी है और सूरज की चकाचौंध किरणें धरती के आधे हिस्से पर रोशनी बनकर फैल चुकी हैं! पंछीगण अपने-अपने डेरों से निकलकर अन्न की खोज में दूर-दूर निकल चुके हैं और तरह-तरह के पशु भी सड़कों, मैदानों और यहाँ-वहाँ फैल चुके हैं! सभी को महज भोजन चाहिए और बस इसी एक चीज भर के लिए वे जीते हैं! मगर मनुष्य नाम का एक प्राणी भी इसी धरती पर है, जो भोजन से इतर तरह-तरह की चीजों को चाहता है—तरह-तरह के साधन, तरह-तरह के मनोरंजन, तरह-तरह के व्यंजन, तरह-तरह का देह-सुख, असीम प्रेम, अनंत वासना और अथाह धन... बस ऐसी ही कुछ अभीप्साएँ हैं आदमी की, जिनके लिए वह जीता है और जिनके लिए औरों के जीने को हराम करता है!!</p>
<p>फिर सुबह हो चुकी है और उजाला हमारे चारों ओर दस्तक देकर सबके घरों के दरवाजे खुलवा चुका है और बस अभी थोड़ी ही देर में तरह-तरह के लोग तरह-तरह के अपने कार्यों में व्यस्त हो जाने वाले हैं! और तरह-तरह की खबरें मुझ तक—हम सब तक—तरह-तरह के साधनों के द्वारा पहुँचने लगी हैं, जिनमें अच्छी कम और ऊबाऊ और घृणास्पद ज्यादा हैं, जो न सिर्फ बीते हुए कल-परसों-नरसों-तरसों की हू-ब-हू हैं, बल्कि आने वाले कल-परसों-नरसों-तरसों की हू-ब-हू भी हैं!</p>
<p>जगह-जगह लूटपाट, जगह-जगह बलात्कार, जगह-जगह व्यापक बेईमानी, जगह-जगह शोषण और मानवाधिकार-हनन, जगह-जगह मारकाट और आतंकवाद, जगह-जगह घरेलू हिंसा और दहेज-हत्या, जगह-जगह बच्चों और अन्य निरीहों का यौन-शोषण, जगह-जगह कमजोर लोगों को आर्थिक, मानसिक और दैहिक यंत्रणा... और क्या-क्या लिखूँ, क्या-क्या बताऊँ!!</p>
<p>सुबह हो चुकी है। इस सुबह के साथ अरबों लोगों के कमाने-खाने और इसके लिए नौकरी-व्यवसाय और अन्य कार्यों में व्यस्त कर लेने का जैसे एक अंतहीन कार्यक्रम के दिन का प्रारंभ है। वहीं बहुत सारे लोगों के लिए एक खेल की शुरुआत भर है! कहीं धन, तो कहीं ताकत, तो कहीं सत्ता, तो कहीं वैभव, तो कहीं कुछ और की अधिकता का अहंकार/गुमान और यही नहीं, उस सबका वीभत्स/नग्न प्रदर्शन और उसके रास्ते में किसी रोड़े के आ जाने पर उसके खात्मे का दंभ...!! आदमी की यह यही नियति आदमी को पशुता के उच्च स्तर से राक्षसों के घटिया और गरिमाहीन/तुच्छ स्तर के भी शायद नीचे गिरा लाई है, मगर आदमी को इसका रंच मात्र भी भान नहीं है!!</p>
<p>आदमी का जर-जरा और जमीन का एक अंतहीन वासना भरा हुआ तुच्छ कार्यक्रम आदमी की सारी सुबहों को भयानक काली रात बनाए हुए है! उसकी हर वक्त की यौनिकता और यौन-संबंधों से लबालब दिन उसे आँखें भी खोलने देता है या नहीं, यह हमें नहीं पता!!... मगर उसकी इस वासना के शिकार, इस जर-जरा और जमीन की वासना के शिकार तथा उसके दर्पपूर्ण दंभ भरे अहंकार के शिकार चूँकि अन्य लाखों-करोड़ों लोग बनते हैं, इसलिए यह बात किसी की निजता की न रहकर सार्वजनिक हो जाती है, क्योंकि प्रश्न कुछ लोगों के सुबह के खेल से शुरू होने वाले आचरण से बहुत से अन्य लोगों के जीवन में हमेशा के लिए अँधेरी काली रात के फैल जाने का हो जाता है! ऐसी भयानक काली रात, जो न जीने देती है और न ही मरने!! और ऐसी काली रातों में विवश और कहर भरा जीवन जीते हुए लोगों के लिए ऐसे राक्षस लोग सदा भयानक अट्टहास करते हुए प्रतीत होते हैं!!</p>
<p>आज फिर सुबह आ गई है। सुबह रोज आती थी, सुबह कल भी आएगी और सुबह तो आती ही रहेगी! मगर सुबह के साथ सही में उजाला भी आ ही जाए, ये कतई जरूरी नहीं! नहीं है ना? सुबह का अखबार हर बीते हुए कल की सुबह-दोपहर-शाम और रात का आईना है! इस आईने में कल के समूचे दिन की कुछ घटनाएँ आदमी के अच्छेपन से ज्यादा उसके शैतानी दिमाग की सूरत ज्यादा दिखाई देती है, न सिर्फ कुछ लोगों की शैतानी हरकतों में, बल्कि हम जैसे खुद को शरीफ समझने वाले लोगों की हरकतों/कार्यों में भी...!! मगर इस बात के विस्तार में न जाकर मैं हम सबसे यही पूछ लेता हूँ ना कि क्यों जी, आप खुद के भीतर कभी झाँकते भी हो क्या कि सुबह से रात तलक किस तरह गुजारते हो आप अपना दिन...!! क्या वो दिन सचमुच पवित्रता से भरा होता है? क्या आप तरह-तरह से किसी को नहीं ठगते?</p>
<p>क्या आप किसी की भी लानत-मलामत नहीं करते? क्या आप सचमुच सब लोगों के साथ समभाव और सद्भाव से रहते हैं? क्या आप सचमुच नौकर-चाकर-दाई-मजदूर-कुली-ठेले-रिक्शे-ऑटो-खलासी-ड्राइवर आदि-आदि सबसे उचित और सम्माननीय व्यवहार करते हो? क्या आप सचमुच अपने परिवार-समाज का हित-पोषण करते हो?</p>
<p>इस सुबह आज का सवाल यही है कि क्या सचमुच हम खुद भी वैसे ही हैं, जैसी कि दुनिया हम अपने लिए चाहते हैं, चाहते रहे हैं!? बस अभी थोड़ी देर में यह सुबह क्रमशः दोपहर-शाम और रात में परिणत होकर खत्म हो जाने वाली है और जैसा कि हम जानते हैं कि काल अखंडित है, इस अखंडित काल की कल की सुबह और फिर परसों-नरसों-तरसों की सुबहें आने वाली हैं! तो फिर हमने क्या सोचा है अपने खुद के बारे में और थोड़ा बहुत ही सही, समाज के बारे में?? खुद को और समाज को ठीक वैसा ही छोड़ देना है या कुछ बदल भी डालना है, यानी कि अब खुद में सचमुच कोई उजाला भी भरना है या छोड़ देना है सारी आने वाली सुबहों को काली-स्याह के भयानक अँधेरे के भरोसे!!</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 16:56:53 +0530</pubDate>
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