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                <title>पर्यावरण - Samridh Jharkhand</title>
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                <description>पर्यावरण RSS Feed</description>
                
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                <title>उधवा झील: जहां हर सर्दी हजारों किलोमीटर उड़कर पहुंचते हैं परिंदों के मेहमान</title>
                                    <description><![CDATA[साहिबगंज स्थित उधवा झील झारखंड की एकमात्र पक्षी अभयारण्य और राज्य की इकलौती रामसर साइट है। हर वर्ष सर्दियों में साइबेरिया, मंगोलिया और यूरोप से हजारों प्रवासी पक्षी यहां पहुंचते हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/sahibganj/udhwa-lake-jharkhand-ramsar-site-migratory-birds-sahibganj-feature/article-23674"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/8c83dce6-dd18-45e3-a98e-1c95df1fc535_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>संजय कुमार धीरज</strong></p>
<p><strong>साहिबगंज:</strong> झारखंड की एकमात्र पक्षी अभयारण्य उधवा झील एक बार फिर हजारों प्रवासी परिंदों के कलरव से जीवंत हो उठी है। मानसून के दस्तक के साथ ही साइबेरिया, मंगोलिया, मध्य एशिया और यूरोप के बर्फीले इलाकों से उड़ान भरकर ये मेहमान परिंदे गंगा के कछार में बसी इस झील को अपना अस्थायी घर बनाने पहुंच रहे हैं। रामसर साइट का दर्जा प्राप्त उधवा झील अब सिर्फ साहिबगंज की पहचान नहीं, बल्कि वैश्विक जैव विविधता और संरक्षण के नक्शे पर एक अहम बिंदु बन चुकी है।</p>
<h4><strong>दो झीलों का संगम है उधवा  </strong></h4>
<p>उधवा पक्षी अभयारण्य दरअसल दो बड़ी झीलों, पतौरा और बेरहाले, से मिलकर बना है। करीब 5.65 वर्ग किमी में फैला यह वेटलैंड गंगा नदी के बाढ़ क्षेत्र से जुड़ा है। बरसात में गंगा का पानी यहां भर जाता है, जिससे झील में सालभर नमी बनी रहती है। यही वजह है कि यहां जलकुंभी, कमल, सिंघाड़ा और मछलियों की भरपूर उपलब्धता रहती है, जो प्रवासी पक्षियों के लिए आदर्श भोजन है।</p>
<h4><strong>धैर्य से कैद हुई प्रकृति की कविता  </strong></h4>
<p>वन्यजीव फोटोग्राफरों के लिए उधवा झील किसी जन्नत से कम नहीं। सुबह की धुंध, पानी पर तैरती नाव और हजारों परिंदों का एक साथ उड़ान भरना, ये नजारे कैमरे में कैद करने के लिए घंटों धैर्य चाहिए। हाल ही में कुछ फोटोग्राफरों ने यहां के दुर्लभ पलों को कैमरे में उतारा है। ये तस्वीरें सिर्फ फ्रेम नहीं, बल्कि प्रवास, संघर्ष और प्रकृति की कालातीत लय की जीवंत कहानियां हैं। हर पंख की फड़फड़ाहट में महाद्वीपों के पार की दास्तान छिपी है।</p>
<h4><strong>कौन-कौन से मेहमान पहुंचे इस बार  </strong></h4>
<p>नवंबर से मार्च तक उधवा झील में नॉर्दर्न पिनटेल, कॉमन टील, गडवाल, यूरेशियन विजन, बार-हेडेड गूज, ग्रे-लेग गूज, कॉमन पोचार्ड और रेड-क्रेस्टेड पोचार्ड जैसी दर्जनों प्रजातियां डेरा डालती हैं। इसके अलावा स्थानीय प्रजातियों में पर्पल स्वैम्पहेन, फेजेंट-टेल्ड जैकाना, ब्रॉन्ज-विंग्ड जैकाना, लेसर व्हिसलिंग डक सालभर दिखते हैं। पक्षी विशेषज्ञों के मुताबिक यहां 100 से ज्यादा प्रजातियों के पक्षी रिकॉर्ड किए गए हैं, जिनमें कई IUCN की रेड लिस्ट में संकटग्रस्त श्रेणी में हैं।</p>
<h4><strong>रामसर साइट: क्यों है खास?  </strong></h4>
<p>उधवा झील को 2021 में रामसर साइट घोषित किया गया था। रामसर कन्वेंशन अंतरराष्ट्रीय महत्व के वेटलैंड को बचाने की संधि है। यह दर्जा मिलने से उधवा झील अब वैश्विक संरक्षण प्रयासों का हिस्सा बन गई है। यह झारखंड का इकलौता रामसर साइट और इकलौता पक्षी अभयारण्य दोनों है।</p>
<h4><strong>खतरे भी कम नहीं: संरक्षण की दरकार </strong></h4>
<p>पर्यावरणविद सह मॉडल कॉलेज के प्राचार्य डॉक्टर रणजीत कुमार सिंह बताते हैं कि उधवा झील की सेहत लगातार बिगड़ रही है। जलकुंभी तेजी से फैल रही है जिससे खुला पानी कम हो रहा है। आस-पास के इलाकों में अवैध मछली पकड़ना, शिकार और खेती के लिए कीटनाशकों का इस्तेमाल परिंदों के लिए खतरा है। पर्यटन के नाम पर होने वाला शोर भी पक्षियों को परेशान करता है। डॉक्टर रणजीत सिंह कहते हैं कि वन विभाग ने गश्त बढ़ाई है, लेकिन स्थानीय लोगों की भागीदारी के बिना संरक्षण अधूरा है। उधवा झील सिर्फ तस्वीरें खींचने की जगह नहीं, यह हमारे पारिस्थितिकी तंत्र का फेफड़ा है।</p>
<h4><strong>पर्यटन की अपार संभावनाएं  </strong></h4>
<p>साहिबगंज जिला प्रशासन उधवा झील को ईको-टूरिज्म हब के रूप में विकसित करने की योजना बना रहा है। वॉच टावर, बोटिंग और नेचर गाइड की सुविधा से यहां पर्यटकों की संख्या बढ़ी है। सर्दियों में बर्ड वॉचिंग के लिए देश-विदेश से लोग आते हैं। इससे स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के मौके भी बन रहे हैं। उधवा झील हर साल सर्दियों में आसमान पर परिंदों से नई इबारत लिखती है। जरूरत है तो बस इन परिंदों की भाषा समझने की, इनकी उड़ान को महफूज रखने की। क्योंकि जब तक उधवा में परिंदे लौटते रहेंगे, तब तक प्रकृति की यह कविता अधूरी नहीं होगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>साहिबगंज</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 15:46:55 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विश्व पर्यावरण दिवस 2026: युद्ध और प्रदूषण की आग में झुलसती पृथ्वी</title>
                                    <description><![CDATA[विश्व पर्यावरण दिवस पर आधारित यह विशेष लेख जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ युद्धों से पैदा हो रहे पर्यावरणीय संकट की पड़ताल करता है। लेखक मनोज कुमार ने खाड़ी क्षेत्र में जारी संघर्ष, तेल रिसाव, बढ़ते कार्बन उत्सर्जन, समुद्री जैव विविधता पर खतरे और वैश्विक प्रदूषण के प्रभावों को रेखांकित किया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/yudh-aur-pradushan-ki-aag-me-jhulsati-prithvi-world-environment-day-special--most-ctr-headline/article-22788"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-06/59eb6ce8-495d-43a6-87d5-d118e5412299_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>5 जून को हर वर्ष हम विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं, लेकिन इस बार जश्न का स्वर धीमा है। क्योंकि 2026 का पर्यावरणीय परिदृश्य सिर्फ जलवायु परिवर्तन की चुनौती नहीं, बल्कि मानव निर्मित युद्धों की तबाही भी उजागर कर रहा है।</p>
<p>यूनाइटेड नेशन्स एनवायरनमेंटल प्रोग्राम की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया ने 2025 में रिकॉर्ड स्तर पर गर्मी, बाढ़ और सूखा झेला। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, समुद्र का स्तर बढ़ रहा है। इसी बीच खाड़ी देशों में छिड़े युद्ध ने पर्यावरण संकट और गहरा दिया है। जब हम कार्बन घटाने की बात करते हैं, तो युद्ध के मैदान में टैंक और बमवर्षक विमान कार्बन का पहाड़ उगल रहे हैं। ईरान-इज़राइल-अमेरिका युद्ध ने पर्शियन गल्फ को पर्यावरणीय युद्धक्षेत्र बना दिया है।</p>
<p>तेल टैंकरों पर हमले से करोड़ों बैरल कच्चा तेल समुद्र में उतरेगा। यह 1991 के गल्फ वॉर के 11 मिलियन बैरल रिसाव से भी बड़ा “इकोसाइड” हो सकता है। बहरीन के मैंग्रोव, ओमान के कोरल रीफ और यूएई के हॉक्सबिल कछुए—सभी तेल की परत और पानी के नीचे होने वाले विस्फोटों की जद में हैं। मैंग्रोव नष्ट होंगे, तो “ब्लू कार्बन” का भंडार भी खत्म होगा।</p>
<p>लगभग 9 करोड़ लोगों को पानी देने वाले 300 डिसेलिनेशन प्लांट निशाना बने हैं। हाई-साल्ट ब्राइन से तट पर “डेड ज़ोन” बन रहे हैं। सैन्य विमान, नौसैनिक बेड़े और जलते तेल डिपो आसमान को काला कर रहे हैं। शिपिंग रूट बंद होने से जहाज़ 3,942 नॉटिकल मील का लंबा चक्कर काटकर 70 प्रतिशत अधिक ग्रीनहाउस गैस छोड़ रहे हैं, जिससे वातावरण तेजी से गर्म हो रहा है। प्रदूषण अब सिर्फ स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक खतरा बन गया है।</p>
<p>युद्ध ने दिखा दिया है कि प्रदूषण सरहदों की सीमाएं नहीं मानता। खाड़ी में जलते तेल डिपो का धुआं हजारों किलोमीटर दूर की हवा को प्रभावित कर रहा है। समुद्री तेल रिसाव प्रवाह के साथ हिंद महासागर तक पहुंच सकता है। साथ ही, तेल की कीमत बढ़ने से दक्षिण कोरिया जैसे देश कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को फिर शुरू कर रहे हैं। यह जीरो कार्बन एमिशन और जलवायु संरक्षण लक्ष्यों पर सीधी चोट है। अब यक्ष प्रश्न यह है कि इसका रास्ता क्या है?</p>
<p>इस पर्यावरण दिवस पर हमें समझना होगा कि “आवर पावर, आवर प्लैनेट” का नारा तब तक अधूरा है, जब तक युद्ध को भी प्रदूषण का एक बड़ा स्रोत नहीं माना जाता। पर्यावरण समझौतों में युद्धकालीन उत्सर्जन को छूट नहीं मिलनी चाहिए। समुद्री इको-सिस्टम को रेड क्रॉस की तर्ज पर युद्ध क्षेत्र में भी सुरक्षित घोषित करना होगा। और सबसे जरूरी यह कि ऊर्जा सुरक्षा का मापदंड सिर्फ तेल का भंडार नहीं, बल्कि वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत जैसे सौर, पवन और जल ऊर्जा भी हों, जिन्हें दुश्मन देश की मिसाइलें आसानी से नष्ट न कर सकें।</p>
<p>आज का दिन हमें याद दिलाता है कि पृथ्वी एक है और इसे बचाने की जिम्मेदारी पूरे विश्व समुदाय की है। अगर आज हम युद्ध की आग नहीं बुझाएंगे, तो कल रहने के लिए हमारी पृथ्वी ही नहीं बचेगी।</p>
<p><img width="127" height="158" alt="9k="></img></p>
<p><strong>लेखक : मनोज कुमार</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 15:05:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Climate कहानी: El Niño की आहट से डरा मानसून 2026, भारत के सामने सूखा, गर्मी और पानी संकट का खतरा</title>
                                    <description><![CDATA[भारत में मानसून 2026 को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। मौसम वैज्ञानिकों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुसार एल नीनो की स्थिति तेजी से विकसित हो रही है, जिससे देश में सामान्य से कम बारिश, भीषण गर्मी, जल संकट और कृषि उत्पादन पर असर पड़ सकता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/el-nino-2026-india-monsoon-drought-heatwave-water-crisis/article-22481"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/publicdomainpictures-beach-84598-1024x1536_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">2026 की गर्मियों में भारत सिर्फ गर्मी से नहीं जूझ रहा। इस बार आसमान भी बेचैन है, समुद्र भी। मौसम की दुनिया में चल रही हलचल का असर खेतों से लेकर बिजली, पानी, खाद्य सुरक्षा और लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी तक पहुंच सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">साल की शुरुआत कमजोर ला नीना से हुई थी। अभी दुनिया ENSO न्यूट्रल स्थिति में है, लेकिन प्रशांत महासागर के भीतर तेजी से बदलाव हो रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि दुनिया एक मजबूत एल नीनो की ओर बढ़ रही है। यदि यही रफ्तार बनी रही, तो 2026-27 में दुनिया "Very Strong El Niño" देख सकती है।</p>
<p><span style="background-color:rgb(236,240,241);"><a style="background-color:rgb(236,240,241);" href="https://samridhjharkhand.com/news/national/is-saal-monsoon-kamzor-rahne-ke-asar-kai-raajyon-mein-badhegi-garmi-chalegi-loo/article-22442"><strong>यह भी पढ़ें: इस साल कमजोर रहेगा मानसून! IMD की चेतावनी- कई राज्यों में पड़ेगी भीषण गर्मी</strong></a></span></p>
<p class="isSelectedEnd">भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कम रह सकता है। अनुमान है कि बारिश Long Period Average (870 मिमी) का करीब 90 प्रतिशत रह सकती है, जिसमें ±4 प्रतिशत की त्रुटि सीमा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">IMD के प्रॉबेबिलिटी फोरकास्ट में 60 प्रतिशत संभावना "Deficient Rainfall" की है, जबकि 24 प्रतिशत संभावना "Below Normal Rainfall" की बताई गई है। इसका सीधा अर्थ है कि भारत सामान्य और कमजोर मानसून की सीमा रेखा पर खड़ा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">असल चिंता उस अस्थिरता की है, जो एक विकसित होते एल नीनो के साथ आती है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार एल नीनो कोई साधारण समुद्री घटना नहीं, बल्कि पूरी पृथ्वी के मौसम तंत्र को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया है। इसका असर भारतीय मानसून पर भी पड़ता है, जिससे बारिश कमजोर हो सकती है और लंबे "ब्रेक मानसून" की स्थिति बन सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd">NOAA के अनुसार मई से जुलाई 2026 के बीच एल नीनो बनने की संभावना 82 प्रतिशत है, जबकि दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 तक इसके बने रहने की संभावना 96 प्रतिशत तक पहुंचती है। वैज्ञानिक इसे गंभीर संकेत मान रहे हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">इतिहास भी चिंता बढ़ाता है। 1950 के बाद दुनिया ने केवल चार "Super El Niño" देखे हैं—1982-83, 1991-92, 1997-98 और 2015-16। इन वर्षों में सूखा, भीषण गर्मी, जंगल की आग और चरम मौसमी घटनाएं देखने को मिली थीं।</p>
<p class="isSelectedEnd">विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 2026 में एल नीनो मजबूत होता है, तो भारत में वर्षा वितरण असंतुलित हो सकता है। कहीं अत्यधिक बारिश तो कहीं सूखे जैसी स्थिति बन सकती है। उत्तर-पश्चिम भारत में उमस भरी हीटवेव का खतरा भी बढ़ सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">भारत की लगभग 52 प्रतिशत खेती आज भी वर्षा पर निर्भर है। देश के करीब 40 प्रतिशत खाद्य उत्पादन का संबंध सीधे मानसून से है। कमजोर मानसून का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भूजल स्तर, जलाशयों, जलविद्युत उत्पादन और शहरी जल आपूर्ति पर भी पड़ेगा।</p>
<p class="isSelectedEnd">विशेषज्ञों ने रेन वाटर हार्वेस्टिंग, एक्वीफर रिचार्ज, ड्रिप सिंचाई, फसल विविधीकरण और जल संरक्षण उपायों को प्राथमिकता देने की सलाह दी है। किसानों को धान जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसलों के बजाय दलहन, तिलहन और मोटे अनाजों की ओर बढ़ने की जरूरत बताई गई है।</p>
<p class="isSelectedEnd">हालांकि उम्मीद की एक किरण हिंद महासागर में भी दिखाई दे रही है। Indian Ocean Dipole (IOD) का पॉजिटिव फेज कई बार एल नीनो के प्रभाव को कम कर देता है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एल नीनो बहुत मजबूत हुआ, तो IOD अकेले उसकी भरपाई नहीं कर पाएगा।</p>
<p class="isSelectedEnd">भारत में मानसून केवल मौसम नहीं है। यह कृषि, अर्थव्यवस्था, जल सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़ा हुआ है। इसलिए "Very Strong El Niño" की चेतावनी सिर्फ वैज्ञानिक शब्द नहीं, बल्कि आने वाले समय की गंभीर चुनौती का संकेत है।</p>
<p>आने वाले महीनों में भारत को हर बूंद पानी, हर फसल, हर हीटवेव और हर मौसम चेतावनी को पहले से अधिक गंभीरता से लेना पड़ सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 16:21:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>असम में मिली दुर्लभ ‘बेंट-टोएड गेको’ छिपकली, वैज्ञानिक भी हुए हैरान</title>
                                    <description><![CDATA[असम के ग्वालपारा जिले स्थित उरपाद बील में दुर्लभ बेंट-टोएड गेको छिपकली देखी गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह पहली बार है जब इस प्रजाति को राज्य में आधिकारिक रूप से दर्ज किया गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/assam-rare-bent-toed-gecko-lizard-found-urpad-beel-goalpara/article-22395"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/7e8f6d1d70dc4b74fb555c425e8c9773_1006897675_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>ग्वालपारा (असम):</strong> असम के ग्वालपारा जिले स्थित उरपाद बील (झील) में दुर्लभ प्रजाति की बेंट-टोएड गेको छिपकली (साइर्टोडैक्टिलस बापमे) देखी गई है। इसे राज्य की समृद्ध जैव विविधता के लिए एक महत्वपूर्ण खोज माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रजाति पहली बार असम में आधिकारिक रूप से दर्ज की गई है।</p>
<p>शोधकर्ताओं और संरक्षणवादियों ने इस खोज को असम के वेटलैंड और वन पारिस्थितिकी तंत्र की समृद्धि का महत्वपूर्ण संकेत बताया है। उनका कहना है कि यह क्षेत्र अब भी कई दुर्लभ और कम ज्ञात प्रजातियों को सुरक्षित आश्रय प्रदान कर रहा है।</p>
<p>असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्व सरमा ने इस खोज को लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक पर खुशी व्यक्त की। उन्होंने कहा कि असम की प्रकृति लगातार नए आश्चर्य प्रस्तुत कर रही है। मुख्यमंत्री ने लिखा कि उरपाद बील में बेंट-टोएड गेको का पहला पक्का रिकॉर्ड राज्य के इकोसिस्टम द्वारा समर्थित असाधारण जैव विविधता को दर्शाता है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के निरंतर संरक्षण प्रयास नाजुक आवासों को सुरक्षित रखने में मदद कर रहे हैं, जहां विभिन्न प्रजातियां फल-फूल रही हैं।</p>
<p>उरपाद बील लंबे समय से अपने पारिस्थितिक महत्व के लिए जाना जाता है और यह कई जलीय एवं स्थलीय जीवों का प्राकृतिक आवास रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस दुर्लभ गेको प्रजाति की मौजूदगी पर्यावरण संरक्षण और आवास सुरक्षा उपायों की सफलता को दर्शाती है।</p>
<p>विशेषज्ञों ने बताया कि बेंट-टोएड गेको साइर्टोडैक्टिलस वंश से संबंधित है, जो विश्वभर में गेको की सबसे विविध प्रजातियों में गिना जाता है। इस समूह की कई प्रजातियां सीमित आवास क्षेत्रों में पाई जाती हैं और पर्यावरणीय बदलावों के प्रति अत्यंत संवेदनशील मानी जाती हैं।</p>
<p>संरक्षणवादियों ने पूर्वोत्तर भारत के वेटलैंड, जंगल और अन्य प्राकृतिक इकोसिस्टम की सुरक्षा पर जोर देते हुए कहा कि दुर्लभ और स्थानिक वन्यजीव प्रजातियों के संरक्षण के लिए निरंतर वैज्ञानिक अनुसंधान और पर्यावरणीय निगरानी बेहद आवश्यक है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 28 May 2026 14:01:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Climate कहानी: AC की बढ़ती मांग से बिजली संकट का खतरा, रिपोर्ट ने बताया बड़ा समाधान</title>
                                    <description><![CDATA[भारत में बढ़ती गर्मी और तेजी से बढ़ रहे एयर कंडीशनर उपयोग के बीच नई रिपोर्ट ने बिजली संकट की आशंका जताई है। India Energy and Climate Center (IECC) की रिपोर्ट के अनुसार, अगर अगले दस वर्षों में AC की ऊर्जा दक्षता दोगुनी कर दी जाए, तो भारत बड़े बिजली संकट से बच सकता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/india-power-crisis-and-ac-efficiency-report-2026/article-22311"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/pexels-mibernaa-24551564-1024x576_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>भारत में मई की रातें अब पहले जैसी नहीं रहीं। रात के ग्यारह बजे भी दीवारें गर्म रहती हैं। पंखा चलता रहता है, मगर हवा में राहत नहीं मिलती। नोएडा की किसी सोसाइटी में इन्वर्टर की बीप सुनाई देती है, लखनऊ के छोटे किराए के कमरे में बच्चा करवट बदलता है और अहमदाबाद में कोई बुज़ुर्ग देर रात तक ठंडी हवा का इंतजार करता रहता है।</p>
<p>ऐसे समय में एयर कंडीशनर अब सिर्फ एक “लक्ज़री” नहीं रहा, बल्कि गर्मी से बचने का सबसे बड़ा सहारा बनता जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि अगर आने वाले वर्षों में करोड़ों भारतीय AC खरीदेंगे, तो क्या देश की बिजली व्यवस्था उस दबाव को झेल पाएगी?</p>
<p>इसी मुद्दे पर अमेरिका के <strong>India Energy and Climate Center (IECC)</strong> ने एक महत्वपूर्ण अध्ययन जारी किया है। रिपोर्ट का शीर्षक है — <em>“Beating the Heat: How Air Conditioner Efficiency Standards Help India Avert Power Shortages and Cut Consumer Bills”</em>।</p>
<p>रिपोर्ट के मुताबिक, अगर भारत अगले दस वर्षों में एयर कंडीशनरों की ऊर्जा दक्षता यानी efficiency को दोगुना कर दे, तो देश बड़े बिजली संकट से बच सकता है। साथ ही उपभोक्ताओं को करीब ₹2.5 लाख करोड़ तक की बचत हो सकती है।</p>
<h4><strong>तेजी से बढ़ रही AC की मांग</strong></h4>
<p>भारत में हर साल लगभग 1 से 1.5 करोड़ नए AC बाजार में जुड़ रहे हैं। अनुमान है कि अगले दशक में यह संख्या 13 से 15 करोड़ तक पहुंच सकती है।</p>
<p>समस्या सिर्फ बढ़ती बिजली खपत की नहीं है। असली दबाव शाम के समय पैदा होता है। जैसे ही सूरज ढलता है, सोलर ऊर्जा कम हो जाती है, लेकिन शहरों की गर्म इमारतें दिनभर की गर्मी छोड़ने लगती हैं। उसी समय लाखों AC एक साथ चालू होते हैं और बिजली ग्रिड पर भारी दबाव बनता है।</p>
<p>रिपोर्ट के प्रमुख लेखक और UC Berkeley के फैकल्टी सदस्य <strong>Nikit Abhyankar</strong> के अनुसार, वर्तमान में AC भारत की पीक बिजली मांग में 60 से 70 गीगावॉट का योगदान दे रहे हैं। अगर नीतियों में बदलाव नहीं हुआ, तो 2030 तक यह मांग 120 गीगावॉट और 2035 तक 180 गीगावॉट तक पहुंच सकती है।</p>
<p>यह भारत की कुल अनुमानित पीक बिजली मांग का 30 प्रतिशत से अधिक होगा।</p>
<h4><strong>100 पावर प्लांट जितनी बचत</strong></h4>
<p>रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर भारत ज्यादा efficient AC को धीरे-धीरे अनिवार्य बना दे, तो 2035 तक करीब 47 गीगावॉट पीक बिजली मांग कम की जा सकती है। यह लगभग 100 बड़े पावर प्लांट्स के बराबर है।</p>
<p>यानि कई बार नई बिजली पैदा करने से ज्यादा असर बिजली बचाने में होता है।</p>
<h4><strong>अभी आना बाकी है असली AC बूम</strong></h4>
<p>रिपोर्ट बताती है कि भारत में अभी शहरी AC स्वामित्व केवल 15 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि असली AC बूम अभी शुरू होना बाकी है।</p>
<p>आज लिए गए फैसले तय करेंगे कि आने वाले वर्षों में भारत “कूल” रहेगा या लगातार बिजली कटौती का सामना करेगा।</p>
<h4>महंगे नहीं होंगे efficient AC</h4>
<p>अक्सर माना जाता है कि ज्यादा efficient AC का मतलब ज्यादा महंगा AC होता है। लेकिन अध्ययन के सह-लेखक <strong>Amol Phadke</strong> का कहना है कि efficiency कीमत बढ़ने की सबसे बड़ी वजह नहीं होती।</p>
<p>अगर बड़े स्तर पर उत्पादन और सही सरकारी नीति समर्थन मिले, तो ज्यादा efficient AC सस्ते भी हो सकते हैं।</p>
<p>रिपोर्ट का अनुमान है कि efficient AC अगले दशक में उपभोक्ताओं को ₹90,000 करोड़ से ₹2.4 लाख करोड़ तक की शुद्ध बचत दे सकते हैं। शुरुआती कीमत थोड़ी ज्यादा हो सकती है, लेकिन कम बिजली बिल के जरिए 2 से 3 वर्षों में वह लागत वापस निकल सकती है।</p>
<h4><strong>Make in India के लिए बड़ा मौका</strong></h4>
<p>रिपोर्ट के अनुसार, भारत में बिक रहे 1000 से ज्यादा AC मॉडल पहले ही मौजूदा 5-star मानकों से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। इनमें कई मॉडल भारतीय कंपनियों द्वारा बनाए जा रहे हैं।</p>
<p>IECC के शोधकर्ता <strong>Jose Dominguez</strong> का मानना है कि सही नीति संकेत मिलने पर भारत कम लागत वाले high-efficiency AC का वैश्विक केंद्र बन सकता है।</p>
<h4><strong>Cooling अब जरूरत बन चुकी है</strong></h4>
<p>इस पूरी बहस के बीच एक और सच्चाई सामने आती है। भारत में AC अब सिर्फ आराम का प्रतीक नहीं रह गया है। कई जगहों पर यह survival का साधन बनता जा रहा है।</p>
<p>जब रातें ठंडी होना बंद कर दें, तब cooling केवल सुविधा नहीं रहती। वह स्वास्थ्य बन जाती है, अच्छी नींद बन जाती है और काम करने की क्षमता बन जाती है।</p>
<p>यही वजह है कि यह रिपोर्ट सिर्फ मशीनों की कहानी नहीं है। यह उस भविष्य की कहानी है, जहां भारत को तय करना है कि बढ़ती गर्मी के बीच वह कैसे जिएगा — ज्यादा कोयला जलाकर या कम बिजली में ज्यादा राहत देकर।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 26 May 2026 15:06:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सस्टेनेबल नहीं, ‘सनातन विकास’ चाहिए: सरयू राय का नया विजन</title>
                                    <description><![CDATA[जमशेदपुर में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय नदी पर्वत सम्मेलन के समापन समारोह में विधायक सरयू राय ने ‘सनातन विकास’ मॉडल अपनाने की वकालत की। उन्होंने कहा कि वर्तमान विकास मॉडल विनाशकारी साबित हो रहा है और प्राकृतिक संसाधनों को बचाकर विकास करना समय की आवश्यकता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/jamshedpur/sarayu-roy-sanatan--vikas-model-national-river-mountain-conference-jamshedpur/article-22122"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/29eb67a2-af2d-47d2-9581-1abfadebd9e9_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>जमशेदपुर।</strong> जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने पहले पहाड़ और नदियों को बचाने, फिर विकास करने की बात कही है। उन्होंने कहा कि आज का मॉडल थोड़ा दूसरे किस्म का है। आज विकास खूब किया जा रहा है और कभी संभव हुआ, तो पहाड़ और नदियों को बचाने की बात की जा रही है। दरअसल, आज वाला विकास का मॉडल विनाश का मॉडल है।</p>
<p>उन्होंने माना कि विकास का काम जरूरी है, लेकिन वह ऐसा विकास हो, जो ‘चरैवेति-चरैवेति’ के सिद्धांत पर हो। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहे और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्राकृतिक संसाधन छोड़े। इस विकास के मॉडल को उन्होंने ‘सनातन विकास’ का नाम दिया।</p>
<p>यहां मोतीलाल नेहरू पब्लिक स्कूल के ऑडिटोरियम में राष्ट्रीय नदी पर्वत सम्मेलन के समापन समारोह में बतौर मुख्य अतिथि उन्होंने कहा कि कई लोगों ने जानना चाहा कि इतने कानून होते हुए नए कानून की जरूरत क्या है। पुराने कानून लागू क्यों नहीं होते? हम लोग रोज इस स्थिति से दो-चार होते हैं। पर्यावरण की छोड़िए, सामान्य प्रशासन में जो कानून पहले से बने हुए हैं, वे लागू नहीं होते। जो लागू होते हैं, वे कानून की मूल भावना के विपरीत भावना से ही लागू होते हैं। यह विडंबना है।</p>
<p>सरयू राय ने कहा कि सरकार ने भारी-भरकम कानून बनाए हैं। उन्हीं के आलोक में विकास और पर्यावरण के संबंधों की हम लोग मीमांसा करते हैं। कुछ दिन पूर्व भारत के मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी कर दी कि पर्यावरण का काम करने वाले बताएं कि उन्होंने विकास का कहां समर्थन किया। ऐसी टिप्पणियों पर जनमानस के बीच हमें सफाई भी देनी चाहिए।</p>
<p>जो पर्यावरण की बात करते हैं, वे विकास के दौरान होने वाली ऐसी घटनाओं की बात करते हैं, जो समाज में प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं। प्रतिकूल प्रभाव न पड़े, जिस नाते कानून बनाए गए हैं, कानून के असली उद्देश्य पूर्ण हों।</p>
<p>उन्होंने कहा कि विकास हो, लेकिन एकांगी न हो। इन दिनों सस्टेनेबल डेवलपमेंट की बात हो रही है। भारत सरकार ने 2030 तक सस्टेनेबल डेवलपमेंट का लक्ष्य रखा है। इतने दिनों में डेवलपमेंट को सस्टेनेबल बनाने के लिए कुछ होता दिख नहीं रहा। हमें लगता है कि सस्टेनेबल डेवलपमेंट के बदले अगर सनातन डेवलपमेंट की बात करें, तो बेहतर होगा।</p>
<p>सनातन का अर्थ क्या है — नित्य नूतन, चिर पुरातन। शुरुआती दौर से जो विकास के कार्य हो रहे हैं, हमें उन्हें आगे बढ़ाना है। उसमें कोई खामी दिखे, तो उसे दूर करना है। इस तरह से विकास की धारा चलती रहती है। विकास की दिशा में कोई अचानक परिवर्तन न करे।</p>
<p> राय ने कहा कि सनातन विकास की बात इसलिए आई, क्योंकि शुरुआती दौर से चले आ रहे विकास कार्य को अनंत काल तक चलाना है। पुरातन विचार भी यही है। उन्होंने कहा कि पहले वन विभाग के लोग उन्हें अवसर विशेष पर बुलाते थे और वह जाते भी थे। जब से उन्होंने पूछना शुरू किया कि हमारा-आपका इस दिवस विशेष के प्रति कर्तव्य क्या है, उन्होंने बुलाना ही बंद कर दिया।</p>
<p>उन्होंने कहा कि पहले के कानून लागू नहीं हो रहे हैं और नया कानून हम लोग बनाने के लिए प्रयासरत हैं। नए कानून से कुछ और नहीं होगा, तो जनता के हाथ में एक और हथियार आ जाएगा। वह न्यायालय का दरवाजा तो खटखटा सकते हैं। हम भी विकास चाहते हैं, लेकिन हम जो विकास चाहते हैं, वह ऐसा विकास हो, जिससे प्राकृतिक संसाधनों के अस्तित्व पर कोई प्रतिकूल असर न पड़े।</p>
<h4><strong>अतिथियों का सम्मान</strong></h4>
<p>इसके पूर्व गौतम सूत्रधार का संजीव मुखर्जी ने, अरुण कु. शुक्ला का प्रवीण सिंह और प्रेम ने, संजय उपाध्याय का संतोष भगत तथा टुनटुन सिंह ने, प्रो. एम.के. जमुआर का नीरू सिंह और सुनीता सिंह ने, प्रो. गोपाल शर्मा का विनीत ने तथा मनोज सिंह का निर्मल सिंह ने शाल, पौधा और स्मृति-चिह्न देकर सम्मानित किया। यूपी संघ के अध्यक्ष डीपी शर्मा का विधायक सरयू राय और राजेंद्र सिंह ने स्वागत किया।</p>
<h4><strong>सरयू राय की पुस्तक ‘चेंजिंग फेस ऑफ सारंडा’ और स्मारिका का विमोचन</strong></h4>
<p>जमशेदपुर पश्चिम के विधायक और कई पुस्तकों के लेखक सरयू राय की नई पुस्तक ‘चेंजिंग फेस ऑफ सारंडा’ का आज विमोचन हुआ। यह पुस्तक अंग्रेजी में है। इसमें सारंडा में आए परिवर्तन के बारे में जानकारी दी गई है। पुस्तक की कीमत मात्र 100 रुपये है।</p>
<p>आज स्मारिका का भी विमोचन किया गया। स्मारिका के संपादक अंशुल शरण हैं। इसमें 126 पेज हैं, जो पर्यावरण के विभिन्न पहलुओं पर लिखे गए लेखों से अटे पड़े हैं।</p>
<h4><strong>ड्राफ्ट फाइनल करने का जिम्मा प्रो. अंशुमाली और प्रो. पीयूष कांत पांडेय को</strong></h4>
<p>राष्ट्रीय नदी पर्वत सम्मेलन के संरक्षक राजेंद्र सिंह ने प्रो. पीयूष कांत पांडेय और प्रो. अंशुमाली को कानून का ड्राफ्ट तय करने की जिम्मेदारी सौंपी है। ये दोनों मिलकर कुल तीन ड्राफ्टों का अध्ययन कर एक ड्राफ्ट बनाएंगे, जिसमें हर वह तथ्य शामिल होगा, जो दो दिनों तक यहां डिस्कस किए गए।</p>
<p>ये दोनों हफ्ते भर के भीतर उस ड्राफ्ट को तैयार कर राजेंद्र सिंह और विधायक सरयू राय को भेजेंगे। उसके उपरांत उस पर और चर्चा होगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>जमशेदपुर</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 23 May 2026 16:37:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>झारखंड के युवा शोधकर्ता कुलेश भंडारी का चीन में अंतरराष्ट्रीय जैवविविधता सम्मेलन के लिए चयन</title>
                                    <description><![CDATA[झारखंड के युवा जैवविविधता शोधकर्ता और प्राणीशास्त्र के स्नातकोत्तर विद्यार्थी कुलेश भंडारी का चयन चीन में आयोजित होने वाले एटीबीसी-2026 अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के लिए हुआ है। वे इस सम्मेलन में झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों के ग्रेनाइट पहाड़ी पारितंत्र और जैवविविधता पर अपना शोध प्रस्तुत करेंगे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/dumka/jharkhand-researcher-kulesh-bhandari-selected-atbc-2026-china/article-21814"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/capture_samridh_1200x720-(8)1.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>दुमका/अंतरराष्ट्रीय विज्ञान डेस्क:</strong> झारखंड के युवा जैवविविधता शोधकर्ता एवं प्राणीशास्त्र के स्नातकोत्तर विद्यार्थी कुलेश भंडारी का चयन विश्व-प्रसिद्ध वैज्ञानिक संस्था Association for Tropical Biology and Conservation द्वारा आयोजित एटीबीसी-2026 अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में मौखिक शोध प्रस्तुति के लिए हुआ है। यह सम्मेलन जून–जुलाई 2026 में चीन के शिशुआंगबन्ना क्षेत्र में आयोजित होगा, जहाँ विश्वभर के जैवविविधता, पारिस्थितिकी एवं संरक्षण विज्ञान से जुड़े वैज्ञानिक भाग लेंगे।</p>
<p>कुलेश भंडारी को सम्मेलन सहभागिता हेतु ग्लोबल विस्टास फाउंडेशन द्वारा अंतरराष्ट्रीय ट्रैवल ग्रांट समर्थन भी प्रदान किया गया है। एटीबीसी को उष्णकटिबंधीय जीवविज्ञान एवं संरक्षण विज्ञान के क्षेत्र में विश्व के सबसे प्रतिष्ठित एवं अत्यंत प्रतिस्पर्धी वैज्ञानिक मंचों में गिना जाता है।<br />उनका शोध झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों के ग्रेनाइट पहाड़ी पारितंत्र, जैवविविधता तथा चट्टान-वन संक्रमण क्षेत्रों पर आधारित है। यह अध्ययन झारखंड के कम अध्ययन किए गए चट्टानी एवं वन पारितंत्रों की पारिस्थितिक महत्ता को वैश्विक वैज्ञानिक मंच तक पहुँचाने का प्रयास माना जा रहा है।<br />कुलेश वर्तमान में Sido Kanhu Murmu University से संबद्ध हैं तथा जैवविविधता संरक्षण, पारंपरिक  पारिस्थितिक ज्ञान, मानव-वन्यजीव अंतःक्रिया एवं सामुदायिक संरक्षण जैसे विषयों पर कार्य कर रहे हैं। वे The Pollination Project Foundation समर्थित “वाइल्ड फूड फॉरेस्ट्स इन ट्राइबल झारखंड” पहल के परियोजना प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त वे The Habitats Trust समर्थित भारतीय विशाल फलाहारी चमगादड़ संरक्षण परियोजना से भी जुड़े हुए हैं।</p>
<p>कुलेश भंडारी ने बताया कि उनका प्रयास झारखंड के वनांचल, पहाड़ी पारितंत्रों एवं आदिवासी भू-दृश्यों की जैवविविधता को वैश्विक वैज्ञानिक मंच तक पहुँचाना है। वर्तमान में सम्मेलन सहभागिता हेतु वीज़ा एवं अन्य यात्रा औपचारिकताओं की प्रक्रिया जारी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>दुमका</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 19 May 2026 15:46:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आ गया सुपर अलनीनो!  बढ़ी IMD की चिंता, कहीं सूखा तो कहीं बाढ़; जानिए क्या होगा असर</title>
                                    <description><![CDATA[El Niño Effect in India 2026: प्रशांत महासागर में समुद्री तापमान तेजी से ऊपर जा रहा है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार एक बेहद शक्तिशाली "सुपर अलनीनो" उभर सकता है, जिसके दुष्प्रभाव भारत सहित दुनियाभर में महसूस किए जाएंगे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/super-el-nino-2026-monsoon-heatwave-and-weather-impact-explained/article-21463"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/hfghdgj.jpg" alt=""></a><br /><p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]"><strong>Super El Nino 2026:</strong> साल 2026 भारत और पूरी दुनिया के लिए गंभीर मौसमी चुनौतियाँ लेकर आ सकता है। एक तरफ रिकॉर्डतोड़ गर्मी और कमजोर मानसून की आशंका है, तो दूसरी तरफ कुछ इलाकों में सूखे और बाढ़ दोनों का खतरा मंडरा रहा है। इस सबकी वजह है सुपर अलनीनो। अमेरिकी संस्था NOAA के क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर ने ताजा अनुमान जारी करते हुए बताया है कि अक्टूबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच सुपर अलनीनो के सबसे प्रबल होने की संभावना है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) पहले ही इसके कारण मानसून वर्षा घटने को लेकर चिंता व्यक्त कर चुका है।</p>
<hr class="border-border-200 border-t-0.5 my-3 mx-1.5" />
<h4 class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]"><strong>अलनीनो क्यों बढ़ा रहा है दुनिया का तापमान?</strong></h4>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]">अलनीनो दरअसल ENSO (El Niño-Southern Oscillation) जलवायु चक्र का गर्म दौर है। इसमें उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर की सतह का तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है, जिसका असर दुनियाभर के मौसम, कृषि और पारिस्थितिकी पर पड़ता है। अगर सुपर अलनीनो आया तो यह इतिहास के सबसे विनाशकारी अलनीनो जैसा हो सकता है। 1877 में आए अलनीनो ने 1876 से 1878 के बीच भयंकर वैश्विक अकाल पैदा किया था, जिसमें 5 करोड़ से ज्यादा लोगों की जान गई थी, यानी तब की दुनिया की कुल आबादी का करीब 3 फीसदी।</p>
<blockquote class="twitter-tweet"><a href="https://twitter.com/NatureScienceA1/status/2055480395177578910?s=20">https://twitter.com/NatureScienceA1/status/2055480395177578910?s=20</a></blockquote>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]">

</p>
<hr class="border-border-200 border-t-0.5 my-3 mx-1.5" />
<h4 class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]"><strong>IMD ने क्या कहा, मानसून पर क्या असर होगा?</strong></h4>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]">भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, केरल में इस बार दक्षिण-पश्चिम मानसून 26 मई 2026 के आसपास दस्तक दे सकता है, यानी सामान्य तारीख 1 जून से पहले। लेकिन जल्दी आने का मतलब अच्छी बारिश नहीं है। NOAA के ताजा ENSO पूर्वानुमान के मुताबिक अलनीनो जल्द सक्रिय होकर 2026-27 की सर्दियों तक बना रह सकता है। क्लाइमेट इमरजेंसी इंस्टीट्यूट के निदेशक पीटर डी कार्टर का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते धरती का तापमान 2024 के रिकॉर्ड स्तर के बेहद करीब पहुँच रहा है।</p>
<blockquote class="twitter-tweet"><a href="https://twitter.com/PCarterClimate/status/2055543584896754049?s=20">https://twitter.com/PCarterClimate/status/2055543584896754049?s=20</a></blockquote>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]">

</p>
<hr class="border-border-200 border-t-0.5 my-3 mx-1.5" />
<h4 class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]"><strong>IMD का मानसून पूर्वानुमान , आंकड़े क्या कहते हैं?</strong></h4>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]">अप्रैल 2026 में जारी IMD के दीर्घकालिक पूर्वानुमान में कहा गया कि इस बार मानसून वर्षा दीर्घकालिक औसत (LPA) के लगभग 92% रह सकती है, जिसे सामान्य से कम माना जाता है। इसमें यह भी बताया गया:</p>
<ul class="[li_&amp;]:mb-0 [li_&amp;]:mt-1 [li_&amp;]:gap-1 [&amp;:not(:last-child)_ul]:pb-1 [&amp;:not(:last-child)_ol]:pb-1 list-disc flex flex-col gap-1 pl-8 mb-3">
<li class="font-claude-response-body whitespace-normal break-words pl-2">LPA के 90% से कम बारिश होने की करीब 35% संभावना है।</li>
<li class="font-claude-response-body whitespace-normal break-words pl-2">वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है।</li>
<li class="font-claude-response-body whitespace-normal break-words pl-2">मानसून की शुरुआत जल्दी होने के बाद भी, अगर मुख्य महीनों में अलनीनो मजबूत रहा तो पूरा मौसम कमजोर साबित हो सकता है।</li>
</ul>
<hr class="border-border-200 border-t-0.5 my-3 mx-1.5" />
<h4 class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]"><strong>मई से जुलाई के बीच ही आ सकता है सुपर अलनीनो</strong></h4>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]">अब इस बात की 82% संभावना जताई जा रही है कि अलनीनो मई से जुलाई 2026 के बीच सक्रिय हो जाएगा और फरवरी 2027 तक चलता रहेगा। यह NOAA के अप्रैल पूर्वानुमान की तुलना में करीब 20 प्रतिशत अंक अधिक निश्चितता है।</p>
<hr class="border-border-200 border-t-0.5 my-3 mx-1.5" />
<h4 class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]"><strong>दुनियाभर में क्या होगा असर?</strong></h4>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]">अलनीनो की घटनाएं आमतौर पर हर 2 से 7 साल में आती हैं। जब प्रशांत महासागर में हवा और समुद्री धाराओं का संतुलन बिगड़ता है, तब समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 0.5°C (0.9°F) से अधिक बढ़ जाता है। इसका नतीजा वैश्विक जलवायु पर व्यापक और गहरा असर होता है। दुनिया तेजी से तटस्थ स्थिति से बाहर निकल रही है और एक अस्थिर मौसमी दौर की तरफ बढ़ रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ताज़ा खबरें </category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/article/environment/super-el-nino-2026-monsoon-heatwave-and-weather-impact-explained/article-21463</link>
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                <pubDate>Sat, 16 May 2026 15:09:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Media Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बेज़ुबानों को पिला रहे पानी, इंसानियत की मिसाल बनी “दाना-पानी” पहल</title>
                                    <description><![CDATA[भीषण गर्मी में जब इंसान सुरक्षित स्थानों और पानी की व्यवस्था कर लेता है, वहीं बेजुबान पक्षी और जानवर प्यास से बेहाल रहते हैं। इसी संवेदनशीलता को समझते हुए शहर की संस्था बीइंग रेस्पॉन्सिबल द्वारा “दाना-पानी” अभियान चलाया जा रहा है। इस वर्ष संस्था ने 200 से अधिक मिट्टी के सकोरे और दाने वितरित किए हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/dana-pani-abhiyan-bezubaan-pakshi-pani-samaj-sewa-being-responsible/article-21292"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/f0eabac9-dc0d-4dae-91fe-c0912a05e34f_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>नेशनल डेस्क: </strong>इंसानियत सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं होती—इस बात को चरितार्थ कर रही है शहर की सामाजिक संस्था “बीइंग रेस्पॉन्सिबल” द्वारा चलाई जा रही “दाना-पानी” पहल। भीषण गर्मी के इस मौसम में जब इंसान पानी और छांव की तलाश में सुरक्षित स्थानों तक पहुँच जाता है, वहीं बेजुबान पक्षी और जानवर प्यास से बेहाल सड़कों, छतों और खुले इलाकों में भटकते नजर आते हैं।</p>
<p>तेज धूप में जब कोई चिड़िया अपनी प्यास बुझाने के लिए आसमान की ओर बेबस निगाहों से देखती है, तो यह दृश्य हर संवेदनशील व्यक्ति के मन को झकझोर देता है। ऐसे ही हालात में यह पहल इन बेजुबानों के लिए राहत बनकर सामने आई है।</p>
<p>संस्था बीइंग रेस्पॉन्सिबल पिछले लगभग चार वर्षों से लगातार हर गर्मी में “दाना-पानी” अभियान चला रही है। इस वर्ष भी संस्था ने शहर के विभिन्न इलाकों में 200 से अधिक मिट्टी के सकोरे और दाने वितरित किए हैं, ताकि पक्षियों और जानवरों को गर्मी में पानी और भोजन की सुविधा मिल सके।</p>
<p>संस्था का मानना है कि यदि हर व्यक्ति अपने घर की छत, आंगन या दरवाजे के बाहर एक सकोरा रखकर उसमें नियमित पानी भर दे, तो हजारों बेजुबान जीवों की जान बचाई जा सकती है। यह छोटा-सा प्रयास कई मासूम जिंदगियों के लिए जीवनदान साबित हो सकता है।</p>
<p>यह पहल केवल सेवा कार्य नहीं, बल्कि एक संवेदनशील विचार है, जो यह संदेश देता है कि पृथ्वी पर हर जीव का समान अधिकार है। जब एक पक्षी प्यास से तड़पता है, तो वह केवल एक जीव नहीं बल्कि हमारी इंसानियत का प्रतिबिंब होता है।</p>
<p>बीइंग रेस्पॉन्सिबल द्वारा चलाई जा रही यह मुहिम बिना किसी शोर-शराबे और दिखावे के लगातार आगे बढ़ रही है। धीरे-धीरे लोग भी इस पहल से जुड़ रहे हैं और अपने घरों में सकोरे रखकर बेजुबानों की मदद कर रहे हैं।</p>
<p>संस्था का कहना है कि शहरों में विकास की दौड़ में पेड़ और जल स्रोत कम होते जा रहे हैं, जिसका सबसे अधिक असर इन बेजुबान जीवों पर पड़ रहा है। ऐसे में यह सकोरे उनके लिए जीवन की डोर बनते जा रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/article/environment/dana-pani-abhiyan-bezubaan-pakshi-pani-samaj-sewa-being-responsible/article-21292</link>
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                <pubDate>Tue, 12 May 2026 17:58:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>झारखंड में अचानक बढ़ी भीषण गर्मी की असली वजह क्या है, समझिए आसान भाषा में</title>
                                    <description><![CDATA[<p>क्या आपको भी लग रहा है कि झारखंड में अचानक गर्मी कुछ ज़्यादा ही तेज हो गई है? आखिर अप्रैल में ही तापमान इतना क्यों बढ़ गया और हीटवेव जैसी स्थिति कैसे बन गई? आइए आसान भाषा में समझते हैं इसके पीछे की असली वजह।</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/jharkhand-me-achanak-badhi-bhishan-garmi-heatwave-ke-piche-ke-mukhya-karan-kya-hai/article-20692"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-04/chatgpt-image-apr-21,-2026,-04_25_39-pm.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>रांची:</strong> झारखंड में अप्रैल के तीसरे हफ्ते में गर्मी ने <a href="https://mausam.imd.gov.in/responsive/heatwave_guidance.php">अचानक तीखा रूप ले लिया है। भारतीय मौसम विभाग के ताज़ा बुलेटिन के</a> मुताबिक राज्य में 20 से 22 अप्रैल 2026 के बीच हीटवेव की स्थिति बनी रहने की संभावना रही, जबकि 21 अप्रैल के लिए भी झारखंड में <a href="https://mausam.imd.gov.in/responsive/heatwave_guidance.php">heat wave warning</a> जारी थी। IMD की रिपोर्ट में<a href="https://mausam.imd.gov.in/responsive/heatwave_guidance.php"> Jharkhand को उन राज्यों में शामिल किया गया है जहां इस अवधि में तापमान और अधिक बढ़ने की आशंका जताई गई थी।<img alt="9k="></img></a></p>
<p><a href="https://mausam.imd.gov.in/responsive/heatwave_guidance.php">मौसम विभाग के आंकड़े भी इस गर्मी की तीव्रता को साफ दिखाते हैं।</a> झारखंड के दैनिक मौसम बुलेटिन के<a href="https://mausam.imd.gov.in/responsive/heatwave_guidance.php"> अनुसार 20 अप्रैल की सुबह दर्ज तापमान में रांची का अधिकतम तापमान 40.1°C, जमशेदपुर का 42.6°C, डाल्टनगंज का 43.8°C </a>और बोकारो-थर्मल का 42.2°C दर्ज हुआ। यही नहीं, कई जगहों पर तापमान सामान्य से काफी ऊपर रहा, <a href="https://mausam.imd.gov.in/responsive/heatwave_guidance.php">जिससे यह साफ है कि यह सिर्फ “गर्मी का मौसम” नहीं, बल्कि सामान्य से कहीं ज्यादा तीखा गर्म दौर है।<img alt="2Q=="></img></a></p>
<div class="embed-responsive" style="width:100%;border:1px solid #C0C0C0;height:600px;">
<p>इस अचानक बढ़ी गर्मी की सबसे बड़ी वजह है <strong>पूर्वी भारत में तापमान का तेज़ उछाल</strong> और लंबे समय तक बने रहने वाला शुष्क मौसम। IMD के अनुसार 19 से 21 अप्रैल के बीच पूर्वी भारत में अधिकतम तापमान में 2 से 3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि की संभावना थी, और उसी दौरान झारखंड सहित पूर्वी हिस्सों में हीटवेव की चेतावनी जारी रही। यानी वातावरण पहले से ही गर्म था, ऊपर से तापमान को नीचे लाने वाली बारिश या बादल नहीं थे।</p>
<p>रांची मौसम केंद्र के बुलेटिन में यह भी दिखा कि राज्य के कई हिस्सों में <strong>dry weather</strong> बना रहा और बारिश लगभग नहीं के बराबर हुई। जब बादल कम होते हैं, हवा में नमी घटती है और सूरज की किरणें जमीन को सीधे और तेजी से गर्म करती हैं। यही वजह है कि दिन चढ़ने के साथ तापमान बहुत तेजी से ऊपर चला जाता है और लोगों को लू जैसी स्थिति महसूस होने लगती है।</p>
<p>IMD के व्यापक पूर्वानुमान में भी यह साफ कहा गया कि झारखंड सहित कई राज्यों में heatwave conditions की संभावना है। 20 अप्रैल की रात जारी बुलेटिन में झारखंड को हीटवेव प्रभावित राज्यों की सूची में रखा गया था, जबकि 21 अप्रैल के बुलेटिन में भी राज्य के लिए गर्मी की चेतावनी बनी रही। इसका मतलब है कि यह स्थिति किसी एक दिन की नहीं, बल्कि कई दिनों से जमा हो रहे मौसमी दबाव का नतीजा है।</p>
<p>सरल भाषा में समझें तो झारखंड में गर्मी इसलिए अचानक बहुत ज्यादा लगी क्योंकि अप्रैल के इस हिस्से में मौसम ने तीन काम एक साथ किए। पहला, सूरज की सीधी तपिश बढ़ गई। दूसरा, बारिश और बादलों ने राहत नहीं दी। तीसरा, लगातार शुष्क और गर्म हवा ने तापमान को नीचे नहीं आने दिया। जब ये तीनों बातें एक साथ हो जाएं, तो गर्मी “सामान्य” नहीं रहती, वह हीटवेव बन जाती है। IMD भी heatwave को किसी क्षेत्र के सामान्य तापमान की तुलना में असामान्य रूप से अधिक तापमान की अवधि मानता है, और उसके असर को बढ़ाने वाले कारकों में मौसम की अनुकूल परिस्थितियां शामिल होती हैं।</p>
<p>फिलहाल मौसम विभाग ने संकेत दिया है कि अगले कुछ दिनों तक राज्य में गर्मी से पूरी राहत मिलना आसान नहीं होगा, हालांकि कुछ हिस्सों में गरज-चमक और आंशिक बारिश की संभावना अलग-अलग बुलेटिनों में जताई गई है। यानी राहत आ सकती है, लेकिन यह हर जगह एक साथ नहीं मिलेगी।</p>
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                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ताज़ा खबरें </category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 21 Apr 2026 16:30:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Media Desk]]></dc:creator>
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                <title>ग्रेनाइट जैवविविधता पर कुलेश भंडारी का शोध अंतरराष्ट्रीय मंच पर चयनित</title>
                                    <description><![CDATA[झारखंड के संथाल परगना क्षेत्र से युवा जैवविविधता शोधकर्ता कुलेश भंडारी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी उपलब्धि हासिल की है। उनका शोध उष्णकटिबंधीय ग्रेनाइट आउटक्रॉप्स और माइक्रोहैबिटैट पर आधारित है, जिसे Association for Tropical Biology and Conservation Annual Meeting 2026 में मौखिक प्रस्तुति के लिए चुना गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/dumka/kulesh-bhandaris-research-on-granite-biodiversity-selected-on-international-platform/article-19817"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-04/e5bbdb0e-b3fa-470b-9c22-2ed7793f98ad_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>दुमका: </strong>झारखंड के संथाल परगना के पहाड़ी और वनांचल क्षेत्र से एक युवा जैवविविधता शोधकर्ता, कुलेश भंडारी, ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। उनका शोध कार्य उष्णकटिबंधीय ग्रेनाइट आउटक्रॉप्स (शैल-उद्भेदन) पर केंद्रित है, जिसमें चट्टानी पहाड़ियों पर पाए जाने वाले सूक्ष्म आवास (माइक्रोहैबिटैट) और जैवविविधता का वैज्ञानिक अध्ययन किया गया है।</p>
<p>इस शोध को Association for Tropical Biology and Conservation Annual Meeting 2026 के लिए मौखिक प्रस्तुति (ओरल प्रेजेंटेशन) के रूप में चयनित किया गया है, जो इस वर्ष Xishuangbanna, चीन में आयोजित होगा। उल्लेखनीय है कि इस शोध के सार (एब्स्ट्रैक्ट) को अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समिति द्वारा बिना किसी संशोधन के सीधे स्वीकृति प्रदान की गई है, जो इसके उच्च वैज्ञानिक स्तर और स्पष्टता को दर्शाता है।</p>
<p>यह शोध संथाल परगना की ग्रेनाइट पहाड़ियों और आदिवासी पारिस्थितिकी तंत्र पर आधारित है। इसमें स्थानीय सूक्ष्म आवासों, प्रजातीय विविधता और पारिस्थितिक पैटर्न का पहली बार वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है। साथ ही, चट्टानी सतहों, दरारों और मृदा-पॉकेट्स में पाए जाने वाले जीवों और वनस्पतियों के अनुकूलन का भी अध्ययन शामिल है।</p>
<p>कुलेश भंडारी वर्तमान में झारखंड के आदिवासी पहाड़ी क्षेत्रों में जैवविविधता, पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण पर कार्य कर रहे हैं। उनका यह शोध न केवल स्थानीय स्तर पर, बल्कि वैश्विक उष्णकटिबंधीय पारिस्थितिकी के क्षेत्र में भी एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>दुमका</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 15:49:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anshika Ambasta]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ग्रीनहाउस गैस नीति के साथ बदल रही भारतीय राजनीति की दिशा</title>
                                    <description><![CDATA[भारत में क्लाइमेट चेंज, कार्बन क्रेडिट और ग्रीनहाउस गैस नीति अब राजनीति और विकास के प्रमुख मुद्दे बनते जा रहे हैं। नेताओं और रणनीतिकारों के बीच ग्रीन पॉलिटिक्स की समझ तेजी से बढ़ रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/carbon-credit-and-climate-politics-growing-environmental-consciousness-in-indian/article-18796"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/0eafee1f-36ad-4c19-b137-21953f6ba711_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>आज के दौर में यदि आप राजनीति और विकास की चर्चा करें, तो जलवायु परिवर्तन यानी 'क्लाइमेट चेंज' को नजरअंदाज करना नामुमकिन है। कुछ साल पहले तक पर्यावरण के मुद्दे केवल एनजीओ या वैज्ञानिकों के सम्मेलनों तक सीमित थे, लेकिन अब यह भारत की मुख्यधारा की राजनीति और अर्थव्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं।</p>
<p>देश ने 2070 तक 'नेट-जीरो' उत्सर्जन का जो महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है, उसने न केवल उद्योगों बल्कि राजनेताओं के सोचने का तरीका भी बदल दिया है। अब चुनावी रैलियों और विधानसभाओं में केवल पुरानी बुनियादी सुविधाओं की बात नहीं होती, बल्कि 'कार्बन क्रेडिट' और 'ग्रीनहाउस गैस' जैसे तकनीकी शब्द भी सुनाई देने लगे हैं। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि भविष्य की राजनीति वही करेगा, जो प्रकृति और प्रगति के बीच संतुलन बनाना जानता होगा।</p>
<p>भारतीय राजनीति के कैनवास पर नजर डालें, तो कई ऐसे चेहरे उभरते हैं जिन्होंने पर्यावरण नीति को एक नई दिशा दी है। पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का पक्ष रखते हुए यह स्थापित किया कि विकास का मतलब प्रकृति का विनाश कतई नहीं है। उनके कार्यकाल में पर्यावरण कूटनीति को एक बौद्धिक गरिमा मिली। वहीं, वर्तमान में इस जिम्मेदारी को संभाल रहे भूपेंद्र यादव के नेतृत्व में भारत आज दुनिया को 'सस्टेनेबल लाइफस्टाइल' का मंत्र दे रहा है।</p>
<p>उनके प्रयासों से सौर ऊर्जा और रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में भारत एक ग्लोबल लीडर के रूप में उभरा है। इसी कड़ी में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता अश्विनी कुमार चौबे भी अपनी सनातनी परंपराओं और आधुनिक पर्यावरण नीतियों के बीच तालमेल बिठाने की पैरवी करते रहे हैं। उनका मानना है कि पर्यावरण की रक्षा हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, जिसे कानून और जन-भागीदारी से मजबूत करना होगा।</p>
<p>राजनीति के इस बदलते स्वरूप में केवल दिल्ली के गलियारे ही नहीं, बल्कि राज्यों के दिग्गज भी सक्रिय हैं। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने कार्यकाल के दौरान जिस तरह से बड़े ग्रीन प्रोजेक्ट्स और रिवर फ्रंट जैसे कार्यों को प्राथमिकता दी, वह बताता है कि क्षेत्रीय राजनीति में भी 'इको-पॉलिटिक्स' की जड़ें गहरी हो रही हैं। वहीं, अभिनेता से राजनेता बने शत्रुघ्न सिन्हा अपनी खास शैली में प्रदूषण और बिगड़ते पर्यावरण पर चिंता जताते हुए इसे एक नागरिक आंदोलन बनाने की बात करते रहे हैं। इन दिग्गजों की सक्रियता यह साफ करती है कि अब 'ग्रीन पॉलिटिक्स' केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक राजनीतिक मजबूरी और जरूरत बन चुकी है।</p>
<p>दिलचस्प बात यह है कि राजनीति के इस बदलते मिजाज को अब चुनावी रणनीतिकार भी भांप रहे हैं। इसी कड़ी में जाने-माने राजनीतिक रणनीतिकार डॉ. अतुल मलिकराम का नाम भी चर्चा में आया है, जिन्होंने हाल ही में ब्यूरो वेरिटास जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था से कार्बन फुटप्रिंट और ग्रीनहाउस गैस अकाउंटिंग में प्रोफेशनल सर्टिफिकेशन हासिल किया है।</p>
<p>हिंदी भाषी राज्यों की जमीनी सियासत और जनसंचार के माहिर खिलाड़ी माने जाने वाले डॉ. मलिकराम का इस तकनीकी क्षेत्र में प्रवेश करना एक बड़ा संकेत है। यह दर्शाता है कि आने वाले समय में चुनावी रणनीतियां केवल जातीय समीकरणों या लोक-लुभावन वादों तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि राजनेताओं को यह भी सलाह दी जाएगी कि वे अपनी नीतियों को वैश्विक पर्यावरण मानकों के अनुरूप कैसे ढालें।</p>
<p>कुल मिलाकर देखें तो भारत जैसे विकासशील देश के लिए कार्बन क्रेडिट और सतत विकास अब केवल किताबी शब्द नहीं रह गए हैं। आने वाले दशकों में देश को ऐसे विकास मॉडल की दरकार होगी जो अर्थव्यवस्था की रफ्तार भी बनाए रखे और धरती को रहने लायक बने रहने में भी मदद करे।</p>
<p>जिस तरह से जयराम रमेश से लेकर डॉ. अतुल मलिकराम तक अलग-अलग भूमिकाओं में लोग पर्यावरण नीति और कार्बन इकोनॉमी की समझ विकसित कर रहे हैं, उससे यह स्पष्ट है कि आगामी वर्षों में पर्यावरण और राजनीति का यह गठबंधन और भी गहरा होगा। वह दिन दूर नहीं जब जनता किसी नेता को उसके द्वारा लगाए गए पेड़ों और कम किए गए कार्बन उत्सर्जन के आधार पर भी आंकेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 12 Mar 2026 17:41:12 +0530</pubDate>
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