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                <title>पर्यावरण - Samridh Jharkhand</title>
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                <description>पर्यावरण RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>आ गया सुपर अलनीनो!  बढ़ी IMD की चिंता, कहीं सूखा तो कहीं बाढ़; जानिए क्या होगा असर</title>
                                    <description><![CDATA[El Niño Effect in India 2026: प्रशांत महासागर में समुद्री तापमान तेजी से ऊपर जा रहा है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार एक बेहद शक्तिशाली "सुपर अलनीनो" उभर सकता है, जिसके दुष्प्रभाव भारत सहित दुनियाभर में महसूस किए जाएंगे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/super-el-nino-2026-monsoon-heatwave-and-weather-impact-explained/article-21463"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/hfghdgj.jpg" alt=""></a><br /><p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]"><strong>Super El Nino 2026:</strong> साल 2026 भारत और पूरी दुनिया के लिए गंभीर मौसमी चुनौतियाँ लेकर आ सकता है। एक तरफ रिकॉर्डतोड़ गर्मी और कमजोर मानसून की आशंका है, तो दूसरी तरफ कुछ इलाकों में सूखे और बाढ़ दोनों का खतरा मंडरा रहा है। इस सबकी वजह है सुपर अलनीनो। अमेरिकी संस्था NOAA के क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर ने ताजा अनुमान जारी करते हुए बताया है कि अक्टूबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच सुपर अलनीनो के सबसे प्रबल होने की संभावना है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) पहले ही इसके कारण मानसून वर्षा घटने को लेकर चिंता व्यक्त कर चुका है।</p>
<hr class="border-border-200 border-t-0.5 my-3 mx-1.5" />
<h4 class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]"><strong>अलनीनो क्यों बढ़ा रहा है दुनिया का तापमान?</strong></h4>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]">अलनीनो दरअसल ENSO (El Niño-Southern Oscillation) जलवायु चक्र का गर्म दौर है। इसमें उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर की सतह का तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है, जिसका असर दुनियाभर के मौसम, कृषि और पारिस्थितिकी पर पड़ता है। अगर सुपर अलनीनो आया तो यह इतिहास के सबसे विनाशकारी अलनीनो जैसा हो सकता है। 1877 में आए अलनीनो ने 1876 से 1878 के बीच भयंकर वैश्विक अकाल पैदा किया था, जिसमें 5 करोड़ से ज्यादा लोगों की जान गई थी, यानी तब की दुनिया की कुल आबादी का करीब 3 फीसदी।</p>
<blockquote class="twitter-tweet"><a href="https://twitter.com/NatureScienceA1/status/2055480395177578910?s=20">https://twitter.com/NatureScienceA1/status/2055480395177578910?s=20</a></blockquote>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]">

</p>
<hr class="border-border-200 border-t-0.5 my-3 mx-1.5" />
<h4 class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]"><strong>IMD ने क्या कहा, मानसून पर क्या असर होगा?</strong></h4>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]">भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, केरल में इस बार दक्षिण-पश्चिम मानसून 26 मई 2026 के आसपास दस्तक दे सकता है, यानी सामान्य तारीख 1 जून से पहले। लेकिन जल्दी आने का मतलब अच्छी बारिश नहीं है। NOAA के ताजा ENSO पूर्वानुमान के मुताबिक अलनीनो जल्द सक्रिय होकर 2026-27 की सर्दियों तक बना रह सकता है। क्लाइमेट इमरजेंसी इंस्टीट्यूट के निदेशक पीटर डी कार्टर का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते धरती का तापमान 2024 के रिकॉर्ड स्तर के बेहद करीब पहुँच रहा है।</p>
<blockquote class="twitter-tweet"><a href="https://twitter.com/PCarterClimate/status/2055543584896754049?s=20">https://twitter.com/PCarterClimate/status/2055543584896754049?s=20</a></blockquote>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]">

</p>
<hr class="border-border-200 border-t-0.5 my-3 mx-1.5" />
<h4 class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]"><strong>IMD का मानसून पूर्वानुमान , आंकड़े क्या कहते हैं?</strong></h4>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]">अप्रैल 2026 में जारी IMD के दीर्घकालिक पूर्वानुमान में कहा गया कि इस बार मानसून वर्षा दीर्घकालिक औसत (LPA) के लगभग 92% रह सकती है, जिसे सामान्य से कम माना जाता है। इसमें यह भी बताया गया:</p>
<ul class="[li_&amp;]:mb-0 [li_&amp;]:mt-1 [li_&amp;]:gap-1 [&amp;:not(:last-child)_ul]:pb-1 [&amp;:not(:last-child)_ol]:pb-1 list-disc flex flex-col gap-1 pl-8 mb-3">
<li class="font-claude-response-body whitespace-normal break-words pl-2">LPA के 90% से कम बारिश होने की करीब 35% संभावना है।</li>
<li class="font-claude-response-body whitespace-normal break-words pl-2">वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है।</li>
<li class="font-claude-response-body whitespace-normal break-words pl-2">मानसून की शुरुआत जल्दी होने के बाद भी, अगर मुख्य महीनों में अलनीनो मजबूत रहा तो पूरा मौसम कमजोर साबित हो सकता है।</li>
</ul>
<hr class="border-border-200 border-t-0.5 my-3 mx-1.5" />
<h4 class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]"><strong>मई से जुलाई के बीच ही आ सकता है सुपर अलनीनो</strong></h4>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]">अब इस बात की 82% संभावना जताई जा रही है कि अलनीनो मई से जुलाई 2026 के बीच सक्रिय हो जाएगा और फरवरी 2027 तक चलता रहेगा। यह NOAA के अप्रैल पूर्वानुमान की तुलना में करीब 20 प्रतिशत अंक अधिक निश्चितता है।</p>
<hr class="border-border-200 border-t-0.5 my-3 mx-1.5" />
<h4 class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]"><strong>दुनियाभर में क्या होगा असर?</strong></h4>
<p class="font-claude-response-body break-words whitespace-normal leading-[1.7]">अलनीनो की घटनाएं आमतौर पर हर 2 से 7 साल में आती हैं। जब प्रशांत महासागर में हवा और समुद्री धाराओं का संतुलन बिगड़ता है, तब समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 0.5°C (0.9°F) से अधिक बढ़ जाता है। इसका नतीजा वैश्विक जलवायु पर व्यापक और गहरा असर होता है। दुनिया तेजी से तटस्थ स्थिति से बाहर निकल रही है और एक अस्थिर मौसमी दौर की तरफ बढ़ रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ताज़ा खबरें </category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/article/environment/super-el-nino-2026-monsoon-heatwave-and-weather-impact-explained/article-21463</link>
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                <pubDate>Sat, 16 May 2026 15:09:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Media Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बेज़ुबानों को पिला रहे पानी, इंसानियत की मिसाल बनी “दाना-पानी” पहल</title>
                                    <description><![CDATA[भीषण गर्मी में जब इंसान सुरक्षित स्थानों और पानी की व्यवस्था कर लेता है, वहीं बेजुबान पक्षी और जानवर प्यास से बेहाल रहते हैं। इसी संवेदनशीलता को समझते हुए शहर की संस्था बीइंग रेस्पॉन्सिबल द्वारा “दाना-पानी” अभियान चलाया जा रहा है। इस वर्ष संस्था ने 200 से अधिक मिट्टी के सकोरे और दाने वितरित किए हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/dana-pani-abhiyan-bezubaan-pakshi-pani-samaj-sewa-being-responsible/article-21292"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/f0eabac9-dc0d-4dae-91fe-c0912a05e34f_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>नेशनल डेस्क: </strong>इंसानियत सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं होती—इस बात को चरितार्थ कर रही है शहर की सामाजिक संस्था “बीइंग रेस्पॉन्सिबल” द्वारा चलाई जा रही “दाना-पानी” पहल। भीषण गर्मी के इस मौसम में जब इंसान पानी और छांव की तलाश में सुरक्षित स्थानों तक पहुँच जाता है, वहीं बेजुबान पक्षी और जानवर प्यास से बेहाल सड़कों, छतों और खुले इलाकों में भटकते नजर आते हैं।</p>
<p>तेज धूप में जब कोई चिड़िया अपनी प्यास बुझाने के लिए आसमान की ओर बेबस निगाहों से देखती है, तो यह दृश्य हर संवेदनशील व्यक्ति के मन को झकझोर देता है। ऐसे ही हालात में यह पहल इन बेजुबानों के लिए राहत बनकर सामने आई है।</p>
<p>संस्था बीइंग रेस्पॉन्सिबल पिछले लगभग चार वर्षों से लगातार हर गर्मी में “दाना-पानी” अभियान चला रही है। इस वर्ष भी संस्था ने शहर के विभिन्न इलाकों में 200 से अधिक मिट्टी के सकोरे और दाने वितरित किए हैं, ताकि पक्षियों और जानवरों को गर्मी में पानी और भोजन की सुविधा मिल सके।</p>
<p>संस्था का मानना है कि यदि हर व्यक्ति अपने घर की छत, आंगन या दरवाजे के बाहर एक सकोरा रखकर उसमें नियमित पानी भर दे, तो हजारों बेजुबान जीवों की जान बचाई जा सकती है। यह छोटा-सा प्रयास कई मासूम जिंदगियों के लिए जीवनदान साबित हो सकता है।</p>
<p>यह पहल केवल सेवा कार्य नहीं, बल्कि एक संवेदनशील विचार है, जो यह संदेश देता है कि पृथ्वी पर हर जीव का समान अधिकार है। जब एक पक्षी प्यास से तड़पता है, तो वह केवल एक जीव नहीं बल्कि हमारी इंसानियत का प्रतिबिंब होता है।</p>
<p>बीइंग रेस्पॉन्सिबल द्वारा चलाई जा रही यह मुहिम बिना किसी शोर-शराबे और दिखावे के लगातार आगे बढ़ रही है। धीरे-धीरे लोग भी इस पहल से जुड़ रहे हैं और अपने घरों में सकोरे रखकर बेजुबानों की मदद कर रहे हैं।</p>
<p>संस्था का कहना है कि शहरों में विकास की दौड़ में पेड़ और जल स्रोत कम होते जा रहे हैं, जिसका सबसे अधिक असर इन बेजुबान जीवों पर पड़ रहा है। ऐसे में यह सकोरे उनके लिए जीवन की डोर बनते जा रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>समाज</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 12 May 2026 17:58:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>झारखंड में अचानक बढ़ी भीषण गर्मी की असली वजह क्या है, समझिए आसान भाषा में</title>
                                    <description><![CDATA[<p>क्या आपको भी लग रहा है कि झारखंड में अचानक गर्मी कुछ ज़्यादा ही तेज हो गई है? आखिर अप्रैल में ही तापमान इतना क्यों बढ़ गया और हीटवेव जैसी स्थिति कैसे बन गई? आइए आसान भाषा में समझते हैं इसके पीछे की असली वजह।</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/jharkhand-me-achanak-badhi-bhishan-garmi-heatwave-ke-piche-ke-mukhya-karan-kya-hai/article-20692"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-04/chatgpt-image-apr-21,-2026,-04_25_39-pm.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>रांची:</strong> झारखंड में अप्रैल के तीसरे हफ्ते में गर्मी ने <a href="https://mausam.imd.gov.in/responsive/heatwave_guidance.php">अचानक तीखा रूप ले लिया है। भारतीय मौसम विभाग के ताज़ा बुलेटिन के</a> मुताबिक राज्य में 20 से 22 अप्रैल 2026 के बीच हीटवेव की स्थिति बनी रहने की संभावना रही, जबकि 21 अप्रैल के लिए भी झारखंड में <a href="https://mausam.imd.gov.in/responsive/heatwave_guidance.php">heat wave warning</a> जारी थी। IMD की रिपोर्ट में<a href="https://mausam.imd.gov.in/responsive/heatwave_guidance.php"> Jharkhand को उन राज्यों में शामिल किया गया है जहां इस अवधि में तापमान और अधिक बढ़ने की आशंका जताई गई थी।<img alt="9k="></img></a></p>
<p><a href="https://mausam.imd.gov.in/responsive/heatwave_guidance.php">मौसम विभाग के आंकड़े भी इस गर्मी की तीव्रता को साफ दिखाते हैं।</a> झारखंड के दैनिक मौसम बुलेटिन के<a href="https://mausam.imd.gov.in/responsive/heatwave_guidance.php"> अनुसार 20 अप्रैल की सुबह दर्ज तापमान में रांची का अधिकतम तापमान 40.1°C, जमशेदपुर का 42.6°C, डाल्टनगंज का 43.8°C </a>और बोकारो-थर्मल का 42.2°C दर्ज हुआ। यही नहीं, कई जगहों पर तापमान सामान्य से काफी ऊपर रहा, <a href="https://mausam.imd.gov.in/responsive/heatwave_guidance.php">जिससे यह साफ है कि यह सिर्फ “गर्मी का मौसम” नहीं, बल्कि सामान्य से कहीं ज्यादा तीखा गर्म दौर है।<img alt="2Q=="></img></a></p>
<div class="embed-responsive" style="width:100%;border:1px solid #C0C0C0;height:600px;">
<p>इस अचानक बढ़ी गर्मी की सबसे बड़ी वजह है <strong>पूर्वी भारत में तापमान का तेज़ उछाल</strong> और लंबे समय तक बने रहने वाला शुष्क मौसम। IMD के अनुसार 19 से 21 अप्रैल के बीच पूर्वी भारत में अधिकतम तापमान में 2 से 3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि की संभावना थी, और उसी दौरान झारखंड सहित पूर्वी हिस्सों में हीटवेव की चेतावनी जारी रही। यानी वातावरण पहले से ही गर्म था, ऊपर से तापमान को नीचे लाने वाली बारिश या बादल नहीं थे।</p>
<p>रांची मौसम केंद्र के बुलेटिन में यह भी दिखा कि राज्य के कई हिस्सों में <strong>dry weather</strong> बना रहा और बारिश लगभग नहीं के बराबर हुई। जब बादल कम होते हैं, हवा में नमी घटती है और सूरज की किरणें जमीन को सीधे और तेजी से गर्म करती हैं। यही वजह है कि दिन चढ़ने के साथ तापमान बहुत तेजी से ऊपर चला जाता है और लोगों को लू जैसी स्थिति महसूस होने लगती है।</p>
<p>IMD के व्यापक पूर्वानुमान में भी यह साफ कहा गया कि झारखंड सहित कई राज्यों में heatwave conditions की संभावना है। 20 अप्रैल की रात जारी बुलेटिन में झारखंड को हीटवेव प्रभावित राज्यों की सूची में रखा गया था, जबकि 21 अप्रैल के बुलेटिन में भी राज्य के लिए गर्मी की चेतावनी बनी रही। इसका मतलब है कि यह स्थिति किसी एक दिन की नहीं, बल्कि कई दिनों से जमा हो रहे मौसमी दबाव का नतीजा है।</p>
<p>सरल भाषा में समझें तो झारखंड में गर्मी इसलिए अचानक बहुत ज्यादा लगी क्योंकि अप्रैल के इस हिस्से में मौसम ने तीन काम एक साथ किए। पहला, सूरज की सीधी तपिश बढ़ गई। दूसरा, बारिश और बादलों ने राहत नहीं दी। तीसरा, लगातार शुष्क और गर्म हवा ने तापमान को नीचे नहीं आने दिया। जब ये तीनों बातें एक साथ हो जाएं, तो गर्मी “सामान्य” नहीं रहती, वह हीटवेव बन जाती है। IMD भी heatwave को किसी क्षेत्र के सामान्य तापमान की तुलना में असामान्य रूप से अधिक तापमान की अवधि मानता है, और उसके असर को बढ़ाने वाले कारकों में मौसम की अनुकूल परिस्थितियां शामिल होती हैं।</p>
<p>फिलहाल मौसम विभाग ने संकेत दिया है कि अगले कुछ दिनों तक राज्य में गर्मी से पूरी राहत मिलना आसान नहीं होगा, हालांकि कुछ हिस्सों में गरज-चमक और आंशिक बारिश की संभावना अलग-अलग बुलेटिनों में जताई गई है। यानी राहत आ सकती है, लेकिन यह हर जगह एक साथ नहीं मिलेगी।</p>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ताज़ा खबरें </category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 21 Apr 2026 16:30:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Media Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ग्रेनाइट जैवविविधता पर कुलेश भंडारी का शोध अंतरराष्ट्रीय मंच पर चयनित</title>
                                    <description><![CDATA[झारखंड के संथाल परगना क्षेत्र से युवा जैवविविधता शोधकर्ता कुलेश भंडारी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी उपलब्धि हासिल की है। उनका शोध उष्णकटिबंधीय ग्रेनाइट आउटक्रॉप्स और माइक्रोहैबिटैट पर आधारित है, जिसे Association for Tropical Biology and Conservation Annual Meeting 2026 में मौखिक प्रस्तुति के लिए चुना गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/dumka/kulesh-bhandaris-research-on-granite-biodiversity-selected-on-international-platform/article-19817"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-04/e5bbdb0e-b3fa-470b-9c22-2ed7793f98ad_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>दुमका: </strong>झारखंड के संथाल परगना के पहाड़ी और वनांचल क्षेत्र से एक युवा जैवविविधता शोधकर्ता, कुलेश भंडारी, ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। उनका शोध कार्य उष्णकटिबंधीय ग्रेनाइट आउटक्रॉप्स (शैल-उद्भेदन) पर केंद्रित है, जिसमें चट्टानी पहाड़ियों पर पाए जाने वाले सूक्ष्म आवास (माइक्रोहैबिटैट) और जैवविविधता का वैज्ञानिक अध्ययन किया गया है।</p>
<p>इस शोध को Association for Tropical Biology and Conservation Annual Meeting 2026 के लिए मौखिक प्रस्तुति (ओरल प्रेजेंटेशन) के रूप में चयनित किया गया है, जो इस वर्ष Xishuangbanna, चीन में आयोजित होगा। उल्लेखनीय है कि इस शोध के सार (एब्स्ट्रैक्ट) को अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समिति द्वारा बिना किसी संशोधन के सीधे स्वीकृति प्रदान की गई है, जो इसके उच्च वैज्ञानिक स्तर और स्पष्टता को दर्शाता है।</p>
<p>यह शोध संथाल परगना की ग्रेनाइट पहाड़ियों और आदिवासी पारिस्थितिकी तंत्र पर आधारित है। इसमें स्थानीय सूक्ष्म आवासों, प्रजातीय विविधता और पारिस्थितिक पैटर्न का पहली बार वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है। साथ ही, चट्टानी सतहों, दरारों और मृदा-पॉकेट्स में पाए जाने वाले जीवों और वनस्पतियों के अनुकूलन का भी अध्ययन शामिल है।</p>
<p>कुलेश भंडारी वर्तमान में झारखंड के आदिवासी पहाड़ी क्षेत्रों में जैवविविधता, पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण पर कार्य कर रहे हैं। उनका यह शोध न केवल स्थानीय स्तर पर, बल्कि वैश्विक उष्णकटिबंधीय पारिस्थितिकी के क्षेत्र में भी एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>दुमका</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 15:49:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anshika Ambasta]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ग्रीनहाउस गैस नीति के साथ बदल रही भारतीय राजनीति की दिशा</title>
                                    <description><![CDATA[भारत में क्लाइमेट चेंज, कार्बन क्रेडिट और ग्रीनहाउस गैस नीति अब राजनीति और विकास के प्रमुख मुद्दे बनते जा रहे हैं। नेताओं और रणनीतिकारों के बीच ग्रीन पॉलिटिक्स की समझ तेजी से बढ़ रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/carbon-credit-and-climate-politics-growing-environmental-consciousness-in-indian/article-18796"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/0eafee1f-36ad-4c19-b137-21953f6ba711_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>आज के दौर में यदि आप राजनीति और विकास की चर्चा करें, तो जलवायु परिवर्तन यानी 'क्लाइमेट चेंज' को नजरअंदाज करना नामुमकिन है। कुछ साल पहले तक पर्यावरण के मुद्दे केवल एनजीओ या वैज्ञानिकों के सम्मेलनों तक सीमित थे, लेकिन अब यह भारत की मुख्यधारा की राजनीति और अर्थव्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं।</p>
<p>देश ने 2070 तक 'नेट-जीरो' उत्सर्जन का जो महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है, उसने न केवल उद्योगों बल्कि राजनेताओं के सोचने का तरीका भी बदल दिया है। अब चुनावी रैलियों और विधानसभाओं में केवल पुरानी बुनियादी सुविधाओं की बात नहीं होती, बल्कि 'कार्बन क्रेडिट' और 'ग्रीनहाउस गैस' जैसे तकनीकी शब्द भी सुनाई देने लगे हैं। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि भविष्य की राजनीति वही करेगा, जो प्रकृति और प्रगति के बीच संतुलन बनाना जानता होगा।</p>
<p>भारतीय राजनीति के कैनवास पर नजर डालें, तो कई ऐसे चेहरे उभरते हैं जिन्होंने पर्यावरण नीति को एक नई दिशा दी है। पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का पक्ष रखते हुए यह स्थापित किया कि विकास का मतलब प्रकृति का विनाश कतई नहीं है। उनके कार्यकाल में पर्यावरण कूटनीति को एक बौद्धिक गरिमा मिली। वहीं, वर्तमान में इस जिम्मेदारी को संभाल रहे भूपेंद्र यादव के नेतृत्व में भारत आज दुनिया को 'सस्टेनेबल लाइफस्टाइल' का मंत्र दे रहा है।</p>
<p>उनके प्रयासों से सौर ऊर्जा और रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में भारत एक ग्लोबल लीडर के रूप में उभरा है। इसी कड़ी में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता अश्विनी कुमार चौबे भी अपनी सनातनी परंपराओं और आधुनिक पर्यावरण नीतियों के बीच तालमेल बिठाने की पैरवी करते रहे हैं। उनका मानना है कि पर्यावरण की रक्षा हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, जिसे कानून और जन-भागीदारी से मजबूत करना होगा।</p>
<p>राजनीति के इस बदलते स्वरूप में केवल दिल्ली के गलियारे ही नहीं, बल्कि राज्यों के दिग्गज भी सक्रिय हैं। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने कार्यकाल के दौरान जिस तरह से बड़े ग्रीन प्रोजेक्ट्स और रिवर फ्रंट जैसे कार्यों को प्राथमिकता दी, वह बताता है कि क्षेत्रीय राजनीति में भी 'इको-पॉलिटिक्स' की जड़ें गहरी हो रही हैं। वहीं, अभिनेता से राजनेता बने शत्रुघ्न सिन्हा अपनी खास शैली में प्रदूषण और बिगड़ते पर्यावरण पर चिंता जताते हुए इसे एक नागरिक आंदोलन बनाने की बात करते रहे हैं। इन दिग्गजों की सक्रियता यह साफ करती है कि अब 'ग्रीन पॉलिटिक्स' केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक राजनीतिक मजबूरी और जरूरत बन चुकी है।</p>
<p>दिलचस्प बात यह है कि राजनीति के इस बदलते मिजाज को अब चुनावी रणनीतिकार भी भांप रहे हैं। इसी कड़ी में जाने-माने राजनीतिक रणनीतिकार डॉ. अतुल मलिकराम का नाम भी चर्चा में आया है, जिन्होंने हाल ही में ब्यूरो वेरिटास जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था से कार्बन फुटप्रिंट और ग्रीनहाउस गैस अकाउंटिंग में प्रोफेशनल सर्टिफिकेशन हासिल किया है।</p>
<p>हिंदी भाषी राज्यों की जमीनी सियासत और जनसंचार के माहिर खिलाड़ी माने जाने वाले डॉ. मलिकराम का इस तकनीकी क्षेत्र में प्रवेश करना एक बड़ा संकेत है। यह दर्शाता है कि आने वाले समय में चुनावी रणनीतियां केवल जातीय समीकरणों या लोक-लुभावन वादों तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि राजनेताओं को यह भी सलाह दी जाएगी कि वे अपनी नीतियों को वैश्विक पर्यावरण मानकों के अनुरूप कैसे ढालें।</p>
<p>कुल मिलाकर देखें तो भारत जैसे विकासशील देश के लिए कार्बन क्रेडिट और सतत विकास अब केवल किताबी शब्द नहीं रह गए हैं। आने वाले दशकों में देश को ऐसे विकास मॉडल की दरकार होगी जो अर्थव्यवस्था की रफ्तार भी बनाए रखे और धरती को रहने लायक बने रहने में भी मदद करे।</p>
<p>जिस तरह से जयराम रमेश से लेकर डॉ. अतुल मलिकराम तक अलग-अलग भूमिकाओं में लोग पर्यावरण नीति और कार्बन इकोनॉमी की समझ विकसित कर रहे हैं, उससे यह स्पष्ट है कि आगामी वर्षों में पर्यावरण और राजनीति का यह गठबंधन और भी गहरा होगा। वह दिन दूर नहीं जब जनता किसी नेता को उसके द्वारा लगाए गए पेड़ों और कम किए गए कार्बन उत्सर्जन के आधार पर भी आंकेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 12 Mar 2026 17:41:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anshika Ambasta]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Climate कहानी : सिर्फ धुआँ नहीं, मौसम भी बढ़ा रहा शहरों की हवा में ज़हर</title>
                                    <description><![CDATA[भारत के बड़े शहरों में बढ़ते वायु प्रदूषण को अक्सर वाहनों, उद्योगों और कचरा जलाने जैसे कारणों से जोड़ा जाता है, लेकिन एक नई रिपोर्ट बताती है कि मौसम भी इसमें बड़ी भूमिका निभाता है। पर्यावरण संस्था Climate Trends की स्टडी के अनुसार मौसम की स्थितियां प्रदूषण के स्तर को 40 प्रतिशत तक प्रभावित कर सकती हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/climate-story-not-only-smoke-but-also-weather-is-increasing/article-18747"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/e023f40a-47cd-4e42-bfe1-1c0db7cc8375_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>भारत के बड़े शहरों में बढ़ते प्रदूषण को अक्सर सिर्फ उत्सर्जन का नतीजा माना जाता है। गाड़ियों का धुआँ, उद्योगों का धुआँ, कूड़ा जलाना। मगर एक नई स्टडी बताती है कि कहानी इससे कहीं ज़्यादा जटिल है।</p>
<p>दरअसल कई शहरों में हवा की गुणवत्ता सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि कितना प्रदूषण निकल रहा है। यह भी उतना ही अहम है कि मौसम उसे फैलने देता है या शहर के ऊपर ही रोक कर रखता है।</p>
<p>पर्यावरण शोध संस्था Climate Trends की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, मौसम की स्थितियाँ अपने आप में प्रदूषण के स्तर को 40 प्रतिशत तक ऊपर-नीचे कर सकती हैं, भले ही उत्सर्जन में कोई बदलाव न हुआ हो। यह विश्लेषण 2024 से 2025 के बीच केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के वायु गुणवत्ता आंकड़ों के आधार पर किया गया है।</p>
<p>रिपोर्ट बताती है कि भारत के कई शहरों में प्रदूषण का असली संकट उत्सर्जन और मौसम के आपसी मेल से बनता है। खासकर तब, जब हवा की रफ्तार बेहद कम होती है और नमी अधिक होती है। ऐसी स्थिति में वातावरण में ठहराव पैदा हो जाता है, जिससे प्रदूषक कण शहर के ऊपर ही जमा होने लगते हैं।</p>
<h4><strong>दिल्ली में सर्दियों की घुटन</strong></h4>
<p>अध्ययन के मुताबिक दिल्ली देश का सबसे गंभीर वायु प्रदूषण संकट झेलने वाला शहर बना हुआ है। यहां सालाना औसत PM2.5 स्तर सबसे अधिक दर्ज किए गए हैं।</p>
<p>सर्दियों में हालात और भी खराब हो जाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार सर्दियों के दौरान दिल्ली में एक भी “क्लीन एयर डे” दर्ज नहीं हुआ। यही वजह है कि साल भर के औसत आंकड़े कभी-कभी सुधार दिखाते हैं, लेकिन नागरिकों को असली राहत महसूस नहीं होती।</p>
<p>रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली और पटना जैसे शहरों में सर्दियों के दौरान 70 प्रतिशत से अधिक दिनों में कम हवा और ज्यादा नमी वाली मौसम स्थितियाँ बनती हैं। यही ठहराव प्रदूषण को लंबे समय तक हवा में बनाए रखता है।</p>
<p>Climate Trends की संस्थापक और निदेशक आरती खोसला कहती हैं कि “अगर सालाना PM2.5 में 20 से 30 प्रतिशत की कमी भी आती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि सर्दियों में हवा सुरक्षित हो गई है। दिल्ली और पटना जैसे शहरों में मौसम की वजह से प्रदूषण लंबे समय तक जमा रहता है। इसलिए आने वाले एनकैप चरण में मौसम को ध्यान में रखकर लक्ष्य तय करना जरूरी है।”</p>
<h4><strong>पटना की गहराती समस्या</strong></h4>
<p>अध्ययन में यह भी सामने आया कि पटना देश का दूसरा सबसे प्रदूषित शहर बन चुका है। यहां भी प्रदूषण का स्तर लगातार ऊंचा बना रहता है।</p>
<p>विशेषज्ञों के मुताबिक, गंगा के मैदानों में स्थित कई शहरों में हवा का प्रवाह सीमित होता है। ऐसे में प्रदूषण फैलने के बजाय शहर के ऊपर ही अटक जाता है।</p>
<h4><strong>दक्षिण के शहरों में नया खतरा</strong></h4>
<p>रिपोर्ट एक और दिलचस्प बदलाव की ओर इशारा करती है। परंपरागत रूप से अपेक्षाकृत साफ माने जाने वाले बेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों में भी अब सर्दियों के महीनों में हवा की गुणवत्ता बिगड़ने के संकेत मिलने लगे हैं। यह एक नया ट्रेंड माना जा रहा है।</p>
<p>इसके अलावा मुंबई और चेन्नई में 2025 के दौरान सालाना औसत प्रदूषण स्तर में बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो इस बात का संकेत है कि प्रदूषण अब सिर्फ कुछ महीनों की समस्या नहीं रह गया है।</p>
<p>दिलचस्प बात यह है कि बड़े शहरों में बेंगलुरु अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में दिखाई देता है। रिपोर्ट के अनुसार वहां हवा की गुणवत्ता अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई है, जिसे शोधकर्ता “संरचनात्मक वायु गुणवत्ता सहनशीलता” कहते हैं।</p>
<h4><strong>कोलकाता की सर्द हवा</strong></h4>
<p>कोलकाता में भी प्रदूषण का संकट सर्दियों में सबसे ज्यादा गंभीर हो जाता है। आईआईटी दिल्ली के सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंसेज़ के प्रमुख साग्निक डे बताते हैं कि उत्तर भारत के कई शहरों में 1 मीटर प्रति सेकंड से भी कम हवा की गति और अधिक नमी के कारण प्रदूषण लंबे समय तक बना रहता है। ऐसे हालात में वेंटिलेशन यानी हवा के फैलाव की क्षमता प्रदूषण स्तर तय करने में बड़ी भूमिका निभाती है।</p>
<p>आईआईएसईआर कोलकाता के पृथ्वी विज्ञान विभाग के डॉ. अभिनंदन घोष कहते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप की भौगोलिक और मौसमीय परिस्थितियाँ पश्चिमी देशों से अलग हैं। इसलिए यहां प्रदूषण को समझने और उससे निपटने की रणनीति भी अलग होनी चाहिए।</p>
<p>वहीं बोस इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर अभिजीत चटर्जी के मुताबिक कोलकाता में सर्दियों के दौरान बायोमास और कचरा जलाना प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं। कम हवा की वजह से ये कण जमीन के पास ही जमा हो जाते हैं।</p>
<h4><strong>नई रणनीति की जरूरत</strong></h4>
<p>रिपोर्ट का निष्कर्ष साफ है। अगर भारत को वाकई साफ हवा चाहिए, तो सिर्फ उत्सर्जन घटाने की नीतियाँ पर्याप्त नहीं होंगी। इसके लिए मौसम आधारित रणनीति भी जरूरी होगी।</p>
<p>रिपोर्ट सुझाव देती है कि राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के अगले चरण में सर्दियों के लिए अलग लक्ष्य, मौसम के हिसाब से प्रदूषण मापने के तरीके, और मौसम बदलते ही सक्रिय होने वाली कार्रवाई योजनाएँ बनाई जाएँ।</p>
<p>क्योंकि कई बार हवा को साफ करने के लिए सिर्फ प्रदूषण कम करना ही नहीं, उसे फैलने की जगह भी देनी पड़ती है और भारत के शहरों में, यह जगह अक्सर मौसम ही तय करता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 11 Mar 2026 17:21:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[  Climate कहानी   ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चंद्र ग्रहण लाइव 2026: मोबाइल पर LIVE कैसे देखें ब्लड मून? जानिए समय और पूरा तरीका</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>नई दिल्ली:</strong> 3 मार्च 2026 को साल का पहला चंद्र ग्रहण लगने वाला है, जो भारत समेत एशिया, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के कई हिस्सों में दिखाई देगा. यह पूर्ण चंद्र ग्रहण होने के कारण चंद्रमा गहरे लाल रंग में बदल जाएगा, जिसे ब्लड मून के नाम से जाना जाता है. भारतीय समयानुसार ग्रहण का स्पर्श दोपहर 3:20 बजे से शुरू होगा, मध्य शाम 5:04 बजे पर रहेगा और मोक्ष शाम 6:47 बजे होगा, कुल अवधि करीब 3 घंटे 27 मिनट की रहेगी.</p>
<p></p>
<p><span class="inline-flex"><em><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>Source: Timeanddate</strong></span></em></span></p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><span class="inline-flex">​</span>भारत में चंद्रमा उगने के बाद ग्रहण का खंडित रूप दिखेगा, खासकर दिल्ली, मुंबई, कोलकाता,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/lunar-eclipse-live-2026-how-to-watch-blood-moon-live/article-18483"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/gemini_generated_image_gixd4dgixd4dgixd.png" alt=""></a><br /><p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>नई दिल्ली:</strong> 3 मार्च 2026 को साल का पहला चंद्र ग्रहण लगने वाला है, जो भारत समेत एशिया, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के कई हिस्सों में दिखाई देगा. यह पूर्ण चंद्र ग्रहण होने के कारण चंद्रमा गहरे लाल रंग में बदल जाएगा, जिसे ब्लड मून के नाम से जाना जाता है. भारतीय समयानुसार ग्रहण का स्पर्श दोपहर 3:20 बजे से शुरू होगा, मध्य शाम 5:04 बजे पर रहेगा और मोक्ष शाम 6:47 बजे होगा, कुल अवधि करीब 3 घंटे 27 मिनट की रहेगी.</p>
<p><iframe style="width:423px;height:236px;" title="YouTube video player" src="https://www.youtube.com/embed/TywJ47LZ-Ic?si=9tn56tNhgJT2xb8A" width="768" height="431" frameborder="0" allowfullscreen=""></iframe></p>
<p><span class="inline-flex"><em><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>Source: Timeanddate</strong></span></em></span></p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><span class="inline-flex">​</span>भारत में चंद्रमा उगने के बाद ग्रहण का खंडित रूप दिखेगा, खासकर दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, पटना जैसे शहरों में शाम के समय आसानी से नजर आएगा. मौसम साफ रहने पर नंगी आंखों से देखा जा सकता है, लेकिन दूरबीन या छोटे टेलिस्कोप से क्रेटर्स और रंग परिवर्तन की बारीकियां ज्यादा साफ दिखेंगी. ग्रहण के दौरान पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है, जिससे चंद्रमा पर पृथ्वी की छाया पड़ती है और सूर्य की रोशनी वायुमंडल से गुजरकर लाल रंग का होता हुआ चंद्रमा पर पड़ता है.</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><img src="https://www.prabhatkhabar.com/_next/image?url=https%3A%2F%2Fwpmedia.prabhatkhabar.com%2Fuploads%2F2026%2F03%2FChandra-Grahan-2026.jpg&amp;w=3840&amp;q=75" alt="Chandra Grahan 2026: खुले आसमान में देखना सुरक्षित है या नहीं? जानें  वैज्ञानिक सच"></img></p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><span class="inline-flex"><em><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>Source: </strong></span></em></span><em><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>Parbhat Khabar</strong></span></em></p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">अगर आसमान बादल छाए हों या आप घर से बाहर न निकलना चाहें, तो मोबाइल पर लाइव स्ट्रीमिंग के जरिए पूरा ग्रहण देख सकते हैं. AfarTV का यूट्यूब चैनल 4K क्वालिटी में लाइव टेलीकास्ट करेगा, जहां पेनुम्ब्रल से टोटल तक सभी चरण दिखेंगे. timeanddate.com भी सुबह 4:30 बजे EST से लाइव कवरेज देगा, जिसमें लॉस एंजिल्स और वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया से रीयल-टाइम व्यूज होंगे. NASA या Virtual Telescope Project जैसे प्लेटफॉर्म पर भी फ्री स्ट्रीम उपलब्ध रहेंगे, बस यूट्यूब ऐप खोलें और 'Lunar Eclipse March 3 2026 live' सर्च करें.</p>
<p><img src="https://static.asianetnews.com/images/w-1280,h-720,imgid-01kj4vaw3xaqd9mh48vta2fsh0,imgname-chandra-grahan-2026-1771836895356.jpg" alt="Chandra Grahan Streaming: 3 मार्च को होगा 2026 का पहला चंद्र ग्रहण, कहां  देखें लाइव स्ट्रीमिंग? | Lunar Eclipse 3 March 2026 Live Stream India Chandra  Grahan Kab Se Kab Tak Rahega"></img></p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><span class="inline-flex"><em><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>Source: </strong></span></em></span><span style="color:rgb(224,62,45);"><em><strong>Asianet</strong></em></span></p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">चंद्र ग्रहण का सूतक काल सुबह 6:20 बजे से शुरू हो जाएगा, जो लगभग 9 घंटे चलेगा, इसलिए गर्भवती महिलाओं को सावधानी बरतनी चाहिए और मंदिर बंद रहेंगे. इस दौरान भोजन-निर्माण, पूजा या नए काम टाल दें, लेकिन ग्रहण देखना सुरक्षित है. होली की पूर्व संध्या पर लग रहा यह ग्रहण खास बनाता है, क्योंकि होलिका दहन के समय ग्रहण प्रभाव में हो सकता है</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/article/environment/lunar-eclipse-live-2026-how-to-watch-blood-moon-live/article-18483</link>
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                <pubDate>Mon, 02 Mar 2026 17:34:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Media Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ईस्टर्न इंडिया के ग्रेनाइट अपलैंड्स में ‘थर्मल रिफ्यूजिया’ की खोज</title>
                                    <description><![CDATA[पूर्वी भारत के ग्रेनाइट अपलैंड्स में किए गए नए फ़ील्ड अध्ययन से पता चला है कि ये पथरीले क्षेत्र गर्मी के दौरान प्राकृतिक थर्मल रिफ्यूजिया का निर्माण करते हैं। झारखंड के संथाल परगना में हुए सर्वेक्षण में पाया गया कि दरारें, झाड़ियाँ और चट्टानी संरचनाएँ तापमान को कम कर जीवों को सुरक्षित माइक्रोहैबिटैट प्रदान करती हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/thermal-refugia-discovered-in-granite-uplands-of-eastern-india/article-18363"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/capture_samridh_1200x720-(7)2.jpeg" alt=""></a><br /><p>पूर्वी भारत के पथरीले, ऊँचाई वाले क्षेत्रों में किए गए एक नए फ़ील्ड अध्ययन से पता चला है कि ग्रेनाइट अपलैंड्स गर्मी के तीखे दौर में प्राकृतिक ‘थर्मल रिफ्यूजिया’—यानी ठंडे, संरक्षित माइक्रोहैबिटैट—बनाते हैं। ये अवलोकन झारखंड के संथाल परगना में किए गए विस्तृत सर्वेक्षणों के दौरान सामने आए, जहाँ कई वन्य प्रजातियाँ अब अपने आवास में तापीय तनाव का सामना कर रही हैं।</p>
<p>अध्ययन के अनुसार, इन पथरीली अपलैंड्स में मौजूद दरारें, छायादार किनारे, घनी झाड़ियाँ और उभरी हुई चट्टानी संरचनाएँ दिन के सबसे गर्म समय में तापमान को कम कर देती हैं। यह सूक्ष्म ताप-अंतर जीवों को जीवित रहने के लिए सुरक्षित स्थान प्रदान करता है। इसे पारिस्थितिकी विज्ञान में ‘थर्मल बफरिंग’ कहा जाता है।</p>
<p>2024–25 की गर्मियों में लगातार रिकॉर्ड किए गए डेटा से यह भी पता चला कि तापमान बढ़ने के साथ कई जीवों में नोक्तर्नल गतिविधि बढ़ गई है, जो संकेत देता है कि लैंडस्केप में थर्मल स्ट्रेस अब एक प्रमुख पारिस्थितिक दबाव बनता जा रहा है।</p>
<p>कुलेश भंडारी का कहना है, “पूर्वी भारत की उच्चभूमि पारिस्थितिकी को केवल बड़े नक्शों से नहीं समझा जा सकता। ग्रेनाइट अपलैंड्स में मौजूद थर्मल रिफ्यूजिया ही वह स्थान हैं, जहाँ कठिन वातावरण में जीवन स्वयं को बचाए रखता है। आने वाले वर्षों के लिए संरक्षण रणनीतियों में इन सूक्ष्म स्थलों को शामिल करना बेहद जरूरी होगा।”</p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>दुमका</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/article/environment/thermal-refugia-discovered-in-granite-uplands-of-eastern-india/article-18363</link>
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                <pubDate>Tue, 24 Feb 2026 17:18:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बिजली ट्रांज़िशन पर नई रिपोर्ट: 21 राज्यों की 21 अलग-अलग रफ्तार</title>
                                    <description><![CDATA[Institute for Energy Economics and Financial Analysis (IEEFA) और Ember की संयुक्त रिपोर्ट Indian States’ Electricity Transition 2026 में बताया गया है कि भारत में बिजली संक्रमण अब एकसमान नहीं बल्कि मल्टी-स्पीड ट्रांजिशन बन चुका है। 21 राज्यों के आकलन में कर्नाटक डीकार्बनाइजेशन में आगे है, जबकि दिल्ली ईवी अपनाने में शीर्ष पर है। रिपोर्ट में नवीकरणीय ऊर्जा, डिस्कॉम सुधार, स्मार्ट मीटर, ग्रीन टैरिफ और ऊर्जा भंडारण जैसे पहलुओं पर राज्यों की प्रगति को रेखांकित किया गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/new-report-on-electricity-transition-21-different-speeds-in-21/article-18331"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/c171db74-4ee8-462b-b3a0-7e9bd110c012_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>दिल्ली में रात भर पंखा चलता है। कर्नाटक में सोलर पार्क चमक रहे हैं। बिहार स्मार्ट मीटर लगा रहा है। राजस्थान ग्रीन टैरिफ सस्ता कर रहा है। भारत की बिजली कहानी अब एक जैसी नहीं रही। यह कई राज्यों की अलग-अलग रफ्तार वाली कहानी बन चुकी है।</p>
<p>नई संयुक्त रिपोर्ट, Institute for Energy Economics and Financial Analysis यानी IEEFA और Ember की, बताती है कि भारत की बिजली व्यवस्था में बदलाव अब कुछ गिने-चुने राज्यों तक सीमित नहीं है। 21 राज्यों का आकलन किया गया, जो देश की 95 प्रतिशत बिजली मांग का प्रतिनिधित्व करते हैं। सभी ने किसी न किसी मोर्चे पर प्रगति की है।</p>
<p>रिपोर्ट का नाम है <em>Indian States’ Electricity Transition 2026</em>। इसमें तीन पैमानों पर राज्यों को परखा गया। पहला, डीकार्बनाइजेशन यानी नवीकरणीय ऊर्जा का हिस्सा और उत्सर्जन तीव्रता। दूसरा, पावर इकोसिस्टम की तैयारी और प्रदर्शन, जैसे डिस्कॉम की स्थिति, सप्लाई की विश्वसनीयता और रूफटॉप सोलर। तीसरा, मार्केट एनएबलर्स, जैसे ईवी, ग्रीन हाइड्रोजन, ग्रीन टैरिफ और ऊर्जा भंडारण।</p>
<p>डीकार्बनाइजेशन के मामले में कर्नाटक शीर्ष पर बना हुआ है। हिमाचल प्रदेश और केरल ने भी अच्छा प्रदर्शन किया है। इन राज्यों में बिजली खरीद में नवीकरणीय ऊर्जा का हिस्सा ज्यादा है और उत्सर्जन तीव्रता अपेक्षाकृत कम। तमिलनाडु, महाराष्ट्र और राजस्थान ने ऊर्जा दक्षता हस्तक्षेपों के चलते सुधार दिखाया है।</p>
<p>पावर इकोसिस्टम की तैयारी में दिल्ली और हरियाणा आगे हैं। इन राज्यों में रूफटॉप सोलर का मजबूत विस्तार हुआ है। बिजली आपूर्ति अपेक्षाकृत विश्वसनीय है और डिस्कॉम प्रदर्शन भी बेहतर। छत्तीसगढ़ ने वित्त वर्ष 2025 में केवल 0.07 प्रतिशत की बिजली कमी दर्ज की, जो बेहद कम है।</p>
<p>बिहार ने इस आयाम में तेजी दिखाई है। मार्च 2025 तक स्वीकृत स्मार्ट मीटरों में से 78 प्रतिशत की स्थापना कर दी गई। असम ने भी 46 प्रतिशत स्मार्ट मीटर इंस्टॉलेशन पूरा किया। डिस्कॉम सुधार और डिजिटाइजेशन को संक्रमण की बुनियाद माना गया है।</p>
<p>मार्केट एनएबलर्स के मोर्चे पर आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान मजबूत प्रदर्शनकर्ता बनकर उभरे हैं। इन राज्यों ने ग्रीन टैरिफ अपनाए हैं और सोलर घंटों के अनुरूप टाइम-ऑफ-डे टैरिफ लागू किए हैं। उत्तर प्रदेश में ईवी तैनाती में तेजी देखी गई है।</p>
<p>दिल्ली ने वित्त वर्ष 2025 में 11.6 प्रतिशत ईवी अपनाने की दर दर्ज की, जो सबसे अधिक है। असम 11 प्रतिशत के साथ करीब है। बिहार ने भी 8.2 प्रतिशत ईवी अपनाने की दर दर्ज की और वित्त वर्ष 2026 के लिए ग्रीन टैरिफ प्रावधान पेश किया है। राज्य ने 2030 तक लगभग 24 गीगावाट नवीकरणीय क्षमता का लक्ष्य रखा है और ऊर्जा भंडारण को शामिल करने के लिए नीलामी प्रक्रिया शुरू की है।</p>
<p>हालांकि तस्वीर पूरी तरह समान नहीं है। पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और झारखंड अभी शुरुआती चरण में माने गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इन राज्यों को संस्थागत क्षमता निर्माण, डिस्कॉम वित्त सुधार और स्पष्ट दीर्घकालिक नीति संकेतों की आवश्यकता है।</p>
<p>IEEFA की साउथ एशिया निदेशक विभूति गर्ग के अनुसार, राज्यों के बीच अंतर स्वाभाविक है। संसाधन, वित्तीय स्थिति, ऐतिहासिक ढांचा और संस्थागत क्षमता अलग-अलग है। आगे की रणनीति राज्य-विशेष अंतर को समझकर बनानी होगी।</p>
<p>Ember की ऊर्जा विश्लेषक रुचिता शाह कहती हैं कि भारत की बिजली यात्रा अब मल्टी-स्पीड ट्रांजिशन बन चुकी है। हर राज्य अलग क्षेत्र में नेतृत्व कर रहा है। इसलिए नीतियां भी लक्ष्यित होनी चाहिए।</p>
<p>साफ है। भारत की बिजली कहानी अब एक लकीर नहीं रही। यह नक्शे पर फैली हुई कई रेखाएं हैं। कहीं सोलर तेज़ है। कहीं डिस्कॉम सुधर रहे हैं। कहीं ईवी सड़कों पर बढ़ रहे हैं।बदलाव हो रहा है। बस उसकी रफ्तार हर राज्य में अलग है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/article/new-report-on-electricity-transition-21-different-speeds-in-21/article-18331</link>
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                <pubDate>Mon, 23 Feb 2026 14:44:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Susmita Rani]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Ring of Fire Solar Eclipse Today: भारत में दिखेगा या रहेगा अदृश्य? इस दिन आएगा ब्लड मून</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>वॉशिंगटन: </strong>17 फरवरी 2026 को लगने वाला सूर्य ग्रहण यानी आज पूरी दुनिया के कुछ हिस्सों में आसमान में रिंग ऑफ फायर का शानदार नजारा पेश कर रहा है। यह वलयाकार सूर्य ग्रहण है, जहां चंद्रमा सूर्य को पूरी तरह ढक नहीं पाता और उसके चारों ओर आग का छल्ला बनता दिखाई देता है।<span class="inline-flex">​</span></p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">यह ग्रहण अंटार्कटिका के बर्फीले इलाकों में पूरी तरह दिखेगा, जबकि दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका के टिप्स, हिंद महासागर और दक्षिणी अफ्रीका के हिस्सों में आंशिक रूप से नजर आएगा। भारत में यह सूर्य ग्रहण कहीं दिखाई नहीं देगा, लेकिन खगोल प्रेमियों को निराश होने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/ring-of-fire-solar-eclipse-today-will-be-visible-or/article-18194"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/gemini_generated_image_l1t8jbl1t8jbl1t8.jpg" alt=""></a><br /><p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>वॉशिंगटन: </strong>17 फरवरी 2026 को लगने वाला सूर्य ग्रहण यानी आज पूरी दुनिया के कुछ हिस्सों में आसमान में रिंग ऑफ फायर का शानदार नजारा पेश कर रहा है। यह वलयाकार सूर्य ग्रहण है, जहां चंद्रमा सूर्य को पूरी तरह ढक नहीं पाता और उसके चारों ओर आग का छल्ला बनता दिखाई देता है।<span class="inline-flex">​</span></p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">यह ग्रहण अंटार्कटिका के बर्फीले इलाकों में पूरी तरह दिखेगा, जबकि दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका के टिप्स, हिंद महासागर और दक्षिणी अफ्रीका के हिस्सों में आंशिक रूप से नजर आएगा। भारत में यह सूर्य ग्रहण कहीं दिखाई नहीं देगा, लेकिन खगोल प्रेमियों को निराश होने की जरूरत नहीं क्योंकि कुछ ही दिनों में एक और खास खगोलीय घटना का इंतजार है।</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>वलयाकार सूर्य ग्रहण की खासियतें</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">वलयाकार सूर्य ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा पृथ्वी से थोड़ा दूर होने के कारण छोटा नजर आता है और सूर्य के बीच में एक चमकीला गोला छोड़ देता है। आज के ग्रहण की अधिकतम अवधि अंटार्कटिका के कॉर्डिया स्टेशन पर करीब 2 मिनट 5 सेकंड रहेगी, जहां 92% तक सूर्य ढकेगा। दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन जैसे शहरों में यह सिर्फ 5% तक दिखेगा। सूर्य ग्रहण देखने के लिए आंखों की सुरक्षा जरूरी है, इसलिए विशेष चश्मे या उपकरणों का इस्तेमाल करें।<span class="inline-flex">​</span></p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>3 मार्च को पूर्ण चंद्र ग्रहण</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">सूर्य ग्रहण के ठीक 14 दिन बाद 3 मार्च 2026 को पूर्ण चंद्र ग्रहण लगेगा, जो भारत समेत दुनिया के बड़े हिस्से में दिखाई देगा। यह चंद्र ग्रहण होली की पूर्व संध्या पर होगा और चांद को लाल या नारंगी रंग में रंग देगा, जिसे ब्लड मून कहा जाता है। पूर्ण चरण लगभग 1 घंटे 12 मिनट चलेगा, और भारत में यह शाम 5 बजे के आसपास शुरू होकर रात 9 बजे तक रहेगा।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">चंद्र ग्रहण तब लगता है जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है, जिससे पृथ्वी की छाया चांद पर पड़ती है। इसकी अंब्रा छाया में चांद पूरी तरह ढक जाता है लेकिन गायब नहीं होता, बल्कि सूर्य की रोशनी का अपवर्तन होने से लालिमा छा जाती है। अच्छी बात यह है कि चंद्र ग्रहण को नंगी आंखों से सुरक्षित देखा जा सकता है, बिना किसी विशेष उपकरण के।</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>भारत में चंद्र ग्रहण का समय</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">भारत के विभिन्न राज्यों में चंद्र ग्रहण का समय थोड़ा अलग होगा। अंडमान निकोबार में पूर्ण ग्रहण दोपहर 5:18 बजे IST से शुरू होगा, जबकि आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में आंशिक चरण शाम 5:55 बजे दिखेगा। दिल्ली, मुंबई और पटना समेत उत्तर भारत में यह शाम 6 बजे के करीब शुरू होकर रात 9:30 बजे तक चलेगा। मौसम साफ रहने पर पूरे देश में यह नजारा आसानी से देखा जा सकेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 17 Feb 2026 14:48:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Media Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>2026 का पहला सूर्यग्रहण: Ring of Fire दिखेगा आसमान में, जानें समय और कहां दिखेगा</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>वॉशिंगटन: </strong>17 फरवरी 2026 को साल का पहला सूर्यग्रहण धरती पर दिखाई देगा, जो खास वलयाकार प्रकार का होगा और आसमान में सूरज को 'रिंग ऑफ फायर' यानी आग के छल्ले जैसा बना देगा. यह दुर्लभ खगोलीय घटना तब घटित होती है जब चंद्रमा पृथ्वी से अपने सबसे दूर वाले बिंदु पर होता है, जिससे वह सूर्य को पूरी तरह ढक नहीं पाता और सूर्य की बाहरी परत चमकती हुई नजर आती है. दुनिया भर के वैज्ञानिक और ग्रहण प्रेमी इस नजारे को कैद करने की तैयारी में जुटे हैं, हालांकि यह सीमित जगहों पर ही दिखेगा.</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>ग्रहण का समय</strong></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/the-first-solar-eclipse-of-2026-will-see-the-ring/article-18075"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/gemini_generated_image_b044jhb044jhb044.jpg" alt=""></a><br /><p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>वॉशिंगटन: </strong>17 फरवरी 2026 को साल का पहला सूर्यग्रहण धरती पर दिखाई देगा, जो खास वलयाकार प्रकार का होगा और आसमान में सूरज को 'रिंग ऑफ फायर' यानी आग के छल्ले जैसा बना देगा. यह दुर्लभ खगोलीय घटना तब घटित होती है जब चंद्रमा पृथ्वी से अपने सबसे दूर वाले बिंदु पर होता है, जिससे वह सूर्य को पूरी तरह ढक नहीं पाता और सूर्य की बाहरी परत चमकती हुई नजर आती है. दुनिया भर के वैज्ञानिक और ग्रहण प्रेमी इस नजारे को कैद करने की तैयारी में जुटे हैं, हालांकि यह सीमित जगहों पर ही दिखेगा.</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>ग्रहण का समय और अवधि</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">नासा के अनुसार, वलयाकार चरण सुबह करीब 7:12 बजे अमेरिकी समय से शुरू होगा और पूर्ण रूप से 1 मिनट 52 सेकंड तक चलेगा, जिसमें चंद्रमा की छाया सूर्य पर पड़ने से रिंग इफेक्ट बनेगा. अंटार्कटिका के कॉर्डिया स्टेशन पर यह ग्रहण स्थानीय समयानुसार शाम 6:48 बजे आंशिक रूप से शुरू होगा, वलयाकार चरण 7:46 बजे आरंभ होकर 2 मिनट 5 सेकंड चलेगा और 8:45 बजे समाप्त होगा. अधिकतम कवरेज 92.46% रहेगा, जो इसकी तीव्रता दर्शाता है.<span class="inline-flex">​</span></p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>दिखाई कहां देगा ?</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">यह रिंग ऑफ फायर का नजारा मुख्य रूप से अंटार्कटिका के हिस्सों में दिखेगा, जहां बर्फीले इलाकों में पेंगुइन जैसे जीव भी इस असामान्य दृश्य से भ्रमित हो सकते हैं. आंशिक ग्रहण दक्षिण अमेरिका के चिली और अर्जेंटीना के दक्षिणी छोर, दक्षिण अफ्रीका, मोजाम्बिक, मैडागास्कर सहित प्रशांत, अटलांटिक और हिंद महासागर के कुछ भागों में नजर आएगा. केप टाउन में यह दोपहर 2:01 से 3:24 बजे तक दिखेगा, जिसमें अधिकतम 5.19% कवरेज होगा, जबकि मारियन द्वीप पर 47.62% तक.</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>भारत में स्थिति</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">भारत से इस सूर्यग्रहण को सीधे नहीं देखा जा सकेगा, क्योंकि इसका पथ अंटार्कटिका से गुजर रहा है. हालांकि, ज्योतिषीय दृष्टि से सूतक काल मान्य हो सकता है, जो दोपहर 3:26 बजे से शाम 7:57 बजे तक चलेगा, क्योंकि यह कुंभ राशि और धनिष्ठा नक्षत्र में लगेगा. ग्रहण के दौरान गर्भवती महिलाओं और बच्चों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है.</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>सूर्यग्रहण कैसे होता है?</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">सूर्यग्रहण तब पड़ता है जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है, जो खगोलीय ज्यामिति का कमाल है. चंद्रमा का आकार सूर्य से 400 गुना छोटा है, लेकिन दूरी भी उतनी ही कम होने से दोनों आकाश में एक समान दिखते हैं. इस संयोग से चंद्रमा सूर्य को ढक लेता है, और वलयाकार मामलों में रिंग बन जाती है.<span class="inline-flex">​</span></p>
<h5 class="mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end font-sans visRefresh2026AnswerSerif:font-editorial font-semimedium visRefresh2026Fonts:font-bold text-base visRefresh2026Fonts:text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>देखने वाले स्टेशन</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">अंटार्कटिका में केवल दो रिसर्च स्टेशन इस पूर्ण वलयाकार नजारे के रास्ते पर हैं - कॉर्डिया स्टेशन और अन्य वैज्ञानिक ठिकाने, जहां वैज्ञानिक इस घटना का अध्ययन करेंगे. केसी स्टेशन पर 91.29% तक कवरेज होगा, लेकिन सूर्यास्त के साथ समाप्त.</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 12 Feb 2026 15:59:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Media Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मध्य प्रदेश के कूनो पार्क में फिर गूंजी खुशखबरी, चीता आशा बनी मां</title>
                                    <description><![CDATA[कूनो राष्ट्रीय उद्यान में मादा चीता आशा ने पांच शावकों को जन्म देकर चीता संरक्षण अभियान को नई सफलता दिलाई है। सभी शावक स्वस्थ हैं और विशेषज्ञ टीम उनकी निगरानी कर रही है। इस उपलब्धि से पार्क में चीतों की संख्या बढ़ गई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/good-news-again-echoed-in-kuno-park-madhya-pradesh/article-17918"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/3b43403d144b2e537f0994abf28f5a4a_1386755279_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>श्योपुर :</strong> मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित कूनो राष्ट्रीय उद्यान में मादा चीता आशा ने पांच स्वस्थ शावकों को जन्म दिया है। इस उपलब्धि के साथ भारत में जन्मे चीता शावकों की संख्या बढ़कर 24 हो गई है।<br /><br />मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने शनिवार को सोशल मीडिया पर उक्त जानकारी साझा करते हुए एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें मादा चीता आशा अपने शावकों के साथ बैठी हुई है। उन्होंने इसे प्रदेश और देश के लिए गौरव का विषय बताया और वन विभाग, फील्ड स्टाफ तथा पशु चिकित्सकों की भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि लगातार निगरानी और वैज्ञानिक प्रबंधन का ही नतीजा है कि कूनो में चीते सुरक्षित माहौल में प्रजनन कर रहे हैं।<br /><br />डीएफओ आर थिरूकुरल ने बताया कि आशा और उसके सभी शावक स्वस्थ्य हैं। कूनों के डॉक्टरों की टीम उसकी निगरानी कर रही है। कूनो नेशनल पार्क में लगातार मिल रही सफलताएं चीता पुनर्स्थापना परियोजना की प्रभावशीलता को दर्शाती हैं। यह उचित निगरानी, वैज्ञानिक प्रबंधन और समर्पित टीमवर्क से वन्यजीव संरक्षण लक्ष्यों को प्राप्त करने की क्षमता को भी प्रमाणित करता है।<br /><br />गौरतलब है कि कूनो उद्यान में पहले से 27 चीते मौजूद थे। नए शावकों के जन्म के बाद पार्क में चीतों की संख्या बढ़कर 32 हो गई है, जबकि प्रदेश में चीतों की संख्या कुल 35 पहुंच गई है। इनमें से तीन चीते फिलहाल मंदसौर जिले के गांधी सागर अभयारण्य में मौजूद हैं। यह देश की चीता संरक्षण यात्रा के लिए एक महत्वपूर्ण सफलता है।<br /><br />आगामी 28 फरवरी को कूनो नेशनल पार्क में दक्षिण अफ्रीका और बोत्सवाना से आठ और चीतों को लाया जाना प्रस्तावित है। उससे पहले शावकों का जन्म होना चीता परियोजना के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार यह संकेत है कि कूनो का पर्यावरण चीता जैसे संवेदनशील वन्यजीव के लिए पूरी तरह अनुकूल बन चुका है। इससे न केवल कूनो की जैव विविधता को मजबूती मिलेगी, बल्कि भारत में चीता आबादी को भी नया विस्तार मिलेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                            <category>मध्य-प्रदेश</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/article/environment/good-news-again-echoed-in-kuno-park-madhya-pradesh/article-17918</link>
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                <pubDate>Sat, 07 Feb 2026 16:54:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
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