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                <title>धर्म - Samridh Jharkhand</title>
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                <description>धर्म RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>17 मई से शुरू होगा अधिकमास, विवाह और मांगलिक कार्यों पर लगेगा विराम</title>
                                    <description><![CDATA[17 मई 2026 से अधिकमास शुरू होने जा रहा है, जिसके कारण 15 जून तक विवाह और अन्य मांगलिक कार्य वर्जित रहेंगे। ज्योतिषाचार्य प्रणव मिश्रा के अनुसार अधिकमास को मलमास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। इस दौरान शुभ कार्य नहीं किए जाते।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/religion/adhikmaas-2026-vivah-muhurat-shani-jayanti-news/article-21477"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-05/74c3a84e-e35d-474d-80fa-755dc984b9db_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>प्रत्येक तीन वर्ष में एक बार अधिकमास आता है। इस वर्ष अधिकमास ज्येष्ठ माह में पड़ रहा है। ज्येष्ठ माह अधिकमास होने के कारण शादी-विवाह के लिए बहुत कम लग्न पड़ रहे हैं। प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य प्रणव मिश्रा ने बताया कि ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की द्वादशी से अमावस्या तक मासांत दोष रहेगा। मासांत दोष के कारण शादी-विवाह वर्जित माने गए हैं।</p>
<p>उन्होंने बताया कि 16 मई को ज्येष्ठ अमावस्या तिथि पड़ रही है। अमावस्या में गुरु और शुक्र अस्त होने के कारण विवाह जैसे मांगलिक कार्य निषिद्ध माने जाते हैं। इसके अगले दिन 17 मई से ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर 15 जून तक अधिकमास रहेगा। विभिन्न हिंदू पंचांगों और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अधिकमास में शादी-विवाह, गृह प्रवेश और अन्य शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं।</p>
<h3><strong>अधिकमास से 20 दिन आगे खिसकेंगे पर्व-त्योहार</strong></h3>
<p>आचार्य प्रणव मिश्रा ने बताया कि अधिकमास को मलमास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। इस दौरान सभी प्रकार के शुभ और मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। अधिकमास के कारण इस बार रक्षाबंधन, गणेश चतुर्थी, पितृपक्ष, शारदीय नवरात्र, दीपावली और छठ जैसे प्रमुख पर्व 15 से 20 दिन की देरी से मनाए जाएंगे। इसी वजह से हिंदू नववर्ष विक्रम संवत 2083 इस बार 13 महीने का होगा।</p>
<h3><strong>16 मई को ज्येष्ठ अमावस्या और शनि जयंती</strong></h3>
<p>हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार इस वर्ष ज्येष्ठ अमावस्या के दिन ही शनि जयंती का दुर्लभ संयोग बन रहा है। पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ अमावस्या तिथि 15 मई को रात्रि 3:51 बजे शुरू होगी और 16 मई को रात्रि 1:36 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार 16 मई, शनिवार को व्रत, पूजा और दान-पुण्य करना अत्यंत शुभ माना गया है।</p>
<h3><strong>17 जून से फिर शुरू होंगे विवाह मुहूर्त</strong></h3>
<p>ज्योतिषाचार्य प्रणव मिश्रा के अनुसार अधिकमास समाप्त होने के बाद 17 जून 2026 से पुनः शादी-विवाह के शुभ मुहूर्त शुरू हो जाएंगे। जून में 19, 20, 21, 22, 23, 24, 25, 26, 27, 28, 29 और 30 जून को विवाह एवं अन्य मांगलिक कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त हैं। वहीं जुलाई में 1, 2, 6, 7, 8 और 11 जुलाई तक विवाह लग्न रहेंगे।</p>
<h3><strong>नवंबर और दिसंबर में विवाह के शुभ मुहूर्त</strong></h3>
<p><strong>नवंबर:</strong> 20, 21, 24, 25, 26 और 30<br /><strong>दिसंबर:</strong> 1, 2, 3, 4, 5, 7, 9, 10, 11 और 12</p>
<h3><strong>देवशयनी एकादशी से फिर रुकेगा विवाह कार्य</strong></h3>
<p>25 जुलाई 2026 को देवशयनी एकादशी के साथ भगवान विष्णु चतुर्मास के लिए योगनिद्रा में चले जाएंगे। इसके बाद चार महीनों तक विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्य वर्जित रहेंगे। 20 नवंबर 2026 को देवउठनी एकादशी के बाद पुनः विवाह कार्य प्रारंभ होंगे।</p>
<h3><strong>क्यों लगता है अधिकमास?</strong></h3>
<p>हिंदू पंचांग सूर्य और चंद्रमा की गति पर आधारित होता है। सौर और चंद्र वर्ष के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर होता है। इसी अंतर को संतुलित करने के लिए हर 32 महीने, 16 दिन और 8 घंटे बाद एक अतिरिक्त माह जोड़ा जाता है, जिसे अधिकमास कहा जाता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 16 May 2026 16:21:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Acharya Pranav Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चारधाम यात्रा: 10 दिन में 4 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने किए दर्शन, केदारनाथ में सबसे ज्यादा भीड़</title>
                                    <description><![CDATA[चारधाम यात्रा के पहले दस दिनों में 4 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने दर्शन किए हैं। राज्य सरकार ने यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा के लिए व्यापक व्यवस्थाएं सुनिश्चित की हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/latest-news/chardham-yatra-2026-four-lakh-devotees-visit-in-10-days-kedarnath-badrinath-yamunotri-gangotri-update/article-20837"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/chatgpt-image-mar-7,-2026,-06_55_54-pm.png" alt=""></a><br /><p>देहरादून। प्रदेश में चारधाम यात्रा सुचारु रूप से चल रही है। राज्य सरकार ने यात्रियों की सुविधा एवं सुरक्षा के लिए व्यापक व्यवस्थाएं सुनिश्चित की हैं। कपाट खुलने से लेकर 28 अप्रैल, 2026 की सायं 7 बजे तक मात्र दस दिन में कुल 4 लाख 8 हजार 401 श्रद्धालु चारो धामों में दर्शन के लिए पहुंचे हैं।<br /><br />चारधाम यात्रा के दौरान यात्रियों, श्रद्धालुओं एवं स्थानीय नागरिकों को किसी प्रकार की असुविधा न हो, इसके लिए चारधाम यात्रा मार्गों सहित प्रमुख धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों पर पेयजल, शौचालय, स्वास्थ्य सेवाएं, स्वच्छता, पार्किंग एवं यातायात व्यवस्थाओं को सुदृढ़ एवं व्यवस्थित किया गया है। राज्य सरकार ने यात्रा व्यवस्थाओं के संबंध में भ्रामक जानकारी प्रसारित करने वालों तथा गंदगी फैलाने वालों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं, ताकि यात्रा की पवित्रता एवं व्यवस्थाएं बनी रहें। राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र, देहरादून से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार चारधाम कपाट खुलने से 28 अप्रैल, 2026 की सांय 7 बजे तक मात्र दस दिनों में कुल 4 लाख 8 हजार 401 श्रद्धालु चारधाम में दर्शन के लिए पहुंचे हैं।<br /><br />राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र के अनुसार अब तक यमुनोत्री धाम में 57,794, गंगोत्री में 57,863, केदारनाथ धाम में 2,07,452 और बदरीनाथ धाम में 84,942 श्रद्धालु ने दर्शन कर चुके हैं। इसके अतिरिक्त गौमुख में अब तक 440 यात्री पहुंचे हैं। वर्तमान यात्रा सीजन में अब तक कुल 64,115 वाहन यात्रियों को लेकर चारधाम पहुंचे हैं। राज्य सरकार ने सभी संबंधित विभागों के समन्वय से यात्रा को सुरक्षित, सुगम एवं व्यवस्थित बनाने के निर्देश दिए हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ताज़ा खबरें </category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 17:31:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Media Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अक्षय तृतीया 2026: दस शुभ संयोगों के बीच दो दिन मनाया जाएगा पर्व, जानें समय और तिथि </title>
                                    <description><![CDATA[<p>इस बार अक्षय तृतीया दस दुर्लभ शुभ संयोगों के साथ दो दिन मनाई जाएगी। तिथि के कारण लोगों में असमंजस है, लेकिन 19 और 20 अप्रैल को अलग-अलग धार्मिक और मांगलिक कार्यक्रमों की खास तैयारी की जा रही है।</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/religion/akshaya-tritiya-2026-two-days-celebration-ten-auspicious-yog-19-and-20-april-wedding-and-rituals/article-20624"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-04/4875821_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>समृद्ध डेस्क: </strong>वैशाख शुक्ल तृतीया के पावन अवसर पर इस वर्ष अक्षय तृतीया दो दिन मनाई जाएगी, जिससे श्रद्धालुओं और आयोजकों में विशेष उत्साह है। 19 अप्रैल को सुबह 10.50 बजे से तृतीया प्रारंभ होकर 20 अप्रैल को सुबह 7.28 बजे तक रहेगी।<br /><br />दुर्लभ योगों के चलते शहर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में इसे अबूझ मुहूर्त मानते हुए बड़े स्तर पर आयोजन किए जा रहे हैं। अनुमान है कि इस दौरान पांच सौ से अधिक विवाह समारोह संपन्न होंगे, जिससे 20 अप्रैल को शादियों की खास धूम रहेगी। तृतीया तिथि दो दिनों में पडऩे के कारण आमजन में तिथियों को लेकर कुछ असमंजस की स्थिति बनी हुई है। हालांकि, परंपराओं के अनुसार 19 अप्रैल को पूजा-अर्चना, धार्मिक अनुष्ठान और मंदिरों में विशेष दर्शन किए जाएंगे। वहीं 20 अप्रैल को विवाह, यज्ञोपवीत संस्कार और सामूहिक मांगलिक कार्यक्रम आयोजित होंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 18:03:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Media Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Dumka News: मयूरनाथ में भव्य कलश शोभा यात्रा के साथ सप्तदिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का शुभारंभ</title>
                                    <description><![CDATA[रामगढ़ प्रखंड के मयूरनाथ में राधा-कृष्ण मंदिर परिसर में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का शुभारंभ भव्य कलश शोभा यात्रा के साथ हुआ। करीब 1551 महिलाओं और कन्याओं ने पारंपरिक वेशभूषा में कलश धारण कर 3 किलोमीटर लंबी यात्रा निकाली।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/dumka/dumka-news-inauguration-of-seven-day-shrimad-bhagwat-katha-with-grand/article-20502"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-04/752269d4-49b4-407e-9580-2db333467a5d_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>दुमका:</strong> रामगढ़ प्रखंड अंतर्गत मयूरनाथ में राधा-कृष्ण मंदिर परिसर में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का शुभारंभ शनिवार को हुआ। यह आयोजन भव्य कलश शोभा यात्रा के साथ शुरू हुआ, जिसमें सैकड़ों महिलाओं और कन्याओं ने भाग लिया। गांव के युवाओं के सहयोग से आयोजित इस धार्मिक कार्यक्रम से पूरे क्षेत्र में भक्तिमय माहौल बन गया।</p>
<p>कलश शोभा यात्रा की शुरुआत मयूरनाथ राधा-कृष्ण मंदिर प्रांगण से हुई। यहां से पारंपरिक वेशभूषा में करीब 1551 महिलाओं और कन्याओं ने सिर पर कलश धारण कर पूरे रामगढ़ मुख्य बाजार का भ्रमण किया। यह शोभा यात्रा राधा-कृष्ण मंदिर से प्रारंभ होकर जोगिया, रामगढ़ मुख्य चौक होते हुए प्रखंड मुख्यालय से लगभग 100 मीटर दूर सारमी के पवित्र सरोवर पहुंची, जहां विधिवत पूजा-अर्चना के साथ कलश में अभिमंत्रित जल भरा गया।</p>
<p>इसके बाद शोभा यात्रा लगभग 3 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए पुनः राधा-कृष्ण मंदिर परिसर स्थित भागवत कथा ज्ञान यज्ञ स्थल पर समाप्त हुई। इस दौरान ‘राधे-राधे’ के जयकारों से पूरा माहौल गूंज उठा।</p>
<p>शोभा यात्रा के दौरान युवाओं ने कलश लेकर चल रही महिलाओं और कन्याओं के लिए पेयजल तथा शरबत की व्यवस्था की थी। श्रद्धालु भी पूरे मार्ग में शोभा यात्रा के साथ चलते रहे, जिससे दृश्य अत्यंत आकर्षक और भक्तिमय बन गया।</p>
<p>बग्गी पर विराजमान कथा वाचिका के रूप में पूज्य महामंडलेश्वर स्वामी माँ ध्यानमूर्ति गिरी जी महाराज (श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी) श्रद्धालुओं का अभिवादन कर रही थीं। मुख्य यजमान के रूप में जयप्रकाश राय एवं उनकी धर्मपत्नी उपस्थित रहे।</p>
<p>कलश शोभा यात्रा के दौरान स्कूली बच्चों में भी उत्साह देखने को मिला। भीषण गर्मी को देखते हुए बच्चों ने शोभा यात्रा में शामिल माताओं और बहनों को शीतल पेयजल, नींबू पानी, रसना और फ्रूटी वितरित किए।</p>
<p>भागवत कथा पंडाल पहुंचने के बाद, कलश यात्रा में शामिल महिलाओं और कन्याओं को मंच पर उपस्थित पंडित द्वारा अक्षत प्रदान कर मंत्रोच्चारण के साथ विधिवत पूजा कराई गई। इसके बाद सभी कलशों को मंच के समीप स्थापित किया गया।</p>
<p>पुरोहित की उपस्थिति में यजमान द्वारा वैदिक रीति-रिवाज से पूजा-अर्चना संपन्न हुई। भागवत कथा 11 अप्रैल शनिवार से 17 अप्रैल तक प्रतिदिन संध्या 7 बजे से आयोजित की जाएगी। वहीं, 18 अप्रैल को हवन, पूर्णाहुति एवं भंडारा के साथ कथा का समापन होगा।</p>
<p>इस आयोजन को लेकर पूरे प्रखंड क्षेत्र में उत्साह और श्रद्धा का माहौल है। शोभा यात्रा के दौरान सुरक्षा व्यवस्था के लिए पुलिस बल की गश्ती भी देखी गई।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>दुमका</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 15:55:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हनुमान जयंती: भक्ति, शक्ति और समर्पण का अद्भुत संगम</title>
                                    <description><![CDATA[हनुमान जयंती हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो भगवान हनुमान के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व भक्ति, शक्ति, समर्पण और निष्ठा का प्रतीक है। हनुमान जी का जीवन हमें साहस, सेवा और विनम्रता का संदेश देता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/religion/hanuman-jayanti-bhakti-shakti-samarpan-mahatva/article-19780"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-04/images_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>महेन्द्र तिवारी</strong></p>
<p>हनुमान जयन्ती का पावन पर्व हिंदू धर्मानुयायियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी उत्सव है। यह दिन भगवान श्रीराम के परम भक्त हनुमान जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है, जो शक्ति, भक्ति, निष्ठा और त्याग के प्रतीक हैं। यह पर्व हर वर्ष चैत्र मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है, और वर्ष 2026 में यह 2 अप्रैल को है। हनुमान जी का चरित्र अद्भुत है, क्योंकि वे एक ओर असीम बल के स्वामी हैं तो दूसरी ओर विनम्रता की प्रतिमूर्ति। वे शिव के ग्यारहवें रुद्र अवतार माने जाते हैं, जिनका जन्म पवन देव के आशीर्वाद से हुआ, इसलिए वे पवनपुत्र कहलाए। उनके जन्म की कथा अत्यंत प्रेरणादायक है, जिसमें माता अंजना की तपस्या और भगवान शिव का वह अंश समाहित है जो संसार को बुराइयों से मुक्ति दिलाने के लिए अवतरित हुआ। हनुमान जी के बचपन की वह कथा आज भी बच्चों से लेकर वृद्धों तक के मन में रोमांच भर देती है, जब उन्होंने सूर्य देव को एक लाल फल समझकर निगलने का प्रयास किया था। यह घटना उनके उस अदम्य साहस और अलौकिक क्षमता का प्रतीक है, जो सीमाओं से परे है। इंद्र के वज्र प्रहार से उनकी ठुड्डी पर लगी चोट ने उन्हें 'हनुमान' नाम दिया, लेकिन उसी क्षण देवताओं द्वारा मिले वरदानों ने उन्हें अपराजेय बना दिया। ब्रह्मा जी ने उन्हें लंबी आयु का वरदान दिया, तो अग्नि ने उन्हें आग से न जलने का और वरुण ने जल से सुरक्षित रहने का आशीष दिया। ये वरदान केवल व्यक्तिगत सिद्धियाँ नहीं थीं, बल्कि भविष्य में होने वाले धर्म और अधर्म के युद्ध की तैयारी थी। हनुमान जयंती पर जब हम उनके जीवन का स्मरण करते हैं, तो उनकी शिक्षा-दीक्षा का प्रसंग भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने सूर्य देव से वेदों का ज्ञान प्राप्त किया और व्याकरण में इतनी निपुणता हासिल की कि वे 'महाव्याकरण' कहलाए। उनका व्यक्तित्व बल और बुद्धि के विलक्षण समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है।</p>
<p>रामचरितमानस और रामायण में हनुमान जी की भूमिका एक ऐसे सेतु की तरह है, जो विरक्त को अनुराग से और भक्त को भगवान से जोड़ती है। ऋष्यमूक पर्वत पर जब उनकी भेंट श्री राम से हुई, तो वह मिलन इतिहास का सबसे पवित्र मिलन बन गया। एक साधारण वानर के वेश में वे अपने प्रभु के पास गए, लेकिन राम की पारखी नजरों ने पहचान लिया कि यह कोई साधारण जीव नहीं है। इसके बाद हनुमान जी का पूरा जीवन राममय हो गया। हनुमान जयंती के इस अवसर पर उनके द्वारा किए गए अद्भुत कार्यों का विश्लेषण करना आवश्यक है। समुद्र लांघने की उनकी क्षमता हमें सिखाती है कि यदि आत्मविश्वास दृढ़ हो, तो सौ योजन का विशाल सागर भी छोटा पड़ जाता है। लंका में अशोक वाटिका के भीतर माता सीता की खोज करना और उन्हें प्रभु राम की मुद्रिका देना उनके धैर्य और बुद्धिमानी की पराकाष्ठा थी। उन्होंने लंका दहन के माध्यम से रावण के अहंकार की लंका को भस्म किया, जो यह संदेश देता है कि अधर्म कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, सत्य की एक लौ उसे राख करने के लिए पर्याप्त है। हनुमान जी का 'सुंदरकांड' केवल एक अध्याय नहीं है, बल्कि वह जीवन के हर मोड़ पर हार रहे मनुष्य के लिए विजय का मंत्र है। लक्ष्मण के प्राणों की रक्षा के लिए जब वे द्रोणागिरि पर्वत उठाने गए, तो वे केवल एक जड़ी-बूटी नहीं लाए, बल्कि उन्होंने सिद्ध कर दिया कि श्रद्धा के मार्ग पर असंभव शब्द का कोई स्थान नहीं है। यदि औषधि की पहचान नहीं हो सकी, तो उन्होंने पूरे पर्वत को ही उठा लिया—यह उनके निर्णय लेने की क्षमता और कार्य के प्रति अटूट समर्पण को दर्शाता है।</p>
<p>हनुमान जयंती की पूजा विधि और इसमें निहित प्रतीकों का भी गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। भक्त मंदिरों में जाकर हनुमान जी को सिंदूर अर्पित करते हैं। इसके पीछे वह प्रसिद्ध कथा है जिसमें उन्होंने माता सीता को अपनी मांग में सिंदूर लगाते देखा था और जब उन्हें पता चला कि यह श्री राम की लंबी आयु के लिए है, तो उन्होंने अपने पूरे शरीर पर ही सिंदूर मल लिया। यह निश्छल भक्ति का वह स्वरूप है जहाँ भक्त अपने आराध्य की प्रसन्नता के लिए स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर देता है। हनुमान चालीसा का पाठ, जो गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित है, आज दुनिया के कोने-कोने में गूंजता है। इसकी हर पंक्ति में एक विशेष ऊर्जा है। 'भूत पिशाच निकट नहीं आवै' जैसी पंक्तियाँ मनुष्य को अज्ञात भय से मुक्ति दिलाती हैं। हनुमान जयंती पर भंडारों का आयोजन और 'बूंदी के लड्डू' का भोग सामाजिक समरसता का प्रतीक है, जहाँ समाज के हर वर्ग के लोग एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि शक्ति का उपयोग सदैव रक्षा और सेवा के लिए होना चाहिए। हनुमान जी चाहते तो स्वयं रावण का वध कर सकते थे, उनमें इतनी सामर्थ्य थी, लेकिन उन्होंने सदैव अपने प्रभु की आज्ञा का पालन किया और खुद को एक सेवक के रूप में ही प्रस्तुत किया। उनकी यह विनम्रता आज के आधुनिक युग के लिए एक बहुत बड़ी सीख है, जहाँ थोड़े से अधिकार मिलते ही मनुष्य अहंकार से भर जाता है।</p>
<p>आधुनिक संदर्भ में हनुमान जयंती की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। आज का मनुष्य मानसिक तनाव, अवसाद और आत्मविश्वास की कमी से जूझ रहा है। हनुमान जी का व्यक्तित्व हमें आत्मविश्वास का पाठ पढ़ाता है। जामवंत जी द्वारा हनुमान जी की सोई हुई शक्ति को याद दिलाना इस बात का प्रतीक है कि हम सबके भीतर अनंत शक्तियाँ छिपी हैं, बस हमें एक सही दिशा और आत्मबोध की आवश्यकता है। हनुमान जयंती पर अखाड़ों में होने वाले आयोजन हमें शारीरिक स्वास्थ्य और अनुशासन के प्रति सचेत करते हैं। वे ब्रह्मचर्य के पालक हैं, जो इंद्रिय निग्रह और मानसिक एकाग्रता का मार्ग है। विद्यार्थी जीवन के लिए हनुमान जी का चरित्र आदर्श है क्योंकि वे एक कुशल वक्ता, चतुर कूटनीतिज्ञ और एकाग्रचित्त साधक हैं। उनकी पूजा करने से व्यक्ति को केवल धार्मिक लाभ नहीं मिलता, बल्कि उसे अनुशासन, समयबद्धता और निष्ठा की भी प्रेरणा मिलती है। हनुमान जी 'अष्टसिद्धि और नवनिधि' के दाता हैं, लेकिन वे ये सिद्धियाँ केवल उसे प्रदान करते हैं जो धर्म के मार्ग पर अडिग रहता है। वे 'चिरंजीवी' हैं, जिसका अर्थ है कि वे हर युग में विद्यमान हैं। ऐसी मान्यता है कि जहाँ भी रामकथा होती है, वहाँ हनुमान जी किसी न किसी रूप में अदृश्य रूप से उपस्थित रहते हैं। यह अटूट विश्वास ही भक्तों को कठिन से कठिन समय में भी संबल प्रदान करता है।</p>
<p>हनुमान जयंती का उत्सव भारत के विभिन्न प्रांतों में अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है, जो देश की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है। उत्तर भारत में जहाँ चैत्र पूर्णिमा का महत्व है, वहीं दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में इसे मार्गशीर्ष माह में मनाया जाता है। तमिलनाडु और केरल में इसे 'हनुमत जयंती' के रूप में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। तिथियों के भेद के बावजूद, भाव एक ही है उस महाशक्ति की वंदना करना जिसने मानवता को सेवा का नया अर्थ दिया। इस दिन मंदिरों को भव्य रूप से सजाया जाता है, प्रभात फेरियाँ निकाली जाती हैं और केसरिया ध्वजों से आकाश पट जाता है। 'जय श्री राम' और 'जय हनुमान' के नारों से वातावरण गुंजायमान हो उठता है। यह पर्व केवल हिंदुओं का नहीं, बल्कि उन सभी का है जो वीरता और सदाचार का सम्मान करते हैं। हनुमान जी का चरित्र संकीर्णताओं से ऊपर उठकर है। वे सुग्रीव जैसे मित्र के प्रति वफादार हैं, विभीषण जैसे शरणागत के रक्षक हैं और श्री राम के अनन्य दास हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि रिश्ते कैसे निभाए जाते हैं और संकट के समय अपनों के साथ कैसे खड़ा रहा जाता है।</p>
<p>निष्कर्षतः, हनुमान जयंती का यह पावन अवसर हमें आत्म-मंथन के लिए प्रेरित करता है। क्या हम अपने भीतर के डर को जीत पा रहे हैं? क्या हम समाज की सेवा के लिए तत्पर हैं? क्या हमारी शक्ति दूसरों की भलाई के लिए प्रयुक्त हो रही है? हनुमान जी का पूरा जीवन 'परोपकाराय पुण्याय' का जीवंत दस्तावेज है। उनकी भक्ति में कोई शर्त नहीं थी, कोई मांग नहीं थी। उन्हें जब विदा करते समय कीमती मोतियों की माला दी गई, तो उन्होंने उन्हें दांतों से तोड़कर फेंक दिया क्योंकि उनमें 'राम' नहीं दिख रहे थे। ऐसी अनन्य भक्ति ही मनुष्य को साधारण से असाधारण और जीव से शिव बनाती है। आज के दौर में जब विश्व अनेक चुनौतियों से घिरा है, हनुमान जी का 'बजरंग' रूप हमें साहस देता है और उनका 'शांत' रूप हमें धैर्य। हनुमान जयंती हमें विश्वास दिलाती है कि यदि हम निष्ठापूर्वक अपने मार्ग पर चलते रहें, तो बाधाएँ चाहे कितनी ही विकट क्यों न हों, विजय अंततः हमारी ही होगी। इस दिन हमें केवल दीये नहीं जलाने चाहिए, बल्कि अपने भीतर के अंधकार को मिटाने का संकल्प लेना चाहिए। भगवान हनुमान की कृपा हम सब पर बनी रहे और हम उनके पदचिह्नों पर चलते हुए एक बेहतर समाज और राष्ट्र का निर्माण कर सकें, यही इस जयंती की सच्ची सार्थकता होगी। अंत में यही कहा जा सकता है कि हनुमान जी की महिमा अपार है, वे बुद्धिमानों में अग्रगण्य हैं, बलवानों में श्रेष्ठ हैं और भक्तों के हृदय में सदैव निवास करने वाले प्राणस्वरूप हैं। उनकी जयन्ती हमें उस शाश्वत सत्य की याद दिलाती रहती है कि ईश्वर के प्रति समर्पण ही वह एकमात्र चाबी है जिससे मोक्ष और सांसारिक सफलता दोनों के द्वार खुलते हैं।</p>
<img src="https://samridhjharkhand.com/media/2026-04/0c509ca2-0778-4d3a-a1aa-119ad3e1f849.jpg" alt="हनुमान जयंती: भक्ति, शक्ति और समर्पण का अद्भुत संगम" width="186" height="198"></img>
लेखक: महेन्द्र तिवारी(फाइल फोटो)

<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Apr 2026 17:21:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सरहुल: एक ऐसा पर्व जो सिखाता है जिंदगी जीने का सही तरीका</title>
                                    <description><![CDATA[सरहुल झारखंड का एक प्रमुख आदिवासी पर्व है, जो प्रकृति और मानव के गहरे संबंध का प्रतीक है। साल वृक्ष की पूजा के माध्यम से यह पर्व जल, जंगल और जमीन के प्रति आभार प्रकट करता है। उरांव, मुंडा और हो जनजाति इसे पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाती हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/religion/sarhul-is-a-festival-which-teaches-the-right-way-to/article-19048"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/365fa778-5006-431e-b037-a858c80501df_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>लेखक: विजय शंकर नायक</strong></p>
<p>झारखंड की धरती पर जब साल वृक्षों की डालियों पर नई कोपलें फूटती हैं, जब जंगलों में हरियाली का नवजीवन उमड़ता है, तब आदिवासी समाज पूरे उल्लास के साथ सरहुल पर्व का स्वागत करता है। सरहुल केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि यह प्रकृति और मानव के बीच गहरे रिश्ते का जीवंत प्रतीक है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन का वास्तविक आधार प्रकृति है और उसकी रक्षा करना ही हमारे अस्तित्व की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।</p>
<h3><strong>सरहुल का अर्थ और महत्व</strong></h3>
<p>‘सरहुल’ शब्द दो भागों से मिलकर बना है—‘सर’ अर्थात साल वृक्ष और ‘हुल’ अर्थात पूजा या उत्सव। यानी यह साल वृक्ष की पूजा का पर्व है। झारखंड के आदिवासी समुदाय, विशेषकर उरांव, मुंडा और हो जनजाति, इस पर्व को अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाते हैं। सरहुल प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करने का अवसर है, जिसमें धरती माता, जंगल, जल, हवा और जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है।</p>
<p>यह पर्व इस बात का भी प्रतीक है कि मानव और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहना चाहिए। जब हम प्रकृति के साथ तालमेल बिठाते हैं, तभी जीवन सुखमय और समृद्ध बनता है।</p>
<h3><strong>सरहुल का धार्मिक और सांस्कृतिक पक्ष</strong></h3>
<p>सरहुल का पर्व आदिवासी समाज के धार्मिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस दिन ‘पाहन’ (गांव का पुजारी) गांव के सरना स्थल पर जाकर पूजा करता है। सरना स्थल वह पवित्र स्थान होता है, जहां साल वृक्षों के बीच देवताओं का वास माना जाता है।</p>
<p>पाहन भगवान से अच्छी फसल, वर्षा, स्वास्थ्य और समृद्धि की प्रार्थना करता है। पूजा के दौरान मुर्गा, हंडिया (चावल से बनी पारंपरिक शराब) और अन्य पारंपरिक वस्तुएं चढ़ाई जाती हैं। इसके बाद पूरे गांव में प्रसाद वितरित किया जाता है।</p>
<p>यह पूजा केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह समाज की एकता और सामूहिकता का प्रतीक भी है। सभी लोग एक साथ मिलकर पूजा करते हैं, जिससे सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं।</p>
<h3><strong>प्रकृति के साथ गहरा संबंध</strong></h3>
<p>सरहुल हमें यह सिखाता है कि प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि हमारी जीवनदायिनी शक्ति है। आज के आधुनिक युग में, जहां लोग प्रकृति का अंधाधुंध दोहन कर रहे हैं, वहीं सरहुल जैसे पर्व हमें चेतावनी देते हैं कि यदि हमने प्रकृति का सम्मान नहीं किया, तो इसका परिणाम विनाशकारी होगा।</p>
<p>साल वृक्ष को विशेष महत्व दिया जाता है, क्योंकि यह झारखंड के जंगलों का प्रमुख वृक्ष है। इसके फूलों को पवित्र माना जाता है और इन्हें घरों में सजाया जाता है। यह प्रकृति के नवजीवन और पुनर्जन्म का प्रतीक है।</p>
<h3><strong>सामाजिक एकता और भाईचारे का पर्व</strong></h3>
<p>सरहुल केवल पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक मेल-जोल का भी पर्व है। इस दिन लोग नए कपड़े पहनते हैं, नाच-गान करते हैं और एक-दूसरे के घर जाकर बधाई देते हैं।</p>
<p>गांवों में अखाड़ा सजाया जाता है, जहां पारंपरिक नृत्य और गीत प्रस्तुत किए जाते हैं। महिलाएं और पुरुष मिलकर ‘झूमर’ और ‘डोमकच’ जैसे लोकनृत्य करते हैं। मांदर और नगाड़े की धुन पर पूरा वातावरण उत्सवमय हो जाता है।</p>
<p>यह पर्व जाति, धर्म और वर्ग के भेदभाव को समाप्त कर सभी को एक मंच पर लाता है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।</p>
<h3><strong>पर्यावरण संरक्षण का संदेश</strong></h3>
<p>आज, जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट से जूझ रही है, तब सरहुल का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि यदि हम प्रकृति को बचाएंगे, तभी हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा।</p>
<p>आदिवासी समाज सदियों से प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीता आया है। उन्होंने कभी भी प्रकृति का शोषण नहीं किया, बल्कि उसे पूजनीय माना। यही कारण है कि उनके जीवन में पर्यावरणीय संतुलन बना रहा।</p>
<p>सरहुल के माध्यम से हमें यह सीखने की जरूरत है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।</p>
<h3><strong>आधुनिक समय में सरहुल की प्रासंगिकता</strong></h3>
<p>आज के दौर में, जब लोग अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं, सरहुल जैसे पर्व हमें हमारी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ते हैं। यह हमें हमारी पहचान का अहसास कराते हैं।</p>
<p>शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली के कारण कई परंपराएं धीरे-धीरे समाप्त हो रही हैं, लेकिन सरहुल आज भी पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह इस बात का प्रमाण है कि आदिवासी समाज अपनी संस्कृति को बचाने के लिए प्रतिबद्ध है।</p>
<p>हमें भी इस परंपरा को समझने और सम्मान देने की आवश्यकता है। यह केवल एक समुदाय का त्योहार नहीं, बल्कि पूरे मानव समाज के लिए एक प्रेरणा है।</p>
<h3><strong>महिलाओं की भूमिका</strong></h3>
<p>सरहुल पर्व में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वे इस पर्व की तैयारियों में सक्रिय रूप से भाग लेती हैं। घर की साफ-सफाई, भोजन की व्यवस्था और पारंपरिक परिधानों की तैयारी में उनका योगदान अहम होता है।</p>
<p>नृत्य और गीतों में भी महिलाएं बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। उनके बिना यह उत्सव अधूरा लगता है। यह पर्व महिलाओं के सम्मान और उनकी भागीदारी का प्रतीक भी है।</p>
<h3><strong>आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभाव</strong></h3>
<p>सरहुल का स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस दौरान बाजारों में रौनक बढ़ जाती है। पारंपरिक वस्त्र, आभूषण और खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ जाती है।</p>
<p>इसके साथ ही, यह पर्व पर्यटन को भी बढ़ावा देता है। बाहर से आने वाले लोग इस उत्सव को देखने के लिए झारखंड आते हैं, जिससे राज्य की सांस्कृतिक पहचान को मजबूती मिलती है।</p>
<h3><strong>निष्कर्ष</strong></h3>
<p>सरहुल केवल एक पर्व नहीं, बल्कि यह जीवन जीने की एक शैली है। यह हमें सिखाता है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर ही हम सच्चे अर्थों में खुशहाल जीवन जी सकते हैं।</p>
<p>आज, जब दुनिया विकास की अंधी दौड़ में लगी हुई है, तब सरहुल हमें रुककर सोचने का अवसर देता है कि क्या हम सही दिशा में जा रहे हैं? क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और स्वस्थ पर्यावरण छोड़ पाएंगे?</p>
<p>सरहुल का संदेश स्पष्ट है—प्रकृति का सम्मान करो, उसे बचाओ और उसके साथ मिलकर जीवन जीओ। यही हमारे अस्तित्व की कुंजी है।</p>
<p>अंततः, सरहुल हमें यह सिखाता है कि सच्ची समृद्धि केवल भौतिक साधनों में नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलित और सामंजस्यपूर्ण जीवन में है। यह पर्व हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है और हमें एक बेहतर भविष्य की ओर प्रेरित करता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 19 Mar 2026 22:07:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
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                <title>Chaitra Amavasya 2026: 18 या 19 मार्च? जानिए सही तिथि, स्नान-दान का समय और पितृ कर्म का शुभ मुहूर्त</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>समृद्ध डेस्क: </strong>चैत्र अमावस्या 2026 को लेकर हर तरफ चर्चा जोरों पर है, खासकर 18 और 19 मार्च के बीच तिथि को लेकर थोड़ा कन्फ्यूजन बना हुआ है। पंचांग के मुताबिक, इस बार अमावस्या तिथि 18 मार्च सुबह 8:26 बजे से शुरू होकर 19 मार्च सुबह 6:53 बजे तक चलेगी, जिससे 19 मार्च को ही इसे मनाना शास्त्रसम्मत माना जा रहा है। इस दिन न केवल स्नान-दान का पुण्य फल मिलता है, बल्कि पितृ कर्म से भी जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।</p>
<h5 class="font-editorial font-bold mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>महत्वपूर्ण तिथियां</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">चैत्र अमावस्या का खास महत्व हिंदू धर्म में है, जहां इसे पितरों का</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/religion/chaitra-amavasya-2026-18-or-19-march-know-the-exact/article-18712"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/chatgpt-image-mar-10,-2026,-07_12_51-pm.jpg" alt=""></a><br /><p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>समृद्ध डेस्क: </strong>चैत्र अमावस्या 2026 को लेकर हर तरफ चर्चा जोरों पर है, खासकर 18 और 19 मार्च के बीच तिथि को लेकर थोड़ा कन्फ्यूजन बना हुआ है। पंचांग के मुताबिक, इस बार अमावस्या तिथि 18 मार्च सुबह 8:26 बजे से शुरू होकर 19 मार्च सुबह 6:53 बजे तक चलेगी, जिससे 19 मार्च को ही इसे मनाना शास्त्रसम्मत माना जा रहा है। इस दिन न केवल स्नान-दान का पुण्य फल मिलता है, बल्कि पितृ कर्म से भी जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।</p>
<h5 class="font-editorial font-bold mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>महत्वपूर्ण तिथियां</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">चैत्र अमावस्या का खास महत्व हिंदू धर्म में है, जहां इसे पितरों का आशीर्वाद पाने का सर्वोत्तम दिन कहा जाता है। 19 मार्च 2026, गुरुवार को संवत का समापन होगा और इसी दिन घट स्थापना का योग बनेगा। पंचांग गणना से अमावस्या 18 मार्च को अपराह्न तक प्रभावी रहेगी, इसलिए पितृ कर्म उसी दिन दोपहर में करना चाहिए।</p>
<h5 class="font-editorial font-bold mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>शुभ मुहूर्त समय</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">स्नान-दान का सबसे अच्छा समय 19 मार्च सुबह 6:53 बजे तक है, जब प्रतिपदा तिथि लगने से पहले ये कार्य पूरे किए जा सकते हैं। घट स्थापना अभिजीत मुहूर्त में 19 मार्च दोपहर 12:04 से 12:52 बजे तक उत्तम रहेगी, जो करीब 48 मिनट की अवधि है। अमावस्या उपरांत ये मुहूर्त विशेष रूप से फलदायी बताए गए हैं।</p>
<h5 class="font-editorial font-bold mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>पितृ कर्म का समय</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">शास्त्रों में अमावस्या के अपराह्न काल को पितृ कर्म के लिए आदर्श माना गया है। इसलिए 18 मार्च, बुधवार को दोपहर में ये कर्मकांड संपन्न करना चाहिए, क्योंकि तब अमावस्या तिथि पूरी तरह व्याप्त होगी। इससे पितरों का तर्पण और आशीर्वाद निश्चित रूप से प्राप्त होगा।</p>
<h5 class="font-editorial font-bold mb-2 mt-4 [.has-inline-images_&amp;]:clear-end text-lg first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>क्या करें इस दिन</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">इस अमावस्या पर सुबह नदी स्नान के बाद दान-पुण्य करें, अगर नदी न हो तो घर पर ही स्नान पर्याप्त है। पितृ दोष निवारण के लिए तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान जैसे कार्य जरूरी हैं, साथ ही ब्राह्मण भोजन, कौए और गाय को भोजन देना शुभ फल देता है। ये सभी रीति-रिवाज जीवन में स्थिरता और समृद्धि लाते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 10 Mar 2026 19:16:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Media Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Char Dham Yatra 2026: ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन शुरू, 19 अप्रैल से खुलेंगे कपाट</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>देहरादून: </strong>उत्तराखंड में चारधाम यात्रा की शुरुआत होने वाली है, जो हर साल लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचती है। इस बार 19 अप्रैल से यमुनोत्री और गंगोत्री धाम के कपाट खुलेंगे, उसके बाद 22 अप्रैल को केदारनाथ और 23 अप्रैल को बद्रीनाथ धाम के द्वार भी श्रद्धालुओं के लिए खुल जाएंगे। अगर आप इस पावन यात्रा पर जाने की सोच रहे हैं, तो देरी न करें – ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया अभी शुरू हो चुकी है। राज्य सरकार ने इसे बेहद सरल बना दिया है, ताकि कोई भी मोबाइल या लैपटॉप से घर बैठे बुकिंग कर सके।<img src="https://images.openai.com/static-rsc-3/X_lSGH4PIOriIroWPnZ5ov9LGFRRhxEfqjaGE9EdeKCur6S8-ZzSNaNfb4qkRMt2xva9L5oo0qkoRhwp-EI9DPWWgm-Mu0FVxQdq7rQqMXA?purpose=fullsize&amp;v=1" alt="Badrinath Temple" /></p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><img src="https://utdb.blob.core.windows.net/images/2026/prod/latest_update_popup_section/latest_update_popup_section-020320261030201829.jpg" alt="latest_update_popup_section-020320261030201829.jpg" /></p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">सरकारी वेबसाइट</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/religion/char-dham-yatra-2026-online-registration-starts-doors-will-open/article-18587"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/hhh.jpg" alt=""></a><br /><p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>देहरादून: </strong>उत्तराखंड में चारधाम यात्रा की शुरुआत होने वाली है, जो हर साल लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचती है। इस बार 19 अप्रैल से यमुनोत्री और गंगोत्री धाम के कपाट खुलेंगे, उसके बाद 22 अप्रैल को केदारनाथ और 23 अप्रैल को बद्रीनाथ धाम के द्वार भी श्रद्धालुओं के लिए खुल जाएंगे। अगर आप इस पावन यात्रा पर जाने की सोच रहे हैं, तो देरी न करें – ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया अभी शुरू हो चुकी है। राज्य सरकार ने इसे बेहद सरल बना दिया है, ताकि कोई भी मोबाइल या लैपटॉप से घर बैठे बुकिंग कर सके।<img src="https://images.openai.com/static-rsc-3/X_lSGH4PIOriIroWPnZ5ov9LGFRRhxEfqjaGE9EdeKCur6S8-ZzSNaNfb4qkRMt2xva9L5oo0qkoRhwp-EI9DPWWgm-Mu0FVxQdq7rQqMXA?purpose=fullsize&amp;v=1" alt="Badrinath Temple"></img></p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><img src="https://utdb.blob.core.windows.net/images/2026/prod/latest_update_popup_section/latest_update_popup_section-020320261030201829.jpg" alt="latest_update_popup_section-020320261030201829.jpg"></img></p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">सरकारी वेबसाइट पर रजिस्ट्रेशन सबसे सीधा रास्ता है। <span style="background-color:rgb(194,224,244);"><strong><a style="background-color:rgb(194,224,244);" href="https://registrationandtouristcare.uk.gov.in/">registrationandtouristcare.uk.gov.in</a></strong></span> पर जाएं, सबसे पहले <a href="https://registrationandtouristcare.uk.gov.in/">Register/Sign Up</a> ऑप्शन चुनें। अपनी बेसिक डिटेल्स भरें और OTP से मोबाइल नंबर वेरीफाई कर लें।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><img src="https://images.openai.com/static-rsc-3/EOHN4DMW0TtDXFjYPE6FXrrP4ZZSXKnsT_4Ob5CR0nQG4kD70ef4pXz2YiVDKskvDchRE2OaIiACeHg6i71j5PydcayW7e5-IDAQTTDSby8?purpose=fullsize&amp;v=1" alt="View of the Kedarnath Temple at night in Kedarnath, Uttarakhand, India"></img> <img src="https://images.openai.com/static-rsc-3/5_RXcDjGJegsffgiDM45tI4CPyrYZCu7XPbmobNzY5JQBred8MVtNXv_vIvk8AK2GwB2VUcd0pL-HkODop9OHk2wLltPgUYa0Low7YHq6as?purpose=fullsize&amp;v=1" alt="carnival on yamunotri valley"></img>लॉगिन के बाद Add/Register for Yatra पर क्लिक करें, जरूरी जानकारी जैसे नाम, उम्र, यात्रा तारीखें भरें और पहचान पत्र अपलोड करें। सबमिट करने पर रजिस्ट्रेशन स्लिप या QR कोड डाउनलोड हो जाएगा, जिसे प्रिंट कर या मोबाइल पर सेव रखें। यह तरीका न सिर्फ तेज है, बल्कि पूरे परिवार का एक साथ रजिस्ट्रेशन भी संभव बनाता है।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><img src="https://images.openai.com/static-rsc-3/bus9KbTCVv_JnouK5rwgJXXjsKN1UMHuGl3zGfFFJkkTuByBogWYT_bJaFGApgp81wqtMFZrm7l5_3JpLSpYoUt3L42EvZwuACSxqgaW-uE?purpose=fullsize&amp;v=1" alt="White stoned Indian temple in Gangotri. Uttarakhand, Nord India."></img></p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">अगर ऐप पसंद है, तो Tourist Care Uttarakhand एप्लिकेशन प्ले स्टोर या ऐप स्टोर से डाउनलोड करें। इसमें वही प्रक्रिया फॉलो करनी है – साइन अप, डिटेल्स भरना और सबमिट।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><img src="https://himalayanhikers.in/img/yatra/Char%20Dham%20Yatra/char-dham.webp" alt="Char Dham Yatra 2026, Complete Itinerary, Cost &amp; Best Time"></img>यह ऐप यात्रा से जुड़ी सारी अपडेट्स जैसे मौसम, रूट और स्वास्थ्य जांच की जानकारी भी देता है। लेकिन सबसे आसान विकल्प व्हाट्सएप है। 8394833833 नंबर पर 'Yatra' लिखकर मैसेज भेजें, चैटबॉट स्टेप बाय स्टेप सारी डिटेल्स पूछेगा। जानकारी देने के बाद रजिस्ट्रेशन पूरा हो जाएगा। यह उन लोगों के लिए बूस्टर है, जो वेबसाइट या ऐप यूज करने में कन्फ्यूज हो जाते हैं।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><img src="https://images.openai.com/static-rsc-3/MAV7tkt4pjn9-lGYwvjDuxrIrGErDMpPLoR-AT8zbS96vriXFpXZJxuHqAEUWuO41CQTKpdF6RdeX25P0Z2eniyM8ZRCsFoQmczVRWN4yak?purpose=fullsize&amp;v=1" alt="Char Dham (Kedarnath, Badrinath, Gangotri And Yamunotri )"></img></p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">यात्रा के दौरान आधार कार्ड साथ रखना अनिवार्य है, क्योंकि चेकिंग पॉइंट्स पर इसकी जरूरत पड़ेगी। किसी समस्या पर हेल्पलाइन 0135-1364 पर कॉल करें – यह 24x7 उपलब्ध है। रजिस्ट्रेशन के साथ विशेष पूजा-पाठ की बुकिंग भी हो सकती है।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><img src="https://www.chardham.in/uploads/yatra-for-chardham.JPG" alt="Do Dham Yatra Guide from Dehradun - Yamunotri and Gangotri"></img> गंगोत्री उत्तरकाशी, केदारनाथ रुद्रप्रयाग, बद्रीनाथ चमोली जिले में स्थित हैं, इसलिए रूट प्लानिंग पहले से कर लें। जल्दबाजी में रजिस्ट्रेशन करवाएं, क्योंकि पीक सीजन में सर्वर लोड हो सकता है। सुरक्षित और सुगम यात्रा के लिए ये स्टेप्स फॉलो करें, धामों की दिव्यता का आनंद लें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 07 Mar 2026 18:53:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Media Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>महाशिवरात्रि 2026: 15 या 16 फरवरी? सही तारीख, मुहूर्त और पूजा विधि पूरी जानकारी</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>समृद्ध डेस्क: </strong>महाशिवरात्रि 2026 को लेकर भक्तों में खासी उत्सुकता है, खासकर यह जानने को कि आखिर 15 फरवरी को मनाई जाएगी या 16 फरवरी को। दृक पंचांग के मुताबिक फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 15 फरवरी शाम 5:04 बजे शुरू होकर 16 फरवरी शाम 5:34 बजे तक चलेगी, लेकिन उदय तिथि के आधार पर मुख्य पर्व 15 फरवरी रविवार को ही होगा। इस बार यह तिथि सर्वार्थ सिद्धि योग से भी जुड़ रही है, जो पूजा को और फलदायी बना देगा।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">इस पावन दिन भगवान शिव की आराधना का विशेष महत्व है, जहां व्रत, जागरण और शिवलिंग पर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/religion/mahashivratri-2026-15-or-16-february-exact-date-time-puja/article-18111"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/gemini_generated_image_23uga123uga123ug.jpg" alt=""></a><br /><p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>समृद्ध डेस्क: </strong>महाशिवरात्रि 2026 को लेकर भक्तों में खासी उत्सुकता है, खासकर यह जानने को कि आखिर 15 फरवरी को मनाई जाएगी या 16 फरवरी को। दृक पंचांग के मुताबिक फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 15 फरवरी शाम 5:04 बजे शुरू होकर 16 फरवरी शाम 5:34 बजे तक चलेगी, लेकिन उदय तिथि के आधार पर मुख्य पर्व 15 फरवरी रविवार को ही होगा। इस बार यह तिथि सर्वार्थ सिद्धि योग से भी जुड़ रही है, जो पूजा को और फलदायी बना देगा।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">इस पावन दिन भगवान शिव की आराधना का विशेष महत्व है, जहां व्रत, जागरण और शिवलिंग पर जलाभिषेक से पाप नष्ट होते हैं तथा मोक्ष की प्राप्ति संभव मानी जाती है। साल 2026 में व्यतीपात योग प्रातःकाल से 16 फरवरी सुबह 2:47 तक रहेगा, जबकि उत्तराषाढ़ा नक्षत्र शाम 7:48 बजे तक और उसके बाद श्रवण नक्षत्र होगा। मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ने की उम्मीद है, जहां रात भर जागरण और मंत्र जाप होगा। कई पंचांगों में 16 फरवरी का जिक्र होने से थोड़ा कन्फ्यूजन है, लेकिन विशेषज्ञ उदय तिथि को ही प्राथमिकता देते हैं।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">महाशिवरात्रि के शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं जो पूजा को सिद्ध बनाएंगे। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 5:21 से 6:12 बजे तक सबसे उत्तम रहेगा स्नान-पूजा के लिए। अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:15 से 12:59 बजे तक है, जबकि निशिता मुहूर्त रात 12:11 से 1:02 बजे तक रात्रि जागरण के लिए आदर्श। सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 7:04 से शाम 7:48 बजे तक मनोकामनाओं की पूर्ति करेगा। इन मुहूर्तों में अभिषेक और आरती करने से ग्रह दोष शांत होते हैं।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">पूजा विधि सरल लेकिन विधिपूर्वक अपनानी चाहिए ताकि शिव कृपा प्राप्त हो। ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, भांग और भस्म चढ़ाएं। चारों प्रहरों में अभिषेक करें, 'ओम नमः शिवाय' या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। रात में शिव चालीसा या रुद्राष्टक का पाठ करें तथा जागरण पूरा करें। जलाभिषेक पूरे दिन संभव है, मगर निशिता काल में विशेष फल मिलेगा। महिलाएं सुखी दांपत्य के लिए, पुरुष करियर उन्नति के लिए यह व्रत रखते हैं।</p>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">यह पर्व शिव-पार्वती विवाह का प्रतीक भी है, जो भक्ति और आत्मशुद्धि का संदेश देता है। व्रत से स्वास्थ्य लाभ, कष्ट निवारण और सफलता मिलती है। ऐसे शुभ योग में पूजा करने से जीवन की हर बाधा दूर हो जाती है। भक्तों को स्थानीय पंचांग से अंतिम पुष्टि कर लेनी चाहिए।</p>
<hr />
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2"><strong>नोट: यह लेख उपलब्ध सूचनाओं और मान्यताओं पर आधारित है। समृद्ध झारखंड इसकी पूर्ण सत्यता की पुष्टि नहीं करता। अधिक जानकारी के लिए विशेषज्ञ से सलाह लें।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 13 Feb 2026 15:57:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Media Desk]]></dc:creator>
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                <title>Mahashivratri special 2026 : तांडव की लय और मांदर की थाप</title>
                                    <description><![CDATA[यह लेख मांदर की थाप और शिव तांडव के माध्यम से आदिवासी संस्कृति, प्रकृति और जीवन की लय के बीच के संबंध को दर्शाता है। इसमें बताया गया है कि नृत्य और संगीत केवल कला नहीं, बल्कि जीवन की गति और सामूहिक चेतना का उत्सव हैं। लेख मनुष्य और प्रकृति के बीच के प्राचीन संबंध को पुनः समझने का संदेश देता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/mahashivratri-special/article-18022"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/a3d643f5-79f5-4b68-86d7-c897f7d87053_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>रात जब गहराती है और जंगल की निस्तब्धता अपने भीतर किसी अनसुनी धड़कन को सँजोने लगती है, तब कहीं दूर से मांदर की थाप सुनाई देती है। वह थाप केवल एक वाद्य की ध्वनि नहीं होती; वह धरती की नाड़ी है, जो मनुष्य के कदमों से मिलकर जीवन की लय रचती है। इसी लय में शिव का तांडव भी कहीं न कहीं जीवित है—आदिम, अनगढ़ और अनंत।</p>
<p>भारतीय परंपरा में शिव का तांडव सृष्टि और संहार का नृत्य माना गया है। पर यदि हम इसे आदिवासी जीवन की दृष्टि से देखें, तो तांडव केवल विध्वंस का प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन की गति का उत्सव है। जिस प्रकार मांदर की थाप पर आदिवासी समुदाय सामूहिक नृत्य करता है, उसी प्रकार तांडव भी सृष्टि की सामूहिक धड़कन है। दोनों में एक अदृश्य साम्य है—लय का, ऊर्जा का और अस्तित्व के उत्सव <br />का।</p>
<p>मांदर की थाप सरल होती है, पर उसमें एक गहरी शक्ति छिपी होती है। वह थाप जैसे ही गूँजती है, लोग एक वृत्त में इकट्ठा हो जाते हैं। कदम ताल मिलाते हैं, हाथ एक-दूसरे से जुड़ते हैं, और नृत्य शुरू हो जाता है। यह नृत्य किसी मंच के लिए नहीं, जीवन के लिए होता है। इसमें कोई दर्शक नहीं, सब सहभागी होते हैं।<br />शिव का तांडव भी ऐसा ही है—जहाँ देवता और जगत के बीच कोई दूरी नहीं रहती। डमरू की ध्वनि और मांदर की थाप जैसे एक ही लय के दो रूप प्रतीत होते हैं।</p>
<p>आदिवासी समाज में नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना का उत्सव है। फसल कटने पर, पर्व आने पर, या शिवरात्रि जैसी रात्रि में मांदर की थाप पर लोग नाचते हैं। यह नृत्य धरती के प्रति कृतज्ञता का भी है और जीवन की निरंतरता का भी। जब मांदर की आवाज़ जंगल में गूँजती है, तो लगता है जैसे धरती स्वयं तांडव कर रही हो।</p>
<p>शिव का तांडव भी इसी धरती की गति है—पर्वतों का उठना-गिरना, नदियों का बहना, ऋतुओं का बदलना। यह नृत्य हमें याद दिलाता है कि जीवन स्थिर नहीं, निरंतर प्रवाहमान है।<br />तांडव की कल्पना में अग्नि है, ऊर्जा है, और परिवर्तन का साहस है। मांदर की थाप में भी वही ऊर्जा छिपी है। जब युवा और वृद्ध, स्त्री और पुरुष एक साथ नृत्य करते हैं, तो वहाँ कोई भेद नहीं रहता। सब एक लय में बँध जाते हैं। यह लय ही समाज को जोड़ती है, जैसे तांडव सृष्टि को जोड़ता है।</p>
<p>शिव के नटराज रूप में जो वृत्ताकार नृत्य है, वही वृत्त आदिवासी नृत्य में भी दिखाई देता है—जहाँ सब एक घेरे में घूमते हैं। यह घेरा केवल नृत्य का नहीं, एकता का प्रतीक है।</p>
<p>मांदर की थाप में एक आदिम स्मृति भी छिपी होती है। यह वही ध्वनि है, जो शायद मानव सभ्यता के प्रारंभ में पहली बार गूँजी होगी—जब मनुष्य ने लकड़ी या चमड़े पर प्रहार करके लय बनाई होगी। उसी लय से नृत्य जन्मा होगा, और उसी नृत्य से देवता की कल्पना। शिव का तांडव शायद उसी पहली लय का विस्तार है।<br />इसलिए जब मांदर बजता है, तो वह केवल वर्तमान का संगीत नहीं, बल्कि इतिहास की धड़कन भी होता है।</p>
<p>आज के आधुनिक जीवन में जब संगीत कृत्रिम हो गया है और नृत्य मंचों तक सीमित हो गया है, तब भी आदिवासी समाज मांदर की थाप को जीवित रखे हुए है। यह थाप हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है। वह याद दिलाती है कि मनुष्य और प्रकृति के बीच जो लय है, वही <br />जीवन का आधार है।</p>
<p>शिव का तांडव भी यही सिखाता है—कि सृष्टि का हर परिवर्तन एक नृत्य है, हर विनाश एक नई सृष्टि की भूमिका है।</p>
<p>तांडव की लय और मांदर की थाप हमें एक गहरे सत्य तक ले जाती है—कि जीवन का सार गति में है। जब तक लय है, तब तक जीवन है। जब मांदर की थाप रुकती है, तो नृत्य थम जाता है; जब तांडव रुकता है, तो सृष्टि भी ठहर जाती है।</p>
<p>इसलिए मांदर की हर थाप में शिव का तांडव छिपा है, और हर तांडव में जीवन की अनंत धड़कन।</p>
<p>शायद इसी कारण जंगल की रात में गूँजती मांदर की आवाज़ सुनकर लगता है कि कहीं दूर शिव नृत्य कर रहे हैं—अनंत, निर्भीक और मुक्त और उस नृत्य में मनुष्य भी शामिल है, धरती भी, आकाश भी। यही तांडव की लय है, यही मांदर की थाप—जीवन का शाश्वत उत्सव।</p>
<p><strong>डॉ आशुतोष प्रसाद</strong><br /><strong>साहित्यकार</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 10 Feb 2026 16:59:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>धर्म–आस्था का अनूठा संगम: देवघर में भव्य श्रीमद्भागवत कथा और अतिरुद्र महायज्ञ, संतों की उपस्थिति से गूंजा वातावरण</title>
                                    <description><![CDATA[देवघर के सर्राफ स्कूल मैदान में 108 कुण्डीय अतिरुद्र महायज्ञ और श्रीमद्भागवत कथा का नौ दिवसीय भव्य आयोजन हो रहा है, जिसमें भारी संख्या में भक्त उमड़ रहे हैं। वैदिक ऊर्जा और दिव्यता से पूरा वातावरण आध्यात्मिक रंग में रंगा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/deoghar/a-unique-confluence-of-religion-and-faith-the-atmosphere-echoed/article-17305"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-12/1d119569-1795-4694-b921-90202e1fec91_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>देवघर: </strong>स्थानीय सर्राफ स्कूल मैदान में बाबा बैधनाथ धाम की पावन धरा पर धर्म, आस्था और श्रद्धा का भव्य व अनूठा संगम के बीच भारतवर्ष के जन कल्याण हेतू महामंडलेश्वर स्वामी हरिहरानंद जी महाराज के दिव्य संरक्षण में 108 कुण्डीय अतिरुद्ध महायज्ञ व श्री मदभागवत कथा ज्ञान यज्ञ का नौ दिवसीय भव्य आयोजन बड़े ही धूमधाम व हर्षोल्लास के साथ पूरे उत्साह से किया जा रहा है।</p>
<p>आध्यात्मिक प्रकाश से ओत-प्रोत, अपनी भव्यता, दिव्यता और विराट अलौकिक आध्यात्मिक आभा से युक्त इस आयोजन में यजमान और जनता पूरे उत्साह व श्रद्धा से भाग ले रहे है। इस अविरमरणीय आयोजन ने भक्तों का मन-मोह लिया है। अतिरुद्र महायज्ञ का विराट मंडप एवं भागवत कथा का भव्य व विशाल पंडाल और संत-महात्माओं की दिव्य उपस्थिति व सान्निध्य से पूरा वातावरण वैदिक ऊर्जा और भक्ति रस में डूब गया है। यह आयोजन धर्म-जागरण, संस्कृति संवर्धन और वैश्विक कल्याण का महासंगम बन गया है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>देवघर</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 04 Dec 2025 16:49:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anshika Ambasta]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Indresh Upadhyay Wedding: पौष मास की शुरुआत में क्यों है शादी, जानें असली ज्योतिषीय वजह</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">कथा वाचक इंद्रेश उपाध्याय की शादी 5 दिसंबर 2025 को जयपुर के ताज आमेर होटल में हो रही है, जिसके लिए उनकी भव्य बारात मथुरा से जयपुर पहुंच चुकी है। इस विवाह को लेकर सबसे बड़ी चर्चा यह है कि यह पौष माह की शुरुआत के समय हो रहा है, जबकि परंपरागत रूप से पौष/खरमास में विवाह जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते।</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 font-display font-semimedium text-base first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>इंद्रेश उपाध्याय की शादी की मुख्य बातें</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">वृंदावन के लोकप्रिय कथा वाचक इंद्रेश उपाध्याय लंबे समय से अपनी धार्मिक कथाओं और प्रवचनों के कारण चर्चित रहे हैं, इसलिए उनके विवाह को लेकर भक्तों और श्रोताओं में उत्सुकता</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/religion/indresh-upadhyay-wedding-why-is-marriage-happening-in-the-beginning/article-17303"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-12/pandit-indresh-updhyay-ji.webp" alt=""></a><br /><p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">कथा वाचक इंद्रेश उपाध्याय की शादी 5 दिसंबर 2025 को जयपुर के ताज आमेर होटल में हो रही है, जिसके लिए उनकी भव्य बारात मथुरा से जयपुर पहुंच चुकी है। इस विवाह को लेकर सबसे बड़ी चर्चा यह है कि यह पौष माह की शुरुआत के समय हो रहा है, जबकि परंपरागत रूप से पौष/खरमास में विवाह जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते।</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 font-display font-semimedium text-base first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>इंद्रेश उपाध्याय की शादी की मुख्य बातें</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">वृंदावन के लोकप्रिय कथा वाचक इंद्रेश उपाध्याय लंबे समय से अपनी धार्मिक कथाओं और प्रवचनों के कारण चर्चित रहे हैं, इसलिए उनके विवाह को लेकर भक्तों और श्रोताओं में उत्सुकता है। 5 दिसंबर को जयपुर के ताज आमेर होटल में उनका विवाह समारोह रखा गया है और उनकी बारात मथुरा से विशेष तैयारी के साथ जयपुर पहुंच चुकी है, जिस वजह से यह आयोजन मीडिया में भी सुर्खियों में है।</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 font-display font-semimedium text-base first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>पौष मास और खरमास की धार्मिक मान्यता</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">हिंदू पंचांग के अनुसार पौष मास को सूर्य देव का विशेष मास माना जाता है, क्योंकि इस अवधि में सूर्य देव धनु राशि में गोचर करते हैं और इसी गोचर की अवधि को खरमास या मलमास कहा जाता है। ज्योतिषीय मान्यता है कि खरमास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य बड़े मांगलिक कार्य करने से शुभ फल की प्राप्ति कम हो सकती है, इसलिए इस समय लोगों को जप, तप और दान जैसे धार्मिक कार्यों पर अधिक जोर देने की सलाह दी जाती है।</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 font-display font-semimedium text-base first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>शास्त्रों के अनुसार विवाह के नियम</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">पूर्णिमा की तिथि के आधार पर देखा जाए तो इस वर्ष पौष मास 5 दिसंबर से प्रारंभ माना जा रहा है, जबकि सूर्य संक्रांति के नियम के अनुसार सूर्य के 15 दिसंबर को धनु राशि में प्रवेश करने से खरमास की वास्तविक शुरुआत मानी जाएगी। विवाह संबंधी पंचांग की गणना सूर्य के दक्षिणायन, शुभ योगों की स्थिति और ग्रहों की चाल पर आधारित होती है, और इसी कारण पौष मास में जब सूर्य दक्षिणायन में रहते हैं तथा शुभ योग नहीं बनते, तो सामान्यतः शादियों के लिए मुहूर्त नहीं दिए जाते।</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 font-display font-semimedium text-base first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>क्या पौष मास में विवाह किया जा सकता है?</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">धार्मिक दृष्टि से मार्गशीर्ष पूर्णिमा के अगले दिन से पौष मास की गणना शुरू हो जाती है, लेकिन खरमास तब से माना जाता है जब सूर्य वास्तव में धनु राशि में प्रवेश करते हैं। वर्ष 2025 में सूर्य का धनु में प्रवेश 15 दिसंबर को होगा, इसलिए इस तिथि से पहले तक मांगलिक कार्यों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं माना जाता और शास्त्रीय मान्यता के अनुसार 15 दिसंबर से पहले विवाह जैसे शुभ कार्य किए जा सकते हैं।</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 font-display font-semimedium text-base first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>इंद्रेश उपाध्याय का विवाह 5 दिसंबर को क्यों?</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">इसी शास्त्रीय दृष्टिकोण के आधार पर इंद्रेश उपाध्याय ने अपना विवाह 5 दिसंबर को तय किया है, जो पूर्णिमा की गणना से पौष मास की शुरुआत के ठीक बाद का दिन तो है, लेकिन सूर्य के धनु में प्रवेश से पहले होने के कारण खरमास का पूर्ण प्रभाव नहीं माना जाता। ज्योतिषियों के अनुसार इस अवधि में अभी तक देवताओं की ऊर्जा पर वह स्थिरता नहीं आती जिसे खरमास के दौरान माना जाता है, इसलिए 15 दिसंबर से पहले के दिन कई विद्वान विवाह योग्य मानते हैं और यही कारण है कि इंद्रेश उपाध्याय की शादी को भी धार्मिक दृष्टि से उचित ठहराया जा रहा है।</p>
<h5 class="mb-2 mt-4 font-display font-semimedium text-base first:mt-0 md:text-lg [hr+&amp;]:mt-4"><strong>दिसंबर 2025 के अंतिम शुभ विवाह मुहूर्त</strong></h5>
<p class="my-2 [&amp;+p]:mt-4 [&amp;_strong:has(+br)]:inline-block [&amp;_strong:has(+br)]:pb-2">दिसंबर 2025 में ग्रह स्थिति ऐसी है कि 9 दिसंबर से कुछ दोष सक्रिय हो जाते हैं और 12 दिसंबर को शुक्र के अस्त होने के कारण विवाह के योग बाधित हो जाते हैं। इसी वजह से पंचांग के हिसाब से दिसंबर महीने में 5 और 6 दिसंबर को ही विवाह के अंतिम शुभ मुहूर्त माने गए हैं, जिसके बाद फिर 2026 की फरवरी से ही नए सिरे से विवाह के शुभ अवसर बनेंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/news/religion/indresh-upadhyay-wedding-why-is-marriage-happening-in-the-beginning/article-17303</link>
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                <pubDate>Thu, 04 Dec 2025 16:21:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Media Desk]]></dc:creator>
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