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                <title>जन स्वास्थ्य - Samridh Jharkhand</title>
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                <description>जन स्वास्थ्य RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>विश्व होम्योपैथ दिवस: एक सुरक्षित और प्रभावी चिकित्सा पद्धति</title>
                                    <description><![CDATA[10 अप्रैल को विश्व होम्योपैथी दिवस के रूप में मनाया गया, जिसका उद्देश्य इस चिकित्सा पद्धति के प्रति जागरूकता फैलाना है। यह दिवस होम्योपैथी के जनक डॉ. सैमुअल हैनिमैन की जयंती पर मनाया जाता है। होम्योपैथी को सुरक्षित, सस्ती और प्रभावी उपचार के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है। इस अवसर पर विभिन्न कार्यक्रम, शिविर और जागरूकता गतिविधियों का आयोजन किया गया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/public-health/world-homeopathy-day-10-april-hahnemann-jayanti-homeopathy-awareness-sahibganj/article-20422"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-04/255ab1af-77ad-4199-8105-3526f8497f01_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>आलेख: डॉक्टर सूर्यानंद पोद्दार</strong></p>
<p style="text-align:justify;">विश्व स्तर पर प्रत्येक वर्ष 10 अप्रैल को विश्व होम्योपैथी दिवस मनाया जाता है। यह दिवस होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति के जनक डॉ. सैमुअल हैनिमैन की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है। इस दिन का मुख्य उद्देश्य होम्योपैथी के महत्व, उसके सिद्धांतों तथा समाज में उसके योगदान के प्रति जागरूकता फैलाना है। होम्योपैथी एक वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति है, जिसका आधार समरूपता का सिद्धांत, अर्थात जिस पदार्थ से किसी स्वस्थ व्यक्ति में रोग के लक्षण उत्पन्न होते हैं, उसी पदार्थ को अत्यंत सूक्ष्म मात्रा में देकर रोग का उपचार किया जाता है। इस पद्धति की शुरुआत 18वीं शताब्दी में जर्मनी के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. हैनिमैन ने की थी।</p>
<p style="text-align:justify;">विश्व होम्योपैथी दिवस का मुख्य उद्देश्य लोगों को इस चिकित्सा पद्धति के प्रति जागरूक करना तथा इसके सुरक्षित, सस्ती और प्रभावी उपचार के रूप में प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देना है। इसके माध्यम से यह भी बताया जाता है कि होम्योपैथी केवल रोग के लक्षणों को नहीं, बल्कि व्यक्ति के संपूर्ण शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर उपचार करती है। इसमें दवाएं प्राकृतिक तत्वों से बनाई जाती हैं और उनके दुष्प्रभाव अत्यंत कम होते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">होम्योपैथी बच्चों, बुजुर्गों तथा गर्भवती महिलाओं के लिए भी अपेक्षाकृत सुरक्षित मानी जाती है। इसके अलावा, होम्योपैथी उपचार व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने पर भी बल देती है। भारत में होम्योपैथी चिकित्सा अत्यंत लोकप्रिय है और सरकार द्वारा इसे आयुष प्रणाली के अंतर्गत बढ़ावा दिया जा रहा है। विश्व होम्योपैथी दिवस के अवसर पर देश-विदेश में विभिन्न संगठनों, स्वास्थ्य शिविरों, कार्यशालाओं एवं जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस दिन चिकित्सक, शोधकर्ता एवं विद्यार्थी होम्योपैथी के क्षेत्र में हो रहे नवीन शोध और उपलब्धियों पर चर्चा करते हैं। साथ ही, आम जनता को मुफ्त परामर्श और दवाएं भी वितरित की जाती हैं। विश्व होम्योपैथी दिवस न केवल एक चिकित्सा पद्धति के सम्मान का दिन है, बल्कि यह हमें समग्र स्वास्थ्य की दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करता है। आधुनिक जीवनशैली से उत्पन्न विभिन्न रोगों के बीच होम्योपैथी एक सरल, सुरक्षित और प्रभावी विकल्प के रूप में अपनी पहचान बना रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>जन स्वास्थ्य</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 19:17:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>स्वस्थ मुंह, स्वस्थ जीवन:  ओरल हेल्थ क्यों ज़रूरी है?</title>
                                    <description><![CDATA[वर्ल्ड ओरल हेल्थ डे के अवसर पर विशेषज्ञों ने बताया कि मुंह का स्वास्थ्य केवल दांतों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे शरीर के स्वास्थ्य से जुड़ा होता है। खराब मौखिक स्वास्थ्य का संबंध मधुमेह, हृदय रोग और अन्य गंभीर बीमारियों से है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/public-health/healthy-mouth-healthy-life-why-oral-health-is-important/article-19079"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/capture_samridh_1200x7201.jpeg" alt=""></a><br /><p>हर वर्ष 20 मार्च को मनाया जाने वाला वर्ल्ड ओरल हेल्थ डे का उद्देश्य मुंह के स्वास्थ्य के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना, मुंह से जुड़ी बीमारियों की संख्या को कम करना और सभी के लिए बेहतर मौखिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देना है। इस अवसर पर यह याद रखना जरूरी है कि ओरल हेल्थ केवल एक सुंदर मुस्कान तक सीमित नहीं है। मुंह शरीर का प्रवेश द्वार है और इसका स्वास्थ्य हमारे संपूर्ण स्वास्थ्य से गहराई से जुड़ा होता है।</p>
<p>दांतों में सड़न (कैविटी), मसूड़ों की बीमारियाँ और मुंह में संक्रमण जैसी समस्याएँ दुनिया भर में सबसे आम स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल हैं। हालांकि ये समस्याएँ केवल मुंह तक सीमित लगती हैं, लेकिन इनके प्रभाव अक्सर इससे कहीं अधिक व्यापक होते हैं।वैज्ञानिक प्रमाण स्पष्ट रूप से बताते हैं कि खराब मौखिक स्वास्थ्य का संबंध मधुमेह, हृदय रोग, श्वसन संक्रमण और गर्भावस्था से जुड़ी जटिलताओं जैसी गंभीर शारीरिक स्थितियों से गहराई से जुड़ा होता है।</p>
<p>मसूड़ों की बीमारी, जिसे पेरियोडेंटाइटिस कहा जाता है, वयस्कों में दांतों के टूटने का एक प्रमुख कारण है और बढ़ती उम्र की लगभग 60% आबादी को प्रभावित करती है। मसूड़ों की बीमारी से जुड़े बैक्टीरिया और सूजन रक्तप्रवाह में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे मधुमेह के मरीजों में ब्लड शुगर नियंत्रण और खराब हो सकता है तथा हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है। इसी प्रकार, अनुपचारित दंत संक्रमण लंबे समय तक दर्द, खाने में कठिनाई, कुपोषण और जीवन की गुणवत्ता में गंभीर गिरावट का कारण बन सकते हैं।</p>
<p>खराब मौखिक स्वास्थ्य सभी आयु वर्ग के लोगों को प्रभावित करता है। बच्चों में यह उनकी वृद्धि, बोलने के विकास और पढ़ाई में प्रदर्शन को प्रभावित कर सकता है। वयस्कों में दांतों की समस्याएँ कार्यस्थल पर अनुपस्थिति और उत्पादकता में कमी का कारण बन सकती हैं। वृद्ध लोगों में दांतों का गिरना पोषण और समग्र स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, जिससे उनके जीवन की गुणवत्ता और भी कम हो जाती है।</p>
<p>अच्छी बात यह है कि मुंह से संबंधित अधिकांश बीमारियाँ रोकी जा सकती हैं। दिन में दो बार फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट से ब्रश करना, नियमित रूप से फ्लॉस करना, मीठे खाद्य पदार्थों और पेय पदार्थों का सीमित सेवन, तंबाकू से परहेज और नियमित रूप से दंत चिकित्सक के पास जाना—ये सरल लेकिन प्रभावी उपाय मुंह की स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम को काफी हद तक कम कर सकते हैं। दांतों की नियमित जांच के माध्यम से शुरुआती अवस्था में ही समस्याओं का पता चल जाता है, जिससे समय पर उपचार संभव होता है और स्थिति गंभीर होने से बच जाती है।</p>
<p>मुंह के स्वास्थ्य की कभी भी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए; यह समग्र स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे नियमित स्वास्थ्य देखभाल में शामिल किया जाना आवश्यक है।टाटा मेन हॉस्पिटल में हम अत्याधुनिक दंत सुविधाएँ प्रदान करते हैं, जो नवीनतम डायग्नोस्टिक और उपचार तकनीकों से सुसज्जित हैं। हमारा डेंटल विभाग अन्य चिकित्सा विशेषज्ञताओं के साथ मिलकर काम करता है, जिससे क्रॉस-कंसल्टेशन एक अपवाद नहीं बल्कि नियमित प्रक्रिया बन गई है।</p>
<p>हमारे यहाँ बच्चों के लिए विशेष रूप से समर्पित एक प्रिवेंटिव डेंटल क्लिनिक भी है। प्रिवेंटिव डेंटल केयर में न्यूनतम हस्तक्षेप वाली दंत चिकित्सा, पिट और फिशर सीलेंट्स, टॉपिकल फ्लोराइड का उपयोग तथा गलत आदतों को छुड़ाने वाले उपकरण शामिल हैं। ये उपाय बचपन से ही मुंह की स्वच्छता से जुड़ी अच्छी आदतों को बढ़ावा देते हैं और लंबे समय तक मौखिक एवं समग्र स्वास्थ्य बेहतर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।</p>
<p>इस वर्ल्ड ओरल हेल्थ डे पर आइए हम मुंह के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने का संकल्प लें—सिर्फ एक आत्मविश्वास भरी मुस्कान के लिए नहीं, बल्कि एक स्वस्थ शरीर और बेहतर जीवन गुणवत्ता के लिए भी। आखिरकार, एक स्वस्थ मुंह वास्तव में एक स्वस्थ जीवन का प्रतिबिंब होता है।</p>
<p>डॉ. रामा शंकर<br />सीनियर कंसल्टेंट एवं एचओडी (डेंटल)<br />मेडिकल सपोर्ट सर्विसेज, टाटा मेन हॉस्पिटल</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>जन स्वास्थ्य</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 20 Mar 2026 17:14:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Article: एचआईवी संक्रमण दर में ठहराव, 2030 लक्ष्य पर संकट</title>
                                    <description><![CDATA[यूएन-एड्स की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि 2023-24 में वैश्विक स्तर पर एचआईवी संक्रमण और एड्स से मौतों की संख्या में कोई अंतर नहीं हुआ. वित्तीय संकट, सामाजिक असमानता और महिलाओं पर हिंसा इस ठहराव के बड़े कारण बताए गए हैं.]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/public-health/article-hiv-infection-rate-stagnation-2030-crisis-on-target/article-15564"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-08/resized-image---2025-08-17t110553.666.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">2023 और 2024 में वैश्विक स्तर पर एचआईवी से संक्रमित होने वाले लोगों की संख्या में और एड्स से मृत होने वाले लोगों की संख्या में कोई अंतर ही नहीं है. संयुक्त राष्ट्र के साझा एड्स कार्यक्रम की नवीनतम रिपोर्ट (यूएन-एड्स ग्लोबल एड्स अपडेट 2025) के अनुसार, 2023 और 2024 में, हर साल, विश्व में 13 लाख लोग एचआईवी से नए संक्रमित हुए और 6.3 लाख मृत. ज़ाहिर है कि अधिकांश नए एचआईवी संक्रमण और एड्स मृत्यु वैश्विक दक्षिण देशों में हुईं है.</p>
<p style="text-align:justify;"> हालांकि यदि भारत समेत अनेक देशों के आँकड़ें देखें तो अधिकांश देशों में, एचआईवी से संक्रमित होने वाले लोगों और एड्स से मृत होने वाले लोगों की संख्या में बहुत थोड़ी सी गिरावट आई है – पर यह संतोषजनक गिरावट नहीं है. जब तक हम यह सुनिश्चित करें कि एचआईवी से कोई नया व्यक्ति संक्रमित ही न हो और कोई एड्स से मृत न हो, तब तक 2030 तक एड्स उन्मूलन का सपना कैसे साकार होगा?</p>
<p style="text-align:justify;"> यूएनएड्स के क्षेत्रीय निदेशक ईमोन मर्फी ने बताया कि 2024 में एशिया पसिफ़िक क्षेत्र में लगभग हर 5 में से 4 नए एचआईवी संक्रमण उन समुदाय में हुए जिन्हें ख़तरा अधिक है – जैसे कि यौनकर्मी, समलैंगिक समुदाय, ट्रांसजेंडर या हिजरा समुदाय, सुई से नशा करने वाले लोग, आदि. अफ़्रीका में हर 4 में से 1 नया एचआईवी संक्रमण इन समुदाय में हुए.</p>
<p style="text-align:justify;"> <br />2024 में अफ़्रीका में 8 लाख से अधिक लोग एचआईवी से नए संक्रमित हुए, जिनमें से दो-तिहाई लड़कियां या महिलायें थीं. जो लड़कियां/ महिलाएं 15-24 वर्ष की हैं उनको अफ़्रीका में एचआईवी से संक्रमित होने का खतरा दुगना है (इसी उम्र के पुरुषों की तुलना में).</p>
<p style="text-align:justify;"> दक्षिण अफ्रीका के अधिवक्ता लेटल्होगोनॉलों ने बताया कि एचआईवी सिर्फ स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं है बल्कि सामाजिक, आर्थिक और विधिक मुद्दों के साथ आंतरिक रूप से जुड़ा है. यदि हमें एड्स उन्मूलन का सपना साकार करना है तो वायरस तक ही सीमित नहीं रहना होगा – बल्कि जो कारण एचआईवी का खतरा बढ़ाते हैं, उनको समझना होगा और अन्तर-विभागीय और साझीदारी के साथ उन कारणों का समाधान खोजना होगा.</p>
<p style="text-align:justify;"> सिर्फ़ सुरक्षित मातृत्व या बाल स्वास्थ्य ही काफ़ी नहीं है बल्कि व्यापक रूप से लोग अपने यौनिक और प्रजनन स्वास्थ्य के बारे में स्वतंत्रता और स्वायत्तता के साथ निर्णय ले सकें, और ज़रूरी सेवाएँ से लाभान्वित हो सकें, यह भी ज़रूरी है. जब महिलाओं या लड़कियों को यह अधिकार नहीं मिलते तो उनके एचआईवी के साथ संक्रमित होने का खतरा बढ़ जाता है. अन्य स्वाथ्य और सामाजिक समस्याओं का खतरा भी अनेक गुना बढ़ जाता है.</p>
<p style="text-align:justify;">उदाहरण के तौर पर, सब-सहारन अफ्रीका में सिर्फ़ 40% महिलाओं को एचआईवी से बचाव संबंधित सही जानकारी है. कुछ अफ़्रीकी देशों में 50% से कम महिलाओं को गर्भनिरोधक मिल पाते हैं. महिला हिंसा का मुद्दा भी अफ्रीकी देशों में बहुत बड़ा मुद्दा है: दक्षिण अफ्रीका में हर 3 घंटे में 1 महिला की मृत्यु महिला हिंसा के कारण होती है. जो महिलायें, महिला हिंसा से जीवित बच जाती हैं, उनको एचआईवी से संक्रमित होने का खतरा 50% अधिक है. यह कहना है लेटल्होगोनॉलों का.</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>लेटल्होगोनॉलों ने कहा कि दक्षिण अफ्रीका में यौनकर्मी को एचआईवी से संक्रमित होने का खतरा 13 गुना अधिक है.</strong></p>
<p style="text-align:justify;">एचआईवी से संक्रमित होने वाले लोगों और एड्स से मृत होने वाले लोगों की संख्या में 2000 की तुलना में काफ़ी गिरावट आई है. यूएनएड्स के इमोन मर्फी ने कहा कि यदि एचआईवी संबंधित वित्तपोषण पूर्ण रूप से बरकरार नहीं किया गया तो एचआईवी से होने वाले नए संक्रमण दर और एड्स से होने वाली मृत्यु दर, 2000 के समान हो सकता है.</p>
<p style="text-align:justify;">ईमोन मर्फी ने बताया कि 2010-2024 के दौरान, एशिया पसिफ़िक क्षेत्र में 9 देश ऐसे हैं जहाँ एचआईवी से संक्रमित होने वाले नए लोगों की संख्या में चिंताजनक बढ़ोतरी हो रही है. फिजी में दुनिया का सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली एचआईवी महामारी है जहाँ 2010-2024 के दौरान, एचआईवी संक्रमण दर में 3091% से अधिक बढ़ोतरी हो गई है.</p>
<p style="text-align:justify;">2010-2024 के दौरान, फिजी के अलावा एशिया पसिफ़िक देशों के इन देशों में एचआईवी दर बढ़ोतरी पर है: फ़िलीपींस (562%), अफ़ग़ानिस्तान (187%), पापुआ न्यू गिनी (84%), भूटान (67%), श्री लंका (48%), तिमोर-लेसते (42%), बांग्लादेश (33%), लाओस (16%).</p>
<p style="text-align:justify;">2010-2024 के दौरान, एशिया पसिफ़िक क्षेत्र में इन 9 देशों में 50% से कम एचआईवी के साथ जीवित लोगों को जीवनरक्षक एंटीरेट्रोवायरल दवाएं मिल पा रही हैं: अफ़ग़ानिस्तान (11%), पाकिस्तान (16%), फिजी (24%), फ़िलीपींस (40%), बांग्लादेश (41%), इंडोनेशिया (41%), मंगोलिया (41%), पापुआ न्यू गिनी (46%), और मालदीव्स (48%).</p>
<p style="text-align:justify;">2010-2024 के दौरान, विश्व में एचआईवी से नए संक्रमित होने वालों की संख्या में 40% गिरावट आई, पर अफ़्रीका के देशों ने अधिक प्रगति की और वहाँ यह संख्या 57% गिरी. पर एशिया पसिफ़िक के देशों में यह संख्या सिर्फ़ 17% कम हुई.</p>
<p style="text-align:justify;">लेटल्होगोनॉलों ने बताया कि 2023 में, 54 अफ़्रीकी देशों में से सिर्फ़ 16 ने अपने देश के एचआईवी कार्यक्रम को पूर्णत: सरकारी निवेश से पोषित किया था. अमीर देशों के अनुदान पर टिके हुए बाक़ी देशों के एचआईवी कार्यक्रम, वित्तपोषण की नज़र से अत्यंत संकट में हैं. सभी देशों को अपने स्वास्थ्य कार्यक्रम को पूर्णत: सरकारी निवेश पर, या देश के भीतर ही वित्तपोषण के ज़रिए चलाना चाहिए.</p>
<p style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में संबोधित करते हुए, संयुक्त राष्ट्र के अन्तर-सरकारी उच्च-स्तरीय राजनीतिक बैठक 2025 में, सतत-विकास-लक्ष्य-3 (स्वास्थ्य सुरक्षा) पर मुख्य चर्चाकर्ता शोभा शुक्ला (सीएनएस संस्थापक) ने कहा कि प्रजनन और यौनिक स्वास्थ्य सेवाएँ, आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं में शामिल होनी चाहिए, जैसे कि सुरक्षित गर्भपात, गर्भपात के बाद की देखभाल, माहवारी संबंधित स्वास्थ्य और स्वच्छता, मानसिक स्वास्थ्य सेवा, आदि. हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी स्वास्थ्य सेवाएं हर लड़की और महिला तक अधिकार-स्वरूप पहुँच रही हों, जिनमें विकलांग लोग, जनजातीय लोग, विभिन्न जेंडर के लोग, अधिक आयु के लोग, घुमंतू श्रमिक, शरणार्थी, एचआईवी के साथ जीवित लोग, यौन कर्मी, नशा करने वाले लोग, आदि भी शामिल रहें. महिला हिंसा को झेल रही महिलाओं को सभी प्रकार की स्वास्थ्य और सामाजिक सहयोग और सुरक्षा मिले.</p>
<p style="text-align:justify;">शोभा शुक्ला ने संयुक्त राष्ट्र में एकत्रित सरकारी प्रतिनिधियों से कहा कि सतत विकास लक्ष्यों पर 2030 तक खरा उतरने के लिए सिर्फ़ 5 साल शेष रह गए हैं परंतु जेंडर और स्वास्थ्य न्याय की ओर प्रगति असंतोषजनक है. उन्होंने अपील की कि स्वास्थ्य और जेंडर न्याय को सरकारें प्राथमिकता दें और कार्यक्रम में तेज़ी लायें क्योंकि जब तक जेंडर न्याय और स्वास्थ्य सुरक्षा सबको नसीब नहीं होगी, तब तक सतत विकास लक्ष्यों पर हम खरा नहीं उतर सकते.</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>बॉबी रमाकांत – सीएनएस (सिटीज़न न्यूज़ सर्विस)</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>(बॉबी रमाकांत, विश्व स्वास्थ्य संगठन महानिदेशक द्वारा 2008 में पुरस्कृत, सीएनएस (सिटीज़न न्यूज़ सर्विस) के संपादकीय से जुड़े हैं.</strong></p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>जन स्वास्थ्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 17 Aug 2025 11:06:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Mohit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>IVF– इच्छुक माता-पिता के लिए एक उम्मीद की किरण: डॉ. अनिशा चौधरी</title>
                                    <description><![CDATA[बांझपन आज वैश्विक स्तर पर हर छह में से एक दंपति को प्रभावित करता है. भारत में लगभग 2.75 करोड़ दंपतियां इस चुनौती का सामना कर रही हैं, और यह संख्या लगातार बढ़ रही है.]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/public-health/ivf-a-ray-of-hope-for-interested-parents-dr-anisha-chaudhary/article-14935"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-07/resized-image-(10).jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हर साल 25 जुलाई को वर्ल्ड आईवीएफ डे के रूप में मनाया जाता है, जो 1978 में दुनिया के पहले आईवीएफ शिशु के जन्म की ऐतिहासिक उपलब्धि को समर्पित है. यह वैज्ञानिक सफलता न केवल चिकित्सा जगत की एक क्रांति थी, बल्कि उन असंख्य दंपतियों के लिए एक नई आशा बनकर उभरी जो संतान प्राप्ति के संघर्ष से जूझ रहे थे. </p>
<p style="text-align:justify;">बांझपन आज वैश्विक स्तर पर हर छह में से एक दंपति को प्रभावित करता है. भारत में लगभग 2.75 करोड़ दंपतियां इस चुनौती का सामना कर रही हैं, और यह संख्या लगातार बढ़ रही है. इसके पीछे बदलती जीवनशैली, देर से मातृत्व की योजना, मोटापा, अत्यधिक तनाव, प्रदूषण, और पीसीओएस व एंडोमेट्रियोसिस जैसी जटिल प्रजनन संबंधी स्वास्थ्य समस्याएं प्रमुख कारण हैं. इसके बावजूद, कई दंपति मदद लेने में देर कर देते हैं — अक्सर सामाजिक कलंक, जानकारी की कमी या असफलता के डर की वजह से. </p>
<p style="text-align:justify;">बांझपन की राह भावनात्मक और शारीरिक रूप से बेहद निराशाजनक हो सकती है. ऐसे में इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (IVF) एक महत्वपूर्ण सहारा बनकर उभरता है — एक ऐसी आधुनिक तकनीक जिसमें अंडाणु और शुक्राणु को शरीर के बाहर निषेचित किया जाता है, और फिर एक स्वस्थ भ्रूण को गर्भाशय में स्थानांतरित किया जाता है.आईवीएफ कोई अंतिम विकल्प नहीं, बल्कि एक सशक्त और समयबद्ध समाधान है, खासकर तब जब अन्य उपचारों से सफलता नहीं मिलती. </p>
<h3 style="text-align:justify;">बांझपन पर चुप्पी तोड़ना </h3>
<p style="text-align:justify;">बांझपन कोई असामान्य बात नहीं है, और यह केवल महिलाओं से जुड़ी समस्या भी नहीं है — वास्तव में करीब 40–50% मामलों में कारण पुरुषों से जुड़े होते हैं. लेकिन दुर्भाग्यवश, अधिकांश मामलों में भावनात्मक बोझ महिलाओं को ही उठाना पड़ता है. हमें एक समाज के रूप में इस सोच को बदलने की जरूरत है. दोषारोपण की जगह सहयोग और समझ का वातावरण बनाना ज़रूरी है, ताकि दंपतियों को खुलकर अपनी समस्याओं के बारे में बात करने और समय पर उपचार लेने में संकोच न हो. </p>
<h3>समय पर मदद — उम्मीद की पहली सीढ़ी</h3>
<p style="text-align:justify;">अगर आप एक साल से गर्भधारण की कोशिश कर रहे हैं (या आपकी उम्र 35 वर्ष से अधिक है और छह महीने में भी सफलता नहीं मिली है), तो यह संकेत है कि आपको प्रजनन विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए. बहुत से मामलों में बिना आईवीएफ के भी उपचार संभव होता है, लेकिन समय पर जांच और सही दिशा में कदम उठाना सबसे ज़रूरी है. प्रजनन से जुड़ी हर स्थिति अलग होती है, और सफलता उम्र, जीवनशैली, स्वास्थ्य व अन्य कारकों पर निर्भर करती है. हम चिकित्सकों की भूमिका केवल इलाज करना नहीं, बल्कि इस संवेदनशील यात्रा में आपका मार्गदर्शन करना है — ईमानदारी, सहानुभूति और भरोसे के साथ. </p>
<h3>आईवीएफ है सुरक्षित — मिथकों को तोड़े </h3>
<p style="text-align:justify;">आईवीएफ को लेकर फैली भ्रांतियां इसकी राह में सबसे बड़ी रुकावट हैं. लोग इसे असुरक्षित या अप्राकृतिक मानते हैं, जबकि यह वैज्ञानिक अनुसंधान और सख्त सुरक्षा मानकों पर आधारित प्रक्रिया है, जिसे दुनिया भर में चार दशक से अधिक समय से सफलतापूर्वक अपनाया जा रहा है. आईवीएफ से जन्मे बच्चों में जन्म दोष की संभावना प्राकृतिक गर्भधारण जितनी ही होती है. साथ ही, यह भी एक मिथक है कि आईवीएफ से अंडाशय “खाली” हो जाते हैं या इससे कैंसर का खतरा बढ़ता है — इन दोनों बातों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है.</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ल्ड आईवीएफ डे उन अग्रदूतों को सम्मान देने का दिन है जिन्होंने प्रजनन चिकित्सा में क्रांतिकारी बदलाव लाए. यह उन सफलताओं का जश्न है जिन्होंने अनगिनत जीवन को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया, और उन संभावनाओं की याद दिलाता है जो कभी असंभव लगती थीं. टाटा मेन हॉस्पिटल में हमारा लक्ष्य है — प्रजनन उपचार को न केवल सुलभ और सुरक्षित बनाना, बल्कि उसे गरिमा, करुणा और विश्वास से जोड़ना. हमारा मानना है कि हर दंपति को अपना परिवार बसाने का पूरा अधिकार है — और हम इस सफर में उनके साथ हैं, हर कदम.</p>
<p style="text-align:justify;">इस वर्ल्ड आईवीएफ डे पर आइए जागरूकता और समझदारी की रोशनी फैलाएं.<br />बांझपन कोई ठहराव नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत की ओर पहला कदम है — जो सही सलाह, वैज्ञानिक सहयोग और आत्मविश्वास के साथ एक नई जिंदगी का रास्ता बन सकता है.</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>डॉ. अनिशा चौधरी, विशेषज्ञ, मेडिकल इनडोर सर्विसेज, टाटा मेन हॉस्पिटल</strong>.</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>महिला</category>
                                            <category>जन स्वास्थ्य</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 25 Jul 2025 18:58:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sujit Sinha]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Climate कहानी: आपका सादा खाना भी काफ़ी ‘ओइली’ है!</title>
                                    <description><![CDATA[हमारा खाना अब मिट्टी में नहीं, तेल में उगता है. क्योंकि आधुनिक खाद्य प्रणाली आज दुनिया के 40% पेट्रोकेमिकल्स और 15% फॉसिल फ्यूल खुद हज़म कर रही है.]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/public-health/climate-story-your-plain-food-is-also-enough-oily/article-14657"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-06/resized-image-(29).jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">क्या आप जानते हैं कि आपका सादा खाना भी काफ़ी ‘ओइली’ है? नहीं, हम घी या सरसों तेल की बात नहीं कर रहे—हम बात कर रहे हैं उस कच्चे तेल की जिसकी कीमत इज़राइल-ईरान जैसे युद्धों से तय होती है, और जिसकी लत में डूबी है आज की पूरी खाद्य प्रणाली. आज चावल से लेकर चिप्स के पैकेट तक, खेत से लेकर किराना स्टोर तक, हर चीज़ में छुपा है डीज़ल, पेट्रोल और पेट्रोकेमिकल्स का जाल. IPES-Food की नई रिपोर्ट कहती है—हमारा खाना अब मिट्टी में नहीं, तेल में उगता है. क्योंकि आधुनिक खाद्य प्रणाली आज दुनिया के 40% पेट्रोकेमिकल्स और 15% फॉसिल फ्यूल खुद हज़म कर रही है. खाद, कीटनाशक, ट्रांसपोर्ट, पैकिंग, कोल्ड स्टोरेज—हर स्तर पर तेल और गैस की निर्भरता इतनी गहरी है कि खाने की कीमत अब फसल से ज़्यादा, फॉसिल फ्यूल मार्केट से तय होती है.</p>
<h3 style="text-align:justify;">और जब तेल की कीमत बढ़ती है, भूख भी महंगी हो जाती है.</h3>
<p style="text-align:justify;">दूसरे शब्दों में कहें तो आज जो चावल, सब्ज़ी, फल, आपकी थाली में और जो पैकेटबंद बिस्किट आपकी हथेली में हैं—उनमें मिट्टी से ज़्यादा शायद मिट्टी से निकलने वाला तेल छिपा है. और यही तेल अब हमारी रसोई में भूख का नया एजेंट बन चुका है. एक ऐसा एजेंट जिसकी कीमत इज़राइल-ईरान जैसे युद्ध तय करते हैं, और ऐसी वजह जो गरीब की थाली भी महंगी कर देती है. मामला दरअसल ये है कि IPES-Food की रिपोर्ट ‘Fuel to Fork’ बताती है—हमारे खाने की पूरी चेन तेल पर चलती है. खेत से लेकर थाली तक.</p>
<h3 style="text-align:justify;">अब खेत में मिट्टी से ज़्यादा डीज़ल की महक</h3>
<p style="text-align:justify;">चलिए एक गांव की तस्वीर सोचिए—बिहार का सिवान, या हरियाणा का कैथल. वहां एक किसान सुबह उठकर ट्रैक्टर स्टार्ट करता है, बीज डालता है, खाद छिड़कता है. पर वो खाद, वो ट्रैक्टर, वो सिंचाई—सब कुछ तेल या गैस से जुड़ा है. खेतों में जो यूरिया और DAP डलती है—उसका 99% हिस्सा फॉसिल फ्यूल से बनता है खेत से सब्ज़ी लेकर जो ट्रक शहर जाता है—वो डीज़ल पीता है और फिर जब तुम मॉल से बिस्किट या नमकीन का पैकेट उठाते हो, तो उसकी प्लास्टिक पैकिंग भी तेल से बनी होती है<br />मतलब ये कि हमारे खाने में अब मिट्टी से ज़्यादा तेल की बू है. जब तेल बढ़ेगा, भूख भी बढ़ेगी आपको याद है न, साल 2022 में जब पेट्रोल ₹100 के पार गया था, सब्ज़ी और दूध के दाम भी आसमान छू गए थे. वही सिलसिला अब फिर सिर उठाता दिख रहा है. IPES-Food के एक्सपर्ट राज पटेल कहते हैं: "जब खाना तेल पर टिका हो, तो हर युद्ध, हर संकट सीधा आपकी थाली पर असर डालता है."</p>
<p style="text-align:justify;">इसका सीधा असर मध्यमवर्ग और ग्रामीण परिवारों पर पड़ेगा—जहाँ पहले ही थाली से दाल गायब होती जा रही है. जो किसान खाद खरीदते थे, अब उधारी में बीज लेते हैं. और जो शहरों में रहते हैं, उनके लिए सब्ज़ियाँ अब मौसमी नहीं, महँगी हो गई हैं. और ये जो ‘सोल्यूशन’ बेचे जा रहे हैं, वो असल में जाल हैं अब कंपनियाँ कहती हैं—‘डिजिटल फार्मिंग करिए’, ‘ब्लू अमोनिया अपनाइए’, ‘स्मार्ट फर्टिलाइज़र लीजिए’. पर सच ये है कि ये सब फिर से तेल पर ही टिका है, और किसानों को नई तरह की गुलामी की ओर धकेलता है—जहाँ उनका डेटा भी बिकता है और फ़सल भी. यानी समाधान के नाम पर फिर से वही मुनाफ़ा, वही तेल, वही कंट्रोल.</p>
<h3 style="text-align:justify;">लेकिन रास्ता है—गाँवों में, मंडियों में, यादों में</h3>
<p style="text-align:justify;">भारत का असली खाना वो है जो दादी की रसोई से आता था—मक्का, ज्वार, सब्ज़ी की रसेदार तरी, बिना प्लास्टिक के, बिना रासायनिक खाद के. IPES-Food की विशेषज्ञ Georgina Catacora-Vargas कहती हैं: "फॉसिल फ्यूल-मुक्त फूड सिस्टम कोई सपना नहीं है—वो आज भी हमारे आदिवासी और देसी समुदायों में जिंदा है." छत्तीसगढ़ की बस्तर मंडी, मेघालय का सामुदायिक बाग़ान, विदर्भ की महिला किसान समूह—ये सब बताते हैं कि लोकल, जैविक और विविध खाना सिर्फ़ स्वाद नहीं, आज आज़ादी की पहचान बन चुका है.</p>
<h3 style="text-align:justify;">अब सवाल यह है:</h3>
<p style="text-align:justify;">क्या COP30 जैसी जलवायु वार्ताओं में खाने की बात होगी? या फिर हम जलवायु को सिर्फ़ कार्बन क्रेडिट की भाषा में ही समझते रहेंगे, और रसोई में खड़ा किसान फिर से छूट जाएगा? तेल से टपकती इस थाली को अब बदलाव की ज़रूरत है. वो बदलाव खेतों की मिट्टी में, देसी बीजों में, लोकल मंडियों में और थाली की सादगी में छुपा है.</p>
<p style="text-align:justify;">आप बताइये—क्या हम फिर से अपने खाने को आज़ाद कर सकते हैं?</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>जन स्वास्थ्य</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/article/public-health/climate-story-your-plain-food-is-also-enough-oily/article-14657</link>
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                <pubDate>Fri, 27 Jun 2025 11:06:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>फाइलेरिया उन्मूलन के लिए सामुदायिक सहभागिता एवं जनांदोलन बहुत ज़रूरी: अरुण कुमार सिंह</title>
                                    <description><![CDATA[<p>आज से राज्य के 15 जिलों में शुरू किया जा रहा है मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एमडीए/आईडीए) कार्यक्रम</p>
<p><strong>रांची:</strong> राज्य सरकार द्वारा आज से राज्य के 15 फाइलेरिया प्रभावित जिलों (लोहरदगा, हजारीबाग, बोकारो, देवघर, धनबाद, गुमला, कोडरमा, पाकुड़, रामगढ़, साहिबगंज, सिमडेगा, गढवा, पू० सिंहभूम, प० सिंहभूम और रांची ) में फाइलेरिया रोग के उन्मूलन के लिए मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एम.डी.ए) कार्यक्रम प्रारंभ किया जा रहा है।</p>
<p>  </p>
<p>राज्य के अपर मुख्य सचिव (स्वास्थ्य), अरुण कुमार सिंह ने बताया कि सिमडेगा को छोड़कर बाक़ी सभी 14 जिलों में 2 दवाओं डीईसी और अल्बंडाजोल एवं सिमडेगा जिले में 3 दवाओं डीईसी, अल्बंडाजोल के साथ</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/community-participation-and-mass-movement-are-very-important-for-eradication-of-filariasis-arun-kumar-singh/article-10462"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2023-02/arun-singh.jpeg" alt=""></a><br /><p>आज से राज्य के 15 जिलों में शुरू किया जा रहा है मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एमडीए/आईडीए) कार्यक्रम</p>
<p><strong>रांची:</strong> राज्य सरकार द्वारा आज से राज्य के 15 फाइलेरिया प्रभावित जिलों (लोहरदगा, हजारीबाग, बोकारो, देवघर, धनबाद, गुमला, कोडरमा, पाकुड़, रामगढ़, साहिबगंज, सिमडेगा, गढवा, पू० सिंहभूम, प० सिंहभूम और रांची ) में फाइलेरिया रोग के उन्मूलन के लिए मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एम.डी.ए) कार्यक्रम प्रारंभ किया जा रहा है।</p>
<p> </p>
<p>राज्य के अपर मुख्य सचिव (स्वास्थ्य), अरुण कुमार सिंह ने बताया कि सिमडेगा को छोड़कर बाक़ी सभी 14 जिलों में 2 दवाओं डीईसी और अल्बंडाजोल एवं सिमडेगा जिले में 3 दवाओं डीईसी, अल्बंडाजोल के साथ आईवरमेंक्टिन की निर्धारित खुराक दवा प्रशासकों द्वारा बूथ एवं घर-घर जाकर अपने सामने मुफ्त खिलाई जाएगी। यह दवाएं पूरी तरह सुरक्षित हैं। ये दवाएं 2 साल से कम उम्र के बच्चों, गर्भवती महिलाओं और गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों को नहीं दी जाएंगी। रैपिड रिस्पांस टीम दवा के सेवन के दौरान किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए आवश्यक दवाओं के साथ मौके पर सक्रिय रहेगी।</p>
<p>उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी कार्यक्रम की सफलता सामुदायिक भागीदारी से ही सुनिश्चित की जा सकती है और फाइलेरिया के उन्मूलन के लिए हम सभी को एक साथ मिलकर इस लड़ाई को जीतना होगा। राज्य के अभियान निदेशक डॉ. भुवनेश प्रताप सिंह ने बताया कि राज्य स्तर से जिला स्तर तक समन्वय बनाकर, मास ड्रग कार्यक्रम को सफलतापूर्वक संपन्न करने के लिए सुनियोजित रणनीति के अनुसार कार्य किया जा रहा है ताकि कार्यक्रम के अंतर्गत सम्पादित होने वाली गतिविधियाँ गुणवत्ता के साथ पूर्ण की जा सकें और कार्यक्रम के दौरान फाइलेरिया रोधी दवाईयों और मानव संसाधनों की कोई कमी न हो। इस कार्यक्रम की प्रतिदिन राज्य स्तर पर समीक्षा की जायेगी और कार्यक्रम के दौरान आने वाली हर समस्या का तुरंत समाधान किया जायेगा। हमारा लक्ष्य है कि इस बार 100 प्रतिशत लाभार्थियों द्वारा फाइलेरिया रोधी दवाओं का सेवन सुनिश्चित किया जाये।</p>
<p> </p>
<p>राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी, वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम, डॉ. अनिल कुमार ने बताया कि फाइलेरिया मच्छर के काटने से फैलता है और यह दुनिया भर में दीर्घकालिक विकलांगता के प्रमुख कारणों में से एक है। किसी भी आयु वर्ग में होने वाला यह संक्रमण लिम्फैटिक सिस्टम को नुकसान पहुंचाता है और अगर इससे बचाव न किया जाए तो इससे शारीरिक अंगों में असामान्य सूजन होती है।</p>
<p>फाइलेरिया के कारण चिरकालिक रोग जैसे हाइड्रोसील (अंडकोष की थैली में सूजन), लिम्फेडेमा (अंगों की सूजन) व काइलुरिया (दूधिया सफेद पेशाब) से ग्रसित लोगों को अक्सर सामाजिक बहिष्कार का बोझ सहना पड़ता है, जिससे उनकी आजीविका व काम करने की क्षमता भी प्रभावित होती है। राज्य में वर्ष 2022 के आंकड़ों के अनुसार लिम्फेडेमा के 5691 मरीज चिन्हित किए गए हैं और कुल हाइड्रोसील के 11713 मरीज हैं। जिसमें से 9365 (80%) मरीजों का सफल ऑपरेशन किया जा चुका है।</p>
<p>इसके साथ ही 41680 फाइलेरिया मरीजों को एम.एम. डी. पी. किट निशुल्क प्रदान की गयी है। इस कार्यक्रम के सफल किर्यन्वयन हेतु उपरोक्त समस्त जिलों के कुल 1,45,60,220 लाभुकों को दवा सेवन का लक्ष्य रखा गया है। इस कार्यक्रम की निगरानी हेतु पर्यवेक्षकों को भी लगाया गया है, तथा किसी भी विषम परिस्थितियों से निपटने हेतु चिकित्सक के नेतृत्व में जिला एवं ब्लॉक स्तर पर रेपिड रेस्पान्स टीमों का भी गठन किया गया हैं।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                            <category>जन स्वास्थ्य</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Feb 2023 16:12:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Jharkhand]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>झारखंड में मनाया गया चौथा विश्व एनटीडी दिवस, उन्मूलन के लिए किए जा रहे प्रयास</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>एनटीडी (नेग्लेक्टेड ट्रॉपिकल डिजीजेज़) के उन्मूलन के प्रति विश्व की प्रतिबद्धता को दर्शाता है एनटीडी दिवस</strong></p>
<p><strong>30 जनवरी को राज्य में मनाया गया चौथा विश्व एनटीडी दिवस</strong></p>
<p><strong>राँची :</strong> प्रत्येक वर्ष 30 जनवरी को पूरे विश्व में एनटीडी दिवस मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का अभिप्राय यह है कि विश्व के सारे लोग एनटीडी (नेग्लेक्टेड ट्रॉपिकल डिजीजेज़) के उन्मूलन के प्रति पूरी प्रतिबद्धता से जनांदोलन के रूप में कार्य करें।</p>
<p>इसी क्रम में राज्य में भी आज एनटीडी दिवस मनाया गया और लोगों को नेग्लेक्टेड ट्रॉपिकल डिजीजेज़ के बारे में जागरूक किया गया। वर्ष 2020 में विश्व को</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/fourth-world-ntd-day-celebrated-in-jharkhand-efforts-being-made-for-tropical-diseases-eradication/article-10448"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2023-01/kalaazhar.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>एनटीडी (नेग्लेक्टेड ट्रॉपिकल डिजीजेज़) के उन्मूलन के प्रति विश्व की प्रतिबद्धता को दर्शाता है एनटीडी दिवस</strong></p>
<p><strong>30 जनवरी को राज्य में मनाया गया चौथा विश्व एनटीडी दिवस</strong></p>
<p><strong>राँची :</strong> प्रत्येक वर्ष 30 जनवरी को पूरे विश्व में एनटीडी दिवस मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का अभिप्राय यह है कि विश्व के सारे लोग एनटीडी (नेग्लेक्टेड ट्रॉपिकल डिजीजेज़) के उन्मूलन के प्रति पूरी प्रतिबद्धता से जनांदोलन के रूप में कार्य करें।</p>
<p>इसी क्रम में राज्य में भी आज एनटीडी दिवस मनाया गया और लोगों को नेग्लेक्टेड ट्रॉपिकल डिजीजेज़ के बारे में जागरूक किया गया। वर्ष 2020 में विश्व को इन बीमारियों से सुरक्षित रखने के लिए पहली बार विश्व एनटीडी दिवस मनाया गया था।</p>
<p>राज्य के अपर मुख्य सचिव अरुण कुमार सिंह ने बताया कि एनटीडी जीवन को प्रभावित करने वाले रोगों का एक समूह है, जो अधिकतर गरीब, कमजोर आबादी को प्रभावित करता है।</p>
<p>एनटीडी में हाथीपांव (लिम्फैटिक फाइलेरिया) कालाजार (विसेरल लीशमैनियासिस) , कुष्ठरोग (लेप्रोसी), डेंगू, चिकुनगुनिया, सर्प-दंश, रेबीज़ जैसे रोग शामिल होते हैं, जिनकी रोकथाम पूर्णतया संभव है; मगर फिर भी पूरी दुनिया में हर साल बहुत सारे लोग इन रोगों से प्रभावित हो जाते हैं। भारत में भी हर साल हजारों लोग इन एनटीडी रोगों से संक्रमित हो जाने के कारण जीवन भर असहनीय पीड़ा सहते हैं और दिव्यांग भी हो जाते हैं, जिसके कारण वे अपनी आजीविका कमाने में भी अक्षम भी हो जाते हैं और उनकी आर्थिक व सामाजिक स्थिति अत्यंत दयनीय हो जाती है।</p>
<p>झारखण्ड के अभियान निदेशक डॉ. भुवनेश प्रताप सिंह ने बताया कि भारत दुनिया भर में प्रत्येक प्रमुख एनटीडी के लिए पहले स्थान पर है। ये गंभीर रोग हैं और इनसे प्रभावित लोगों की शिक्षा, पोषण और आर्थिक विकास पर विपरीत प्रभाव होता है , परंतु इनकी रोकथाम एवं उन्मूलन पूर्ण रूप से संभव है। राज्य सरकार सभी प्रकार के एनटीडी रोगों के उन्मूलन हेतु प्रतिबद्ध है और इनसे सम्बंधित सभी गतिविधियो को मिशन मोड में संचालित किया जा रहा है।</p>
<p>राज्य के वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम पदाधिकारी डॉ. अनिल कुमार ने बताया कि गत 13 जनवरी को आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री मनसुख मांडविया ने कहा कि एनटीडी के अंतर्गत आने वाले रोग भारत के लिए नेग्लेक्टेड नहीं हैं और इसीलिए, भारत सरकार इन रोगों के उन्मूलन के लिए प्राथमिकता पर कार्य कर रही है। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मन की बात कार्यक्रम में कहा है कि फ़ाइलेरिया रोग के उन्मूलन की प्रतिबद्धता के दृष्टिगत इसके उन्मूलन का लक्ष्य वर्ष 2027 निर्धारित किया गया है एवं कालाजार के उन्मूलन का लक्ष्य वर्ष 2023 निर्धारित किया गया है।</p>
<p> </p>
<p>डॉ. अनिल ने यह भी बताया कि राज्य सरकार के दिशा-निर्देश और प्रतिबद्धता के अनुरूप राज्य में एनटीडी रोगों के उन्मूलन के लिए राज्य स्तर से ग्राम स्तर तक सभी संभव प्रयास किये जा रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप, वर्तमान में राज्य का केवल 1 प्रखंड – पाकुड़ का लिट्टीपाड़ा कालाजार रोग से प्रभावित है। हमें पूर्ण विश्वास है कि जिस तरह से राज्य कालाजार के उन्मूलन की और अग्रसर है, उसी प्रकार अंतर विभागीय समन्वय से और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच दूर-दराज इलाकों तक सुनिश्चित कर राज्य को फाइलेरिया से भी जल्द ही मुक्त कराया जायेगा एवं इसी प्रकार के समस्त एनटीडी रोगों का राज्य से शीघ्र उन्मूलन होगा।</p>
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                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>बड़ी खबर</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                            <category>जन स्वास्थ्य</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 31 Jan 2023 08:47:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Jharkhand]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>फाइलेरिया और हाथीपांव रोग गंभीर जरूर लेकिन नियमित दवाओं के सेवन से रोग होगा दूर: डॉ अरुण</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
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<p><strong>रांची:</strong> फाइलेरिया रोग सार्वजनिक स्वास्थ्य की घातक बीमारी बनती जा रही है। पूरी दुनिया के साथ- साथ इस रोग से झारखंड भी अछूता नहीं है। महज रूप से लेता है। इस गम्भीर विषय पर स्वास्थ्य विभाग के सचिव डॉ अरुण कुमार सिंह से किये गए बातचीत के अंश इस प्रकार प्रस्तुत हैं।</p>
<p>  </p>
<p><strong>सवाल:</strong> फ़ाइलेरिया रोग क्या है और झारखण्ड में इसकी क्या स्थिति है ?</p>
<p><strong>जवाब:</strong> फाइलेरिया या हाथीपांव रोग, सार्वजनिक स्वास्थ्य की गंभीर समस्या है। यह रोग मच्छर के काटने से फैलता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के अनुसार फाइलेरिया, दुनिया भर में दीर्घकालिक विकलांगता के प्रमुख कारणों में</p></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/filariasis-and-elephantiasis-are-serious-but-regular-medicines-will-cure-the-disease-dr-arun/article-10218"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2022-10/arun-kumar-singh.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
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<p><strong>रांची:</strong> फाइलेरिया रोग सार्वजनिक स्वास्थ्य की घातक बीमारी बनती जा रही है। पूरी दुनिया के साथ- साथ इस रोग से झारखंड भी अछूता नहीं है। महज रूप से लेता है। इस गम्भीर विषय पर स्वास्थ्य विभाग के सचिव डॉ अरुण कुमार सिंह से किये गए बातचीत के अंश इस प्रकार प्रस्तुत हैं।</p>
<p> </p>
<p><strong>सवाल:</strong> फ़ाइलेरिया रोग क्या है और झारखण्ड में इसकी क्या स्थिति है ?</p>
<p><strong>जवाब:</strong> फाइलेरिया या हाथीपांव रोग, सार्वजनिक स्वास्थ्य की गंभीर समस्या है। यह रोग मच्छर के काटने से फैलता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के अनुसार फाइलेरिया, दुनिया भर में दीर्घकालिक विकलांगता के प्रमुख कारणों में से एक है। पूरी दुनिया के फ़ाइलेरिया के मरीजों में लगभग 45 प्रतिशत फ़ाइलेरिया रोगी भारत में हैं। राज्य में वर्ष 2021 के आंकड़ों के अनुसार लिम्फेडिमा (अंगों में सूजन)  के लगभग 43768 मरीज़ हैं और  हाइड्रोसील (अंडकोष की थैली में सूजन) के 46220 मरीज़ हैं । जिनमे से अबतक 3885 मरीजों का सफल आपरेशन किया जा चुका है।</p>
<p><strong>सवाल:</strong> यह रोग हो जाने पर पीड़ित व्यक्ति के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है ?</p>
<p><strong>जवाब:</strong> वैसे तो यह रोग किसी भी आयु वर्ग में हो सकता है मगर बच्चों को इससे अधिक ख़तरा है। यह संक्रमण लिम्फैटिक सिस्टम को नुकसान पहुंचाता है और अगर इससे बचाव न किया जाए तो इससे शारीरिक अंगों में असामान्य सूजन होती है। फाइलेरिया के कारण चिरकालिक रोग जैसे; हाइड्रोसील (अंडकोष की थैली में सूजन), लिम्फेडेमा (अंगों की सूजन) व काइलुरिया (दूधिया सफेद पेशाब) से ग्रसित लोगों को अक्सर सामाजिक बहिष्कार का बोझ सहना पड़ता है, जिससे उनकी आजीविका व काम करने की क्षमता भी प्रभावित होती है।</p>
<p><strong>सवाल:</strong> राज्य सरकार इसके उन्मूलन के लिए क्या प्रयास कर रही है ?</p>
<p><strong>जवाब:</strong> झारखण्ड सरकार, लिम्फेटिक फाइलेरिया (हाथीपांव) के उन्मूलन हेतु पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इस रोग से बचाव के लिए राष्ट्रीय फाइलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम के अंतर्गत राज्य सरकार द्वारा समय- समय पर मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एमडीए) कार्यक्रम चलाये जाते हैं। इसी क्रम में, आगामी 16 सितम्बर से 30 सितम्बर 2022  तक  झारखण्ड के 8 फाइलेरिया प्रभावित जिलों (लोहरदगा, हज़रीबाग, गिरिडीह, गढवा, पू० सिंहभूम, प० सिंहभूम, खूंटी और रांची ) में कोरोना के दिशा- निर्देशों के अनुसार शारीरिक दूरी, मास्क और हाथों की साफ- सफाई का अनुपालन करते हुए फाइलेरिया रोग उन्मूलन के लिए मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन कार्यक्रम प्रारंभ किया जा रहा है। राज्य स्तर से जिला स्तर तक विभिन्न विभागों एवं स्वयं सेवी संस्थाओ के साथ समन्वय बनाकर कार्य किया जा रहा है, ताकि कार्यक्रम में किसी भी संसाधन की कमी न होने पाए। एमडीए गतिविधियों का संचालन कोविड-19  के मानकों  का पालन करते हुए किया जायेगा, जिसमें हाथ की स्वच्छता, मास्क और शारीरिक दूरी (दो गज की दूरी) शामिल हैं । इस अभियान में सभी वर्गों के लाभार्थियों को फाइलेरिया से सुरक्षित रखने के लिए 2 दवाएं डी.ई.सी. और अल्बंडाज़ोल की निर्धारित खुराक प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा घर- घर जाकर, अपने सामने मुफ्त खिलाई जायेगी।  किसी भी स्थिति में, दवा का वितरण नहीं किया जायेगा। इन दवाओं का सेवन खाली पेट नहीं करना है।  2 वर्ष से कम उम्र के बच्चों, गर्भवती महिलाओं और अति गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति यों को ये दवाएं नहीं खिलाई जाती है।</p>
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<p><strong>सवाल:</strong> फ़ाइलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम के सफल किर्यन्वयन में किस तरह की चुनौतियाँ हैं ?</p>
<p><strong>जवाब:</strong> देखिये इस कार्यक्रम में सबसे बड़ी चुनौती है, लाभार्थियों का इस रोग की गंभीरता को समझते हुए मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के दौरान फ़ाइलेरिया रोधी दवाओं का प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों के सामने सेवन करना। हम सब प्रशासनिक स्तर और सामजिक स्तर पर सकारात्मक प्रयास कर रहें हैं कि कार्यक्रम के दौरान 100% लाभार्थियों द्वारा फ़ाइलेरिया रोधी दवाओं का सेवन  किया जाना सुनिश्चित हों।</p>
<p><strong>सवाल:</strong> सर, फ़ाइलेरिया के बारे में तो काफी बातचीत हो गयी, लेकिन कालाजार रोग क्या है और राज्य के कौन- कौन से  जिले कालाजार रोग से प्रभावित हैं, साथ ही सरकार द्वारा लोगों को इससे सुरक्षित रखने के लिए क्या उपाय किये जा रहें हैं ?</p>
<p><strong>जवाब:</strong> देखिये, कालाजार का संक्रमण बालू मक्खी यानि सैंडफ्लाई द्वारा होता है। यह बालू मक्खी कालाजार रोग के परजीवी लीशमेनिया डोनोवानी को एक रोगी व्यक्ति से दूसरे स्वस्थ व्यक्ति तक फैलाती है। यदि किसी व्यक्ति को दो सप्ताह से ज्यादा से बुखार हो, उसकी तिल्ली और जिगर बढ़ गया हो और उपचार से ठीक न हो, तो उसे कालाजार हो सकता है। कालाजार को फैलाने वाली बालू मक्खी के खत्म करने के लिए सरकार द्वारा कीटनाशी दवा का छिड़काव (आ ई.आर.एस.) करवाया जाता है। झारखण्ड सरकार कालाजार रोग के उन्मूलन के लिए भी प्रतिबद्ध है और इसी क्रम में कालाजार से प्रभावित 4 जिलों (गोड्डा, दुमका, साहेबगंज और पाकुड़) में समय- समय पर कीटनाशी दवा का छिड़काव कराया जाता है। दिनांक 1 अगस्त, 2022 से 45 दिनों तक उपरोक्त जिलों में कीटनाशी दवा का छिड़काव कराया जा रहा है। इस बारे में एक विशेष बात आपको बताना चाहूँगा कि अभी कुछ दिन पहले कोलंबिया देश में कालाजार से प्रभावित अन्य देशों के राजनीतिज्ञों, उच्चस्तरीय अधिकारियों एवं कार्यक्रम अधिकारियों की कालाजार रोग के उन्मूलन पर विस्तृत चर्चा हुई। जिसमें हमने स्वास्थ्य विभाग द्वारा विगत कई वर्षों के निरंतर प्रयासों से प्राप्त उपलब्धियों पर जानकारी साझा की और अंतर्राष्ट्रीय पटल पर सभी देशों के प्रभागियों को यह बताया कि राज्य में विषम परिस्थितियों के बावजूद रोग नियंत्रण मे सफल हुए जिसमे समय- समय पर छिड़काव, निगरानी एवं प्रत्येक स्तर पर कार्यक्रम का अनुश्रवण शामिल है। वहाँ से आने के पश्चात हमने उच्च प्रथिमकता वाले सभी गाँवों के लिए एक स्पेशल कार्ययोजना बनाई गई है और हम सुनिश्चित करेंगे की जिला एवं ब्लॉक अधिकारियों के माध्यम से इसका सफल क्रियान्वयन किया जाए ।</p>
<p><strong>सवाल:</strong> हमारे श्रोताओं को आपकी और से कोई सन्देश ?</p>
<p><strong>जवाब:</strong> फ़ाइलेरिया उन्मूलन के तहत सभी जिलों में वर्ष में एक बार चरणबद्ध तरीके से मास ड्रुग एडमिनिस्ट्रेशनका कार्यक्रम चलाया जा रहा है। मैं आपके समाचार पत्र के माध्यम से यह संदेश देना चाहता हूँ कि ये फ़ाइलेरिया रोधी दवाएं पूरी तरह सुरक्षित हैं। रक्तचाप, शुगर, अर्थरायीटिस या अन्य सामान्य रोगों से ग्रसित व्यक्तियों को भी  ये दवाएं खानी हैं। सामान्य लोगों को इन दवाओं के खाने से किसी भी प्रकार के दुष्प्रभाव नहीं होते हैं। और अगर किसी को दवा खाने के बाद उल्टी, चक्कर, खुजली या जी मिचलाने जैसे लक्षण होते हैं तो यह इस बात का प्रतीक हैं कि उस व्यक्ति के शरीर में  फाइलेरिया के कीटाणु मौजूद हैं, जोकि दवा खाने के बाद कीटाणुओं के मरने के कारण उत्पन्न होते हैं। इसके साथ ही कालाजार रोग के उन्मूलन के लिए जिस समय स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की टीम कीटनाशी दवा का छिड़काव करने आये, लोग उन्हें पूरा सहयोग करें।</p>
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]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                            <category>जन स्वास्थ्य</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 26 Oct 2022 15:19:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Jharkhand]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पोलियो के खिलाफ प्रयास कर रहे हैं देश, पर उप-राष्ट्रीय स्तर पर कमियां : डब्ल्यूएचओ एसई एशिया</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली :</strong> डब्ल्यूएचओ की दक्षिण-पूर्व एशिया की क्षेत्रीय निदेशक डॉ पूनम खेत्रपाल सिंह ने कहा कि दक्षिण-पूर्व एशिया के देश पोलियो के खिलाफ प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उप-राष्ट्रीय स्तर पर कुछ कमियां बनी हुई हैं। उन्होंने कहा कि पोलियो उन्मूलन के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्रीय प्रमाणन आयोग की यहां बैठक हुई और क्षेत्र की स्थिति की समीक्षा की गई। “हमें निगरानी और टीकाकरण कवरेज को बढ़ाने और पोलियो प्रकोप की स्थिति में तेजी से और समय पर प्रतिक्रिया देने के लिए अपनी पोलियो प्रकोप प्रतिक्रिया क्षमताओं को अपडेट करने की आवश्यकता है।”</p>
<p>इस सप्ताह दो दिवसीय बैठक में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/public-health/countries-are-making-efforts-against-polio-but-there-are-shortcomings-at-the-sub-national-level-who-se-asia/article-10111"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2022-09/poli.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>नई दिल्ली :</strong> डब्ल्यूएचओ की दक्षिण-पूर्व एशिया की क्षेत्रीय निदेशक डॉ पूनम खेत्रपाल सिंह ने कहा कि दक्षिण-पूर्व एशिया के देश पोलियो के खिलाफ प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उप-राष्ट्रीय स्तर पर कुछ कमियां बनी हुई हैं। उन्होंने कहा कि पोलियो उन्मूलन के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्रीय प्रमाणन आयोग की यहां बैठक हुई और क्षेत्र की स्थिति की समीक्षा की गई। “हमें निगरानी और टीकाकरण कवरेज को बढ़ाने और पोलियो प्रकोप की स्थिति में तेजी से और समय पर प्रतिक्रिया देने के लिए अपनी पोलियो प्रकोप प्रतिक्रिया क्षमताओं को अपडेट करने की आवश्यकता है।”</p>
<p>इस सप्ताह दो दिवसीय बैठक में राष्ट्रीय प्रमाणन समितियों और वैश्विक प्रमाणन आयोग के अध्यक्षों, डोनरों, भागीदार एजेंसियों के प्रतिनिधियों और डब्ल्यूएचओ ने भाग लिया। आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि इस क्षेत्र में जंगली पोलियो वायरस या परिसंचारी वैक्सीन-व्युत्पन्न पोलियोवायरस (सीवीडीपीवी) का कोई मामला नहीं है, लेकिन इस क्षेत्र की सीमा से लगे स्थानिक देशों में जंगली पोलियो वायरस टाइप 1 के निरंतर प्रसार के कारण जोखिम बना रहता है, साथ ही इसके कारण भी सीवीडीपीवी अन्य क्षेत्रों के कई देशों से रिपोर्ट किया जा रहा है।</p>
<p>आयोग ने सिफारिश की, जब तक वैश्विक पोलियो उन्मूलन हासिल नहीं हो जाता, तब तक स्थिति पर निरंतर निगरानी की आवश्यकता है। क्षेत्रीय निदेशक ने कहा कि विश्व स्तर पर पोलियो अंतरराष्ट्रीय चिंता का एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल बना हुआ है। इस महीने की शुरूआत में, न्यूयॉर्क ने अपशिष्ट जल के नमूनों में पोलियो वायरस का पता चलने के बाद आपातकाल की स्थिति घोषित कर दी थी। हाल के महीनों में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, मलावी और मोजाम्बिक में जंगली पोलियोवायरस टाइप 1 के मामले सामने आए हैं।</p>
<p>खेत्रपाल सिंह ने कहा, आज द्विसंयोजक मौखिक पोलियो वैक्सीन और निष्क्रिय पोलियो वैक्सीन के क्षेत्र में कवरेज 2020 के बाद से अधिकांश भाग में सुधार हुआ है, हालांकि, कई देशों में प्रक्षेपवक्र चिंता का कारण बना हुआ है। हालांकि, यह क्षेत्र पूरे कोविड -19 प्रतिक्रिया के दौरान वैश्विक निगरानी मानकों को बनाए रखने में सक्षम था, लेकिन राष्ट्रीय और उप-राष्ट्रीय स्तरों पर भिन्नताएं हैं जिन्हें संबोधित करने की आवश्यकता है।</p>
<p>अत्यधिक वित्तीय तनाव के बीच पर्याप्त संसाधनों को बनाए रखने पर जोर देते हुए, डॉ खेत्रपाल सिंह ने कहा कि इस क्षेत्र में पोलियो नेटवर्क को सक्षम करने से टीकाकरण प्रणाली को मजबूत करने और अन्य सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यों को करने से पोलियो-प्राथमिकता वाले देशों को वैश्विक पोलियो उन्मूलन हासिल होने तक मुख्य क्षमता और बुनियादी ढांचे को बनाए रखने में मदद मिलेगी। लगभग पिछले ढाई-तीन साल आसान नहीं रहे हैं, लेकिन इस क्षेत्र की निरंतर पोलियो मुक्त स्थिति पोलियो कार्यक्रम कार्यबल के समर्पण और प्रतिबद्धता का एक प्रमाण है, जिनमें से कई ने कोविड-19 में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।</p>
<p>21-22 सितंबर को दो दिवसीय बैठक में, डब्ल्यूएचओ के अफ्रीका, पूर्वी भूमध्यसागरीय, यूरोपीय और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्रों से पोलियो की स्थिति पर अपडेट भी साझा किए गए।</p>
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                                                            <category>बड़ी खबर</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>जन स्वास्थ्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 24 Sep 2022 14:05:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Jharkhand]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>MDA के दौरान अपने जिले में 100% लाभार्थियों को फाइलेरिया रोधी दवाएं खिलाने का लक्ष्य रखें : अभियान निदेशक</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>झारखंड सरकार द्वारा जिला स्तरीय प्रशिक्षकों का एमडीए कार्यक्रम पर प्रशिक्षण संपन्न</strong></p>
<p><strong>रांची :</strong> झारखंड सरकार, लिम्फेटिक फाइलेरिया यानी हाथीपांव के उन्मूलन के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इसी के फलस्वरूप राज्य सरकार द्वारा आगामी 16 सितम्बर से 30 सितम्बर तक झारखण्ड के 8 फाइलेरिया प्रभावित जिलों लोहरदगा, हजारीबाग, गिरिडीह, गढवा, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम, खूंटी और रांची में कोरोना के दिशा-निर्देशों के अनुसार शारीरिक दूरी, मास्क और हाथों की साफ-सफाई का अनुपालन करते हुए फाइलेरिया रोग उन्मूलन के लिए मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन कार्यक्रम प्रारंभ किया जा रहा है।</p>
<p>इस कार्यक्रम के सफल क्रियान्वयन के लिए शनिवार को स्वास्थ्य, चिकित्सा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/aim-to-feed-anti-filaria-medicines-to-100-percent-beneficiaries-in-your-district-during-mda-campaign-director/article-9934"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2022-08/mda.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>झारखंड सरकार द्वारा जिला स्तरीय प्रशिक्षकों का एमडीए कार्यक्रम पर प्रशिक्षण संपन्न</strong></p>
<p><strong>रांची :</strong> झारखंड सरकार, लिम्फेटिक फाइलेरिया यानी हाथीपांव के उन्मूलन के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इसी के फलस्वरूप राज्य सरकार द्वारा आगामी 16 सितम्बर से 30 सितम्बर तक झारखण्ड के 8 फाइलेरिया प्रभावित जिलों लोहरदगा, हजारीबाग, गिरिडीह, गढवा, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम, खूंटी और रांची में कोरोना के दिशा-निर्देशों के अनुसार शारीरिक दूरी, मास्क और हाथों की साफ-सफाई का अनुपालन करते हुए फाइलेरिया रोग उन्मूलन के लिए मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन कार्यक्रम प्रारंभ किया जा रहा है।</p>
<p>इस कार्यक्रम के सफल क्रियान्वयन के लिए शनिवार को स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग, झारखंड के अभियान निदेशक भुवनेश प्रताप सिंह की अध्यक्षता में उपर्युक्त 8 जिलों के सिविल सर्जन, जिला वीबीडी पदाधिकारी, जिला वीबीडी सलाहकार, मलेरिया निरीक्षक एवं प्रभारी चिकित्सक पदाधिकारियों को प्रशिक्षित किया गया, ताकि इसके अंतर्गत संपन्न की जाने वाली गतिविधियाँ सही रूप से संपादित हों।</p>
<p>इस अवसर पर राज्य के अभियान निदेशक भुवनेश प्रताप सिंह ने कहा कि मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के दौरान फाइलेरिया रोधी दवाओं का वितरण नहीं, बल्कि प्राशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों के सामने लाभार्थियों द्वारा दवा का सेवन सुनिश्चित होना चाहिए।</p>
<p>कार्यक्रम के दौरान 100ः लाभार्थियों द्वारा फ़ाइलेरिया रोधी दवाओं का सेवन किया जाना सुनिश्चित करें। समाज के लोगों को भी इस कार्यक्रम में ज़िम्मेदारी निभाने के लिए प्रेरित कीजिए, क्योंकि किसी भी कार्यक्रम की सफलता के लिए सामुदायिक सहभागिता बहुत आवश्यक होती है।</p>
<p>प्रशिक्षण में झारखंड के राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी, वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम डॉ अनिल कुमार ने बताया कि सितम्बर में शुरू किये जा रहे मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन कार्यक्रम में फाइलेरिया से मुक्ति के लिए 2 वर्ष से कम उम्र के बच्चों, गर्भवती महिलाओं और अति गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों को छोड़कर सभी लोगों को उम्र के अनुसार डीईसी और अलबेंडाजोल की निर्धारित खुराक प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा घर-घर जाकर अपने सामने मुफ़्त खिलाई जाएगी। डॉ अनिल ने यह भी बताया कि आमतौर पर बचपन में होने वाला फाइलेरिया संक्रमण लिम्फैटिक सिस्टम को नुकसान पहुंचाता है और अगर इसका इलाज न किया जाए तो इससे शारीरिक अंगों में असामान्य सूजन होती है।</p>
<p>फाइलेरिया के कारण चिरकालिक रोग जैसे हाइड्रोसील यानी अंडकोष की थैली में सूजन, लिम्फेडिमा यानी अंगों में सूजन से ग्रसित लोगों को अक्सर सामाजिक भेदभाव सहना पड़ता है। इससे उनकी आजीविका व काम करने की क्षमता भी प्रभावित होती है। उन्होंने बताया कि राज्य में वर्ष 2021 के आंकड़ों के अनुसार लिम्फेडिमा यानी अंगों में सूजन के लगभग 43768 मरीज़ हैं और हाइड्रोसील यानी अंडकोष की थैली में सूजन के 46220 मरीज़ हैं।</p>
<p>कार्यक्रम के बढ़ते क्रम में, एंटोमोलोजी की राज्य परामर्शी सज्ञा सिंह ने राज्य सरकार द्वारा आगामी मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की रणनीति एवं इससे जुड़े अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि राज्य स्तर से जिला स्तर तक विभिन्न विभागों एवं स्वयं सेवी संस्थाओं के साथ समन्वय बनाकर कार्य किया जा रहा है ताकि कार्यक्रम में किसी भी संसाधन की कमी न होने पाए।</p>
<p>इसी क्रम को बढ़ाते हुए राज्य की आईईसी परामर्शी नीलम कुमार ने लोगों में जागरूकता हेतु विकसित की गयी प्रचार. प्रसार सामग्री पर भी विस्तृत चर्चा की और प्रतिभागियों को समझाया कि इसके माध्यम से फाइलेरिया से संबंधित संदेशों को समुदाय के अंतिम छोर तक कैसे पहुंचाया जा सकता है।</p>
<p>विश्व स्वास्थ्य संगठन के राज्य एनटीडी समन्वयक डॉ अभिषेक पॉल ने अपने संबोधन में लिम्फेटिक फाइलेरिया बीमारी की गंभीरता को समझाते हुए इसके उन्मूलन हेतु प्राथमिकता के साथ मिशन मोड में कार्य करने की आवश्यकता पर जोर दिया और बताया कि यह बीमारी लोगों को दिव्यांग और अक्षम बना देती है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि कार्यक्रम की प्रतिदिन मोनिटरिंग और समीक्षा की जायेगी ताकि अगर कोई भी समस्या आये तो तुरंत उसका निदान किया जा सके।</p>
<p>प्रशिक्षण में तकनीकी विशषज्ञों द्वारा मोनिटरिंग फॉरमेट, प्रशिक्षण, वित्तीय प्रबंधन और पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के विभिन्न आयामों पर भी चर्चा की गयी ।</p>
<p>इस अवसर पर ग्लोबल हेल्थ स्ट्रेटजीज के अनुज घोष, प्रोजेक्ट कंसर्न इंटरनेशनल के कलाम खान और केयर संस्था के प्रतिनिधि नीरज कुमार ने भी मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन कार्यक्रम के दौरान उनकी संस्थाओं द्वारा राज्य सरकार को दिए जा रहे सहयोग के बारे में बताया।</p>
<p>प्रशिक्षण में एनआईएमआर के प्रतिनिधि डॉ पीयूष कुमार, राज्य परामर्शदाता प्रशिक्षण बिनय कुमार, राज्य परामर्शदाता पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप जयंत देव सिंह और राज्य परामर्शदाता वित्त, प्रवीण कुमार ने भी सक्रिय प्रतिभाग किया।</p>
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                                                            <category>बड़ी खबर</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                            <category>जन स्वास्थ्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 20 Aug 2022 21:39:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Jharkhand]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>झारखंड में साझा प्रयास से मलेरिया के मामलों में उल्लेखनीय कमी आयी है : बन्ना गुप्ता</title>
                                    <description><![CDATA[<p>  </p>
<p><strong>रांची:</strong> झारखंड देश के उन पांच राज्यों में एक है जहां मलेरिया के सबसे अधिक मामले दर्ज किए जाते हैं। झारखंड के अलावा ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और मेघालय में वेक्टर जनित इस बीमारी के अत्यधिक मामले दर्ज किए जाते हैं। 2019 में देश भर में मलेरिया के कुल मामलों में 45.47 प्रतिशत मामले इन्हीं राज्यों में दर्ज किए गए। इन चुनौतियों के बीच मलेरिया के बोझ को कम करने के लिए झारखंड ने उल्लेखनीय प्रगति की है और वर्ष 2017 से 2021 के बीच राज्य में मलेरिया के मामलों की संख्या साल-दर-साल कम हुई है। यह बात झारखंड के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/malaria-cases-have-come-down-in-jharkhand-says-state-health-minister-banna-gupta/article-9773"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2022-06/77628574-e1602556334318.png" alt=""></a><br /><p> </p>
<p><strong>रांची:</strong> झारखंड देश के उन पांच राज्यों में एक है जहां मलेरिया के सबसे अधिक मामले दर्ज किए जाते हैं। झारखंड के अलावा ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और मेघालय में वेक्टर जनित इस बीमारी के अत्यधिक मामले दर्ज किए जाते हैं। 2019 में देश भर में मलेरिया के कुल मामलों में 45.47 प्रतिशत मामले इन्हीं राज्यों में दर्ज किए गए। इन चुनौतियों के बीच मलेरिया के बोझ को कम करने के लिए झारखंड ने उल्लेखनीय प्रगति की है और वर्ष 2017 से 2021 के बीच राज्य में मलेरिया के मामलों की संख्या साल-दर-साल कम हुई है। यह बात झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता ने एक प्रेस बयान में कहा है।</p>
<p>उन्होंने कहा है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की विश्व मलेरिया रिपोर्ट – 2020 के आधार पर झारखंड मलेरिया उन्मूलन के राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण में तीसरे स्थान पर रहा। राज्य में मलेरिया के सालाना आंकड़ों की बात करें इसमें लगातार कमी दर्ज की गयी है। 2017 में झारखंड में 94,114 मामले थे, जबकि 2018 में 57,095 केस दर्ज किए गए। यह 39 प्रतिशत की कमी थी। फिर 2019 में 37,133 मामले दर्ज हुए और 35 प्रतिशत की कमी आयी। 2020 में 55 प्रतिशत की कमी के साथ 16ए653 मामले दर्ज किए गए। साल 2021 में 2019 की तुलना में 19 प्रतिशत कम मामले दर्ज किए गए और संख्या घट कर 13,426 हो गयी।</p>
<p>राज्य के स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता ने बताया कि श्आदिवासी क्षेत्र में भी इस बीमारी को लेकर लोगों में जगारूकता फैलाने के लगातार प्रयास कर रहे हैं, जिसका परिणाम है कि अब यहाँ पहले की तुलना मलेरिया के मामलों में काफी कमी दिखाई दे रही है। आदिवासी परिवारों के लोग भी बड़ी संख्या में इस बीमारी की वजह व खतरे को समझने लगे हैं।</p>
<p>इसके साथ ही, झारखंड सरकार की मलेरिया उन्मूलन रणनीतियों के तहत कई प्रयास आदिवासी व अन्य क्षेत्रों में भी किए जाते हैं। जैसे बड़े पैमाने पर बुखार का सर्वेक्षण, एलएलआईएन का वितरण, बीमारी फैलने वाले क्षेत्रों में मच्छरों के पनपने के स्थानों पर कीटनाशकों का छिड़काव। राज्य ने मलेरिया के कारण होने वाली कम मृत्यु दर को बनाए रखा है और वर्ष 2017-2021 के दौरान मलेरिया के कारण मौतों की संख्या शून्य से 0.04 फीसदी के बीच रही है। राज्य मलेरिया उन्मूलन की राष्ट्रीय रणनीतियों के अनुरूप काम कर रहा है तथा यह 2027 तक देश में शून्य स्वदेशी संचरण तथा 2030 तक उन्मूलन के लक्ष्य को हासिल करने में मदद करेगा।<br />
गांव के लोगों में इस बीमारी को लेकर जागरूकता का अभाव रहा है, लेकिन अब लोग इसको लेकर तेजी से जागरूक हो रहे हैं। अगर लोगों को वेक्टर जनित बीमारियों के प्रति समझ नहीं होती है तो इस वजह से इसके मामले बढने का खतरा बना रहता है। विश्व स्वास्थ्य संगठनए केंद्र सरकार व अन्य संबंधित एजेंसियों के साथ बेहतर तालमेल के जरिए अब राज्य ने इस बीमारी पर काफी हद तक नियंत्रण कर लिया है।</p>
<p>झारखंड की मलेरिया के मामलों को कम करने का श्रेय विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा शुरू किए गए हाई बर्डन हाई इम्पैक्ट प्रोग्राम को ठीक प्रकार से लागू करने तथा इस पर नियमित निगरानी को जाता है, जिसे केंद्र सरकार द्वारा मलेरिया उन्मूलन के लिए पेश की गई राष्ट्रीय रूपरेखा के तहत अंजाम दिया जा रहा है। इस प्रोग्राम की शुरूआत साल 2018 में भारत सहित 11 ऐसे देशों में की गईए जहां मलेरिया का बोझ बहुत अधिक था। यह प्रोग्राम रोग के बोझ को कम करने में कारगर साबित हुआ है।</p>
<p>अंतरक्षेत्रीय दृष्टिकोण के चलते राज्य में मलेरिया के मामलों में कमी लाने में मदद मिली है। इसके साथ ही कई समाधानों को अंजाम दिया गया जैसे एलएलआईएन छोटे जल निकायों में मच्छर के लार्वा खाने वाली मछलियां पालना, आशा कर्मचारियों को मलेरिया के निदान एवं देखभाल में प्रशिक्षण देना। मलेरिया उन्मूलन के प्रयासों में अन्तरक्षेत्रीय दृष्टिकोण बेहद महत्वपूर्ण रहा है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन एवं अन्य प्रोग्रामों के तहत विभिन्न अवयवों की समेकित सर्विस डिलीवरी मलेरिया के उन्मूलन में महत्वपूर्ण है। कुछ मुख्य क्षेत्र जहां सहयोगी संस्थाएं और विभाग एक साथ काम कर बड़े प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं, उनमें सामुदायिक प्रयास, सेवाओं को आगे बढ़ाने के लिए सरकारी प्रोग्रामों की ज़िम्मेदारी बढ़ना, बेहतर स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य अनुकूल व्यवहार में सुधार, पर्यावरण संरक्षण, सुरक्षित जल एवं वेक्टर नियन्त्रण को सुनिश्चित करना शामिल शामिल हैं।</p>
<p>स्वास्थ्य मंत्री ने झारखंड वासियों से आग्रह किया है कि मलेरिया को लेकर जागरूकता कार्यक्रमों व सरकारी रोकथाम उपायों का लाभ उठायें। वे इस बीमारी व इसकी वजहों को जानें। घरों में व आसपास सफाई रखें। ऐसे जल जमाव या दूषित जगह न रहने दें जिससे मच्छरों के पनपने का खतरा हो। बुखार हो तो तुरंत नजदीकी अस्पताल व स्वास्थ्य केंद्र में संपर्क करें। झाड़-फूंक के चक्कर में न रहें और वैज्ञानिक तरीका अपनायें। हम सबको मिल कर इस बीमारी को अपने राज्य से पूरी तरह शीघ्र ही समाप्त करना है ।</p>
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                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                            <category>जन स्वास्थ्य</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Jun 2022 22:08:17 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Samridh Jharkhand]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कोविड की तुलना में वायु प्रदूषण ने अधिक लोगों की जान ली है : डॉ अरविंद कुमार</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>नयी दिल्ली :</strong> हाल में दिवाली के त्यौहार के दौरान एक बार फिर दिल्ली के बढे प्रदूषण स्तर को लेकर चिंताएं हर ओर से जाहिर की जा रही हैं। हालांकि दिल्ली की यह समस्या लगभग स्थायी हो चुकी है। आइसीएस-मेदांता के चेयरमैन डॉ अरविंद कुमार ने कहा है कि वायु प्रदूषण ने कोविड की तुलना में अधिक लोगों की जान ली है।</p>
<p>वायु प्रदूषण पर बात करते हुए उन्होंने न्यूज एजेंसी एएनआइ से कहा, स्मॉग टॉवर लगाना पैसे की बर्बादी है और एक बड़ी गलती होगी। उन्होंने कहा कि बेहतर होगा कि वायु को प्रदूषित होने से बचाने पर जोर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/public-health/air-pollution-has-killed-more-people-than-covid-dr-arvind-kumar/article-9401"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2021-11/arvind-kumar-medanta-doctor.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>नयी दिल्ली :</strong> हाल में दिवाली के त्यौहार के दौरान एक बार फिर दिल्ली के बढे प्रदूषण स्तर को लेकर चिंताएं हर ओर से जाहिर की जा रही हैं। हालांकि दिल्ली की यह समस्या लगभग स्थायी हो चुकी है। आइसीएस-मेदांता के चेयरमैन डॉ अरविंद कुमार ने कहा है कि वायु प्रदूषण ने कोविड की तुलना में अधिक लोगों की जान ली है।</p>
<p>वायु प्रदूषण पर बात करते हुए उन्होंने न्यूज एजेंसी एएनआइ से कहा, स्मॉग टॉवर लगाना पैसे की बर्बादी है और एक बड़ी गलती होगी। उन्होंने कहा कि बेहतर होगा कि वायु को प्रदूषित होने से बचाने पर जोर दिया जाए। उन्होंने कहा कि कोविड महामारी की तुलना में वायु प्रदूषण ने अधिक लोगों की जान ली है।</p>
<blockquote class="twitter-tweet">
<p dir="ltr" lang="en" xml:lang="en">Installing a smog tower is a colossal waste of public money, &amp; a grave mistake. The answer lies in preventing the air from getting polluted. Pollution has killed more people than COVID has: Dr. Arvind Kumar, Chairman, Institute of Chest Surgery, Medanta, on air pollution</p>
<p>— ANI (@ANI) <a href="https://twitter.com/ANI/status/1457269293393985542?ref_src=twsrc%5Etfw">November 7, 2021</a></p></blockquote>
<p></p>
<p>डॉ अरविंद कुमार ने कहा कि लंग केयर फाउंडेशन में हमारे अध्ययन के अनुसार, 50 प्रतिशत से अधिक किशोरों में छाती की बीमारी के लक्षण हैं, 29 प्रतिशत को अस्थमा होता है। 29 प्रतिशत में अस्थमा होता है, 40 प्रतिशत मोटापे से ग्रस्त होते हैं, जिनमें अस्थमा का खतरा 200 प्रतिशत अधिक होता है। उन्होंने कहा कि वायु प्रदूषण के नतीजे बच्चे भुगत रहे हैं।</p>
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<p dir="ltr" lang="en" xml:lang="en">Delhi| As per our study at Lung Care Foundation, more than 50% of adolescents have a higher incidence of chest symptoms, 29% have asthma, 40% are obese (200% higher incidence of asthma). Children are suffering: Dr. Arvind Kumar, Chairman, ICS-Medanta, on air pollution <a href="https://t.co/X0hYJuYjF5">pic.twitter.com/X0hYJuYjF5</a></p>
<p>— ANI (@ANI) <a href="https://twitter.com/ANI/status/1457260811563331593?ref_src=twsrc%5Etfw">November 7, 2021</a></p></blockquote>
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                                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>जन स्वास्थ्य</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 07 Nov 2021 15:31:02 +0530</pubDate>
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