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कोरोना वायरस की चुनौतियां और उसके समाधान में होमियोपैथी चिकित्सा की भूमिका

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डाॅ एसएन झा
होमियोपैथी फिजिशियन
तिवारी चैक, देवघर, झारखंड
मोबाइल : 8507180004

एक चिकित्सक के रूप में मैंने समाज, परिवार एवं आम जनता की बीच में जाकर एक अनुभव प्राप्त किया है. मैंने महसूस किया है कि पहले की तुलना में मौजूदा कोरोना संकट के दौर में आम जनता में भय पैदा हो गया है.
परिवार व समाज में विषमता बढ गयी है. भौतिकवाद के बढते हुए कदम के कारण अमीर अमीर होते जा रहे हैं और बढती जनसंख्या के बीच गरीबों के नुकसान की संभावना बढती चली गयी है. कोरोना जैसे भयावह रोग ने एक महामारी का रूप ले लिया है, जिसके निदान के लिए एकांकी चिकित्सा पद्धति ताल ठोक रही है.

ऐसी परिस्थिति में कुछ साल पहले के परिदृश्य को याद करना आवश्यक है. जब लोग इंसेफलाइटिस, चेचक, प्लेग, फाइलेरिया, डेंगू आदि रोगों के प्रकोप से परेशान हो गये थे सारे देशवासी को कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. तब ऐसी परिस्थिति में भारत सरकार की सूझबूझ से भारतीय चिकित्सा पद्धति की ओर ध्यान गया और आयुष चिकित्सा पद्धति को अपने स्तर से स्वास्थ्य मंत्रालय ने पेश किया और इस आधार पर विश्व स्वास्थ्य संगठन एवं भारत सरकार ने आयुष मंत्रालय के तहत आयुर्वेदिक, यूनानी, प्राकृतिक चिकित्सा, योग और होमियोपैाथी को सम्मिलित किया. इसके परिणाम स्वरूप भारत वर्ष के अंतर्गत आयुष विभाग अस्तित्व में आया और उसकी कार्यप्रणाली को लागू किया गया. उसकी एक पुस्तक भी भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी की गयी. लोगों को वह वितरित की गयी, जिसकी डाॅक्टर एसएन झा के यहां एक काॅपी मौजूद है. ऐसी परिस्थिति में पहली अवस्था के लोगों के स्वास्थ्य नियंत्रण में कम खर्च पर शारीरिक व मानसिक दोनों रोग से कम खर्च में मुक्त करने में यह बड़ा सहायक सिद्ध हुआ.

ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन को भी लागू किया गया और जन स्वास्थ्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए इसने मुख्य भूमिका निभायी और बहुत हद तक सफलता भी मिली.

दरअसल, स्वास्थ्य इंसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है. डब्ल्यूएचओ के ग्लोबल हेल्थ मूवमेंट की मुहिम हेल्थ फाॅर आॅल के साथ दुनिया भर के सभी इंसानों को स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने की कोशिश की गयी है, जिनसे Drकोई स्वास्थ्य सुविधा से वंचित नहीं हो.

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बहुउद्देश्यीय संयुक्त स्वास्थ्य नीति की स्थापना करते हुए भारत सरकार एवं डब्ल्यूएचओ को अपने में जोड़ने की जरूरत है और उसके मुताबिक स्वास्थ्य सुविधा की गुणवत्ता को देखते हुए लागू करने की जरूरत है. नही ंतो राजनीति और भेदभाव रखने पर विश्व कल्याण नहीं हो सकता है. इसमें होमियोपैथी अपनी विशेषताओं की वजह से विश्व के सारे गरीब व अमीर देशों के लोगों को सामान रूप से दैहिक एवं मानसिक रोगों से पूर्ण स्वस्थ करने में कारगर होगा.
अभी जो टीका का विशेष ढंग से अनुसंधान चल रहा है, उससे तल्काल रोकथाम में मदद मिल सकती है, लेकिन पूर्ण निदान नहीं हो सकता है. जिस तरह के वायरस होते है। उसका कुप्रभाव शारीरिक व मानसिक रूप से उसी तरह पड़ता है. जैसे: चेचक, इंसेफ्लाइटिस, डेंगू, कैंसर, टीबी के प्रभावित रोग पूर्ण रूप से निरोग नहीं होते हैं.

इसका बुरा असर जिंदगी पर किसी न किसी रूप में पड़ता रहता है. देखा गया है कि कैंसर टीबी, कुष्ठ, डायबिटिज वंशानुगत होता है.

ऐसी परिस्थति में होमियोपैथी नोसोर्स ग्रुप की दवा एवं जनरल दवा का एक साथ कांबिनेशन मिलाकर चिकित्सकों के सलाहनुसार चलाने पर पूर्ण रूप से रोग मुक्ति संभव है और इससे जिंस पर पड़ने वाले कुप्रभाव दूर कर पुनः निरोग अवस्था में लाया जा सकता है. ऐसी प्रक्रिया होमियोपैथी के अलावा किसी अन्य पैथ में नहीं हैं. वर्तमान समय में चिकित्सकों की सूची बनाकर जिलावार स्थापना कर डीएम-डीसी के संरक्षण में युद्ध स्तर पर होमियोपैथी चिकित्सकों से सहायता लेने की आवश्यकता है अन्यथा महामारी पर नियंत्रण पाना असंभव हो जाएगा और अधिकारी, कर्मचारी व सरकार बेकामयाब हो जाएंगे.

ऐसी अवस्था में इस लेख को देखते हुए विशेषज्ञ चिकित्सा सलाहकारों से सलाह लेते हुए इसे जल्द से जल्द लागू करें. इसके लिए पंचायत, नगर निगम, जिला सभी जगह यूनिट खोली जाए. सरकार का अभी भी स्वास्थ्य विभाग पर वित्तीय खर्च बहुत कम है और चिकित्सा सुविधा मुख्य रूप से इतनी खर्चीली हो गयी है कि आम जनता का वहां तक सहज पहुंच पाना मुश्किल हो रहा है और लोग असमय मौत के शिकार हो रहे हैं. उनके साथ दुव्र्यवहार किया जाता है. पैसा ऐंठा जाता है. चिकित्सक व्यावसायिक हो गए हैं. उनकी जनकल्याण की भावना समाप्त हो गयी है. जनसंख्या की बढती हुई रफ्तार को देखते हुए गरीबों की संख्या सबसे अधिक है. वे साधनहीन हैं और अमीरों द्वारा उनका शोषण किया जाता है और उन्हें सारी सुविधाओं से वंचित रखा जाता है. अगर सुविधा मिल भी जाता है तो भूखे नंगे का अधिककार छिनने का प्रयास किया जाता है.

(नोट : यह लेखक के निजी विचार हैं.)

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