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                <title>  Climate कहानी    - Samridh Jharkhand</title>
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                <description>  Climate कहानी    RSS Feed</description>
                
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                <title>तेल संकट पर IEA की चेतावनी, आदत बदलें नहीं तो बढ़ेगा असर</title>
                                    <description><![CDATA[मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच IEA ने चेतावनी दी है कि दुनिया एक बड़े तेल संकट का सामना कर रही है। रिपोर्ट के अनुसार, यह अब तक का सबसे बड़ा सप्लाई झटका है, जिससे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल पार कर चुकी हैं। IEA ने केवल सप्लाई बढ़ाने के बजाय मांग घटाने पर जोर दिया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/energy/-draft--add-your-title/article-19123"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/az1975-oil-7166594-1024x576_samridh_1200x720-(1).jpeg" alt=""></a><br /><p>मिडिल ईस्ट में चल रही जंग अब सिर्फ खबर नहीं रही; यह सीधे आपकी जेब, आपकी रसोई और आपके सफर तक पहुँच चुकी है। <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">International Energy Agency</span></span> (IEA) की नई रिपोर्ट इसी बदलती हकीकत को सामने रखती है। रिपोर्ट के अनुसार, यह सिर्फ एक और तेल संकट नहीं, बल्कि अब तक का सबसे बड़ा सप्लाई झटका है।</p>
<h3><strong>रास्ता रुकता है तेल का, ठहरती दुनिया</strong></h3>
<p>दुनिया का लगभग 20% तेल जिस रास्ते से गुजरता है, वही रास्ता अब लगभग बाधित हो चुका है। करीब 2 करोड़ बैरल रोज़ का प्रवाह अचानक कम हो जाए, तो असर सिर्फ बाजार में नहीं, बल्कि आम जिंदगी में भी दिखता है। तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुकी हैं। डीज़ल, जेट फ्यूल और LPG जैसी चीज़ें तेजी से महंगी हो रही हैं। IEA के प्रमुख <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Fatih Birol</span></span> ने इसे बड़ी ऊर्जा आपदा बताया है और चेतावनी दी है कि हालात जल्दी नहीं सुधरे तो असर और गहरा होगा।</p>
<h3><strong>सिर्फ तेल बढ़ाने से काम नहीं चलेगा</strong></h3>
<p>अब तक दुनिया का जवाब रहा—भंडार खोलो, सप्लाई बढ़ाओ। IEA देशों ने 40 करोड़ बैरल तेल रिलीज़ करने का फैसला किया, जो अब तक का बड़ा कदम है। लेकिन रिपोर्ट साफ कहती है कि केवल सप्लाई बढ़ाने से यह संकट हल नहीं होगा; अब मांग कम करना जरूरी है।</p>
<h3><strong>समाधान सड़क पर है, और आपके घर में भी</strong></h3>
<p>IEA ने 10 ऐसे आसान कदम सुझाए हैं, जो तुरंत असर दिखा सकते हैं। ये बड़े पॉलिसी बदलाव नहीं, बल्कि रोजमर्रा की आदतों में बदलाव हैं—वर्क फ्रॉम होम अपनाना, हाईवे पर स्पीड कम करना, पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल बढ़ाना, कार शेयरिंग और बेहतर ड्राइविंग।</p>
<p>सिर्फ सड़क ही नहीं, आसमान और रसोई भी इसमें शामिल हैं—जहां जरूरी न हो, हवाई यात्रा टालना, LPG को कुकिंग के लिए बचाना और इलेक्ट्रिक कुकिंग जैसे विकल्प अपनाना।</p>
<h3><strong>दुनिया पहले से ये कर रही है</strong></h3>
<p>यह सिर्फ सुझाव नहीं हैं; कई देश इन्हें लागू भी कर चुके हैं। कहीं 4 दिन का वर्क वीक, कहीं स्कूल ऑनलाइन, तो कहीं फ्यूल राशनिंग और पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा दिया जा रहा है। यानी संकट आते ही सबसे पहले हमारी रोजमर्रा की जिंदगी बदलती है।</p>
<h3><strong>असली कहानी आदतों की है</strong></h3>
<p>इस रिपोर्ट की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह टेक्नोलॉजी या बड़े निवेश की नहीं, बल्कि आदतों की बात करती है। कम चलाना, समझदारी से चलाना और जहां संभव हो विकल्प अपनाना ही समाधान है।</p>
<p>IEA भी मानता है कि ये कदम पूरी सप्लाई की भरपाई नहीं कर सकते, लेकिन कीमतों को काबू में रख सकते हैं, बाजार को स्थिर कर सकते हैं और आम लोगों को राहत दे सकते हैं।</p>
<p>हर संकट एक आईना होता है और यह तेल संकट भी वही कर रहा है। यह दिखा रहा है कि हमारी जिंदगी कितनी गहराई से फॉसिल फ्यूल पर निर्भर है। बदलाव सिर्फ नीतियों से नहीं, बल्कि व्यवहार से शुरू होता है। आज यह मजबूरी है, कल यही आदत बन सकती है—और शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा मोड़ है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>ऊर्जा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 21 Mar 2026 15:53:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[  Climate कहानी   ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Climate कहानी : सिर्फ धुआँ नहीं, मौसम भी बढ़ा रहा शहरों की हवा में ज़हर</title>
                                    <description><![CDATA[भारत के बड़े शहरों में बढ़ते वायु प्रदूषण को अक्सर वाहनों, उद्योगों और कचरा जलाने जैसे कारणों से जोड़ा जाता है, लेकिन एक नई रिपोर्ट बताती है कि मौसम भी इसमें बड़ी भूमिका निभाता है। पर्यावरण संस्था Climate Trends की स्टडी के अनुसार मौसम की स्थितियां प्रदूषण के स्तर को 40 प्रतिशत तक प्रभावित कर सकती हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/climate-story-not-only-smoke-but-also-weather-is-increasing/article-18747"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/e023f40a-47cd-4e42-bfe1-1c0db7cc8375_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>भारत के बड़े शहरों में बढ़ते प्रदूषण को अक्सर सिर्फ उत्सर्जन का नतीजा माना जाता है। गाड़ियों का धुआँ, उद्योगों का धुआँ, कूड़ा जलाना। मगर एक नई स्टडी बताती है कि कहानी इससे कहीं ज़्यादा जटिल है।</p>
<p>दरअसल कई शहरों में हवा की गुणवत्ता सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि कितना प्रदूषण निकल रहा है। यह भी उतना ही अहम है कि मौसम उसे फैलने देता है या शहर के ऊपर ही रोक कर रखता है।</p>
<p>पर्यावरण शोध संस्था Climate Trends की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, मौसम की स्थितियाँ अपने आप में प्रदूषण के स्तर को 40 प्रतिशत तक ऊपर-नीचे कर सकती हैं, भले ही उत्सर्जन में कोई बदलाव न हुआ हो। यह विश्लेषण 2024 से 2025 के बीच केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के वायु गुणवत्ता आंकड़ों के आधार पर किया गया है।</p>
<p>रिपोर्ट बताती है कि भारत के कई शहरों में प्रदूषण का असली संकट उत्सर्जन और मौसम के आपसी मेल से बनता है। खासकर तब, जब हवा की रफ्तार बेहद कम होती है और नमी अधिक होती है। ऐसी स्थिति में वातावरण में ठहराव पैदा हो जाता है, जिससे प्रदूषक कण शहर के ऊपर ही जमा होने लगते हैं।</p>
<h4><strong>दिल्ली में सर्दियों की घुटन</strong></h4>
<p>अध्ययन के मुताबिक दिल्ली देश का सबसे गंभीर वायु प्रदूषण संकट झेलने वाला शहर बना हुआ है। यहां सालाना औसत PM2.5 स्तर सबसे अधिक दर्ज किए गए हैं।</p>
<p>सर्दियों में हालात और भी खराब हो जाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार सर्दियों के दौरान दिल्ली में एक भी “क्लीन एयर डे” दर्ज नहीं हुआ। यही वजह है कि साल भर के औसत आंकड़े कभी-कभी सुधार दिखाते हैं, लेकिन नागरिकों को असली राहत महसूस नहीं होती।</p>
<p>रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली और पटना जैसे शहरों में सर्दियों के दौरान 70 प्रतिशत से अधिक दिनों में कम हवा और ज्यादा नमी वाली मौसम स्थितियाँ बनती हैं। यही ठहराव प्रदूषण को लंबे समय तक हवा में बनाए रखता है।</p>
<p>Climate Trends की संस्थापक और निदेशक आरती खोसला कहती हैं कि “अगर सालाना PM2.5 में 20 से 30 प्रतिशत की कमी भी आती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि सर्दियों में हवा सुरक्षित हो गई है। दिल्ली और पटना जैसे शहरों में मौसम की वजह से प्रदूषण लंबे समय तक जमा रहता है। इसलिए आने वाले एनकैप चरण में मौसम को ध्यान में रखकर लक्ष्य तय करना जरूरी है।”</p>
<h4><strong>पटना की गहराती समस्या</strong></h4>
<p>अध्ययन में यह भी सामने आया कि पटना देश का दूसरा सबसे प्रदूषित शहर बन चुका है। यहां भी प्रदूषण का स्तर लगातार ऊंचा बना रहता है।</p>
<p>विशेषज्ञों के मुताबिक, गंगा के मैदानों में स्थित कई शहरों में हवा का प्रवाह सीमित होता है। ऐसे में प्रदूषण फैलने के बजाय शहर के ऊपर ही अटक जाता है।</p>
<h4><strong>दक्षिण के शहरों में नया खतरा</strong></h4>
<p>रिपोर्ट एक और दिलचस्प बदलाव की ओर इशारा करती है। परंपरागत रूप से अपेक्षाकृत साफ माने जाने वाले बेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों में भी अब सर्दियों के महीनों में हवा की गुणवत्ता बिगड़ने के संकेत मिलने लगे हैं। यह एक नया ट्रेंड माना जा रहा है।</p>
<p>इसके अलावा मुंबई और चेन्नई में 2025 के दौरान सालाना औसत प्रदूषण स्तर में बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो इस बात का संकेत है कि प्रदूषण अब सिर्फ कुछ महीनों की समस्या नहीं रह गया है।</p>
<p>दिलचस्प बात यह है कि बड़े शहरों में बेंगलुरु अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में दिखाई देता है। रिपोर्ट के अनुसार वहां हवा की गुणवत्ता अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई है, जिसे शोधकर्ता “संरचनात्मक वायु गुणवत्ता सहनशीलता” कहते हैं।</p>
<h4><strong>कोलकाता की सर्द हवा</strong></h4>
<p>कोलकाता में भी प्रदूषण का संकट सर्दियों में सबसे ज्यादा गंभीर हो जाता है। आईआईटी दिल्ली के सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंसेज़ के प्रमुख साग्निक डे बताते हैं कि उत्तर भारत के कई शहरों में 1 मीटर प्रति सेकंड से भी कम हवा की गति और अधिक नमी के कारण प्रदूषण लंबे समय तक बना रहता है। ऐसे हालात में वेंटिलेशन यानी हवा के फैलाव की क्षमता प्रदूषण स्तर तय करने में बड़ी भूमिका निभाती है।</p>
<p>आईआईएसईआर कोलकाता के पृथ्वी विज्ञान विभाग के डॉ. अभिनंदन घोष कहते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप की भौगोलिक और मौसमीय परिस्थितियाँ पश्चिमी देशों से अलग हैं। इसलिए यहां प्रदूषण को समझने और उससे निपटने की रणनीति भी अलग होनी चाहिए।</p>
<p>वहीं बोस इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर अभिजीत चटर्जी के मुताबिक कोलकाता में सर्दियों के दौरान बायोमास और कचरा जलाना प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं। कम हवा की वजह से ये कण जमीन के पास ही जमा हो जाते हैं।</p>
<h4><strong>नई रणनीति की जरूरत</strong></h4>
<p>रिपोर्ट का निष्कर्ष साफ है। अगर भारत को वाकई साफ हवा चाहिए, तो सिर्फ उत्सर्जन घटाने की नीतियाँ पर्याप्त नहीं होंगी। इसके लिए मौसम आधारित रणनीति भी जरूरी होगी।</p>
<p>रिपोर्ट सुझाव देती है कि राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के अगले चरण में सर्दियों के लिए अलग लक्ष्य, मौसम के हिसाब से प्रदूषण मापने के तरीके, और मौसम बदलते ही सक्रिय होने वाली कार्रवाई योजनाएँ बनाई जाएँ।</p>
<p>क्योंकि कई बार हवा को साफ करने के लिए सिर्फ प्रदूषण कम करना ही नहीं, उसे फैलने की जगह भी देनी पड़ती है और भारत के शहरों में, यह जगह अक्सर मौसम ही तय करता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 11 Mar 2026 17:21:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[  Climate कहानी   ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Climate कहानी : भविष्य की तकनीक पर दांव, आज की कटौती गायब, कार्बन रिमूवल पर ऑक्सफोर्ड की सख़्त चेतावनी</title>
                                    <description><![CDATA[ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की नई स्टडी चेतावनी देती है कि भविष्य की कार्बन रिमूवल तकनीकों के भरोसे आज उत्सर्जन घटाने को टालना जलवायु और कानून दोनों के लिए खतरनाक हो सकता है। रिपोर्ट कहती है कि निकट अवधि में तेज़ एमिशन कटौती अनिवार्य है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/climate-story-bet-on-future-technology-todays-cuts-disappear-oxfords/article-17849"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/goranh-graffiti-on-the-wall-4240287_1280_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>दुनिया जब रिकॉर्ड तोड़ गर्मी का सामना कर रही है, उसी वक्त एक अहम सवाल तेज़ी से उभर रहा है। क्या हम भविष्य की तकनीकों के भरोसे आज की एमिशन कटौती को टाल सकते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड के शोधकर्ताओं की एक नई स्टडी साफ़ कहती है, यह रास्ता न सिर्फ़ ख़तरनाक है बल्कि अंतरराष्ट्रीय क़ानून के दायरे में भी समस्या खड़ी कर सकता है।</p>
<p>यह अध्ययन बताता है कि कार्बन डाइऑक्साइड रिमूवल, यानी हवा से CO₂ निकालकर उसे स्टोर करना, जलवायु कार्रवाई का एक ज़रूरी हिस्सा तो है, लेकिन अगर देश इसे निकट भविष्य में एमिशन घटाने के विकल्प की तरह इस्तेमाल करने लगें, तो यह पेरिस समझौते के 1.5 डिग्री सेल्सियस लक्ष्य को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकता है।</p>
<p>रिपोर्ट में कहा गया है कि कई देश अपनी नेट ज़ीरो योजनाओं में भविष्य की बड़े पैमाने पर कार्बन हटाने वाली तकनीकों पर दांव लगा रहे हैं। समस्या यह है कि इन तकनीकों की व्यवहारिकता, सामाजिक स्वीकार्यता और समयसीमा को लेकर अब भी काफी अनिश्चितता है। ऐसे में ज़्यादा भरोसा तापमान में ज़्यादा और लंबे समय तक होने वाले ‘ओवरशूट’ का कारण बन सकता है, यानी वह दौर जब धरती 1.5 डिग्री की सुरक्षित सीमा से ऊपर चली जाए।</p>
<p>ऑक्सफोर्ड लॉ फ़ैकल्टी की प्रोफेसर लवण्या राजामणि, जो इस अध्ययन की लेखकों में शामिल हैं, कहती हैं कि कुछ देश अनिश्चित भविष्य की तकनीकों पर जुआ खेल रहे हैं। उनके मुताबिक, यह तरीका गंभीर, व्यापक और अपूरणीय जलवायु नुकसान की ओर ले जा सकता है। अध्ययन ज़ोर देता है कि निकट अवधि में एमिशन में तेज़ कटौती सिर्फ़ नैतिक ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि एक क़ानूनी आवश्यकता भी है।</p>
<p>रिपोर्ट 2025 में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस की जलवायु परिवर्तन पर दी गई सलाहकारी राय का हवाला देती है। इसमें ‘हानि रोकथाम’ और ‘ड्यू डिलिजेंस’ के सिद्धांत को मज़बूती से परिभाषित किया गया था। इन सिद्धांतों के तहत देशों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी जलवायु रणनीतियाँ दूसरों को गंभीर नुकसान न पहुंचाएं और जोखिमों को लेकर सतर्क रवैया अपनाया जाए।</p>
<p>अध्ययन बताता है कि अंतरराष्ट्रीय क़ानून पहले से ही कुछ साफ़ ‘गार्डरेल्स’ तय करता है। मसलन, देशों को सबसे पहले एमिशन घटाने को प्राथमिकता देनी होगी। किसी भी कार्बन रिमूवल रणनीति का तकनीकी और सामाजिक रूप से संभव होना ज़रूरी है। इसके साथ ही यह भी देखा जाएगा कि इन उपायों से किसी तरह के नकारात्मक प्रभाव तो नहीं पड़ रहे और क्या देश विदेशों में किए जा रहे कार्बन रिमूवल पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भर तो नहीं हैं।</p>
<p>प्रक्रियात्मक स्तर पर भी पारदर्शिता अहम बताई गई है। देशों को यह साफ़ बताना होगा कि वे किस तरह के कार्बन रिमूवल पर भरोसा कर रहे हैं, भविष्य के अनुमानों के पीछे क्या मान्यताएं हैं, और उत्सर्जन व रिमूवल को अलग अलग कैसे गिना जा रहा है।</p>
<p>स्टडी के सह लेखक डॉ. रूपर्ट स्टुअर्ट स्मिथ का कहना है कि आज लिए जा रहे फैसले भविष्य की पीढ़ियों पर जलवायु जोखिम न थोपें, इसके लिए क़ानूनी सीमाएं बेहद ज़रूरी हैं। उनके मुताबिक, कार्बन हटाने की योजनाएं उत्सर्जन में तुरंत और गहरी कटौती की जगह नहीं ले सकतीं।</p>
<p>यह शोध जर्नल Climate Policy में प्रकाशित हुआ है और इसमें ऑक्सफोर्ड के साथ इम्पीरियल कॉलेज लंदन, जर्मनी और ऑस्ट्रिया के शोध संस्थानों के वैज्ञानिक शामिल हैं। रिपोर्ट का संदेश सीधा है। कार्बन हटाने की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन अगर आज की कार्रवाई टालकर भविष्य की उम्मीदों पर सब कुछ छोड़ दिया गया, तो न तो जलवायु सुरक्षित रहेगी और न ही देश क़ानूनी ज़िम्मेदारियों से बच पाएंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 05 Feb 2026 13:36:38 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>ऑस्ट्रेलिया पर बढ़ती निर्भरता से भारत की स्टील इंडस्ट्री पर संकट के बादल</title>
                                    <description><![CDATA[IEEFA की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की स्टील इंडस्ट्री ऑस्ट्रेलिया के मेट कोल पर अत्यधिक निर्भर है, जबकि वहां कानूनी और जलवायु दबाव बढ़ने से सप्लाई जोखिम गहराता जा रहा है। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि भविष्य में कोयला महंगा और कम उपलब्ध हो सकता है, जिससे भारत के स्टील सेक्टर पर बड़ा आर्थिक असर पड़ेगा। समाधान के रूप में स्क्रैप आधारित EAF, ग्रीन हाइड्रोजन और लो-कार्बन तकनीक अपनाने की जरूरत बताई गई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/indias-steel-industry-in-danger-due-to-increasing-dependence-on/article-17296"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-12/download_samridh_1200x720-(2).jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत के स्टील सेक्टर पर मंडरा रहा बादल अब साफ दिखाई दे रहा है.  दरअसल IEEFA की एक नई रिपोर्ट की मानें तो भारत की बढ़ती स्टील मांग का भविष्य सिर्फ फैक्ट्रियों में नहीं, बल्कि हज़ारों किलोमीटर दूर ऑस्ट्रेलिया की खदानों में भी तय हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत आज दुनिया का सबसे तेज़ी से बढ़ता स्टील बाज़ार है. सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक देश की क्षमता 300 मिलियन टन प्रति वर्ष तक पहुंच जाए. पर समस्या यह है कि यह बढ़त अभी भी पुराने तरीके BF BOF पर टिकी है, जिसे चलाने के लिए मेटलर्जिकल कोयला यानी मेट कोल चाहिए होता है. और यही कोयला भारत को लगभग पूरा बाहर से आयात करना पड़ता है। कुल ज़रूरत का लगभग 90 प्रतिशत कोयला सिर्फ ऑस्ट्रेलिया से आता है. यही बात मुश्किल खड़ी कर रही है।</p>
<h4><strong>ऑस्ट्रेलिया की सप्लाई पर बढ़ता जोखिम</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">IEEFA कहता है कि ऑस्ट्रेलिया दुनिया का सबसे बड़ा मेट कोल एक्सपोर्टर है, पर उसकी खदानें अब कई तरह के दबाव में हैं। कानूनी चुनौतियां, ऊंची लागत, फंडिंग में कटौती, क्लाइमेट जोखिम और नए प्रोजेक्ट्स को मंज़ूरी मिलने में देरी</p>
<p style="text-align:justify;">रिपोर्ट चेतावनी देती है कि भविष्य में सप्लाई कम पड़ेगी तो दाम आसमान छू सकते हैं। इसका सीधा असर भारत पर पड़ेगा, जहां स्टील की बढ़ती ज़रूरत को पूरा करने के लिए ज्यादा BF BOF प्लांट तैयार किए जा रहे हैं ।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>IEEFA के साइमोन निकोलस कहते हैं : </strong>ऑस्ट्रेलिया खुद 2050 नेट जीरो की ओर बढ़ रहा है. वहां कोयला विस्तार पर कानूनी चुनौतियां बढ़ रही हैं. ऐसे में भारत के लिए खतरा बढ़ रहा है क्योंकि हमारी निर्भरता बहुत ज्यादा है.” निकोलस यह भी बताते हैं कि COP30 में ऑस्ट्रेलिया ने बेलें डिक्लेरेशन को साइन किया, जो तेल, गैस और कोयले से तेज़ी से दूर जाने की मांग करता है. इससे साफ है कि आने वाले समय में ऑस्ट्रेलिया मेट कोल पर और कड़े कदम उठाएगा ।</p>
<h4><strong>तो भारत क्या करे </strong></h4>
<p style="text-align:justify;">IEEFA के रिसर्चर सौम्या नौटियाल का मानना है कि भारत के पास एक रास्ता है। स्क्रैप आधारित इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस यानी EAF ग्रीन हाइड्रोजन आधारित स्टील और लो कार्बन टेक्नोलॉजी के लिए पॉलिसी सपोर्ट  यह सब मिलकर भारत की मेट कोल पर निर्भरता कम कर सकते हैं. रिपोर्ट कहती है कि भारत दुनिया के सबसे सस्ते ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादकों में हो सकता है ।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन ध्यान निर्यात पर नहीं, घरेलू स्टील इंडस्ट्री में इसके इस्तेमाल पर होना चाहिए। यह बदलाव आसान नहीं है, पर समय कम है। अगर भारत आज कदम नहीं उठाता, तो भविष्य में महंगा कोयला, आर्थिक झटके, और स्टील सेक्टर में अस्थिरता तय है।</p>
<h4><strong>बड़ी तस्वीर </strong></h4>
<p style="text-align:justify;"><strong> </strong>भारत की स्टील इंडस्ट्री 2070 नेट ज़ीरो के रास्ते पर चलना चाहती है, पर उसकी नींव आयातित कोयले पर टिकी है। जब नींव ही डगमगाए तो इमारत कितनी भी आधुनिक हो, जोखिम में ही रहती है। रिपोर्ट इस बात की साफ चेतावनी देती है कि अब भारत को नई दिशा तय करनी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">स्क्रैप, हाइड्रोजन और घरेलू तकनीक ही वह रास्ता है जो ऊर्जा सुरक्षा भी दे सकता है और स्टील सेक्टर को भविष्य के बाज़ार में मजबूत भी बना सकता है ।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 04 Dec 2025 14:25:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[  Climate कहानी   ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Climate कहानी: 57 कम गर्म दिन, पेरिस समझौते की वो उम्मीद, जो अब भी ज़िंदा है</title>
                                    <description><![CDATA[नई रिपोर्ट बताती है कि अगर देश पेरिस समझौते के तहत अपने वादों को पूरा करते हैं और तापमान वृद्धि को 2.6°C  तक सीमित रखते हैं, तो दुनिया हर साल 57 कम गर्म दिन अनुभव कर सकती है। वहीं, 4°C गर्मी पर हीटवेव और अत्यधिक गर्मी की घटनाएँ कई गुना बढ़ जाएंगी। हीटवेव अब सबसे घातक आपदा बन चुकी है, गरीब देश सबसे अधिक प्रभावित हैं। सुरक्षित जलवायु के लिए उत्सर्जन कटौती, क्लाइमेट जस्टिस और प्रभावी नीति जरूरी हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/climate-story-57-less--hot-days-the-hope-of-paris/article-16725"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-10/resized-image---2025-10-16t163815.991.jpeg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर देश पेरिस समझौते के तहत अपने जलवायु वादों को पूरा करते हैं और तापमान वृद्धि को 2.6°C तक सीमित रखते हैं, तो दुनिया हर साल 57 कम गर्म दिन झेल सकती है। वहीं, अगर तापमान 4°C तक बढ़ा, तो हीटवेव्स और अत्यधिक गर्मी की घटनाएँ कई गुना बढ़ जाएंगी। विशेषज्ञों का कहना है कि हर अंश का फर्क लाखों लोगों के जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी तय करता है। रिपोर्ट में यह भी उजागर किया गया कि हीटवेव्स अब सबसे घातक आपदा बन गई हैं और गरीब देश इसके सबसे ज्यादा प्रभाव में हैं। पेरिस समझौता अभी भी दुनिया को सुरक्षित जलवायु की दिशा में मोड़ सकता है, बशर्ते वादों को गंभीरता से लागू किया जाए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ग्लोबल वार्मिंग, पेरिस समझौता, जलवायु परिवर्तन, तापमान वृद्धि, हीटवेव, कम गर्म दिन, 2.6°C, 4°C, Climate Central, World Weather Attribution, अत्यधिक गर्मी, जलवायु जोखिम, उत्सर्जन कटौती, क्लाइमेट जस्टिस, मानव जीवन, वैश्विक तापमान, गर्मी की घटनाएँ, जलवायु नीति, सुरक्षित जलवायु, पर्यावरणीय अन्याय</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दुनिया की गर्मी बढ़ चुकी है। मौसम अब सिर्फ़ बदलता नहीं — चेतावनी देता है। लेकिन इसी बेचैनी के बीच एक नई स्टडी ने उम्मीद की झलक दी है। अगर देश पेरिस समझौते (Paris Agreement) के तहत तय अपने वादों को पूरा करते हैं और इस सदी के अंत तक तापमान वृद्धि को लगभग 2.6°C तक सीमित रखते हैं, तो दुनिया हर साल 57 कम गर्म दिन झेल सकती है। यह निष्कर्ष है Climate Central और World Weather Attribution की नई रिपोर्ट का — जो बताती है कि यह ऐतिहासिक समझौता अब भी दुनिया को एक सुरक्षित जलवायु की दिशा में मोड़ सकता है, बशर्ते रफ्तार तेज़ हो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अगर 4°C तक तापमान बढ़ा, तो क्या होगा?</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">2015 में जब पेरिस समझौता हुआ, तब वैज्ञानिकों का मानना था कि अगर कुछ नहीं किया गया तो सदी के अंत तक दुनिया 4°C तक गर्म हो जाएगी। ऐसे में पृथ्वी पर औसतन 114 “बहुत गर्म दिन” हर साल आते — वो दिन जब तापमान ऐतिहासिक औसत से 90वें परसेंटाइल से ऊपर चला जाता है। अब, अगर मौजूदा उत्सर्जन कटौती योजनाएँ लागू होती हैं और तापमान 2.6°C तक सीमित रहता है, तो दुनिया ऐसे 57 दिन कम झेलेगी। भारत में यह संख्या करीब 30 दिन की है। यानी, एक महीने तक का फर्क केवल नीति, प्रतिबद्धता और सामूहिक इच्छाशक्ति ला सकती है। हर अंश की कीमत है रिपोर्ट कहती है कि “हर दसवां हिस्सा भी मायने रखता है।” 2015 से अब तक सिर्फ़ 0.3°C अतिरिक्त गर्मी आई है, लेकिन इससे दुनिया को हर साल 11 और गर्म दिन मिले हैं। इस छोटे-से बदलाव ने अमेज़न में गर्मी को 10 गुना, माली और बुर्किना फासो में 9 गुना, और भारत-पाकिस्तान में 2 गुना ज़्यादा संभावित बना दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रो. फ्रिडेरिक ओटो, इम्पीरियल कॉलेज लंदन की क्लाइमेट वैज्ञानिक, कहती हैं:</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">“पेरिस समझौता हमें बचा सकता है, लेकिन सिर्फ़ अगर हम इसे गंभीरता से लें। हर अंश का फर्क लाखों लोगों के जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी तय करता है।” हीटवेव्स की दुनिया: जहाँ हर साल और मुश्किल बढ़ रही है स्टडी में छह हालिया हीटवेव्स का विश्लेषण किया गया — यूरोप, पश्चिम अफ्रीका, अमेज़न, एशिया, ऑस्ट्रेलिया और उत्तरी अमेरिका में। अगर तापमान 4°C तक बढ़ा, तो ऐसी घटनाएँ आज की तुलना में 5 से 75 गुना ज़्यादा होंगी। यह अंतर सिर्फ़ तापमान का नहीं, जीवन की संभावना का है। Climate Central की वैज्ञानिक डॉ. क्रिस्टिना डाल कहती हैं, “पेरिस समझौते ने दिशा दिखाई है, लेकिन हम अब भी खतरनाक भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं। कई देश अभी 1.3°C की गर्मी से ही जूझ रहे हैं, 2.6°C की दुनिया तो कहीं ज़्यादा निर्दयी होगी।” तैयारी आधी दुनिया में रुकी हुई है हीट अब दुनिया की सबसे घातक आपदा है — हर साल करीब 5 लाख लोगों की मौत इससे जुड़ी होती है। इसके बावजूद आधे से ज़्यादा देश अब तक हीट एक्शन प्लान या अर्ली वार्निंग सिस्टम नहीं बना पाए हैं। जो बने हैं, वे अक्सर कागज़ों में सीमित हैं। रेड क्रॉस की क्लाइमेट विशेषज्ञ रूप सिंह कहती हैं, “हमने पिछले दशक में गर्मी को लेकर जागरूकता बढ़ाई है, लेकिन सुरक्षा योजनाएँ अब भी आधी दुनिया तक नहीं पहुँची हैं।”</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अन्याय की परतें और आने वाला दशक</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोपेनहेगन विश्वविद्यालय के प्रो. इमैनुएल राजू कहते हैं, “ज़्यादातर गरीब देश अब मुश्किल से ही सामना कर पा रहे हैं। यह जलवायु नहीं, अन्याय का संकट है - जहाँ जिन्होंने सबसे कम नुकसान किया, वही सबसे ज़्यादा झुलस रहे हैं।” वह कहते हैं कि अब “सर्वाइवल” से आगे बढ़कर “ट्रांसफॉर्मेशन” की ज़रूरत है - मतलब, सिर्फ़ झेलने नहीं, बल्कि व्यवस्था बदलने की। और इसके लिए ज़रूरी है - अधिक उत्सर्जन कटौती, अ</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Oct 2025 16:39:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[  Climate कहानी   ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Climate कहानी: एनर्जी सेक्टर में उगा रिन्यूबल का सूरज: ‘सूर्य घर योजना’ से रफ्तार तो बढ़ी, पर राह अभी लंबी है</title>
                                    <description><![CDATA[भारत में प्रधानमंत्री सूर्या घर योजना (PMSGY) ने रेज़िडेंशियल रूफटॉप सोलर सेक्टर में तेजी लायी है। एक साल में 4,946 मेगावॉट क्षमता स्थापित की गई और ₹9,280 करोड़ की सब्सिडी जारी हुई। गुजरात और केरल में इंस्टॉलेशन दर सबसे अधिक है, जबकि राष्ट्रीय औसत अभी 22.7% है। प्रमुख चुनौतियाँ हैं कम जागरूकता, कठिन फाइनेंस प्रक्रिया, सप्लाई चेन और शिकायत निवारण प्रणाली की कमज़ोरियाँ। Domestic Content Requirement और plug-and-play सोलर किट्स जैसी पहलें भविष्य में इंस्टॉलेशन को आसान बना सकती हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/climate-story-the-sun-of-renewables-rises-in-the-energy/article-16684"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-10/resized-image---2025-10-15t140135.344.jpeg" alt=""></a><br /><p>भारत में अब छतें सिर्फ़ बारिश नहीं, सूरज भी पकड़ रही हैं। प्रधानमंत्री सूर्या घर योजना (PMSGY) ने देश के रेज़िडेंशियल रूफटॉप सोलर सेक्टर को नई दिशा दी है। लॉन्च के महज़ एक साल में 4,946 मेगावॉट क्षमता स्थापित की जा चुकी है, और अब तक ₹9,280 करोड़ (लगभग 1.05 बिलियन डॉलर) की सब्सिडी जारी हो चुकी है। लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं होती — क्योंकि जहाँ रोशनी बढ़ रही है, वहीं कुछ साये भी साथ चल रहे हैं। तेज़ी आई, लेकिन असमानता बरकरार IEEFA और JMK Research की नई रिपोर्ट बताती है कि जुलाई 2025 तक 57.9 लाख घरों ने रूफटॉप सोलर के लिए आवेदन किया। यह मार्च 2024 की तुलना में चार गुना वृद्धि है। फिर भी, कुल 1 करोड़ इंस्टॉलेशन के लक्ष्य का सिर्फ 13.1% ही पूरा हो सका है। यानी उत्साह ज़रूर बढ़ा है, पर ज़मीन पर रफ्तार अभी सीमित है।</p>
<p>गुजरात और केरल इस रेस में सबसे आगे हैं। दोनों राज्यों का conversion ratio 65% से अधिक है — मतलब, वहाँ जितने लोग आवेदन करते हैं, उनमें से दो-तिहाई के घरों पर सोलर लग भी जाता है। इसका कारण साफ है: परिपक्व सोलर इकोसिस्टम, मज़बूत वेंडर नेटवर्क और उपभोक्ताओं में जागरूकता। इसके उलट, देश का औसत installation-to-application conversion ratio सिर्फ़ 22.7% है — यह बताता है कि इच्छुक घरों में से चार में से तीन को अभी भी रास्ता नहीं मिल पा रहा।</p>
<h4><strong><span style="color:rgb(224,62,45);"> राज्य आगे बढ़ रहे हैं — अपने तरीके से</span></strong></h4>
<p>केंद्र की सब्सिडी के साथ-साथ कई राज्य सरकारें अब खुद भी मदद बढ़ा रही हैं। असम, दिल्ली, गोवा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों ने अतिरिक्त पूंजी सब्सिडी शुरू की है, ताकि शुरुआती इंस्टॉलेशन लागत कम हो सके पर जहाँ वित्तीय प्रोत्साहन हैं, वहीं कई अड़चनें भी बनी हुई हैं — कम जागरूकता, कठिन लोन प्रक्रिया, शिकायत निवारण पोर्टल की तकनीकी गड़बड़ियाँ, और बिखरी हुई सप्लाई चेन।</p>
<h3><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>सपनों के बीच की हकीकत</strong></span></h3>
<p>IEEFA और JMK की रिपोर्ट बताती है कि सोलर एडॉप्शन की सबसे बड़ी बाधा अब पैसे या तकनीक से ज़्यादा, धारणा है। कई उपभोक्ताओं को अब भी लगता है कि सोलर लगाना महँगा है या रखरखाव मुश्किल है। JMK Research के सीनियर कंसल्टेंट प्रभाकर शर्मा कहते हैं, “कम जागरूकता और आसान फाइनेंस की अनुपलब्धता अब भी बड़ी रुकावटें हैं। ख़ासकर ग्रामीण इलाकों में लोग सोलर को अब भी ‘महंगी तकनीक’ समझते हैं। इसी गैप को भरने के लिए योजना में capacity-building programmes जोड़े गए हैं — 2024 से अब तक तीन लाख से अधिक लोगों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है, ताकि स्थानीय वेंडर, फाइनेंसर और यूटिलिटी कर्मी सोलर इकोसिस्टम का हिस्सा बन सकें।</p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>घरेलू सामग्री और डिजिटल सुधार</strong></span></h4>
<p>PMSGY के तहत अब Domestic Content Requirement लागू है, जिससे हर इंस्टॉलेशन में प्रमाणित भारतीय सोलर मॉड्यूल का उपयोग सुनिश्चित होता है। “इनोवेटिव प्रोजेक्ट्स” घटक के तहत सरकार 60% तक की ग्रांट देकर नए बिज़नेस मॉडल्स और पायलट प्रोजेक्ट्स को प्रोत्साहन दे रही है। राज्यों को सोलर सिटी और मॉडल सोलर विलेज विकसित करने के लिए भी कहा गया है। लेकिन रिपोर्ट यह भी मानती है कि बिना सुसंगत और समयबद्ध लक्ष्यों के, ये प्रयास छिटपुट रह सकते हैं। IEEFA की डायरेक्टर विभूति गर्ग कहती हैं, “हर राज्य को अपने स्तर पर स्पष्ट और समयबद्ध रूफटॉप सोलर लक्ष्य तय करने होंगे। तभी नीति का असर ज़मीनी स्तर पर दिखेगा।” शिकायतें, देरी और समाधान रिपोर्ट यह भी बताती है कि ग्रिवांस रेड्रेसल सिस्टम तो बनाया गया है, लेकिन उसकी प्रभावशीलता सीमित है। कई उपभोक्ताओं को सब्सिडी डिस्बर्समेंट, पोर्टल एरर या डेटा एंट्री गलती जैसी समस्याएँ झेलनी पड़ रही हैं। इस पर JMK Research के अमन गुप्ता सुझाव देते हैं, “जिले स्तर पर एस्केलेशन मैट्रिक्स बनाना चाहिए ताकि शिकायतें सिर्फ़ डिस्कॉम या पोर्टल तक सीमित न रहें।”</p>
<h4> <strong><span style="color:rgb(224,62,45);">आगे की दिशा: प्लग-एंड-प्ले सोलर</span></strong></h4>
<p>रिपोर्ट कहती है कि सोलर मार्केट में अभी तक एकरूप गुणवत्ता की कमी है। अगर मानकीकृत plug-and-play सोलर किट्स (जिसमें मॉड्यूल, इन्वर्टर, स्ट्रक्चर, और केबल एक पैक में हों) तैयार की जाएँ, तो इंस्टॉलेशन आसान और तेज़ हो सकता है। यही दृष्टिकोण भविष्य के सोलर विस्तार की कुंजी बन सकता है।</p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>निष्कर्ष: रोशनी की यह यात्रा लंबी है, लेकिन दिशा सही है</strong></span></h4>
<p>PMSGY ने साबित किया है कि भारत की छतें अब सिर्फ़ धूप से नहीं, उम्मीद से भी भर रही हैं। सिर्फ़ एक साल में 4.9GW जोड़ना मामूली बात नहीं है। लेकिन अगर 2027 तक 30GW का लक्ष्य हासिल करना है, तो सब्सिडी से ज़्यादा ज़रूरत है — डिजिटल पारदर्शिता, मानकीकृत समाधान, और उपभोक्ता भरोसे की। जलवायु कार्रवाई की असली परीक्षा अब नीतियों में नहीं, बल्कि उन छतों पर होगी जहाँ कोई परिवार सूरज से अपनी पहली बिजली बना रहा होगा।</p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 15 Oct 2025 14:02:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[  Climate कहानी   ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>उत्तराखंड की आपदा: जब हिमालय ने तोड़ी चुप्पी, और हमारे तैयार न होने की चुकानी पड़ी कीमत  </title>
                                    <description><![CDATA[जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि मानसून अब पुराने ढर्रे पर नहीं चलता। अरब सागर पर गर्म होती हवाएं, मध्य एशिया में तेज़ी से बढ़ते तापमान और दक्षिण-पश्चिमी हवाओं का उत्तर की ओर झुकाव, ये सब मिलकर उत्तर भारत के हिमालयी क्षेत्रों में बारिश के ‘तूफानी पैटर्न’ बना रहे हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/the-disaster-of-uttarakhand-when-the-himalayas-broke-silence-and/article-15335"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-08/resized-image2.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">दोपहर का वक्त था। बादल घिरे थे, पर कोई डर नहीं था। यह तो पहाड़ों का रोज़ का मिज़ाज है। लेकिन अचानक, जैसे किसी ने आसमान के दरवाज़े को खोल दिया हो। </p>
<p style="text-align:justify;">एक गगनचुंबी जलधारा सीधी पहाड़ से उतरती हुई धाराली की गलियों में घुस गई। जो सामने आया, उसे बहा ले गई। घर, दुकान, पुल, सड़क… सब कुछ।</p>
<p style="text-align:justify;">स्थानीय लोगों को पहले लगा कि यह सामान्य बादल फटना होगा, लेकिन जब आवाज़ें तेज़ होती गईं, पानी का रंग गाढ़ा होता गया, और ज़मीन कांपने लगी—तब सब समझ गए, यह एक और जलवायु-जनित आपदा है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन क्या यह वाकई ‘अचानक’ हुआ? या फिर यह वह तबाही थी, जिसकी चेतावनी हमें सालों से मिल रही थी… और जिसे हमने बार-बार नजरअंदाज़ किया?</p>
<h4><strong>बदलता मानसून और पहाड़ों पर बढ़ता ख़तरा</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि मानसून अब पुराने ढर्रे पर नहीं चलता। अरब सागर पर गर्म होती हवाएं, मध्य एशिया में तेज़ी से बढ़ते तापमान और दक्षिण-पश्चिमी हवाओं का उत्तर की ओर झुकाव, ये सब मिलकर उत्तर भारत के हिमालयी क्षेत्रों में बारिश के ‘तूफानी पैटर्न’ बना रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>स्कायमेट वेदर के महेश पलावत समझाते हैं: </strong>“जब गर्म समुद्री हवा भारी नमी लेकर हिमालय से टकराती है, तो पहाड़ उसे रोकते हैं। नतीजा होता है Cumulonimbus बादलों का बनना—ऐसे बादल जो 50,000 फीट तक ऊंचे जा सकते हैं। ये बादल जब फटते हैं, तो अपने साथ पूरी घाटी में तबाही ला सकते हैं।”</p>
<p style="text-align:justify;">यह सिर्फ एक स्थानीय घटना नहीं थी, यह उस मानसूनी सिस्टम का परिणाम था जिसे Middle East Spring Heating ने और अस्थिर कर दिया है।</p>
<h4><strong>पिघलते ग्लेशियर और कमजोर होती चट्टानें</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">DRDO और MoES के आंकड़ों के मुताबिक, हिमालय के ग्लेशियर हर साल औसतन 15 मीटर पीछे हट रहे हैं। कुछ इलाकों में यह दर 20 मीटर से भी ज़्यादा है।<br />गंगा बेसिन: 15.5 मीटर/वर्ष<br />इंडस बेसिन: 12.7 मीटर/वर्ष<br />ब्रह्मपुत्र: 20.2 मीटर/वर्ष</p>
<p style="text-align:justify;">Wadia Institute of Himalayan Geology के वैज्ञानिक बताते हैं कि जैसे-जैसे ग्लेशियर पिघलते हैं, नीचे की ज़मीन अस्थिर होती जाती है। पिघलती बर्फ, बहती चट्टानें और अचानक बनने वाले झीलें, जिनके टूटने पर कई गांव बह जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">2018 तक Karakoram और Hindu Kush जैसे इलाकों में 127 बड़े glacier-related landslides रिकॉर्ड किए गए हैं।</p>
<h4><strong>हिमालय अब चेतावनी नहीं दे रहा, वो सीधे जवाब दे रहा है</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">IPCC की Cryosphere रिपोर्ट साफ़ कहती है कि high-elevation regions में हर 1°C तापमान बढ़ने पर वर्षा की तीव्रता 15% बढ़ जाती है। यह सामान्य विज्ञान से दुगुनी दर है।</p>
<p style="text-align:justify;">अब ऊंचे इलाकों में बारिश बर्फ की जगह होती है। क्यों? क्योंकि zero-degree isotherm, वो स्तर जिस पर बर्फ गिरती है, ऊपर चला गया है। जहां बर्फ गिरती थी, अब मूसलधार बारिश होती है। और जब बारिश होती है, तो वह बर्फ की तरह शांत नहीं होती, वो मिट्टी, चट्टान और पेड़ों को बहाकर ले जाती है।</p>
<h4><strong>अंधाधुंध विकास: विकास या विनाश का न्योता?</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">2013 का केदारनाथ<br />2021 की ऋषिगंगा<br />और अब 2025 की धाराली आपदा, तीनों एक जैसी कहानियां कहती हैं: “प्राकृतिक आपदाएं हमारी नीतिगत विफलता का आइना हैं।”</p>
<p style="text-align:justify;">होटल, सड़कें, सुरंगें, और हाइड्रो प्रोजेक्ट, इन सबका निर्माण बिना भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>दून यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर वाईपी सुंद्रियाल कहते हैं:</strong><br />“हिमालय दुनिया की सबसे युवा पर्वत श्रृंखला है—अभी यह भूगर्भीय दृष्टि से अधपका है। और हम इसमें निर्माण कर रहे हैं, जैसे यह किसी पठार पर बना शहर हो। बारिश की हर बूंद अब विनाशक बन सकती है।”</p>
<h4><strong>समाधान क्या है? और क्यों हम अब भी टाल रहे हैं?</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">IIT मुंबई के डॉ. सुभीमल घोष कहते हैं, “जैसे हमने चक्रवातों के लिए चेतावनी प्रणाली बनाई है, वैसे ही हमें पहाड़ी इलाकों के लिए भी Floodplain Zoning, Early Warning Systems और खतरे की लेवल आधारित प्लानिंग करनी चाहिए।”</p>
<p style="text-align:justify;">Automatic Weather Stations (AWS), खासकर हिमालय की ऊपरी पहाड़ियों में, जान बचाने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>ISB के प्रोफेसर अंजल प्रकाश, जो IPCC के लेखक भी हैं, चेतावनी देते हैं: </strong>“हमें AWS का जाल फैलाना होगा। हर घाटी, हर जलग्रहण क्षेत्र, हर पहाड़ी की नब्ज़ हमें पढ़नी होगी—तभी हम समय रहते अलर्ट जारी कर पाएंगे।”</p>
<h4><strong>हम क्या खो रहे हैं, ये सिर्फ आंकड़े नहीं बताते, वो ज़मीनी कहानियां हैं</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">हर बार जब एक घर बहता है, कोई अपनी ज़मीन छोड़ता है, या कोई बच्चा अपने स्कूल का रास्ता खो बैठता है, हम सिर्फ जलवायु परिवर्तन की मार नहीं झेल रहे, हम अपनी योजनात्मक अक्षमता की कीमत चुका रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हिमालय कोई ‘अदृश्य खतरा’ नहीं है। वो हर साल, हर मानसून, हर जलप्रलय में हमें याद दिला रहा है: “मैं थक चुका हूं सहन करते करते। अब आपकी बारी है सीखने की।”</p>
<p style="text-align:justify;">क्या हम तैयार हैं? या फिर अगली बार की बारी किसी और धाराली की होगी?</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 Aug 2025 17:23:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[  Climate कहानी   ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Climate कहानी: बात सिर्फ मौसम की नहीं, अब इंसाफ की भी</title>
                                    <description><![CDATA[अब इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस भी कह रहा: जलवायु को बचाना सिर्फ नैतिक नहीं, कानूनी ज़िम्मेदारी भी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/international/climate-story-talk-is-not-just-the-weather-but-also/article-14950"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-07/resized-image-(26).jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आज इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ), यानि दुनिया की सबसे बड़ी अदालत, ने एक ऐतिहासिक सलाह दी है. उन्होंने साफ-साफ कह दिया है कि दुनिया के हर देश की ये कानूनी ज़िम्मेदारी है कि वो जलवायु संकट को रोकने के लिए ठोस कदम उठाएं. कोई बहाना नहीं चलेगा. अब ये सिर्फ वैज्ञानिक चेतावनी या युवाओं का आंदोलन नहीं है, ये कानून की बात है.</p>
<p style="text-align:justify;">ये कहानी शुरू हुई थी एक छोटे से द्वीप देश वानुआतु से, जहाँ के युवाओं ने ये सवाल उठाया: "क्या हमारी सरकारें जलवायु संकट से हमारी रक्षा करने की कानूनी ज़िम्मेदारी निभा रही हैं?" इसी सवाल को 2023 में UN महासभा ने ICJ के सामने रखा. और आज, दुनिया भर से आए 100 से ज़्यादा देशों की दलीलें सुनने के बाद, ICJ ने ये ऐलान किया है:</p>
<p style="text-align:justify;">"हर देश को अपने ग्रीनहाउस गैस एमिशन को तेजी से कम करना होगा और कोयला, तेल, गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों से छुटकारा पाना होगा. वरना वो अंतरराष्ट्रीय कानून तोड़ रहे होंगे." UN महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इसे एक "ऐतिहासिक जीत" बताया है, पृथ्वी के लिए, जलवायु न्याय के लिए, और उन युवाओं के लिए जो लगातार लड़ रहे हैं.</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>मुद्दा साफ है:</strong> पेरिस समझौते में तय 1.5 डिग्री सेल्सियस का लक्ष्य कोई सुझाव भर नहीं है, ये एक ज़रूरी पैमाना है, जिसके हिसाब से नीतियां बनानी ही होंगी.</p>
<h3 style="text-align:justify;">अदालतों की लहर बन चुकी है </h3>
<p style="text-align:justify;">ICJ का ये फैसला अकेला नहीं है. इससे पहले नीदरलैंड, दक्षिण कोरिया, जर्मनी, बेल्जियम, इंटर-अमेरिकन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स, और यूरोपीय मानवाधिकार अदालत जैसे कई मंचों ने भी यही कहा है—सरकारें जलवायु परिवर्तन को रोकने में नाकाम रहती हैं, तो ये सिर्फ नीति की नाकामी नहीं, इंसानों के अधिकारों का उल्लंघन है.</p>
<p style="text-align:justify;">कानून अब लोगों के साथ खड़ा है. Climate Litigation Network की को-<strong>डायरेक्टर सारा मीड ने कहा:</strong> "ये फैसला उस उम्मीद को वैधता देता है जो दुनिया के ज़्यादातर लोग अपनी सरकारों से रखते हैं—कि वो हमारी और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा के लिए जलवायु पर ठोस कदम उठाएंगे."</p>
<p style="text-align:justify;">आज के हालात में, जब ज़्यादातर देशों की जलवायु योजनाएं अधूरी और कमज़ोर हैं, तो ये कानूनी राय नई उम्मीद और ताकत देती है. स्विट्ज़रलैंड जैसे देशों पर भी अब दबाव बढ़ेगा, जो कोर्ट के पुराने फैसलों को चुनौती दे रहे हैं. </p>
<p style="text-align:justify;"><strong>ग्रीनपीस स्विट्ज़रलैंड के जॉर्ज क्लिंगलर ने कहा:</strong> "ICJ ने साफ कर दिया है कि हर देश का कानूनी फर्ज़ है कि वो जलवायु संकट से सबसे ज़्यादा प्रभावित लोगों और भविष्य की पीढ़ियों की रक्षा करे."</p>
<h3 style="text-align:justify;">आगे क्या?</h3>
<p style="text-align:justify;">अब जबकि बेल्जियम, फ्रांस, कनाडा, तुर्की, पुर्तगाल, न्यूजीलैंड, और कई देशों में जलवायु मुकदमे चल रहे हैं, ये सलाह एक तरह का कानूनी और नैतिक कम्पास बन सकती है. इससे एक्टिविस्ट, समुदाय और आम लोग अपने हक़ के लिए और मजबूती से खड़े हो सकेंगे.</p>
<p style="text-align:justify;">यानी अब मौसम की तरह सरकारों के मूड बदलने का समय नहीं है—अब जवाबदेही का मौसम आ गया है.</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>अंतरराष्ट्रीय</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 25 Jul 2025 21:24:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[  Climate कहानी   ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Climate कहानी: कोयला हुआ पुराना, अब रिन्यूएबल ही सस्ता</title>
                                    <description><![CDATA[IRENA (इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी) की ताज़ा रिपोर्ट यही कहती है. 2024 में दुनिया भर में जितनी भी नई बिजली परियोजनाएं शुरू हुईं, उनमें से 91% रिन्यूएबल एनर्जी की थीं—और ये सब कोयला और गैस से सस्ती साबित हुईं.]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/climate-story--coal-became-old-now-renewable-is-cheaper/article-14878"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-07/image-(1).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">दुनिया भर में 91% नई सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाएं कोयले-गैस से सस्ती पड़ीं. लेकिन सवाल अब भी बड़ा है: क्या सस्ती बिजली हर किसी तक पहुँच रही है? जरा सोचिए, अगर आपको बताया जाए कि बिजली बनाने का सबसे सस्ता तरीका अब न कोयला है, न गैस, बल्कि सूरज और हवा हैं—तो क्या आप भरोसा करेंगे?</p>
<p style="text-align:justify;">IRENA (इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी) की ताज़ा रिपोर्ट यही कहती है. 2024 में दुनिया भर में जितनी भी नई बिजली परियोजनाएं शुरू हुईं, उनमें से 91% रिन्यूएबल एनर्जी की थीं—और ये सब कोयला और गैस से सस्ती साबित हुईं.</p>
<h3 style="text-align:justify;">सस्ती, साफ़ और सुरक्षित - रिन्यूएबल एनर्जी की तिकड़ी</h3>
<p style="text-align:justify;">इस रिपोर्ट के अनुसार: सोलर पैनल्स से बनने वाली बिजली की लागत, सबसे सस्ते कोयले या गैस से भी औसतन 41% कम थी. ज़मीन पर लगने वाली पवन टर्बाइनों (ऑनशोर विंड) से बनने वाली बिजली तो 53% तक सस्ती थी. 2024 में अकेले रिन्यूएबल एनर्जी से जुड़े 582 गीगावॉट के नए प्रोजेक्ट लगे, जिससे दुनिया ने लगभग 57 अरब डॉलर का कोयला-तेल जलाने से बचा लिया. यानी साफ़ हवा, कम प्रदूषण और पैसे की भी बचत—एक साथ. लेकिन ये सफर उतना सीधा नहीं है.. सस्ती पड़ रही रिन्यूएबल एनर्जी के बावजूद, इसे ज़मीन पर लाना और हर किसी तक पहुंचाना अब भी टेढ़ी खीर है. </p>
<p style="text-align:justify;"><strong>IRENA की रिपोर्ट साफ़ कहती है कि:</strong> परमिट मिलने में देरी, ग्रिड से जोड़ने में तकनीकी दिक्कतें, और फाइनेंसिंग की ऊँची लागत, कई देशों - खासकर भारत जैसे उभरते बाज़ारों में - रिन्यूएबल की रफ्तार को थामे हुए हैं.</p>
<p style="text-align:justify;">Global South के लिए ये सस्ता सपना अभी भी महँगा क्यों है? रिपोर्ट में एक दिलचस्प तुलना की गई - यूरोप और अफ्रीका की. दोनों ही जगह 2024 में ऑनशोर विंड प्रोजेक्ट्स की लागत लगभग बराबर थी (0.052 डॉलर प्रति यूनिट), लेकिन कारण अलग थे: यूरोप में ज़्यादा खर्च मशीन और सेटअप पर हुआ, जबकि अफ्रीका में ब्याज और फाइनेंसिंग की लागत ज़्यादा थी - क्योंकि निवेशकों को वहाँ रिस्क ज़्यादा लगता है.IRENA ने बताया कि यूरोप में पूंजी लागत 3.8% थी, वहीं अफ्रीका में 12% तक पहुँची. ये फर्क दिखाता है कि भले ही सूरज सब पर बराबर चमकता हो, लेकिन सोलर प्लांट सबके लिए बराबर सस्ता नहीं है.</p>
<h3>तकनीक भी दे रही है साथ, लेकिन सिस्टम पीछे छूट रहा है</h3>
<p style="text-align:justify;">2010 से अब तक बड़ी बैटरियों की लागत 93% तक गिर चुकी है. अब सोलर-विंड प्लांट्स के साथ बैटरियां और AI-आधारित डिजिटल सिस्टम जोड़े जा रहे हैं, ताकि बिजली का उत्पादन स्मार्ट, लचीला और टिकाऊ बन सके. लेकिन अफसोस ये है कि ऐसे इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश अभी भी धीमा है, खासकर उन देशों में जहाँ इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है.</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>गुटेरेस और IRENA की सीधी बात:</strong> संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा "रिन्यूएबल सिर्फ सही नहीं, समझदारी भरा निवेश है. अब वक्त है कि देश इनकी राह की रुकावटें हटाएं और निवेश को बढ़ावा दें."</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>IRENA के प्रमुख फ्रांसेस्को ला कैमेरा ने चेतावनी दी: </strong>"अगर हमने अभी नीतियों को मज़बूत नहीं किया, फाइनेंसिंग आसान नहीं बनाई, तो ये प्रगति धीमी हो सकती है."</p>
<h4 style="text-align:justify;">निचोड़ की बात</h4>
<p style="text-align:justify;">साफ़ बिजली अब सिर्फ एक सपना नहीं रही—ये हकीकत है. लेकिन क्या ये हकीकत सब तक पहुँच रही है? क्या जो लोग हर महीने बिजली के बिल से जूझते हैं, उन्हें इसका फायदा मिल रहा है? क्या गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों में भी सूरज और हवा से सस्ती बिजली पहुँच पा रही है? जब तक हम इन सवालों पर काम नहीं करते, तब तक “सस्ती बिजली” का ये दावा अधूरा है. रिन्यूएबल की कहानी, सिर्फ तकनीक की नहीं, नीति, निवेश और न्याय की भी है.</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/article/environment/climate-story--coal-became-old-now-renewable-is-cheaper/article-14878</link>
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                <pubDate>Wed, 23 Jul 2025 18:49:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[  Climate कहानी   ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Climate कहानी: बाउंसर बन चुकी है गर्मी: क्रिकेट पर मंडराता जलवायु संकट</title>
                                    <description><![CDATA[IPL 2025 के मैच तो लोगों ने खूब देखे होंगे, लेकिन अब जो रिपोर्ट आई है, वो चिंता बढ़ाने वाली है. रिपोर्ट कहती है कि इस साल IPL के करीब आधे मैच ऐसे मौसम में खेले गए जब मैदान की गर्मी इंसानी सेहत के लिए खतरा बन चुकी थी.]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/game/climate-story-has-become-a-bouncer-bouncer/article-14846"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-07/download-(2)-(1)1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">IPL के एक तिहाई मैच ऐसी गर्मी में खेले गए जो खिलाड़ियों की सेहत के लिए ख़तरनाक मानी जाती है. IPL 2025 के मैच तो लोगों ने खूब देखे होंगे, लेकिन अब जो रिपोर्ट आई है, वो चिंता बढ़ाने वाली है. रिपोर्ट कहती है कि इस साल IPL के करीब आधे मैच ऐसे मौसम में खेले गए जब मैदान की गर्मी इंसानी सेहत के लिए खतरा बन चुकी थी.</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, वैज्ञानिक ‘हीट इंडेक्स’ नाम की चीज़ से ये तय करते हैं कि मौसम कितना नुकसानदेह है. इसमें तापमान और नमी को मिलाकर देखा जाता है कि बाहर रहना कितना जोखिम भरा हो सकता है. अब इस रिपोर्ट के मुताबिक, 65 मैचों में से 36% मुकाबले ऐसी हालत में हुए जिसमें थकावट और हीटस्ट्रोक का खतरा काफी ज्यादा था. 12% मैच तो सीधे-सीधे 'डेंजर जोन' में थे.</p>
<p style="text-align:justify;">यह रिपोर्ट ‘हिट फॉर सिक्स’ नाम से आई है, जिसे ब्रिटेन की एक खेल और जलवायु संस्था, क्लाइमेट सेंट्रल और कई दूसरे संगठनों ने मिलकर तैयार किया है. इसमें खिलाड़ियों, वैज्ञानिकों और पूर्व क्रिकेटरों की राय भी शामिल है.</p>
<h3>गर्मी से बढ़ रही मुश्किलें</h3>
<p style="text-align:justify;">पोर्ट्समाउथ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर माइक टिपटन कहते हैं कि अब खिलाड़ियों को ऐसे हालात में खेलना पड़ रहा है जो न सिर्फ़ परेशानी वाले हैं बल्कि उनकी सेहत के लिए खतरनाक भी हैं. उन्होंने कहा, "अब बात सिर्फ़ परफॉर्मेंस की नहीं रह गई है, बात खिलाड़ियों की सुरक्षा की है."</p>
<p style="text-align:justify;">रिपोर्ट ये भी बताती है कि भारत के ज़्यादातर क्रिकेट स्टेडियमों में पिछले कुछ दशकों में खतरनाक गर्म दिनों की तादाद तेज़ी से बढ़ी है. मुंबई में ऐसे दिनों की संख्या 125% बढ़ चुकी है. केरल के तिरुवनंतपुरम में तो 2024 में 100 से ज़्यादा ऐसे दिन रिकॉर्ड हुए जब गर्मी का असर सीधे सेहत पर पड़ सकता था.</p>
<h3>ये सिर्फ भारत की कहानी नहीं</h3>
<p style="text-align:justify;">ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, साउथ अफ्रीका जैसे देशों में भी ऐसी ही हालत है. हर साल गर्मी का स्तर ऊपर जा रहा है. अमेरिका में फुटबॉल के मैच और विंबलडन जैसे टूर्नामेंट भी इस बार भयंकर गर्मी में खेले गए.</p>
<p style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र की मौसम एजेंसी का कहना है कि 2025 दुनिया के सबसे गर्म सालों में गिना जाएगा. वैज्ञानिक साफ़ कह रहे हैं कि ये सब कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधन जलाने की वजह से हो रहा है.</p>
<h3>खिलाड़ी क्या कह रहे हैं?</h3>
<p style="text-align:justify;">वेस्टइंडीज़ के पूर्व कप्तान डैरेन गंगा कहते हैं, “आज क्रिकेट वाकई एक मुश्किल दौर में है. गर्मी की वजह से उल्टी, चक्कर और हीट स्ट्रोक होना अब आम बात हो गई है.”<br />IPL टीमों से जुड़े ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी ऐश्टन टर्नर बोले, “हम क्रिकेट को मैदान से अलग नहीं कर सकते. अब मैदान का मौसम पहले से ज्यादा तेजी से बदल रहा है.”</p>
<p style="text-align:justify;">ऑस्ट्रेलिया के ही साइमन कैटिच ने कहा कि जलवायु संकट का असर बच्चों के खेल पर भी दिख रहा है. उनके बेटे के कई जूनियर क्रिकेट मैच बारिश और खराब मौसम की वजह से रद्द हो चुके हैं.</p>
<h3>ज़मीनी स्तर के खिलाड़ी भी परेशान</h3>
<p style="text-align:justify;">दिल्ली की टॉस क्रिकेट अकादमी के राघव कहते हैं, “गर्मी में पिच जल्दी सूख जाती है, गेंदबाज़ों को मुश्किल होती है, बल्लेबाज़ भी थक जाते हैं. यह अब एक बड़ी चिंता बन गया है.”</p>
<p style="text-align:justify;">नोएडा के वंडर्स क्लब के मोहम्मद कैफ कहते हैं, “गर्मी को लेकर डर बढ़ गया है. हम सोच भी नहीं सकते कि हालात और कितना बिगड़ सकते हैं.”</p>
<h3>क्रिकेट का क्या रोल हो सकता है?</h3>
<p style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र के जलवायु सलाहकार सेल्विन हार्ट ने कहा कि जलवायु संकट एक ‘बाउंसर’ की तरह है, और अगर हम चूके तो यह हमें गंभीर चोट पहुंचाएगा. उन्होंने कहा, “क्रिकेट इस संकट से बच नहीं सकता, लेकिन बदलाव लाने में इसकी बड़ी भूमिका हो सकती है.”</p>
<p style="text-align:justify;">क्लाइमेट सेंट्रल की वैज्ञानिक क्रिस्टीना दहल कहती हैं कि अगर हम जीवाश्म ईंधन जलाना बंद नहीं करते, तो ऐसे खतरनाक दिन और बढ़ेंगे. हमें खेल के कैलेंडर को फिर से सोचना होगा ताकि खिलाड़ी और दर्शक दोनों सुरक्षित रह सकें.</p>
<h3>सीधी बात:</h3>
<p style="text-align:justify;">क्रिकेट सिर्फ एक खेल नहीं है, ये लाखों लोगों की भावना से जुड़ा है. लेकिन अब इस खेल पर भी जलवायु परिवर्तन का सीधा असर दिखने लगा है. सवाल ये है कि क्या हम वक्त रहते आंख खोलेंगे?</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>आर्टिकल</category>
                                            <category>खेल</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 22 Jul 2025 10:47:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[  Climate कहानी   ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Climate कहानी: गरम होता एशिया: समंदर से पहाड़ तक जलवायु संकट की मार, लेकिन चेतावनी और तैयारी ने बचाई जानें</title>
                                    <description><![CDATA[2024 में एशिया का औसत तापमान 1991–2020 की तुलना में 1.04°C ज़्यादा रहा. चीन, जापान, कोरिया, म्यांमार जैसे देशों में महीनों तक लगातार हीटवेव्स चलीं. म्यांमार ने 48.2°C का नया रिकॉर्ड बना दिया—इतनी गर्मी कि इंसानी शरीर जवाब देने लगे]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/climate-story-growing-holy-climate-crisis-from-asia-sea-to/article-14611"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-06/download-(9)-(1).jpg" alt=""></a><br /><p>साल 2024 का साल एशिया के लिए सिर्फ गर्म नहीं था, ये एक जलवायु चेतावनी की घंटी जैसा था—कभी धधकते शहर, कभी पिघलते ग्लेशियर, तो कभी डूबते खेत. वर्ल्ड मेट्रोलॉजिकल ऑर्गनाइज़ेशन (WMO) की ताज़ा रिपोर्ट State of the Climate in Asia 2024 बताती है कि एशिया अब पूरी दुनिया से लगभग दोगुनी रफ्तार से गरम हो रहा है, और इसका असर हर किसी की ज़िंदगी पर पड़ रहा है.</p>
<h3>तापमान ने तोड़े रिकॉर्ड, एशिया अब 'हीट ज़ोन'</h3>
<p>2024 में एशिया का औसत तापमान 1991–2020 की तुलना में 1.04°C ज़्यादा रहा. चीन, जापान, कोरिया, म्यांमार जैसे देशों में महीनों तक लगातार हीटवेव्स चलीं. म्यांमार ने 48.2°C का नया रिकॉर्ड बना दिया—इतनी गर्मी कि इंसानी शरीर जवाब देने लगे. अप्रैल से लेकर नवंबर तक कुछ हिस्सों में लगातार गर्मी से राहत नहीं मिली.</p>
<h3>समंदर भी कर रहे हैं उबाल</h3>
<p>एशिया का पूरा समुद्री इलाका अब तेज़ी से गर्म हो रहा है. WMO की रिपोर्ट कहती है कि समुद्री सतह का तापमान अब हर दशक में 0.24°C बढ़ रहा है—ये ग्लोबल औसत (0.13°C) से लगभग दोगुना है. 2024 में रिकॉर्डतोड़ "मरीन हीटवेव्स" आईं. अगस्त-सितंबर के दौरान, करीब 15 मिलियन वर्ग किलोमीटर समुद्र इस हीटवेव से प्रभावित हुआ—यानी पूरी धरती के महासागरीय क्षेत्र का 10% हिस्सा. इससे मछलियों की ब्रीडिंग, समुद्री जीव-जंतु और तटीय आजीविकाओं पर सीधा असर पड़ा. छोटे द्वीपीय देशों और भारत के तटीय क्षेत्रों के लिए ये एक नया खतरा बन चुका है.</p>
<h3>हिमालय से आती है एक और चिंता: पिघलते ग्लेशियर</h3>
<p>"तीसरा ध्रुव" कहे जाने वाले हाई माउंटेन एशिया (HMA)—जो तिब्बती पठार और हिमालय क्षेत्र में फैला है—अब तेज़ी से अपनी बर्फ खो रहा है. 2023–24 के आंकड़ों में, 24 में से 23 ग्लेशियरों का द्रव्यमान घटा. मध्य हिमालय और तियन शान की चोटियों पर कम बर्फबारी और अत्यधिक गर्मी ने ग्लेशियरों को खोखला बना दिया है. उरुमची ग्लेशियर नंबर 1, जो 1959 से मॉनिटर किया जा रहा है, उसने अब तक की सबसे बड़ी बर्फीली गिरावट दर्ज की. ग्लेशियरों के पिघलने से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड्स (GLOFs) और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं. इसका सीधा असर पानी की सुरक्षा और लाखों लोगों की ज़िंदगी पर पड़ता है जो इन नदियों पर निर्भर हैं.</p>
<h3>बारिश और सूखे की दोहरी मार</h3>
<p>WMO की रिपोर्ट बताती है कि 2024 में कहीं सूखा तो कहीं भीषण बाढ़ ने ज़िंदगी को उलट-पलट कर दिया:<br /><strong>नेपाल:</strong> सितंबर में रिकॉर्ड बारिश से आई बाढ़ में 246 लोगों की मौत हुई और 130,000 से ज्यादा लोगों को समय रहते राहत दी गई.<br /><strong>भारत, केरल: </strong>30 जुलाई को भयानक बारिश (48 घंटे में 500 मिमी से ज्यादा) ने भूस्खलन और 350 से ज्यादा मौतों को जन्म दिया.<br /><strong>चीन: </strong>सूखे ने 4.8 मिलियन लोगों को प्रभावित किया, 3.35 लाख हेक्टेयर फसल नष्ट हुई, और ₹400 करोड़ से ज्यादा का नुकसान हुआ.<br /><strong>UAE:</strong> 24 घंटे में 259.5 मिमी बारिश—1949 से अब तक की सबसे ज्यादा—ने मध्य पूर्व की जलवायु स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए.<br /><strong>कज़ाकिस्तान और रूस: </strong>भारी बर्फ पिघलने और असामान्य बारिश ने 70 साल की सबसे बड़ी बाढ़ लाई, 1.18 लाख लोग बेघर हुए.</p>
<h3>लेकिन चेतावनी और तैयारी काम आई</h3>
<p>रिपोर्ट का एक अहम हिस्सा नेपाल का केस स्टडी है. जहां समय रहते "early warning systems" और स्थानीय प्रशासन की तैयारी ने जानें बचाईं. सरकारी एजेंसियों और समुदायों के बीच तालमेल ने 1.3 लाख लोगों को पहले ही अलर्ट कर दिया, जिससे जान-माल का नुकसान सीमित रहा. संदेश साफ है: जलवायु बदल रही है, तैयारी ही रक्षा है WMO की महासचिव सेलेस्टे साओलो ने कहा, "मौसम अब सिर्फ मौसम नहीं रहा, ये लोगों की आजीविका, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा का सवाल बन गया है." रिपोर्ट सरकारों के लिए एक सीधा संदेश है: जलवायु संकट को आंकड़ों से नहीं, तैयारी और नीतियों से जवाब देना होगा.</p>
<h3>क्या करें आगे?</h3>
<p>गांव-शहरों में लोकल वेदर वार्निंग सिस्टम्स को मज़बूत करना होगा<br />जलवायु शिक्षा और तैयारी को स्कूलों से लेकर पंचायतों तक पहुँचाना होगा<br />और सबसे अहम, स्थानीय कहानियों के ज़रिये लोगों को जोड़ना होगा—क्योंकि आंकड़े डराते हैं, लेकिन कहानियां समझाती हैं.</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 24 Jun 2025 12:32:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[  Climate कहानी   ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Opinion: शहर, जलवायु परिवर्तन और डॉ. अंजल प्रकाश का नज़रिया </title>
                                    <description><![CDATA[डॉ. अंजल प्रकाश की बातों में न सिर्फ तथ्यों की गहराई है, बल्कि एक उम्मीद भी है। उनका मानना है कि अगर हम समय रहते सही कदम उठाएं, तो हमारे शहर जलवायु परिवर्तन की इस लड़ाई में विजयी हो सकते हैं। उनके शब्दों में, “शहर सपनों का केंद्र हैं, और अगर हम इन्हें जलवायु संकट से बचा सके, तो यही सपने हमारी अगली पीढ़ियों को एक बेहतर भविष्य देंगे।”]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/article/environment/opinion-city-climate-change-and-dr-panjal-prakashs-view%C2%A0/article-14032"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-01/gfdgd3.jpg" alt=""></a><br /><p>“आपने कभी सोचा है, शहर सिर्फ ईंट-पत्थर की इमारतों और भीड़-भाड़ वाले बाजारों का नाम नहीं हैं। ये ज़िंदगियों के सपनों का कैनवास हैं। लेकिन ये सपने, जिनमें हम और आप जीते हैं, आज जलवायु परिवर्तन के साये में हैं। और एशिया के शहर तो इस बदलाव के केंद्र में खड़े हैं।”</p>
<p>ये कहना है डॉ. अंजल प्रकाश का जो न सिर्फ भारती इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक पॉलिसी के निदेशक और इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (आईएसबी) में एसोसिएट प्रोफेसर हैं, बल्कि जिन्हें ,प्रोफेसर अंजल प्रकाश का जिन्हें अभी हाल ही में संयुक्त राष्ट्र ने जलवायु परिवर्तन और शहरों पर अपनी आगामी विशेष रिपोर्ट के लिए मुख्य लेखक के रूप में नियुक्त किया है। प्रो. अंजल 150 जलवायु विशेषज्ञों के इस प्रतिष्ठित वैश्विक समूह को हिस्सा हैं।</p>
<p>अंजल प्रकाश की बातों में एक सहज गंभीरता होती है। वो ऐसा बोलते हैं कि लगता है जैसे कोई करीबी दोस्त हमें हमारी दुनिया के बदलते मौसम के किस्से सुना रहा हो। एक बातचीत में उन्होंने कहा, “देखिए, नेपाल का काठमांडू हो या भारत का मुंबई, बांग्लादेश का ढाका हो या चीन का शंघाई—हर शहर इस लड़ाई का हिस्सा है। फर्क बस इतना है कि सबकी चुनौतियां अलग-अलग हैं, लेकिन उनका दर्द एक जैसा है।”</p>
<h4><strong>नेपाल: हिमालय से पिघलती उम्मीदें</strong></h4>
<p>“काठमांडू को देखिए,” अंजल ने कहा, “यहां मौसम का मिज़ाज लगातार बिगड़ रहा है। ऊपर से हिमालय के ग्लेशियर पिघल रहे हैं। आपको पता है, ये सिर्फ बाढ़ और सूखे की समस्या नहीं है, यह उन किसानों के लिए जीवन-मरण का सवाल है जो इन नदियों के पानी पर पूरी तरह निर्भर हैं। और शहर के लोग? उनके लिए ये पिघलते ग्लेशियर सिर्फ खबरें नहीं, उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। पानी की किल्लत, अनियमित मौसम, और बाढ़ जैसे संकट उनके दरवाजे पर खड़े हैं। लेकिन उम्मीद की बात ये है कि नेपाल के लोग अब स्थायी जल प्रबंधन और हरित शहरीकरण जैसे उपायों पर ध्यान दे रहे हैं। बदलाव भले धीमा हो, लेकिन हो रहा है।”</p>
<h4><strong>भारत: महानगरों की लड़ाई</strong></h4>
<p>डॉ. अंजल ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, “अब भारत के महानगरों की बात करें तो यह जलवायु परिवर्तन का एकदम सामने से सामना कर रहे हैं। मुंबई, दिल्ली, कोलकाता जैसे शहर—यहां की समस्याएं सिर्फ खबरों में सुर्खियां नहीं, यहां की असलियत हैं। अत्यधिक गर्मी, ऊष्णकटिबंधीय तूफान और बढ़ते जलस्तर ने न सिर्फ शहर के ढांचे को बल्कि वहां के लोगों की सेहत और आजीविका को भी झकझोर दिया है। पर अच्छी बात ये है कि भारत में ग्रीन बिल्डिंग्स बन रही हैं, अक्षय ऊर्जा का उपयोग बढ़ रहा है, और सार्वजनिक परिवहन को सुधारने की कोशिश हो रही है। ये छोटे-छोटे कदम आने वाले बड़े बदलावों की नींव रख रहे हैं।”</p>
<h4><strong>पाकिस्तान: कराची और जल संकट</strong></h4>
<p>“अब ज़रा पाकिस्तान के कराची को देखिए,” उन्होंने गंभीर होते हुए कहा। “यहां का तापमान बढ़ रहा है, मानसून अनियमित हो गया है, और पानी की कमी ने लोगों की ज़िंदगी को बेहद मुश्किल बना दिया है। कराची के बुनियादी ढांचे को बार-बार आने वाली बाढ़ ने कमजोर कर दिया है। लेकिन वहां भी लोग हरित वास्तुकला और बेहतर जल प्रबंधन की तरफ ध्यान दे रहे हैं। यह देखकर खुशी होती है कि लोग हार मानने के बजाय समाधान खोजने में जुटे हैं।”</p>
<h4><strong>बांग्लादेश: ढाका का संघर्ष</strong></h4>
<p>डॉ. अंजल ने गहरी सांस लेते हुए कहा, “और ढाका? यहां की कहानियां सबसे ज्यादा दर्दनाक हैं। समुद्र का बढ़ता जलस्तर और बार-बार आने वाली बाढ़ ने यहां की ज़िंदगी को जैसे हिलाकर रख दिया है। लोग अपने घर खो रहे हैं, भोजन की कमी हो रही है, और स्वास्थ्य संकट बढ़ रहा है। लेकिन बांग्लादेश में सरकार और एनजीओ मिलकर बाढ़-प्रतिरोधी घर बना रहे हैं और सतत शहरी विकास की योजना पर काम कर रहे हैं। ये छोटे-छोटे प्रयास यहां के लोगों को जीने की एक नई उम्मीद दे रहे हैं।”</p>
<h4><strong>चीन: बीजिंग और शंघाई की कहानी</strong></h4>
<p>“चीन की कहानी थोड़ी अलग है,” उन्होंने समझाया। “यहां समस्या वायु प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की है। बीजिंग और शंघाई जैसे शहर तेजी से औद्योगिक विकास के चलते पर्यावरणीय संकट झेल रहे हैं। लेकिन चीन सरकार ने बड़े पैमाने पर कार्बन उत्सर्जन घटाने और नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाने के लिए ठोस कदम उठाए हैं। उनके शहरों में हरियाली बढ़ रही है और यह बाकी देशों के लिए एक प्रेरणा है।”</p>
<h4><strong>समावेशी प्रयासों की ज़रूरत</strong></h4>
<p>बात खत्म करते हुए डॉ. अंजल बोले, “देखिए, जलवायु परिवर्तन का सामना कोई अकेला देश या शहर नहीं कर सकता। यह सबकी साझी समस्या है, और समाधान भी साझे होंगे। हमें तकनीकी नवाचारों को अपनाना होगा, लोगों को जागरूक करना होगा और एक-दूसरे का सहयोग करना होगा। बेहतर शहरी नियोजन और समुदाय का सशक्तिकरण ही इस संकट का स्थायी समाधान है।”</p>
<p>डॉ. अंजल प्रकाश की बातों में न सिर्फ तथ्यों की गहराई है, बल्कि एक उम्मीद भी है। उनका मानना है कि अगर हम समय रहते सही कदम उठाएं, तो हमारे शहर जलवायु परिवर्तन की इस लड़ाई में विजयी हो सकते हैं। उनके शब्दों में, “शहर सपनों का केंद्र हैं, और अगर हम इन्हें जलवायु संकट से बचा सके, तो यही सपने हमारी अगली पीढ़ियों को एक बेहतर भविष्य देंगे।”</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>पर्यावरण</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Jan 2025 18:31:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[  Climate कहानी   ]]></dc:creator>
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