<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://samridhjharkhand.com/%E0%A4%85%E0%A4%9C%E0%A4%AF-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0--%E0%A4%B2%E0%A4%96%E0%A4%A8%E0%A4%8A/author-8" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Samridh Jharkhand RSS Feed Generator</generator>
                <title>अजय कुमार, लखनऊ - Samridh Jharkhand</title>
                <link>https://samridhjharkhand.com/author/8/rss</link>
                <description>अजय कुमार, लखनऊ RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>Opinion : विदेश दौरे के पहले दिन योगी आदित्यनाथ को बड़ी निवेश सफलता</title>
                                    <description><![CDATA[मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विदेश दौरे के दौरान सिंगापुर में 6650 करोड़ रुपये के तीन महत्वपूर्ण निवेश समझौते हुए। इन समझौतों से स्मार्ट सिटी, जल प्रबंधन, कौशल विकास और शहरी विकास परियोजनाओं को गति मिलेगी तथा उत्तर प्रदेश में रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-yogi-adityanath-gets-big-investment-success-on-first-day/article-18337"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/4e95ffa5-a7ac-4b3e-9b96-e0019320fd3c_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आजकल विदेश दौरे पर हैं। उनका यह दौरा आज 23 फरवरी से शुरू होकर 26 फरवरी तक चलेगा, जिसमें योगी को पहले दो दिन सिंगापुर और उसके बाद दो दिन जापान में गुजारना है। इसी क्रम में आज सिंगापुर पहुंचते ही सीएम योगी ने  निवेशकों के साथ गहन चर्चा की और जी-टू-बी बैठकों का आयोजन भी किया गया,जिसमें 33 वैश्विक कंपनियों के प्रतिनिधियों से मुलाकात हुई, जहां सीएम ने उत्तर प्रदेश की स्थिर नीतियों, मजबूत कानून व्यवस्था और बेहतर बुनियादी ढांचे की ताकत बताई।</p>
<p>पहले ही दिन तीन महत्वपूर्ण समझौते हुए, जिनकी राशि छह हजार छह सौ पचास करोड़ रुपये बताई जा रही है। इन समझौतों से शहरी विकास, स्मार्ट शहर परियोजनाएं, जल प्रबंधन और कौशल विकास के क्षेत्रों में प्रगति होगी। सिंगापुर के गृह मंत्री और विदेश मंत्री से उनकी भेंट ने राजनयिक स्तर पर भी मजबूती प्रदान की। उन्होंने भारतीय समुदाय को संबोधित कर प्रदेश के अवसरों से अवगत कराया और निवेश का भरोसा जगाया।</p>
<p>इस दौरे का मुख्य उद्देश्य उत्तर प्रदेश को निर्माण केंद्र और एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था वाला राज्य बनाना था। योगी ने निवेशकों को बताया कि प्रदेश में एकल खिड़की प्रणाली से अनुमोदन प्रक्रिया सरल हो गई है, बिजली-पानी की आपूर्ति निर्बाध है और एक्सप्रेसवे तथा औद्योगिक पार्कों का जाल बिछ चुका है। सिंगापुर जैसे विकसित देश ने हमेशा प्रौद्योगिकी और वित्तीय क्षेत्रों में नेतृत्व किया है, इसलिए वहां से प्राप्त सहयोग प्रदेश के औद्योगिक परिदृश्य को बदल देगा।</p>
<p>रोड शो के माध्यम से उन्होंने निवेशकों को आमंत्रित किया और प्रदेश की 36 लाख करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था को नई गति देने का वादा किया। पिछले वैश्विक निवेशक समिट में 35 लाख करोड़ के प्रस्ताव मिले थे, जिन पर कार्य शुरू हो चुका है, और यह दौरा उसी श्रृंखला का हिस्सा था। सिंगापुर से लौटते हुए योगी ने कहा कि यह यात्रा निवेश की नई लहर लाएगी, जो लाखों नौकरियां पैदा करेगी।</p>
<p>जापान प्रवास के दौरान योगी आदित्यनाथ ने यमनाशानी प्रांत के राज्यपाल से भेंट की और उच्च गति रेल परियोजनाओं पर चर्चा की। जापान की उन्नत रेल प्रौद्योगिकी उत्तर प्रदेश के लिए वरदान साबित हो सकती है, खासकर मगलेव ट्रेन जैसी परियोजनाओं के लिए। उन्होंने वहां भारतीय समुदाय के साथ सामुदायिक कार्यक्रम आयोजित किया और निवेश के अवसरों पर प्रकाश डाला। जापान के निवेशक निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटोमोबाइल क्षेत्रों में रुचि दिखा रहे हैं। योगी ने जापानी कंपनियों को प्रदेश के विशाल बाजार और कुशल श्रमिकों के बारे में बताया।</p>
<p>इस दौरे से प्राप्त प्रतिबद्धताएं ऊर्जा, परिवहन और तकनीकी क्षेत्रों को मजबूत करेंगी। जापान जैसे देश से निवेश आने से प्रदेश का निर्यात बढ़ेगा और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में उत्तर प्रदेश की स्थिति मजबूत होगी। कुल मिलाकर, चार दिनों में हुई बैठकों ने दर्जनों संभावनाएं खोली हैं, जो राज्य को आत्मनिर्भर बनाने में सहायक होंगी।</p>
<p>इस यात्रा से उत्तर प्रदेश को निवेश के अलावा अन्य लाभ भी मिले। सिंगापुर से प्राप्त समझौते जल प्रबंधन में नई तकनीक लाएंगे, जो गंगा सफाई और नदी जोड़ परियोजनाओं को गति देंगे। कौशल विकास के क्षेत्र में साझेदारी से युवाओं को आधुनिक प्रशिक्षण मिलेगा, जिससे बेरोजगारी कम होगी। जापान से उच्च गति परिवहन प्रौद्योगिकी हासिल होने से एक्सप्रेसवे और मेट्रो परियोजनाएं तेज होंगी।</p>
<p>योगी सरकार ने पहले ही निवेश नीतियों को सरल बनाया है, जिससे ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में सुधार हुआ। प्रदेश अब निवेशकों का भरोसेमंद गंतव्य बन चुका है, जहां भूमि बैंक, सस्ती बिजली और सुरक्षा का वातावरण उपलब्ध है। इस दौरे ने वैश्विक ब्रांडों का विश्वास बढ़ाया, जैसा कि वित्तीय वर्ष में सैकड़ों परियोजनाओं से स्पष्ट है। निवेश से ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योग लगेंगे, जिससे प्रवासन रुकेगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।</p>
<p>योगी आदित्यनाथ की यह यात्रा 2017 के म्यांमार दौरे के बाद पहली थी, जो दर्शाता है कि सरकार विदेशी निवेश पर कितना जोर दे रही है। सिंगापुर और जापान जैसे देशों से निवेश आने से प्रदेश का सकल   घरेलू उत्पाद बढ़ेगा और एक ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य साकार होगा। निवेशकों ने प्रदेश की कानून व्यवस्था की प्रशंसा की, जो योगी के शासन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। यात्रा से लौटकर योगी ने अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक की और प्राप्त प्रतिबद्धताओं को जमीन पर उतारने के निर्देश दिए। इन निवेशों से इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा और जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में प्रगति होगी। लाखों युवाओं को रोजगार मिलेगा, खासकर लखनऊ, नोएडा और वाराणसी जैसे शहरों में। ग्रामीण इलाकों में सौर ऊर्जा परियोजनाएं लगेंगी, जो किसानों की आय दोगुनी करेंगी। कुल 11 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के साथ गई यात्रा ने सभी क्षेत्रों को कवर किया।</p>
<p>इस दौरे की सफलता से उत्तर प्रदेश वैश्विक पटल पर चमकेगा। निवेश के अलावा सांस्कृतिक आदान-प्रदान बढ़ेगा और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। जापान के राज्यपाल के साथ चर्चा से सांस्कृतिक केंद्र स्थापित हो सकते हैं। सिंगापुर की स्मार्ट सिटी तकनीक से प्रदेश के शहर आधुनिक बनेंगे। योगी ने निवेशकों को आश्वासन दिया कि सभी प्रस्तावों पर त्वरित कार्यवाही होगी। यह यात्रा न केवल आर्थिक लाभ देगी, बल्कि राज्य की छवि को नया आयाम भी प्रदान करेगी। भविष्य में ऐसे और दौरे होंगे, जो प्रदेश को भारत का इंजन बनाएंगे।</p>
<p>निवेश से उद्योग धंधे लगेंगे, बाजार फूलेंगे और कल्याणकारी योजनाएं मजबूत होंगी। योगी आदित्यनाथ का विजन स्पष्ट है- विकसित उत्तर प्रदेश, जो विश्व गुरु भारत का आधार बने। इस दौरे ने सिद्ध कर दिया कि मेहनत और दूर दृष्टि से असंभव कुछ नहीं। प्रदेशवासी गर्व से कह सकते हैं कि उनका राज्य अब वैश्विक निवेश का केंद्र है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-yogi-adityanath-gets-big-investment-success-on-first-day/article-18337</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-yogi-adityanath-gets-big-investment-success-on-first-day/article-18337</guid>
                <pubDate>Mon, 23 Feb 2026 18:13:37 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-02/4e95ffa5-a7ac-4b3e-9b96-e0019320fd3c_samridh_1200x720.jpeg"                         length="50507"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[अजय कुमार, लखनऊ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Opinion : ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट पर विकास बनाम पर्यावरण की जंग</title>
                                    <description><![CDATA[ग्रेट निकोबार द्वीप पर प्रस्तावित 90 हजार करोड़ रुपये की मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल से मंजूरी मिलने के बाद विकास और पर्यावरण संरक्षण को लेकर बहस तेज हो गई है। यह परियोजना भारत को समुद्री व्यापार और रणनीतिक शक्ति में नई ऊंचाई दे सकती है, लेकिन इससे जैव विविधता और आदिवासी समुदायों पर खतरे की आशंका भी जताई जा रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-battle-of-development-vs-environment-on-great-nicobar-mega/article-18230"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/2b1c13ed-b467-4f49-ac3f-dc485429b5cd_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:left;">अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का सबसे दक्षिणी द्वीप ग्रेट निकोबार आज भारत की रणनीतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय बहस का केंद्र बन चुका है। करीब 90 हजार करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल से मंजूरी मिलने के बाद यह सवाल और गहरा हो गया है कि क्या भारत विकास और संरक्षण के बीच संतुलन साध पाएगा।</p>
<p style="text-align:left;">ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में कहा है कि परियोजना को दी गई पर्यावरणीय स्वीकृति में पर्याप्त सुरक्षा उपाय शामिल हैं और इसे रोका नहीं जा सकता, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि हर शर्त का कड़ाई से पालन अनिवार्य होगा। ग्रेट निकोबार द्वीप भारत का सबसे दक्षिणी बड़ा द्वीप है और भौगोलिक दृष्टि से इसकी स्थिति असाधारण मानी जाती है। यह द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य से करीब 35 से 40 नॉटिकल मील की दूरी पर स्थित है।</p>
<p style="text-align:left;">अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठनों और शिपिंग डेटा के मुताबिक, दुनिया के कुल समुद्री व्यापार का लगभग 30 से 40 प्रतिशत हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। चीन के कुल ऊर्जा आयात का करीब 60 प्रतिशत और जापान तथा दक्षिण कोरिया के व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते पर निर्भर है। यही वजह है कि इसे हिंद महासागर क्षेत्र की सबसे अहम ‘चोक पॉइंट’ माना जाता है।</p>
<p style="text-align:left;">भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अभी तक देश के पास इस इलाके में कोई बड़ा ट्रांसशिपमेंट हब नहीं है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत का करीब 75 प्रतिशत कंटेनर ट्रांसशिपमेंट विदेशी बंदरगाहों जैसे सिंगापुर, कोलंबो और पोर्ट क्लांग के जरिए होता है। इससे न केवल समय बढ़ता है, बल्कि लॉजिस्टिक्स लागत भी 10 से 15 प्रतिशत तक ज्यादा हो जाती है।</p>
<p style="text-align:left;">रिजर्व बैंक और शिपिंग मंत्रालय से जुड़े अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि उच्च लॉजिस्टिक लागत के कारण भारत की मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है। इसी कमी को दूर करने के लिए ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट को गेमचेंजर बताया जा रहा है। यह परियोजना लगभग 166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली होगी। इसमें गैलेथिया बे पर अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांस शिपमेंट टर्मिनल, ड्यूल यूज सिविल-मिलिट्री एयरपोर्ट, 450 मेगावॉट का गैस और सौर ऊर्जा आधारित पावर प्लांट और एक नई इंटीग्रेटेड टाउनशिप शामिल है।</p>
<p style="text-align:left;">सरकारी दस्तावेज बताते हैं कि सिर्फ पोर्ट परियोजना पर करीब 40,040 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। पहले चरण में 18,000 करोड़ रुपये की लागत से 2028 तक इसे चालू करने का लक्ष्य है। शुरुआती क्षमता 4 मिलियन टीईयू से अधिक होगी, जबकि पूरी तरह विकसित होने पर यह क्षमता 16 मिलियन टीईयू तक पहुंच सकती है।</p>
<p style="text-align:left;">अगर इन आंकड़ों की तुलना की जाए तो भारत का कुल कंटेनर ट्रैफिक 2020 में करीब 17 मिलियन टीईयू था, जबकि चीन का आंकड़ा 245 मिलियन टीईयू से अधिक रहा। यह अंतर साफ दिखाता है कि भारत को अपने समुद्री इंफ्रास्ट्रक्चर में कितनी बड़ी छलांग की जरूरत है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बड़े कंटेनर जहाज सीधे ग्रेट निकोबार पर रुकने लगते हैं, तो छोटे फीडर जहाजों के जरिए देश के पूर्वी और पश्चिमी तट के बंदरगाहों तक माल पहुंचाना आसान होगा।</p>
<p style="text-align:left;">इससे ट्रांजिट टाइम में कई दिन की बचत हो सकती है और लागत में भी उल्लेखनीय कमी आएगी।रणनीतिक दृष्टि से यह परियोजना भारत की समुद्री सुरक्षा को नई मजबूती दे सकती है। रक्षा विश्लेषकों के अनुसार ग्रेट निकोबार का विकास हिंद महासागर क्षेत्र में निगरानी, खुफिया गतिविधियों और त्वरित सैन्य प्रतिक्रिया की क्षमता को बढ़ाएगा। आपदा प्रबंधन और मानवीय सहायता अभियानों के लिहाज से भी यह द्वीप एक अहम बेस बन सकता है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती सामरिक हलचलों के बीच भारत के लिए यह एक अतिरिक्त बढ़त के रूप में देखा जा रहा है।</p>
<p style="text-align:left;">लेकिन जितनी बड़ी इसकी रणनीतिक और आर्थिक अहमियत है, उतनी ही गहरी इसकी पर्यावरणीय चुनौतियां भी हैं। ग्रेट निकोबार एक बायोस्फीयर रिजर्व है, जहां घने वर्षावन, मैंग्रोव, कोरल रीफ और कई दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं। पर्यावरण आकलनों के मुताबिक परियोजना के लिए 8.5 लाख से लेकर 50 लाख से ज्यादा पेड़ों की कटाई की आशंका जताई गई है।</p>
<p style="text-align:left;">यह इलाका लेदरबैक समुद्री कछुओं के सबसे महत्वपूर्ण प्रजनन स्थलों में से एक है। इसके अलावा निकोबार मेगापोड पक्षी, खारे पानी के मगरमच्छ, निकोबार मकाक और रॉबर क्रैब जैसी प्रजातियों पर भी खतरे की बात कही जा रही है यही वजह है कि इस परियोजना को लेकर राजनीतिक और सामाजिक विरोध भी सामने आया। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी समेत कई पर्यावरणविदों ने आरोप लगाया कि परियोजना में पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के भविष्य को नजरअंदाज किया गया है।</p>
<p style="text-align:left;">उनका कहना रहा कि क्लाइमेट चेंज के दौर में समुद्र स्तर बढ़ रहा है और ऐसे में इतने बड़े तटीय इंफ्रास्ट्रक्चर का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। ग्रेट निकोबार सिर्फ जैव विविधता का केंद्र नहीं है, बल्कि शोंपेन और निकोबारी जैसी जनजातियों का भी घर है। खासतौर पर शोंपेन जनजाति की आबादी 200 से 300 के बीच बताई जाती है और उन्हें दुनिया की सबसे संवेदनशील आदिवासी जनजातियों में गिना जाता है।</p>
<p style="text-align:left;">विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े पैमाने पर बाहरी आबादी के आने से उनकी पारंपरिक जीवन शैली, संस्कृति और अस्तित्व पर गंभीर असर पड़ सकता है। सरकार का दावा है कि आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं और उनके क्षेत्रों में न्यूनतम हस्तक्षेप होगा, लेकिन इस पर लगातार निगरानी की मांग की जा रही है।एनजीटी ने अपने आदेश में पर्यावरण संरक्षण को लेकर कई सख्त निर्देश दिए हैं।</p>
<p style="text-align:left;">इनमें मैंग्रोव पुनर्स्थापन, कोरल ट्रांसलोकेशन, तटरेखा संरक्षण, वन्य जीवों के प्रजनन स्थलों की सुरक्षा और आदिवासी हितों की रक्षा शामिल है। ट्रिब्यूनल ने यह भी साफ किया है कि आईलैंड कोस्टल रेगुलेशन जोन नियमों का किसी भी स्तर पर उल्लंघन स्वीकार नहीं किया जाएगा और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई की जाएगी। कुल मिलाकर, ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट भारत के सामने एक बड़ी परीक्षा है। एक तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री शक्ति और आर्थिक विकास की जरूरत है, तो दूसरी तरफ पर्यावरण संतुलन और स्थानीय समुदायों की रक्षा की जिम्मेदारी।</p>
<p style="text-align:left;">आने वाले वर्षों में यह परियोजना किस दिशा में आगे बढ़ती है, यही तय करेगा कि ग्रेट निकोबार भारत के लिए अगला सिंगापुर बनता है या विकास और संरक्षण की टकराहट का सबसे बड़ा उदाहरण। फिलहाल इतना तय है कि यह द्वीप अब सिर्फ भारत का सबसे दक्षिणी भूभाग नहीं, बल्कि देश की समुद्री राजनीति और दीर्घकालिक रणनीति का केंद्र बन चुका है</p>
<p style="text-align:left;"><strong>अजय कुमार</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-battle-of-development-vs-environment-on-great-nicobar-mega/article-18230</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-battle-of-development-vs-environment-on-great-nicobar-mega/article-18230</guid>
                <pubDate>Wed, 18 Feb 2026 16:28:37 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-02/2b1c13ed-b467-4f49-ac3f-dc485429b5cd_samridh_1200x720.jpeg"                         length="50507"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[अजय कुमार, लखनऊ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Opinion : संसद के मकर द्वार पर गुस्से का विस्फोट और राजनीति की मर्यादा पर उठते सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[4 फरवरी को संसद के मकर द्वार पर राहुल गांधी और केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू के बीच हुई तीखी नोकझोंक ने भारतीय राजनीति की भाषा और मर्यादा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। यह विवाद अब व्यक्तिगत आरोपों से आगे बढ़कर राष्ट्रीय बहस बन चुका है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-an-outburst-of-anger-at-the-makar-gate-of/article-17854"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/protest-by-suspended-mps-at-the-parliament-s-main-gate_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p>संसद लोकतंत्र का सबसे ऊँचा मंच है, लेकिन 4 फरवरी को इसी संसद के मकर द्वार पर जो हुआ, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या भारतीय राजनीति में अब संयम और शिष्टाचार पीछे छूटते जा रहे हैं। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू के बीच हुई तीखी नोकझोंक सिर्फ दो नेताओं की व्यक्तिगत नाराज़गी नहीं थी, बल्कि यह उस राजनीतिक तनाव की अभिव्यक्ति थी, जो पिछले कुछ वर्षों से अंदर ही अंदर पक रहा था।</p>
<p>घटना उस समय की है जब बजट सत्र के दौरान कांग्रेस सांसद तख्तियाँ लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। राहुल गांधी खुद इस प्रदर्शन में मौजूद थे। इसी दौरान सामने से केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू आते दिखे। राहुल गांधी ने उन्हें देखते ही बिना किसी भूमिका के तीखे शब्द कह दिए  ये गद्दार जा रहा है, जरा इसका चेहरा देखो। यह टिप्पणी वहीं खड़े कांग्रेस सांसदों के बीच ठहाकों के साथ गूंज गई। इसके बाद राहुल गांधी ने हाथ बढ़ाते हुए कहा, हेलो ब्रो मेरे गद्दार दोस्त चिंता मत करो तुम वापस आ जाओगे।</p>
<p>यह कोई मंचीय भाषण नहीं था, न ही कोई लिखी हुई टिप्पणी। यह क्षणिक गुस्से से निकली प्रतिक्रिया थी। लेकिन राजनीति में कई बार यही क्षणिक प्रतिक्रियाएं सबसे भारी पड़ जाती हैं। बिट्टू ने राहुल गांधी का हाथ नहीं पकड़ा। उन्होंने पलटकर कहा, देश के दुश्मन के साथ मैं हाथ नहीं मिलाता, और सीधे संसद के भीतर चले गए।यहीं से यह मामला शब्दों की लड़ाई से निकलकर राष्ट्रीय राजनीतिक बहस बन गया।</p>
<p>रवनीत सिंह बिट्टू कोई साधारण नेता नहीं हैं। वे पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते हैं, जिनकी 1995 में आतंकवादियों द्वारा हत्या कर दी गई थी। बिट्टू ने 2009 में कांग्रेस के टिकट पर पहली बार लोकसभा चुनाव जीता। इसके बाद 2014 और 2019 में भी वे सांसद बने। कुल मिलाकर उन्होंने 15 साल तक कांग्रेस का प्रतिनिधित्व संसद में किया।</p>
<p>लेकिन 2024 के आम चुनाव से ठीक पहले उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गए।2024 के चुनाव में बिट्टू लुधियाना सीट से भाजपा के उम्मीदवार थे। उन्हें कांग्रेस के अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग से करीब 20 हजार वोटों से हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद भाजपा ने उन्हें राज्यसभा भेजा और केंद्र सरकार में मंत्री बनाया। यहीं से राहुल गांधी और बिट्टू के रिश्तों में तल्खी खुलकर सामने आने लगी।</p>
<p>राहुल गांधी के गद्दार शब्द ने इसलिए ज्यादा विवाद खड़ा किया, क्योंकि भारतीय राजनीति में यह शब्द सिर्फ दल बदलने तक सीमित नहीं माना जाता। यह शब्द देश, संविधान और जनता के साथ विश्वासघात से जोड़कर देखा जाता है। यही कारण है कि भाजपा नेताओं ने इसे केवल राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक हमला बताया।</p>
<p>भाजपा नेताओं का तर्क है कि एक सिख नेता, जिसके परिवार ने आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष में बलिदान दिया, उसे सार्वजनिक रूप से गद्दार कहना असंवेदनशील है। दूसरी ओर कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह टिप्पणी राजनीतिक संदर्भ में थी और पार्टी छोड़कर जाने वालों पर राहुल गांधी पहले भी तीखे शब्दों का इस्तेमाल करते रहे हैं।यह पहला मौका नहीं है जब बिट्टू ने राहुल गांधी को देश का दुश्मन कहा हो।</p>
<p>इससे पहले अमेरिका में दिए गए राहुल गांधी के एक बयान को लेकर बिट्टू ने सार्वजनिक रूप से उन्हें भारत का सबसे बड़ा दुश्मन तक कहा था। राहुल गांधी ने उस बयान में सिख समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठाया था, जिसे भाजपा और बिट्टू ने भारत की छवि खराब करने की कोशिश बताया। यह पूरा विवाद ऐसे समय में सामने आया, जब राहुल गांधी पहले से ही सरकार पर हमलावर रुख अपनाए हुए हैं।</p>
<p>लोकसभा चुनाव के बाद कभी वे हाथ में संविधान की प्रति लेकर नजर आए, तो अब संसद परिसर में वे पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की किताब फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी हाथ में लिए दिखाई दिए। इस किताब के कुछ अंश पढ़ने की अनुमति जब उन्हें सदन में नहीं दी गई और रिकॉर्ड से हटाया गया, तो राहुल गांधी ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा बना दिया।</p>
<p>राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मकर द्वार पर हुआ यह विवाद राहुल गांधी के बढ़ते आक्रामक तेवर और भाजपा के प्रति उनकी असहजता का परिणाम है। विपक्ष के नेता के तौर पर राहुल गांधी लगातार सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इस प्रक्रिया में कई बार भाषा की मर्यादा टूटती दिखाई दे रही है।</p>
<p>यह भी सच है कि राजनीति में धैर्य सबसे कठिन परीक्षा होती है। लंबे संघर्ष, हार, आलोचना और व्यक्तिगत हमलों के बीच कई बार नेता खुद पर नियंत्रण खो बैठते हैं। लेकिन संसद परिसर जैसे स्थान पर बोले गए शब्द सिर्फ व्यक्तिगत नहीं रहते, वे संस्था की गरिमा से भी जुड़ जाते हैं।यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाती है कि राजनीतिक असहमति अब वैचारिक बहस से निकलकर व्यक्तिगत आरोपों तक पहुंच चुकी है।</p>
<p>गद्दार और देश का दुश्मन जैसे शब्द राजनीति को और ज्यादा ध्रुवीकृत करते हैं। इससे न तो लोकतांत्रिक संवाद मजबूत होता है और न ही जनता का भरोसा।मकर द्वार पर हुआ यह टकराव आने वाले दिनों में सिर्फ बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहेगा। यह घटना विपक्ष की रणनीति, सत्ता पक्ष की प्रतिक्रिया और राजनीतिक भाषा की दिशा तय करने वाला संकेत बन सकती है।</p>
<p>सवाल यह नहीं है कि किसने पहले क्या कहा, सवाल यह है कि क्या भारतीय राजनीति अब संयम की भाषा छोड़ चुकी है।लोकतंत्र में विरोध जरूरी है, लेकिन मर्यादा उससे भी ज्यादा जरूरी है। 4 फरवरी को संसद के बाहर जो हुआ, वह सिर्फ एक क्षणिक गुस्से का नतीजा नहीं था, बल्कि उस राजनीति का प्रतिबिंब था, जहाँ शब्द हथियार बन चुके हैं और संवाद कमजोर पड़ता जा रहा है।</p>
<img src="https://samridhjharkhand.com/media/2026-02/9ee7bed9-4c73-4c84-8902-f3ea0f7ad1e2_samridh_1200x720-(1).jpeg" alt="Opinion : संसद के मकर द्वार पर गुस्से का विस्फोट और राजनीति की मर्यादा पर उठते सवाल" width="166" height="100"></img>
अजय कुमार (फाइल फोटो)

<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-an-outburst-of-anger-at-the-makar-gate-of/article-17854</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-an-outburst-of-anger-at-the-makar-gate-of/article-17854</guid>
                <pubDate>Thu, 05 Feb 2026 16:32:49 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-02/protest-by-suspended-mps-at-the-parliament-s-main-gate_samridh_1200x720.jpeg"                         length="53699"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[अजय कुमार, लखनऊ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Opinion : मणिपुर में नई सरकार की वापसी और खेमचंद सिंह की सबसे कठिन राजनीतिक परीक्षा</title>
                                    <description><![CDATA[करीब एक साल के राष्ट्रपति शासन के बाद मणिपुर में युमनाम खेमचंद सिंह के नेतृत्व में नई चुनी हुई सरकार बनने जा रही है। जातीय हिंसा, विस्थापन और अविश्वास से जूझ रहे राज्य के सामने अब शांति बहाली और पुनर्वास सबसे बड़ी चुनौती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion---return-of-new-government-in-manipur-and-toughest-political/article-17848"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/9ee7bed9-4c73-4c84-8902-f3ea0f7ad1e2_samridh_1200x7201.jpeg" alt=""></a><br /><p>करीब एक साल तक राष्ट्रपति शासन में रहने के बाद मणिपुर में फिर से चुनी हुई सरकार बनने जा रही है और इस बार सत्ता की कमान युमनाम खेमचंद सिंह के हाथों में होगी। यह बदलाव सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं है, बल्कि उस राज्य के लिए एक नई शुरुआत का संकेत है, जो मई 2023 से जातीय हिंसा, विस्थापन और अविश्वास के दौर से गुजर रहा है।</p>
<p>मैतेई और कुकी समुदायों के बीच शुरू हुआ संघर्ष धीरे-धीरे इतना गहरा हो गया कि पूरा राज्य घाटी और पहाड़ के दो हिस्सों में बंटता दिखने लगा। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस हिंसा में अब तक 200 से ज्यादा लोगों की जान गई, 60 हजार से अधिक लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए और करीब 350 गांवों में सामान्य जीवन ठप हो गया. हजारों घर, स्कूल, चर्च और मंदिर जला दिए गए, जिससे सामाजिक ढांचा ही नहीं, आर्थिक गतिविधियां भी बुरी तरह प्रभावित हुई।</p>
<p>हिंसा के चलते राज्य का प्रशासन लगभग पंगु हो गया था। राष्ट्रीय राजमार्गों पर आवागमन बाधित हुआ, कई महीनों तक इंटरनेट बंद रहा और व्यापारिक गतिविधियां ठप पड़ गईं. अनुमान है कि इस संकट से मणिपुर की अर्थव्यवस्था को करीब 10 से 12 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. पर्यटन उद्योग पूरी तरह रुक गया और छोटे व्यापारियों की आजीविका पर सीधा असर पड़ा।</p>
<p>स्वास्थ्य सेवाएं भी प्रभावित हुईं, क्योंकि कई जिलों में डॉक्टरों और दवाइयों की आपूर्ति बाधित रही। शिक्षा का हाल यह रहा कि हजारों बच्चों की पढ़ाई महीनों तक बंद रही और कई स्कूल राहत शिविरों में बदल दिए गए। इसी हालात में तत्कालीन मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह पर कुकी समुदाय ने पक्षपात का आरोप लगाया। धीरे-धीरे बीजेपी के भीतर भी असंतोष बढ़ा।</p>
<p>अक्टूबर 2024 में पार्टी के करीब डेढ़ दर्जन विधायकों ने केंद्रीय नेतृत्व को पत्र लिखकर मुख्यमंत्री बदलने की मांग की। दबाव इतना बढ़ा कि फरवरी 2025 में बीरेन सिंह को इस्तीफा देना पड़ा और इसके बाद मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।</p>
<p>संविधान के मुताबिक राष्ट्रपति शासन एक साल से ज्यादा नहीं चल सकता, इसलिए केंद्र और राज्य दोनों स्तर पर यह मजबूरी बन गई कि नई सरकार का गठन किया जाए. इसी राजनीतिक और संवैधानिक दबाव के बीच युमनाम खेमचंद सिंह का नाम सामने आया।</p>
<p>खेमचंद सिंह का चयन केवल पार्टी के भीतर संतुलन साधने का फैसला नहीं है, बल्कि सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर लिया गया कदम माना जा रहा है। वे मैतेई समुदाय से आते हैं, जिसकी आबादी मणिपुर में करीब 53 प्रतिशत है, लेकिन उन्हें कुकी और नागा समुदायों के बीच भी स्वीकार्यता वाला नेता माना जाता है। हिंसा के दौरान वे उन गिने-चुने मैतेई नेताओं में थे, जिन्होंने कुकी राहत शिविरों का दौरा किया और विस्थापित परिवारों से मुलाकात की।</p>
<p>नागा बहुल उखरुल जिले में कुकी गांव के राहत शिविर में उनकी मौजूदगी को मानवीय संदेश के तौर पर देखा गया। उस समय जब घाटी और पहाड़ के बीच भरोसे की दीवार सबसे ऊंची थी, खेमचंद की यह पहल एक अलग संकेत थी कि वे केवल अपनी जाति की राजनीति नहीं करना चाहते।</p>
<p>राजनीतिक अनुभव के लिहाज से भी खेमचंद सिंह को मजबूत दावेदार माना गया. वे 2017 और 2022 में सिंगजामेई सीट से विधायक चुने गए। 2017 में पहली बार सत्ता में आने पर उन्हें विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया और उन्होंने पूरे पांच साल सदन की कार्यवाही संभाली। 2022 में वे मंत्री बने और ग्रामीण विकास, पंचायती राज, नगर प्रशासन, आवास और शिक्षा जैसे अहम विभागों की जिम्मेदारी निभाई।</p>
<p>मणिपुर की राजनीति में करीब दो दशक से सक्रिय रहने वाले खेमचंद को संगठन और प्रशासन दोनों की समझ रखने वाला नेता माना जाता है। पार्टी नेतृत्व को लगा कि संकट के दौर में एक ऐसा चेहरा जरूरी है, जो अनुभव के साथ-साथ अपेक्षाकृत विवाद रहित भी हो।</p>
<p>मणिपुर विधानसभा का अंकगणित भी इस फैसले को मजबूती देता है। 60 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी के पास फिलहाल 37 विधायक हैं। 2022 के चुनाव में पार्टी को 32 सीटें मिली थीं, लेकिन बाद में जेडीयू के पांच विधायक बीजेपी में शामिल हो गए। एक सीट फिलहाल रिक्त है।</p>
<p>इसके अलावा एनपीएफ के 5, जेडीयू के 1 और 3 निर्दलीय विधायक सरकार का समर्थन कर रहे हैं। इस तरह एनडीए के पास कुल 46 विधायकों का समर्थन है, जबकि विपक्ष 14 पर सिमटा है। संख्या के लिहाज से सरकार मजबूत है, लेकिन मणिपुर की राजनीति में असली चुनौती बहुमत नहीं, सामाजिक भरोसा है।</p>
<p>राज्य में आज भी करीब 50 हजार लोग राहत शिविरों में रह रहे हैं। प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार अब तक केवल 25 से 30 प्रतिशत विस्थापित परिवार ही स्थायी रूप से अपने घर लौट पाए हैं। घाटी और पहाड़ी इलाकों के बीच आवाजाही पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाई है। कई इलाकों में सुरक्षा बलों की तैनाती के बिना लोगों का आना-जाना संभव नहीं है।</p>
<p>सबसे बड़ी चिंता अवैध हथियारों की है. अनुमान है कि हिंसा के दौरान हजारों हथियार लूटे गए या अवैध रूप से जमा किए गए, जिनमें से अब तक केवल एक हिस्सा ही वापस लिया जा सका है। यह स्थिति शांति बहाली के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा मानी जा रही है।</p>
<p>नई सरकार के सामने प्राथमिक चुनौती पुनर्वास और सुरक्षा की होगी। हजारों परिवार जिनके घर जल गए, उनके लिए स्थायी आवास, मुआवजा और रोजगार की व्यवस्था करना आसान काम नहीं है। केंद्र सरकार ने पुनर्वास के लिए विशेष पैकेज देने की बात कही है, लेकिन जमीन पर इसका असर तभी दिखेगा, जब प्रशासन निष्पक्ष तरीके से काम करे।</p>
<p>स्वास्थ्य और शिक्षा को भी दोबारा पटरी पर लाना होगा । आंकड़ों के मुताबिक हिंसा के कारण 100 से ज्यादा स्कूल और दर्जनों स्वास्थ्य केंद्र आंशिक या पूरी तरह बंद हो गए थे । इन्हें दोबारा चालू करना सरकार की बड़ी जिम्मेदारी होगी।</p>
<p>बीजेपी की रणनीति यह भी मानी जा रही है कि मुख्यमंत्री मैतेई समुदाय से होंगे, जबकि उपमुख्यमंत्री पद पर कुकी और नागा समुदाय से प्रतिनिधित्व देकर संतुलन बनाया जाएगा। यह फार्मूला सियासी तौर पर जरूरी है, क्योंकि 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं और पार्टी का लक्ष्य लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटना है।</p>
<p>लेकिन चुनावी गणित से पहले सामाजिक गणित को दुरुस्त करना ज्यादा जरूरी है। संवाद की प्रक्रिया शुरू करना, रास्ते खोलना, राहत शिविरों को धीरे-धीरे खाली कराना और प्रशासन पर भरोसा लौटाना सरकार की प्राथमिकता होगी।खेमचंद सिंह की पृष्ठभूमि उन्हें बाकी नेताओं से अलग बनाती है। वे पेशे से ताइक्वांडो खिलाड़ी और शिक्षक रहे हैं। 1977 में उन्होंने इस खेल की शुरुआत की और करीब 20 साल तक सक्रिय खिलाड़ी रहे।</p>
<p>दक्षिण कोरिया में प्रशिक्षण लेकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया और भारतीय ताइक्वांडो टीम के कप्तान भी बने। बाद में वे खेल प्रशासक बने और ताइक्वांडो फेडरेशन ऑफ इंडिया में उपाध्यक्ष रहे। असम ताइक्वांडो एसोसिएशन की स्थापना से लेकर मणिपुर ताइक्वांडो एसोसिएशन के अध्यक्ष तक का सफर उन्हें अनुशासन और संगठन की अहमियत सिखाता है। उनके समर्थक मानते हैं कि खेल से आई यही सोच उन्हें राजनीति में भी संतुलित बनाती है।</p>
<p>खेमचंद सिंह को स्वच्छ छवि वाला नेता माना जाता है। विधानसभा अध्यक्ष और मंत्री रहते हुए उन पर किसी बड़े भ्रष्टाचार या गंभीर विवाद का आरोप नहीं लगा। हिंसा के दौरान उन्होंने सार्वजनिक रूप से शांति की अपील की और कहा कि यह संघर्ष बच्चों के भविष्य को बर्बाद नहीं करना चाहिए।</p>
<p>यही बातें बीजेपी नेतृत्व को यह भरोसा दिलाती हैं कि वे सख्ती और संवेदना के बीच संतुलन बना सकते हैं। मणिपुर की राजनीति में यह संतुलन सबसे कठिन काम है, क्योंकि यहां मुद्दे केवल विकास या रोजगार तक सीमित नहीं, बल्कि पहचान, जमीन और अस्तित्व से जुड़े हैं।</p>
<p>राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्य में अपेक्षाकृत शांति जरूर लौटी, लेकिन यह शांति प्रशासनिक नियंत्रण से बनी है, सामाजिक मेल-मिलाप से नहीं। नई सरकार के सामने असली चुनौती यही है कि वह लोगों के बीच भरोसा बहाल करे। अगर राहत शिविरों में रह रहे हजारों परिवार अपने घर लौटते हैं, बाजार फिर से खुलते हैं और बच्चे बिना डर के स्कूल जाते हैं, तभी यह माना जाएगा कि सरकार सफल हो रही है। मणिपुर की जनता अब भाषण नहीं, जमीन पर बदलाव देखना चाहती है।</p>
<p>युमनाम खेमचंद सिंह के लिए मुख्यमंत्री बनना केवल राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक अग्निपरीक्षा है। उन्हें साबित करना होगा कि वे केवल पार्टी के नेता नहीं, पूरे राज्य के नेता हैं। अगर वे घाटी और पहाड़ दोनों को साथ लेकर चल पाए, संवाद की राजनीति को प्राथमिकता दी और प्रशासन को निष्पक्ष बनाया, तो वे मणिपुर को हिंसा के अंधेरे से बाहर निकाल सकते हैं।</p>
<p>लेकिन अगर अविश्वास और असुरक्षा की दीवारें जस की तस रहीं, तो यह सरकार भी उसी सवालों के घेरे में आ जाएगी, जिनसे बचने के लिए नेतृत्व बदला गया है। मणिपुर की राजनीति में अब असली लड़ाई सत्ता की नहीं, शांति और भरोसे की है, और इसी मोर्चे पर खेमचंद सिंह की सबसे बड़ी परीक्षा होने वाली है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion---return-of-new-government-in-manipur-and-toughest-political/article-17848</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion---return-of-new-government-in-manipur-and-toughest-political/article-17848</guid>
                <pubDate>Thu, 05 Feb 2026 13:04:54 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-02/9ee7bed9-4c73-4c84-8902-f3ea0f7ad1e2_samridh_1200x7201.jpeg"                         length="50507"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[अजय कुमार, लखनऊ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Opinion : डिजिटल लत के साये में बचपन, टूटती जिंदगियां और भारत की अधूरी सोशल मीडिया सुरक्षा नीति</title>
                                    <description><![CDATA[भारत में तेजी से बढ़ती मोबाइल और इंटरनेट पहुंच बच्चों की मानसिक दुनिया को बदल रही है। ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया एल्गोरिदम उन्हें लत के जाल में फंसा रहे हैं, जहां खेल और असली जिंदगी की सीमा मिटती जा रही है। हाल की घटनाएं इस डिजिटल खतरे की गंभीरता को उजागर करती हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-childhoods-lives-broken-under-the-shadow-of-digital-addiction/article-17847"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-02/9ee7bed9-4c73-4c84-8902-f3ea0f7ad1e2_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:left;">भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां बच्चों की दुनिया तेजी से बदल रही है। खिलौनों, मैदानों और दोस्तों की जगह मोबाइल स्क्रीन ने ले ली है। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि धीरे-धीरे हमारी आंखों के सामने पनपा। गाजियाबाद की तीन नाबालिग बहनों और भोपाल के एक 14 साल के बच्चे की मौत ने इस सच्चाई को बेरहमी से उजागर कर दिया है कि डिजिटल दुनिया अब सिर्फ मनोरंजन नहीं रही, बल्कि कई मासूम जिंदगियों के लिए मानसिक जाल बन चुकी है।</p>
<p style="text-align:left;">ये घटनाएं कोई इत्तेफाक नहीं हैं, बल्कि उस सिस्टम का नतीजा हैं जहां बच्चों की सुरक्षा से ज्यादा अहमियत डिजिटल मुनाफे को दी जा रही है। भारत में इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुंच ने पिछले एक दशक में क्रांति ला दी। सरकारी और निजी रिपोर्टों के मुताबिक आज देश में 80 करोड़ से ज्यादा इंटरनेट यूजर हैं और इनमें करीब एक तिहाई बच्चे और किशोर हैं। एक औसत भारतीय बच्चा रोजाना 3 से 6 घंटे स्क्रीन पर बिता रहा है। कोरोना महामारी के दौरान यह समय और बढ़ा।</p>
<p style="text-align:left;">ऑनलाइन पढ़ाई ने मोबाइल को बच्चों की जिंदगी का अनिवार्य हिस्सा बना दिया। लेकिन पढ़ाई खत्म होने के बाद वही मोबाइल गेमिंग, सोशल मीडिया और ऑनलाइन चैलेंज का प्रवेश द्वार बन गया. धीरे-धीरे बच्चों के लिए असली दुनिया उबाऊ और स्क्रीन के भीतर की दुनिया ज्यादा आकर्षक लगने लगी।</p>
<p style="text-align:left;">ऑनलाइन गेमिंग का मनोविज्ञान बेहद जटिल है। कई गेम्स और टास्क-बेस्ड ऑनलाइन ट्रेंड इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि यूजर को लगातार अगला स्तर पूरा करने की बेचैनी बनी रहे । हर टास्क पूरा होने पर दिमाग में डोपामिन रिलीज होता है, जो खुशी और संतुष्टि का एहसास देता है।</p>
<p style="text-align:left;">यही प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती है और लत बन जाती है। बच्चों का दिमाग, जो अभी विकास की अवस्था में होता है, इस प्रभाव को समझ नहीं पाता. वे यह फर्क नहीं कर पाते कि गेम का दबाव और असली जिंदगी की अहमियत क्या है। गाजियाबाद की तीनों बहनों के मामले में भी शुरुआती जांच यही संकेत देती है कि वे एक टास्क-बेस्ड ऑनलाइन गेम से भावनात्मक रूप से जुड़ चुकी थीं, जहां गेम पूरा करना ही उनका लक्ष्य बन गया था।</p>
<p style="text-align:left;">समस्या सिर्फ गेमिंग तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया एल्गोरिदम भी इसी सिद्धांत पर काम करते हैं. रील्स, शॉर्ट वीडियो और लाइक-शेयर का सिस्टम बच्चों को लंबे समय तक स्क्रीन से बांधे रखता है। कंपनियों का मुनाफा यूजर के समय पर निर्भर करता है। जितना ज्यादा समय बच्चा स्क्रीन पर रहेगा, उतना ज्यादा डेटा, उतना ज्यादा विज्ञापन और उतनी ज्यादा कमाई। लेकिन इस दौड़ में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की कीमत कोई नहीं गिनता। भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए बच्चों की सुरक्षा को लेकर नियम तो हैं, लेकिन वे या तो अधूरे हैं या सख्ती से लागू नहीं होते।</p>
<p style="text-align:left;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-childhoods-lives-broken-under-the-shadow-of-digital-addiction/article-17847</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-childhoods-lives-broken-under-the-shadow-of-digital-addiction/article-17847</guid>
                <pubDate>Thu, 05 Feb 2026 12:33:31 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2026-02/9ee7bed9-4c73-4c84-8902-f3ea0f7ad1e2_samridh_1200x720.jpeg"                         length="50507"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[अजय कुमार, लखनऊ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ममता बनर्जी का एसआईआर विरोध: घुसपैठियों को बचाने का आरोप तेज</title>
                                    <description><![CDATA[पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के विरोध को लेकर ममता बनर्जी पर घुसपैठियों और फर्जी वोटरों का साथ देने का आरोप लग रहा है, जबकि बीएलओज को भारी राजनीतिक दबाव व धमकियों का सामना करना पड़ रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/mamata-b-anerjees-accusation-of-protecting-sir-protest-infiltrators-intensifies/article-17206"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-11/resized-image---2025-11-26t182009.443.jpeg" alt=""></a><br /><p>पश्चिम बंगाल में वहां की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न) प्रक्रिया का जबर्दस्त विरोध कर रही हैं, क्योंकि उनका मानना है कि यह प्रक्रिया भाजपा द्वारा अल्पसंख्यकों,  खासकर मुस्लिम वोटर्स को निशाना बनाने के लिए एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल की जा रही है। ममता का यह भी आरोप है कि एसआईआर के तहत घुसपैठियों को वोटर लिस्ट से हटाने का नाम लेकर असली वोटरों को भी परेशान किया जा रहा है, जिससे उनका वोट बैंक प्रभावित हो सकता है।</p>
<p>इस विरोध के पीछे दो पहलू हैं: एक तो ममता का अल्पसंख्यक वोट बैंक बचाने का प्रयास, और दूसरा पश्चिम बंगाल में चुनावी फायदे की नजर से यह विरोध। उन्होंने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए असम जैसे भाजपा शासित राज्यों में इस प्रक्रिया को लागू न करने की निंदा की है। ममता ने चुनाव आयोग को कई बार पत्र लिखकर इस प्रक्रिया को अव्यवस्थित, खतरनाक और बिना तैयारी के बताया है और इसे रोकने की मांग की है।</p>
<p>पश्चिम बंगाल में बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) को इस प्रक्रिया में काम करने में जो परेशानी हो रही है, वह तृणमूल कांग्रेस और ममता सरकार के एसआईआर विरोध के चलते है। बीएलओ यूनाइटेड फोरम के अनुसार, प्रदेश में बीएलओ को राजनीतिक संरक्षण वाले अपराधी तत्व धमका रहे हैं, जिससे वे अपना काम ठीक से नहीं कर पा रहे। बीएलओ के लिए उचित सुरक्षा, ट्रेनिंग और प्रशासनिक सहूलियत नहीं मिल रही है; वे अपने स्कूलों में भी उपस्थिति दर्ज नहीं करवा पा रहे हैं और उनके ड्यूटी आवंटन में अनियमितता है।</p>
<p>इसके अलावा, उन्हें काम का अत्यधिक दबाव, डेटा में त्रुटियां, सर्वर फेलियर जैसी तकनीकी समस्याएं झेलनी पड़ रही हैं और बिना कारण बताए डिसिप्लिनरी एक्शन की धमकियां मिल रही हैं। ममता सरकार की यह रणनीति बीएलओज को भयभीत करके एसआईआर प्रक्रिया को बाधित करने की है, ताकि फर्जी वोटर सूची में बने रह सकें और घुसपैठियों या फर्जी वोटर्स को हटाने की प्रक्रिया सफल न हो।</p>
<p>इस कारण प्रभावी तरीके से केवल पश्चिम बंगाल में ही बीएलओ को काम करने में दिक्कतें आ रही हैं। ममता ने चुनाव आयोग पर भी आरोप लगाया है कि वे एसआईआर प्रक्रिया के तहत लगने वाले दबाव और समस्या को नजरअंदाज कर रहे हैं, जबकि बीएलओ अपने हद से ज्यादा काम कर रहे हैं। चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया के रूप में पुलिस कार्रवाई व अन्य समर्थन नहीं मिल रहा, जिससे बीएलओ और ज्यादा दबाव में हैं।</p>
<p>इस प्रकार, ममता सरकार का एसआईआर विरोध और बीएलओ पर हो रहे दबाव की जड़ में सीधा राजनीतिक हित है। ममता बनर्जी अल्पसंख्यक वोटरों को सुरक्षित रखने के साथ-साथ अपने राजनीतिक प्रभाव को बचाने के लिए इस प्रक्रिया का विरोध कर रही हैं। बीएलओ, जो घर-घर जाकर वोटर लिस्ट की जांच कर रहे हैं, उन्हें दंडित करने, धमकाने एवं उनकी सहायता रोकने की क्रियाएं इस विरोध का हिस्सा हैं।</p>
<p>पश्चिम बंगाल में यह स्थिति इसलिए विशेष रूप से गंभीर है, क्योंकि यहां के वोट बैंक में अल्पसंख्यकों का बड़ा हिस्सा है और ममता सरकार उसे खोना नहीं चाहती। कुल मिलाकर, ममता बनर्जी का एसआईआर विरोध घुसपैठियों के वोट को लेकर उनकी चिंता के साथ-साथ चुनावी रणनीति का हिस्सा है, जबकि बीएलओ को इस प्रक्रिया में कानूनी, प्रशासनिक और राजनीतिक दबाव की वजह से काम करना कठिन हो रहा है, और ममता सरकार इन दबावों और बाधाओं को बढ़ा रही है ताकि एसआईआर प्रक्रिया पूरी तरह से प्रभावी न हो सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/opinion/mamata-b-anerjees-accusation-of-protecting-sir-protest-infiltrators-intensifies/article-17206</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/opinion/mamata-b-anerjees-accusation-of-protecting-sir-protest-infiltrators-intensifies/article-17206</guid>
                <pubDate>Wed, 26 Nov 2025 18:29:00 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2025-11/resized-image---2025-11-26t182009.443.jpeg"                         length="48035"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[अजय कुमार, लखनऊ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बिहार की सियासत की पहली परीक्षा, 121 सीटों पर जनता तय करेगी नीतीश और तेजस्वी की किस्मत</title>
                                    <description><![CDATA[<p>बिहार में राजनीतिक तापमान अपने चरम पर है। 6 नवंबर को राज्य की सियासत की दिशा तय करने वाला पहला चरण होने जा रहा है, जिसमें 18 जिलों की 121 सीटों पर वोट डाले जाएंगे। यह सिर्फ चुनावी प्रक्रिया का पहला पड़ाव नहीं, बल्कि सत्ता की कुर्सी की नींव रखे जाने वाला निर्णायक मोड़ है। 3 करोड़ 75 लाख से अधिक मतदाता 1314 उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला करेंगे। आंकड़ों से लेकर उम्मीदवारों की सूची तक, हर तथ्य इस बात की गवाही दे रहा है कि इस बार की लड़ाई पहले से कहीं ज्यादा कड़ी, रोचक और निर्णायक है।बिहार के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/bihar/the-first-test-of-bihars-politics-the-public-will-decide/article-16885"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-11/resized-image-(86).jpeg" alt=""></a><br /><p>बिहार में राजनीतिक तापमान अपने चरम पर है। 6 नवंबर को राज्य की सियासत की दिशा तय करने वाला पहला चरण होने जा रहा है, जिसमें 18 जिलों की 121 सीटों पर वोट डाले जाएंगे। यह सिर्फ चुनावी प्रक्रिया का पहला पड़ाव नहीं, बल्कि सत्ता की कुर्सी की नींव रखे जाने वाला निर्णायक मोड़ है। 3 करोड़ 75 लाख से अधिक मतदाता 1314 उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला करेंगे। आंकड़ों से लेकर उम्मीदवारों की सूची तक, हर तथ्य इस बात की गवाही दे रहा है कि इस बार की लड़ाई पहले से कहीं ज्यादा कड़ी, रोचक और निर्णायक है।बिहार के पहले चरण में मिथिलांचल, कोसी, मुंगेर डिवीजन और भोजपुर बेल्ट के वे इलाके शामिल हैं जहां राजनीति हमेशा से जातीय समीकरणों और स्थानीय प्रभावशाली चेहरों पर टिकी रही है। इस बार भी स्थिति कुछ अलग नहीं। इन इलाकों में नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू, तेजस्वी यादव की आरजेडी, भाजपा, कांग्रेस और वाम दलों के बीच सीधे-सीधे मुकाबले देखने को मिल रहे हैं। कुल 1314 उम्मीदवारों में से 122 महिलाएं भी मैदान में हैं, जो बिहार की राजनीति में महिलाओं की बढ़ती सक्रियता को दर्शाता है।</p>
<p>पहले चरण में मुकाबला एनडीए और महागठबंधन के बीच सीधा है, लेकिन दिलचस्प यह है कि इस बार दोनों गठबंधनों के भीतर भी अंदरूनी जंग जारी है। महागठबंधन की ओर से आरजेडी 72 सीटों पर, कांग्रेस 24 पर और सीपीआई माले 14 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। वहीं सीपीआई और वीआईपी छह-छह सीटों पर, सीपीएम तीन पर और इंडियन इंक्लूसिव पार्टी दो सीटों पर मैदान में है। एनडीए में जेडीयू 57, भाजपा 48, एलजेपी (रामविलास) 13, आरएलएम 2 और हम (जीतनराम मांझी की पार्टी) एक सीट पर किस्मत आजमा रही है। इसके अलावा असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम 8 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि जन सुराज पार्टी ने 119 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं।यह आंकड़े भले चुनावी गणित की एक झलक भर हों, लेकिन असल कहानी उम्मीदवारों की प्रोफाइल और इलाकाई समीकरणों में छिपी है। पहले चरण में करीब 32 प्रतिशत उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्ट के अनुसार, हर तीसरा उम्मीदवार किसी न किसी मुकदमे में आरोपी है। इनमें से 20 प्रतिशत उम्मीदवार गंभीर धाराओं में केस झेल रहे हैं। यही बिहार की सियासत की सच्चाई है, जहां अपराध, प्रभाव और राजनीतिक पूंजी एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं।</p>
<p>पिछले चुनाव के नतीजों पर नजर डालें तो 2020 में इन 121 सीटों पर एनडीए और महागठबंधन के बीच कांटे की टक्कर रही थी। महागठबंधन ने 61 सीटें जीती थीं जबकि एनडीए ने 59 सीटें। उस वक्त चिराग पासवान की एलजेपी अकेले मैदान में थी और सिर्फ एक सीट जीत सकी थी। आरजेडी ने उस चुनाव में शानदार प्रदर्शन करते हुए 42 सीटें जीती थीं, भाजपा को 32, जेडीयू को 23, कांग्रेस को 8, माले को 7, वीआईपी को 4 और सीपीआई व सीपीएम को दो-दो सीटें मिली थीं। यही कारण है कि इस बार आरजेडी पर अपनी बढ़त बनाए रखने का दबाव है, जबकि जेडीयू और भाजपा के सामने खोया जनाधार वापस लाने की चुनौती।नीतीश कुमार के लिए यह पहला चरण किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं। जेडीयू जिन 57 सीटों पर लड़ रही है, उनमें से 36 पर आरजेडी से, 13 पर कांग्रेस से और सात पर सीपीआई माले से सीधा मुकाबला है। इसके अलावा दो सीटों पर वीआईपी से टक्कर है। यही कारण है कि नीतीश की राजनीति की साख इसी फेज पर टिकी मानी जा रही है। 2020 में जेडीयू के जिन 43 विधायकों ने जीत दर्ज की थी, उनमें से 23 पहले चरण की सीटों से आए थे। अगर इस बार वही सीटें डगमगाईं, तो नीतीश की मुख्यमंत्री कुर्सी भी खतरे में पड़ सकती है। दो दशक से सत्ता की धुरी बने नीतीश के लिए यह चुनाव राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है।</p>
<p>दूसरी तरफ, तेजस्वी यादव के लिए यह फेज सत्ता की राह का पहला पड़ाव है। पिछली बार उन्होंने भोजपुर और सारण बेल्ट में आरजेडी का परचम फहराया था और इस बार उनका लक्ष्य उन इलाकों में बढ़त बरकरार रखते हुए नई सीटों पर कब्जा करना है। तेजस्वी खुद राघोपुर से चुनाव मैदान में हैं, जो उनकी पारिवारिक परंपरा की सीट रही है। यहां जीत दर्ज करना तो उनके लिए सहज है, लेकिन चुनौती यह है कि सहयोगी दलों कांग्रेस और लेफ्ट के उम्मीदवारों को भी मजबूत प्रदर्शन दिलाया जाए। पिछली बार सहयोगी दलों के कमजोर प्रदर्शन के कारण ही तेजस्वी बहुमत से पीछे रह गए थे। इस बार उनका फोकस पूरे गठबंधन को एकजुट रखकर जीत की राह बनाना है।पहले चरण में नीतीश सरकार के 16 मंत्रियों की किस्मत भी दांव पर है। इनमें जेडीयू के 5 और भाजपा के 11 मंत्री शामिल हैं। भाजपा के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे सीवान से, डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी तारापुर से, और दूसरे डिप्टी सीएम विजय सिन्हा लखीसराय से चुनाव लड़ रहे हैं। इनके अलावा पटना के बांकीपुर से नितिन नवीन, दरभंगा के जाले से जीवेश मिश्रा, साहेबगंज से पर्यटन मंत्री राजू कुमार सिंह, अमनौर से आईटी मंत्री कृष्ण मंटू और बिहारशरीफ से पर्यावरण मंत्री सुनील कुमार जैसे बड़े चेहरे भी मैदान में हैं। जेडीयू के जल संसाधन मंत्री विजय चौधरी सरायरंजन से, ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार नालंदा से, समाज कल्याण मंत्री मदन सहनी बहादुरपुर से और सूचना मंत्री महेश्वर हजारी कल्याणपुर से मैदान में हैं। इनके लिए यह सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि राजनीतिक भविष्य का निर्णायक मोड़ है।</p>
<p>बिहार की राजनीति का चरित्र हमेशा से गठबंधनों और समीकरणों पर टिका रहा है। लेकिन इस बार माहौल कुछ अलग है। भाजपा अब जेडीयू पर पूरी तरह निर्भर नहीं दिखना चाहती। नीतीश के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर की सुगबुगाहट भी है, और भाजपा इसी लहर को अपने पक्ष में भुनाने में लगी है। वहीं जन सुराज पार्टी जैसे नए संगठन भी जनता के बीच पैठ बनाने की कोशिश में हैं। प्रशांत किशोर की यह पार्टी 119 सीटों पर उम्मीदवार उतारकर सियासी हलचल बढ़ा रही है। हालांकि, इनका असर कितना होगा, यह नतीजे बताएंगे, लेकिन इतना तय है कि वोटों का बिखराव इस बार निर्णायक असर डालेगा।बिहार की जनता हर बार की तरह इस बार भी जातीय समीकरणों और स्थानीय मुद्दों से प्रभावित दिख रही है। बेरोजगारी, शिक्षा, महंगाई और कानून-व्यवस्था चुनावी विमर्श के केंद्र में हैं, लेकिन विकास और नेतृत्व की तुलना में भावनात्मक समीकरण ज्यादा असर डालते दिख रहे हैं। तेजस्वी जहां युवाओं को रोजगार और परिवर्तन की बात कर रहे हैं, वहीं नीतीश कुमार अपनी सुशासन और विकास की छवि को दोहराने में लगे हैं।</p>
<p>6 नवंबर का मतदान सिर्फ 121 सीटों का फैसला नहीं करेगा, बल्कि यह तय करेगा कि बिहार की राजनीति आगे किस दिशा में बढ़ेगी। अगर पहले चरण में आरजेडी और उसके सहयोगी बढ़त बनाते हैं, तो तेजस्वी का रास्ता आसान होगा। लेकिन अगर नीतीश और भाजपा ने संतुलन बनाए रखा, तो बाकी चरणों में मुकाबला और भी दिलचस्प हो जाएगा।पहले चरण का चुनाव बिहार के भविष्य की सबसे बड़ी परीक्षा है  सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए। 20 साल से बिहार की राजनीति जिन दो ध्रुवों पर टिकी रही है, वही अब फिर से आमने-सामने हैं। फर्क बस इतना है कि इस बार दोनों के पास खोने को भी बहुत कुछ है। नीतीश के लिए सत्ता का निरंतरता दांव पर है और तेजस्वी के लिए भविष्य की राजनीति का स्वप्न। यह चरण तय करेगा कि जनता किसे अगले पांच साल की बागडोर सौंपना चाहती है।</p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>बिहार</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/state/bihar/the-first-test-of-bihars-politics-the-public-will-decide/article-16885</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/state/bihar/the-first-test-of-bihars-politics-the-public-will-decide/article-16885</guid>
                <pubDate>Wed, 05 Nov 2025 12:21:40 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2025-11/resized-image-%2886%29.jpeg"                         length="43732"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[अजय कुमार, लखनऊ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बिहार: नामांकन के अंतिम दिन तक महागठबंधन में सीटों के लिये घमासान</title>
                                    <description><![CDATA[बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए विपक्षी इंडी गठबंधन के भीतर सीट बंटवारे को लेकर मतभेद बढ़ते जा रहे हैं। राजद और कांग्रेस के बीच 50-80 सीटों को लेकर खींचतान है, वहीं वीआईपी 15 सीटों की मांग कर रहा है। राहुल गांधी और लालू यादव की बैठक ने गठबंधन को बचाने की कोशिश की, लेकिन जातीय, क्षेत्रीय और स्थानीय समीकरणों के कारण समन्वय अधूरा है। नामांकन की अंतिम तिथि नजदीक है, और विपक्ष की एकजुटता पर प्रश्न खड़ा हो गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/bihar/battle-for-seats-in-grand-alliance-till-last-day-of/article-16727"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-10/resized-image---2025-10-16t164955.200.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए शुक्रवार, 17 अक्टूबर को नामांकन का अंतिम दिन है, लेकिन उससे पहले ही विपक्षी इंडी गठबंधन के भीतर सीट बंटवारे को लेकर घमासान चरम पर पहुंच गया है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस के बीच सीटों की हिस्सेदारी को लेकर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं, वहीं तीसरे और छोटे सहयोगी दल भी अपनी-अपनी सियासी हैसियत के हिसाब से ज्यादा सीटों की मांग कर रहे हैं। गठबंधन को एकजुट होकर चुनाव मैदान में उतरना था ताकि सत्ता पक्ष को टक्कर दी जा सके, लेकिन आज की स्थिति देखकर लगता है कि अंदरूनी सिर फुटव्वल ने विपक्षी एकजुटता की तस्वीर को धुंधला कर दिया है।बिहार की सियासत में राजद और कांग्रेस का साथ नया नहीं है, लेकिन इस बार की परिस्थिति कुछ अलग है। लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक उत्तराधिकारी मानी जाने वाली पार्टी राजद को गठबंधन का नेतृत्वकर्ता दल माना जा रहा है, जबकि कांग्रेस अपने परंपरागत वोट बैंक और राष्ट्रीय पहचान के आधार पर अधिक सीटों की मांग पर अड़ी हुई है। इसी मुद्दे को लेकर बीते बुधवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पटना में राजद के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव से मुलाकात की। मुलाकात बंद कमरे में करीब एक घंटे तक चली, जिसमें तेजस्वी यादव भी मौजूद थे। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस ने करीब 80 सीटों की मांग रखी है, जबकि राजद उसे 50 से अधिक देने के मूड में नहीं है। इस खींचतान के बीच यह गठबंधन कमजोर दिखने लगा है।</p>
<p style="text-align:justify;">राजद की ओर से तर्क दिया जा रहा है कि बिहार में उनकी संगठनात्मक पकड़ कांग्रेस से कहीं ज्यादा गहरी है। 2020 के चुनाव में भी कांग्रेस 70 सीटों पर लड़ी थी, लेकिन केवल 19 सीटें जीत पाई थी। इससे राजद नेतृत्व यह तर्क दे रहा है कि कांग्रेस का प्रदर्शन उम्मीद से काफी खराब रहा था, इसलिए इस बार उसे कम सीटों पर लड़ा जाना चाहिए। उधर कांग्रेस का कहना है कि उसकी उपस्थिति राज्य के लगभग सभी जिलों में है और गठबंधन को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती देने के लिए उसे पर्याप्त राजनीतिक स्पेस मिलना चाहिए। दोनों दलों के बीच सीटों की अपनी-अपनी दावेदारी के बीच इन दलों की राजनीतिक बयानबाजी सड़क चौराहों पर पहुंच गई है, जिससे कार्यकर्ताओं में भी भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है।विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के प्रमुख मुकेश साहनी गठबंधन में असंतोष के सबसे मुखर आवाज बनकर उभरे हैं। साहनी, जो खुद को ‘मल्लाह समाज का चेहरा’ बताते हैं, को अब तक केवल 4 से 5 सीटों की पेशकश की गई है, जबकि वे कम से कम 15 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की मांग कर रहे हैं। राजद नेताओं का कहना है कि वीआईपी की संगठनात्मक ताकत सीमित है और इतनी सीटें देना समीकरणों के हिसाब से संभव नहीं है। इससे नाराज मुकेश  साहनी  ने गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर अपनी रणनीति स्पष्ट करने का ऐलान किया है। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा है कि साहनी इंडी गठबंधन छोड़ स्वतंत्र रूप से चुनाव मैदान में उतर सकते हैं या किसी तीसरे मोर्चे से हाथ मिला सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो गठबंधन की एकजुटता और कमजोर पड़ जाएगी।</p>
<p>उधर, कांग्रेस और राजद के बीच जो पेंच फंसा है, उसमें मध्यस्थता की जिम्मेदारी वामपंथी दलों को सौंपी गई है। लेकिन सीपीआई और सीपीएम जैसे दलों की राज्य में सीमित ताकत होने के कारण वे इस विवाद को सुलझा पाने की स्थिति में नहीं दिख रहे हैं। बीजेपी और एनडीए खेमे में इस खेमेबाजी को लेकर खुशी का माहौल है। एनडीए रणनीतिकारों का कहना है कि जब विपक्ष खुद एक मंच पर नहीं टिक पा रहा तो जनता को क्या भरोसा दिलाएगा। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुनः सत्ता में आने के बाद से राजद और कांग्रेस लगातार एनडीए सरकार पर बेरोजगारी, महंगाई, किसान मुद्दों और भ्रष्टाचार को लेकर हमले कर रहे हैं, लेकिन अंदरूनी मतभेदों ने उनकी राजनीतिक धार को कुंद कर दिया है। बिहार के राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि सीट बंटवारा केवल संख्या का खेल नहीं बल्कि जातीय समीकरणों, क्षेत्रीय प्रभाव और स्थानीय नेतृत्व की प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ होता है। राजद यादव-मुस्लिम समीकरण पर टिके रहना चाहता है, जबकि कांग्रेस ब्राह्मण, बनिया और अनुसूचित जाति के मतदाताओं को साधने की रणनीति बना रही है। वीआईपी का आधार मल्लाह समुदाय में है, और इस वर्ग के वोट कई सीटों पर निर्णायक हो सकते हैं। यदि यह वर्ग अलग दिशा में चला गया, तो नुकसान राजद-कांग्रेस गठबंधन को ही होगा। अंदरूनी खींचतान का दूसरा पहलू स्थानीय नेताओं की नाराजगी है। राजद के कुछ पुराने नेताओं को टिकट वितरण की प्रक्रिया में परिवारवाद का आरोप लगाते हुए विरोध दर्ज कराते देखा गया है। कई जगहों पर कार्यकर्ताओं ने कार्यालयों के बाहर प्रदर्शन किया है। कांग्रेस में भी असंतोष खुलकर सामने आ गया है, क्योंकि टिकट मांगने वालों की संख्या अत्यधिक है लेकिन सीटें सीमित। राहुल गांधी और लालू यादव की बैठक से पहले कांग्रेस हाईकमान ने अपने बिहार प्रभारी को निर्देश दिया था कि वे युवा चेहरों को प्राथमिकता दें, लेकिन इससे पुराने नेताओं में असंतोष फैला है।</p>
<p>राजनीतिक पर्यवेक्षक यह भी मानते हैं कि राहुल गांधी की लालू यादव से मुलाकात एक 'सेव-द-एलायंस' प्रयास थी, जहां दोनों वरिष्ठ नेताओं ने गठबंधन को अंतिम क्षण तक टूटने से बचाने की कोशिश की है। लेकिन बिहार जैसे राज्य में, जहां जातीय और क्षेत्रीय समीकरण हर चुनाव को प्रभावित करते हैं, वहां सीट बंटवारा केवल ऊपर के स्तर का समझौता नहीं बल्कि जमीनी परिघटना होती है। अगर इस पर मजबूत तालमेल नहीं बैठा तो उम्मीदवारी फॉर्म भरने के अंतिम दिन तक कई सीटों पर गठबंधन की स्थिति अस्पष्ट रह सकती है। अब जबकि नामांकन की अंतिम तारीख सिर पर है, हर घंटे गठबंधन के भीतर नई खींचतान और बयानबाजियां सामने आ रही हैं। राजद चाहती है कि अंतिम सूची इसी रात तक जारी कर दी जाए ताकि शुक्रवार को नामांकन संभव हो सके, जबकि कांग्रेस ने अपने केंद्रीय नेतृत्व की दिल्ली में बैठक बुला ली है। उसी समय मुकेश साहनी की प्रेस कॉन्फ्रेंस और उसके संभावित नतीजे पूरे समीकरण को और उलझा सकते हैं।</p>
<p>बिहार की जनता इन सब राजनीतिक जटिलताओं को बारीकी से देख रही है। जनता के लिए मुद्दे वही हैं  रोजगार, शिक्षा, कानून व्यवस्था और महंगाई लेकिन विपक्ष जब खुद के भीतर बंटा हुआ दिखता है तो उसकी वैकल्पिक राजनीति की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। 2020 के चुनाव में भी विपक्षी एकता के बावजूद एनडीए ने मुश्किल से जीत हासिल की थी, पर इस बार के भीतरूनी मतभेद विपक्ष को और कमजोर बना सकते हैं। कल के दिन नामांकन की अंतिम तिथि बीतते ही तस्वीर कुछ साफ जरूर होगी कि गठबंधन एकजुट होकर मैदान में उतरता है या सीट बंटवारे की इस खींचतान में उसका ढांचा बिखर जाता है। अभी के संकेत बताते हैं कि राहुल गांधी और लालू यादव की बैठक के बावजूद समन्वय पूरी तरह नहीं बन पाया है। ऐसे में बिहार के मतदाता अब इस इंतजार में हैं कि क्या विपक्षी दल अपनी अंतर्विरोधी राजनीति से ऊपर उठकर सत्ता पक्ष को वास्तविक चुनौती देंगे या फिर आंतरिक सिर फुटव्वल ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बनेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>बिहार</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/state/bihar/battle-for-seats-in-grand-alliance-till-last-day-of/article-16727</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/state/bihar/battle-for-seats-in-grand-alliance-till-last-day-of/article-16727</guid>
                <pubDate>Thu, 16 Oct 2025 16:50:48 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2025-10/resized-image---2025-10-16t164955.200.jpeg"                         length="45205"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[अजय कुमार, लखनऊ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Opinion: योगी की तारीफ से क्यों बढ़ी अखिलेश की बेचैनी</title>
                                    <description><![CDATA[बसपा सुप्रीमो मायावती ने लखनऊ रैली में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तारीफ करते हुए सपा और अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोला, जिससे यूपी की सियासत में नई हलचल मच गई है। उन्होंने घोषणा की कि बीएसपी 2027 का चुनाव अकेले लड़ेगी और गठबंधन से दूर रहेगी। मायावती की रणनीति सपा के ‘पीडीए फार्मूले’ को कमजोर कर दलित, बहुजन और गैर-जाटव वोटरों को फिर से अपने पक्ष में एकजुट करने की है। भाजपा के प्रति नरम रुख अपनाकर वे दलित वोट बैंक में सेंध रोकना चाहती हैं। यह कदम उनके 2007 जैसे व्यापक सामाजिक समीकरण को दोबारा जीवित करने की कोशिश है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-why-did-akhileshs-uneasiness-increase-due-to-yogis-praise/article-16611"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-10/resized-image---2025-10-11t172253.303.jpeg" alt=""></a><br /><p>बसपा सुप्रीमो मायावती ने गत दिनों लखनऊ की महारैली में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की खुलकर तारीफ की और समाजवादी पार्टी व अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोला है, जो यूपी की सियासत में एक बड़े दांव के रूप में देखा जा रहा है। मायावती ने योगी सरकार को स्मारक स्थलों के रखरखाव व बहुजन हित में सकारात्मक भूमिका के लिए आभार जताया और साथ में सपा पर आरोप लगाया कि पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले का इस्तेमाल सिर्फ विपक्ष में करते हैं, सत्ता में रहकर इसे भूल जाते हैं। मायावती की यह रणनीति 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए बहुजन और दलित वोटरों को अपने पक्ष में एकजुट करने का प्रयास है। उन्हें पता है कि सपा की ‘पीडीए’ रणनीति ने दलित-मुस्लिम-ओबीसी गठजोड़ को मजबूत किया है, जिससे बसपा का कोर वोटर प्रभावित हुआ है। इसी वजह से मायावती ने रैली के मंच से कहा कि बीएसपी अकेले अपने बल पर चुनाव लड़ेगी और गठबंधन से दूर रहेगी, क्योंकि पिछली बार सपा या कांग्रेस के साथ किए गए गठबंधन चुनाव में बसपा को फायदा नहीं मिला था।</p>
<p>भाजपा के प्रति उनका नरम रुख और योगी की तारीफ भी एक सोची-समझी रणनीति है। मायावती जानती हैं कि उनका सीधा मुकाबला भाजपा से कम और सपा-कांग्रेस के वोट कटवा फॉर्मूलों से ज्यादा है। वे दलित समाज में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती हैं, ताकि सपा के ‘पीडीए’ या कांग्रेस की जातिगत जनगणना की मांग के जरिए दलित वोट बैंक में सेंध न लगे। भाजपा के साथ नजदीकी दिखाने का खतरा जरूर है, लेकिन बीएसपी के थिंक टैंक मानते हैं कि उनका कोर वोटर जबरदस्त रूप से पार्टी के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा है। 2007 के ‘सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय’ वाली व्यापक सामाजिक समीकरण को मायावती फिर से खड़ा करना चाह रही हैं।</p>
<p>बसपा का प्रदर्शन लगातार गिरता गया है  2007 में अकेले 206 सीटें, 2012 में 80, 2017 में 19 और 2022 में मात्र 1 सीट मिली। लोकसभा चुनावों में भी 2014 और 2024 में शून्य पर रही है। ऐसे में मायावती का दांव अपनी ताकत का सार्वजनिक प्रदर्शन, योगी से नजदीकी, और दलित-मुस्लिम व गैर-जाटव समाज को फिर से जोड़ना है। वो इसका असर पहले पंचायत चुनावों में और फिर 2027 के विधानसभा चुनावों में दिखाना चाहती हैं, ताकि भीड़ वोट में बदल सके और डाउनफॉल का सफर रुक सके। हालांकि विपक्ष   सपा और कांग्रेस  बीएसपी-भाजपा की ‘अंदरूनी सांठगांठ’ बताकर दलित समाज को मायावती से दूर करने की कोशिश कर रही है, साथ ही बीएसपी पर ‘बी टीम’ का आरोप भी लगा रहे हैं। लेकिन मायावती ने साफ किया है कि उनका असल टारगेट दलित, बहुजन और सर्वजन का वही पुराना समीकरण दोबारा कायम करना है, जिसके बूते 2007 में पूर्ण बहुमत मिला था। यही वजह है कि वो भाजपा या किसी गठबंधन की परवाह किए बिना अपने कोर वोटरों के साथ मजबूत रिश्ते पर फोकस कर रही हैं, भले इसके लिए कोई आलोचना झेलनी पड़े।</p>
<p>संक्षेप में कहा जाए तो मायावती ने इस दांव से सपा के पीडीए फॉर्मूले को कमजोर करने, भाजपा के साथ नजदीकी दिखाकर दलितों का भरोसा दोबारा हासिल करने और बहुजन समाज को पुराने जमाने की तरह एक मंच पर लाने की कोशिश की है। आने वाले चुनावों में यह दांव कितना काम करेगा, यह पंचायत चुनाव और 2027 के नतीजे ही तय करेंगे। लेकिन मौजूदा हालात में यूपी की सियासी बिसात पर ‘हाथी’ का फिर से सक्रिय होना सपा और कांग्रेस दोनों की साइकिल को डगमगाता दिख रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-why-did-akhileshs-uneasiness-increase-due-to-yogis-praise/article-16611</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-why-did-akhileshs-uneasiness-increase-due-to-yogis-praise/article-16611</guid>
                <pubDate>Sat, 11 Oct 2025 17:24:04 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2025-10/resized-image---2025-10-11t172253.303.jpeg"                         length="43459"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[अजय कुमार, लखनऊ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Opinion: संघ की विचारधारा पर क्यों उठती है बार-बार उंगली</title>
                                    <description><![CDATA[राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 100 साल का जश्न मना रहा है। संघ ने आलोचनाओं और प्रतिबंधों के बावजूद समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखी। महिलाओं और दलितों को सम्मान न मिलने के आरोपों के बीच भी संघ ने शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और संस्कार निर्माण में कई योजनाएँ चलाई हैं, जिससे महिलाओं का सशक्तिकरण और राष्ट्र सेवा सुनिश्चित होती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-why-are-fingers-repeatedly-raised-on-the-ideology-of/article-16581"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-10/resized-image---2025-10-10t160445.126.jpeg" alt=""></a><br /><p>राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 100 साल का जश्न मना रहा है। इन सौ सालों में संघ ने देश में अपनी जड़ें काफी मजबूती से जमा ली। यह सब तब हुए जबकि कांग्रेस की सरकारों ने संघ पर प्रतिबंद्ध सहित उसको लेकर जनता के बीच खूब जहर उगला था। यहां तक की संघ की राष्ट्रभक्ति पर भी सवाल खड़े किये गये। यह भ्रम फैलाया गया कि संघ आजादी की लड़ाई के समय संघ के साथ खड़ा था। दलितों और महिलाओं को संघ में सम्मान नहीं मिलने का आरोप लगाया गया। कुल मिलाकर संघ ने सौ सालों में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। संघ की समाज के प्रति समर्पण और प्रतिबद्धता किसी से छिपी नहीं है,इसीलिये तमाम आरोपों के बाद भी संघ ने अपनी विचारधारा पर कभी समझौता नहीं किया। यह सच है कि संघ पर कई बार प्रतिबंध लगाया गया तो कांग्रेस की ही सरकारों ने समाज के प्रति उनके योगदान की सराहना भी की,लेकिन संघ ने कभी भी अपने ऊपर लगे आरोपों का खुलकर खंडन नहीं किया। ऐसा इस लिये है क्योंकि संघ कभी खुलकर समाज के सामने नहीं आता है। न ही अपने किये सामाजिक कार्यो की वाहवाही बटोरता है,लेकिन संघ को सबसे अधिक विचलित तब होना पड़ता है,जब उस पर देष की आधी आबादी यानि महिलाओं की अनदेखी का आरोप लगता है। संघ पर आरोप लगाया जाता है कि वह अपनी विचारधारा और संगठनात्मक ढांचे में महिलाओं को पुरुषों जितना सम्मान और स्थान नहीं देता। आलोचक कहते हैं कि संघ में महिलाओं को नेतृत्व भूमिका में जगह बहुत कम मिलती है। लेकिन संघ स्वयं इस धारणा का खंडन करता आया है। उसका कहना है कि महिलाओं की गरिमा और शक्ति के बिना राष्ट्र का अस्तित्व ही अधूरा है। यही कारण है कि संघ ने वर्षों से महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और संस्कार निर्माण की दिशा में कई कार्य योजनाएं चलायी हैं।  </p>
<p>संघ और उससे जुड़े संगठनों ने महिलाओं की उन्नति, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक उत्थान के लिये अब तक किस प्रकार के कार्य किए हैं, साथ ही कि किन क्षेत्रों में अभी भी और काम की आवश्यकता महसूस की जाती है। इस पर गौर किया जाये तो देखने में यही आता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयं पुरुषों का संगठन है। परन्तु इसकी समानांतर शाखा महिलाओं के लिए ’’राष्ट्र सेविका समिति’’ के रूप में कार्यरत है। यह संगठन 1936 में डॉ. हेडगेवार के सुझाव से स्थापित हुआ। इसका उद्देश्य महिलाओं में आत्मविश्वास, अनुशासन और राष्ट्रप्रेम की भावना जगाना था। समिति आज देशभर में हजारों शाखाएँ चला रही है। इन शाखाओं में युवतियों और महिलाओं को मानसिक व शारीरिक दृष्टि से सशक्त बनाने की दिशा में विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। दंड, योग, गीत, व्याख्यान, साहित्य अध्ययन और विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिताएं इनके नियमित आयोजन का हिस्सा हैं। इस समिति के माध्यम से अनेक महिला कार्यकर्ता समाज सेवा के क्षेत्र में आगे आयीं। ग्रामीण क्षेत्रों, आदिवासी इलाकों और शहरी बस्तियों में समिति की सेविकाएँ शिक्षा का प्रसार कर रही हैं, महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रही हैं और संस्कार शिक्षा भी दे रही हैं।  </p>
<p>संघ का मानना है कि भारत का स्वर्णिम भविष्य केवल शिक्षित और संस्कारित पीढ़ी के निर्माण से ही संभव है। इसी उद्देश्य से संघ के प्रेरणा से अनेक शिक्षण संस्थानों की स्थापना हुई, जिनमें लड़कियों की संख्या उल्लेखनीय है।विद्या भारती नामक शिक्षण संगठन आज भारत का सबसे बड़ा शैक्षिक नेटवर्क है। इसके विद्यालयों में बालिकाओं को संस्कारित शिक्षा प्रदान की जाती है। विज्ञान, गणित और कला जैसे विषयों के साथ नृत्य, संगीत व योग का अभ्यास भी कराया जाता है।आदिवासी बस्तियों में चलाए जा रहे ‘एकल विद्यालय’ योजनाओं से बड़ी संख्या में लड़कियां शिक्षा से जुड़ी हैं। इन विद्यालयों से दूर-दराज की पहाड़ी और वनवासी बालिकाओं तक शिक्षा पहुँच रही है। छात्राओं को छात्रवृत्ति और मार्गदर्शन देकर उच्च शिक्षा की ओर अग्रसर करने पर भी बल दिया जाता रहा है। संघ से जुड़े संगठनों का प्रयास रहा है कि शिक्षा केवल पढ़ाई लिखाई तक सीमित न होकर चरित्र निर्माण और राष्ट्रप्रेम से भी जुड़ी हो।  <br />महिलाओं के लिए स्वास्थ्य संबंधी अनेक योजनाएँ संघ व उसकी सहयोगी संस्थाएँ चला रही हैं। सेवा भारती संगठन देशभर में हजारों सेवा केंद्र चला रहा है। इनमें महिलाओं के लिए निःशुल्क स्वास्थ्य परीक्षण शिविर लगाए जाते हैं। ग्रामीण और शहरी इलाकों में बालिकाओं के लिए पोषण आहार वितरण, आयरन की गोलियाँ, स्वास्थ्य परामर्श और स्वास्थ्य शिक्षा का कार्य होता हैगर्भवती महिलाओं की मदद, प्रसव के समय सहयोग, और बच्चों की देखभाल से जुड़ी योजनाओं के पीछे संघ की स्वयंसेविकाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। महिला जागरूकता अभियान चलाकर मासिक धर्म स्वच्छता, पोषण और परिवार स्वास्थ्य जैसे विषयों पर ज्ञान फैलाया जाता है।  <br /> </p>
<p>संघ का उद्देश्य केवल महिलाओं को शिक्षित करना भर नहीं है, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाना भी है।अनेक सेवा प्रकल्पों में महिलाओं को सिलाई, बुनाई, कढ़ाई, हस्तशिल्प और भोजन प्रसंस्करण जैसी विधाओं का प्रशिक्षण दिया जाता है।इसके माध्यम से महिलाएं परिवार के आर्थिक बोझ को साझा करती हैं और आत्मसम्मान के साथ समाज में योगदान देती हैं। स्वयं सहायता समूह बनाकर ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को लघु उद्यम चलाने में सहायता दी जाती है। इससे उनमें नेतृत्व क्षमता और प्रबंधन कौशल का विकास हुआ है।  आत्मनिर्भरता और महिला उद्यमिता ऐसे प्रयासों से महिलाएँ आर्थिक मजबूती के साथ आत्मसम्मान हासिल कर रही हैं। उनके अंदर प्रबंधन और निर्णय लेने की क्षमता का भी विकास हो रहा है।  </p>
<p>राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण यह है कि महिलाओं का योगदान केवल आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों तक सीमित न रहकर सांस्कृतिक और नैतिक निर्माण में भी महत्त्वपूर्ण होना चाहिए। सेविका समिति की शाखाओं और शिविरों में बालिकाओं को भारतीय शास्त्र, परंपरा और इतिहास से परिचित कराया जाता है। माँ भारती और नारी गरिमा की अवधारणा गीतों, नाटकों और व्याख्यानों के माध्यम से भावनात्मक रूप से जोड़ी जाती है। यह प्रशिक्षण उन्हें परिवार और समाज दोनों के प्रति जिम्मेदारी निभाने की दिशा में सजग बनाता है और उनमें नेतृत्व के साथ-साथ अनुशासन की भावना को भी प्रगाढ़ करता है।  <br />स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आधुनिक काल की प्राकृतिक आपदाओं तक, संघ प्रेरित महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। सेविका समिति की महिलाएँ राहत कार्य, भोजन वितरण, आश्रय केंद्र संचालन और चिकित्सा सहयोग जैसे कार्यों में उल्लेखनीय योगदान देती रही हैं। यह उनकी सामाजिक जिम्मेदारी और सेवा भाव की जीवंत मिसाल है।  </p>
<p>उधर, आलोचक कहते हैं कि यदि महिला और पुरुष समान हैं तो महिलाओं को संघ की मुख्य संरचना में सम्मिलित क्यों नहीं किया गया। उनका मत है कि महिला नेतृत्व को पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाता। संघ का पक्ष बिल्कुल भिन्न है। उसका कहना है कि पुरुष और महिला की भूमिकाओं और प्रकृति में भिन्नता है। इसीलिए दोनों के लिए अलग-अलग मंच बनाना ही उचित है। ’राष्ट्र सेविका समिति’ इसी विचार पर संगठित है और वर्षों से स्वतंत्र रूप से कार्य कर रही है। संघ का दावा है कि समिति की महिलाएँ सामाजिक उन्नति और सेवा कार्यों में कहीं अधिक सक्रिय हैं और यह विभाजन किसी बाधा के बजाय जिम्मेदारियों का स्वाभाविक बंटवारा है। कुल मिलाकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठन महिलाओं के शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा और आत्मनिर्भरता से जुड़े हजारों प्रकल्पों के माध्यम से समाज में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। लाखों महिलाएँ इन प्रयासों से आत्मबल और आत्मसम्मान प्राप्त कर रही हैं। हालांकि आलोचनाएँ यह कहती हैं कि संघ की केन्द्रीय नीति निर्धारण इकाई में महिला नेतृत्व का अभाव अब भी दिखता है। फिर भी यह वास्तविकता भी है कि महिला शक्ति को स्वतंत्र मंच देकर उन्हें राष्ट्र निर्माण में सक्रिय किया गया है। आज गाँव-गाँव और शहर-शहर में संघ प्रेरित सेविकाएँ समाज सेवा, संस्कार शिक्षा और महिला उत्थान का दीप जला रही हैं। उनका योगदान शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्कृति की मजबूत नींव रख रहा है और यह सिद्ध कर रहा है कि राष्ट्र की शक्ति स्त्री और पुरुष दोनों की साझेदारी से ही संपूर्ण होती है।  </p>
<p>भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर राष्ट्र के संकट काल तक, महिलाओं ने बहादुरी से भूमिका निभाई। संघ मानता है कि मातृशक्ति ही राष्ट्र की जननी है। इतिहास में क्रांति और जागरण के क्षणों में महिलाओं का योगदान सबसे अधिक रहा है।  आज भी राष्ट्रीय संकट या प्राकृतिक आपदा के समय संघ व सेविका समिति की महिलाएं राहत और सेवा कार्यों में सक्रिय दिखाई देती हैं। बाढ़, भूकम्प, महामारी और दंगों के समय स्वयंसेविकाओं ने राहत शिविर चलाये, भोजन बाँटा और पीड़ित बहनों की सहायता की है।  </p>
<p>संघ पर महिला नेतृत्व को संगठनात्मक ढांचे में कम स्थान देने का आरोप लगता है। इसका कारण यह है कि संघ की मूल शाखा में केवल पुरुष सदस्य होते हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि महिलाएं वास्तव में बराबर की भागीदार हैं, तो उन्हें इसी संरचना में सम्मिलित क्यों नहीं किया गया। संघ इस पर स्पष्ट जवाब देता है कि पुरुष और महिला दोनों की प्रकृति में अंतर है। इसलिए उनके विकास के लिये अलग-अलग मंच बनाना अधिक उपयुक्त है। राष्ट्र सेविका समिति इसी सिद्धांत पर कार्य करती है। संघ का कहना है कि समिति स्वतंत्र रही है और उसको अपने कार्यक्रम और दिशा तय करने की पूरी स्वतंत्रता दी गयी है। संघ का यह दावा भी है कि यदि महिला कार्यकर्ताओं को देखा जाए, तो वे सामाजिक उत्थान में पुरुषो से कहीं अधिक सक्रिय और प्रभावशाली ढंग से कार्य करती हैं।  </p>
<p>संघ ने महिला सशक्तिकरण के लिये क्या काम किया,इसके उदाहरण भी मौजूद हैं। संघ प्रेरित अनेक महिला कार्यकर्ताओं ने समाज में उल्लेखनीय काम किया है। आदिवासी क्षेत्रों में सैकड़ों संघ सेविकाएँ शिक्षा का दीपक जलाने का कार्य कर रही हैं। शहरी झुग्गियों में बालिकाओं के लिए चलाये जा रहे संस्कार केंद्र वहाँ की पीढ़ी को नयी दिशा दे रहे हैं। अनेक महिलाएं ग्राम विकास योजनाओं की अगुआई कर रही हैं। संघ साफ कहता है कि राष्ट्र निर्माण में महिला और पुरुष दोनों की बराबर भागीदारी आवश्यक है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस बात पर जोर देता रहा है कि महिला ’शक्ति’ और ’संस्कार’ राष्ट्र की धुरी है। यही कारण है कि संघ ने शिक्षण, स्वास्थ्य, सेवा और आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में महिलाओं के लिए हजारों योजनाएं चलाईं। हालांकि, आलोचनाएँ भी कम नहीं हैं।</p>
<p>बहरहाल, यह सच है कि संघ की केन्द्रीय नेतृत्व संरचना में महिलाओं की औपचारिक भागीदारी नहीं है। लेकिन संघ यह मानता है कि अलग मंच बनाकर महिलाओं को राष्ट्रसेवा के लिए स्वतंत्र अवसर देना ही वास्तविक सम्मान है। अंततः यह कहना उचित होगा कि महिलाएं आज संघ प्रेरित प्रयासों से गाँव-गाँव और शहर-शहर में आत्मविश्वास और सम्मान के साथ खड़ी हो रही हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति और सेवा के क्षेत्र में उनका योगदान राष्ट्र निर्माण की मजबूत नींव रख रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-why-are-fingers-repeatedly-raised-on-the-ideology-of/article-16581</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-why-are-fingers-repeatedly-raised-on-the-ideology-of/article-16581</guid>
                <pubDate>Fri, 10 Oct 2025 16:05:59 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2025-10/resized-image---2025-10-10t160445.126.jpeg"                         length="48256"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[अजय कुमार, लखनऊ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Opinion: आई लव मोहम्मद की हकीकत और साज़िशों का सच</title>
                                    <description><![CDATA[उत्तर प्रदेश में “आई लव मोहम्मद” पोस्टरों और बैनरों के कारण धार्मिक और राजनीतिक तनाव बढ़ रहा है। असली संदेश पैग़म्बर मोहम्मद का जीवन अपनाने में है, न कि पोस्टर-नारेबाज़ी में। विशेषज्ञ और विद्वानों का कहना है कि इसे समाज में दंगे भड़काने और राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-i-love-mohammads-reality-and-truth/article-16508"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-09/resized-image---2025-09-27t142612.663.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">इस्लाम धर्म में बुतपरस्ती यानी मूर्तिपूजा को कड़ाई से हराम घोषित किया गया है। पैग़म्बर साहब की किसी तस्वीर, चित्र या मूर्ति बनाने पर हमेशा से पाबंदी रही है, क्योंकि इस्लाम का मूल संदेश एक ईश्वर की इबादत पर आधारित है, न कि किसी प्रतिमा या चित्र की पूजा पर। लेकिन इन दिनों उत्तर प्रदेश में नए तरह का चलन देखने को मिल रहा है, जिसमें जगह-जगह आई लव मोहम्मद लिखे बैनर और पोस्टर लगाए जा रहे हैं। मोहम्मद साहब के नाम पर समाज का माहौल खराब करने सहित दंगा फैलाया जा रहा है। सवाल यह है कि जब पैग़म्बर की तस्वीर तक बनाना मना है, तब क्या इस तरह के भावनात्मक नारे लगाकर धार्मिक और राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिशें जायज़ मानी जा सकती हैं? पैग़म्बर मोहम्मद साहब ने अपने जीवनकाल में तौहीद का संदेश दिया था। उन्होंने हर तरह की बुतपरस्ती और चित्र या मूर्ति पूजा का खंडन किया। लेकिन आई लव मोहम्मद जैसी कार्यवाहियाँ इस्लाम की उसी मूल भावना से टकराती नज़र आती हैं। यहाँ सवाल यह नहीं कि मोहम्मद साहब के प्रति प्रेम या आदर किया जा रहा है, बल्कि यह है कि उस प्रेम को किस रूप में प्रदर्शित किया जा रहा है। इस्लाम में अपने पैग़म्बर से मोहब्बत दिखाने का तरीका उनके बताए मार्ग पर चलना और अमल करना है, न कि नारेबाज़ी और पोस्टरों से हंगामा खड़ा करना। कानपुर से आई लव मोहम्मद के पोस्टर से जो चिंगारी निकली थी  बरेली में उसने उग्र रूप धारण कर लिया। उपद्रवियों ने जम कर हिंसा और लूटपाट की। इस अराजकता के लिये विवादित मुस्लिम मौलाना तौकीर रजा सीधे तौर पर उतरदायी है। बरेली में तौकीर रजा सहित दंगा फैलाने वालों पर कार्रवाई के बाद इस समय वहां तनावपूर्ण शांति है।</p>
<p style="text-align:justify;">बीते कुछ महीनों से उत्तर प्रदेश के कई शहरों में आई लव मोहम्मद लिखे पोस्टर, दीवारों पर बने बड़े-बड़े बैनर और झंडे देखने को मिल रहे हैं। इन बैनरों को लगाने का नाम भले ही धार्मिक प्रेम दिखाना बताया जा रहा हो, लेकिन जानकारों का मानना है कि इसके पीछे गहरी राजनीतिक नीयत छिपी हुई है। यह सिर्फ साधारण नारा नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी साज़िश है जिसमें धार्मिक भावनाओं को भड़काकर समाज में तनाव पैदा किया जा रहा है। इन बैनरों का उद्देश्य केवल अपने समुदाय में धार्मिक जोश जगाना नहीं, बल्कि दूसरे धर्मों के लोगों को उकसाना भी है। सार्वजनिक जगहों पर लगाए जाने वाले ये पोस्टर जब किसी अन्य संप्रदाय के इलाके में लगाए जाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से टकराव की स्थिति बनती है। उत्तर प्रदेश के कई कस्बों और शहरों में यही देखने को मिला। मोहल्लों में एक वर्ग जब आई लव मोहम्मद के झंडे या बैनर लेकर निकलता है, तो दूसरा वर्ग इसे उकसावे की कार्रवाई मानता है। धीरे-धीरे माहौल गरमाने लगता है और छोटे-छोटे विवाद बड़े दंगों में बदल जाते हैं।  </p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि प्रदेश की कानून व्यवस्था लंबे समय से धार्मिक तनावों को लेकर चुनौती झेल रही है। प्रशासन अक्सर नारे लगाने और पोस्टर चिपकाने वालों के खिलाफ सख्ती नहीं दिखाता, क्योंकि इसे धार्मिक भावनाओं से जुड़ा मामला बना दिया जाता है। लेकिन सवाल ये उठता है कि जब इस्लामी शिक्षाओं में चित्र और मूर्ति जैसी चीज़ों का कोई स्थान नहीं है, तो फिर इन पोस्टरों को धार्मिक स्वतंत्रता कैसे माना जा सकता है? यह स्पष्ट है कि प्रशासन की शिथिलता के कारण ही ये साज़िशें परवान चढ़ रही हैं। धार्मिक नारों और बैनरों का दूसरा बड़ा पहलू राजनीति से जुड़ा हुआ है। हर चुनावी मौसम में समुदाय विशेष की भावनाओं को भड़काकर वोट पाना एक आम चलन बन चुका है। आई लव मोहम्मद आंदोलन भी यही खेल लगता है। आम लोगों की आस्था को हथियार बनाकर न केवल वातावरण दूषित किया जा रहा है, बल्कि दंगे-फसादों का डर दिखाकर राजनैतिक गोलबंदी भी की जा रही है। इन घटनाओं के कारण समाज के आम नागरिक लगातार दहशत में जी रहे हैं। जिन इलाकों में पोस्टर लगाए जाते हैं, वहां तनाव फैल जाता है। दुकानें जल्दी बंद हो जाती हैं, दैनिक जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है और छोटे-छोटे बच्चों तक के मन में डर बैठ जाता है। बड़ों के दिमाग में यह सवाल गूंजता है कि यह प्यार दिखाने का तरीका है या दंगे भड़काने की चाल?  </p>
<p style="text-align:justify;">वहीं कई मुस्लिम विद्वानों ने खुलकर कहा है कि इस तरह के नारे और बैनर इस्लामी शिक्षा के खिलाफ हैं। पैग़म्बर मोहम्मद साहब से असली प्रेम उनका आदर्श जीवन अपनाने में है, न कि झंडे और पोस्टर लहराने में। लेकिन यही धार्मिक संदेश जब तक आम जनता तक सही रूप में नहीं पहुंचेगा, तब तक ये साज़िशें जारी रहेंगी। भारत का इतिहास धार्मिक उन्माद और दंगों से भरा पड़ा है। छोटी-सी चिंगारी बड़े विस्फोट में बदल जाती है। अंग्रेजों के जमाने से लेकर आज तक, फूट डालो और राज करो की नीति बार-बार दोहराई जाती रही है। फर्क बस इतना है कि अब राजनीति करने वाले आधुनिक तरीकों से यही काम कर रहे हैं। पोस्टर, बैनर और नारे इसी आधुनिक हथियार का हिस्सा हैं।  </p>
<p style="text-align:justify;">बहरहाल, कुल मिलाकर इस्लामी विद्वानों को आम जनता को समझाना होगा कि मोहम्मद साहब के नाम का उपयोग राजनीतिक मंसूबों के लिए करना पाप है। असली अनुसरण उनके जीवन मूल्यों को अपनाने में है।किसी भी समुदाय की आस्था की आड़ लेकर शहर की शांति बिगाड़ने वालों पर तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए। धार्मिक नारेबाज़ी के नाम पर पोस्टर या बैनर लगाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। समाज के सभी वर्गों को मिलकर यह समझना होगा कि ऐसे नारों के पीछे कौन-सी अंतरात्मा काम कर रही है। जब जनता खुद इन खेलों का शिकार नहीं बनेगी, तभी शांति कायम हो पाएगी। राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी’ राजनीति का आधार धार्मिक भावनाएँ नहीं, बल्कि विकास और न्याय होना चाहिए। इसके लिए जनता को कठोर सवाल करना आवश्यक है।  </p>
<p style="text-align:justify;">आई लव मोहम्मद जैसे नारों और पोस्टरों को देखने पर तत्कालीन भावनाएँ भले ही धार्मिक प्रेम की प्रतीक लगें, लेकिन असलियत में इनका इस्तेमाल समाज में नफरत फैलाने और दंगे भड़काने की साज़िश के रूप में किया जा रहा है। जब इस्लाम खुद पैग़म्बर साहब की तस्वीर तक हराम मानता है, तो ऐसे पोस्टर और नारे धर्म की सेवा नहीं बल्कि धर्म के नाम पर राजनीति करने का साधन हैं। शांति, भाईचारा और आपसी सम्मान ही असली संदेश है, जो इस्लाम समेत हर धर्म की आत्मा है। अगर उत्तर प्रदेश और देश को इन गहरी साज़िशों से बचाना है, तो समाज को सत्य पहचानना होगा और उस पर एकजुट होकर खड़ा होना होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-i-love-mohammads-reality-and-truth/article-16508</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-i-love-mohammads-reality-and-truth/article-16508</guid>
                <pubDate>Sat, 27 Sep 2025 14:27:19 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2025-09/resized-image---2025-09-27t142612.663.jpeg"                         length="43207"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[अजय कुमार, लखनऊ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Opinion: छात्र संघ चुनाव नतीजों का संदेश, जेन जेड मोदी के साथ</title>
                                    <description><![CDATA[दिल्ली और अन्य राज्यों में हुए छात्र संघ चुनावों में एबीवीपी की जीत ने साफ संकेत दिया है कि नई पीढ़ी मोदी और बीजेपी के विचारों के साथ जुड़ रही है। कांग्रेस और वामपंथी छात्र संगठन कमजोर होते दिख रहे हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-student-union-election-results-message-with-jane-z-modi/article-16446"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-09/resized-image---2025-09-24t162131.659.jpeg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">दिल्ली और कई राज्यों में हुए छात्र संघ चुनावों ने एक बार फिर देश की राजनीति के भविष्य की दिशा को लेकर बड़े संकेत दिए हैं। इस बार चुनावी नतीजों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का दबदबा साफ तौर पर देखने को मिला है, जबकि कांग्रेस से जुड़ी एनएसयूआई और वामपंथी दलों की छात्र इकाइयाँ बुरी तरह पिछड़ गईं। छात्र राजनीति को हमेशा से राष्ट्रीय राजनीति की नर्सरी माना जाता रहा है। यही वजह है कि इन नतीजों को केवल छात्र संघ की परिधि में सीमित कर नहीं देखा जा सकता, बल्कि इसका असर आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भी दिखाई देगा।छात्र राजनीति भारतीय लोकतंत्र का एक अहम आधार रही है। आज़ादी के बाद से ही विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में होने वाले छात्र संघ चुनाव के नतीजे यह बताते रहे हैं कि समाज की नई पीढ़ी किस दिशा में सोच रही है। यही कारण है कि एबीवीपी की कामयाबी को भारतीय जनता पार्टी के लिए एक बड़े उत्साहवर्धक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। हाल के वर्षों में जिस तरह से बीजेपी ने नई पीढ़ी में अपनी पकड़ मजबूत की है, यह नतीजे उसी अभियान के विस्तार की तरह माने जा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कहा जाता है कि विश्वविद्यालय का माहौल समाज का आईना होता है। दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में एबीवीपी की जीत इस बात की गवाही देती है कि युवाओं में राष्ट्रवादी सोच, सांस्कृतिक गौरव और भारतीय परंपरा के प्रति झुकाव तेजी से बढ़ा है। बीजेपी ने केंद्र की सत्ता में रहते हुए नीतियों और योजनाओं में युवाओं को लगातार प्राथमिकता दी है। स्टार्टअप इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया जैसे कार्यक्रमों ने युवाओं में विश्वास जगाया है कि सरकार उनके भविष्य को लेकर गंभीर है। यही भरोसा छात्र संघ चुनावों में सीधे-सीधे दिख रहा है।दूसरी ओर कांग्रेस और वामपंथी छात्र संगठनों की हालत लगातार कमजोर होती जा रही है। कांग्रेस नेतृत्व पर आरोप है कि वह नई पीढ़ी से संवाद स्थापित करने में नाकाम रही है। पार्टी जिस तरह से युवाओं की आकांक्षाओं और सपनों को समझने में चूक कर रही है, उसका परिणाम छात्र संघ चुनावों में साफ दिख रहा है। एनएसयूआई के पास वैचारिक स्पष्टता का अभाव है और संगठन की ज़मीनी पकड़ लगातार कमजोर हुई है। वामपंथी राजनीति की सबसे बड़ी समस्या यह रही है कि वह पुराने नारों और बोझिल विमर्श की जकड़ से बाहर नहीं निकल पा रही। बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा और आधुनिकता के बीच युवाओं को वामपंथी राजनीति में प्रेरणा कम, निराशा ज्यादा दिखाई देती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन चुनावों का बड़ा असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ता है। भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नई पीढ़ी को अपने साथ जोड़ने की जिस मुहिम पर काम कर रहे हैं, उसमें ऐसे नतीजे उनके लिए शक्ति गुणन की तरह हैं। एबीवीपी की जीत यह संदेश देती है कि विश्वविद्यालयों में राष्ट्रवादी विचारधारा गहराई से जड़ें जमा रही है, और वह आने वाले वर्षों में राजनीतिक तौर पर बीजेपी के लिए बैकअप शक्ति बन सकती है। मोदी का सबसे बड़ा लाभ यह है कि मौजूदा दौर में युवा स्वयं को पार्टी की नीतियों से जुड़ा हुआ महसूस कर रहा है। यह जुड़ाव केवल वोट बैंक की राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समाज में उस सोच की गहराई को बढ़ाएगा जिसे बीजेपी लंबे समय से विकसित कर रही है।कांग्रेस और वामपंथी दलों की हार से यह साफ झलक उभरती है कि उनके लिए आने वाले चुनाव और कठिन होंगे। यदि नई पीढ़ी उनका साथ छोड़ रही है, तो यह केवल चुनावी पराजय नहीं बल्कि उनके वैचारिक आधार को भी खोखला बना देगा। कांग्रेस को जिस तरह से लगातार राज्यों और केंद्र में हार का सामना करना पड़ा है, उसके पीछे एक बड़ी वजह युवाओं का मोहभंग है। अब छात्र संघ चुनावों के ये नतीजे उस प्रवृत्ति को और स्पष्ट कर रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजनीति में यह माना जाता है कि जो युवा को साध लेता है, वह भविष्य को साध लेता है। बीजेपी ने संगठित तरीके से एबीवीपी को मैदान में उतारा है और लगातार विश्वविद्यालयों में उसकी पकड़ मजबूत करने का काम किया है। यही वजह है कि आज एबीवीपी छात्र राजनीति की सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है। दूसरी तरफ एनएसयूआई और वाम छात्र संगठन बिखरी हुई रणनीति और कमजोर संगठन क्षमता के शिकार हैं।इन चुनाव नतीजों से यह भी साबित होता है कि देश का राजनीतिक मानस परिवर्तन की प्रक्रिया से गुजर रहा है। एक समय था जब दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे केंद्र वामपंथी राजनीति के गढ़ माने जाते थे। लेकिन आज वही संस्थान बदलते समय का संकेत दे रहे हैं। अब राष्ट्रीयता, सांस्कृतिक गौरव और आत्मनिर्भरता जैसे मुद्दे छात्रों की प्राथमिकता बन चुके हैं। यह बदलाव मोदी युग की राजनीतिक विचारधारा के अनुरूप है। आने वाले वर्षों में बीजेपी को इसका बहुत फायदा मिलेगा। जब ये छात्र पढ़ाई पूरी कर राजनीति, प्रशासन, मीडिया, टेक्नोलॉजी या किसी भी क्षेत्र में जाएंगे, तो उनकी सोच और झुकाव भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में काम करेगा। वही दूसरी तरफ कांग्रेस और वामपंथी दलों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा क्योंकि उनके पास नई पीढ़ी को आकर्षित करने का कोई कारगर तरीका नजर नहीं आ रहा।छात्र संघ चुनावों के नतीजे यह संदेश दे रहे हैं कि भारत की नई पीढ़ी मोदी और बीजेपी की राह पर बढ़ रही है। यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है, तो आगामी लोकसभा चुनाव में बीजेपी की शक्ति और व्यापक होगी, जबकि कांग्रेस और वामपंथी दल और किनारे लग जाएंगे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-student-union-election-results-message-with-jane-z-modi/article-16446</link>
                <guid>https://samridhjharkhand.com/opinion/opinion-student-union-election-results-message-with-jane-z-modi/article-16446</guid>
                <pubDate>Wed, 24 Sep 2025 16:22:42 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://samridhjharkhand.com/media/2025-09/resized-image---2025-09-24t162131.659.jpeg"                         length="48228"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[अजय कुमार, लखनऊ]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        