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                <title>Sunil Singh - Samridh Jharkhand</title>
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                <description>Sunil Singh RSS Feed</description>
                
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                <title>बीजेपी का अंदरूनी घमासान: आदित्य साहू ने सांसद ढुल्लू महतो की लगाई क्लास</title>
                                    <description><![CDATA[धनबाद की राजनीति में BJP के अंदरूनी विवाद ने तूल पकड़ लिया है। एक जिला अध्यक्ष के साथ कथित अपमानजनक व्यवहार के बाद मामला प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू तक पहुंचा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/dhanbad/bjps-internal-conflict-in-dhanbad-aditya-sahu-classed-mp-dhullu/article-20708"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-04/gg.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">धनबाद की राजनीति में मेयर संजीव सिंह और सांसद ढुल्लू महतो के बीच चल रही तनातनी के बीच एक खबर और भाजपा की अंदरूनी राजनीति में गरम है। यह मामला भाजपा के संगठन और सांसद ढुल्लू महतो से ही जुड़ा हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">धनबाद संसदीय क्षेत्र के एक जिला अध्यक्ष इनदिनों सांसद के व्यवहार से दुखी और आहत हैं। क्योंकि सांसद ने इनको अपमानित किया है। खरी खोटी सुनाई वह भी अपने दरवाजे पर। पिछले हफ्ते क्षेत्र के एक जिला अध्यक्ष सांसद से मिलने उनके घर पहुंचे। 3 घंटे तक मिलने के लिए बैठे रहे। बहुत आरजू मिनत के बाद सांसद निकले और अध्यक्ष को देखते ही गुस्से से लाल हो गए। खरी-खोटी सुनाई, भला बुरा कहा। कहा, संगठन में एक भी तेली समाज का आदमी नहीं है। आप लोग मनमानी करते हैं। ऐसे नहीं चलेगा। अध्यक्ष सांसद  का व्यवहार देखकर दंग रह गए। मुंह लटकाए और आंखें डबडबा कर तुरंत निकल गए। धनबाद से सीधे रांची आए और प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू के घर पहुंच गए।</p>
<p style="text-align:justify;"> आदित्य साहू को अपनी पीड़ा बताई और कहा, अब मैं जिला अध्यक्ष नहीं रहूंगा। मेरा इस्तीफा लीजिए। बहुत बेज्जती हुई। अपमानित किया गया। क्या इसीलिए आपने अध्यक्ष बनाया था। इतने दिनों से संगठन में गाली सुनने के लिए काम कर रहे हैं। आदित्य साहू के सामने जिला अध्यक्ष के आंसू निकल आए। कहा, जब अध्यक्ष को 3 घंटा इंतजार करना पड़ा तो कार्यकर्ता का हाल जान लीजिए।</p>
<p style="text-align:justify;">आदित्य साहू संगठन के आदमी हैं। जमीन से ऊपर उठकर आए हैं। उन्हें एक कार्यकर्ता का दर्द पता है। उन्होंने तत्काल सांसद महतो को फोन लगाया। जमकर क्लास ली। बहुत कुछ कह दिया। <br />बताया जा रहा है आदित्य साहू को कभी इतने गुस्से में नहीं देखा गया और न कभी किसी को इस तरह बोलते हुए। कहा, क्या एक समाज से पार्टी और संगठन चलेगा। जाति का नेता मत बनो। सर्व समाज का नेता बानो। यही हाल रहा तो आगे बहुत मुश्किल होगी। बहुत शिकायत मिलती है। हम भी तेली समाज से आते हैं। कार्यकर्ताओं को सम्मान देना पड़ेगा। आदित्य साहू गुस्से में बहुत सारी बातें कह गए जो यहां लिखना मुनासिब नहीं है। दरअसल धनबाद संसदीय क्षेत्र में तीन जिला अध्यक्ष हैं और इन तीनों अध्यक्षों को सांसद पसंद नहीं करते हैं। उनके मन के मुताबिक अध्यक्षों का चयन नहीं हुआ है। इसलिए वह नाराज रहते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>ताज़ा खबरें </category>
                                            <category>धनबाद</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 14:14:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sunil Singh]]></dc:creator>
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                <title>विष्णुगढ़ कांड से उठते सवाल, अपराध की चर्चा कम और भाजपा की अधिक</title>
                                    <description><![CDATA[हजारीबाग के विष्णुगढ़ (कुसुंबा गांव) में नाबालिग बच्ची की जघन्य हत्या ने झारखंड सहित पूरे देश को झकझोर दिया है। आरोपी भीम राम की राजनीतिक पृष्ठभूमि को लेकर छिड़ी बहस ने इस गंभीर अपराध को सियासी रंग दे दिया है, जहाँ विपक्षी दल भाजपा को घेर रहे हैं, वहीं भाजपा इसे बदनाम करने की साजिश बता रही है। नरबलि की थ्योरी और हत्या के क्रूर तरीके (गुप्तांग में छड़ी और दम घुटने) पर भी कई सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अपराधी को किसी पार्टी से जोड़कर देखने के बजाय फास्ट ट्रैक कोर्ट के माध्यम से उसे कड़ी सजा दिलाने पर ध्यान केंद्रित होना चाहिए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/jharkhand-crime-news-bhim-ram-bjp-link-denied-in-vishnugarh-murder-case/article-19967"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-04/bhim-ram.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>सुनील सिंह</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>रांची: </strong>हजारीबाग जिले के विष्णुगढ़ थाने की कुसुंबा गांव में नाबालिग बच्ची की हत्या के मामले में पुलिस ने जो खुलासा किया है वह सचमुच हैरान कर देने वाली घटना है। मानवता और रिश्तों को तार-तार करने वाली। निंदा के लिए शब्द नहीं। पुलिस के खुलासे के बाद कई सवाल भी उठ खड़े हुए हैं। पहला सवाल आरोपी भीम राम को ले और दूसरा सवाल नरबलि को लेकर। भीम राम को भाजपा का कार्यकर्ता बताया गया। भाजपा का नाम आते ही तूफान खड़ा हो गया। असम में चुनावी मुद्दा बन गया। मुख्यमंत्री से लेकर भाजपा के तमाम विरोधी दलों के नेता भीम राम के बहाने भाजपा को टारगेट करने में जुट गए। जघन्य अपराध की चर्चा थम गई। इधर, भाजपा ने मोर्चा संभाला और सफाई दी कि भीम राम भाजपा का कार्यकर्ता नहीं है। पार्टी को बदनाम किया जा रहा है। भाजपा इस मामले में पूरी तरह डिफेंसिव हो गई। इसके सिवाय कोई उपाय भी नहीं था। </p>
<p style="text-align:justify;">भीम राम के भाजपा से जुड़े होने को लेकर कई तस्वीर वायरल है। जिसमें वह पार्टी के बड़े नेताओं के साथ दिख रहा है। गले में भाजपा का पट्टा पहना हुआ है। यह सच भी हो कि वह पदाधिकारी न हो लेकिन कार्यकर्ता है। लेकिन क्या पूरे मामले को भीम राम और भाजपा से जोड़कर देखा जाए। क्या इससे अपराध कम हो जाएगा। अपराधी चाहे किसी पार्टी से जुड़ा हो वह अपराधी ही है। ऐसे हजारों लोग मिल जाएंगे जो किसी न किसी पार्टी से जुड़े रहते हैं और अंदर-अंदर अपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहते हैं। कोई पार्टी इससे अछूता नहीं है। इसलिए पार्टी से जोड़कर देखने के बजाय उसके अपराध और कारनामे को देखना चाहिए। </p>
<p style="text-align:justify;">कोई पार्टी या उसका बड़ा नेता किसी को यह नहीं कहता कि तुम अपराध करो और पार्टी को बदनाम करो। हालांकि कुछ अपवाद हो सकता है। लाखों कार्यकर्ता और समर्थक होते हैं ऐसे में कौन किस पृष्ठभूमि का है पता करना मुश्किल होता है। जब मामले का खुलासा होता है तभी पता चलता है इसलिए फोकस भीम राम जैसे लोगों पर नहीं अपराध पर होना चाहिए। दूसरा सवाल नरबलि को लेकर है। कुछ लोग और परिजन नरबलि की घटना को पुलिस की कहानी बता रहे हैं। झारखंड में ओझा- गुणी, नरबलि जैसी कुप्रथा गंभीर समस्या है। ऐसी घटनाएं अंधविश्वास और अशिक्षा के कारण होती हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">जैसा कि नाम है नरबलि यानी नर की बालि। इस मामले में बच्चों की बलि नहीं दी गई। गला नहीं काटा गया। बच्ची की मौत दम घुटने से हुई है। गला और नाक दबाने से बच्ची की मौत की पुष्टि हुई है। कहा गया कि सिर फाड़ कर खून चढ़ाया गया। बच्ची के गुप्तांग में छड़ी घुसाने की बात भी कही गई है। मामला जब नरबलि का है तो फिर छड़ी क्यों क्यों घुसाई गई। यह बिल्कुल अलग तरह का मामला है। </p>
<p style="text-align:justify;">इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की जरूरत है। ताकि संदेह की कोई गुंजाइश न रहे। घटना में शामिल सभी लोगों को जल्द से जल्द फांसी की सजा मिले। इसके लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया जाना चाहिए। मैं फिर कहता हूं कि अपराधियों की कोई जाति और पार्टी नहीं होती। वह अपराध ही होते हैं और किसी पार्टी के साथ जुड़ जाने से अपराध कम नहीं हो जाता। इसलिए चर्चा अपराध और अपराधी की होनी चाहिए न कि किसी पार्टी की।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 20:22:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sunil Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>नई भूमिका में दिख सकते हैं हरिवंश, मोदी दे सकते हैं कोई जिम्मेदारी: सुनील सिंह</title>
                                    <description><![CDATA[राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश जी को जदयू ने तीसरी बार उम्मीदवार नहीं बनाया है, जिससे उनके 9 अप्रैल को समाप्त हो रहे कार्यकाल के बाद नई भूमिका को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। अपनी विद्वता, बेदाग छवि और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से प्रगाढ़ संबंधों के कारण यह कयास लगाए जा रहे हैं कि केंद्र सरकार उन्हें कोई महत्वपूर्ण संवैधानिक या राजनीतिक जिम्मेदारी सौंप सकती है। बिहार के जातीय समीकरणों के कारण जदयू से टिकट न मिलने के बावजूद, हरिवंश जी का कद राष्ट्रीय राजनीति में अब भी काफी ऊंचा माना जा रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/harivansh-modi-can-be-seen-in-a-new-role-sunil/article-18520"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2026-03/08f3a12f-76cf-42c5-9fa3-11e66f080641_samridh_1200x720.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>रांची:</strong> राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश जी को लेकर स्थिति साफ हो गई। जदयू ने उन्हें तीसरी बार  उम्मीदवार नहीं बनाया। इसकी संभावना पहले से ही व्यक्त की जा रही थी। 9 अप्रैल को हरिवंश जी का कार्यकाल समाप्त होगा। इसके बाद उनकी भूमिका क्या होगी। उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर मेरे पास कोई पक्की सूचना तो नहीं है, लेकिन मेरी जितनी राजनीतिक समझ है उससे मैं उम्मीद करता हूं कि आने वाले दिनों में प्रधानमंत्री मोदी कोई न कोई जिम्मेदारी उन्हें दे सकते हैं। क्योंकि मोदी उन्हें पसंद करते हैं। हरिवंश जी विद्वान हैं। पढ़ने लिखने वाले हैं। इनके पास ज्ञान का अद्भुत भंडार है। कई चीजों पर मजबूत पकड़ है। बेदाग छवि है। राज्यसभा के उपसभापति का दायित्व भी उन्होंने बखूबी निभाया। </p>
<p style="text-align:justify;">कई देशों में भारत सरकार की ओर से देश का प्रतिनिधित्व किया। उपसभापति रहते हुए उनके संबंध मोदी के साथ-साथ भाजपा के बड़े नेताओं के साथ और प्रगाढ़ हुआ है। हरिवंश जी एक मात्र ऐसे उपसभापति रहे जिनका संबंध सभी राजनीतिक दलों के नेताओं से बेहतर रहा है। सरकार को कभी संकट में नहीं डाला। जदयू जब एनडीए से अलग हुआ तब हरिवंश जी ने उपसभापति के पद से इस्तीफा नहीं दिया। उन्होंने संवैधानिक पद और मर्यादा का ख्याल रखते हुए इस्तीफा नहीं देने की बात कही थी। इस्तीफा के लिए उन पर दबाव भी नहीं था। उस वक्त बीजेपी ने भी हरिवंश जी का साथ दिया। हरिवंश जी का कहीं कोई विरोध नहीं है। <br />बिहार की राजनीतिक स्थिति, जातीय समीकरण और जदयू की नीतियों की वजह से वह तीसरी बार उम्मीदवार नहीं बन सके। लेकिन मुझे विश्वास है कि आने वाले दिनों में हरिवंश जी किसी नई भूमिका में नजर आएंगे। मोदी कहीं न कहीं हरिवंश जी को अवसर दे सकते हैं। हरिवंश जी की भूमिका क्या होगी यह तय मोदी ही करेंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
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                <pubDate>Thu, 05 Mar 2026 22:04:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sunil Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>मिशन बंगाल में उतरी भाजपा, पर्दे के पीछे मुख्य रणनीतिकार बने सीआर पाटिल</title>
                                    <description><![CDATA[बिहार चुनाव में सफलता के बाद भाजपा ने मिशन बंगाल की तैयारी तेज कर दी है। पार्टी ने 150 नेताओं की टीम को बंगाल में तैनात किया है, जबकि पर्दे के पीछे मुख्य रणनीतिकार सीआर पाटिल पूरे अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/west-bengal/bjp-enters-mission-bengal-cr-patil-becomes-chief-strategist-behind/article-17263"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-12/resized-image---2025-12-02t121333.301.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>कोलकाता : </strong> बिहार विधानसभा चुनाव में मिली भारी सफलता से भाजपा उत्साहित है। भाजपा अब मिशन बंगाल की राह पर है। बंगाल फतह की तैयारी है। इसमें कितनी सफलता मिलेगी यह तो चुनाव परिणाम के बाद ही पता चलेगा। लेकिन भाजपा ने अभी से ही वहां अपनी तैयारी तेज कर दी है। मिशन बंगाल को लेकर 150 नेताओं की फौज बंगाल के विभिन्न जिलों में उतर चुकी है। इनमें अधिकांश पार्टी के बड़े नेता, विभिन्न राज्यों के सांसद और विधायक हैं।</p>
<p> बंगाल में अगले वर्ष अप्रैल में चुनाव होने की संभावना है। बिहार चुनाव परिणाम के तुरंत बाद भाजपा ने अपनी टीम को बंगाल में लगा दिया।  भारतीय जनता पार्टी के सबसे बड़े रणनीतिकार और मोदी-शाह के करीबी गुजरात भाजपा के अध्यक्ष सीआर पाटिल को बंगाल की जिम्मेदारी दी गई है। पर्दे के पीछे मुख्य रणनीतिकार सीआर पाटिल हैं। इनके नेतृत्व में ही पूरी टीम वहां काम कर रही है। पाटिल अपनी रणनीति का लोहा मनवा चुके हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार के चुनाव में भी पाटिल की सक्रिय भूमिका रही है।</p>
<p>पाटिल पर्दे के पीछे काम करते हैं। रणनीति बनाते हैं और उसे अमली जामा पहनाते हैं। मोदी और अमित शाह के सबसे करीबी और भरोसेमंद हैं।  मिशन बंगाल के तहत फिलहाल 6 संगठन सचिव और 6 वरिष्ठ नेताओं की अलग-अलग टीम काम कर रही है। चुनाव की तिथि जैसे-जैसे नजदीक आएगी, वैसे-वैसे नेताओं और कार्यकर्ताओं की टोली वहां पहुंचेगी। ग्रासरूट स्तर पर योजना बनाकर काम शुरू हो चुका है।</p>
<p> सूत्रों के अनुसार जिन नेताओं को मिशन बंगाल के तहत अभी लगाया गया है उनके नाम इस प्रकार हैं।  उत्तर बंगाल (अनंत नारायण मिश्रा), राढ़ (पवन साईं और धन सिंह रावत),  हावड़ा (पवन राणा और संजय भाटिया), मेदिनीपुर (जेपीएस राठौर), दक्षिण 24 परगना (एम सिद्धार्थन और सीटी रवि),  सिलीगुड़ी (अरुण बिन्नादी ,राजीव कुमार ओझा)।  गृहमंत्री अमित शाह अब लगातार हर महीने बंगाल का दौरा करेंगे। इसके साथ पार्टी के अन्य नेता भी बंगाल के दौरे पर जाएंगे। पीएम मोदी का भी कार्यक्रम तैयार हो रहा है।</p>
<p>भाजपा इस बार बंगाल में करो और मरो की नीति पर काम करने की तैयारी कर रही है। पश्चिम बंगाल से ममता बनर्जी को उखाड़ फेंकने में भाजपा को कितनी सफलता मिलेगी यह देखना होगा। क्योंकि टीएमसी बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती है। ममता बनर्जी को सत्ता से बाहर करना मुश्किल है। इधर, टीएमसी ने भी अपनी तैयारी शुरू कर दी है। फिलहाल तो एसआईआर के मुद्दे पर ही टीएमसी और भाजपा में टकराव की स्थिति है</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>ओपिनियन</category>
                                            <category>पश्चिम-बंगाल</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 02 Dec 2025 12:26:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sunil Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>डीजीपी अनुराग गुप्ता को क्यों देना पड़ा इस्तीफा, क्या है पर्दे के पीछे की कहानी?</title>
                                    <description><![CDATA[ विनय चौबे को एसीबी ने गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था। तीन महीने के अंदर एसीबी ने विनय चौबे के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट दाखिल नहीं किया। इसका लाभ विनय चौबे को मिला और शराब घोटाले में उन्हें जमानत मिल गई। हालांकि अभी वह जमीन घोटाले के मामले में जेल में ही हैं।  ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/why-did-dgp-anurag-gupta-have-to-resign-what-is/article-16922"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-11/resized-image---2025-11-07t202324.889.jpeg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>रांची: </strong>19 सितंबर को जब राज्य सरकार ने अपने भरोसेमंद डीजीपी अनुराग गुप्ता से एसीबी का प्रभाव वापस ले लिया था, तब मैंने उसी दिन एक पोस्ट में लिखा था कि अनुराग गुप्ता को अचानक हटाए जाने के फैसले के पीछे बड़ी कहानी है। इसके तार शराब घोटाले में शामिल वरिष्ठ आईएएस अधिकारी विनय चौबे से जुड़े हुए हैं। विनय चौबे शराब घोटाले के आरोपी हैं। विनय चौबे को एसीबी ने गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था। तीन महीने के अंदर एसीबी ने विनय चौबे के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट दाखिल नहीं किया। इसका लाभ विनय चौबे को मिला और शराब घोटाले में उन्हें जमानत मिल गई। हालांकि अभी वह जमीन घोटाले के मामले में जेल में ही हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सरकार ने माना कि चार्जशीट दाखिल नहीं करने के पीछे डीजीपी अनुराग गुप्ता का हाथ है। क्योंकि यही एसीबी के प्रभार में थे। बावजूद चार्जशीट दाखिल नहीं की गई। इस मामले में सरकार की खूब किरकिरी हुई। कार्यशैली पर सवाल उठाए गए। विनय चौबे की गिरफ्तारी से आईएएस अधिकारियों में नाराजगी है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मैंने यह भी लिखा था कि अब देखिए आगे क्या होता है। यह बात सच साबित हुई और डीजीपी अनुराग गुप्ता को इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया। सरकार के दबाव पर उन्होंने इस्तीफा दिया है। सरकार से टकराव लेना उन्हें भारी पड़ा। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जिस अनुराग गुप्ता के लिए राज्य सरकार ने नया नियम कानून बनाया। केंद्र सरकार से टकराव लिया। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का सामना किया। उन्हें रिटायरमेंट के बाद दो साल के लिए एक्सटेंशन दिया। आखिर भरोसेमंद डीजीपी के साथ ऐसा क्या हो गया कि उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। इसके पीछे बहुत कहानी बताई जा रही है। कई राज भी हैं। मनमानी तरीके से काम करने के साथ-साथ भ्रष्टाचार से जुड़े  कई मामले हैं। मामला इतना आगे बढ़ गया कि सरकार को अपने भरोसेमंद डीजीपी से इस्तीफा लेना पड़ा। नाक के बाल बन गए अनुराग गुप्ता को सरकार ने चलता कर दिया। हजारीबाग के जमीन घोटाले में विनय चौबे के साथ अभियुक्त बनाए गए नेक्स्टजेन के मालिक व बड़े कारोबारी विनय सिंह की गिरफ्तारी  को भी एक कारण माना जा रहा है। विनय सिंह की पहुंच सरकार टॉप लेवल तक है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डीजीपी की नई नियुक्ति में भी सरकार ने वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों की अनदेखी कर तदाशा मिश्र पर भरोसा जताया है। सीनियरिटी के मामले में कोई सवाल न उठे इसलिए सरकार ने तदाशा मिश्र को प्रभारी डीजीपी ही नियुक्त किया है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">झारखंड गठन के बाद पहली बार किसी महिला पुलिस अधिकारी को डीजीपी नियुक्त किया गया है। तदाशा मिश्र को बहुत-बहुत बधाई।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 07 Nov 2025 20:25:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sunil Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पूर्व मंत्री केएन त्रिपाठी की सुरक्षा हटी, निजी सुरक्षाकर्मी चल रहे साथ, सरकार पर लगाया साजिश का आरोप</title>
                                    <description><![CDATA[<p>पूर्व मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता केएन त्रिपाठी की सुरक्षा की जिम्मेदारी से राज्य सरकार ने हाथ खींच लिया है। सुरक्षा कर्मियों के साथ हुए विवाद के बाद से केएन त्रिपाठी की सुरक्षा में अब कोई भी पुलिसकर्मी नहीं है। अब उनकी सुरक्षा कार्यकर्ताओं के जिमे है। केएन त्रिपाठी संभवत राज्य के ऐसे पहले पूर्व मंत्री हैं जिनकी सुरक्षा में कोई पुलिसकर्मी तैनात नहीं है।</p>
<p>डाल्टनगंज में मंगलवार की रात केएन त्रिपाठी से एक कार्यक्रम में मुलाकात हुई। मैंने देखा कि उनकी सुरक्षा में तीन-चार निजी सुरक्षाकर्मी आधुनिक हथियारों से लेस आगे पीछे चल रहे हैं। निजी सुरक्षा कर्मियों को</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/security-of-former-minister-kn-tripathi-removed-private-security-personnel/article-16884"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-11/resized-image-(9).jpeg" alt=""></a><br /><p>पूर्व मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता केएन त्रिपाठी की सुरक्षा की जिम्मेदारी से राज्य सरकार ने हाथ खींच लिया है। सुरक्षा कर्मियों के साथ हुए विवाद के बाद से केएन त्रिपाठी की सुरक्षा में अब कोई भी पुलिसकर्मी नहीं है। अब उनकी सुरक्षा कार्यकर्ताओं के जिमे है। केएन त्रिपाठी संभवत राज्य के ऐसे पहले पूर्व मंत्री हैं जिनकी सुरक्षा में कोई पुलिसकर्मी तैनात नहीं है।</p>
<p>डाल्टनगंज में मंगलवार की रात केएन त्रिपाठी से एक कार्यक्रम में मुलाकात हुई। मैंने देखा कि उनकी सुरक्षा में तीन-चार निजी सुरक्षाकर्मी आधुनिक हथियारों से लेस आगे पीछे चल रहे हैं। निजी सुरक्षा कर्मियों को देखकर मैं चौंक गया। मैंने उनसे पूछा, सरकारी सुरक्षाकर्मी क्यों नहीं हैं? कहां गए। इस पर त्रिपाठी ने कहा कि सरकार मेरी हत्या करना चाहती है। मेरी आवाज दबाना चाहती है।  कई पुलिस अधिकारी भी ऐसा जिसमें साजिश में शामिल हैं। प्रोटोकॉल के अनुसार मेरी सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की है। लेकिन सरकार ने सुरक्षा कर्मियों को हटा लिया। मेरी सुरक्षा की सरकार को चिंता नहीं है।</p>
<p>पिछले दिनों एक साजिश के तहत मुझ पर सुरक्षाकर्मियों से मारपीट करने का आरोप लगाया गया। सुरक्षाकर्मियों ने मेरे ऊपर हरिजन एक्ट सहित अन्य मुकदमे दायर किए। यह सब साजिश का हिस्सा था। </p>
<p>निजी सुरक्षाकर्मियों के सवाल पर उन्होंने कहा कि कोई सुरक्षा कर्मी नहीं है। यह कांग्रेसी कार्यकर्ता हैं, और खुद हमारी सुरक्षा में लगे। डाल्टनगंज क्षेत्र की जनता ही भाग्य विधाता है और सुरक्षा की जिम्मेदारी जनता पर ही है। मैं किसी से डरने वाला नहीं हूं। मेरे साथ कार्यकर्ता ही साथ चलते हैं और इसके लिए मैं कोई भुगतान नहीं करता। अपनी स्वेच्छा से कुछ कांग्रेसी कार्यकर्ता हथियार लेकर मेरे साथ चलते हैं। </p>
<p>उन्होंने कहा कि केएन त्रिपाठी की आवाज दबने वाली नहीं है। वह गलत कार्यों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करते रहेंगे । सरकार ने मेरी सुरक्षा क्यों हटाई ? मेरे साथ क्यों साजिश की गई इसका जवाब सरकार को देना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 04 Nov 2025 20:49:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sunil Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नहीं रहे गरीबों के भगवान, ₹5 फीस वाले डॉ सुरेंद्र सिंह, जानिए इनका कर्म</title>
                                    <description><![CDATA[पलामू के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. सुरेंद्र सिंह, जिन्हें लोग “गरीबों का भगवान” कहते थे, का निधन हो गया। वे वर्षों तक मात्र ₹5 फीस लेकर मरीजों का इलाज करते थे और कई बार गरीब मरीजों से कोई शुल्क नहीं लेते थे। सादगी, ईमानदारी और सेवा भाव के प्रतीक डॉ. सिंह ने अपना पूरा जीवन मानवता की सेवा में समर्पित कर दिया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/palamu/dr-surendra-singh-the-god-of-the-poor-is-no/article-16817"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-10/resized-image---2025-10-25t115231.149.jpeg" alt=""></a><br /><div><strong>पलामू:</strong> जिले के प्रसिद्ध चिकित्सा डॉक्टर सुरेंद्र सिंह नहीं रहे। यह एक सामान्य सी लगने वाली खबर है। क्योंकि दुनिया में जो आया है उसे जाना ही है। यही अंतिम सत्य है। लेकिन कौन क्या करके गया। क्या था। समाज को क्या दिया। उसकी अपनी पहचान क्या थी। कर्म कैसे थे। लोग इसी की चर्चा करते हैं, और याद करते हैं। </div>
<div>सुरेंद्र सिंह डॉक्टर थे। लेकिन पेशेवर नहीं थे। सौदागर नहीं थे। मरीजों का खून नहीं चूसते थे। कभी धोखा नहीं दिया। फरेब नहीं किया। अनावश्यक जांच नहीं। उनके दरवाजे मरीज के लिए 24 घंटे खुले रहते थे। आने जाने में कहीं कोई बंदिश नहीं। कोई इगो प्रॉब्लम नहीं। </div>
<div> </div>
<div>चिकित्सक को धरती पर भगवान का दर्जा प्राप्त है। डॉ सुरेंद्र सिंह इन्हीं में से थे। वह गरीबों के भगवान थे। उनकी फीस सुनकर आपको यकीन नहीं होगा । आपको लगेगा वह डॉक्टर नहीं थे  क्या? एमबीबीएस की डिग्री नहीं थी। अनुभव नहीं था। क्या आखिर क्यों उनकी फीस ₹5 थी। आजकल तो डॉक्टरों की फीस 2 से 3 हजार तक है। मरीज डॉक्टर के पास जाने से डरते हैं। पता नहीं कितने रुपए लग जाएंगे। कितनी जांच करानी पड़ेगी। गरीब हैं तो घर द्वार, बैल-बकरी, गहना- जेवर खेत जमीन बिक जाएगी। लेकिन सुरेंद्र सिंह ने ऐसा कुछ नहीं किया न कराया। इसलिए उन्हें आप धरती पर भगवान का दर्जा दे सकते हैं। </div>
<div> </div>
<div>पलामू के हैदरनगर में वह लंबे समय तक रहे। यहां उनकी फीस ₹5 थी। यदि पूरे दिन में 100 मरीजों को दिखा तो 50 तो मुफ्त वाले थे। अपने गांव देहात के मरीजों से फीस लेने की तो वह सोच भी नहीं सकते थे। किसी ने देने की कोशिश की तो हाथ जोड़ लिया। लंबे समय तक रमना, नगर ऊंटरी में भी सेवा दी। यहां भी यही व्यवहार था। </div>
<div>अस्वस्थता और उम्र के कारण जब हैदरनगर छोड़कर डाल्टनगंज रहने लगे तो मरीज यहां भी आते थे। यहां के एक निजी अस्पताल ने उनसे सेवा देने का आग्रह किया। लेकिन उन्होंने कहा कि फीस ₹5 ही रखिए। लेकिन अस्पताल प्रबंधन ने कहा कि ₹5 में क्या होगा। कैसे चलेगा अस्पताल। बाद में अस्पताल प्रबंधन के दबाव में वह ₹50 फीस पर सेवा देने को तैयार हुए। </div>
<div> </div>
<div>डॉ सुरेंद्र सिंह का जन्म बिश्रामपुर थाने के मुरमा गांव में एक सामान्य परिवार में हुआ था। गरीबों का दर्द क्या होता है वह अच्छी तरह जानते थे। बड़ी मुश्किल से उनकी पढ़ाई- लिखाई हुई थी। </div>
<div> </div>
<div>वह रिश्तों को भी काफी महत्व देते थे। अपने लोगों से फीस लेने की कभी उन्होंने सोचा भी नहीं। रहन सहन, जीवन शैली एकदम सामान्य। कभी लगा नहीं कि वह डॉक्टर हैं। इनके बारे में जितना लिखा जाए कम ही होगा। मुझे लगता है ऐसे ही  डॉक्टरों के व्यवहार विचार और समर्पण के कारण ही धरती पर इन्हें भगवान कहा गया।</div>
<div> </div>
<div> </div>
<div> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>पलामू</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

                <link>https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/palamu/dr-surendra-singh-the-god-of-the-poor-is-no/article-16817</link>
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                <pubDate>Sat, 25 Oct 2025 11:53:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sunil Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>झारखंड में झामुमो के सामने क्या है रास्ता, समझिए गणित</title>
                                    <description><![CDATA[बिहार में झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ धोखा हुआ है। गहरा जख्म मिला है। धोखा भी ऐसा कि पार्टी कहीं का नहीं रही। चुनाव लड़ने के ऐलान के बाद पार्टी को फैसला बदलना पड़ा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/bihar/patna/what-is-the-path-in-front-of-jmm-in-jharkhand/article-16791"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-10/jharkhand-chief-minister-hemant-soren-135847968-1x1-(1).jpg" alt=""></a><br /><p>बिहार चुनाव की गर्माहट झारखंड में भी महसूस की जा रही है। यहां की राजनीति भी नई करवट लेने को तैयार दिख रही है। राजनीति में कब क्या हो जाए, कौन किसके साथ चला जाए, कहना मुश्किल है। बिहार में झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ धोखा हुआ है। गहरा जख्म मिला है। धोखा भी ऐसा कि पार्टी कहीं का नहीं रही। चुनाव लड़ने के ऐलान के बाद पार्टी को फैसला बदलना पड़ा। पार्टी चुनाव से ही बाहर हो गई। महागठबंधन से अलग होने का फैसला लेना पड़ा। </p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>अब झामुमो आगे क्या करेगा, क्या है रास्ता</strong></span></h4>
<p>झामुमो को धोखा कांग्रेस और राजद ने मिलकर दिया है। इसलिए झारखंड में भी गठबंधन तोड़ने का ऐलान करे। अपमान का बदला लेने के लिए कांग्रेस और राजद से गठबंधन तोड़ना होगा। सिर्फ राजद को आउट करने से बदला नहीं चुकेगा।</p>
<p>झामुमो अगर गठबंधन तोड़ता है तो फिर उसके सामने दो विकल्प होंगे। एक तो वह कांग्रेस और राजद के विधायकों को अपने पाले में कर ले और दोनों पार्टियों में टूट हो जाए। विधायकों की बड़ी संख्या झामुमो के साथ हो जाए। </p>
<p>हेमंत सोरेन अब राजनीति के पक्के खिलाड़ी हो गए हैं। उन्हें दावपेच मालूम हो चुका है। इसलिए दोनों पार्टियों को तोड़कर झामुमो में मिला लेना कोई बड़ी बात नहीं है। यह काम आसानी से हो जाएगा। क्योंकि कांग्रेस और राजद के विधायकों को पता है कि वह झामुमो के कंधे पर सवार होकर ही विधायक बने हैं। इन दोनों पार्टियों की झारखंड में कोई खास वजूद नहीं है। पार्टी के बदले दोनों दलों में कुछ ऐसे विधायक हैं जिनका इलाके में अपना प्रभाव है। इसका लाभ पार्टियों को मिलता है। <br /> बहुत संभव है हेमंत सोरेन इसी राह पर चलें। नहीं तो झारखंड में अभी की तरह सरकार चलती रहे। गठबंधन तोड़ने का भय दिखाकर झारखंड मुक्ति मोर्चा कांग्रेस और राजद पर दबाव बनाए रखेगा, और हेमंत सोरेन अपने हिसाब से सरकार चलाएंगे। अभी वह चला भी रहे हैं। सरकार में कांग्रेस और राजद की कोई खास चलती नहीं है।</p>
<p>दूसरी संभावना यह है कि झामुमो गठबंधन तोड़कर भाजपा के साथ चला जाए। भाजपा चुनाव के बाद से ही इस दिशा में प्रयासरत है। भाजपा के कई बड़े नेता और रणनीतिकार हेमंत सोरेन से संपर्क में हैं। ऐसे लोग मौके की तलाश में हैं कि कब हेमंत सोरेन गठबंधन से बाहर होकर हमारे साथ हाथ मिला लें । </p>
<p>अब आगे का रास्ता तय करने का फैसला हेमंत सोरेन को लेना है। इसके लिए बिहार चुनाव का परिणाम और नवंबर महीने तक इंतजार करना होगा। </p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>चुनाव लड़ने से पीछे क्यों हटा झामुमो</strong></span></h4>
<p>झारखंड मुक्ति मोर्चा एक दर्जन सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा तो कर रहा था लेकिन जमीन पर उसकी तैयारी पूरी नहीं थी। वह गठबंधन के भरोसे ही चुनाव लड़ना चाहता था। दो-तीन सीटों की उम्मीद थी। लेकिन एक भी सीट नहीं मिली तो जेएमएम ने चुनाव मैदान छोड़ दिया। यह अच्छा ही फैसला है। क्योंकि यदि पार्टी चुनाव में जाती और वोट नहीं लाती तो किरकिरी होती। इसलिए मैदान से बाहर रहकर अपनी इज्जत बचा ली। अब कहने को बहुत कुछ मौका मिलेगा।</p>
<p>राजद के कुछ सूत्रों का कहना है कि झारखंड में विधानसभा चुनाव के दौरान तेजस्वी यादव को झामुमो के कुछ नेताओं ने अपमानित किया था। सीट लेने के लिए उन्हें कई दिनों तक रांची में रहना पड़ा था। इसी का बदला उन्होंने बिहार में लिया है। बहरहाल आप सबकी नजरें झामुमो के अगले कदम पर है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>पटना</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>बिहार</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 21 Oct 2025 09:48:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sunil Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>इंतजार था अध्यक्ष का, मिल गया कार्यकारी अध्यक्ष, रविंद्र राय किए गए किनारे, आदित्य साहू का बढ़ा कद </title>
                                    <description><![CDATA[<p>झारखंड भाजपा को स्थायी प्रदेश अध्यक्ष के बदले कार्यकारी अध्यक्ष मिल गया। कार्यकर्ता करीब सालभर से अध्यक्ष की उम्मीद लगाए बैठे थे, लेकिन लंबे इंतजार के बाद भी कार्यकारी अध्यक्ष से ही संतोष करना पड़ेगा। अध्यक्ष के लिए अभी और इंतजार करना होगा। अब बिहार चुनाव के बाद ही फैसला होगा। राष्ट्रीय अध्यक्ष का मामला भी लंबे समय से लटका हुआ है। </p>
<p>केंद्रीय नेतृत्व ने राज्यसभा सांसद आदित्य साहू को रविंद्र राय की जगह कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया है। बाबूलाल मरांडी अभी अध्यक्ष का दायित्व निभाते रहेंगे। जब कागजों पर प्रदेश में संगठनात्मक चुनाव की प्रक्रिया लंबे समय से चल</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/politics/waiting-for-the-president-the-executive-chairman-ravindra-rai-was/article-16531"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-10/resized-image-(61).jpeg" alt=""></a><br /><p>झारखंड भाजपा को स्थायी प्रदेश अध्यक्ष के बदले कार्यकारी अध्यक्ष मिल गया। कार्यकर्ता करीब सालभर से अध्यक्ष की उम्मीद लगाए बैठे थे, लेकिन लंबे इंतजार के बाद भी कार्यकारी अध्यक्ष से ही संतोष करना पड़ेगा। अध्यक्ष के लिए अभी और इंतजार करना होगा। अब बिहार चुनाव के बाद ही फैसला होगा। राष्ट्रीय अध्यक्ष का मामला भी लंबे समय से लटका हुआ है। </p>
<p>केंद्रीय नेतृत्व ने राज्यसभा सांसद आदित्य साहू को रविंद्र राय की जगह कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया है। बाबूलाल मरांडी अभी अध्यक्ष का दायित्व निभाते रहेंगे। जब कागजों पर प्रदेश में संगठनात्मक चुनाव की प्रक्रिया लंबे समय से चल रही है, तब अचानक रविंद्र राय को कार्यकारी अध्यक्ष से हटाकर आदित्य साहू को क्यों कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया, फिलहाल इसकी जानकारी नहीं मिल सकी है। लेकिन इसकी कोई न कोई वजह तो जरूर है जो देर सवेर सामने आएगी।  पिछले साल विधानसभा चुनाव के दौरान जब रविंद्र राय की नाराजगी की खबरें आई तो उन्हें मनाने के लिए तत्काल कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया था। अब जब अध्यक्ष की नियुक्ति की घोषणा होनी है तब ऐसे में रविंद्र राय को क्यों हटाया गया यह बड़ा सवाल है? </p>
<p>विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद ऐसी संभावना व्यक्त की जा रही थी कि पार्टी अब हार से सबक लेते हुए संगठन में  बड़ा फेरबदल करेगी। लेकिन अभी तक कोई निर्णय नहीं हो सका पार्टी अनिर्णय की स्थिति में है।</p>
<p>पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास जब ओडिशा के राज्यपाल का पद त्याग कर सक्रिय राजनीति में झारखंड लौटे तो ऐसी संभावना व्यक्त की जा रही थी कि उन्हें कोई बड़ा दायित्व दिया जाएगा। प्रदेश अध्यक्ष बनाया जा सकता है। लेकिन इस पर भी कोई फैसला नहीं हुआ। रघुवर दास को कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई। नई जिम्मेदारी की उम्मीद लगाए रघुवर दास ने राजपाल का पद भी छोड़ दिया और इधर भी कोई फैसला नहीं हुआ। </p>
<p>विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी में  जो जड़ता आई थी वह अब तक कायम है। अभी तक मंडल अध्यक्ष और जिला अध्यक्ष का चुनाव नहीं हो सका है। यह प्रक्रिया लंबे समय से चल रही है। बहरहाल पार्टी ने राज्यसभा सांसद आदित्य साहू को कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर उन्हें बड़ी जिम्मेदारी दी है। आदित्य साहू का नाम प्रदेश अध्यक्ष के लिए भी चल रहा था। वर्तमान में महासचिव हैं और प्रदेश भाजपा का अधिकांश कार्यभार यही संभालते हैं। संगठन का लंबा अनुभव है। रघुवर दास सहित पार्टी के बड़े नेताओं से अच्छे संबंध हैं। ओबीसी समुदाय से आते हैं। झारखंड में अब भाजपा ओबीसी समाज पर ही फोकस कर रही है। आदित्य साहू इसके उदाहरण हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Oct 2025 15:48:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sunil Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मंत्री इरफान अंसारी ने भानु प्रताप शाही को चाय पर बुलाया, कहा, मुझे बार-बार क्यों टारगेट करता है और मंत्री नहीं हैं?</title>
                                    <description><![CDATA[<p>स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री भाजपा के फायर ब्रांड नेता भानु प्रताप शाही के बीच लंबे समय से कहासुनी होती रही है। दोनों नेता एक दूसरे को देख लेने की धमकी तक देते रहे हैं। चुनौती दर चुनौती का यह सिलसिला लंबे समय से चल रहा है।</p>
<p>दो दिन पहले यह विवाद और बढ़ गया जब इरफान अंसारी ने भानु प्रताप शाही को गैर झारखंडी और दारूबाज कहा। भानु प्रताप शाही ने पलटवार करते हुए इरफान अंसारी को करारा जवाब दिया। पिता-पुत्र दोनों को दारूबाज कहा। विवाद बढ़ने के बाद एक सामाजिक कार्यकर्ता ने मंत्री इरफान अंसारी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/news/politics/minister-irfan-ansari-called-bhanu-pratap-shahi-on-tea-why/article-15982"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-09/resized-image-(10).jpeg" alt=""></a><br /><p>स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री भाजपा के फायर ब्रांड नेता भानु प्रताप शाही के बीच लंबे समय से कहासुनी होती रही है। दोनों नेता एक दूसरे को देख लेने की धमकी तक देते रहे हैं। चुनौती दर चुनौती का यह सिलसिला लंबे समय से चल रहा है।</p>
<p>दो दिन पहले यह विवाद और बढ़ गया जब इरफान अंसारी ने भानु प्रताप शाही को गैर झारखंडी और दारूबाज कहा। भानु प्रताप शाही ने पलटवार करते हुए इरफान अंसारी को करारा जवाब दिया। पिता-पुत्र दोनों को दारूबाज कहा। विवाद बढ़ने के बाद एक सामाजिक कार्यकर्ता ने मंत्री इरफान अंसारी को फोन करके उनके बयान के लिए याद दिलाते हुए ऐसा न करने की नसीहत दी।</p>
<p>इसके बाद मंत्री ने क्या कहा, क्या सफाई दी, यह आप भी सुनिए। इरफान अंसारी दिल के सच्चे इंसान, सरल और मददगार हैं। लेकिन बेचारे मीडिया के सामने ऐसा कुछ बार-बार बोल देते हैं जिसकी वजह से वह विवादों में फंस जाते हैं। कैमरे के सामने अपने को रोक नहीं पाते। कैमरा उनकी कमजोरी है। इसके बाद उनका किया धरा पर पानी फिर जाता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Sep 2025 16:06:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sunil Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नीरज सिंह हत्याकांड में पूर्व विधायक संजीव सिंह सहित सभी आरोपी बरी, तो हत्यारा कौन, अनुसंधान सवालों के घेरे में</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>रांची:</strong> धनबाद के बहुचर्चित पूर्व डिप्टी मेयर नीरज सिंह हत्याकांड का फैसला आ गया। कोर्ट को फैसला सुनाने में 8 साल 6 महीने का समय लगा। कोर्ट ने इस मामले में पूर्व विधायक संजीव सिंह सहित सभी 10 आरोपियों को ठोस सबूत के अभाव में बरी कर दिया। इस फैसले ने एक गंभीर सवाल भी खड़ा कर दिया है। कोर्ट के फैसले से यह साबित हो गया कि हत्याकांड में संजीव सिंह और अन्य आरोपियों की कोई भूमिका नहीं थी। बावजूद सभी आरोपी लंबे समय तक जेल की सजा काटते रहे। आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है। संजीव सिंह तो</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/dhanbad/all-the-accused-including-former-mla-sanjeev-singh-in-the/article-15831"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-08/img-20250827-wa0029.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>रांची:</strong> धनबाद के बहुचर्चित पूर्व डिप्टी मेयर नीरज सिंह हत्याकांड का फैसला आ गया। कोर्ट को फैसला सुनाने में 8 साल 6 महीने का समय लगा। कोर्ट ने इस मामले में पूर्व विधायक संजीव सिंह सहित सभी 10 आरोपियों को ठोस सबूत के अभाव में बरी कर दिया। इस फैसले ने एक गंभीर सवाल भी खड़ा कर दिया है। कोर्ट के फैसले से यह साबित हो गया कि हत्याकांड में संजीव सिंह और अन्य आरोपियों की कोई भूमिका नहीं थी। बावजूद सभी आरोपी लंबे समय तक जेल की सजा काटते रहे। आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है। संजीव सिंह तो गंभीर रूप से बीमार भी हैं। लंबे समय से उनका इलाज चल रहा है। जब सभी आरोपी बरी कर दिए गए तो यह सवाल उठता है कि हत्या किसने की। यह बड़ा सवाल है। नीरज सिंह सहित चार लोगों की हत्या तो हुई थी। तो हत्यारे कौन थे। क्या पुलिस अंधेरे में तीर मारती रही। <br /> </p>
<p>शक और राजनीतिक प्रतिद्वंदिता को आधार मानकर संजीव सिंह एवं उनके लोगों को गिरफ्तार कर इस हत्याकांड की जांच करती रही और असली अपराधी पकड़े नहीं गए। यानी हत्या करने वाले जेल से बाहर और निर्दोष लोग जेल के अंदर। <br />     </p>
<p>इस हत्याकांड ने केवल धनबाद बल्कि पूरे झारखंड को झकझोर कर रख दिया था। इसके तार बिहार और यूपी तक जुड़े। यूपी से शूटरों की गिरफ्तारी हुई। जांच के लिए गठित एसआईटी ने काफी सबूत जुटाए। गवाहों को खड़ा किया। कोर्ट में लंबी सुनवाई हुई लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। सभी आरोपी बरी हो गए। यह पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल है। </p>
<p> </p>
<p>नीरज सिंह हत्याकांड को राजनीतिक प्रतिद्वंदिता और वर्चस्व की लड़ाई का नतीजा माना गया। जांच की केंद्र बिंदु भी यही थी। <br /> हत्याकांड सिंह मेंशन और रघुकुल की लड़ाई बन गई। दो परिवार आपस में खून के प्यास हो गए। खून का रिश्ता तारतार हो गया। नीरज सिंह की हत्या के बाद उनकी पत्नी पूर्णिमा नीरज सिंह कांग्रेस के टिकट पर झरिया से विधायक चुनी गईं। तब इनको सहानुभूति का लाभ मिला। आरोपी संजीव सिंह की पत्नी रागिनी सिंह भाजपा के टिकट पर चुनाव हार गईं। जनता ने हत्याकांड के लिए संजीव सिंह को दोषी मानते हुए रागिनी सिंह को चुनाव में हरा दिया। </p>
<p>   </p>
<p>24 के विधानसभा चुनाव में रागिनी सिंह को जनता ने विधायक चुना। पूर्णिमा नीरज सिंह को हार का सामना करना पड़ा। क्योंकि संजीव सिंह की बीमारी और लंबे समय तक जेल में रहने के कारण इस बार सहानुभूति का लाभ रागिनी सिंह को मिला। </p>
<p>राजनीतिक लड़ाई अपनी जगह। लेकिन आखिर नीरज सिंह का हत्यारा कौन है। पुलिस को अब इसका जवाब देना पड़ेगा। इस केस में गवाही सहित कई प्रक्रिया उस वक्त पूरी हुई जब पूर्णिमा विधायक थीं। वह भी सत्ताधारी दल की। सत्ता की पहुंच और हनक से सब लोग वाकिफ हैं।<br />जल्द ही इस फैसले को नीरज सिंह का परिवार ऊपरी अदालत में चुनौती देगा। अब हाई कोर्ट का फैसला क्या आता है यह देखना होगा। फैसले से जहां सिंह मेंशन में खुशी है वहीं रघुकुल में सन्नाटा पसरा हुआ है। इस मामले में धनबाद की राजनीति भी गर्म हो गई है</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>अपराध</category>
                                            <category>धनबाद</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 28 Aug 2025 11:01:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sunil Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>क्या सिरम टोली फ्लाईओवर निर्माण की तरह नगड़ी में भी अपने फैसले पर अडिग रहेंगे हेमंत सोरेन</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>रांची: </strong>कांके के नगड़ी गांव में रिम्स-2 के निर्माण कार्य पर ग्रहण लगता दिख रहा है। जमीन अधिग्रहण के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन अब बड़ा रूप ले चुका है। पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन, भाजपा सहित कई आदिवासी और जन संगठनों ने विरोध तेज कर दिया है। प्रशासन का कड़ा रूख व सुरक्षा की चाक -चौबंद व्यवस्था, चंपई सोरेन को हाउस अरेस्ट किए जाने, उनके समर्थकों को रास्ते में ही रोक देने सहित कई निरोधात्मक कार्रवाई की गई। बावजूद रविवार को हजारों लोग नगड़ी पहुंच गए। खेत जोता और धान की रोपनी की। पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://samridhjharkhand.com/state/jharkhand/ranchi/will-hemant-soren-be-adamant-on-his-decision-in-nagdi/article-15801"><img src="https://samridhjharkhand.com/media/400/2025-08/resized-image-(52)3.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>रांची: </strong>कांके के नगड़ी गांव में रिम्स-2 के निर्माण कार्य पर ग्रहण लगता दिख रहा है। जमीन अधिग्रहण के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन अब बड़ा रूप ले चुका है। पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन, भाजपा सहित कई आदिवासी और जन संगठनों ने विरोध तेज कर दिया है। प्रशासन का कड़ा रूख व सुरक्षा की चाक -चौबंद व्यवस्था, चंपई सोरेन को हाउस अरेस्ट किए जाने, उनके समर्थकों को रास्ते में ही रोक देने सहित कई निरोधात्मक कार्रवाई की गई। बावजूद रविवार को हजारों लोग नगड़ी पहुंच गए। खेत जोता और धान की रोपनी की। पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े और लाठी चार्ज करनी पड़ी। इसके बाद आंदोलन और तेज होने की संभावना है। </p>
<p style="text-align:justify;">रांची में सिरम टोली फ्लाईओवर निर्माण के विरोध के बाद यह दूसरा मौका है, जब आदिवासी संगठनों व राजनीतिक दलों की ओर से नगड़ी में रिम्स-2 के निर्माण कार्य का एकजुट होकर विरोध किया जा रहा है। करीब दो महीने के अंदर ही आदिवासी समाज के लोग मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सरकार के फैसले के खिलाफ सड़कों पर उतरकर उग्र विरोध कर रहे हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">सिरम टोली में आदिवासियों ने सरना स्थल को बचाने की लड़ाई लड़ी और अब नगड़ी में जमीन बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। सिरम टोली के आंदोलन में चंपई सोरेन खुलकर सामने नहीं आए थे। लेकिन नगड़ी में वह नेतृत्व करने की तैयारी में हैं। सरकार को उन्होंने चुनौती दे डाली है। कहा है कि किसी सूरत में  नगड़ी में आदिवासियों की जमीन पर निर्माण नहीं होने देंगे। सरकार कहीं और सरकारी जमीन देखकर रिम्स-2 का निर्माण करें। वह अस्पताल के निर्माण के खिलाफ नहीं है। </p>
<p style="text-align:justify;">सिरम टोली फ्लाईओवर निर्माण के मामले में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन विकास के नाम पर झुके नहीं। तमाम आंदोलन और विरोध के बावजूद सिरम टोली फ्लाईओवर का निर्माण कार्य समय पर पूरा हुआ और मुख्यमंत्री ने नहीं इसका उद्घाटन किया। हेमंत सोरेन ने यह संदेश दिया कि वह विकास के मुद्दे पर झुकेंगे नहीं। तो क्या नगड़ी के मामले में भी यही होगा। मुख्यमंत्री नहीं झुकेंगे और यहां निर्माण कार्य होगा। सरकार तो अभी तक यही संदेश और संकेत दे रही है। आगे क्या होगा यह कहना मुश्किल है। लेकिन यदि मुख्यमंत्री सिरम टोली की तरह नगड़ी में भी भी अपने निर्णय पर अड़े रहे तो फिर अस्पताल का निर्माण होकर रहेगा। नगड़ी आंदोलन में अब सरकार के विरोधी एकजुट हो गए हैं। इसलिए हेमंत सोरेन शायद ही अपना कदम पीछे खींचे।  स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी बार-बार कह चुके हैं कि नगड़ी में ही रिम्स- 2 का निर्माण होगा। क्योंकि यह मुख्यमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट है। नगड़ी में निर्माण को लेकर कांग्रेस में भी मतभेद है। </p>
<p style="text-align:justify;">बहरहाल अब सबकी निगाहें मुख्यमंत्री पर टिकी हैं। जल जंगल जमीन और दिशोम गुरु स्वर्गीय शिबू सोरेन की दुहाई देकर भी सरकार को इस मुद्दे पर घेरने की कोशिश की कोशिश हो रही है।<br /> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>समाचार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>रांची</category>
                                            <category>झारखण्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 25 Aug 2025 01:20:29 +0530</pubDate>
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