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झारखंड में डीएमएफ फंड का उपयोग एनर्जी गैप को भरने में करना एक अच्छा विकल्प : स्टडी

डीएमएफ की राशि के व्यय के लिए ऊर्जा क्षेत्र को अन्य प्राथमिकता वाला नहीं प्राथमिकता वाले क्षेत्र में लाना जरूरी 

रांची : पिछले सप्ताह आइफॉरेस्ट की एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि झारखंड जैसे खनिज उत्पादक राज्य में डीएमएफ के पैसे का उपयोग एनर्जी गैप को भरने में करना एक अच्छा विकल्प हो सकता है। आइफॉरेस्ट ने अपने अध्ययन में उन इकाइयों या क्षेत्रों को चिह्नित किया है, जहां एनर्जी गैप को भरने में डिस्ट्रिक्ट मिनरल फंड की राशि का उपयोग किया जा सकता है। इसमें स्वास्थ्य केंद्र, आंगनबाड़ी केंद्र, विद्यालय, कृषि, कृषि आधारित लघु उद्योग, सामुदायिक स्तर पर रौशनी का प्रबंध और जलापूर्ति शामिल है।

इस रिपोर्ट में आइफॉरेस्ट ने इन इकाइयों में डिस्ट्रिब्यूटेड रिन्यूबल एनर्जी आपूर्ति संयंत्र स्थापित करने के लिए लगने वाली लागत का भी उल्लेख किया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि डीएमएफ रूल 2016 में इसकी राशि से काम करने के लिए आठ उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्र और चार प्राथमिकता वाले क्षेत्र चिह्नित किए गए हैं। उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्र में पेयजल उन्नयन के लिए आधारभूत संरचना का विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छता, सामाजिक कल्याण, आजीविका, कौशल विकास, प्रदूषण नियंत्रण शामिल हैं, जबकि अन्य प्राथमिकता वाले क्षेत्र में आधारभूत संरचना, ऊर्जा, सिंचाई साधनों का विकास आदि शामिल हैं।

इस रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड में डीएमएफ मद में 8301 करोड़ रुपये एकत्र हुआ, जिसमें 5704 करोड़ रुपये प्रोजेक्ट के लिए मंजूर किए गए। इस रिपोर्ट के अनुसार, इसमें 80 प्रतिशत राशि पेजयल के लिए खर्च की गयी, 11 प्रतिशत स्वच्छता के लिए, दो प्रतिशत स्वास्थ्य एवं एक प्रतिशत शिक्षा के लिए।

रिपोर्ट के अनुसार, ऊर्जा क्षेत्र को अन्य प्राथमिकता वाले क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया गया है, जबकि आवश्यकता इस बात की है कि खनन वाले जिलों में डिस्ट्रिब्यूटेड रिन्यूबल एनर्जी को प्राथमिकता वाले क्षेत्र के रूप में चिह्नित कर डीएमएफ राशि का उसमें निवेश बढाया जाए।

आइफॉरेस्ट ने अपने अध्ययन में एक अन्य अध्ययन का हवाला दिया है जिसके अनुसार, जलवायु परिवर्तन यानी क्लाइमेट चेंज के लिहाज से देश का सबसे संवेदनशील राज्य है। झारखंड में भी अत्यधिक खनन वाले जिले जलवायु परिवर्तन को लेकर अधिक संवेदनशील हैं, जिसमें बोकारो, हजारीबाग, गिरिडीह, चतरा, साहिबगंज, पाकुड़ आदि जिले शामिल हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि डीएमएफ की राशि से एनर्जी गैप को भरा जाये, जिससे बाल पोषण व स्वास्थ्य, सिंचाई, लघु उद्योग व शिक्षा आदि स्तरों पर सुधार हो।

इस अध्ययन में यह कहा गया है कि खनन वाले जिले क्लीन एनर्जी फॉर सोशल इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड लाइवलीहुड प्रोग्राम का संचालन कर सकते हैं, जिसके जरिए ग्रामीण आबादी का सामाजिक और आर्थिक उन्नयन हो सके। इसमें कहा गया है कि सबसे अधिक महत्वपूर्ण व नाजुक क्षेत्रों स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, आजीविका पर डीएमएफ के तहत फोकस किया जाना चाहिए।

क्लीन एनर्जी फॉर सोशल इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड लाइवलीहुड प्रोग्राम के तहत 100 सौर ग्राम स्थापना जैसी पहल का भी सुझाव इस रिपोर्ट में दिया गया है। इन गांवों में सोलर मिनी ग्रिड की स्थापना की जा सकती है और प्राथमिकता वाले क्षेत्र को विद्युत आपूर्ति की बात कही गयी है। इस पहल के लिए ऐसे गांवों का चयन किया जाए जहां या तो विद्युत आपूर्ति वर्तमान में नहीं हो या फिर उसकी गुणवत्ता बहुत खराब हो।

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