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मध्य प्रदेश में आदिवासी ग्रामीणों की प्यास बुझाने वाला सामुदायिक प्रयास

सतना जिले के केल्हौरा में रहने वाले लोग पानी की अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने और अपने मवेशियों के लिए पानी का जुगाड़ करने के लिए कुओं और तालाबों को पुनर्जीवित कर रहे हैं. उनके इस सामुदायिक प्रयास में स्थानीय एनजीओ ने उनकी मददकी है.

राकेश कुमार मालविया

सतना, मध्यप्रदेश: मार्च 2019 में मध्य प्रदेश के सतना जिले के केल्हौरा के तीस लोग अपने गांव के कुएं की मरम्मत के लिए एक साथ आगे आए. उनके यहां पानी का नजदीकी स्रोत यही कुआ था, जो गर्मी के दिनों में अक्सर सूख जाता था. 48 साल की रेखा मवासी इन सभी का नेतृत्व कर रहीं थीं. लगभग 10 दिनों तक उन्होंने लगातार प्रयास किया. उनकी मेहनत रंग लाई और वे कुएं की गहराई को 60 फीट तक बढ़ाने में कामयाब हो गए. कुएं में आया पानी अब उनके मवेशियों की प्यास बुझाने के लिए भी काफी था.

रेखा ने 101Reporters को बताया, “जब से कुएं को साफ और गहरा किया गया है, तब से पानी का संकट कम हो गया है. गांव वालों को अब पानी लाने के लिए दो से तीन किमी दूर जाने की जरूरत नहीं पड़ती है. ”

मझगवां ब्लॉक में 96 ग्राम पंचायतें शामिल हैं. उन्हीं में से एक केल्हौरा भी है. यहां हालात कभी भी अच्छे नहीं थे. फरवरी के महीने में जैसे ही गर्मी के दिन शुरू होते, जल संकट गहराने लगता था. अप्रैल और मई में तो पानी की कमी और भी बढ़ जाती. वैकल्पिक जल स्रोत का अभाव था. सो स्थानीय लोगों के पास पानी खोजने के लिए कुओं या तालाबों में छोटे-छोटे गड्ढे खोदने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था. पानी की मांग इतनी ज्यादा थी कि लोग रात भर कतार में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करते थे.

प्यासे दिन

सतना जिला ढेर सारे पहाड़ों और जंगलों से घिरा है. यहां लगभग 14 प्रतिशत जनजातीय आबादी है. इनमें मवासी, कोल, गोंड और खरवार समुदाय बहुसंख्यक हैं. ज्यादातर स्थानीय लोग कुपोषण से पीड़ित हैं, भले ही वे किसी भी समुदाय से हों. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की पांचवीं रिपोर्ट के अनुसार, जिले में 31 फीसदी बच्चे कम वजन के हैं और 49 फीसदी बच्चे अविकसित हैं. इसके अलावा, यह क्षेत्र जलवायु परिवर्तन से काफी ज्यादा प्रभावित है. यहां कभी भारी बारिश के कारण बाढ़ आ जाती है, तो कई बार सूखे जैसी स्थितियां बन जाती हैं.

एक सामाजिक संगठन विकास संवाद समिति, यहां खाद्य और पोषण सुरक्षा के समुदाय-आधारित प्रबंधन मॉडल पर काम कर रहा है. इस समिति के जिला समन्वयक प्रतीक कुमार ने कहा, “हमने महसूस किया कि यहां पानी की समस्या को दूर किए बिना खाद्य सुरक्षा के बारे में बात करना बेमानी है. पानी की कमी के चलते चार से छह महीने में सभी सामुदायिक प्रयास विफल होते नजर आने लगते . इससे बचने के लिए हमने अपने प्रोजेक्ट में पानी से जुड़े कामों को शामिल किया और सामुदायिक बैठकों में इस समस्या पर चर्चा की ”.

 

मध्य प्रदेश में आदिवासी ग्रामीणों की प्यास बुझाने वाला सामुदायिक प्रयास.

 

केल्हौरा में रहने वाले 55 साल के मणिराम मवासी ने कहा, ” गांव की चौपालों या बैठकों में ही समुदाय ने वाटरशेड प्रबंधन योजना के तहत एक तालाब खोदने पर सहमति व्यक्त की थी ताकि बारिश का पानी जमा हो सके.”

मार्च 2019 में 40 पुरुषों और 30 महिलाओं ने एक तालाब खोदने के लिए हर दिन छह घंटे तक काम करना शुरू कर दिया था. लगातार तीन दिन काम करने के बाद उसमें पानी आ गया. अगले कुछ दिनों में एक और गड्ढा तैयार किया जो जल्द ही पानी से भर गया था.

मझगवां में जनस्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग में तकनीकी सहायक के पद पर कार्यरत कृष्ण कुमार मिश्रा ने बताया, ”पहले यहां पानी की कमी नहीं थी. 10 से 15 साल पहले जमीन से 100 से 150 फीट नीचे पानी मिल जाता था, लेकिन फिर ट्यूबवेल बोरिंग के जरिए पानी लेने के लिए हमें 300 फीट से ज्यादा खोदना पड़ने लगा.

 

रेखा मवासी, जिन्होंने पानी की समस्या को हल करने के लिए केल्हौरा, सतना में 30 लोगों के समूह का नेतृत्व किया.

 

केल्हौरा की तरह इसी प्रखंड के किशनपुर में भी स्थिति इतनी ही गंभीर थी. मवासी आदिवासियों के वर्चस्व वाले गांव के तीन कुएं, एक तालाब और दो हैंडपंप सूख चुके थे और लोगों को नजदीकी कुएं से पानी लाने के लिए दो से तीन किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता था. हालात इतने खराब थे कि कई लोगों ने अपने मवेशियों को पास के जंगलों में खुला छोड़ दिया.

2019 में पानी की कमी को दूर करने से पहले वो जिस तरह की मुश्किलों से दो-चार हो रहे थे, उसे याद करते हुए एक स्थानिय निवासी ने बताया, “कुएं में रात भर में पानी जमा हो जाता था और लोग लंबी कतारों में इंतजार करते थे. बच्चों को बर्तन भरने के लिए नीचे उतारा जाता. वह कुए की मुंडेर पर खड़े अपने परिजनों को तले से पानी भरकर पहुंचाते. गांव वाले अकसर अपनी बारी को लेकर झगड़ते रहते थे.”लोगउन्हेंप्यारसेभैयाआदिवासीकहतेहैं.

पानी लाने की ज्यादातर जिम्मेदारी महिलाएं और बच्चों के कंधों पर होती थी और वही इससे सबसे ज्यादा प्रभावित थे. पानी की कमी ने इनके कामों को मुश्किल बना दिया था. बच्चे पढ़ नहीं पा रहे थे, क्योंकि उनका ज्यादातर समय पानी का इंतजाम करने में बीत रहा था.

केल्हौरा पंचायत के तगारपार गांव में रहने वाले 32 आदिवासी परिवारों में से सिर्फ आठ के पास लगभग दो एकड़ जमीन है. बाकी सब खेतिहर मजदूर हैं. गांव के दो सरकारी हैंडपंप हर बार गर्मी में सूख जाते थे. रेखा ने बताया, “सरकार ने लगभग 20 साल पहले एक कुआं खोदना शुरू किया था, लेकिन यह आज तक अधूरा है. हर मानसून में  बारिश का पानी कुएं को कचरे से भर देता है, जिससे यह और भी बेकार हो जाता.”

खुद से खुद की मदद सबसे बेहतर

जहां स्थानीय लोगों ने शारीरिक श्रम किया, वहीं विकास संवाद समिति ने कुओं को गहरा करने के लिए उन्हें सारा जरूरी सामान मुहैया कराया.

उस प्रयास की सफलता ने अन्य गांवों के लोगों को एक साथ आगे आने और पानी के संकट को हल करने के लिए प्रोत्साहित किया. विकास संवाद के अनुसार इलाके के 25 गांवों में कुओं की सफाई की गई और उन्हें गहरा करने का काम किया गया. इसके अलावा तालाब भी खोदे गए. 2019 में किरहाई पोखरी, कानपुर, पाडो और किशनपुर के गांवों में चार तालाबों को गहरा किया गया. तगरपार, वीरगढ़, किशनपुर और कानपुर में चार कुओं का कायाकल्प भी किया गया.

कुओं का जल स्तर अब 10 से 15 फीट बढ़ गया है. और तीन साल पहले जिस तरह से वे भीषण गर्मी में सूख जाते थे, अब वैसी स्थिति नहीं रही है. स्थानीय लोगों ने कानपुर, पटनी, दादिन और किशनपुर में चार कुओं को पुनर्जीवित किया है. इसके अलावा पुट्रिचुआ गांव में एक छोटी सी नहर भी खोदी. चितहरा और कानपुर में 15 एकड़ से अधिक कृषि भूमि पर सिंचाई का कार्य किया गया है.

पुनर्जीवित किए गए कुओं का जल स्तर बढ़ा है. अब यह गर्मियों में पूरी तरह से सूखते नहीं हैं
पुनर्जीवित किए गए कुओं का जल स्तर बढ़ा है. अब यह गर्मियों में पूरी तरह से सूखते नहीं हैं

 

किशनपुर के भाई मवासी ने कहा, “हमें अहसास हो गया है कि अब हमारा गांव पहले की तरह पानी की कमी से नहीं जूझता है. हमारे पास अपने मवेशियों को पालने और खेती करने के लिए पर्याप्त पानी है.”

पानी की कमी न होने से कृषि उपज भी बढी है. लगभग 150 परिवारों ने दावा किया कि 25 प्रतिशत ज्यादा पैदावार हुई हैं. वे सभी पत्तेदार सब्जियां उगा रहे हैं. और उन्हें बाजार में बेचकर अतिरिक्त कमाई कर रहे हैं. इतना ही नहीं, कई ग्रामीणों ने अपनी खाने-पीने की आदतों में भी सुधार किया है. वो इन सब्जियों को अपने खाने में शामिल कर रहे हैं और अपने भोजन में पोषण के इनटेक को बढा रहे हैं.

लेकिन एक गलत फैसला या कहें कि गलत फसल उगाने का विकल्प, सालों बाद दूर हुई पानी की किल्लत को फिर से बढ़ा सकता है. उदाहरण के लिए बनहरी गांव के रामलाल मवासी ने अपने खेत के पास के कुएं की मरम्मत के सामुदायिक प्रयासों में योगदान दिया था. अब उनके पास मवेशियों के साथ-साथ सिंचाई के लिए भी पर्याप्त पानी है. रामलाल ने इस साल पत्तेदार साग के अलावा ज्यादा फायदे के लिए गन्ने की खेती का सहारा लिया है. यह एक पानी सोखने वाली फसल है. जरूरत से ज्यादा पानी मिलने की खुशी का स्वाद चखने वाले इस इलाके में फसल की पसंद का प्रभाव अभी देखा जाना बाकी है.

मध्य प्रदेश के जल-संरक्षण विशेषज्ञ रहमत मंसूरी ने चेतावनी दी कि “जिन क्षेत्रों में बड़े प्रयासों से पानी का संरक्षण किया जा रहा है, उन्हें गन्ना जैसी फसल लगाने से बचना चाहिए.”

उन्होंने कहा, ” सिर्फ पुनर्जीवित किए गए पानी के स्रोत के इस्तेमाल पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए, बल्कि आस-पास के क्षेत्रों को समान रूप से इसका लाभ मिले इस पर भी ध्यान दिए जाने की जरुरत है.”

सामुदायिक पहल ने लगभग 2,000 ग्रामीणों और 1,000 मवेशियों के लिए स्वच्छ पानी मुहैया कराया है. वे अब तक 20 गांवों में लगभग 35 कुओं को पुनर्जीवित करने के लिए एक साथ आगे आए हैं.

किशनपुर के मोहन मवासी कहते हैं, “अब जबकि हमारे तालाब गहरे हो गए हैं, हमें पानी की कमी से जूझना नहीं पड़ता है. साल भर उन्हें पानी से भरा देख बहुत अच्छा लगता है.”

 

 

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