Breaking News

समीक्षा: मौजूदा ज्ञान के प्रति हमारा नज़रिया बदलने की अमिताभ घोष की कोशिश

‘महापर्बत’ में अमिताभ घोष एक ऐसी कहानी पेश करते हैं जिसमें मानवता निषिद्ध चोटियों तक पहुँचने की तलाश में पर्यावरणीय कयामत की ओर बढ़ रही है।

तिब्बती पठार पर बर्फ से ढके कैलाश पर्वत के सामने प्रार्थना के झंडे। ये पहाड़ दुनिया के सबसे पवित्र पहाड़ों में से एक है, और इस पर चढ़ना प्रतिबंधित है। (फोटो: अलामी)

‘महापर्बत’ में अमिताभ घोष एक ऐसी कहानी पेश करते हैं जिसमें मानवता निषिद्ध चोटियों तक पहुँचने की तलाश में पर्यावरणीय कयामत की ओर बढ़ रही है।

 

स्रोत : द् थर्ड पोल। : यह आलेख मूल रूप से एक क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेंस के तहत द् थर्ड पोल पर प्रकाशित हुआ था।

ओमेर अहमद

हाल ही में आई अमिताभ घोष की किताब ‘महापर्बत: एक कहानी हमारे दौर की’ पर प्रतिक्रिया देना आसान नहीं है। किसी भी समीक्षा में, हम अक्सर यह बताने की कोशिश करते हैं कि एक किताब क्या हासिल करना चाहती है, लेखक ने उसे हासिल करने की कोशिश कैसे की और क्या वे उसे हासिल करने में कामयाब हो पाएं?

लेकिन अगर किताब 35 पन्नों की हो तो हम उसे उन्हीं मापदंडों पर नहीं आंक सकते जिन पैमानों पर हम लंबी किताबों का विश्लेषण करते हैं। परिभाषा की मानें तो एक फेबल यानी कहानी में हम उन चीजों की उम्मीद नहीं कर सकते जो हम नॉवल्ज़ में करते हैं। यानी एक छोटी सी कहानी में कैरेक्टर डेवलपमेंट या असाधारण परिस्थितियां में इंसान कैसे फ़ैसलें लेते हैं, इन बातों पर कम ध्यान दिया जाता है।

इस तर्क को सामने रखने का मतलब यह नहीं है कि ये किताब मामूली है या इसमें गंभीरता नहीं है। मानव इतिहास में तो सदियों से कोआन और नैतिक कहानियों की अहम जगह रही है। इन कहानियों की संक्षिप्तता इनकी ताकत है, कमज़ोरी नहीं। ठीक उसी तरह, एक सपने पर अधारित अमिताभ की यह कहानी अपनी सादगी की वजह से और भी प्रभावशाली बन जाती है।

 

उपनिवेशवाद से भी परे

‘महापर्बत’ की कहानी एक ऐसे युद्धरत समुदाय पर आधारित है जो बर्फ़ से ढके एक विशालकय पहाड़ के पास रहते हैं। घाटी के सभी लोग इस पहाड़ के प्रति श्रद्धा रखते हैं। गांववालों का फैसला था कि वो कभी भी ‘महापर्बत’ की ढलानों पर कदम नहीं रखेंगे। लेकिन बाद में ‘एंथ्रोपोइ’ नाम के अजनबियों की एक सेना ने उन पर हमला कर दिया और वो उनके गुलाम बन गए। पहाड़ के अंदर छुपे खनिजों और धातुओं की लालच में एंथ्रोपोइ महापर्बत पर चढ़ना चाहते थे और इस काम में उन्होंने घाटी के लोगों की मदद ली।
एंथ्रोपोइ महापर्बत पर चढ़ते रहे और उसी बीच नीचे घाटी में कुछ लोगों ने तय कर लिया कि वो एंथ्रोपोइ की गुलामी में नहीं रहेंगे और वे भी पहाड़ पर चढ़ने की कोशिश करने लगें। इस वजह से घाटी में उथल-पुथल मच गई क्योंकि सभी एक दूसरे के ऊपर अपनी प्रधानता दिखाना चाहते थे। अमिताभ इस मंज़र को इस तरह बयां करते हैं: “हमारी घाटी में रक्तपात का तांडव मच गया। हमारे साथ इतने बड़े पैमाने पर खूनखराबा और तबाही तो एंथ्रोपोइ ने भी नहीं की थी।”

जैसे-जैसे वो महापर्बत पर चढ़ते हैं, उन्हें ये पता चलता है कि पहाड़ अस्थिर होता जा रहा है। उन्हें विनाशकारी भूस्खलन और हिमस्खलन के मंज़र नज़र आते हैं। उनके हर एक कदम से विनाशकारी आपदा उनके और करीब आती जाती है। लेकिन इसके बावजूद वो वापस नहीं जाना चाहते, हालात अब ऐसे हो चुके है कि वो चाह कर भी अब वापस नहीं लौट सकते।

साल 2004 में आई अमिताभ की किताब ‘द हंगरी टाइड’ के बाद उन्होंने अपनी कहानियों में उपनिवेशवाद और औद्योगीकरण के विषयों का ज़िक्र किया है। ‘महापर्बत’ की ये कहानी भी उपनिवेशवाद और औद्योगीकरण के इतिहास की एक कहानी के रूप में देखी जा सकती है। लेकिन इस कहानी का नैतिक सबक आसान शब्दों में नहीं बताया गया है।

इस कहानी में तबाही का ज़िम्मेदार किसी एक को नहीं बनाया गया है बल्कि किसी को भी बख्शा नहीं गया: ना ही उपनिवेशवादियोंं, ना ही उन लोगों को जिन्हें पहले कोलोनाइज़ करके रखा गया और ना ही उन एंथ्रोपोइ वैज्ञानिकों को जो ‘सतत विकास’ की बातें कर रहे थे। लोग पहाड़ की ऊंचाई तक पहुँचने की एक ऐसी दौड़ का हिस्सा बनाया जिसमें शामिल होने का मतलब था कि पैरों तले पूरी दुनिया तबाह होती नज़र आएगी।

 

क्या इस कहानी में है हिमालय के निशान?

अन्य फेबल्स की तरह इस कहानी में भी इस बात का ज़िक्र नहीं है कि ये कहानी किस जगह की है। लेकिन कहानी के कुछ अंश ऐसे हैं जो हिमालय की तरफ़ इशारा करते हैं। एक उदाहरण है इस किताब का नाम: महापर्बत।

दूसरा संकेत इतना स्पष्ट नहीं है। वैसे तो कई संस्कृतियों में पहाड़ों को पवित्र स्थलों के रूप में देखा जाता हैं, लेकिन जब बात हिमालय की आती है तो इसका महत्व थोड़ा अधिक है। उदाहरण के लिए, तिब्बती पठार पर कैलाश पर्वत को बॉन, हिंदू, बौद्ध और जैन परंपराओं में पवित्र माना जाता है।

पहाड़ पर चढ़ने पर प्रतिबंध घोष की कहानी का एक अहम हिस्सा है। ठीक ऐसा ही प्रतिबंध आज भूटानी निषेधों में भी देखा जा सकता है। भूटान में दुनिया की कुछ सबसे ऊंची चोटियां हैं। भूटान ने साल 1994 में 6,000 मीटर से ऊपर पर्वतारोहण पर प्रतिबंध लगा दिया था। साल 2003 में पर्वतारोहण पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया था।

इसके पीछे का कारण था: बढ़ते खतरें, विवाद, दुर्भावना और कचरा जिसने माउंट एवरेस्ट के व्यावसायिक शिखरों को कलंकित कर दिया है।

एक दूसरा संकेत यह भी है कि कहानी में फैसला लेने वाले लोगों के बीच औरतों की संख्या कम होती गई। जैसे-जैसे लोग प्रगति के नए तरीकों की तरफ़ ध्यान देने लगें, औरतों की अहमियत को लोग नज़रअंदाज़ करने लगें। इन तरीकों से आखिरकार पर्यावरण का बहुत नुकसान हुआ।

साल 2010 में इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट द्वारा प्रकाशित “माउंटेन डेवलपमेंट में जेंडर पर्सपेक्टिव्स” में कहा गया है कि हिमालय में, “बहुत छोटे और अधिक अवक्रमित वन प्राप्त करने के बावजूद, सभी महिला समूह अन्य समूहों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं।”

 

वैश्विक सांस्कृतिक रीतियों में पर्यावरण का स्थान

‘महापर्बत’ का दृष्टिकोण संकीर्ण नहीं है। इस किताब की एक दिलचस्प बात ये है कि ये दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पाए जाने वाले एक तरीके के सांस्कृतिक विषयों को आपस में जोड़ती है। घोष प्रचलित हैं और बहुपठित भी। कभी न कभी उन्होंने 2005 में आए गोरिल्लाज़ नाम के एक बैंड का गाना, “फायर कमिंग आउट ऑफ़ द मंकीज़ हेड,” ज़रूर सुना होगा। इस गाने में “हैप्पीफोक” मंकी नाम के पहाड़ के नीचे शांति से रहते थे। लेकिन ये खुशी का मंज़र बस तब तक रहता है जब तक “स्ट्रेन्जफोक” नहीं आते। स्ट्रेन्जफोक आते ही पहाड़ पर खनन करना शुरू करते हैं जिससे आस पास की दुनिया में अस्थिरता और विनाश आ जाता है।

इस गाने की तरह ये किताब भी हमें अंत में ये दिखाता है कि कयामत हमारे बहुत पास है। लेकिन इन दोनों जगह कोई आसान जवाब नहीं मिलता। लेकिन ये हमें मजबूर करता है कि हम उस ज्ञान पर एक और नज़र डालें जो हमें आज तक मिलता आया है, हमें सवाल पूछने पर मजबूर करता है: क्या हमें उन लोगों से इस ज्ञान को लेना चाहिए जिनकी वजह से हम आज यहां खड़े हैं? क्या हमें वापस अपनी पुरानी कथाओं को सुनने की ज़रूरत है जिसे हमने कभी ठुकरा दिया था?

ये कहानी और वो गाना हमें ये बताते है कि वैश्विक सांस्कृतिक रीतियाँ पर्यावरण संबंधित मुद्दों और चिंताओं के इर्द-गिर्द ही घूमती है। और इन कहानियों के केंद्र हैं पहाड़।

संपादक का नोट: यह समीक्षा 4 जुलाई को इंडिया टुडे में छपे एक समीक्षा का विस्तारित संस्करण है।

(ओमेर अहमद द् थर्ड पोल में दक्षिण एशिया के मैनिजिंग एडिटर हैं। उन्होंने राजनीतिक विश्लेषक और पत्रकार के रूप में काम किया है। उन्होंने अपने काम में हिमालयी क्षेत्र पर विशेष ध्यान दिया है। वह भूटान के राजनीतिक इतिहास और कुछ उपन्यासों के लेखक हैं।)

 

यह आलेख द थर्ड पोल से साभार लिया गया है। द थर्ड पोल पर इस आलेख को हिंदी और अंग्रेजी में पढने के लिए क्रमशः इन लिंक को क्लिक करें।

यह भी देखें