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कोरबा : धूल, धुआं और धुंध वाले शहर में एक दिन और उसकी चुनौतियां

कोरबा की एक कोयला बिजली उत्पादन इकाई। Photo - Rahul Singh

राहुल सिंह

कोरबा के बारे में सुना था, पढा था। आंकड़ों को भी देखा था। पर, इस सप्ताह के शुरुआत में पहली बार उस शहर को देखने का मौका मिला। धूल, धुआं और काली धुंध से ढके एक शहर को देखना मेरे लिए एक अजीब अनुभव था। जबकि मुझे बेहद प्रदूषित शहर धनबाद का बहुत करीब का अनुभव रहा है। मैं इस बात की ठीक से कल्पना नहीं कर सकता कि बारिश के मौसम और बारिश वाले दिन जब कोरबा शहर ऐसा नजर आता है तो सूखे दिनों में यहां कैसी स्थिति रहती होगी? शायद उसे महसूस करने के लिए वैसे दिनों में एक बार जाना हो।

कोरबा देश की कोयला राजधानी कहे जाने वाले धनबाद से इस मायने में अलग है कि यहां कोयला ताप बिजली संयंत्रों की चिमनियां बड़ी संख्या में नजर आती हैं, जबकि धनबाद में पॉवर प्लांट इतनी बड़ी संख्या में नहीं हैं। हां, धनबाद के निरसा इलाके में कोल भठ्ठियों की चिमनियां बड़ी संख्या में हैं। धनबाद व झरिया में सिर्फ कोयले की धूल प्रदूषण का बड़ा कारण है जो कोरबा में कोयला डस्ट के साथ चिमनियों का धुआं भी।

कोरबा की एक कोयला खदान।

 

छत्तीसगढ का कोरबा देश का सबसे बड़ा कोयला उत्पादक और कोयला बिजली उत्पादक जिला है। यहां 1941 में कोयला का खनन शुरू हुआ लेकिन 1955 में यहां का कोयला उत्पादन बड़ा आकार ले सका। कोयला उत्पादन में इसके बड़े योगदान की वजह से इसे कल का धनबाद भी कहा जा सकता है, जहां कोयला खनन का इतिहास सवा सौ साल पुराना है।

कोरबा वर्तमान में अकेले देश का 16 प्रतिशत और छत्तीसगढ का 74 प्रतिशत कोयला उत्पादित कर रहा है। आइफॉरेस्ट की कोरबा पर इस साल के आरंभ में आयी जस्ट ट्रांजिशन रिपोर्ट के अनुसार, यह जिला 6428 मेगावाट ताप विद्युत उत्पादित करता है जो एक जिले के रूप में सर्वाधिक है। हाल के सालों में यह जिला 117 से 120 मिलियन टन कोयला का उत्पादन करता रहा है जिसके 2025 तक बढ कर 180 मिलियन टन पहुंचने का अनुमान है।

हसदेव नदी और उस पर बना बराज।

 

कोरबा में जब हम हसदेव नदी के तट पर पहुंचे तो उसका पानी मटमौला नजर आया। यह मालूम नहीं कि यह उसका स्थायी रंग है या बारिश की वजह से ऐसा है। फरक्का की तरह शहर के एक छोर पर ही हसदेव नदी पर बराज बना हुआ है।

कोरबा की तीन कोयला खदानों का ही 90 प्रतिशत योगदान उसके कुल कोयला उत्पादन में है। ये खदानें हैं – गेवरा, दीपका और कुसमुंडा। इस्टर्न कोल फील्ड लिमिटेड के नियंत्रण वाले ये तीनों खदानें ओपन कास्ट माइंस हैं। गेवरा का लीज एरिया 4184.5 हेक्टेयर है और इसकी उत्पादन क्षमता 49 मिलियन मिट्रिक टन है। दीपका का लीज एरिया 1999.3 हेक्टेयर है और उत्पादन क्षमता 35 हेक्टेयर है। जबकि कुसमुंडा का लीज एरिया 1,655.8 हेक्टेयर है और उत्पादन क्षमता 50 मिलियन टन है। आइ फॉरेस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, इन तीन खदानों के साथ मानिकपुर खदान लाभ की स्थिति में हैं, जबकि अन्य खदानें अलाभप्रद स्थिति में हैं। हालांकि इनमें एक सरायपल्ली का ब्यौरा उपलब्ध नहीं है। कोरबा में चार नई खदानें प्रस्तावित भी हैं।

कोरबा में एनटीपीसी सहित 11 बिजली उत्पादक कंपनियों की 26 इकाइयां चिमनियां हैं। देश में किसी एक जिले में इतनी संख्या में थर्मल पॉवर प्लांट नहीं हैं। 2585 हेक्टेयर में फैले इन संयंत्रों की संयुक्त उत्पादन क्षमता 6,428 मेगावाट है। इसके अलावा पांच कोल वाशरी, 20 फ्लाइ एश ब्रिक्स इकाइयां भी हैं। गैर मान्यता प्राप्त फ्लाइ एश ब्रिक्स की संख्या तीन गुणा अधिक होने का अनुमान है।

शहर में स्थित औद्योगिक संयंत्र।

 

अब इतना अधिक कोयला व बिजली उत्पादन के बाद सामान्यतः क्या यह मान लिया जाना चाहिए कि इस शहर का काफी औद्योगिकीकरण हो गया है और यहां सब चीजें दुरुस्त हैं? लेकिन, आंकड़े कड़वे हकीकत को बयान करते हैं। देश के ज्यादातर खनिज व कोयला उत्पादक जिलों की तरह ही कोरबा काफी पिछड़ा जिला है, जिस वजह से इसे केंद्र सरकार ने 112 आकांक्षी जिलों में शामिल किया है। कोरबा की 32 प्रतिशत आबादी बहुआयामी रूप से गरीब है, जबकि बीपीएल आबादी की संख्या 41.5 प्रतिशत है। जिले में इलाज के लिए सरकारी सुविधाओं पर 55 प्रतिशत निर्भरता है। ग्रामीण क्षेत्र में सरकारी स्वास्थ्य सुविधा पर निर्भरता 75 प्रतिशत है। केवल छह प्रतिशत आबादी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए कोयला व बिजली संयंत्रों की सुविधाओं पर निर्भर हैं और ये उनके कर्मचारी हैं और उनके कल्याणकारी कवर के दायरे में आते हैं। आंकड़े बताते हैं कि 35 प्रतिशत बच्चों में पोषण की कमी है और 28 प्रतिशत बच्चे अंडरवेट हैं। स्कूल में शुरुआती नामांकन का प्रतिशत 93 के आसपास है, लेकिन हाइयर सेकेंड्री लेवल पर पहुंच क रवह 58.75 प्रतिशत हो जाता है। 66 प्रतिशत लोग सरकारी स्कूल और 32 प्रतिशत परिवार निजी स्कूल बच्चों को भेजते हैं। मानव विकास के विभिन्न सूचकांक पर कोरबा का हाल बहुत बुरा है।

 

तो फिर विकास कहां है और क्या है?
खनन और जीवाष्म ईंधन उत्पादन आधारित विकास की सबसे बड़ी कीमत स्थानीय समुदाय को चुकाना होता है। कोरबा इसका अपवाद नहीं है। आने वाले दो-तीन दशकों में कोरबा और कई नई चुनौतियों से गुजरेगा। अध्ययन रिपोर्ट बताती हैं कि ये चुनौतियां अगले कुछ सालों में बढने वाले खनन और जस्ट ट्रांजिशन से जुड़ी होंगी। और, इस दरमियान कोरबा का आकाश और काला हो चुका होगा, उसकी हवाओं में और जहर घुल चुका होगा।

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