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ट्रांजिशन की चुनौतियां सिर्फ कोयला उत्पादक जिलों तक नहीं हैं सीमित, झारखंड के तीन जिले अति संवेदनशील

एनर्जी ट्रांजिशन पर नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया की आयी नयी रिपोर्ट में इसे सामाजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य में देखने-समझने की कोशिश की गयी है। यह कोयला उत्पादक जिलों के अलावा गैर कोयला उत्पादक जिलों के लिए भी उतना ही अहम है जो रोजगार व राजस्व के लिए कोयला पर आश्रित हैं। इस रिपोर्ट में झारखंड में तीन जिलों को ‘ट्रांजिशन के दौर’ में अति संवेदनशील जिले में शामिल किया गया है, जिसमें रांची भी शामिल है। पढें…

झारखंड के रामगढ जिले के भुरकुंडा में जिंदल का एक स्पंज आयरन स्टील प्लांट का दृश्य, जिसकी कोयलेे पर निर्भरता इस तसवीर में दिख रही है। फोटो : सुमित कुमार।

राहुल सिंह

एनर्जी ट्रांजिशन पर वैश्विक स्तर पर बहस तेज है और इस महीने के आरंभ में ग्रेट ब्रिटेन के ग्लासगो में हुए सीओपी26 में यह विषय चर्चा के केंद्र में रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सम्मेलन में भारत की ओर से 2070 तक नेट जीरो यानी शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य प्रस्तुत किया। कुछ स्तरों पर इसे एक अधिक दीर्घकालिक लक्ष्य माना जा रहा है और 2050 तक ऐसी उम्मीद की जा रही थी-है, लेकिन यह तय है कि इस समय अवधि के तीन चरणों में दुनिया बहुत बदल जाएगी। पहला चरण 2030 का, दूसरा 2050 और तीसरा चरण 2070 का होगा। इससे भारत के अत्यधिक कोयला उत्पादक राज्य झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल प्रमुख रूप से प्रभावित होंगे। इसके साथ अन्य राज्य मध्यप्रदेश, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र व उत्तरप्रदेश के कुछ हिस्से इस ट्रांजिशन से प्रभावित होंगे।

एनर्जी का यह ट्रांजिशन कोयला उद्योग के स्वरूप में या उसकी मांग खत्म होने के परिणाम स्वरूप होगा, जो भारत की ऊर्जा उत्पादन का मुख्य स्रोत है। एनर्जी ट्रांजिशन, जस्ट ट्रांजिशन या कोल ट्रांजिशन जैसे टर्म को लेकर विभिन्न संस्थाओं की ओर से हाल के महीनों में कई अध्ययन सामने आया हैं और इनमें नवीनतम अध्ययन नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया (NFI) का है। एनएफआइ ने इसी महीने जारी अपने अध्ययन रिपोर्ट को सोसियो इकोनॉमिक इंपेक्ट ऑफ कोल ट्रांजिशन इन इंडिया : बॉटम अप एनालिसिस ऑफ जॉब्स इन कोल एंड कोल कंज्युमिंग इंडस्ट्रीज (Socio-Economic Impacts of Coal Transition in India) नाम दिया है।

भुरकुंडा का एक बंद कोयला खदान।

जैसा कि नाम से स्पष्ट है कि यह कोल ट्रांजिशन के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों के आकलन के अध्ययन पर आधारित रिपोर्ट है और इस मायने में इस विषय पर आयी हालिया रिपोर्टाें से थोड़ी अलग है। यह वैश्विक पर्यावरणीय चुनौती के समक्ष ऊर्जा जरूरतों के स्वरूप में बदलाव के सामाजिक और आर्थिक प्रभाव के अध्ययन-आकलन का प्रयास है।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 13 मिलियन यानी 1.3 करोड़ लोग भारत में कोयला क्षेत्र, परिवहन, ऊर्जा, स्पंज आयरन, स्टील एवं ब्रिक्स सेक्टर पर रोजगार के लिए निर्भर हैं। इन सारे उद्योग प्रमुख आधार कोयला ही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कोयला ट्रांजिशन भारत के पूर्वी व मध्य स्थित राज्यों के लोगों को प्रभावित करेगा, जिसमें पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश के कुछ हिस्से, तेलंगाना, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश शामिल हैं।

इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 266 जिले कम से कम से कोयला आधारित एक परिसंपत्ति पर निर्भर है, जबकि 135 जिले ऐसे हैं जहां दो या दो से अधिक कोयला आधारित परिसंपत्तियां हैं। ध्यान रहे कि देश में कोयला उत्पादक जिलों की संख्या दो अंकों (70) में सीमित है। कुछ माह पूर्व एनर्जी ट्रांजिशन के रिसर्चर संदीप पई के अध्ययन में भी यह तथ्य सामने आया था कि भारत के 736 जिलों में 40 प्रतिशत किसी न किसी रूप कोयला पर निर्भर हैं

रामगढ के भुरकुंडा के निकट स्थित जिंदल का स्टील प्लांट। फोटो : सुमित कुमार।

स्वाति डिसूजा (Climate Action lead at NFI) के नेतृत्व में उनके और काव्या सिंघल (Research Associate – Climate Programme at NFI) द्वारा लिखे गए एनएफआइ की इस अध्ययन रिपोर्ट में कोयला ट्रांजिशन से प्रभावित होने वाले जिलों को तीन श्रेणी में विभाजित किया गया है। इन्हें कोयला ट्रांजिशन से प्रभावित होने वाले अत्यधिक संवेदनशील जिले (Highly Vulnerable District), मध्यम संवेदनशील जिले (Moderate Vulnerable District) और न्यूनतम संवेदनशील जिले (Least Vulnerable District) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। अत्यधिक संवेदनशील जिलों में झारखंड के तीन जिलों पाकुड़, पलामू व रांची को शामिल किया गया है, मध्यम स्तर पर संवेदनशील जिलों में देवघर व कोडरमा को शामिल किया गया है। वहीं, न्यूनतम संवेदनशील जिलों में गिरिडीह, हजारीबाग, रामगढ़, सिंहभूम, गोड्डा, धनबाद, बोकारो को शामिल किया गया है। इस अध्ययन के अनुसार, कोयला ट्रांजिशन से झारखंड के 24 में 15 जिले किसी ने किसी रूप में प्रभावित होंगे। यहां यह गौरतलब है कि राज्य के 24 में 12 जिलों में कोयला खनन होता है।

 

झारखंड से सटे बिहार के भागलपुर जिले (जहां 1992 में बना कहलगांव में एनटीपीसी का थर्मल पॉवर प्लांट है) को कोयला ट्रांजिशन से प्रभावित होने वाले अत्यधिक संवेदनशील जिले में शामिल किया गया है, जबकि भागलपुर में कोयला की कोई खदान नहीं है। हमने इसकीवजहों को जानने के लिए इस रिपोर्ट की सह लेखिका काव्या सिंघल से सवाल पूछा, जिसके जवाब में उन्होंने कहा, “हमलोगों ने अध्ययन में जिलों को विभाजित करने के लिए तीन मानकों को मुख्य आधार बनाया है, जिसमें कोयला उत्पादन, पॉवर प्लांट और स्टील व स्पंज आयरन उद्योग शामिल हैं”। काव्या के अनुसार, “इसके लिए कोयला, ऊर्जा एवं स्टील मंत्रालय के डाटा को अध्ययन व विश्लेषण का आधार बनाया गया। इसमें इस तथ्य पर गौर किया गया कि कहां कोयला उत्पादन ज्यादा है और वह जारी रहेगा, अगर पॉवर या स्पंज आयरन व स्टील के प्लांट हैं तो कितने नए हैं, उनकी क्षमता कितनी है। उन्होंने कहा कि अभी 85 प्रतिशत कोयला उत्पादन करने वाली खदानें अगले 20 से 30 सालों में बंद हो जाएंगी। तो ट्रांजिशन की चुनौतियों को इन तीनों प्रमुख क्षेत्रों में बदलाव के परिप्रेक्ष्य में समझने की यह एक कोशिश है।

कहलगांव में एनटीपीसी का थर्मल पॉवर प्लांट. Photo Credit – Hindustan Times.

यह अध्ययन कोयला आधारित ऊर्जा के समापन को एक व्यापक संदर्भ देता है और भागलपुर जैसे गैर कोयला उत्पादक जिले जहां 29 साल पुराना पॉवर प्लांट छोड़ कोई बड़ी औद्योगिक इकाई नहीं है, उसके बंद होने के बाद उत्पन्न चुनौतियों की ओर इंगित करता है। मोंगाबे की हाल में आयी एक रिपोर्ट के अनुसार, एक पॉवर प्लांट की उम्र 30 से 45 साल के बीच होती है

इस अध्ययन में झारखंड में अधिक संवेदनशील जिलों जहां कोल ट्रांजिशन से बड़ी चुनौतियां उत्पन्न हो सकती है, उसमें रांची, पाकुड़ व पलामू को रखा गया है। पाकुड़ झारखंड के उत्तर पूर्व में स्थित बंगाल से सटा एक छोटा-सा जिला है, जहां कोयला खदान हैं और पत्थर की माइनिंग व उससे उत्पन्न हो रही पर्यावरणीय चुनौतियों के लिए यह चर्चा में रहता है। वहीं, पलामू पश्चिम उत्तर झारखंड में स्थित कोयला खनन वाला एक बड़ा व पुराना जिला है जो उत्तरप्रदेश, बिहार के करीब है। इस इलाके का औद्योगिकीकरण मध्य झारखंड या दक्षिणी झारखंड की तरह नहीं हो सका है। रांची भी अति संवदेनशील जिले में हैं, जिसके उत्तरी क्षेत्र में कोयला खनन होता है, लेकिन कई खदानें बंदी के कगार पर हैं। अध्ययन के अनुसार, बड़ी आबादी वाला यह जिला ट्रांजिशन को लेकर अधिक चुनौतीपूर्ण स्थितियों से गुजर सकता है। यहां यह तथ्य उल्लेखनीय है कि 2008 से अबतक 123 खदान बंद हुए हैं, वहां पर्यावरणीय उपचार व भूमि पुनर्वास के बहुत कम प्रमाण धरातल पर मिले है।

रिपोर्ट में जस्ट ट्रांजिशन प्रोग्राम को लेकर वैश्विक अनुभवों के अधार पर चार सवाल को ध्यान में रखते हुए कार्य करने की बात कही गयी है। ये सवाल हैं : 1. कोयला क्षेत्र में उत्पादन से सप्लाई चैन तक कितनी नौकरियां जुड़ी हैं? 2. उस जॉब प्रोफाइल की प्रकृति क्या है जो ट्रांजिशन के दौरान उसे संकट में डाल देगा? 3. प्रमुख कोयला संक्रमण क्षेत्रों में मजदूरों की सामाजिक-आर्थिक रूपरेखा क्या है? आसन्न संक्रमण के लिए कौन से जिले सबसे अधिक संवेदनशील हैं?

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